Sunday, March 23, 2014

बन्दर


मरना-मारना,
कटना-काटना,
रोना-रुलाना,
बतकही से बक बक
बक-बक से तलवार,
तलवार से लाशें.
बाल काटता रहा आदमी,
बढ़ते रहे बाल.
नाखून घिसता रहा आदमी,
बढ़ते रहे नाखून.
सीधा चलता रहा आदमी,
झुक- झुक जाता है फिर-फिर,
रेंगता फिर-फिर.
रंगता रहा देह,
रंग धुल जाता है फिर-फिर.

झूठ है कि आदमी है वो,
आदमी आदमी नहीं,
आदमी बन्दर है!

Friday, March 21, 2014

कश्तियाँ डोलती हैं




कश्तियाँ डोलती हैं,
सुबह - शाम.
ज्वार-भाटे तेरे शहर भी
कश्तियाँ हिलाते होंगे.

यादों के भाटे,
ख्वाबों के ज्वार,
मन की कश्तियाँ.

कश्तियाँ डोलती  हैं.

Saturday, March 8, 2014

Sketch : श्वेता



तेरी मुस्कान, गोल चेहरा
एक छलकता बचपन-
निश्छल, निर्मल, निष्कपट.
जब भी तू हंसी
निर्मल, निर्झर-निर्झर...
मैं खोया, बस खोया.

मेरा गाना, तेरा रोना,
मेरा फिर-फिर गाना
तेरा फिर-फिर रोना.
कोई गान नहीं
जो तुम्हें हंसा न सके,
तुम्हें झूठा रुला न सके.

शुक्र है,
बस ट्रैन बढ़ रही है,
तुम अभी भी ज़िंदा हो,
मेरे अंदर... असीम तक.

Sketch : प्रतीक्षा



चलती ट्रैन, नपते रस्ते,
ओझल होते दृश्य.
बस एक तुम्हारा चेहरा है
जो अँधेरे डब्बे में भी
आँखों में चमक रहा है.

तेरा कन्धा मेरा सर,
तेरी हंसी, मेरी मुस्कान,
तेरा गुस्सा, मेरी चुप्पी,
'तेरे पप्पा का', मेरी हंसी.
तेरा रोना, मेरा रोना,
तेरा हँसाना, मेरा खुश होना.

रिश्ते बस जन्म से नहीं बनते,
यकीनन
रिश्ते हमसे बनते हैं.
हमसे-तुमसे...
बस हमसे और तुमसे.

Tuesday, February 25, 2014

खून बहाने वाले तुम्हीं थे



मैंने खून से कहा-
मत बहा कर इतना
देख सदियों तू बहा
इतिहास बना,
और बच्चों को पढ़ना पड़ता है वो इतिहास,
दर्ज़ करनी पड़ती हैं तमाम तारीखें
फ़ैल-पास का उठाना पड़ता है जोखिम.

'बहाने वाले तुम्हीं थे,
इतिहास में दर्ज़ करने वाले तुम ही.
लालसाएं तुम्हारी, लोलुप्त तुम
अपनों का खून बहाते रहे.
निहायत ही बेवकूफ इंसान,
ईश्वर ने तुम्हें इसलिए जन्मा था?'
खून तल्ख़ी से बोला
  ....और अब मैं बिलकुल चुप था!

Monday, February 24, 2014

मुक्तिबोध, चाँद का मुंह सच में टेड़ा है.



उसकी कत्थई आँखों में देखता हूँ जी भर,
अपलक निहार-निहार
निश्छल,
निर्मल,
निष्कपट,
मेरे सौम्य-शीतल चाँद.
जैसी तमाम पदवियां
लुटाता हूँ बार-बार.

एक दिन
उसकी कत्थई आँखें
मेरे वक़्त का तकाज़ा कर
फेर लेती हैं नज़रें!

मैं जोर से चीखता हूँ
'मुक्तिबोध, चाँद का मुंह सच में टेड़ा है.'

कवि बेवकूफ़ होते है,
बेहद बेवकूफ़!

Sunday, February 23, 2014

दर्द और गुलज़ार




हर दफ़े निखर निखर आता हूँ ग़मों से,
हर दफ़े एक नया ग़म पनप आता है...
डर है कहीं दर्द का 'एडिक्ट' न हो जाऊं!


-*-

तेरे जैसा लिखना-पढ़ना मुझे कभी न आया,
न दिन ढला, न रात उगी, न चाँद शरमाया,
निर- मूरख मैं तुझको पढ़- पढ़ बार-बार हर्षाया,
मुझे भी तरकीब बता 'गुलज़ार' हुनर कहाँ से लाया?




ज़लज़ले की रात



ज़लज़ले की रात 
दुनिया ने बांटा सामान,
मेरे हिस्से में आई एक किताब
जिसक आखिरी पन्ने पे लिखा था-
'ज़लज़ला अच्छा-बुरा देखकर नहीं आता,
कुत्तों की कोई जात नहीं होती,
लोग कभी अपने नहीं होते, मौत अपनी है!'

उस रात ज़लज़ले ने
मुझे कम, रिश्तों को ज्यादा ख़ाक किया. 




Friday, February 21, 2014

Nero's Guest



खाली पतीली पे 
उबाला गया मटमैला पानी
लगातार तीन दिन तक...
चार साल का छुटकू 
'रोटी रोटी' चिल्लाते मर गया.

मैं व्यस्त था
बेमतलब सी बातें सुलझाने में.
मेरी चार छोटी परेशानियां
किसी की ज़िन्दगी से बड़ी तो नही!

आज भी हूँ मैं,
मेरे जैसे 'नीरो'ज़ गेस्ट'. 

Friday, January 31, 2014

Don't know, what to 'title' it. Its not a poem, its just what i felt today...



हर व्यक्ति बदलना चाहता है तुम्हें,
अपनी नज़र से.
हर व्यक्ति के लिए तुम हो,
अच्छे कभी, कभी बुरे.
उसकी नज़र, बस उसकी नज़र से
देखेगा तुम्हें वो...
चाहे तुम सही रहो या गलत!

दुनिया बहुत छोटी है,
सोच के मामले में.
दुनिया बहुत तिरछी है,
नज़र के मामले में.

तू अपनी धुन बजाता चल,
गीत खुद का गाता चला,
दुनिया की टेड़ी नज़रों को
अपनी नज़र दिखाता चल.