Tuesday, April 17, 2018

[ The Obtuse Angle ] 3

हम सोशल मीडिया पे लिख लिख कर गुस्से का इज़हार करते हैं, वक़्त हुआ तो किसी चौराहे पे मार्च या इंडिया गेट पे कैंडल जलाने में हिस्सा बनते हैं... और लेकिन वोट अपने जाति वाले को ही देते हैं.

हम  इतने सभ्य हैं कि जब तक हादसे घर पे दस्तक नहीं देते खुद की सोच तक हम नहीं बदलते. हमने अपनी जातियों/धर्मों को वोट दिए हैं. हमने अपने फ्रैंकेंस्टीन खुद पैदा किये हैं. 

कितना सुख है शाम को कुर्सी पर बैठ ये सोचने में कि आज हमारे साथ कोई हादसा नहीं हुआ है... और कितना सुकूं है फोन पे ये पता चलने में कि चाहने वाले भी ठीक हैं.

सच तो ये है, सुख के साथ मैं ये लिख रहा हूँ, सुकूं के साथ आप इसे पढ़ने वाले हैं. कल नए फ्रैंकेंस्टीन  फिर पैदा करने वाले हैं. कल फिर सोशल मीडिया पे कवितायेँ, चौराहे पे मार्च और कैंडल जलाने वाले हैं और उसके फोटो चस्पाने वाले हैं.

वैसे पिछली बार की कविता उतनी अच्छी नहीं थी, शायद इमोशंस कम रह गए थे. इस बार तो क्या लिखा है आपने!
इस बार की फोटो ठीक ही है. अगली बार कैंडल सामने और बैनर बगल में रख के फोटो खिचाईयेगा... बेहतरीन आएगी. पूरा एक्टिविस्ट लगेंगे. 

दुआ करता हूँ ये आपके लिए 'अगली बार' जल्दी ही आएगा.

Outrage alone is not going to show us the way forward. The way forward lies in painstaking investment in police resources. We have an abysmal police-population ratio. It needs to improve in quantity and quality. We need better trained investigators with vastly improved forensic facilities. We need programmes to protect crucial witnesses. We need a plea bargaining system so that minor cases don’t clog up our courts. We need a much healthier judge-to-population ratio. We need tougher laws against perjury, false complaints before the police, and for obstruction of justice. We need tough action against police personnel who fail to act without fear or favour. And this action cannot be confined to the junior ranks. Their supervisory officers, including IPS officers, must be held accountable when they fail to act.
The outrage brigade needs to gets its act together and start venting on these issues. Come election time, let every citizen ask their candidates about their proposals for improving the quality of policing. And in between elections, they must hold their elected representatives and the police leadership accountable for delivering on these proposals. It’s a lot harder to do than instant outrage. But there is no other way. If tears, candlelight marches and rants on social media were sufficient to ensure justice for December 16, baby Masoom would be alive and scampering around in some meadow today.