जनवरी 2025 की एक ठंडी सुबह... हम 'अनुभूति' कार्यक्रम के लिए निकले थे। बच्चों को जंगल के करीब लाना था, उन्हें प्रकृति की खूबसूरती दिखानी थी। लेकिन जंगल की अपनी ही 'अनुभूतियाँ' होती हैं, जो हमें कभी भी किसी भी मोड़ पर चौंका सकती हैं। हम अभी अपनी गाड़ी में थे कि अचानक रोहित ने खबर दी "सर, जंगल में, प्लांटेशन के अंदर, एक तेंदुआ सुस्त अवस्था में पड़ा है!"
यह खबर सुनते ही मेरा दिमाग तेजी से दौड़ने लगा। प्लांटेशन! यानी घने पेड़, कटीली तार की जाली और ऊपर से तेंदुए का सुस्त होना... यह किसी आम रेस्क्यू से कहीं ज्यादा पेचीदा होने वाला था।
हमने तुरंत प्रोटोकॉल का पालन किया। मौकस्थल का मुआयना करने के उपरांत मैंने डीएफओ सर को सूचना दी और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की एक्सपर्ट रेस्क्यू टीम से संपर्क साधा। सर ऑफिशियल काम से स्टेट हेडक्वार्टर में थे। उन्होंने कहा "आप तो कर लोगे।" मैंने हां में जवाब दिया। वो आश्वस्त थे, उन्हें भरोसा था। मैं पहले भी काफी रेस्क्यू कर चुका था। जब तक बांधवगढ़ की टीम पहुँची, हमारी टीम ने इलाके की घेराबंदी कर ली थी और सतत मॉनिटरिंग जारी थी, ताकि कोई भी ग्रामीण या राहगीर गलती से तेंदुए के करीब न जा सके। भीड़ का होना ऐसे वक्त में सबसे बड़ा खतरा होता है।
टीम के आते ही हमने स्थिति का जायजा लिया। तेंदुआ लगभग 3 से 4 साल का था—एक 'सब-एडल्ट'। इस उम्र के जानवर बेहद फुर्तीले और अप्रत्याशित होते हैं, खासकर जब वे घायल या बीमार हों। प्लांटेशन के अंदर घनी झाड़ियां और ऊँचे पौधे थे, जिससे उसे देखना और उस तक पहुँचना दोनों मुश्किल थे।
सबसे पहले उसे ट्रेंकुलाइज करने का फैसला किया गया। डॉक्टर ने निशाना साधा और 'डार्ट' सही जगह लगी। लेकिन यह सिर्फ आधी लड़ाई थी। अब चुनौती थी उस बेहोश तेंदुए को उस घने प्लांटेशन से बाहर निकालना।
प्लांटेशन की मजबूत जाली को तोड़ना पड़ा। हमारे स्टाफ और बांधवगढ़ की टीम के लोग पैदल ही उस घनी झाड़ियों के बीच घुसे। एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ रहा था। तेंदुआ बेहोश था, लेकिन उसका वजन और उस घनी जगह से उसे बाहर लाना, यह एक बड़ी मशक्कत थी। साथियों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। कभी रस्सियों का सहारा, कभी सावधानी से उसे खींचना—करीब आधे घंटे की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार हमने उसे सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
तत्काल उसका प्राथमिक परीक्षण किया गया। वह कमजोर लग रहा था और उसे विशेषज्ञ देखभाल की जरूरत थी। डॉक्टर्स की सलाह के बाद बिना देर किए उसे मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी, सतना भेजने की तैयारी की गई।
जंगल की ड्यूटी हमें सिखाती है कि यहाँ हर दिन एक जैसा नहीं होता। सुबह हम बच्चों को जंगल के बारे में बताने निकले थे, और दोपहर तक हम जंगल के एक अभिन्न सदस्य की जान बचाने की जद्दोजहद में जुटे थे। यही तो है फॉरेस्ट लाइफ—जहाँ हर पल एक नयी चुनौती और एक नयी 'अनुभूति' इंतज़ार करती है।
फोटो: प्लांटेशन के अंदर बीमार तेंदुआ और रेस्क्यू उपरांत हमारी मुस्तैद टीम।
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