Saturday, November 19, 2016

राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर सोचें | अनूप भटनागर


यह कैसी विडम्बना है कि भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश के संविधान में मृतप्राय अनुच्छेद 44 के संदर्भ में विधि आयोग द्वारा नागरिक संहिता के बारे में समाज के विभिन्न वर्गों से सुझाव मांगे जाने के साथ ही देश की राजनीति में उबाल आ गया है। कांग्रेस और जनता दल (यू) जैसे सरीखे कई राजनीतिक दल इसके औचित्य पर सवाल उठाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कुछ संगठनों ने इस विषय पर आसमान सिर पर उठा लिया है। समान नागरिक संहिता के सवाल पर कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया ने 1985 में बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के फैसले को बदलने की तत्कालीन केन्द्र सरकार की कवायद की याद ताजा कर दी है।
संभवत: पहली बार उच्चतम न्यायालय ने इस विषय पर कोई सुझाव दिया था। अप्रैल 1985 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश वाई. वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने तलाक और गुजारा भत्ता जैसे मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में देश में समान नागरिक संहिता बनाने का सुझाव दिया था। संविधान पीठ की राय थी कि समान नागरिक संहिता देश में राष्ट्रीय एकता को बढावा देने में मददगार होगी।
इस फैसले के तुरंत बाद तत्कालीन सत्तारूढ़ दल ने आरिफ मोहम्मद खां सरीखे पढ़े-लिखे नेताओं का पहले भरपूर उपयोग किया और बाद में मुस्लिम समाज के कुछ वर्गों और संगठनों के दबाव में इस फैसले को बदलते हुए एक नया कानून ही बना दिया। समान नागरिक संहिता के बारे में विधि आयोग द्वारा मांगे गये सुझावों का विरोध करते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ अन्य संगठनों ने इसका बहिष्कार करने का निश्चय किया है जबकि मुस्लिम महिला संगठनों का तर्क है कि हमें इस प्रक्रिया से तैयार होने वाले दस्तावेज का प्रारूप देखने के बाद ही कोई प्रतिक्रिया देनी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि शासन भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।
शाहबानो प्रकरण के बाद भी देश की शीर्ष अदालत ने इस बारे में सुझाव दिये क्योंकि वह महसूस कर रही थी कि समान नागरिक संहिता के अभाव में हिन्दू विवाह कानून के तहत विवाहित पुरुषों द्वारा पहली पत्नी को तलाक दिये बगैर ही धर्म परिवर्तन करके दूसरी शादी करने की घटनायें बढ़ रही थीं।
न्यायालय ने धर्म का दुरुपयोग रोकने के इरादे से धर्म परिवर्तन कानून बनाने की संभावना तलाशने और ऐसे कानून में यह प्रावधान करने का सुझाव दिया था कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है तो वह अपनी पहली पत्नी को विधिवत तलाक दिये बगैर दूसरी शादी नहीं कर सकेगा और यह प्रावधान प्रत्येक नागरिक पर लागू होना चाहिए। ऐसे अनेक मामलों और महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव को ध्यान में रखते हुए ही विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता के बारे में 16 बिन्दुओं पर सुझाव आमंत्रित करने का निश्चय किया।
आयोग जानना चाहता है कि क्या समान नागरिक संहिता के दायरे में विवाह, विवाह विच्छेद, दत्तक ग्रहण, भरण पोषण, उत्तराधिकार और विरासत जैसे विषयों को भी लाया जाना चाहिए। आयोग यह भी जानना चाहता है कि क्या बहुविवाह और बहुपति प्रथा पर पाबंदी लगायी जानी चाहिए या उसे विनियत करना चाहिए? आयोग ने विभिन्न संप्रदायों के पर्सनल कानूनों को संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के अनुरूप बनाने के लिये उन्हें संहिताबद्ध करने के बारे में भी नागरिकों की राय मांगी है।
आयोग ने मैत्री करार जैसी रूढ़िवादी प्रथाओं पर पाबंदी लगाने या इसमें संशोधन करने, ईसाई समुदाय में विवाह विच्छेद को अंतिम रूप देने के लिये दो साल की प्रतीक्षा के प्रावधान और विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य बनाने और अंतर-धार्मिक तथा अंतर-जातीय विवाह करने वाले दंपतियों को सुरक्षा प्रदान करने के उपायों पर भी सुझाव मांगे हैं।
पारसी विवाह एवं तलाक कानून, 1936 की धारा 32-बी के तहत परस्पर सहमति से तलाक लेने के लिये पति-पत्नी को कम से कम एक साल अलग रहना होता है। ईसाई समुदाय से संबंधित तलाक कानून, 1869 की धारा 10-क (1) के तहत कम से कम दो साल अलग रहने का प्रावधान है। इस मामले में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि विशेष विवाह कानून के तहत शादी करने वाले जोड़े यदि विवाह विच्छेद करना चाहते हैं तो उन्हें इसी कानून के प्रावधानों के अनुरूप आवेदन करना होगा।
उच्चतम न्यायालय की नजर में भले ही समान नागरिक संहिता देश की एकता को बढ़ावा देने वाली हो लेकिन इस बारे में विधि आयोग की पहल ने राजनीतिक दलों को दो खेमों में बांट दिया है। कुछ दल इसका विरोध कर रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा और शिव सेना इसके पक्ष में हैं।

मुक्तव्यापार समझौते का मुखर विरोध

अंतर प्रशांत साझेदारी समझौता (ट्रांस पेसिफिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट या टी पी पी ए) पर इसी वर्ष फरवरी में 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते पर पहुंचने में पांच वर्ष का समय लगा था। साथ ही यह उम्मीद थी कि प्रत्येक देश द्वारा स्वीकृति प्रदान किए जाने के दो वर्ष के भीतर यह लागू हो जाएगा। परंतु अब इस विवादास्पद समझौते पर संकट के बादल छा गए हैं। त्रासदी यह है कि अमेरिका जिसने इस समझौते की प्रक्रिया प्रारंभ की थी वही इसे समाप्त करने पर तुला हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति  चुनाव में टी पी पी ए सर्वाधिक प्रमुखता वाला मुद्दा बन गया है। वैसे डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव अभियान का केंद्र बिंदु टी पी पी ए का विरोध ही है। पूर्व उम्मीदवार बर्नी सेंडर्स, जो कि टी पी पी ए विरोध के अगुआ हैं, का कहना है, ‘‘हमें टी पी पी पर पुन: बातचीत नहीं करना चाहिए। इस उन्मुक्त, मुक्त व्यापार समझौते (एफ टी ए) को नष्ट कर देना चाहिए क्योंकि इससे हमारे यहां के पांच लाख रोजगार नष्ट हो जाएंगे। हिलेरी क्ंिलटन भी अपने विदेशमंत्री पद के दौरान के अभिमत के विपरीत जाकर अब टी पी पी ए के खिलाफ  हो गई हैं। परंतु उनके इस हृदय परिवर्तन को लेकर संदेह किया जा रहा है कि राष्ट्रपति बनते ही वह अपना रुख पुन: बदल लेंगी। परंतु क्ंिलटन का कहना है,’’ मैं टी पी पी ए खिलाफ  हूं। इसका अर्थ है चुनाव के पहले भी और बाद में भी।’’
इस बात की पूरी संभावना है कि दोनों उम्मीदवार इस प्रचलित धारणा को लेकर चिंतित हो रहे हैं, जिसके अनुसार मुक्त व्यापार समझौतों से लाखों रोजगार समाप्त होते हैं, मजदूरी में ठहराव आता है और अमेरिका समाज में लाभों  का अनुचित वितरण होता है। राष्ट्रपति पद के इन दो उम्मीदवारों के अलावा दो अन्य खिलाड़ी और भी हैं जो कि टी पी पी ए की निर्यात के बारे में तय करेंगे। यह हैं राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिकी कांग्रेस। ओबामा टी पी पी ए के मुख्य पैरोकार रहे हैं। उन्होंने अत्यन्त उत्कटता से यह कहते हुए इसके पक्ष में तर्क दिए हैं कि इससे आर्थिक लाभ होंगे,पर्यावरण एवं श्रम मानकों में सुधार होगा और एशियाई भौगोलिक राजनीति में अमेरिका चीन से आगे निकल जाएगा। लेकिन अभी तक उन्हें सफलता नहीं मिली है। यह आवश्यक है कि अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले ओबामा से 8 नवंबर से होने वाले कांग्रेस की सुस्ती भरी कांग्रेस में और जनवरी 2017 के मध्य तक इसे अवश्य ही पारित करवा लें। वैसे अभी तक यह अस्पष्ट है कि इस मरे-मराए से टी पी पी विधेयक को अगर सदन के पटल पर रखा जाता है तो इसे पारित करवाने जितना सहयोग उन्हें मिल भी पाएगा कि नहीं। पिछले वर्ष इससे संबंधित एक फास्टट्रेक व्यापार अधिकारिता विधेयक बहुत कम बहुमत से पारित हो पाया था। अब जबकि यह ठोस टी पी पी ए सदन के सामने आने वाला है तो कई सदस्यों के मत में परिवर्तन आ रहा है। ऐसे कुछ सांसद जिन्होंने फास्टट्रेक विधेयक के पक्ष में मत दिया था उन्होंने संकेत दिया है कि वे टी पी पी ए के पक्ष में मतदान नहीं करेंगे।
अधिकांश ड्रेमोक्रेट सांसदों ने संकेत दिया है कि वे टी पी पी ए के खिलाफ  हैं इसमें क्ंिलटन के साथ उपराष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे सीनेटर टिम कैनी भी शामिल है, जिन्होंने फास्ट ट्रेक के पक्ष में मत दिया था। कार्यकारी समिति के सदस्य सेन्डी लेविन का कहना है, अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सदन में इस वर्ष टी पी पी ए को मत नहीं मिलेंगे। यदि प्रस्तावित ढीले-ढाले सत्र में इसे प्रस्तुत कर भी दिया जाता है तो यह गिर जाएगा। सदन के रिपब्लिकन नेताओं ने भी अपना विरोध जताया है। सीनेट में बहुमत के नेता मिच मॅक्कोमेल का कहना है राष्ट्रपति पद के अभियान ने एक ऐसा राजनीतिक वातावरण बना दिया है कि इस सत्र में टी पी पी को पारित कराना वस्तुत: असंभव हो गया है। सदन के स्पीकर और रिपब्लिकन नेता पॉल डी रियान, जिन्होंने फास्ट ट्रेक विधेयक तैयार करने में मदद की थी, का कहना है कि इस बात का कोई कारण नजर नहीं आता कि इस सुस्ती भरे सत्र में टी पी पी को मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाए, क्योंकि हमारे पास इसे पारित जितने लिए मत नहीं हैं। इस बीच सदन में छ: रिपब्लिकन सीनेटरों ने अगस्त के प्रारंभ में ओबामा को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि इस सत्र में वह  टी पी पी विधेयक लाने का प्रयास न करें।
हालांकि ओबामा के लिए तस्वीर धुंधली नजर आ रही है, परंतु उन्हें कमतर नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा है कि चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद वह कांग्रेस को टी पी पी के पक्ष में मतदान करने के लिए मनवा लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि बहुत से लोग सोचते थे कि वे सदन से फास्ट ट्रेक विधेयक पारित नहीं करवा पाएंगे, परंतु वे गलत साबित हुए। कांग्रेस को अपने पक्ष में लेने के लिए ओबामा को दक्षिण व वाम दोनों पक्षों को भरोसा में लेना पड़ेगा जो कि टी पी पी ए में कुछ विशिष्ट मुद्दों जैसे जैविक औषधियों पर एकाधिकार तथा आई एस डी एस (निवेशक-राष्ट्र विवाद निपटारा) को शामिल करवाना चाहते हैं। उन्हें संतुष्ट करने के लिए ओबामा को उन्हें भरोसा दिलवाना होगा जो वह चाहते हैं उसे किसी न किसी तरह से प्राप्त किया जा सकता है, भले ही वह टी पी पी ए का वैधानिक हिस्सा न भी हो। वह इसे द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से पाने का प्रयास करेंगे या इस बात पर जोर देंगे कि कुछ देश टी पी पी ए के प्रावधानों से इतर जाकर कर कुछ अतिरिक्त करें। वैसे भी टी पी पी ए के दायित्वों को पूरा कर पाने के लिए अमेरिका का प्रमाणन एक जरुरी शर्त है। कांग्रेस को खुश करने के लिए ओबामा टी पी पी ए की कुछ विशिष्ट धाराओं पर सैद्धान्तिक रूप से पुन: बातचीत भी कर सकते है। लेकिन अन्य टी पी पी देशों को यह विकल्प अस्वीकार्य हो सकता है।
इसी वर्ष जून में मलेशिया ने टी पी पी ए की किसी भी धारणा पर पुन: समझौते से इंकार कर दिया था। तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं उद्योग मंत्रालय की महासचिव डॉ. रेबेका फातिमा स्टामारिया का कहना है-  अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों ने भले ही इस तरह के संकेत दिए हों लेकिन टी पी पी ए पर पुन: वार्ता का प्रश्न ही नहीं उठता। सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली ह्सिन लूंग ने अपनी हालिया वाशिंगटन यात्रा के दौरान टी पी पी ए के किसी भी हिस्से पर पुनर्विचार की संभावना को सिरे से नकारते हुए कहा कि भले ही कुछ सांसद ऐसा चाहते हों यह संभव नहीं है। जनवरी में कनाडा के व्यापार मंत्री क्रिस्टिया फ्रीलेंड ने कहा था  टी पी पी पर पुर्नवार्ता संभव नहीं है। जापान ने भी पुर्नवार्ता की संभावना को नकार दिया है। 12 देशों ने इसी वर्ष फरवरी में समझौते पर हस्तक्षर कर दिए हैं और इसे लागू करने के लिए दो वर्षों का समय दिया है। सैद्धांतिक तौर पर देखें तो यदि इस वर्ष टी पी पी लागू नहीं हो पाता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति अगले वर्ष इसे संसद से पारित करवा सकते हैं। लेकिन ऐसा हो पाने की संभावना अत्यन्त क्षीण है। अतएव टी पी पी ए को इसी अलसाए सत्र में ही पारित करवाना होगा। अन्यथा यह हमेशा के लिए चर्चा से बाहर हो जाएगा। गौरतलब है कि नाटकीय ढंग से मुक्त व्यापार समझौतों के खिलाफ कम से कम उस अमेरिका में जनमत बना है। जिसने व्यापार मुक्त व्यापार समझौतों की शुरुआत की थी।        
(लेखक जेनेवा स्थित साउथ सेन्टर के कार्यकारी निदेशक हैं।) | http://www.deshbandhu.co.in/article/6188/10/330#.WC_dwvl97IW

फिर आंदोलन की राह पर असम | दिनकर कुमार

केंद्र सरकार ने हिंदू बांग्लादेशियों को भारत की नागरिकता देने का जो फैसला किया है, उसके विरोध में असम के छात्र और नागरिक संगठन सड़क पर उतर कर विरोध जता रहे हैं और इस फैसले को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। पिछले साल आठ सितंबर को मोदी सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत आने वाले हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों, जैनियों, पारसियों और बौद्धों को भारतीय नागरिकता देने का फैसला किया। इसके लिए पासपोर्ट अधिनियम-1920, विदेशी अधिनियम-1946 और विदेशी आर्डर-1948 को संशोधित करने की बात कही गई। इस अध्यादेश के जरिए बताया गया कि जो धार्मिक अल्पसंख्यक पासपोर्ट या अन्य यात्रा दस्तावेज के बगैर भारत आते हैं या जिनके पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज की मियाद खत्म हो चुकी है, उनको भारतीय नागरिक के रूप में स्वीकार किया जाएगा। यह अध्यादेश जहां संविधान के अनुच्छेद 14,15,19,21 और 29 का उल्लंघन बताया जा रहा है वहीं 1985 के असम समझौते का भी। इस अध्यादेश को चुनौती देते हुए असम सम्मिलित महा संघ, अखिल असम आहोम सभा, असम आंदोलनर शहीद निर्जाजित परियाल व असम के आठ गणमान्य व्यक्तियों ने उच्चतम न्यायालय में चार जनहित याचिकाएं दायर कीं। इस मामले को विचार करने के लिए संवैधानिक पीठ के पास भेजा गया।
असम समझौते में प्रावधान किया गया था कि 25 मार्च 1971 के बाद असम में आए किसी भी धर्म के विदेशी को रहने का अधिकार नहीं होगा। असम के जन संगठन इसी बात पर खफा हैं कि असम समझौते के प्रावधान से परिचित होने के बावजूद मोदी सरकार ने लोकसभा में नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 पेश कर दिया। इस विधेयक को कानून का दर्जा देकर मोदी सरकार बांग्लादेशी हिंदुओं को असम में बसाना चाहती है। असम के लोग आशंकित हैं कि ऐसा होने पर वे अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन कर जीने के लिए मजबूर हो जाएंगे। उनकी भाषा-संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। एक अनुमान के मुताबिक ऐसे हिंदू बांग्लादेशियों की तादाद बीस लाख है। वर्ष 1971 से पहले आकर असम में बसे बांग्लादेशी हिंदुओं की तादाद के साथ जब बीस लाख की तादाद और जुड़ जाएगी तो भाषाई तौर पर बांग्लाभाषी हिंदू असम में बहुसंख्यक बन जाएंगे।
असम के मूल को भय सता रहा है कि जिस तरह त्रिपुरा के मूल निवासी अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन कर जीने के लिए विवश हो गए, उसी तरह वे भी अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन सकते हैं। फिर असमिया भाषा का सरकारी भाषा होने और शिक्षा का माध्यम होने का दर्जा खत्म हो सकता है और राज्य की जनजातियों की भाषा-संस्कृति नष्ट हो सकती है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले राज्य के लोगों से वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आएगी तो असम समझौते की धारा 6 के तहत किए गए प्रावधान को लागू करेगी और असम के लोगों के संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी। असम के लोगों को लग रहा है कि सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी अब उनके साथ विश्वासघात करने पर उतारू हो गई है ।
असम के मूल निवासियों के हितों को नजरअंदाज करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नागरिकता कानून में संशोधन संबंधी अध्यादेश को कानूनी मान्यता दिलवाने के लिए विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया। जैसे ही यह विधेयक संसद में पारित हो जाएगा- पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले सभी गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी। भले ही इस कानून का कोई विपरीत प्रभाव देश के दूसरे राज्यों पर नहीं पड़ेगा, लेकिन इस कानून की वजह से असम की जनसंख्या का ताना-बाना बिखर कर रह जाएगा। अब तक असम की भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली राज्य सरकार ने इस विधेयक का विरोध करने की जगह समर्थन करने का ही संकेत दिया है। इस तरह राज्य की सरकार पर अपने ही लोगों की आशाओं -आकांक्षाओं के खिलाफ रुख अपनाने का आरोप लग रहा है।
संसद में कुछ विपक्षी सांसदों ने जब इस विधेयक का कड़ा विरोध किया तो सरकार ने इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास विचार करने के लिए भेज दिया। इस समिति के अध्यक्ष डॉ सत्यपाल सिंह हैं। समिति में बीस सांसद लोकसभा के और दस सांसद राज्यसभा के हैं। समिति में असम के भाजपा के दो और कांग्रेस के एक सांसद को जगह दी गई है। असम के दोनों भाजपा सांसदों ने विधेयक का समर्थन किया है, जबकि राज्य से कांग्रस के अकेले सांसद ने कहा है कि संयुक्त संसदीय समिति को असम में अलग से एक बैठक आयोजित कर विभिन्न जन संगठनों, राजनीतिक दलों,बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और गण्यमान्य व्यक्तियों की राय लेनी चाहिए, जो लगातार इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं।
असम के लोगों का तर्क है कि पहले से ही राज्य में सत्तर लाख बांग्लादेशी बसे हुए हैं और नए सिरे से असम बांग्लादेशियों का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है। उनका कहना है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिंदू बांग्लादेशियों से इतना ही ज्यादा लगाव है तो उनको अपने गृहराज्य गुजरात में बसाने की व्यवस्था करें। असम पर नाहक यह बोझ क्यों डालना चाहते हैं!मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि इस विधेयक को पारित करवाने में मोदी सरकार को कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। इसे पारित करने का अर्थ असम समझौते का उल्लंघन करना होगा। इसके अलावा उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों की मूल भावना का भी उल्लंघन होगा। बीते तीन अक्तूबर को संयुक्त संसदीय समिति की बैठक हुई, जिसमें दो संवैधानिक मामलों के जानकारों- टी के विश्वनाथन और सुभाष कश्यप- की राय ली गई। जानकारों ने समिति के सामने तीन बिंदु रखे। एक, इससे असम समझौते का उल्लंघन होगा। दो, विधेयक को ढीले-ढाले अंदाज में तैयार किया गया है और अगर यह पारित होता है तो इसे असम समझौते में संशोधन समझा जाएगा। तीन, अगर यह विधेयक पारित होता है तो इससे उच्चतम न्यायालय के विभिन्न फैसलों का उल्लंघन होगा, जिनमें कहा जा चुका है कि संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 25 के अनुसार धर्म के आधार पर किसी व्यक्ति को नागरिकता नहीं दी जा सकती। इस तरह विधेयक को अगर पारित किया गया तो यह चुनौती दिए जाने पर न्यायिक समीक्षा में नहीं टिक पाएगा और हो सकता है उच्चतम न्यायालय इसे निरस्त कर दे।
बीते तेरह अक्तूबर को संयुक्त संसदीय समिति की तीसरे स्तर की सुनवाई दिल्ली में हुई। इसमें देश के सत्ताईस संगठनों को अपना पक्ष रखने के लिए आमंत्रित किया गया। इनमें असम से भी पांच संगठनों को बुलाया गया, जो मूल असमिया लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन नहीं हैं, बल्कि हिंदू बांग्लादेशियों के प्रतिनिधि संगठन हैं। स्वाभाविक रूप से इन संगठनों ने हिंदू बांग्लादेशियों को भारत की नागरिकता देने का ही समर्थन किया। माना जा रहा है कि अखिल असम छात्र संघ, कृषक मुक्ति संग्राम समिति, असम जातीयतावादी युवक छात्र परिषद आदि संगठनों को सुनवाई में न बुला कर समिति ने महज खानापूर्ति करने की कोशिश की है और असम के मूल निवासियों की शिकायत को समझने में तनिक रुचि नहीं ली है। संसद का शीतकालीन सत्र कब शुरू होगा इसकी घोषणा हो चुकी है। शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट पेश करेगी और उसी सत्र में सरकार इस विधेयक को पारित कराने की कोशिश करेगी।
असम के जन संगठनों का आरोप है कि बीस लाख हिंदू बांग्लादेशियों को असम में बसा कर भारतीय जनता पार्टी अपना वोट बैंक और पुख्ता करना चाहती है। विडंबना यह है कि यह उस पार्टी का रुख है जो हमेशा वोट बैंक की राजनीति को कोसती आई है और इसका दोष दूसरे राजनीतिक दलों पर मढ़ती रही है। भारतीय जनता पार्टी इन बांग्लादेशियों को बराक घाटी और निचले असम के कुछ खास विधानसभा क्षेत्रों में बसाने की योजना बना चुकी है। भाजपा को उम्मीद है कि भारत की नागरिकता मिल जाने पर हिंदू बांग्लादेशी उसका अहसान मानेंगे और चुनाव में उसे ही वोट देंगे। असम की बराक घाटी और धुबुरी जिले में हिंदू बांग्लादेशियों की तादाद सबसे ज्यादा है। भाजपा उनको अलग-अलग जिलों में बसाने की तैयारी कर चुकी है। ऐसा करते हुए इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा जाएगा कि प्रत्येक जिले में मतदाता के रूप में हिंदू बांग्लादेशी किस तरह निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
बराक घाटी के तीन जिले कछार, हैलाकांदी और करीमगंज के पंद्रह विधानसभा क्षेत्रों में से बारह विधानसभा क्षेत्रों में हिंदू बंगाली बहुसंख्यक हैं। फिर, ऐसे कई विधानसभा क्षेत्र हैं जहां पहले से ही हिंदू बंगाली मौजूद हैं। अगर उन क्षेत्रों में नए सिरे से हिंदू बांग्लादेशियों को बसा दिया जाएगा तो वे चुनाव में आसानी से निर्णायक भूमिका निभा पाएंगे। असम के जन संगठनों का आरोप है कि अब तक मुसलिम बांग्लादेशियों का इस्तेमाल कांग्रेस वोट बैंक के तौर पर करती रही थी; अब सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस का अनुसरण करते हुए हिंदू बांग्लादेशियों का इस्तेमाल वोट बैंक के तौर पर करना चाहती है। स्वाभाविक रूप से आम लोगों में इस बात को लेकर आक्रोश बढ़ता जा रहा है और इसका इजहार भी हो रहा है।

क्या हो पुलिस सुधार की दिशा | विकास नारायण राय

दिल्ली हाइकोर्ट ने केंद्र सरकार को दिल्लीवासियों की सुरक्षा को लेकर चेताया है। दिल्ली पुलिस के लिए गृह मंत्रालय की स्वीकृति के बावजूद चौदह हजार अतिरिक्त भर्तियां नहीं हो सकीं और चार सौ पचास करोड़ रुपए के सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए धनराशि मुहैया नहीं कराई गई। हाइकोर्ट के सामने लंबित दिल्ली पुलिस, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के शपथपत्रों के आलोक में पुलिस की क्षमता-वृद्धि और आधुनिकीकरण की इन जरूरतों का देर-सबेर पूरा किया जाना अनुमानित होगा ही। इस बीच महाराष्ट्र एटीएस के सामुदायिक रुझान का एक बिरला उदाहरण भी सामने आया- उन्होंने आइएस के प्रचार के प्रभाव में सीरिया जाने पर उतारू कई नौजवानों की काउंसलिंग कर उनकी घर वापसी कराई है। इसके बरक्स आतंकी मामलों में मुसलिम युवकों के झूठे चालान और असीमानंद की जमानत में मिलीभगत जैसे आरोप भी जांच एजेंसियों पर लगते रहे हैं, जिनका लाभ युवकों को बरगलाने वाले उठाते हैं। पुलिसिया कायदे जहां छोटे-मोटे अपराधी को शातिर बना देने की कुव्वत रखते हैं, व्यवस्था की अंधी चपेट की मार में आने वालों को असामाजिक रास्तों पर जाने का उकसावा तक सिद्ध होते रहे हैं। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित का आत्महत्या-प्रकरण छात्रों के दो संगठनों में तनाव से उपजा। इसकी जड़ में इनमें से एक संगठन (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) की दिल्ली विश्वविद्यालय में वह ताकत है जिसके चलते वहां ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ नामक सांप्रदायिकता-विरोधी फिल्म का प्रदर्शन नहीं हो सका था। एक लोकतांत्रिक डीएनए वाली पुलिस ने संविधान-प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस सरासर अपमान को शिद्दत से लिया होता, न कि इस पर लीपापोती हुई होती। तब शायद हैदराबाद परिसर के उबलने की नौबत भी न आती। भारतीय लोकतंत्र में पुलिस की इस परिचालन-विसंगति को कैसे समझें, जो किताबों में लिखे कानून को गली-कूचों में ठोस न्याय की शक्ल नहीं लेने दे रही? एफआइआइटी और यूजीसी परिसरों में लाठीचार्ज का तांडव करने वाली एजेंसी मालदा में मूकदर्शक बनी रह जाती है! पेशेवर-अकादमिक तबकों से निकले विरोधी स्वरों पर दमन की गर्मी, जबकि घोर असामाजिक तत्त्वों की सांप्रदायिक आड़ में बलवे और आगजनी की खुली नुमाइश पर भी ठंड! गोया कि राजधानी के थानों से लेकर सुदूर माओवादी मैदान तक एक जैसे समीकरण का बोलबाला है- भारत का संविधान लोकतांत्रिक है; उसे देशवासियों के दैनिक जीवन में लागू करने वाले न्याय-व्यवस्था के उपकरण नहीं! दरअसल, पुलिस के सामाजिक उत्पाद, ‘कानून का शासन’ की आधारभूत लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर ही करते आए हैं। पुलिस को प्राय: अपराध-अपराधी, यातायात, बंदोबस्त या सुरक्षा और आतंक जैसे संदर्भों में देखने के आदी समाज में उसकी क्षमता को आंकड़ों में देखने-परखने का चलन है- उसके पेशेवर प्रतिफलों का सामाजिक उत्पाद के रूप में आकलन नहीं होता। इस घातक चूक से जुड़ा परिणाम है पुलिस की क्षमता-वृद्धि और आधुनिकीकरण की दौड़ में उसके लोकतंत्रीकरण के महत्त्वपूर्ण आयामों का पीछे छूट जाना। न तो पुलिसकर्मी, न पुलिस की पद्धतियां और न ही पुलिस के काम के सामाजिक उत्पाद- लोकतंत्र के मान्य पैमाने इनमें से किसी की भी अनिवार्य कसौटी नहीं बनाए जाते! पुलिस की आए दिन की कार्यप्रणाली में अवैधानिक विरोधाभास वैसे ही नहीं समाए हुए हैं- उसकी लोक-छवि का मानो एक लगभग अपरिवर्तनीय-सा (अ)समाजशास्त्र बन गया है- एफआइआइटी और यूजीसी जैसी सक्रियता मालदा की निष्क्रियता की भरपाई कर देती है! हरियाणा के राम रहीम एक धार्मिक दर्जा देकर उनके अनुयायियों की ‘धार्मिक’ भावनाओं को ठेस पहुंचाने के अपराध में टीवी कॉमेडियन कीकू शारदा को एक नहीं दो-दो बार आनन-फानन में गिरफ्तार कर लिया जाता है! जबकि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में आत्महत्या करने पर विवश किए गए शोध छात्र को आतंकी और देशद्रोही बताने वाले केंद्रीय मंत्री और तदनुसार उसे छात्रावास से निष्कासित करने वाले कुलपति के विरुद्ध मुकदमा भी देशव्यापी आक्रोश के बाद ही दर्ज हो सका। इस मामले में किसी की गिरफ्तारी या सजा की तो दूर-दूर तक कोई बात ही नहीं- ऊपर से दिल्ली में पुलिस ने विरोध जताते छात्रों पर कड़कती ठंड में पानी की बौछार की और डंडे फटकारे। जाहिर है, ‘कानून का शासन’, पुलिस के सामाजिक उत्पाद के दायरे में एक तकनीकी अवधारणा भर रहा है, न कि लोकतांत्रिक शर्त। क्या हम सड़क पर खाकी वर्दी और सुरक्षात्मक कवच में लाठी भांजती पुलिस पर लदे हुए कानून के गुरुतर भार को समझते हैं? कमांडर ने किसी एक अचानक क्षण में नागरिकों के समूह पर लाठीचार्ज का फैसला लिया- तो यह उनके लिए लाठी कौशल का ही नहीं, लोकतंत्र की समझ का भी संवेदी इम्तहान बन जाना चाहिए। इसकी पालना में जब सिपाही लाठी चलाता है तो ज्यादातर उसके पास उत्तेजित अवस्था में संतुलित व्यवहार के लिए बमुश्किल चंद सेकेंड ही होते हैं। लाठी किस पर पड़नी है, कहां पड़नी है- पैर पर, हाथ पर, पीठ पर या कभी जब जान पर ही बन आए तो आत्मरक्षा में सिर पर? बड़े से बड़े मानवतावादी के लिए भी यह लोकतांत्रिक अनुकूलन की गहनतम परीक्षा का क्षण होगा। पर पुलिसकर्मी के लिए यह अपरिचित संवेदनाओं का क्षेत्र सिद्ध होता है क्योंकि उसका सारा अभ्यास लाठी भांजने के तकनीकी कौशल पर केंद्रित रहा है। यही नहीं, इन पुलिसकर्मियों में से अधिकतर या शायद सभी पूर्व ड्यूटी की थकान उतरे बगैर, और बिना वस्तुस्थिति की समुचित जानकारी के, मौके पर भेजे गए होते हैं, क्योंकि अकस्मात आई घड़ी में न इतनी बेशी नफरी ही उपलब्ध होती है और न उतना समय किसी के पास होता है, और जहां समय और नफरी दोनों हों भी, वहां भी पुलिस की कार्यपद्धति में सामयिक अनुकूलन का असर ही हावी मिलेगा, न कि संवैधानिक अनुकूलन का। दरअसल, पुलिस के प्रशिक्षण, संगठन और कार्य-संस्कृति में बस कौशलतंत्र की दक्षता रची-बसी होती है, जबकि लोकतंत्र का समीकरण सिरे से नदारद मिलेगा। पुलिसकर्मी को एक लोकाचारी कानूनदां के रूप में नहीं, अधिकारी व्यवस्था के उत्तरदायी एजेंट के रूप में देखा जाता है! उदाहरण के लिए, एफआइआइटी (पुणे) और यूजीसी (दिल्ली) पर धरना दे रहे छात्रों पर काबू पाने के लिए हुए पुलिस के लाठीचार्ज पर लौटें। दोनों ही जगहों पर केंद्र सरकार के निर्णयों के प्रति छात्रों के दीर्घकालिक विरोध के स्वर लोकतांत्रिक रहे हैं। एफआइआइटी में एक स्वर से छात्र एक ‘अपात्र’ को संस्था का अध्यक्ष नियुक्त किए जाने पर आंदोलनरत हुए, जबकि यूजीसी के विरुद्ध देश भर से शोधरत छात्र इसलिए लामबंद हुए क्योंकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आदेश ने उन्हें अरसे से चले आ रहे वजीफों से वंचित कर दिया था। दोनों दृष्टांतों में पुलिस की लाठी कारगर भूमिका में रही, जबकि लोकतांत्रिक रणनीति नदारद मिली। लाठीचार्ज के इन प्रदर्शनों से ठीक उलट मामला है मालदा का, जहां अराजक तत्त्वों से भरी विशाल सांप्रदायिक भीड़ को घंटों बेखौफ हिंसक उपद्रव करने दिया गया, यहां तक कि इस दौरान पुलिस थाना तक उनका निशाना बना। उन्हें काबू करने में पुलिस निष्क्रिय बनी रही। उसके सैन्यीकरण और आधुनिकीकरण का इस्तेमाल नहीं हुआ। दरअसल, ऐसी स्थितियां भी पुलिस की पेशेवर प्रणाली में लोकतांत्रिक तत्परता के अभाव का ही नतीजा हैं। शासनतंत्र की नीतिगत बेरुखी के चलते मालदा प्रकरण का विश्लेषण भी राजनीतिक दोषारोपण के दायरे में रहा और इसमें निहित सामाजिक संदेश की अनदेखी हुई। एक रोडरोलर को स्कूटर की तरह नहीं चलाया जा सकता। भारत के संविधान का गठन बेशक लोकतंत्र के पक्ष में रोडरोलर सरीखा हो, पर उसे व्यावहारिक जीवन में खींचने वाले कानूनी इंजनों और पुलिसिया पहियों में स्कूटर का दम-खम भी नहीं। यह पेशेवर कौशल का ही नहीं, लोकतांत्रिक क्षमता का प्रश्न भी है। न्याय-व्यवस्था के कौशल-संपन्न उपकरणों में लोकतांत्रिक क्षमता भरने का! ऐसी क्षमता के अभाव में इन उपकरणों के हश्र की एक झलक अमेरिकी समाज के विकसित प्रयोगों में देखी जा सकती है जहां पुलिस की नागरिकों पर होने वाली हिंसा में वृद्धि एक अनवरत राष्ट्रीय बहस का रूप ले चुकी है। यह माना जा रहा है कि पुलिस को नई तरह से प्रशिक्षित किए जाने की जरूरत है। अलाबामा में फरवरी 2015 में अट्ठावन वर्षीय निहत्थे भारतीय नागरिक सुरेश भाई पटेल का मामला अमेरिका और भारत दोनों देशों में चर्चित रहा था। उनको अपने बेटे के अपार्टमेंट के पास टहलते हुए अमेरिकी पुलिसकर्मी पार्कर ने जमीन पर गिरा कर बेबस कर दिया, जिससे वे आंशिक रूप से लकवे का शिकार हो गए। अंग्रेजी न समझने वाले पटेल पर किसी अपराध का शक नहीं था और पुलिसकर्मी को बस इतना लगना काफी था कि वे उसके आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। अब अदालत ने भी पार्कर के कृत्य को अपराध न मानते हुए उसे बरी कर दिया है। कई पुलिसकर्मियों ने इस मुकदमे में गवाही दी कि इस तरह पटेल को जमीन पर गिराना राज्य की नीति के अंतर्गत पुलिसकर्मी के प्रशिक्षण के अनुरूप था। पुलिस के आदेशों की अवमानना में हिंसा के मामलों में जो कानूनी स्थिति अमेरिका में है,कमोबेश वही भारत में भी। इन कृत्यों को जान-बूझ कर किया गया अपराध सिद्ध करना लगभग असंभव हो जाता है, चाहे पीड़ित कितना भी शांतिपूर्ण या बेदाग क्यों न हो। लेकिन इससे समाज में अपनी ही पुलिस और न्याय-व्यवस्था के प्रति अविश्वास और आक्रोश पैदा होता है। इसी तरह दंगे-फसाद में पुलिस की निष्क्रियता समाज में असुरक्षा और खौफ की आवृत्ति का निमंत्रण जैसा है। न्याय के नजरिए से दोनों तरह का सामाजिक उत्पाद पूर्णतया अमान्य होना चाहिए। इसके लिए पुलिस-प्रशिक्षण और व्यवहार में हिंसा के अनिवार्य इस्तेमाल को संविधान की अवमानना से नत्थी करने की जरूरत है। - See more at: http://www.jansatta.com/politics/way-of-police-reforms-delhi-high-court-centre-govt/64117/#sthash.eBIOI2sG.dpuf

Friday, November 18, 2016

पुलिस की जवाबदेही | विकास नारायण राय

अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में प्रेसिडेंशिअल बहस के तीनों दौर में हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रम्प ने पुलिस की सामाजिक जवाबदेही और सुप्रीम कोर्ट के जजों की सामाजिक प्रतिबद्धता पर टिप्पणी की। भारत के चुनावों में कुछ हद तक कानून-व्यवस्था को लेकर तो मुद््दा बनता है, पर कानून लागू करने के प्रति जिम्मेदार कर्मियों के सामाजिक और संवैधानिक सरोकार का मुद््दा कभी नहीं रहता। अमेरिकी समाज में वहां की पुलिस पर नस्ली भेदभाव के आरोप लगातार चर्चा में रहे हैं। जहां गोरी श्रेष्ठता के पक्षधर अमेरिकियों के चहेते ट्रम्प ने इन्हें सिरे से नकार दिया, वहीं हिलेरी ने माना कि अमेरिकी समाज में व्याप्त नस्ली पूर्वग्रह पुलिस वालों के व्यवहार में भी प्रतिबिंबित होता है और इसे समुचित प्रशिक्षण से दूर किया जाना चाहिए। भारतीय पुलिस पर भी जब-तब जातीय, सांप्रदायिक और वर्गीय पूर्वग्रहों के आरोप न सिर्फ लगते रहे हैं बल्कि अनेक जांच व शोध-रिपोर्टों में ये आरोप सही भी पाए गए हैं। कम बदनाम नहीं रही है, पुलिस की अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर विरोधियों को प्रताड़ित करने और अपराध को प्रश्रय देने की छवि। राजनीतिक आकाओं के दिमाग में पुलिस की जवाबदेही की कमोबेश ऐसी ही तस्वीर मिलेगी। पुलिस ने भी इस स्थिति से संतुलन बिठा लिया है।
देश में चल रही समान नागरिक संहिता की तीखी बहस में कम लोगों के ध्यान में होगा कि एक सौ अस्सी वर्ष पूर्व मैकाले कमेटी ने 14 अक्टूबर 1837 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड आॅकलैंड के सामने भारतीय दंड संहिता का छपा मसविदा पेश किया था, जिससे भारत में कॉमन क्रिमिनल कोड लागू करने का आधार तैयार हुआ। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन आने तक आपराधिक कानून भी धार्मिक कानूनों की प्रतिच्छाया ही होते थे। कंपनी ने अपने अधिकार क्षेत्र, बंगाल, बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी के लिए क्रमश: अलग-अलग रेगुलेशन जारी किए थे, पर तो भी बॉम्बे प्रेसीडेंसी के लिखित कोड को छोड़ कर शेष स्थानों पर व्यवहार में इनका चलन पहले से चल रहे मुसलिम कानूनों से ही नत्थी रहा। अंग्रेजों को अंतत: भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम- कॉमन क्रिमिनल कोड के तीन स्तंभ, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के तुरंत बाद के तीन-चार वर्षों में लागू करने पड़े। कॉमन क्रिमिनल कोड, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की एकीकृत प्रशासनिक मशीनरी के सफलतम औजारों में एक सिद्ध हुआ।
मैकाले ने दंड संहिता का मसविदा प्रस्तुत करते समय आमुख रिपोर्ट में दो महत्त्वपूर्ण चेतावनियां दी थीं। एक- जब तक व्यक्ति के अधिकार और सरकारी-कर्मी की शक्तियां अनिश्चित बनी रहेंगी, यह हमेशा तय नहीं हो पाएगा कि उन अधिकारों का हनन हुआ है या उन शक्तियों का दुरुपयोग। दो- विधायिका को कानून ऐसे बनाने चाहिए जो सटीक हों और आमजन के लिए ग्राह्य हों, यानी लिखित कानून से वही ध्वनित हो जो कानून बनाने वालों की मंशा है और जिन पर यह आयद होना है वे इसे आसानी से समझ सकें। मैकाले का तर्क था कि सटीक न होने से कानून बनाने का काम अदालतें हथिया लेती हैं और आसान न होने से लोगों की मुश्किलें बढ़ती हैं।  हालांकि मैकाले का प्रस्तावित ड्राफ्ट भी इन मानदंडों पर खरा नहीं उतर सकता था- उसे तो औपनिवेशिक प्रशासन की आवश्यकताओं पर खरा उतरना था। लेकिन आज तक भी स्थिति वही क्यों बनी हुई है? मोदी सरकार ने अनावश्यक कानूनों को खारिज करने और विशेषकर टैक्स कानूनों के सरलीकरण को मुद््दा जरूर बनाया है, (हालांकि इस दिशा में भी रफ्तार बेहद सुस्त है) जबकि आपराधिक कानूनों के इस्तेमाल में पुलिस और अदालती मनमानी से आम जनता का रोजाना वास्ता पड़ता है। लिहाजा, आपराधिक न्याय के क्षेत्र में भी ऐसी पहल की तुरंत आवश्यकता है।
अंग्रेजों के जमाने से ही कानून और न्याय के बीच की खाई व्यापक रही है। आम आदमी के लिए कानून वह नहीं होता जो किताबों में लिखा है या अदालती निर्णयों में बंद है। उनके लिए कानून वह है जो सड़कों पर और थानों में पुलिस द्वारा लागू किया जाता है। दुर्भाग्य से आज भी पुलिस की कार्यप्रणाली कानूनी मानदंडों और नागरिकों के प्रति उदासीन रह कर चलाई जा रही है। पुलिस की ट्रेनिंग आज भी उसे अंगरेजी शासन की तर्ज पर रेजिमेंटेशन के लिए तैयार करती है और पेशेवर जीवन उसे सत्ता-केंद्रों का पिछलग्गू बनने के लिए उकसाता है। लिहाजा, स्वतंत्र भारत में भी एक पुलिसकर्मी सामान्यत: संविधान और लोकतंत्र के प्रति सचेत न बन कर, सत्ता-अनुकूल आंकड़ों और शक्ति-केंद्रों के अनुकूल अनुशासन के प्रति उत्तरदायी होकर रह जाता है।
कानून को ‘सटीक’ बनाने में निहित है कि कानूनी प्रावधानों का कानून के घोषित लक्ष्य से मिलाप हो। यदि ऐसा होता तो दहेज, घरेलू हिंसा, भ्रूण हत्या जैसे कानूनों की व्यापक असफलता या राजद्रोह और धार्मिक वैमनस्य के कानूनों का मनमाना दुरुपयोग देखने को न मिलता। पोक्सो एक्ट (यानी प्रिवेंशन आॅफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ओफेंसेस एक्ट) में प्रिवेंशन यानी रोकथाम का एक भी प्रावधान नहीं है। यह कानून हरकत में ही तब आता है जब अपराध घट जाए, तो रोकथाम का उद््देश्य कैसे पूरा करेगा? आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा जैसे जीवन-मरण के मसलों पर भी हमारा तंत्र एक सर्व-स्वीकृत कोड नहीं बना सका है। मैकाले ने एक आदर्श यह भी बघारा था कि जब तक कानूनी प्रक्रियाएं अबूझ और भटकाव वाली रहेंगी, कोई दंड संहिता स्पष्ट और सुनिश्चित हो ही नहीं सकती। यह मानदंड आज भी उसी तरह प्रश्नचिह्न बना हुआ है जैसे अंगरेजी राज में था। इसीलिए सामान्य मारपीट के मुकदमे कत्ल में तथा पीछा करने (स्टाकिंग) के मामले एसिड हमले में परिवर्तित हो जाते हैं और कानून-पुलिस-अदालत सब देखते रह जाते हैं।
दरअसल, लंबे समय से यह स्वीकार करने वालों की कमी नहीं कि पुलिस की जवाबदेही को राजनीतिक आकाओं, उच्च अधिकारियों और अदालतों के दायरे में सीमित करने से पुलिस सुधार नहीं लाया जा सकता। मीडिया और मानवाधिकार संगठनों के इस सुधार चक्र का हिस्सा बनने से भी नहीं। नागरिक और संविधान की उपेक्षा के वातावरण में सत्ताधारियों द्वारा अपनी राजनीति चमकाने में पुलिस का दुरुपयोग कोई छिपी बात नहीं रह गई है। दिल्ली पुलिस द्वारा ‘आप’ के चौदह विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए हैं और सभी मामलों में उनकी गिरफ्तारियां भी की गई हैं। इनमें से नौ में अदालतों ने दिल्ली पुलिस की मनमानी कार्रवाई पर विपरीत टिप्पणियां की हैं।
रेशनलिस्ट संपादकदिलीप मंडल के विरुद्ध लखनऊ में और हरियाणा के एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय के अध्यापकों के विरुद्ध रेवाड़ी में हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं भड़काने के मुकदमे हाल में दर्ज हुए हैं, जिनका कोई सिर-पैर नहीं बनता। दोनों मामलों में कोई आम धार्मिक हिंदू शिकायतकर्ता के रूप में सामने नहीं आया, मुकदमा दर्ज करने का दबाव एक संगठित समूह ने बनाया। जेएनयू ‘देशद्रोह’ प्रकरण में दिल्ली पुलिस ने कश्मीरी अलगाववादियों के पक्ष में नारे लगाने के आरोप में नामजद छात्रों को बिना जांच पूरी हुए गिरफ्तार करने में पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन टेप को छेड़छाड़ कर प्रसारित करने और आम भावनाएं भड़काने वाले मीडियाकर्मियों को छुआ तक नहीं। अनुभव कहता है कि शासक कोई हो, इस तरह के मामले चलते ही रहते हैं। पुलिस की दैनिक कार्यशैली में यह व्यापक राजनीति-जनित दुरुपयोग इस कदर रच-बस गया है मानो वही पुलिस का मुख्य तौर-तरीका हो।
पुलिस का अपनी जवाबदेही को लेकर रवैया एक रूटीन उदाहरण से समझा जा सकता है। हाल में राजधानी से लगे फरीदाबाद के मुजेसर में एक फैक्ट्री के गेट से निकलते ट्रक ने सड़क किनारे के ढाबे में बैठे लोगों को टक्कर मार दी, जिससे दो लोगों की मौत हो गई। सामान्यत: ऐसे मामले में पुलिस को तय करना होता है कि यह घटना विशुद्ध दुर्घटना थी, या इसके पीछे ट्रक ड्राइवर की घोर लापरवाही थी। ड्राइवर के शराब के नशे में होने या बहुत तेज गाड़ी चलाने की दशा में मामला सदोष मानव वध का भी हो सकता था। लेकिन पुलिस द्वारा मामला अंतत: दर्ज किया गया साजिशन हत्या का, जिसमें ट्रक ड्राइवर के साथ हत्या की साजिश में फैक्ट्री मालिक को भी शामिल दिखाया गया।
‘साजिश’ और ‘हत्या’ पुलिस की छानबीन से निकले हुए तथ्य नहीं थे। हुआ यह कि मौतों से क्रोधित लोगों ने सड़क रोक दी और विपक्षी राजनीतिक दलों ने बहती गंगा में हाथ धोने के अंदाज में शोर मचाया। इससे पुलिस को उनके मुताबिक मामला बनाना ही श्रेयस्कर नजर आया। ट्रक ड्राइवर किसी को क्या दे सकता था, पर फैक्ट्री मालिक को शामिल करने में सभी को फायदा लगा होगा! पुलिस थानों में आए दिन ऐसे मुकदमे दर्ज होते हैं जिनका कानूनी सिर-पैर समझ से परे है। ऐसी गिरफ्तारियां होती हैं जो सरासर गैर-कानूनी हैं।
पुलिस सुधार पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आए दस वर्ष हो चुके हैं। कई राज्यों ने इसके अनुपालन में नए पुलिस अधिनियम भी बना लिए हैं। इसके बावजूद हम रोजाना पाते हैं कि कानून से बंधी पुलिस कितनी सहजता से एक गिरोह की तरह काम करने लगती है! उसकी ट्रेनिंग, अनुशासन और संवैधानिक शपथ उसका गलत बढ़ा हाथ पकड़ क्यों नहीं पाते? अनुसंधान, गिरफ्तारी, बल-प्रयोग और मानव अधिकार जैसे पक्षों पर सर्वोच्च न्यायालय के तमाम दिशा-निर्देश उसके मार्गदर्शक क्यों नहीं बन पाते हैं? सत्ताधारी कभी लोकतांत्रिक पुलिस की बात क्यों नहीं उठाते? अमेरिका की तरह पुलिसकर्मियों की संवैधानिक निर्मिति का मुद््दा हमारे चुनावों में कब उठेगा? सबसे बड़ी बात, जनता स्वयं कब आगे बढ़ कर लोकतांत्रिक पुलिस की मांग करेगी!
पुलिस की जवाबदेही

राजनीतिः नक्सल समस्या की जड़ें | संजीव पांडेय

एक बार फिर नक्सली हमले में पुलिस के कई जवान शहीद हो गए। औरंगाबाद-गया जिलों की सीमा पर सोनदाहा के जंगल में नक्सलियों ने आइइडी से विस्फोट कर दस जवानों की जान ले ली। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में चार नक्सली भी मारे गए। हालांकि सरकार ने दावा किया कि हर जगह मात खा रहे नक्सलियों ने बौखलाहट में यह हमला किया। लेकिन जानकार बता रहे हैं कि नक्सलियों के जाल में पुलिस फंस गई थी। पुलिस में आपसी सहयोग की कमी थी और इस कारण नुकसान ज्यादा हो गया। हमले के बाद राजनीति भी तेज हो गई और बिहार सरकार को निशाने पर लिया गया। हालांकि समस्या की जड़ क्या है, इस पर कोई बात करने को राजी नहीं है। सच्चाई तो यही है कि गांवों में जमींदारों और भूमिपतियों के खिलाफ शुरू किए गए नक्सल आंदोलन की दशा और दिशा दोनों बदल गई है और इसमें अहम भूमिका कॉरपोरेट और राजनीतिक दलों की है। क्योंकि कई साल पहले ही गांवों में जमींदारों ने या नक्सलियों के सामने घुटने टेक दिए या गांव छोड़ कर भाग गए।
खबर आई है कि आईईडी विस्फोट नक्सलियों के बाल दस्ते ने किया है। नक्सलियों द्वारा बाल दस्ता तैयार किए जाने की खबरें काफी पहले से आ रही थीं। नक्सलियों द्वारा बाल दस्ते के गठन के कई कारण हैं। पहले तो, छोटे बच्चों पर पुलिस अमूमन शक नहीं करती। वहीं इलाके में भारी गरीबी के कारण कई जगहों पर नक्सली बच्चों के माता-पिता को बरगलाने में कामयाब हो जाते हैं। यही नहीं, नक्सली जोर-जबरदस्ती कर हर परिवार से बच्चों को बाल दस्ते में शामिल करने की कोशिश करते हैं। उनकी इन जोर-जबर्दस्ती से परेशान हो बिहार-झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों के बहुत-से परिवार अपने बच्चों को छोटे शहरों में मजदूरी करने के लिए भेज चुके हैं। जीटी रोड पर बनारस के बाद ही बिहार और झारखंड तक बने लाइन होटलों में छोटे-छोटे बच्चे काम करते नजर आए। इनमें से ज्यादातर जीटी रोड के दोनों तरफ प्रभावित नक्सल इलाके के गांवों के बच्चे हैं जो नक्सलियों के डर से गांव छोड़ चुके हैं। इन बच्चों को मासिक मेहनताना महज पांच सौ से एक हजार रुपए मिलता है। यही नहीं, कई गरीब परिवार तो शहरों में अपने बच्चों को इस शर्त पर किसी परिवार के पास छोड़ने को राजी हैं कि दो वक्त का खाना भर दे दें। क्योंकि उन्हें अपने बच्चे की जान की फिक्र लगी है।
इसमें कोई शक नहीं कि नक्सली इस समय कैडर की कमी से जूझ रहे हैं। इसके कई कारण हैं। लेकिन यह भी सच्चाई है कि नक्सल प्रभावित इलाके में लोगों का शोषण आज भी जारी है। इस शोषण के लिए तमाम लोग जिम्मेवार हैं। इसी मजबूरी का फायदा उठा नक्सली बाल दस्ते तैयार कर रहे हैं। उनके भय से युवा अपना इलाका छोड़ महानगर की तरफ भाग रहे हैं। क्योंकि स्थानीय स्तर पर इन्हें रोजगार नहीं है। युवाओं को बड़े शहरों में आकर मजदूरी करना मजबूरी है। लेकिन बाल दस्ते के साथ-साथ नक्सलियों के महिला दस्ते ने भी नक्सल प्रभावित इलाके में एक नई समस्या पैदा की है। नक्सलियों के डर से बड़े पैमाने पर गांव-देहात के लोग अपने घरों की महिलाओं को शहरों की तरफ भेजने लगे हैं।
इसमें सबसे ज्यादा चांदी मानव तस्करों की हुई है जो बड़े महानगरों में आदिवासी और अन्य महिलाओं को बेचने तक का काम करते हैं। क्योंकि नक्सली गांवों में जाकर लोगों को महिलाओं को भी नक्सलियों के गुरिल्ला दस्ते में भेजने का दबाव बनाते है। मजबूरी में मां-बाप अपनी बेटी को शहर की तरफ भेजना ही सुरक्षित समझते हैं। झारखंड के कई गांवों में महिलाओं के साथ इस तरह की घटना की बातें सामने आई हैं।
नक्सल आंदोलन ठहराव के दौर में है। लेकिन इसे खत्म करने के लिए सरकारों को काफी काम करना होगा। ठहराव के दौर में कैडर की कमी से जूझ रहे नक्सली कोई बड़ी वारदात करने की फिराक में रहते हैं ताकि सरकार और लोगों पर उनका खौफ बना रहा। औरंगाबाद की घटना इसी का नतीजा है। पिछले कुछ सालों में बिहार और झारखंड में सीपीआइ (माओवादी) के कई प्रमुख लोग पकड़े गए। इसमें से कुछ तो औरंगाबाद जिला जेल में ही बंद हैं। वैसे में बिहार और झारखंड में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए नक्सली वारदात करने की योजना बनाते रहते हैं। लेकिन दूसरी ओर, सरकार और पुलिस बल में भी आपसी तालमेल की कमी है। औरंगाबाद में दस जवानों की शहादत से पता चला कि पुलिस में भी आपसी तालमेल का अभाव है।
औरंगाबाद पुलिस गया और औरंगाबाद जिलों की सीमा पर कार्रवाई के लिए पहुंच गई, लेकिन गया पुलिस से उसके तालमेल का अभाव था। गया पुलिस को सूचना तब मिली जब विस्फोट हो गया और कई जवान मारे गए। दरअसल, पुलिस अधिकारियों के बीच वाहवाही लेने की होड़ के अक्सर शिकार जवान होते है। बताया जाता है कि जिस नक्सल कमांडर संदीप की खोज में औरंगाबाद पुलिस सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के साथ कार्रवाई के लिए सोनदाहा जंगल में पहुंची उसे संदीप ने खुद अपने जाल में फंसाया था। नक्सलियों ने ही औरंगाबाद पुलिस को सूचना दी कि संदीप फिलहाल इसी इलाके में है। नक्सलियों को पता था कि पुलिस कार्रवाई के लिए आएगी इसलिए पूरे इलाके में विस्फोटक बिछा दिए थे।
दरअसल, सरकारी तंत्र और पुलिस बलों में नक्सलियों की घुसपैठ एक बड़ी समस्या है। छत्तीसगढ़ में कुछ साल पहले नक्सली हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के सत्तर से ज्यादा जवान मारे गए थे। गृह मंत्रालय ने इस घटना की जांच की थी। जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच में पता चला कि नक्सलियों को जंगल में घूम रहे सीआरपीएफ के जवानों की एक-एक गतिविधि की खबर थी। क्योंकि नक्सलियों के पास सीआरपीएफ से गायब किए गए वायरलेस सेट मौजूद थे। एक गांव में जब सीआरपीएफ के जवान खाना खाने के लिए रुके तो नक्सलियों ने उनके खाने में बेहोशी की दवा मिलवा दी। खाने के बाद सीआरपीएफ के जवानों की नींद आ गई और नक्सलियों ने हमला कर दिया। हमले में सीआरपीएफ का सिर्फ एक जवान बच सका था।
नक्सली आंदोलन एक नए मोड़ पर है। नक्सल प्रभावित राज्यों में पुलिस कार्रवाई तेज हुई और इससे नक्सलियों को काफी नुकसान पहुंचा है। नक्सली कमांडरों के आर्थिक हित कई जगहों पर सरकारी योजनाओं से जुड़ चुके हैं। वे विकास परियोजनाओं पर लेवी भी लगाते हैं और विकास परियोजनाएं हासिल करने वाली कंपनियों में अप्रत्यक्ष रूप से अपना निवेश भी करते हैं। उधर सरकार इन सारी चीजों की जानकारी के बाद भी चुप बैठी रहती है। विचित्र है कि राज्य सरकारें नक्सल प्रभावित इलाकों में आम लोगों की समस्याएं दूर करने के लिए संजीदा नहीं दिखतीं। लोगों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया नहीं करवाई गई हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और पीने कापानी तक लोगों को उपलब्ध नहीं है। बिहार-झारखंड के कई जिलों में पीने के पानी की भारी समस्या है। यही नहीं, इन इलाकों में पीने के पानी में आर्सेनिक की मात्रा काफी ज्यादा है। इससे लोगों में कई बीमारियां हो रही हैं। सोनदाहा जंगल में पुलिस की जवाबी कार्रवाई में मारे गए एक नक्सली जितेंद्र मांझी का गांव धूपनगर गया के ही आमस प्रखंड में है। उसके गांव के पानी में इतना ज्यादा आर्सेनिक था कि लोग बड़े पैमाने पर बीमार हो गए थे।
हालांकि राज्यों की मशीनरी जहां ठप है वहीं केंद्रीय पुलिस बलों द्वारा स्थानीय लोगों की समस्या दूर करने की कोशिश हो रही है। केंद्रीय पुलिस बल गांवों में स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करवा रहा है। लोगों को जरूरत के सामान भी केंद्रीय पुलिस बल बांट रहा है। नक्सल प्रभावित इलाकों में काम कर रहे पत्रकारों का कहना है कि कुछ सरकारी अधिकारी चाहते हैं कि यह समस्या बरकरार रहे। इलाके के विकास के नाम पर आने वाले पैसे से इनकी चांदी होती है। अशांत क्षेत्र के नाम पर विकास के लिए खूब पैसा आता है। लेकिन पैसा लोगों के बीच विकास के लिए नहीं पहुंचता। इसका पहले ही बंदरबांट हो जाता है। इस बंदरबांट में नक्सली कमांडरों की भूमिका भी होती है। इस मामले में सरकारी अधिकारियों से उनकी मिलीभगत होती है। नक्सली कमांडरों को भी उनका हिस्सा पहुंच जाता है। हर विकास परियोजना में उन्हें बीस से तीस प्रतिशत तक की राशि मिलने की बात कही जा रही है।
बिहार और झारखंड में नक्सली आंदोलन एक और समस्या से जूझ रहा है। यहां मध्य स्तर पर नक्सली संगठन जाति के आधार पर बंटे है। नक्सली आंदोलन में कमांडरों की जाति महत्त्वपूर्ण है। जाति के आधार पर कमांडर बंटे हुए है। जातिगत आधार पर बंटे होने के कारण कुछ कमांडर समय-समय पर पुलिस की मदद भी कर देते है। सीपीआइ (माओवादी) में मध्यम स्तर के ज्यादातर नक्सली कमांडर यादव, पासवान या झारखंड की जनजातियों से संबंधित हैं। यादव और पासवान जाति का छतीस का आंकड़ा है। नक्सली संगठनों में भी इस टकराव की छाया दिखती है। झारखंड और बिहार में कई नक्सली कमांडर संगठन में जातिगत तनाव के कारण पुलिस कार्रवाई में मारे गए। क्योंकि पुलिस को अंदर से ही सूचना मिली। बीते कुछ सालों से बिहार और झारखंड में पासवान और जनजातियों से आए कमांडरों से ज्यादा ताकतवार यादव कमांडर हैं। इसे कई बार दूसरी जाति के कमांडर बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं।

बरगद से सिकोया की ओर | Arvind k Sen

कारोबारी मामलों के जानकार अक्सर भारतीय कर-व्यवस्था की तुलना बरगद के पेड़ से करते हैं। ऐसी व्यवस्था, जिसका बरगद के पेड़ की भांति खूब फैलाव है, जिसके कर प्रावधान बरगद की जड़ों की माफिक आपस में उलझे हुए हैं और बरगद की तरह ही कर प्रावधानों की ऊंचाई (पहुंच) कम होने के कारण बड़े पक्षी (करवंचक) पकड़ में नहीं आते हैं। इसके विपरीत, दुनिया की सफल कर-व्यवस्थाओं को सिकोया के पेड़ की संज्ञा दी जाती है। ऐसी कर प्रणालियां, जो सिकोया के पेड़ की तर्ज पर सीधी और स्पष्ट हैं, जिनका फैलाव कम और गहराई ज्यादा है। सीधी-सपाट होने के कारण सिकोया पेड़ जैसी कर प्रणालियों में उलझाव की गुंजाइश कम होती है, लिहाजा इन्हें लागू करना और कर उगाहना आसान होता है।
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एक ऐसा निर्णय है जो हमारी कर-व्यवस्था को बरगद के उलझाव से निकाल कर सिकोया की स्पष्टता की ओर ले जाने वाला है। अगर कर-कानून सुपरिभाषित हों तो कर चुकाने वाले ईमानदार नागरिकों की परेशानियां कम हो जाती हैं, वहीं कानून में झोल कम होने के कारण उनका उल्लंघन करना भी आसान नहीं होता। समाज के लगभग सभी तबकों और राजनीतिक दलों ने जीएसटी के पक्ष में सहमति जताई है। ऐसे में सरकार ने अगले वित्तवर्ष से जीएसटी को लागू करने की योजना बनाई है। चूंकि यह नया कर है और कई मौजूदा कर (उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, वैट, चुंगी व प्रवेश कर) जीएसटी में समाहित हो जाने हैं, इसलिए कर अधिकारियों को जीएसटी के क्रियान्वयन से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया जाना है।
इन दोनों चुनौतियों (प्रस्तावित कानून को अगले वित्तवर्ष से लागू करने तथा इसके क्रियान्वयन का प्रशिक्षण) को सुलझाने के लिए जरूरी है कि नए कर (जीएसटी) की दरें निर्धारित की जाएं और संसद का अनुमोदन लिया जाए। सरकार ने पहली चुनौती को सुलझा लिया है। राज्यों से विचार-विमर्श के बाद सरकार ने प्रस्तावित जीएसटी की दरें बीते दिनों घोषित की हैं। जीएसटी परिषद ने वस्तु एवं सेवा कर ढांचे के तहत 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की चार स्तर की दरें तय करके प्रस्तावित कर की मोटी-मोटी संरचना पेश कर दी है। हालांकि इस नई कर-व्यवस्था के संबंध में प्रशासनिक शक्तियों को साझा करने के सवाल पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अंतिम सहमति बनना बाकी है। अगर इस बिंदु पर भी बात बन जाती है तो जीएसटी की राह साफ हो जाएगी। इसके साथ ही पहली बार देश का आर्थिक एकीकरण होगा और सेवाओं एवं वस्तुओं के प्रवाह पर अंतरराज्यीय बाधाएं दूर होने से एक देशव्यापी साझा बाजार भी अस्तित्व में आएगा।
जीएसटी परिषद ने अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं की जुदा-जुदा दरें तय करके एक बहुस्तरीय कर-प्रणाली खड़ी करने का प्रयास किया है। हमारे देश की विविधता और लोगों की आमदनी में खासा फर्क होने के कारण प्रस्तावित बहुस्तरीय कर प्रणाली उचित ही है। मिसाल के तौर पर, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल खाद्यान्न (जैसे, चावल और गेहूं) जैसी आम उपभोग की चीजों पर शून्य प्रतिशत कर लगाया जाएगा। दूसरे लफ्जों में कहें तो फिलहाल खाद्यान्न पर जीएसटी नहीं लगाया जाएगा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल आधी चीजों (पचास फीसद) के लिए शून्य प्रतिशत की दर तय की गई है। यह तथ्य सब जानते हैं कि कम आमदनी वाले लोगों का सबसे ज्यादा साबका उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल चीजों से ही पड़ता है। इस तरह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल जरूरी उपभोग की चीजों पर शून्य प्रतिशत की दर रखने का फायदा जाहिर तौर पर लोगों को मिलेगा।
GST की चार दरों का ऐलान; 5, 12, 18 और 28 फीसदी पर बनी सहमति
GST की चार दरों का ऐलान; 5, 12, 18 और 28 फीसदी पर बनी सहमति
 
हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि भले ही दर शून्य प्रतिशत रखी गई हो लेकिन ये चीजें जीएसटी के दायरे में हैं। इसलिए यह फायदा लंबे समय तक कायम रहेगा या नहीं, यह फैसला आने वाली सरकारों के हाथ में रहेगा। नया कर होने के कारण क्रियान्वयन के शुरुआती दौर में लोगों को दिक्कतें उठानी पड़ सकती हैं। इसी बात का खयाल रखते हुए सरकार ने व्यापक खपत वाली चीजों पर भी कर की दरें नरम रखी हैं। मसलन, मसालों और सरसों के तेल का उपयोग देश के तकरीबन हर घर में होता है। बड़ी खपत वाली इन चीजों पर पांच फीसद की दर प्रस्तावित की गई है। नरम कर दरें यहां पर आकर समाप्त हो जाती हैं।
इसके बाद सरकार ने वस्तुओं एवं सेवाओं की प्रकृति और उनका उपभोग करने वाले लोगों की आमदनी को ध्यान में रखते हुए धीरे-धीरे नरम से कठोर दरों का रुख किया है।
जैसे, नौकरीपेशा लोगों द्वारा उपभोग किए जाने वाले डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर बारह फीसद की दर प्रस्तावित की गई है। इसे कठोर दर तो नहीं कहा जाएगा लेकिन इसकी दर व्यापक खपत वाली चीजों से ज्यादा रखी गई है। बढ़ते शहरीकरण के कारण तेजी से बढ़ रहे मध्यवर्ग द्वारा उपभोग की जाने वाली चीजों मसलन साबुन, तेल, टूथपेस्ट और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों जैसे रेफ्रिजरेटर व स्मार्टफोन पर 18 फीसदी की दर प्रस्तावित की गई है। सामान्यतया नव मध्यवर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का समर्थक रहा है और यह वर्ग बेहद आक्रामकता के साथ मीडिया व इंटरनेट माध्यमों के जरिए अपनी मांगें रखता रहा है।
फिलहाल टूथपेस्ट और स्मार्टफोन जैसी आधुनिक जीवन शैली वाली चीजों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। कहना मुश्किल है कि 18 फीसद की टैक्स-दर के प्रति नव मध्यवर्ग का क्या रुख होगा। धनाढ्य वर्ग द्वारा उपयोग की जाने वाली महंगी वस्तुओं (जिन्हें कराधान की भाषा में सफेद वस्तुएं कहा जाता है) और कारों पर लगने वाले कर की दर 28 फीसद रखी गई है। इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। बल्कि भारत के समकक्ष विकासशील देशों में लक्जरी वस्तुओं पर इससे भी ज्यादा दरों पर कर वसूला जाता रहा है। अगर इसे 30 फीसद रखा जाता और मध्यवर्ग व निम्न आदमनी वाले समूह के बीच झूल रहे नव मध्यवर्ग के उपभोग वाली चीजों पर लगने वाले कर की दरों को 12 फीसद के बजाय 10 फीसद रखा जाता तो और उचित होता।
हालांकि तर्क दिया जा सकता है कि जीएसटी एक नया कर है और इसमें बेहद ऊंची दरों का नकारात्मक असर भी हो सकता है। जरूरत पड़ने पर बाद में भी दरें बढ़ाई जा सकती हैं। मगर अनुभव बताता है कि एक बार स्थापित होने के बाद कर की दरों में इजाफा करना बेहद मुश्किल होता है। खासतौर पर लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दल टैक्स-दरों में बढ़ोतरी करके किसी तबके को नाराज करने का सियासी जोखिम उठाने से बचते हैं। बहरहाल, मौज-मजे और शान-शौकत के लिए खरीदी जाने वाली बेहद महंगी चीजों और मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तुओं जैसे पान मसाला, तंबाकू और शीतल पेयों (मानव शरीर और अर्थव्यवस्था पर बेहद नकारात्मक असर डालने वाली इन चीजों को आर्थिक भाषा में ‘पापमय वस्तुएं’ या ‘सिनफुल थिंग्स’ कहा जाता है) पर कर की दर 28 फीसद प्रस्तावित की गई है।
इस मोर्चे पर भी सरकार ने एक बार फिर नरमी बरती है, जिसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया के बाकी देशों में इस श्रेणी की चीजों पर ऊंची टैक्स-दरें लगाने की रवायत रही है, ताकि इनके उपभोग को हतोत्साहित किया जा सके। इससे दो फायदे होते हैं। एक, ऊंची कर-दरों के कारण के कारण कर-राजस्व में इजाफा होता है, और दूसरा, ऊंची कर-दरों के कारण इनके उपभोग में कमी आती है, जिसके चलते इन चीजों के उपभोग से पैदा होने वाली बीमारियों के इलाज पर खर्च होने वाली रकम बचती है। हमारे देश में भी लंबे समय से समाज का जागरूक तबका इन वस्तुओं पर ऊंची कर-दरों की मांग करता आया है। मगर इन वस्तुओं की निर्माता कंपनियां भी बराबर कर-दरें कम रखने की मांग करती रही हैं। संभव है कि सरकार इन वस्तुओं के कारोबारियों की तरफ से किए जा रहे प्रतिरोध के चलते इस श्रेणी की वस्तुओं पर ज्यादा ऊंची कर-दरें रखने का फैसला नहीं कर पाई।
बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जीएसटी जैसा विशाल और शक्तिशाली कर-विधान एक झटके में लागू नहीं किया जा सकता। कदम-दर-कदम ही इतने बड़े कर-सुधार को लागू किया जा सकता है। जीएसटी की बहुस्तरीय व्यवस्था उचित है, क्योंकि एक ही दर रहने से मुद्रास्फीति बढ़ने का अंदेशा था। कर श्रेणियां बन गई हैं, अब देखने वाली बात यह है कि कौन-सी वस्तुएं किस श्रेणी में आती हैं। इसके अलावा, सेवाओं पर लगने वाले करों की दरें घोषित होना बाकी है। कयास लगाए जा रहे हैं कि अधिकतर सेवाओं पर 18 फीसद और जरूरी सेवाओं पर 12 फीसद की दर से कर लगाया जा सकता है। इस बारे में अंतिम निर्णय जीएसटी परिषद को लेना है।
खैर, सरकार को सेवाओं पर कर की दरें निर्धारित करते वक्त और वस्तुओं की श्रेणियां तय करते समय इस बात का खयाल रखना होगा कि कर-राजस्व में बढ़ोतरी हो लेकिन इसकी कीमत आम आदमी को न चुकानी पड़े। जीएसटी की बहुस्तरीय व्यवस्था में जुदा-जुदा वस्तुओं और सेवाओं का अलग-अलग श्रेणियों में आवंटन इस तरह हो कि उसमें हमारी अर्थव्यवस्था की मौजूदा खपत-प्रवृत्तियों की झलक हो। यानी जो ज्यादा आमदनी के साथ ज्यादा उपभोग करे, उस पर ज्यादा टैक्स और व्यापक उपभोग वाली जीवन की जरूरी चीजों पर कम टैक्स लगे। यही कराधान का स्वर्णिम नियम भी है।

संकट में वन्य जीव | रीता सिंह

वर्ल्ड वाइल्ड फंड एवं लंदन की जूओलॉजिकल सोसायटी की हालिया रिपोर्ट चिंतित करने वाली है कि 2020 तक धरती से दो तिहाई वन्य जीव खत्म हो जाएंगे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हो रही जंगलों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले चार दशकों में वन्य जीवों की संख्या में भारी कमी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक 1970 से 2012 तक वन्य जीवों की संख्या में 58 फीसद की कमी आई है। हाथी और गोरिल्ला जैसे लुप्तप्राय जीवों के साथ-साथ गिद्ध और रेंगने वाले जीव तेजी से खत्म हुए हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2020 तक 67 फीसद वन्य जीवों की संख्या में कमी आ सकती है।
गौरतलब है कि खत्म हो रहे जीवों में जंगली जीव ही नहीं बल्कि पहाड़ों, नदियों व महासागरों में रहने वाले जीव भी शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1970 से अब तक इन जीवों की संख्या में तकरीबन 81 फीसद की कमी आई है। जलीय जीवों के अवैध शिकार के कारण तीन सौ प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। जलीय जीवों के नष्ट होने का एक अन्य कारण फफूंद संक्रमण और औद्योगिक इकाइयों का प्रदूषण भी है। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाएं, विभिन्न प्रकार के रोग, जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी भी प्रमुख कारण हैं। इन्हीं कारणों की वजह से यूरोप के समुद्र में ह्वेल और डॉल्फिन जैसे भारी-भरकम जीव तेजी से खत्म हो रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक भीड़-बकरियों जैसे जानवरों के उपचार में दी जा रही खतरनाक दवाओं के कारण भी पिछले बीस सालों में दक्षिण-पूर्व एशिया में गिद्धों की संख्या में कमी आई है। भारत में ही पिछले एक दशक में पर्यावरण को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की संख्या में 97 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। गिद्धों की कमी से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और किस्म-किस्म की बीमारियां तेजी से पनप रही हैं। गिद्धों की तरह अन्य प्रजातियां भी तेजी से विलुप्त हो रही हैं।
वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि पेड़ों की अंधाधुध कटाई और जलवायु में हो रहे बदलाव के कारण कई जीव जातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर विविधता और पारिस्थितिकी अभिक्रियाओं पर उसका नकारात्मक असर पड़ना तय है। यह आशंका इसलिए अकारण नहीं है कि पृथ्वी पर करीब बारह करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीव के समाप्त होने का कारण मूलत: जलवायु परिवर्तन ही था। अगर जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाले वर्षों में धरती से जीवों का अस्तित्व मिटना तय है।
धरती के साथ मानव का निष्ठुर व्यवहार बढ़ता जा रहा है जो कि जीवों के अस्तित्व के प्रतिकूल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बारह हजार वर्ष पहले हिमयुग के खत्म होने के बाद होलोसीन युग शुरू हुआ था। इस युग में धरती पर मानव सभ्यता ने जन्म लिया। इसमें मौसम चक्र स्थिर था, इसलिए स्थलीय और जलीय जीव पनप सके। लेकिन बीसवीं सदी के मध्य से जिस तरह परमाणु ऊर्जा के प्रयोग का दौर शुरू हुआ है और बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो रही है उससे होलोसीन युग की समाप्ति का अंदेशा बढ़ गया है। उसी का असर है कि आज वन्य जीव अस्तित्व के संकट से गुजर रहे है।
वन्य जीवों के वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो पृथ्वी के समस्त जीवधारियों में से ज्ञात तथा वर्णित जातियों की संख्या लगभग अठारह लाख है। लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या के तकरीबन पंद्रह फीसद से कम है। उसका कारण लाखों जीवों के बारे में जानकारी उपलब्ध न होना है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी पर विद्यमान कुल जातियों की संख्या पचास लाख से पांच करोड़ के बीच है। इनमें अधिकांश का वर्णन व नामकरण अब भी नहीं हो सका है। जबकि जीव जातियों की पहचान व इनके नामकरण का क्रमबद्ध कार्य पिछले ढाई सौ वर्षों से जारी है।
जहां तक भारत का सवाल है, तो यहां विभिन्न प्रकार के जीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। जीवों की लगभग पचहत्तर हजार प्रजातियां यहां पाई जाती हैं। इनमें तकरीबन 350 स्तरनधारी, 1250 पक्षी, 150 उभयचर, 2100 मछलियां, 60 हजार कीट व चार हजार से अधिक मोलस्क व रीढ़ वाले जीव हैं। भारत में जीवों के संरक्षण के लिए कानून बने हैं। इसके बावजूद जीवों का संहार जारी है। जैव विविधता को बचाने के लिए आवश्यक है कि जीवों को बचाया जाए। जैव विविधता एक ऐसा प्राकृतिक संसाधन है जो यदि एक बार समाप्त हो गया तो उसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता। अर्थात इसका विलुप्तिकरण सदैव के लिए हो जाता है।
गौर करें तो जीवों पर बढ़ते संकट का मुख्य कारण वायुमंडल के तापमान का बढ़ना, प्रदूषण का बढ़ता स्तर, जंगलों तथा भूमि का व्यापक कटाव, मनुष्यों की अदूरदर्शिता, क्लोनिंग व जैव तकनीक का बढ़ता प्रयोग तथा उच्च स्तरीय और कीट-प्रतिरोधी बीजों का विकास आदि हैं। अस्तिव के संकट में फंसे जीवों को बचाने के लिए जरूरी है कि धरती के बढ़ते तापमान और प्रदूषण की रोकथाम की ठोस पहल हो। जिस गति से धरती का तापमान बढ़ रहा है उससे आने वाले दिनों में वन्य जीवों का संकट गहरा सकता है। लिहाजा, उनके संरक्षण के लिए विशिष्ट परियोजनाएं बनाई जाएं तथा वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगे। इसके अलावा, वन क्षेत्र को कम करके कृषि विस्तार की योजनाआेंं पर भी रोक लगनी चाहिए। ‘स्थानांतरण खेती’ को नियंत्रित किया जाए तथा यदि संभव हो तो उसे समाप्त ही कर दिया जाए। नगरों के विकास के लिए भी वनों की कटाई पर रोक लगनी चाहिए।
लेकिन त्रासदी है कि संपूर्ण विश्व में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई जारी है। इस तरह हम देखते हैं कि जलवायु बदलाव के संकट के मूल में विकास का प्रचलित मॉडल है जो संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर आश्रित है। ‘ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट’ (जीएफआरए) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 1990 से 2015 के बीच कुल वन क्षेत्र तीन फीसद घटा है और 102,000 लाख एकड़ से अधिक का क्षेत्र 98,810 लाख एकड़ तक सिमट ढाई सौ वर्षों से चल रहा है। यानी 3,190 लाख एकड़ वनक्षेत्र में कमी आई है। गौर करें तो यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रीका के आकार के बराबर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक वनक्षेत्र में छह फीसद की कमी आई है। उष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्रों की स्थिति और भी दयनीय है। यहां सबसे अधिक दस फीसद की दर से वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है। ये हालात तब हैं जब एक दशक से पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर सतत प्रयास जारी है।
एक अनुमान के मुताबिक वैश्विक समुदाय विकास के नाम पर प्रत्येक वर्ष सात करोड़ हेक्टेयर वनक्षेत्र का विनाश कर रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वनों के विनाश से वातावरण जहरीला होता जा रहा है और प्रतिवर्ष दो अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमंडल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है। ‘नेचर जिओसाइंस’ का कहना है कि ओजोन परत को होने वाले नुकसान से कुछ खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्त्वों (वीएसएलएस) की संख्या में वृद्धि हुई है जो वन्य जीवों व मानव जाति के अस्तित्व के लिए बेहद खतरनाक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्त्वों (वीएसएलएस) की ओजोन को नुकसान पहुंचाने में भागीदारी नब्बे फीसद है। विडंबना यह कि एक ओर प्राकृतिक आपदाओं से जीव-जंतुओं की प्रजातियां नष्ट हो रही हैं, वहीं रही-सही कसर इंसानी लालच और उसका शिकार का शौक पूरा कर दे रहा है। अभी पिछले दिनों ही इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफयर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिछले एक दशक में प्रतीक के लिए दुनिया भर में सत्रह लाख वन्य जीवों का शिकार (ट्राफी हंटिंग) किया गया। इनमें दो लाख विलुप्तप्राय जीव हैं।
दरअसल, इन वन्य जीवों के शिकारी जीवों के अंगों को महंगी कीमतों पर बेचते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी मुंहमांगी कीमत मिलती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक हाथी मारने की कीमत पच्चीस से साठ हजार डॉलर है। इसी तरह एक बाघ साढ़े आठ हजार से पचास हजार और तेंदुआ पंद्रह से पैंतीस हजार डॉलर तक है। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि शौक के लिए शिकार यानी ट्राफी हंटिंग को अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों ने मान्यता दे रखी है। ट्राफी हंटिंग में अमेरिकी शिकारी सबसे आगे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले एक दशक में दुनिया भर में ग्यारह हजार बाघों का शिकार किया गया जिनमें पचास फीसद बाघों को अमेरिकी शिकारियों ने मारा है। आश्चर्य की बात यह है कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन यह तर्क दे रहा है कि अगर कानूनी दायरे में ट्राफी हंटिंग हो तो वन्य जीवों के संरक्षण में मदद मिलेगी और जीवों की आबादी नियंत्रित होगी। साथ ही स्थानीय लोगों को आर्थिक फायदा भी पहुंचेगा। लेकिन यह दलील सही नहीं है। सच यह है कि इससे वन्य जीवों की संख्या में कमी आएगी और पहले से ही लुप्त हो रहे जीवों का अस्तित्व मिट जाएगा।