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Friday, August 18, 2023

प्रतापी अक्षयकुमार!

 


महाकाव्य रामायण में अक्षयकुमार को पढ़ते पढ़ते अनायास ही महाकाव्य महाभारत के अभिमन्यु का स्मरण हो आता है. यहाँ सोलह साल का कुमार अपने पिता से जिद कर के देश में घुस आये अज्ञात शत्रु से भिड़ने के लिए चला जाता है, वहां तेरह साल का कुमार अपना अधूरा ज्ञान लिए अपने ताऊ युद्धिष्ठर से जिद कर लड़ने चला जाता है. वही ज़िद, वही जूनून. यहां हनुमान इस छोटे से बालक की वीरता देख हतप्रभ हैं और उसकी तारीफ में कहते हैं -


अयं महा त्मा च महां श्च वी र्यतः समा हि तश्चा ति सहश्च संयुगे। असंशयं कर्मगुणो दया दयं सना गयज्ञैर्मुनि भि श्च पूजि तः ॥ २७॥ (वाल्मीकि रामायण)

वहां व्यूह रचनाकार द्रोण, कर्ण जैसे प्रतापी योद्धा उसके कौशल को देख अत्याधिक प्रभावित हैं. यहाँ यह किशोर जहाँ हनुमान जैसे प्रतापी से युद्धरत होकर वीरगति को प्राप्त होता है वहीँ अभिमन्यु के सामने तो द्रोण, कर्ण, दुर्योधन इत्यादि सात सात महारथी थे. वह अंत तक लड़कर वीरगति को प्राप्त होता है.

आप सोच रहे होंगे कि मैं क्यों अक्षयकुमार और अभिमन्यु को तौल रहा हूँ, जबकि अक्षयकुमार तो अधर्म के साथ खड़ा था और अभिमन्यु धर्म के साथ... मैं कहूंगा, अक्षयकुमार भी अपने धर्म का पालन आकर रहा था, घर में घुस आये अज्ञात शत्रु से लड़ रहा था. तब उसका धर्म यही था और उसने उसका पालन अपने मृत्यु तक किया.

अक्षयकुमार रावण का सबसे छोटा पुत्र था और मंदोदरी के गर्भ से जन्मा था. एक कथा अनुसार वह रावण की दूसरी पत्नी धन्यमालिनी की कोख से जन्मा था. बाल्मीकि रामायण अनुसार वह बहुत ही पराक्रमी योद्धा था और मात्र सोलह की उम्र में उसने समस्त अस्त्र शास्त ज्ञान प्राप्त कर लिए थे. शुक्राचार्य के दिए वेद पुराण ज्ञान से वह पिता की ही तरह प्रकांड पंडित बन गया था. बाल्मीकि रामायण अनुसार अक्षयकुमार का युद्ध कौशल देख हनुमान बड़े प्रभावित थे और वाल्मीकि रामायण में इसे ऐसे बखान किया गया है :

ततः शरैर्भि न्नभुजा न्तरः कपिः कुमा रवर्येण महा त्मना नदन्।
महा भुजः कर्मवि शेषतत्त्ववि द् वि चि न्तया मा स रणे परा क्रमम्॥ २५॥

इतने ही में महा मना वी र अक्षकुमा र ने अपने बा णों द्वा रा कपि श्रेष्ठ हनुमा न जी की दो नों भुजा ओं के मध्यभा ग–छा ती में गहरा आघा त कि या । वे महा बा हु वा नरवी र समयो चि त कर्तव्यवि शेष को ठी क-ठी क जा नते थे; अतः वे रणक्षेत्र में उस चो ट को सहकर सिं हना द करते हुए उसके परा क्रम के वि षयमें इस प्रका र वि चा र करने लगे- ॥ २५ ॥

अबा लवद् बा लदि वा करप्रभः करो त्ययं कर्म महन्महा बलः ।
न चा स्य सर्वा हवकर्मशा लि नः प्रमा पणे मे मति रत्र जा यते॥ २६॥

‘यह महा बली अक्षकुमा र बालसूर्य के समा न तेजस्वी है और बा लक हो कर भी बड़ों के समा न महा न् कर्म कर रहा है। युद्धसम्बन्धी समस्त कर्मों में कुशल हो ने के का रण अद्भुतद्भु शो भा पा ने वा ले इस वी र को यहाँ मा र डा लने की मेरी इच्छा नहीं हो रही है।॥ २६॥

अयं महा त्मा च महां श्च वी र्यतः समा हि तश्चा ति सहश्च संयुगे। असंशयं कर्मगुणो दया दयं सना गयज्ञैर्मुनि भि श्च पूजि तः ॥ २७॥

‘यह महा मनस्वी रा क्षसकुमा र बल-परा क्रम की दृष्टि से महा न् है। युद्ध में सा वधा न एवं एका ग्रचि त्त है तथा शत्रु के वेग को सहन करने में अत्यन्त समर्थ है। अपने कर्म और गुणों की उत्कृष्टता के का रण यह ना गों , यक्षों और मुनि यों के द्वा रा भी प्रशंसि त हुआ हो गा , इसमें संशय नहीं है।। २७॥

परा क्रमो त्सा हवि वृद्धमा नसः समी क्षते मां प्रमुखो ऽग्रतः स्थि तः । परा क्रमो ह्यस्य मनां सि कम्पयेत् सुरा सुरा णा मपि शी घ्रका रि णः ॥२८॥

‘परा क्रम और उत्सा ह से इसका मन बढ़ा हुआ है। यह युद्ध के मुहा ने पर मेरे सा मने खड़ा हो मुझे ही देख रहा है। शी घ्रता पूर्वक युद्ध करने वा ले इस वी र का परा क्रम देवता ओं और असुरों के हृदय को भी कम्पि त कर सकता है॥ २८॥

(साभार : ramcharit.in )

हालाँकि मानस में अक्षयकुमार की वीरता का कोई बखान नहीं है और जितनी डिटेल में महाभारत में अभिमन्यु के कौशल और वीरता का बखान है उतना वाल्मीकि रामायण या अन्य किसी में अक्षयकुमार का नहीं है. स्वाभाविक भी है. वह एक राक्षस कुमार था अनैतिक रावण का पुत्र था. किसी भी महाकाव्य में एंटी हीरो की तारीफें स्वाभाविक रूप से कम ही होंगी, किन्तु जितना भी बखान है वो अनायास ही अभिमन्यु की याद दिला देता है. एक किशोर का अपने परिवार हेतु अपने प्राणों को न्यौछावर कर देना कितना अद्भुत है!

Thursday, August 10, 2023

विभीषण की कहानी : घर का भेदी...



विभीषण का नाम सुनते ही हिंदी की एक युक्ति दिमाग में आना शुरू हो जाती है - 'घर का भेदी लंका ढाये.' बचपन से ही हम यही सुनते आ रहे हैं. कुछ लोग कहते हैं कि ये सच नहीं है. जो भी हो विभीषण का चरित्र रामायण में बिलकुल अनोखा चरित्र है. वो राक्षस कुल में जन्म लिया है किन्तु कर्मों से, कथनों से राक्षस नहीं है. रामानंद सागर जी की रामायण में भी विभीषण का ऐसे चित्रांकन (अभिनेता: मुकेश रावल जी) किया गया था जिसमें वे शरीर से सख्त दिखते थे किन्तु बातों से कोमल ह्रदय थे.

जैसा कि रावण के जन्म की कहानी^ कहते वक़्त लिखा था कि महर्षि विश्रवा और राक्षसकुल की कैकसी को तीन पुत्र रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और एक कन्या प्राप्त सूर्पनखा प्राप्त हुए थे और कहते हैं इन तीनों पुत्रों में से प्रथम पुत्र रावण में अनुवांशिक रूप से अपने पिता और अपनी माता दोनों के कुलों के बराबर गुण आये. दूसरे पुत्र कुम्भकर्ण में माता के कुल के गुण थे. अंतिम पुत्र विभीषण में पूर्णत: पिता के कुल के गुण थे. ये भी एक कारण है कि विभीषण कार्य और कथन से पिता की तरह ही ऋषि प्रतीत होते हैं. 

लेकिन इसके पीछे एक और कारण भी है. जब अपने नाना सुमाली की इच्छा से तीनों भाइयों रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण से भगवान् ब्रह्मा की आराधना की तो बाकि भाइयों ने बल, शक्ति मांगी किन्तु विभीषण उनमें से अकेले थे जिन्होंने माँगा कि 'प्रभु, मैं हमेशा सच के साथ चलूँ, सत-धर्म का साथ दूँ.'

कहानी अनुसार विभीषण मंत्री थे लंका के और सही-गलत का ज्ञान राजा को देना उनका कर्त्तव्य था किन्तु जब उन्होंने पर-स्त्री सीता के हरण के प्रति अपने महाराज रावण से आपत्ति प्रकट की, उनको समझाना चाहा तो उनका अपमान किया गया. उनके सर पर लात से प्रहार किया गया. विभीषण उसी पल सत्य का साथ देने अपने कुछ साथियों सहित श्रीराम के पास पहुँच गए. लेकिन सच तो ये है कि इसके पूर्व से ही विभीषण भगवान् विष्णु के अनन्य भक्त थे. उन्होंने ब्रह्मा से सत-धर्म परायणता के अलावा भागवत-भक्ति का भी वरदान माँगा था. दक्षिण भारत की एक मान्यता अनुसार वे भगवान विष्णु के रूप रंगनाथ-स्वामी के भक्त थे. उनकी पूजा करते हुए ही हनुमान ने उन्हें लंका दहन के पहले देखा था और उनका ही महल जल जाने से बच गया था.

विभीषण ने जब लंका को छोड़ा तो वे भगवान् राम के शरणागत होने के बाद युद्ध में उनकी मदद करते रहे. कहते हैं उन्होंने लंका के बहुत सारे राज़ राम को बताये थे इसलिए भी भगवान यह युद्ध मानवीय रूप में जीतने में सफल रहे. युद्ध के समय असली और मायावी विरुपाक्ष को पहचानने का रहस्य राम को विभीषण ने बताया था. अतिकाय को मारने के लिए ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करने का परामर्श लक्ष्मण को विभीषण ने ही दिया था. सुषेण वैद्य का पता भी विभीषण ने बताया था. निकुंबला मंदिर तक जाने का गुप्त रास्ता भी विभीषण द्वारा ही बताया गया था, जहाँ जाकर लक्ष्मण मेघनाथ को मार सके थे. रावण की मृत्यु का ज्ञान भी विभीषण ने ही राम को दिया था और उनके बताये अनुसार ही नाभि में वाण मार रावण को मृत्यु सैय्या पर सुलाने में राम सफल हुए थे. (मानस में: 'नाभि कुंड पियूष बस याके, नाथ जिअत रावण बल ताके।')

लंका को जलाने को श्रेय भले ही हनुमान जी को दिया जाता हो किन्तु लंका की महत्वपूर्ण गुप्त जानकारियां विभीषण ने ही भगवान राम को प्रकट की थीं जिससे ही राक्षसराज रावण की बलशाली सोने की लंका एक मानवीय शत्रु के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हुई थी. शायद इसलिए भी विभीषण को 'घर का भेदी लंका ढाये' जैसी नकारात्मक कहावत में शामिल किया गया है. 

विभीषण के अनुसार उन्होंने ये सत्य धर्म के लिए किया था किन्तु एक अन्य चरित्र कुम्भकर्ण का भी है जो अपने सत-धर्म पर अडिग रहे थे. जो रावण से कहते हैं कि "आपने सीता का हरण कर गलती की है और सीता को आपको वापिस राम के पास छोड़ कर आना चाहिए" और जब रावण इंकार कर देते हैं तो वे कहते हैं " मैं जानता हूँ कि आपने गलत किया है और आपकी तरफ से लड़ते हुए मैं सत्य की तरफ नहीं खड़ा हूँ. फिर भी मैं अपने धर्म का पालन करूँगा, और मेरा धर्म है अग्रज की बात को मानना, अपने राजा के कहे का पालन करना. मैं धर्म का अनुसरण करते हुए लडूंगा और राम के हाथों मृत्यु को प्राप्त होऊंगा."

विभीषण के अनुसार वे धर्म का पालन करते हुए राम के साथ मिल गए और और कुम्भकर्ण के अनुसार वे धर्म का पालन करने रावण की और से लड़ते हुए श्रीराम के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए. लेकिन सत्य और धर्म तो एक ही हो सकता है तो सच्चा धर्म कौन सा था? 

वो आपको सोचना है. मेरे अनुसार तो पर-स्त्रीहरण उस समय की मोरालिटी अनुसार महापाप था और उसकी रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म. रामायण की अन्य कथाओं में जैसे सति अहिल्या की कथा में भी कुछ-कुछ ऐसा ही लिखा मिलता है. शायद विभीषण के लिए इसलिए भाई का साथ देने से बड़ा धर्म-मार्ग राम की पत्नी को न्याय दिलाना था. इसलिए ही विभीषण का चरित्र विश्वास, धर्म, मित्रता और न्याय का प्रतीक माना जाता है.

लेकिन फिर कुम्भकर्ण के लिए ऐसा क्यों नहीं था? जबकि वे भी धर्मपालन की बात करते हैं. मैं जो समझा हूँ उसके अनुसार एक तो कुम्भकर्ण जन्म से ही माता के कुल के राक्षसी-गुण सर्वाधिक थे इसलिए वे नैतिकता को पूर्णत: समझने में असमर्थ रहे और साथ ही दूसरा ये कि पूरा वर्ष ही निद्रा में रहने के कारण वे परिस्थिति को ही अच्छे से नहीं समझ पाए थे और शायद तीसरा ये कि अधिकतर निद्रालीन रहने के कारण वे सत्य-असत्य की समझ ही गूढ़ रूप से नहीं रखते थे. इसलिए ही जहाँ विभीषण का चरित्र विश्वास, धर्म, मित्रता और न्याय का प्रतीक माना जाता है, वही रावण का साथ देने के लिए, दुराचार के साथ रहने के लिए कुंभकर्ण को बुराई के रूप में जलाया जाता है.

ऊपर मैंने सति अहिल्या की कथा की बात की है जिसमें रामायण से पूर्व में इंद्र द्वारा उनके सतीत्व हरण पर उनके पति महर्षि गौतम ने सजा देते हुए उन्हें पत्थर की मूरत बना दिया था. रामायण में राम द्वारा उनको पुनः मानवरूप देना एक तरीके से 'स्त्री का सतीत्व छल से हरा भी जाये तब भी स्त्री को ही सजा मिलेगी!' वाली पूर्व की मोरालिटी का विरोध भी है. जैसे राम माता अहिल्या को मानव रूप देते हुए कह रहे हों "माता, जब दोष आपका नहीं तो सजा आपको क्यों?" हालाँकि समाज आज भी बहुत आगे नहीं बड़ा है वह बलात्कारी से ज्यादा बलात्कार की शिकार महिला को अधिक सजा देता है, दोषी मानता है. शायद तब भी बहुत आगे नहीं बढ़ पाया था तभी तो वही राम अग्निपरीक्षा लेते वक़्त समाज से हारे से प्रतीत होते हैं. यह अनावश्यक कार्य भी उन्हें करना पड़ता है. 

लेकिन विभीषण इस सत-धर्म को समझते थे. इसीलिए पूरा युद्ध होने बाद वे अपने प्रियजनों के लिए रोते हैं तो एक कथा अनुसार रावण उनसे कहता है कि "तुमने अपने धर्म का पालन किया है अनुज!" और एक अन्य कथा में जब वे लंका का राज लेने से इंकार करते हैं तो भगवान् राम अपना विराट भागवत-स्वरुप दिखा आदेश देते हैं, जिसे विभीषण को स्वीकारना पड़ता है और वे भाभी मंदोदरी का आशीष ले सिंहासन पर बैठते है. 

विभीषण को अन्य कथाओं में देखें तो वे लंका के राज्याभिषेक उपरांत मंदोदरी से शादी करते हैं और एक कथा अनुसार अशोक वाटिका में सीता की प्रधान सेविका त्रिजटा उनकी पुत्री थीं. किन्तु दोनों कथाएं बाद में डाली गई प्रतीत होती हैं. 

चित्र : राम के शरणागत होते विभीषण.

Wednesday, April 19, 2023

मेरे राम


 राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। वे कहे, बिना कहे ही, मां के कहे का मान रखने, पिता के वचन का सम्मान रखने, चुपचाप चौदह वर्ष वनवास के लिए निकल जाते हैं। जबकि जनमानस उन्हें ही राजा के रूप में देखना चाहता था, वचन से बंधे पिता भी उन्हें वचन न मानने की सलाह देते हैं, लक्ष्मण जैसा वीर भाई साथ खड़ा था, फिर भी!!

राम का चरित्र इसलिए महान है क्योंकि उन्होंने असीम बल, क्षमताओं, सम्पूर्ण जन समर्थन के बाद भी नैतिकता को नहीं छोड़ा, सत्य को नहीं छोड़ा, आचरण को नहीं छोड़ा, विचार को नहीं छोड़ा।

राम का चरित्र किसी भी मंदिर, किसी भी मूर्ति मात्र में नहीं समा सकता है। राम का चरित्र बस जिया जा सकता है, अपनाया जा सकता है। सूक्ष्म में भी हमारे अंदर समा गया तो भी हमें बेहतर मनुष्य बना सकता है। राम को निर्जीव वस्तुओं में नहीं ढाला जा सकता क्योंकि वह सजीव आदर्श मानव का चरित्र है। वह सिर्फ अपनाया जा सकता है स्वयं में, विचारों में, व्यवहार में, आचरण में।

वशिष्ठ, विश्वामित्र के शिष्य राम शांति, एकाग्रता, प्रेम, सहानुभूति, दृढ़ता, वचनबद्धता, सौम्यता, आज्ञापालन, नैतिकता, ज्ञान, साहस, कौशल, वीरता जैसे सद्गुणों का समन्वय हैं, और उनमें ये सारे गुण आवश्यक अनुपात में हैं।

राम का बस वही हो सकता है जिसमें राम के चरित्र, गुणों का समावेशन हो रहा है... और जिनमें हो रहा है उनमें क्रोध, दंभ, लालच जैसे अवगुण नहीं हो सकते, वे दंगाई या हत्यारे नहीं बन सकते।

... और जो इन अवगुणों को धारण किए है और आपके सामने राम का नाम ले रहा है, वो बस आपको, आपकी आस्था को ठग रहा है। 

#Ram

Sunday, June 27, 2021

मेघनाथ (मेघनाद) यथार्थ




रामायण में मेघनाथ का किरदार विजय अरोरा जी ने निभाया है. जो अपने समय में एक प्रसिद्द फिल्म अभिनेता रहे हैं. यादों की बारात और इंसाफ जैसी प्रसिद्द फिल्म्स उनके खाते में हैं. अपने समय में वो अपनी प्रियतम मुस्कान के लिए जाने जाते थे. कहते हैं, उन्होंने राम के किरदार के लिए भी ऑडिशन दिया था. ये पोस्ट लेकिन विजय अरोरा नहीं मेघनाथ के बारे में है.


मेघनाथ का किरदार रामायण का बड़ा अद्भुत किरदार है. मेघनाथ-लक्ष्मण युद्ध जितना प्रसिद्द है उतनी ही रौचक मेघनाथ के जन्म की कहानी भी है.


रावण बड़ा प्रतापी था किन्तु बाली और सहस्त्रबाहु अर्जुन से युद्ध में हारा भी था. इसलिए उसे पुत्र के रूप में अपने से भी ज्यादा बड़े योद्धा की कामना थी. ज्योतिष के महाज्ञानी रावण ने इसके लिए एक उपाय किया. उसने सारे ग्रहों को मेघनाथ के जन्म के समय  ज्योतिष के ग्यारहवें घर में (11th house of horoscope ) जाने का आदेश दिया. कहते हैं अगर सारे ग्रह ग्यारहवें घर में हो तो इस वक्त में उत्पन्न व्यक्ति पत्थर को भी छूने से सोना कर सकता है. बहुत ही वैभवशाली-कीर्तिवान व्यक्ति उत्पन्न होता है.


 रावण के डर से सारे ग्रह देवों ने उसकी बात मानी, सिर्फ शनिदेव को छोड़कर. वे उस वक्त बारहवें घर में बैठ गए और बाद में यही मेघनाथ की मृत्यु का कारण भी बना. रावण शनिदेव की इस हरकत से इतना क्रोधित हुआ कि उसने उन्हें बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया. मेघनाथ का जन्म हुआ तो 8  ग्रह ज्योतिष के ग्यारहवें घर (11th House of Horoscope) में थे. इसलिए वह बड़ा प्रतापी था. उसने पैदा होते ही मेघ सी गर्जना में प्रथम क्रंदन किया. इसलिए उसका नाम मेघनाथ रखा गया.


पुराणों अनुसार योद्धाओं की महामहरथी, अतिमहारथी, महारथी, अतिरथी और रथी नाम से पांच श्रेणियां हैं. महामहारथी में ब्रह्मा, विह्णु, महेश, गणेश, शक्ति और कार्तिकेय बस आते हैं. अतिमहारथियों में ब्रह्मा, विष्णु. महेश के अवतारों (राम, कृष्णा, परसुराम, हनुमान, वीरभद्र इत्यादि) के अलावा बस मेघनाथ और अर्जुन ही आते हैं. रावण और लक्ष्मण महारथी माने जाते हैं.


मतलब मेघनाथ लक्ष्मण और रावण से भी बड़ा योद्धा था!


 एक बार रावण को देवताओं से युद्ध हुआ और युद्ध में रावण को इंद्र ने बंदी बना लिया. जब मेघनाथ को पता चला तो उसने अकेले ही देवलोक पर चढ़ाई कर दी और इंद्र को बंदी बनाकर लंका ले आया. वह इंद्र का वध करने ही वाला था कि ब्रह्मा जी प्रकट हुए उन्होंने उसे इंद्र को छोड़ने को कहा. बदले में मेघनाथ ने ब्रह्मा से ब्रह्मास्त्र के अलावा अमरता का भी वर मांगा. ब्रह्मा ने अमरता का वर देने से मना कर दिया किंतु उसे वरदान दिया कि अगर वह अपनी कुलदेवी प्रत्यंगिरा माता के लिए निकुम्भिला यज्ञ करेगा तो उससे उसे एक रथ प्राप्त होगा. जिसपे बैठ वह सारे युद्ध जीत सकता है. अगर वह उस रथ पे बैठा है तो कोई भी योद्धा उसे मारने में सक्षम नहीं होगा. किन्तु यज्ञ भांग करने वाला ही उसे मारने में सक्षम भी होगा! कहते हैं ब्रह्मा ने ही मेघनाथ को इंद्रजीत नाम भी दिया था. 


वैसे मेघनाथ संसार का एकमात्र योद्धा था जिसके पास ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र और नारायणास्त्र थे. द्वापर युग में अर्जुन के पास पशुपतास्त्र और ब्रह्मास्त्र  तो थे किन्तु नारायणास्त्र नहीं था. हालाँकि स्वयं नारायण श्रीकृष्ण रूप में उनके साथ थे.


राम-रावण युद्ध में मेघनाथ ने तीन दिन युद्ध किया. पहले ही दिन उसने ब्रह्मास्त्र से 67 करोड़ वानरों का वध कर सुग्रीव की लगभग आधी सेना ख़त्म कर दी. साथ राम लक्ष्मण को भी मूर्छित कर दिया था.


युद्ध के दूसरे दिन अपनी मायावी शक्तियों से उसने बड़ा तीव्र युद्ध किया और एक अदृश्य तीर से 'वासवी शक्ति' का लक्ष्मण पर प्रयोग किया, जिससे वो मूर्छित हो गए. वासवी शक्ति क्षण भर में व्यक्ति को परलोक पहुँचाने में सक्षम थी किन्तु लक्ष्मण बलशाली वीर थे इसलिए वो सिर्फ मूर्छित हुए. सूर्योदय के पहले अगर उपचार न किया जाता तो कालकवलित हो सकते थे. इसलिए ही हनुमान संजीवनी बूटी लेने गए और पूरा का पूरा द्रोणगिरि पर्वत उठा लाये.


जब मेघनाथ को पता चला की लक्ष्मण बच गए हैं तो वह अपनी कुलदेवी प्रत्यंगिरा माता के लिए निकुम्भिला यज्ञ करने लगा.  लेकिन विभीषण ने लक्ष्मण को ब्रह्मा जी के वरदान से अवगत कराया और लक्ष्मण रात्रि में ही यज्ञ विध्वंश करने के लिए निकल पड़े.


कथाओं अनुसार यज्ञ भंग होने के बाद मेघनाथ ने यज्ञ में प्रयुक्त बर्तनों से ही युद्ध करना शुरू कर दिया. बाद में जब वो अस्त्र के ले वापस आया तो ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी लक्ष्मण पर किया किन्तु ब्रह्मास्त्र लक्ष्मण की परिक्रमा कर के वापस मेघनाथ के पास आ गया.


मेघनाथ समझ गया कि लक्ष्मणजी वो वीर हैं जिनसे वह मृत्यु को प्राप्त होगा इसलिए वह कुछ देर के लिए युद्धक्षेत्र छोड़ रावण को समझाने के लिए भी गया. किन्तु दम्भ में चूर रावण ने उसकी एक न सुनी. साथ ही पितृाज्ञा न मानने के कारण मेघनाथ का अपमान भी किया.


मेघनाथ ने रावण से आज्ञापालन न करने के कारण क्षमा मांगी और पुनः रणभूमि में आ युद्ध करना प्रारम्भ किया. लक्ष्मण ने अंजलीकास्त्र से मेघनाथ का सर धड़ से अलग कर दिया. (इसी अस्त्र से द्वापर युग में अर्जुन ने कर्ण का वध किया था.) इस तरह मेघनाथ मृत्यु को प्राप्त हुआ.


कथाओं अनुसार ब्रह्मा से मेघनाथ को एक और वर प्राप्त था कि वह उसी योद्धा से मृत्यु को प्राप्त होगा जो 12 वर्षो तक सोया न हो. लक्ष्मण राम-सीता की सेवा करते-करते वन में बारह वर्षों से सोये नहीं थे. इसलिए भी मेघनाथ को मारने में सफल रहे.


एक कथा अनुसार मेघनाथ ने शेषनाग कि पुत्री सुलोचना से बिना अनुमति के विवाह किया था. इसलिए शेषनाग ने दंड देने के लिए लक्ष्मण के रूप में मेघनाथ का वध किया था.


हालाँकि मेघनाथ कि पत्नी सुलोचना पति वियोग सह नहीं पाई और समाचार सुनने के पश्चात् ही मृत्यु को प्राप्त हुई!


हिंदी में एक कहावत है कि जैसी संगत वैसी रंगत. मतलब आप बुराई के साथ हैं तो आप भी बुरे होंगे. भले ही आप कितने भी बलशाली रहे हों. मेघनाथ भी उसका एक उदहारण है. किन्तु साथ ही पितृआज्ञा का अक्षरश: पालन करने वाले पुत्र के रूप में भी उसे याद किया जाता रहेगा. 


- Vivek Vk Jain


(Photo: Internet) #Meghnath #Ramayana

Sunday, April 26, 2020

एक था कुम्भकर्ण

KRIYA GURUPRANAM: The story of Kumbhakarna

कुम्भकर्ण की कहानी जाननी हो तो हमें जय-विजय की कहानी जाननी होगी. जय-विजय वैकुण्ड के द्वारपाल थे. ब्राह्मण पुराणानुसार वे वरुण देव और उनकी पत्नी स्तुता के पौत्र और कलि के पुत्र थे. अनन्य विष्णु भक्त दोनों भाइयों को विष्णु ने वैकुण्ड का द्वारपाल नियुक्त किया.

भागवत पुराण अनुसार एक बार ब्रह्मा के मानस पुत्र चार कुमारों ने वैकुण्ड का भ्रमण किया तो द्वार पर ही उन्हें जय विजय मिल गए. चारों कुमार तपस्या के बल पर बाल रूप में दिखते थे. जय-विजय ने उन्हें देखा और बाल रूप के कारण बच्चे समझ कर यह कह जाने से रोक दिया कि 'भगवन अभी विश्राम में हैं. बाद में दर्शन कीजिये.' कुमार कुपित हो गए. 'विष्णु अपने भक्तों के लिए हमेशा उपस्थित रहते हैं.' यह कह कर उन्होंने जय-विजय को पृथ्वीलोक पर हमेशा के लिए जीवन-मृत्यु चक्र में फंसे रहने का श्राप दे दिया.

जय विजय घबराकर भगवन की शरण में पहुंचे. विष्णुजी ने कहा कि कुमारों का दिया हुआ श्राप तो बदला नहीं जा सकता है लेकिन मुक्ति के दो उपाय हैं. एक ये कि तुम दोनों सात जन्मों तक मेरे अनन्य भक्त बनकर के धरती पर जन्म लो और इसके पश्चात् वापस वैकुण्ड लौट आओगे. दूसरा ये कि सिर्फ तीन जन्मों तक मेरे परम-शत्रु बनकर जन्म लो और फिर वापस वैकुण्ड लौट जाओगे. जय-विजय प्रभु के अनन्य भक्त थे उन्हें बहुत दिनों तक विष्णुजी से अलग रह पाना संभव नहीं था. इसलिए उन्होंने शत्रु बनकर जन्म लेना स्वीकार किया. लेकिन इसके लिए उन्हें कुल तीन युगों कि यात्रा करनी पड़ी!

सतयुग में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में जन्में. विष्णु ने उनका उद्धार करने हिरण्याक्ष के लिए वराह अवतार और हिरण्यकश्यप के लिए नरसिंह अवतार लिया. त्रेता युग में वे रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्में और रामावतार से उदधृत हुए. द्वापर युग में वे शिशुपाल और दन्तावक्र के रूप में जन्में और कृष्णावतार से उद्धृत हुए.

अत: मृत्यु उपरांत रावण और कुंभकर्ण को वैकुण्ठ प्राप्त हुआ था.

कुम्भकर्ण का मतलब होता है कुम्भ (यानि मटका) के जैसे कानों वाला. नाम भी इसलिए पड़ा था कि वो दैत्याकार पैदा हुआ था. कुम्भकर्ण ऋषि विश्रवा के पुत्र के रूप में जन्मा था जिसमे जन्म से राक्षसी प्रवित्तियाँ हावी थी. इसलिए वह दैत्याकार था. लेकिन ऋषि संरक्षण में उसमें रीति-नीति, प्रेम जैसे मानवीय गुणों का वास भी हुआ. विश्रवा ये जानते थे कि अर्ध-राक्षस, अर्ध-मानवीय उनके पुत्रों का जीवन कठिनतम हो सकता है इसलिए उन्होंने ब्रह्मा जी कि तपस्या के लिए अपने तीनों पुत्रों को प्रेरित किया. अति कठोर तपस्या करने के पश्चात् रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण पर ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा.

कुंभकर्ण को दो वर मांगने थे- इन्द्रासनम और निर्देवतम. अर्थात 'इन्द्र का आसन' और 'देवताओं का अंत'. लेकिन इन्द्र को इस बात का भान था. इसलिए उन्होंने देवी सरस्वती की आराधना की. फल स्वरुप देवी कुम्भकरण कि जिह्वा में आकर बैठ गई और कुंभकर्ण के मुंह जो निकला वो था- निद्रासनम और निद्रावतनम अर्थात 'निद्रा के लिए आसन' हो और 'निद्रा का आगमन' हो. सीधे सीधे उसने सोने के लिए वरदान मांग लिए. ब्रह्मा से तथास्तु कहा और रावण के लाख मनाने पर भी वरदान बदले बिना अंतर्ध्यान हो गए. इस तरह धरती पर एक राक्षस चैन की नींद सोने लगा.

कालांतर में कुम्भकर्ण के कुम्भ, निकुम्भ और भीमासुर नाम से पुत्र भी हुए.

मानस में कुम्भकर्ण की राम के प्रति अनन्यता जाहिर की गई है. तुलसीदास जी ने लिखा हुआ है:

राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक

( रामचंद्रजी के रूप और गुणों को स्मरण करके वह एक क्षण के लिए प्रेम में मग्न हो गया। फिर रावण से करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाए.)

 महिषखाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समान
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा.

(भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह बिजली गिरने के समान गरजा। मद से चूर रण के उत्साह से पूर्ण कुंभकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली.)

कुंभकर्ण को जब जगाया गया तो उसने रावण से अकस्मात् जगाने का कारण पूछा और कारण जानने के बाद उसने जो कहा वो मानस में इस तरह लिखा हुआ है:

 भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना॥

( हे राक्षसराज! तूने अच्छा नहीं किया। अब आकर मुझे क्यों जगाया? हे तात! अब भी अभिमान छोड़कर श्री रामजी को भजो तो कल्याण होगा.)

हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥
( हे रावण! जिनके हनुमान्‌ सरीखे सेवक हैं, वे श्री रघुनाथजी क्या मनुष्य हैं? हाय भाई! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया॥)

 कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबाहा॥3॥
( हे स्वामी! तुमने उस परम देवता का विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनि ने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता, पर अब तो समय जाता रहा॥)

अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सुफल करौं मैं जाई॥
स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥4॥
(हे भाई! अब तो अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापों को छुड़ाने वाले श्याम शरीर, कमल नेत्र श्री रामजी के जाकर दर्शन करूँ॥)

मतलब कुम्भकर्ण को पता था कि रावण ने क्या किया है और राम कौन हैं. किन्तु वह भ्रातृ-आज्ञा का पालन करने और रामचंद्र जी से मिलने के लिए युद्ध में शामिल हुआ.

विभीषण को देख कुम्भकर्ण ने उसे समझाया और उसे खरी-खोटी सुनाने के बाद उसकी प्रशंसा भी की. तुलसीदास अनुसार:

 देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥2॥
(उसे देखकर विभीषण आगे आए और उसके चरणों पर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाई को उठाकर उसने हृदय से लगा लिया और श्री रघुनाथजी का भक्त जानकर वे उसके मन को प्रिय लगे॥)

 तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥
(विभीषण ने कहा- हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार करने पर रावण ने मुझे लात मारी। उसी ग्लानि के मारे मैं श्री रघुनाथजी के पास चला आया। दीन देखकर प्रभु के मन को मैं बहुत प्रिय लगा॥)

सुनु भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥
धन्य धन्य तैं धन्य विभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥
कुम्भकर्ण ने कहा- हे पुत्र! सुन, रावण तो काल के वश हो गया है (उसके सिर पर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षस कुल का भूषण हो गया॥

 बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर॥

(हे भाई! तूने अपने कुल को दैदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुख के समुद्र श्री रामजी को भजा॥)

 बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥
 मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर रणधीर श्री रामजी का भजन करना। हे भाई! मैं काल के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता, इसलिए अब तुम जाओ॥

इस तरह कुम्भकर्ण ने राक्षस प्रवृत्ति का होते हुए भी धर्म और नीति का पालन किया और मृत्यु को वरण  किया.



Saturday, November 30, 2019

रावण के जन्म की कहानी



रावण नाम सुनते ही हमारे अंदर एक दैत्याकार , दस सिर  बीस हाथ वाले आदमी का चेहरा उभर आता है. कुछ के सामने शायद रामानंद सागर के रामायण के अरविंद त्रिवेदी जी द्वारा निभाए चरित्र का चेहरा उभर आता हो. लेकिन जो भी है आता चेहरा एक राक्षस का ही सामने है. लेकिन क्या रावण वाकई राक्षस था? इसे जानने के लिए हमें रावण के जन्म की कथा पर जाना होगा.

हुआ यूँ की राक्षस राज सुमाली ने सब दैत्यों को हरा दिया था. वो और उसके भाई माली और माल्यवान मिलकर बहुत ताकतवर थे. उसकी स्वयं की पत्नी केतुमति एक गन्धर्व कन्या थी. सुमाली स्वयं एक बेहद शक्तिशाली राजा था. उसने सारे दैत्यों और देवों को जीत कर अपना राज्य लंका में स्थापित किया था. किन्तु कालांतर में उसका शक्तिशाली भाई माली विष्णु के हाथों मारा गया और बाद में देवों के हाथों हार कर उसे रसताल में शरणागत होना पड़ा. विक्षुप्त सुमाली अब खुद से भी ज्यादा शक्तिशाली, समझदार, ज्ञानी पुरुष को अपने उत्तराधिकारी के रूप में चाहता था. वह चाहता था कि न सिर्फ देवगण उसके उत्तराधिकारी से डरें बल्कि  वो इतना तपी, हठी, योगी हो कि त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) को भी उसके ज्ञान, तप और योग का भय हो.

उसी समय स्वयं ब्रह्मा के पौत्र और महर्षि पुलत्स्य के पुत्र विश्रवा के तप के चर्चे सारे ब्रह्माण्ड में गूंज रहे थे. इनके तप, ऋषिव्रत से प्रसन्न हो महर्षि भारद्वाज ने अपनी कन्या इलाविडा का विवाह इनसे किया था. सुमाली और केतुमति को ये पुरुष युगपुरुष सा प्रतीत हुआ. विश्रवा के बारे में विस्तार से पता किया गया और सुमाली और केतुमति ने अपनी सबसे सुन्दर कन्या कैकसी जो खुद गन्धर्व कन्या कि तरह ही बेहद सुन्दर थी, का विवाह विश्रवा से करने का निश्चय किया. लेकिन परेशानी ये थी कि इतना बड़ा योगी किस तरह कैकसी से विवाह हेतु तैयार हो? इसके लिए कैकसी ने ऋषि आश्रम एक समक्ष अपने सौंदर्य का प्रदर्शन किया, ना-ना प्रकार से रिझाया, स्वयं सुमाली ने इस तरह का प्रेमाच्छिद वातावरण बनाया कि विश्रवा कैकसी के प्रेमपाश में बांध जाएँ. और हुआ भी यही. विश्रवा ऋषि कैकसी के प्रेम में बंधे अपना घर, अपने पुत्र कुबेर और पहली पत्नी इलाविडा को छोड़ कर कैकसी के साथ रहने के लिए आ गए. उन्होंने नया आश्रम बनाया और वहीँ कैकसी के साथ निवासरत हुए.

कालांतर में महर्षि विश्रवा और कैकसी को तीन पुत्र रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और एक कन्या प्राप्त सूर्पनखा प्राप्त हुए.

कहते हैं इन तीनों पुत्रों में से प्रथम पुत्र रावण में अनुवांशिक रूप से अपने पिता और अपनी माता दोनों के कुलों के बराबर गुण आये. दूसरे पुत्र कुम्भकर्ण में माता के कुल के गुण थे. अंतिम पुत्र विभीषण में पूर्णत: पिता के कुल के गुण थे.

रावण में माता के कुल और पिता के कुल दोनों के गुण अनुवांशिक रूप से समाये हुए थे. इसलिए वो पिता के कुल की ओर से जहाँ स्वयं भगवान ब्रह्मा का प्रपोत्र था तो योगी श्रेष्ठ विश्रवा का पुत्र था. मतलब उसमे देवीय अंश, श्रेष्ठ ऋषि के श्रेष्ठ मानवीय अंश एक साथ विद्यमान थे. वहीँ माँ के कुल की तरफ से नानी के गन्धर्व अंश तथा पिता के बलशाली राक्षस कुल के अंश थे. मतलब रावण में बुद्धि, तप-तपस्या-त्याग, योग, ज्ञान जैसे दैवीय गुण एवं संयम, अभय, विवेक, न्याय जैसे मानवीय गुण अनुवांशिक रूप से से ही विद्यमान थे तो साथ में बल, शक्ति, युद्ध निपुणता तथा कपट,  क्रूरता, हिंसा जैसे राक्षसी गुण-अवगुण भी थे तो गांधर्वीय सौंदर्य, संगीत-ज्ञान एवं सांस्कृतिक निपुणता भी जन्म से मौजूद थी. इसलिए रावण सर्वोत्तम योगी व शिव भक्त था, एक बेहतरीन वीणा वादक, एक बेहतरीन योद्धा हुआ. इसलिए वह एक योगी का पुत्र होते हुए भी लंका को जीत पाने में समर्थ हुआ बल्कि वहां का बेहतरीन और जन-मान्य राजा भी साबित हुआ. रावण को चारों वेदों का ज्ञान था और सारे छह: शास्त्र भी ज्ञात थे. कहते हैं उसके दसों सिरों का मतलब भी यही है कि उसे चार वेद और छह शास्त्र ज्ञात थे. जैन धर्म में उसके दस सिरों का मतलब उसको दस दर्शनों का ज्ञान होना बताते हैं.

लेकिन इतना ज्ञान, प्रतापी, शिव-भक्त, आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ रावण के साथ ऐसा क्या हुआ था कि उसको मरने के लिए स्वयं भगवान को अवतार लेना पड़ा?
कारण ये था कि रावण का जन्म एक साजिश के माध्यम से हुआ था. इसलिए उसका लालन-पालन भी नाना-कुल के सानिध्य में हुआ. इसलिए भले ही उसमें अनुवांशिक रूप से राक्षस कुल के बस कुछ अंश थे किन्तु पालन-पोषण और संपर्क में मिले संस्कारों के कारण उसमें राक्षसी प्रवित्तियाँ ज्यादा हावी हुईं और अंतत: अंत का कारण भी बनी.