Saturday, January 6, 2024

शौर्य गाथा 100.

 भाई साहब को भी नेमप्लेट चाहिए। भाईसाहब की जिद है तो पापा को पूरी करनी पड़ेगी। पापा बनवा देते हैं। अब भाईसाहब दिन रात उसे लगाए घूम रहे हैं। जागते कुछ याद आए न आए, नेमप्लेट याद जरूर रहती है।

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भाईसाहब जागे है और जागते ही पापा की गोदी चढ़ गए हैं।
पापा भाईसाहब का गाल चूमते हुए गुड मॉर्निंग बोलते हैं। भाईसाहब पापा का चेहरा दोनों हाथों में लेकर पापा के होंठ अपने माथे पर रख देते हैं। पापा माथा चूमते हैं।
पापा को उनके इस एक्ट से स्वर्गानुभूति महसूस होती है।

Thursday, January 4, 2024

शौर्य गाथा 99.

 भाईसाहब दिन-ब-दिन बड़े हो रहे हैं और साथ ही बातूनी भी होते का रहे हैं। उनके मुख से निकले तोतले शब्दों को सुनना आनंददायक है। बोलने की समझ विकसित होते देख आप आश्चर्य से भर उठते हैं!

एक बार बोलते हैं "मम्मा ऑफिस में (ये अपने स्कूल को ऑफिस कहते हैं, जैसे मम्मा पापा का ऑफिस है वैसे ही इनका भी है।) मेले दोस्त मुझे चॉकलेट देते हैं l"
मम्मा: "लेकिन चॉकलेट खाना तो बुरी बात होती है।"
भाईसाहब तुरंत पलट जाते हैं "मम्मा, अले... चॉकलेट नहीं... बादाम दिया था।"
भाईसाहब में इतनी जल्दी आ रही समझ पर हम बहुत हंसते हैं।
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ऐसे ही भाई साहब की मौसी आई हुई है। उनके साथ उनकी 2 महीने की बेटी भी है। भाईसाहब देखकर बहुत खुश हैं। बोल रहे हैं "मैं खिलाऊंगा, अपने साथ रखूंगा।"
मम्मा: "अरे बेबी तो मेरी है ना।"
भाईसाहब: "अले! मेली भी तो है ना।"
भाईसाहब में किस बात पर 'भी' बोलना है किस बात पर नहीं की भी समझ आ गई है! इतनी समझदारी देखकर हम आश्चर्यचकित हैं।

Sunday, December 24, 2023

तुम्हारे प्रेम की कविताएं

 


मुस्कुराऊं तो मुस्कुराती हो

बेवजह गाल सहलाती हो

पीछे से आ लिपट जाती हो

बाल बिखराती हो, बारिश कराती हो

नींद में बुदबुदाती हो

कितने वादे करती हो, 

कितने याद दिलाती हो

जब भी खिलखिलाती हो

कितनी भोली नज़र आती हो

चूम लूं , लजाती हो।


तुम बहुत भाती हो।


**


सूख के तुम्हारे होंठों से झर जायेगी कविता

कभी उंगलियों की पोरों के उलझ जायेगी कविता

तुम्हारे माथे को चूम इक कविता उगा दूंगा

तुम्हारी करवट पर शांत सो जायेगी कविता।


तुम्हारे होने से पूर्व मैं एक कविता था

तुम्हारे आने के बाद तुम एक कविता हो।


उलझी गलियों में जब उलझोगी

मेरी कविता सीने से लगाना

यूं थम मेरी उंगली चले आना!


**


कुछ भी प्रेम हो सकता है,

रिसते हाथ

सिसकती सांस

सरकते होंठ

भीगी आंख.


प्रेम... बस प्रेम है!


**


कविता अधूरी

बैठी रही किसी कवि की याद में।


जैसे तुम्हारी राह तकते

मैं बैठा हूं,

दिल्ली में दिल लिए।


**


कनखियों से देखता तुम्हारा लजाना

सादगी से सीने में उतर जाना।


कविता की पहली किताब की तुम प्रेरणा होगी

कविता की आखिरी किताब का नज़राना।


तुम्हारी लटो में उलझ मार जाऊंगा,

एक रोज ऐसी कविता हो जाऊंगा।


प्रेरणा सृष्टि के जन्म की रही होगी,

कनाखियों से देखना तुम्हारा लजाना।


**


यह कविता

माफीनामा है

तमाम स्त्रियों से,

जिनसे मैंने पुरुष की

तरह व्यवहार किया।


जबकि मुझे मनुष्य होना चाहिए था।



**


तुम्हारे होने से ही है ये दुनिया

तुम्हारे होने से हैं ये घर।


कितना सुखद है

किसी के होने से

खुद के होने का एहसास होना।




शौर्य गाथा 97/98

 वर्ल्डकप को इक महीना हो गया है लेकिन भाईसाहब अभी भी क्रिकेट की ही खुमारी में हैं। "पापा मैं तोहली अंकल बनूंगा, आप बॉल फेंको।" पापा बॉल करते हैं।

"पापा मैंने फोर रन मारे।" फिर बोलते हैं "पापा मैं आपको आउट कर रहा।" इनके हाथ में बैट है और ये पापा को आउट कर रहे हैं! इसलिए पापा उन्हें समझाते हैं कि आउट करने के लिए बाउलिंग की जाती है।
भाईसाहब "अले तोहली अंकल तो बैट से आउट करते हैं ना पापा को।"
अब पापा क्या ही बोलें।
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फर्स्ट फ्लोर से हम भाईसाहब के बैट बॉल के साथ नीचे आ गए हैं। भाईसाहब तोहली अंकल' बने हुए हैं।
इन्हें प्यास लगने लगी है। "तोहली अंकल तो पानी पीना है पापा।" मैं पानी लेने ऊपर जाता हूं।
भाईसाहब नीचे से चिल्ला रहे हैं "आले तोहली अंकल ते पापा, तोहली अंकल ते पापा जल्दी नीचे आओ... नीचे। तोहली अंकल को बैटिंग करनी है...."
मम्मा पापा और कॉलोनी का हंस-हंस के बुरा हाल है। पापा पानी लेकर नीचे आते हैं। अपनी प्यास बुझाकर तोहली अंकल बैटिंग करने लगे हैं।

Friday, December 22, 2023

Papa's Letters to Shaurya #11thLetter

 

COVID ... ये समय सबसे तकलीफदेय था। याद करता हूं तो सिहर जाता हूं। हर वर्ष हर नवंबर का हर दिन बड़ी तकलीफ में कटता है। क्यों...? तुम बड़े होकर समझ जाओगे। तुम पंद्रह दिन के और हमें कोविड था... नाना नानी मामा मामी सब तकलीफ में। लगातार कोशिशें.. आंखों का पानी छिपाए... अपनी घबराहट छिपाए, कोशिशें। मेरे अंदर क्या चल रहा था उस समय शायद ही कोई समझा हो। हम उबर आए थे, शायद ईश्वर को हम पर दया आ गई थी। शायद तुम्हारे साथ ईश्वर आया था। एक छोटा बच्चा ईश्वर का ही रूप होता है... होता है न!
मेरे से ज्यादा तो उन सबने तकलीफ झेली जिन्होंने 1200 Kms की पैदल यात्राएं की। गरीबी हमसे क्या क्या नहीं करवाती। विस्थापन, फुटपाथ, उड़ी नींद और जाने क्या क्या नहीं झेला होगा सबने।कई बार सोचा हूं, कई बार अकेले में रोया हूं। विपिन चाचू के पास हमसे भयावह कहानियां है। पता नहीं वो कैसे सोया होगा।
मैं तुम्हें सब अपनी मनःस्थिति या वो समय बताने नहीं बता रहा हूं। बस इसलिए कि तुम इक दिन समझोगे कि हमें और अधिक मानवीय, मनुष्यतर बनना है। आपदाएं मानव सभ्यता को उसकी सच्चाई, उसकी औकात बताने आती हैं। ये बताने कि हम क्षणभंगुर हैं, ये बताने की मनुष्यता को प्रकृति कभी भी खत्म करने में सक्षम है। ये बताने कि हमें प्रकृति और मानवता दोनों को अधिक प्यार करने और सहेजने की आवश्यकता है।
मैं चाहता हूं की जब तुम बड़े हो जाओ तो इस आपदा से समझो कि अस्पताल में कॉविड में भी हम तक खाना पहुंचने मामा मामी, नाना नानी, 150Kms चलकर आते दादा दादी अपना सबकुछ दांव पर रखने के लिए तैयार थे। ये समझो कि परिवार के मायने क्या हैं।
तुम प्रकृति के अधिक पास हो जाओ, अधिक प्रेम करने लगो, थोड़ा ज्यादा रिश्ते समझने लगो, अंदर से अधिक ताकतवर बनो और अधिक मानवीय हो जाओ... इसलिए लिख रहा हूं।
तुम्हारे पापा.

Tuesday, December 19, 2023

प्रेम बस प्रेम की कवितायें



 कुछ लड़कियां ज़मीं होती हैं, कुछ आसमां,

कुछ नींद होती हैं, कुछ ख़्वाब,

कुछ नदी होती हैं, कुछ समंदर,

कुछ लड़कियां छत होती हैं, कुछ घर.


तुम रेयर कॉम्बिनेशन हो,

तुम ये सबकुछ हो!


*


भाषा खत्म हो जाएगी,

मैं तुम्हें कविता से पुकारूंगा.


कविताएं भाषाओं से नहीं

संवेदनाओं से लिखी जाती हैं.

कविताएं मुख से नहीं 

एहसासों से कही जाती हैं.


*


तुम्हारे होंठों को चूमकर

ईश्वर के सबसे करीब होता हूं.


सीता ने

प्रेम से राम को

राधा ने

प्रेम से कृष्ण को


ईश्वर बनाया है!


*


तुम्हारी हंसती आंखों में

निश्छलता रहेगी जबतक


प्रेम 

बना रहेगा धरती पर

तबतक.


*


मुझे यकीं है

सिर्फ प्रेम ही

किसी को पवित्र कर सकता है


कर्मकांड नहीं!


*


यौवन के

हर कोने पर निशां हैं.

देह के

हर हिस्से पर कोंपल सा फूटा हूं.


तुम्हारी आत्मा पर

कविता बोई है मैंने.


कैसे और कहां

जाओगे मुझे छोड़कर!


*


मैंने जब

नौकरी की,

रीढ़ की हड्डी खोई,

फाइनेंशियल मैनेजमेंट सीखा

सोशल सिक्योरिटी की परतें ओढ़ी.

सोशल स्टेटस समझा,

फिर लोगों को आंखों में

उसका दंभ देखा...


मैं जान गया

मैं इस दुनिया के लिए

नहीं बना हूं.


*


जब जब मैं मद्धम पड़ता हूं


तुम उग आते हो

उजाले की तरह.


*


किसी कविता सी तुम

फूट पड़ती हो घावों से

दर्ज़ के बीज से जैसे

फूट पड़ा है कोई पौधा.


जख्मों से

निकल पड़ी हैं कविताएं,

कहानियां, कई चित्र.


शुक्रिया दर्द का, जख्मों का.


*


मैंने तुम्हें ज़िंदा रखा है

किस्सों में, कहानियों में,

कविताओं में.


देह...

देह से परे

कवि ही किसी को

ज़िंदा रख सकता है...


कलम से.


*


लेट होने पर जो तुम

गुस्सा करती हो

मॉर्निंग वॉक न करूं तो

मुंह फुलाती हो

ऑफिस से आ कितना बतियाती हो

कुछ बातों पर कितना घबराती हो

मेरे मजे लेती हो

कितना खिलखिलाती हो

बच्चे से चिपक

मासूम सो जाती हो

भीड़ में हाथ पकड़

जो मुस्कुराती हो

किसी पार्टी में

कोने में ले जा बतियायी हो

चूम लूं, लजाती हो.


तुम बहुत भाती हो.


*


कुछ कविताएं

कितनी गरम होती हैं


जैसे पीठपर 

तुमने अधर रख दिए हों.


*


मेरे सीने में जमा

जो समंदर है


कहो

क्या तुम्हारे भी अंदर है?


सही की धार में बहते हो?

गलत को गलत कहते हो?


*


मैं अगढ़ ही रहना चाहूं तो?


तराशकर कहीं रखा जाऊं

सब देखें, पूजा करें.


मैं किसी पहाड़ का,

किसी नदी में बहता

अगढ़ पत्थर ही रहना चाहूंगा.


*


ईश्वर को सबसे ज्यादा याद

कृषक ने किया.


ईश्वर ने सबसे कम

कृषक की सुनी.


*


एक शहर था

जहां तुम्हारे होने तक मैं था

तुम्हारे होंठों को चूम मैंने

उस शहर को छोड़ा.


वो शहर

तुम होंठो में जमाकर

साथ ले गई हो.


बड़ा ताल जमा किया था होंठों पर

प्यास में फिर भी वे

सुना है मेरी राह तकते हैं!


*


कि मेरे शहर आओ


वो पेड़ अब भी चहचहाता है

वैसे ही,

वो नदी अभी बजे जा रही है

वैसे ही,

चौराहा वो निरंतर जी रहा है

वैसे ही.


तुम्हारे हमारे जाने से

कुछ तो नहीं बदला.


एक रिश्ता,

एक सपनों के घर के अलावा.


*


मैं तुम्हें सुलगा लेता हूं जानम


किसी शाम कातर होती आंखों में

भर जाता है उम्मीद का धुंआ.


*


एक दिन

कविता यूं ही अटक जायेगी

एक सांस

यूं ही थम जायेगी

कोई ख्वाब

यूं ही आंखों में रह जायेगा

एक टीस

बची रह जायेगी.


आसमां के गीत पर

सुबह को चादर ओढ़ गुनगुनाऊंगा.

एक रोज दुनिया से निकल

मैं दुनिया का हो जाऊंगा.


*


तुमसे एक अंतिम बात कहनी थी

ख्वाब सड़क पर पड़ी टहनी थी

एक सिरे पे जिसके तुम्हारा नाम था

पेड़ की दूसरे सिरे पे आस बंधी थी.


मेरे जिस्म में पत्ती रहनी थी.

ख्वाब सड़क पर गिरी टहनी थी.


*


तुम्हारे पास

जान रखकर वो लड़का

ज़िंदगी ढूढने चला है.


जिंदगी ढूंढ ले वो

तो बताना

बेजान जीने की अगर कला है.


*


मैंने कविताएं लिखीं

प्रेम सार्वजनिक कर दिया

मैंने कविताएं लिखीं

दुःख सार्वजनिक कर दिया.


मेरे दोस्त,

सबकुछ तुम्हारे साथ ही नहीं 

घटित हो रहा है पहली बार.


यकीन न हो तो

मेरी कविताएं पढ़ लेना.


*


प्रेम के खातिर

मारे जाते हों युवा

जिस समाज में


वो समाज कैसे कहला सकता है?

कहला भी ले तो

सभ्य कैसे कहा जा सकता है?


*


इंतजार करते रहे हम

कि सुंदर होगा जहां में कुछ और.


और बस गए हम.

तुम्हारे होंठों में बना घर

ताउम्र रह गए हम.

Monday, December 18, 2023

ईश्वर और प्रेम कि कवितायेँ


मुझसे कहा गया

मैं मंदिर जाऊंगा वहां ईश्वर मिलेगा.


मैंने तुम्हारी आँखों में देखा

ईश्वर वहां मुस्कुराता झांक रहा था.

--**--


बुद्ध, महावीर

मूर्तियों में क़ैद कर दिए गए.


उनका कहा

बड़ा कठोर, नग्न सच था.


उनका हश्र 

यही होना था!


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जब मेरी उँगलियों की पौरें,

तुम्हारी उँगलियों की पौरों को

आहिस्ता-आहिस्ता छूती हैं...


तब सृष्टि का निर्माण

हौले-हौले शुरू होता है...


--**--


मेरे माथे को चूम खिलखिलाना,

मेरी हंसी में बस जाना.

मुझे गले लगाना,

मेरे सीने में समा जाना.

मेरे होंठों पे जमा कर देना खुद को,

चूमकर.

हाथों में लम्स,

छूकर.


देखें,

फिर हमें कौन जुदा करता है.


--**--


मुझे कोई देखे,

उसकी नज़र

तुम्हारी मुस्कान पर ठहर जाये!


तुम समाना

इस तरह

मेरे अंदर!


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मेरे पास खेत नहीं कि

धान उगाता.


मेरे पास प्रेम था,

मैंने प्रेम उगाया.


शहर में प्रेम की कवितायेँ


 कितना वक़्त था

जो तुम्हारे बगैर 

काटा न जा सकना था.


पर सारा ही कट रहा है

तुम्हारे बगैर.


--**--


मुझसे जब तुम

उस शहर में मिलती हो

ज्यादा खूबसूरत लगती हो.


आँखें और बड़ा ताल,

माथा और मानव संग्रहालय

होंठ और भारत भवन.


कितनी समानता है न?

आँखों में जो सैलाब है

झील से कुछ ज्यादा ही है.

माथे पर बल

मानव संग्रहालय में दर्ज़ सभ्यताओं से ज्यादा हैं.

होंठों से झिरते लफ्ज़...

भारत भवन में भी उतने सुन्दर नहीं कहे किसी ने.


तुम हो मेरा शहर.


तो बताओ मेरे शहर,

तुमसे इश्क़ कर

क्यों न जाऊं तर!


जब तुम उस शहर होती हो,

ज्यादा खूबसूरत होती हो.


--**--


तुम्हारे चूमकर पैर 

मैं जाऊंगा घर.


पैर चूमकर

रिश्ता न सही

प्रेम मुकम्मल सा लगता है.


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तुमसे बात करने के बाद

कवितायेँ झरने लगती हैं.


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हम प्रेम को नहीं चुनते

प्रेम हमें चुनता है.


प्रेम मुकम्मल होगा या नहीं

ये समाज चुनता है.


(हीर की कब्र पर फूल हरे होंगे.)


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जिसके सीने से लिपट 

क्रोध, मोह, माया, स्वार्थ,

काम, अहंकार, घृणा, द्वेष

त्यागा सा लगे.


उसी से तुम्हें सच्चा प्रेम है.


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कितने इतवार काटे मैंने

तुम्हारे इंतज़ार में.

बावन? पांच सौ बीस?

अब तो गिनती ही नहीं.


शतायु को बावन सौ 

इतवार मिलते हैं.

तुम्हारे बगैर

हर इतवार शतायु होता है.


--**--


मैं किसी दिन लिखूंगा

कोई कविता,

जो तुमसे ज्यादा खूबसूरत होगी.


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मैं चाहता हूँ,

किसी सिंधु घाटी सभ्यता 

के किनारे

गढ़ना तुम्हें किसी कविता में.


हज़ारों साल बाद कोई देखे

कहे 'ओह! ब्यूटीफुल डांसिंग गर्ल!'


--**--


तुम्हारी नाक

महावीर टेकरी सी है.

तुम्हारे अंगूठे

कोलर डैम छूटे हैं.


तुम मोहब्बत में जानं

मेरा भोपाल शहर हो जाती हो!


--**--


कितने लोग थे

जिनके हिस्से पूरा प्यार नहीं आया.


और वे अधूरे जीते रहे.

तुन्हें कभी पता ही नहीं चला

की प्रेम के बाद

दुनिया कैसी होती है!


Sunday, December 10, 2023

Papa's Letters to Shaurya #TenthLetter


मेरे जंगल में गुम होने की कई जगह हैं, जहां एकांत में बैठ लिखा जा सकता है, अपने उन्नीदे शब्द उकेरे जा सकते हैं, किंतु वहां बैठ लेखनी नहीं उभरती। वहां का अपना सौंदर्य है, जो सम्मोहित कर लेता है। वहां बैठ बस उसे निहारने भर से जीवन गतिमान लगने लगता है।
लेखनी तब उभरती है जब ऑफिस में बैठे हों चेयर पर, सामने मिलने वाले हों और यकायक से तुम याद आ जाओ, तुम्हारे नन्हें हाथ याद आ जाएं, 'पापा-पापा' कहना याद आ जाए। मैं अतिथि के जाने तक उन शब्दों को जेहन में सहेजता हूं और जाते ही पेपर पर उकेरने की कोशिश करता हूं। आधे-अधूरे लफ्ज़ पेपर पर आ ही जाते हैं। ऐसी कितनी ही #शौर्य_गाथा-यें पेपर पर अधूरी लिखी हुई रखी हुई हैं। शायद जो पूर्ण हो पाई हैं, उनसे अधिक ये हैं।
लिखने से ज्यादा मैं तुम्हें महसूस करना सीख गया हूं। तुम्हारे साथ रहते थोड़ा ज्यादा बच्चा होना सीख गया हूं। बड़ा होते-होते बहुत कुछ मर गया था, थोड़ा-थोड़ा उसे महसूस कर रहा हूं। मोहब्बत को नए नजरिया से देख रहा हूं। ट्रू लव के मायने जान रहा हूं। अक्सर कहीं पढ़ा एक वाक्य जेहन में उभर आता है "एक पिता अपने बच्चों को सबसे अच्छा गिफ्ट क्या दे सकता है?" उत्तर है-"बच्चों की मां से और अधिक प्रेम कर सकता है।"
शायद तुम्हारे आने के बाद तुम्हारी मां से और अधिक प्रेम करने लगा हूं।
तुम्हारी कोमल हथेलियों ने मुझे और अधिक कोमल बनाया है। तुम्हारी हंसी ने मुझे अधिक सुख महसूस करना सिखाया है।
जिनके बच्चे हैं वे ये दो वाक्य अच्छे से समझ गए होंगे-
1. क्यों बच्चे भगवान का रूप कहलाते हैं, और
2. क्यों ये सृष्टि का भविष्य हैं।
तुमने मुझे दोनों समझाए हैं।
मैं फोटो खींचने में बहुत आलसी हूं। इन कुछ महीने में अधिक फोटो लेना शुरू किया है। तुम्हारे लम्हे लफ्जों के अलावा चित्रों में सहेजना चाहता हूं।
तुम्हारे होने ने मुझमें बहुत सी तब्दीलियां लाई हैं। कुछ तो शब्दों में भी नहीं समा पाएंगी...
तुम्हारे पापा
फ़ोटो:
हम सींच रहे हैं
एक-एक पौधा.
वे गुलाब
हम उन्हें.

Thursday, December 7, 2023

युद्ध और प्रेम की कविताएं

 


तुम्हारे ब्रह्मांड में जा
तुम्हारे होंठों को चूम ले.

मेरी कविता की बस यही चाह है.

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तुम्हारी पीठ पर
जो कवितायें लिखीं गईं

वे ही सबसे सुंदर कवितायें थीं.

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जिन कविताओं को
तुमने होंठों से लगाया.

वे ही मुकम्मल घोषित की गईं.

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मेरे पास बंदूक है
मैं उस पर कविता रख
सुकूं से सो जाता हूं.

सिर्फ कविता
बंदूक सुला सकती है,
शांति स्थापित कर सकती है.

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मैं लिखता हूं
कविता,
कि एक रोज
तुम तक पहुंच ये
तुम्हारे होंठों को चूमेगी.

मेरी याद में तुम हथेलियां सहलाओगी.

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एक कविता युद्ध को सहला रही थी
युद्ध जर्जर था युद्धोपरांत.

युद्ध दौरान कविता
टूटी मानवता को सहलाती रही,
युद्ध उपरांत युद्ध को.

युद्ध और क्रोध तोड़ते हैं विरोधी,
साथ ही स्वयं को...

कविता ने कहा उस रोज.

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युद्ध और प्रेम में हमेशा
युद्ध चुना गया.
होंठों और बंदूक में
बंदूक चुनी गई.

यह मानवीय निर्बलता है
कि युद्ध आसान है,
प्रेम कठिन.

गले लगाना, होंठ चूमना
बंदूक उठाने से
ज्यादा साहस का काम है.

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तुमसे प्रेम
अनायास नहीं था.
तुम्हारी सुंदर आंखों में
आंसू
सीने में सैलाब
जिस्म में जज़्बा
जेहन में विचार
इरादों में पंख थे.

ये रेयर कॉम्बिनेशन हैं.

तुम्हें छू में तरंगित था
चूमकर बुद्ध हुआ
जब जब सीने से लगे तुम
मैं खुद को खोता गया,
तुम्हारा होता गया।

बताओ,
तुमसे प्रेम न हो तो किससे होता!

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तुम्हारी पीठ पर लिखे हैं
मैंने सबसे सुंदर शब्द
तुम्हारे हाथों में छोड़ी है
सबसे सुंदर एहसास.

मैं कहीं भी रहूं,
तुम जहां भी रहो

थककर, हारकर
आंसू, उन्माद लिए
तुमतक पहुंच जाता हूं.

तुम मेरा घर हो.

तुमसे प्रेमकर मैंने जाना दोस्त,
घर सिर्फ जगहें नहीं होती
लोग भी होते हैं!

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फोटो : इंटरनेट