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Sunday, September 8, 2024

प्रेग्नेंसी


1.

जोर से गले भी नहीं लगा पा रहा आजकल

तुम्हारा पिट्टू बीच में आ जाता है

बात बात पे जो धोल जमा देते थे पीठ पे

वो भी नहीं हो पा रहा

न ही बगल में बैठे बैठे

कंधे से धक्क् कर दिया करता था, वो ही।


तुम्हारे पिट्टू को चूमकर

को असीम खुशी मिलती है

इस सुख में सबकुछ भूल जाता हूं

वो लफ्जों में नहीं कह पाऊंगा


हां, तुम ही कहती थीं "दौड़ा करो."

अब स्ट्रेन आ गया है पांव में

अब तुम्हारे मूड स्विंग्स पे

पेम्पर भी नहीं कर पा रहा

न कुछ अच्छा बना खिला पा रहा हूं।

अब भुगतो मुझे दौड़ाने का नतीजा!


तुम गोलू हो गई हो

तुम पर प्यार बहुत आता है

तुम डांटने भी बहुत लगी हो इसलिए

जताने से डर भी लगता है


चौपाटी पर गोलगप्पे खिलाना चाहता हूं

लेकिन मन को मना कर देता हूं

स्वस्थ होना जरूरी है न तुम्हारा

किसी दिन उलझी सी दिखती हो

तो बाल संवारकर सब ठीक होगा कहने का मन होता है

कल से ऑफिस न जाना कई बार कहने का मन होता है

लेकिन तुम खुद को बेहतर जानती हो।


कभी कहा नहीं लेकिन

ड्राई फ्रूट्स शेक टेस्टी नहीं लगता

साथ देने पी जरूर लेता हूं

कभी कहा नहीं लेकिन

"शुक्रिया" तुम्हारा 'तुम' होने के लिए

जैसे हो वैसा होने के लिए

और सबसे ज्यादा

मेरे साथ होने के लिए

और इतनी सारी खुशी देने के लिए।

देखो सीधे सीधे कहना नहीं आता इसलिए 

इतनी बड़ी नज़्म लिखनी पड़ी।

--**--

2.

मेरी सारी टी-शर्ट, सारे ट्रैक पेंट्स

तुम्हारे हो गए हैं,

कुछ तो अब मुझे भी ढीले हो जायेंगे

मेरे लिए नए कपड़े खरीदना अब तुम्हारी जिम्मेवारी होगी।


लेट नाइट मैग्गी की क्रेविंग बहुत होती है

हर बार नहीं बनाऊंगा


कितने फ्रूट्स खा रही हो

सेब सी गोलू होती जा रही हो।


हॉरर फिल्म के लिए न 

एक्शन फिल्म के लिए न 

लव स्टोरीज़ से बोर नहीं हो गई हो?

(कितना ख्याल रखती हो,

कि आनेवाले बच्चे पर इनका बुरा असर न पड़े!)


कभी कभी पलटकर

तुम्हें चूम लेना चाहता हूं,

कभी तुम्हारे पिट्टू को...


तुम्हारा साथ और ये अनुभव

“It's not the destination, it's the journey”

के मायने ज्यादा समझने लगा हूं।


तुम्हारे बालों में उंगलियां फिरा

कभी कभी कहना चाहता हूं

"शुक्रिया"

तुम्हारे पिट्टू पर हाथ रख

पढ़ना चाहता हूं इबादतें

'तुम्हारे साथ होने को'

'मुकम्मल' लफ्ज़ से बदल देना चाहता हूं।

--**-- 

3.

'वी आर प्रेग्नेंट' कितना नया शब्द है न!

'ईश्वर औरत को देता है सज़ा कर्मों की

इसलिए होता ये ये असहनीय दर्द बच्चा जनने पर.'

'औरत कितनी भी कोशिशें कर ले मोक्ष नहीं पा सकती है,

जन्मना होगा उसे पुनः पुरुष रूप में!'


कितनी ही कहानियां हैं

जो आधी आबादी को दोयम दर्ज़े का नागरिक बनाने पे तुली रहीं.


'वी आर प्रेग्नेंट' कितना नया शब्द है न!

सभ्यता को तीन हज़ार साल लग गए यह समझने में

जबकि सबसे शुरू से पता था

कि पुरुष बच्चे नहीं जन सकते.

--**-- 

4.

वो कंधे पे सर रख अपने दिन की थकान मिटाती है

बहुत सारा बतियाती है

ऑफिस की पूरी कहानी सुनाती है

फिर पिट्टू को पकड़ मैगी की डिमांड है

मैं उसका पिट्टू चूम लेता हूं

बच्चा किक करता है और हम खिलखिला उठते हैं

प्रेग्नेंसी कितनी खूबसूरत है न!

- - 

वो थक गई है

मैं उसके पैर दबाता हूं

वो मेरा हाथ पकड़ सो जाती है

मैं उसके गहरी नींद में जाने का इंतजार करता हूं

फिर चादर उड़ाते सोचता हूं

प्रेग्नेंसी कितनी खूबसूरत है न!

-- 

लेबर रूम में विदा करते वो

कसकर मेरा हाथ पकड़े है

जैसे कह रही हो

सब ठीक होगा ना? 

मैं सबके सामने उसे चूम लेता हूं

"हां न बच्चा सब ठीक होगा"


नन्हीं सी जान और उसकी मां

दोनों की प्रेमल आंखें

दोनों मुस्कुरा रहे हैं कुछ घंटों बाद!


बच्चा जैसे कहता है

'मैं खूबसूरत हूं ना?'


"और प्रेग्नेंसी कितनी खूबसूरत है न!" मैं जवाब देता हूं।


Saturday, May 4, 2024

मुझसे प्यार करने के बाद


 मुझसे प्यार करने के बाद तुम्हारा पहले जैसे कुछ भी नहीं रह जाएगा

इतराने लगोगी हर कविता पर

हर लफ्ज़ में समाने लगोगी मुझे

तस्वीरों से समा जायेंगे

साथ बिताए पल

और शताब्दी के अंत तक याद रह जायेगी हर एक छुअन.


मुझसे प्यार करने के बाद तुम्हारा पहले जैसे कुछ भी नहीं रह जाएगा

टटोलोगी मुझे किताबों में

जिन्हें हमने साथ पढ़ा था

उन बातों में

जिन्हें हमने साथ कहीं थी

बुदबुदाओगी मुझे

और पास आने को ललचाओगी

जब भी मैं दूर होऊंगा.


दरवाजे की हर दस्तक में

मेरे आने का इंतजार होगा

नींद में चूम लेने की लालसा

जब नहीं होऊंगा पास

तुम्हारे होंठ सूख जाएंगे याद में

नींद हो जायेगी बेझिल

चांद खाओगी भूख में

दुहराओगी मेरा नाम.


मुझसे प्यार करने के बाद तुम्हारा पहले जैसे कुछ भी नहीं रह जाएगा

सच को सच कहना समझोगी 

सहन को साहस में बदल दोगी

तुम युद्धरत तो हमेशा से थीं हर कठनाई से

ज़रा और जोर से लड़ना सीख जाओगी 

दुनिया सिर्फ मर्द की नहीं है

बराबरी के हक का पता चलेगा तुम्हें

सीने से खुद को लगाना सीखोगी

और दुनिया को अनुभव से तौलोगी.


तुम्हारी पीठ पर जितनी कविताएं लिखूंगा

सब तुम्हारे सीने में जमा हो जाएंगी

तुम्हारे माथे को चूम

जितने भी सूरज उगाऊंगा

तुम्हें ताउम्र प्रज्ज्वल करेंगे

और जो नज़्में हम साथ लिखेंगे

उनका हर लफ्ज़ चूमोगी.


तुम तुम नहीं रह जाओगी

तुम्हारा होना और भी प्रदीप्त हो जायेगा

ज्यादा निष्पाप, शांत, सरल,

कांटों के बीच युद्धरत गुलाब

प्रेम यही सब बदलाव तो हमारे अंदर लाता है


 मुझसे प्यार करने के बाद तुम्हारा पहले जैसे कुछ भी नहीं रह जाएगा।


(बांग्लादेशी कवि हुमायूं आजाद की कविता से प्रेरित)

इक पत्र और प्रेम कविताएं



 मैंने कहा "तुम जहां हो

वहां तुम्हारा होना 

एक क्रांति है।"


"नहीं, मेरा होना ही 

एक क्रांति है।"

लड़की ने प्रत्युत्तर दिया।


**


किताबों में उलझा

एक वीरानापन है।


कैसे तुम्हें समझाऊं

तुम्हारा दुनिया में होना ही अपनापन है।


**


एक रात तुम लौट आना

शहर से लौटता है कोई गांव जैसे


वैसे शहर से कोई

फिर स्थाई तो नहीं लौटा है गांव

ह्वंगसांग से सारे

यात्री की तरह लौटते हैं गांव


पर एक रात तुम लौट आना

अपने होने की यात्रा पर।


**


तुनहरे हाथों में गुदगुदी होती तो होगी

मेरी याद अभी भी वहां सोती तो होगी

दवा नीम सी बिखरी है चेहरे पे तुम्हारे

मेरी याद बुखार में राहत देती तो होगी।


**


मैंने नहीं चाहा कि

कभी पीली साड़ी को उतारो तुम

पतझड़ में बसंत होती हो

मेरा मन-तरंग खिल जाता है


तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा

पीला सूट

खुले बाल

तुम्हें भगवान ने पीली साड़ी में ही बनाया होगा।


**


जो तुम्हें

पाठ्यक्रम में सिखाया जाएगा


वो तुम्हें कभी

वह नहीं बनाएगा

जो तुम बनना चाहते हो


या कि ईश्वर तुम्हें बनाना चाहता था.



**


एक दिन जब ईश्वर

खुद धान रोपेगा


तो खुद न्यूनतम समर्थन मूल्य

बढ़ाने चला आयेगा.


धरती पे बैठे लोगों को तो

धान कैसे उगती है

कभी समझ नहीं आयेगा!


**


तुम जीता जागता प्रेमपत्र हो.


**


मृत्यु से भी ज्यादा

बदतर होना कुछ देखा है?


क्या ढोया है

वह बोझ


असफलता, 

निःसंतानता,

बेरोजगारी


इससे भी बड़ा बोझ है

अपनी संतान से आंखें न मिला पाना


और उस गलती के लिए

जो तुमने कभी की ही नहीं थी!


**



मुझे पूछना था तुमसे

कि किरदार जिनमें तुम 

रम जय करते थे


उन्हें 

जिस्म से बाहर कैसे निकाला करते थे?


मैं तो जिस किरदार में हूं

वर्षों से वही ढो रहा हूं।


(इरफ़ान के लिए)

निर्मला पुतुल की प्रसिद्ध कविता


बाबा! 


मुझे उतनी दूर मत ब्याहना 


जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर 


घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें 


मत ब्याहना उस देश में 


जहाँ आदमी से ज़्यादा 


ईश्वर बसते हों 


जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ 


वहाँ मत कर आना मेरा लगन 


वहाँ तो क़तई नहीं 


जहाँ की सड़कों पर 


मन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटरगाड़ियाँ 


ऊँचे-ऊँचे मकान और 


बड़ी-बड़ी दुकानें 


उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता 


जिस में बड़ा-सा खुला आँगन न हो 


मुर्ग़े की बाँग पर होती नहीं हो जहाँ सुबह 


और शाम पिछवाड़े से जहाँ 


पहाड़ी पर डूबता सूरज न दिखे 


मत चुनना ऐसा वर 


जो पोचई और हड़िया में डूबा रहता हो अक्सर 


काहिल-निकम्मा हो 


माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में 


ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर 


कोई थारी-लोटा तो नहीं 


कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी 


अच्छा-ख़राब होने पर 


जो बात-बात में 


बात करे लाठी-डंडा की 


निकाले तीर-धनुष, कुल्हाड़ी 


जब चाहे चला जाए बंगाल, असम या कश्मीर 


ऐसा वर नहीं चाहिए हमें 


और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ 


जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाए 


फ़सलें नहीं उगाईं जिन हाथों ने 


जिन हाथों ने दिया नहीं कभी किसी का साथ 


किसी का बोझ नहीं उठाया 


और तो और! 


जो हाथ लिखना नहीं जानता हो ‘ह’ से हाथ 


उसके हाथ मत देना कभी मेरा हाथ! 


ब्याहना हो तो वहाँ ब्याहना 


जहाँ सुबह जाकर 


शाम तक लौट सको पैदल 


मैं जो कभी दुख में रोऊँ इस घाट 


तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम 


सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप 


महुआ की लट और 


खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ संदेश तुम्हारी ख़ातिर 


उधर से आते-जाते किसी के हाथ 


भेज सकूँ कद्दू-कोहड़ा, खेखसा, बरबट्टी 


समय-समय पर गोगो के लिए भी 


मेला-हाट-बाज़ार आते-जाते 


मिल सके कोई अपना जो 


बता सके घर-गाँव का हाल-चाल 


चितकबरी गैया के बियाने की ख़बर 


दे सके जो कोई उधर से गुज़रते 


ऐसी जगह मुझे ब्याहना! 


उस देश में ब्याहना 


जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों 


बकरी और शेर 


एक घाट पानी पीते हों जहाँ 


वहीं ब्याहना मुझे! 


उसी के संग ब्याहना जो 


कबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरह 


रहे हरदम हाथ 


घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर 


रात सुख-दुख बाँटने तक 


चुनना वर ऐसा 


जो बजाता हो बाँसुरी सुरीली 


और ढोल-माँदल बजाने में हो पारंगत 


वसंत के दिनों में ला सके जो रोज़ 


मेरे जूड़े के ख़ातिर पलाश के फूल 


जिससे खाया नहीं जाए 


मेरे भूखे रहने पर 


उसी से ब्याहना मुझे!

 

Sunday, December 24, 2023

तुम्हारे प्रेम की कविताएं

 


मुस्कुराऊं तो मुस्कुराती हो

बेवजह गाल सहलाती हो

पीछे से आ लिपट जाती हो

बाल बिखराती हो, बारिश कराती हो

नींद में बुदबुदाती हो

कितने वादे करती हो, 

कितने याद दिलाती हो

जब भी खिलखिलाती हो

कितनी भोली नज़र आती हो

चूम लूं , लजाती हो।


तुम बहुत भाती हो।


**


सूख के तुम्हारे होंठों से झर जायेगी कविता

कभी उंगलियों की पोरों के उलझ जायेगी कविता

तुम्हारे माथे को चूम इक कविता उगा दूंगा

तुम्हारी करवट पर शांत सो जायेगी कविता।


तुम्हारे होने से पूर्व मैं एक कविता था

तुम्हारे आने के बाद तुम एक कविता हो।


उलझी गलियों में जब उलझोगी

मेरी कविता सीने से लगाना

यूं थम मेरी उंगली चले आना!


**


कुछ भी प्रेम हो सकता है,

रिसते हाथ

सिसकती सांस

सरकते होंठ

भीगी आंख.


प्रेम... बस प्रेम है!


**


कविता अधूरी

बैठी रही किसी कवि की याद में।


जैसे तुम्हारी राह तकते

मैं बैठा हूं,

दिल्ली में दिल लिए।


**


कनखियों से देखता तुम्हारा लजाना

सादगी से सीने में उतर जाना।


कविता की पहली किताब की तुम प्रेरणा होगी

कविता की आखिरी किताब का नज़राना।


तुम्हारी लटो में उलझ मार जाऊंगा,

एक रोज ऐसी कविता हो जाऊंगा।


प्रेरणा सृष्टि के जन्म की रही होगी,

कनाखियों से देखना तुम्हारा लजाना।


**


यह कविता

माफीनामा है

तमाम स्त्रियों से,

जिनसे मैंने पुरुष की

तरह व्यवहार किया।


जबकि मुझे मनुष्य होना चाहिए था।



**


तुम्हारे होने से ही है ये दुनिया

तुम्हारे होने से हैं ये घर।


कितना सुखद है

किसी के होने से

खुद के होने का एहसास होना।




Tuesday, December 19, 2023

प्रेम बस प्रेम की कवितायें



 कुछ लड़कियां ज़मीं होती हैं, कुछ आसमां,

कुछ नींद होती हैं, कुछ ख़्वाब,

कुछ नदी होती हैं, कुछ समंदर,

कुछ लड़कियां छत होती हैं, कुछ घर.


तुम रेयर कॉम्बिनेशन हो,

तुम ये सबकुछ हो!


*


भाषा खत्म हो जाएगी,

मैं तुम्हें कविता से पुकारूंगा.


कविताएं भाषाओं से नहीं

संवेदनाओं से लिखी जाती हैं.

कविताएं मुख से नहीं 

एहसासों से कही जाती हैं.


*


तुम्हारे होंठों को चूमकर

ईश्वर के सबसे करीब होता हूं.


सीता ने

प्रेम से राम को

राधा ने

प्रेम से कृष्ण को


ईश्वर बनाया है!


*


तुम्हारी हंसती आंखों में

निश्छलता रहेगी जबतक


प्रेम 

बना रहेगा धरती पर

तबतक.


*


मुझे यकीं है

सिर्फ प्रेम ही

किसी को पवित्र कर सकता है


कर्मकांड नहीं!


*


यौवन के

हर कोने पर निशां हैं.

देह के

हर हिस्से पर कोंपल सा फूटा हूं.


तुम्हारी आत्मा पर

कविता बोई है मैंने.


कैसे और कहां

जाओगे मुझे छोड़कर!


*


मैंने जब

नौकरी की,

रीढ़ की हड्डी खोई,

फाइनेंशियल मैनेजमेंट सीखा

सोशल सिक्योरिटी की परतें ओढ़ी.

सोशल स्टेटस समझा,

फिर लोगों को आंखों में

उसका दंभ देखा...


मैं जान गया

मैं इस दुनिया के लिए

नहीं बना हूं.


*


जब जब मैं मद्धम पड़ता हूं


तुम उग आते हो

उजाले की तरह.


*


किसी कविता सी तुम

फूट पड़ती हो घावों से

दर्ज़ के बीज से जैसे

फूट पड़ा है कोई पौधा.


जख्मों से

निकल पड़ी हैं कविताएं,

कहानियां, कई चित्र.


शुक्रिया दर्द का, जख्मों का.


*


मैंने तुम्हें ज़िंदा रखा है

किस्सों में, कहानियों में,

कविताओं में.


देह...

देह से परे

कवि ही किसी को

ज़िंदा रख सकता है...


कलम से.


*


लेट होने पर जो तुम

गुस्सा करती हो

मॉर्निंग वॉक न करूं तो

मुंह फुलाती हो

ऑफिस से आ कितना बतियाती हो

कुछ बातों पर कितना घबराती हो

मेरे मजे लेती हो

कितना खिलखिलाती हो

बच्चे से चिपक

मासूम सो जाती हो

भीड़ में हाथ पकड़

जो मुस्कुराती हो

किसी पार्टी में

कोने में ले जा बतियायी हो

चूम लूं, लजाती हो.


तुम बहुत भाती हो.


*


कुछ कविताएं

कितनी गरम होती हैं


जैसे पीठपर 

तुमने अधर रख दिए हों.


*


मेरे सीने में जमा

जो समंदर है


कहो

क्या तुम्हारे भी अंदर है?


सही की धार में बहते हो?

गलत को गलत कहते हो?


*


मैं अगढ़ ही रहना चाहूं तो?


तराशकर कहीं रखा जाऊं

सब देखें, पूजा करें.


मैं किसी पहाड़ का,

किसी नदी में बहता

अगढ़ पत्थर ही रहना चाहूंगा.


*


ईश्वर को सबसे ज्यादा याद

कृषक ने किया.


ईश्वर ने सबसे कम

कृषक की सुनी.


*


एक शहर था

जहां तुम्हारे होने तक मैं था

तुम्हारे होंठों को चूम मैंने

उस शहर को छोड़ा.


वो शहर

तुम होंठो में जमाकर

साथ ले गई हो.


बड़ा ताल जमा किया था होंठों पर

प्यास में फिर भी वे

सुना है मेरी राह तकते हैं!


*


कि मेरे शहर आओ


वो पेड़ अब भी चहचहाता है

वैसे ही,

वो नदी अभी बजे जा रही है

वैसे ही,

चौराहा वो निरंतर जी रहा है

वैसे ही.


तुम्हारे हमारे जाने से

कुछ तो नहीं बदला.


एक रिश्ता,

एक सपनों के घर के अलावा.


*


मैं तुम्हें सुलगा लेता हूं जानम


किसी शाम कातर होती आंखों में

भर जाता है उम्मीद का धुंआ.


*


एक दिन

कविता यूं ही अटक जायेगी

एक सांस

यूं ही थम जायेगी

कोई ख्वाब

यूं ही आंखों में रह जायेगा

एक टीस

बची रह जायेगी.


आसमां के गीत पर

सुबह को चादर ओढ़ गुनगुनाऊंगा.

एक रोज दुनिया से निकल

मैं दुनिया का हो जाऊंगा.


*


तुमसे एक अंतिम बात कहनी थी

ख्वाब सड़क पर पड़ी टहनी थी

एक सिरे पे जिसके तुम्हारा नाम था

पेड़ की दूसरे सिरे पे आस बंधी थी.


मेरे जिस्म में पत्ती रहनी थी.

ख्वाब सड़क पर गिरी टहनी थी.


*


तुम्हारे पास

जान रखकर वो लड़का

ज़िंदगी ढूढने चला है.


जिंदगी ढूंढ ले वो

तो बताना

बेजान जीने की अगर कला है.


*


मैंने कविताएं लिखीं

प्रेम सार्वजनिक कर दिया

मैंने कविताएं लिखीं

दुःख सार्वजनिक कर दिया.


मेरे दोस्त,

सबकुछ तुम्हारे साथ ही नहीं 

घटित हो रहा है पहली बार.


यकीन न हो तो

मेरी कविताएं पढ़ लेना.


*


प्रेम के खातिर

मारे जाते हों युवा

जिस समाज में


वो समाज कैसे कहला सकता है?

कहला भी ले तो

सभ्य कैसे कहा जा सकता है?


*


इंतजार करते रहे हम

कि सुंदर होगा जहां में कुछ और.


और बस गए हम.

तुम्हारे होंठों में बना घर

ताउम्र रह गए हम.

Monday, December 18, 2023

ईश्वर और प्रेम कि कवितायेँ


मुझसे कहा गया

मैं मंदिर जाऊंगा वहां ईश्वर मिलेगा.


मैंने तुम्हारी आँखों में देखा

ईश्वर वहां मुस्कुराता झांक रहा था.

--**--


बुद्ध, महावीर

मूर्तियों में क़ैद कर दिए गए.


उनका कहा

बड़ा कठोर, नग्न सच था.


उनका हश्र 

यही होना था!


--**--


जब मेरी उँगलियों की पौरें,

तुम्हारी उँगलियों की पौरों को

आहिस्ता-आहिस्ता छूती हैं...


तब सृष्टि का निर्माण

हौले-हौले शुरू होता है...


--**--


मेरे माथे को चूम खिलखिलाना,

मेरी हंसी में बस जाना.

मुझे गले लगाना,

मेरे सीने में समा जाना.

मेरे होंठों पे जमा कर देना खुद को,

चूमकर.

हाथों में लम्स,

छूकर.


देखें,

फिर हमें कौन जुदा करता है.


--**--


मुझे कोई देखे,

उसकी नज़र

तुम्हारी मुस्कान पर ठहर जाये!


तुम समाना

इस तरह

मेरे अंदर!


--**--


मेरे पास खेत नहीं कि

धान उगाता.


मेरे पास प्रेम था,

मैंने प्रेम उगाया.


शहर में प्रेम की कवितायेँ


 कितना वक़्त था

जो तुम्हारे बगैर 

काटा न जा सकना था.


पर सारा ही कट रहा है

तुम्हारे बगैर.


--**--


मुझसे जब तुम

उस शहर में मिलती हो

ज्यादा खूबसूरत लगती हो.


आँखें और बड़ा ताल,

माथा और मानव संग्रहालय

होंठ और भारत भवन.


कितनी समानता है न?

आँखों में जो सैलाब है

झील से कुछ ज्यादा ही है.

माथे पर बल

मानव संग्रहालय में दर्ज़ सभ्यताओं से ज्यादा हैं.

होंठों से झिरते लफ्ज़...

भारत भवन में भी उतने सुन्दर नहीं कहे किसी ने.


तुम हो मेरा शहर.


तो बताओ मेरे शहर,

तुमसे इश्क़ कर

क्यों न जाऊं तर!


जब तुम उस शहर होती हो,

ज्यादा खूबसूरत होती हो.


--**--


तुम्हारे चूमकर पैर 

मैं जाऊंगा घर.


पैर चूमकर

रिश्ता न सही

प्रेम मुकम्मल सा लगता है.


--**--


तुमसे बात करने के बाद

कवितायेँ झरने लगती हैं.


--**--


हम प्रेम को नहीं चुनते

प्रेम हमें चुनता है.


प्रेम मुकम्मल होगा या नहीं

ये समाज चुनता है.


(हीर की कब्र पर फूल हरे होंगे.)


--**--


जिसके सीने से लिपट 

क्रोध, मोह, माया, स्वार्थ,

काम, अहंकार, घृणा, द्वेष

त्यागा सा लगे.


उसी से तुम्हें सच्चा प्रेम है.


--**--


कितने इतवार काटे मैंने

तुम्हारे इंतज़ार में.

बावन? पांच सौ बीस?

अब तो गिनती ही नहीं.


शतायु को बावन सौ 

इतवार मिलते हैं.

तुम्हारे बगैर

हर इतवार शतायु होता है.


--**--


मैं किसी दिन लिखूंगा

कोई कविता,

जो तुमसे ज्यादा खूबसूरत होगी.


--**--


मैं चाहता हूँ,

किसी सिंधु घाटी सभ्यता 

के किनारे

गढ़ना तुम्हें किसी कविता में.


हज़ारों साल बाद कोई देखे

कहे 'ओह! ब्यूटीफुल डांसिंग गर्ल!'


--**--


तुम्हारी नाक

महावीर टेकरी सी है.

तुम्हारे अंगूठे

कोलर डैम छूटे हैं.


तुम मोहब्बत में जानं

मेरा भोपाल शहर हो जाती हो!


--**--


कितने लोग थे

जिनके हिस्से पूरा प्यार नहीं आया.


और वे अधूरे जीते रहे.

तुन्हें कभी पता ही नहीं चला

की प्रेम के बाद

दुनिया कैसी होती है!


Thursday, December 7, 2023

युद्ध और प्रेम की कविताएं

 


तुम्हारे ब्रह्मांड में जा
तुम्हारे होंठों को चूम ले.

मेरी कविता की बस यही चाह है.

---

तुम्हारी पीठ पर
जो कवितायें लिखीं गईं

वे ही सबसे सुंदर कवितायें थीं.

---

जिन कविताओं को
तुमने होंठों से लगाया.

वे ही मुकम्मल घोषित की गईं.

---

मेरे पास बंदूक है
मैं उस पर कविता रख
सुकूं से सो जाता हूं.

सिर्फ कविता
बंदूक सुला सकती है,
शांति स्थापित कर सकती है.

---

मैं लिखता हूं
कविता,
कि एक रोज
तुम तक पहुंच ये
तुम्हारे होंठों को चूमेगी.

मेरी याद में तुम हथेलियां सहलाओगी.

---

एक कविता युद्ध को सहला रही थी
युद्ध जर्जर था युद्धोपरांत.

युद्ध दौरान कविता
टूटी मानवता को सहलाती रही,
युद्ध उपरांत युद्ध को.

युद्ध और क्रोध तोड़ते हैं विरोधी,
साथ ही स्वयं को...

कविता ने कहा उस रोज.

---

युद्ध और प्रेम में हमेशा
युद्ध चुना गया.
होंठों और बंदूक में
बंदूक चुनी गई.

यह मानवीय निर्बलता है
कि युद्ध आसान है,
प्रेम कठिन.

गले लगाना, होंठ चूमना
बंदूक उठाने से
ज्यादा साहस का काम है.

---

तुमसे प्रेम
अनायास नहीं था.
तुम्हारी सुंदर आंखों में
आंसू
सीने में सैलाब
जिस्म में जज़्बा
जेहन में विचार
इरादों में पंख थे.

ये रेयर कॉम्बिनेशन हैं.

तुम्हें छू में तरंगित था
चूमकर बुद्ध हुआ
जब जब सीने से लगे तुम
मैं खुद को खोता गया,
तुम्हारा होता गया।

बताओ,
तुमसे प्रेम न हो तो किससे होता!

---

तुम्हारी पीठ पर लिखे हैं
मैंने सबसे सुंदर शब्द
तुम्हारे हाथों में छोड़ी है
सबसे सुंदर एहसास.

मैं कहीं भी रहूं,
तुम जहां भी रहो

थककर, हारकर
आंसू, उन्माद लिए
तुमतक पहुंच जाता हूं.

तुम मेरा घर हो.

तुमसे प्रेमकर मैंने जाना दोस्त,
घर सिर्फ जगहें नहीं होती
लोग भी होते हैं!

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फोटो : इंटरनेट

Tuesday, August 29, 2023

तुम

तुम उस भोर सी दीप्त हो 
जो एक सुखद शुरुआत की
आभा लिए प्रकाशित होती है. 

तुम उस देहरी सी दीप्त हो 
 जिसे हर दिवाली घर से वापस जाते 
प्रतीक्षा में छोड़ आता हूँ. 

Monday, August 28, 2023

Love and Goodbyes



अप्राप्य और प्राप्य के बीच 
तुम्हारी उँगलियों की पोरों पर 
अपने आंसू रख चला आया था. 

जो प्राप्त है मेरे पास 
उसके प्राप्य का सुख है. 
जो अप्राप्य, उसके लिए शुभकामनायें. 

... और एक ख़त,
जिसमें लिखा गया 
'कितना गहन प्रेम है हमें'
लेकिन कभी भेजा नहीं गया. 

Sunday, August 27, 2023

    इक ख़त, जिसमें लिखा था कि

कितनी मोहब्बत है हमें
बस लिखा गया, कभी भेजा नहीं गया।
एक ख़त, जिसमें लिखा था कि
कितनी मोहब्बत है तुम्हें,
उसका रहा इंतजार।
एक कविता जिसमें तुमने इश्क को
नमक की तरह स्वादानुसार
जरूरत कहा था
मैंने दूसरी दफा नहीं पढ़ी।
एक कविता जिसमें लम्स का एहसास
अनंत तक रहता है साथ
मेरी फेवरेट है।
अपृथक की जाने वाली जगहों से
तुम्हारे अनुसार
स्त्री खरोंच खरोंचकर कर दी गई है अलग।
मेरे अनुसार
प्रेम, आस्था, समर्पण और उत्तरदायित्व
इनमें से किसी एक की कमी
किसी पुरुष में,
उसे इतना कमजोर बनाती है
कि स्त्री से वह दुर्भावनापूर्ण व्यवहार करता है।
एक स्त्री, एक प्रेम
उतने ही पवित्र हैं
जितनी मंदिर में रखी अबोध प्रतिमा!
Vivek Vk Jain | Dec 2022
May be an image of 1 person and smiling

Sunday, June 17, 2018

रात

एक खूबसूरत नींद कभी कविता नहीं कहती
एक बदसूरत रात कभी बच्चे नहीं जनती.

उसने कहा मेरा पोट्रैट बनाओ
मैंने कैनवास काला कर दिया
वो चकित थी
कि मैं उसे इतना अच्छे से कैसे जानने लगा हूँ.

मैंने नींद कि गोलियां लेना शुरू की
उसने प्रेम में कवितायेँ लिखीं
उसने धीमे से मेरा माथा चूमा
वहां का खून जम काला पड़ गया.
उसने कहा 'उसे मेरे जैसा प्रेमी ही चाहिए था'
और मेरा दम घुटने लगा.

वो लबालब हो गई मेरे प्रेम में
ऐसा उसने कविता में लिखा
फिर बोली 'अच्छा तुम भी कुछ सुनाओ.'

मैं हौले से बुदबुदाया
'मैं उबर चुका हूँ तुम्हारी छुअन से
तुम्हारे छूने से अब आत्मा नहीं धधकती.'

वो बदसूरत रात कट-फट चुकी थी
लेकिन ये बेहद खूबसूरत अंत था.

Sunday, May 27, 2018

तू ती को रि न


देयोनार बनो,
गाज़ीपुर बनो,
जलो, गलो, सड़ो, मरो,
चुप रहो.
चुपचाप
कानपुर,
फरीदाबाद,
लुधियाना या
दिल्ली हो जाओ.
या सवाल पूछो,
सड़कों पे आओ,
तो गोलियां खाओ
सरकारी चेतावनी सुनो.
तूती नहीं चुप्पी सीखो तूतीकोरिन.
सचेतोगे, जागरूक होंगे, मांगोगे
तो मार दिए जाओगे तूतीकोरिन.

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Notes:
-Deonar, Gazipur- Asia's largest dumping grounds.
-Kanpur, Delhi, Ludhiyana - most polluted cities in the world.
-‘Right to clean and healthy environment’ is a fundamental right under article 21 of the Constitution.

Thursday, April 26, 2018

तुम्हें ढूंढता नहीं मैं


तुम्हें ढूंढता नहीं मैं,
न ही कोई चेष्ठाएं करूँगा पाने की.
यदि तुम नदी हो
तो मेरी यादें उसके डूबे
गोल पत्थर हैं
जो संग साथ बह रहे होंगे
और मैं वो सागर जिसमें जा तुम समाओगी.
यदि तुम नज़्म होगी
तो मेरी यादें उसके लफ्ज़ होंगे
और मैं उस नज़्म का संपूर्ण मायना.
यदि ईश भी हो जाओ तुम
तो मेरी याद वो प्रथम कृति होगी
जिसे तुम गढ़ोगी
और मैं तुम्हारा वैकुंठ, जिसमें तुम रहोगी.
मैं इंतज़ार में नहीं हूं तुम्हारे
मैं तुममें हूं
रक्तकनिकाओं सा तैर रहा हूं
जिस्म के हर हिस्से में
आकाश सा समेटे हूं
तुम्हें अपने में.
पिता सा देख रहा हूं
तुम्हारे पहले उठते कदमों को.
एहतियात से, कि थाम पाऊं अगर गिरे तो.
प्रेमी सा
सीने से लगाए हुए हूं
प्रेम की नई परिभाषाएं गढ़ रहा हूं.
मैं तुम्हारा क्या था, क्या हूं,
और क्या हो जाऊंगा... नहीं जानता.
लेकिन इंतज़ार में नहीं हूं,
ढूंढ़ता नहीं हूं
क्यूंकि तुममें हूं.
चेष्टाएं नहीं करूंगा पाने की
क्यूंकि तुम नदी सी सामाओगी मुझमें ही
बादल बरसोगी मुझ पर ही
सांसों में अंत्रकृत मुझे ही
कोई भी वाद्य हो, धुन निकालोगी मेरी ही.

Sunday, April 8, 2018

लकड़ी


वो लकड़ी है, लड़की नहीं
बड़ी होते ही चूल्हे में जला दी जाएगी.

ये मेरी दोस्त
तुम लकड़ी बन ही रही हो
तो मेरी दादी की लकड़ी बनना
जिससे उन्होंने समाज के ठाकुरों को पीटा
और जरूरत पड़ने पे दादा को भी.
उनकी लकड़ी इतनी ताकतवर थी कि
सारा गांव उनसे डरता था
उन्होंने सपने में तो औरंगज़ेब को भी उसी लकड़ी से मारा होगा
और अंग्रेज़ तो उनकी लकड़ी के सामने ही भागे.

इसलिए मेरी दोस्त
लड़कियां लकड़ियां पैदा होती हैं
जिन्हें बड़े हो के चूल्हे में जलना है
लेकिन तुम इतना तेज़ जलना कि
आग से समाज जला सको
दो चार को धुंएँ से मार सको
और इतना धधकना कि
ये जो आग है
वो बुराई को, बुरा करने वाले को
दशहरे के रावण सा जला दे.

हालाँकि रावण हर वर्ष जलने के लिए नहीं पैदा हुआ था
हर लड़की लकड़ी बनने नहीं पैदा हुई है
हर आदमी जलाने पैदा नहीं हुआ है
और हर एक कि नियति में कांटे नहीं उगे हैं.

लेकिन मुझे भरोसा है
जब अंतिम लड़की लकड़ी बनने से मना कर देगी
उस दिन सब तुम्हें याद करेंगे.
जैसे मैं मंडेला को याद करता हूँ
निडर गाँधी को याद करता हूँ
और लक्ष्मीबाई की आग को याद करता हूँ.

लकड़ी बनना मेरी दोस्त
तो बरसना भी सीखना
गरजना भी सीखना
जलना पर जलाना भी सीखना
गलना पर गलाना भी सीखना.

देखना तुम्हारे आंसू जाया न जाएँ
वो मोती हैं मेरी लिए
और तुम्हारी आँखें सीपी,
जिनमे पड़े सपने
तुम्हें मेरी याद दिलाते रहेंगे.

Saturday, April 7, 2018

मेरे दोस्त

स्थापित सत्यों को नकार कर
रेत बाजुओं में भर 
चाँद तारों को सूली पे चढ़ा देता हूँ.
तुम्हें भय है कि ईश्वर आ जायेगा एक दिन
और मेरे कर्मो का हिसाब लेगा
लेकिन यह स्थापित तथ्य है
और मैं इसे नकारता हूँ.

मुझे ईश्वर नहीं चाहिए
तुम्हारी आस्थाएं और नियम भी नहीं
मैं आदिमानुष हूँ
जो अभी भी उन कंदराओं में जी रहा हैं
जिनमें बस उसके नियम चलते हैं
उन कायदों में बंधा है
जिनसे उसे सुख मिलता है
और उन आँखों से दुनिया देखता है
जो उसे जन्म से मिली थीं.

मुल्कों को नकार 
धर्मों को नकार
जातियां नकार
मिले लिंग को नकार 
युद्धों को नकार
दंगों को नकार
हत्याएं नकार
अभिमान और ज्ञान नकार

जो बचता है
वो थोथला नंगा इंसान है
जिसके कपड़ों से बू नहीं आती 
हत्याओं को,
धरती हड़पने की,
प्रदूषण की,
जन-जंगल-जमीन हरने की 
न किसी स्त्री के खून की.

वो मैं हूँ.
और अगर तुम भी वो बन सकते हो मेरे दोस्त
तो आओ 
मेरे साथ चलो
नंग-धडंग 
अपने समाज, परिवार और आस्थाओं से परे.
यदि नहीं कर सकते ऐसा
तो कितना भी लिख लो तुम 'आज़ादी'
कितना भी कह लो 'फेमिनिज्म'
कितना भी चिल्ला लो तुम 'प्रेम'
तुम्हारा कहा सब मृगमरीचिका है
तुम्हारा ज्ञान सब थोथा विज्ञान है
और रही बात तुम्हारी कविता की
वो सब बारहखड़ी के अलावा कुछ भी नहीं
जो कागज़ रंग रही है
और पेड़ गिरा रही है.

मेरे दोस्त 
कोई भी इंसान आदिमानुष
 हुए बगैर 
कवि नहीं हो सकता
न ही मेरा मित्र.
ये भी एक प्रथम और अंतिम स्थापित सत्य है.

Wednesday, April 4, 2018

तेरे-मेरे

गम के हिस्से कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे हैं
कुछ आंसू तेरे हिस्से हैं, कुछ मेरे हैं
किरचनें ख्वाबों की चुभती हैं
ख्वाब टूटे कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे हैं.
बंद पड़ी ढेरों बातें हैं, 
कुछ बेरंग खत तेरे हैं, कुछ मेरे हैं.
एक बाढ़ छुपी तेरे सीने में हैं
एक मचली नदी मेरे सीने में है.
कुछ नकली रेखाएं तेरी हथेली पर
एक टूटी नियति मेरे जीने में है.
दर्द तेरी बातों में कुछ है
कुछ पिघले लफ्ज़ मेरे हैं
तुझे खुशियां सीने से लगानी मेरे है
मुझे माथे पे सूरज उगाना तेरे है.
लेकिन ज़ख्म नए-पुराने तेरे-मेरे हैं
सारे अरमान अधूरे तेरे-मेरे हैं
सबको हाथ छुड़ाने तेरे-मेरे हैं
क्यूंकि दिल दीवाने तेरे-मेरे हैं
क्यूंकि दिल दीवाने तेरे-मेरे हैं.

Tuesday, March 13, 2018

जैन-बैल-खेल


कभी लगा वो लोग खुशकिस्मत हैं 
जो खुद की देह में ही अजनबी हो गए
उनसे जो खुद के घर में अजनबी हुए हैं.

फिर कभी उल्टा लगा.
मतलब खुद के घर में अजनबी होना अच्छा है
खुद की देह में अजनबी होने के.

फिर दोनों ही ख्याल अजीब लगने लगे
जैसे बचपन में 'त्रिशला-नन्दन महावीर' भजन निरर्थक था.
वैसे वो आज भी निरर्थक ही है.

मेरे पिता ने मुझसे बेहतर जैन बनने को कहा
मेरे हर बार बेहतर जैन बनकर पहुंचा
उन्हें हर बार और भी कमतर जैन महसूस हुआ.

उनका धर्म मंदिर ले जाता था
और मैं ज्यूँ ज्यूँ धर्म के करीब आता गया
 मंदिर से दूर होता गया
और अपने में धर्म के पास.

न उन्हें कभी समझ आया
न मुझे शायद धर्म.

खैर, मुद्दे की बात ये है कि
मैंने उनसे ये ज़िन्दगी नहीं मांगी थी
उन्होंने दी वो भी रिश्ते-नाते, परिवार समाज, धर्म
और बने-बंधे कायदों के साथ.
मैं जुते हुए बैल कि तरह पैदा हुआ था
जिसे सीढ़ी धुरी में चलना था
और डंडे से रास्ता दिखाया जाना था.

मैंने इससे इंकार कर दिया.

मैंने एक प्रेमिका चुनी
एक सपना चुना
एक गीत लिखा
दो सौ रूपये की आज़ादी वाली किताब खरीदी 
और जूतों में पंख लगा उड़ गया.

प्रेमका ने दिल तोडा
सपना बिखर गया
गीत को किसी ने न गुनगुनाया
किताब का लेखक कर्मों से लिखे जैसा न था
और जूते घिस गए.

...और मुझे लगने लगा मेरे पिता सही थे.
जुते हुए बैल सा जीना ही सही है.

लेकिन देह और घर दोनों जगह ही अजनबी इंसान 
ऐसे ज़िंदा कैसे रहता.
इसलिए मैंने मरना चुना.
किन्तु आत्महत्या अपराध था
और मेरा सुसाइड-नोट पोएटिक था.
मेडिकल साइंस ने भी तरक्की कर ली थी. बचा लिया गया.

इसलिए मैंने दौड़ना शुरू किया
और खेत से बाहर आने तक दौड़ता रहा.
ये क्रांति थी
अबतक किसी ने दौड़ा न था.
और जो दौड़े थे बांधे गए थे.

मैं किरणों संग भाग रहा हूँ
सबेरे से 
और अँधेरे के पार भागूंगा
अगली उम्मीद तक.

तुम रस्सियां बंटना शुरू कर दो.
बाँधने लम्बी लगेगी.
आकाशगंगा के पार तक.

Monday, February 19, 2018

एक अंडा फूट गया था

मैं बदहवास घर के चप्पे चप्पे में तुम्हें खोजता हूँ
लेकिन तुम नहीं मिलते
उन दीवारों में भी नहीं जिनसे टिककर मैंने तुम्हें चूमा था.
तुम्हरी यादें रोटियों की शक्ल ले लेती है
तुम्हारा जिस्म कविता हो जाता है
और तुम्हारी रूह गौरैया सी लगती है
बचपन में जिसके घोंसले से गिर
एक अंडा फूट गया था.
उस गलती की सजा शायद मैं अब भुगत रहा हूँ.