Friday, July 31, 2026

वर्ल्ड रेंजर्स डे विशेष

 


31 जुलाई... सुबह के लगभग साढ़े दस बजे हैं. मैं ऑफिस पहुंचता हूँ तो देखता हूँ स्टाफ पहले से ही जमा है. डिप्टी साहब, बीट गार्ड, डिपो चौकीदार, स्थाईकर्मी दादा, सब आज एक अलग ही मूड में हैं. वजह पूछता हूँ तो पता चलता है आज विश्व रेंजर्स डे है. मैं मुस्कुरा देता हूँ. सच कहूं तो हम सबके लिए हर दिन एक जैसा ही होता है. सुबह पेट्रोलिंग की रिपोर्ट, दोपहर किसी न किसी गांव से आती शिकायत, शाम होते-होते कोई रेस्क्यू कॉल. फिर भी साल में एक दिन ऐसा आता है जब दुनिया भर के जंगलों में वर्दी पहने हम जैसे लोगों को याद किया जाता है. आज वही दिन है.


चाय का कप हाथ में लिए मैं स्टाफ से बैठकर बातें करने लगता हूँ. सबसे उम्रदराज फॉरेस्टर, जो अब रिटायरमेंट के करीब हैं, बताने लगते हैं "साब, हमने तो अपनी पूरी जिंदगी इसी वर्दी में गुजार दी. न त्यौहार देखा, न परिवार को पूरा वक़्त दिया. पर जब कोई जानवर बच जाता है या जंगल हरा-भरा रहता है, तो वही सबसे बड़ी दिवाली लगती है." उनकी बात सुनकर मुझे लगता है, यही तो असली मायने है इस दिन के, उन हज़ारों-लाखों गुमनाम लोगों को सलाम करना, जो चेहरे पर धूप की झुर्रियां और कंधे पर बंदूक या डंडा लिए, बिना किसी हल्ला-गुल्ले के जंगल और जंगल में रहने वालों की हिफाजत में लगे रहते हैं.


विश्व रेंजर्स डे मनाने की शुरुआत सन 1992 में हुई थी, जब इंटरनेशनल रेंजर फेडरेशन (International Ranger Federation) की स्थापना हुई. इस संगठन ने दुनिया भर के रेंजरों को एक मंच पर लाने का काम किया, ताकि वे अपने अनुभव, समस्याएं और सफलताएं आपस में साझा कर सकें. सन 2007 में, फेडरेशन की स्थापना की सालगिरह के मौके पर, 31 जुलाई को औपचारिक रूप से "विश्व रेंजर्स डे" घोषित किया गया. तब से हर साल यह दिन दुनिया के हर कोने में, अफ्रीका के सवाना से लेकर भारत के घने जंगलों तक, दक्षिण अमेरिका के वर्षावनों से लेकर हिमालय की तलहटी तक मनाया जाता है. हर साल एक थीम भी तय की जाती है, जो उस साल रेंजरों के किसी खास पहलू चाहे वह उनकी सुरक्षा हो, उनका मानसिक स्वास्थ्य हो, या फिर जलवायु परिवर्तन में उनकी भूमिका, पर ध्यान केंद्रित करती है.


आम आदमी के लिए शायद "रेंजर" शब्द सुनते ही जंगल में घूमती हुई एक वर्दीधारी छवि उभरती हो. पर हकीकत इससे कहीं ज्यादा पेचीदा और विस्तृत है. एक रेंजर की जिम्मेदारी सिर्फ जंगल में गश्त लगाना नहीं होती. हम वन्यजीवों की गणना करते हैं, अवैध शिकार और लकड़ी तस्करी रोकते हैं, जंगल की आग बुझाते हैं, पौधरोपण की योजनाएं बनाते और लागू करते हैं, वन्यजीवों और इंसानी बस्तियों के बीच के टकराव को सुलझाते हैं, घायल या फंसे जानवरों का रेस्क्यू करते हैं, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की मदद करते हैं, और गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक भी करते हैं. कभी-कभी हमें बंदूकधारी शिकारियों का सामना करना पड़ता है, तो कभी किसी कुएं में गिरे जंगली सूअर के परिवार को बचाना होता है, तो कभी बाढ़ में फंसे हिरण को निकालना होता है. दुनिया भर में लगभग साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा रेंजर इस काम में जुटे हैं, और हर एक की कहानी अपने आप में अलग है.

अफ्रीका के कुछ देशों में रेंजरों को गैंडे और हाथियों को बचाने के लिए सशस्त्र शिकारियों से सीधी मुठभेड़ करनी पड़ती है. यह लगभग युद्ध जैसी स्थिति होती है. दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगलों में रेंजर बाघों और तेंदुओं के लिए बिछाए गए फंदों को ढूंढकर नष्ट करते हैं. भारत में हमारा काम इससे थोड़ा अलग जरूर है, पर चुनौतियां कम नहीं. यहां हमें वन्यजीव और इंसान के बीच बढ़ते टकराव को संभालना पड़ता है. कभी तेंदुआ गांव में घुस आता है, तो कभी हाथियों का झुंड खेत रौंद देता है, तो कभी जंगली सुअर किसी कुएं में जा गिरता है. हर घटना में समय बहुत मायने रखता है, और गलत फैसला किसी इंसान या जानवर, दोनों में से किसी की भी जान ले सकता है.


रेंजरों के इस काम का असर सिर्फ जंगल की सीमाओं तक सीमित नहीं रहता. जंगल बचेंगे तो ही बारिश समय पर होगी, नदियां बहती रहेंगी, मिट्टी का कटाव रुकेगा और जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार धीमी होगी. वन्यजीवों की सुरक्षा जैव विविधता बनाए रखने के लिए जरूरी है, और जैव विविधता ही धरती के पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) की रीढ़ है. इसके अलावा, बहुत से आदिवासी और वनवासी समुदायों की आजीविका सीधे जंगल पर निर्भर है. रेंजरों का काम इन समुदायों और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाए रखने का भी है. जब हम किसी गांव में जाकर लोगों को समझाते हैं कि जंगली जानवर से कैसे बचा जाए, या किसी किसान को उसकी फसल के नुकसान का मुआवजा दिलाते हैं, तो हम सिर्फ कानून लागू नहीं कर रहे होते, हम इंसान और प्रकृति के बीच के रिश्ते को बचाए रखने की कोशिश कर रहे होते हैं.


पर यह नौकरी जितनी गौरवशाली सुनाई देती है, उतनी ही मुश्किल भी है. सबसे पहली दिक्कत तो यही है कि दुनिया के ज्यादातर देशों में रेंजरों को न तो पर्याप्त वेतन मिलता है, न ही आधुनिक उपकरण. कई जगह रेंजर बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के, सिर्फ एक पुरानी राइफल या डंडे के सहारे सशस्त्र शिकारियों का सामना करते हैं. रहने की सुविधाएं अक्सर बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित होती हैं. किसी गांव के किसी कोने में रहना. जहां न बिजली, न ठीक से पानी, न इलाज की सुविधा. परिवार से दूर, घने जंगलों के बीच बने छोटे कैंपों में कभी कभी कई दिन गुजारने पड़ते हैं. त्यौहार, शादी-ब्याह, बच्चों का जन्मदिन, इन सबसे रेंजर अक्सर वंचित रह जाते हैं, क्योंकि जंगल कभी छुट्टी नहीं लेता.


जान का खतरा भी हमेशा साथ चलता है. थिन ग्रीन लाइन फाउंडेशन जैसी संस्थाओं के आंकड़े बताते हैं कि हर साल दुनिया भर में सैकड़ों रेंजर ड्यूटी के दौरान अपनी जान गंवा देते हैं. कोई शिकारियों की गोली का शिकार होता है, तो कोई हाथी या भालू के हमले में, तो कोई जंगल की आग बुझाते वक़्त. इसके बावजूद, इस पेशे को वह सम्मान और पहचान अक्सर नहीं मिल पाती जिसकी यह हकदार है. 


मानसिक तनाव भी एक बड़ी समस्या है. लगातार खतरे में रहना, परिवार से दूरी, संसाधनों की कमी और कई बार समाज की उदासीनता, यह सब मिलकर रेंजरों और वनरक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं. महिला रेंजरों के लिए तो चुनौतियां और भी बढ़ जाती हैं. दूरदराज इलाकों में तैनाती, बुनियादी सुविधाओं की कमी और सामाजिक बाधाएं, यह सब उनके रास्ते में और मुश्किलें खड़ी करते हैं.


शाम को मैं फिर से अपने स्टाफ के बीच बैठा हूँ. बीट गार्ड चाय की चुस्की लेते हुए मुस्कुरा रहे हैं. मैं सोचता हूँ, आज दुनिया के किसी कोने में कोई रेंजर शिकारियों का पीछा कर रहा होगा, कोई घायल हाथी का इलाज करा रहा होगा, कोई जंगल की आग से जूझ रहा होगा, और कोई मेरी तरह  अपने स्टाफ के साथ बैठा चाय पी रहा होगा. हम में से किसी को भी शायद तमगे या तालियों की उम्मीद नहीं होती. हमारे लिए सबसे बड़ा इनाम वही होता है जब शाम को जंगल हरा-भरा दिखे, कोई फंसा हुआ जानवर सुरक्षित निकल जाए, और कोई ग्रामीण फोन पर धन्यवाद कहे. 


आज विश्व रेंजर्स डे पर, मैं अपने उन तमाम साथियों को सलाम करता हूँ, जो देश-दुनिया के कोने-कोने में, बिना किसी शोर-शराबे के, जंगल और उसमें बसने वाले हर जीव की हिफाजत में लगे हुए हैं. यही हमारा त्यौहार है, यही हमारी दिवाली है.


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