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Monday, January 15, 2018

गुलज़ार

गुलज़ार मुझे सर्दियों के सुबह पार्क में नंगे पैर शोव्ल ओढ़े टहलने में सबसे ज्यादा याद आते हैं. कुछ खोना और उसकी कसक किसी ठंढे पल में महसूस  करना... उन्ही की कुछ नज्में...




१.
ठीक से याद नहीं...


ठीक से याद नहीं, 
फ़्रांस में "बोर्दो" के पास कहीं 
थोड़ी-सी देर रुके थे.
छोटे से कसबे में, एक छोटा-सा लकड़ी का गिरजा,
आमने "आल्टर'' के, बेंच था...
एक ही शायद 
भेद उठाये हुए एक "ईसा" की चोबी मूरत !
लोगों की शम'ओं से /पाँव कुछ झुलसे हुए,
पिघली हुई मोम में कुछ डूबे हुए,
जिस्म पर मेखें लगी थीं
एक कंधे पे थी, जोड़ जहाँ खुलने लगा था
एक निकली हुई पहलु से, जिसे भेद की टांग में ठोंक दिया था
एक कोहनी के ज़रा नीचे जहाँ टूट गयी थी लकड़ी..
गिर के शायद... या सफाई करते.

२.
कभी आना पहाड़ों पर

कभी आना पहाड़ों पर...
धुली बर्फों में नम्दे डालकर आसन बिछाये हैं 
पहाड़ों की ढलानों पर बहुत से जंगलों के खेमे खींचे हैं 
तनाबें बाँध रखी हैं कई देवदार के मजबूत पेड़ों से
पलाश और गुलमोहर के, हाथों से काढ़े हुए तकिये लगाये हैं 
तुम्हारे रास्तो पर छाँव छिडकी है
में बादल धुनता रहता हूँ,
की गहरी वादियाँ खाली नहीं होतीं
यह चिलमन बारिशों की भी उठा दूंगा, जब आओगे.
मुझे तुमने ज़मीं दी थी 
तुम्हारे रहने के काबिल यहाँ एक घर बना दूँ मैं
कभी फुर्सत मिले जब बाकी कामों से, तो आ जाना 
किसी "वीक एंड"  पर आ जाओ 

३.
दोनों एक सड़क के आर-पार चल रहे हैं हम

दोनों एक सड़क के आर-पार चल रहे हैं हम
उस तरफ से उसने कुछ कहा जो मुझ तक आते-आते
रास्ते से शोर-ओ-गुल में खो गया..
मैंने कुछ इशारे से कहा मगर,
चलते-चलते दोनों की नज़र ना मिल सकी
उसे मुगालता है मैं उसी की जुस्तजू में हूँ 
मुझे यह शक है, वो कहीं
वो ना हो, जो मुझ से छुपता फिरता है !
सर्दी थी और कोहरा था,
सर्दी थी और कोहरा था और सुबह
की बस आधी आँख खुली थी, आधी नींद में थी !
शिमला से जब नीचे आते/एक पहाड़ी के कोने में 
बसते जितनी बस्ती थी इक /बटवे जितना मंदिर था
साथ लगी मस्जिद, वो भी लाकिट जितनी
नींद भरी दो बाहों जैसे मस्जिद के मीनार गले में मंदिर के,
दो मासूम खुदा सोये थे

source: http://bairang.blogspot.in/2010/10/blog-post.html

Wednesday, December 21, 2016

माँ / गुलज़ार

तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
ढूँढा करता हूं तुम्हें
अपने चेहरे में ही कहीं
लोग कहते हैं
मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं
यूं तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर प्यासी हैं
कान में छेद है
पैदायशी आया होगा
तूने मन्नत के लिये
कान छिदाया होगा
सामने दाँतों का वक़्फा है
तेरे भी होगा
एक चक्कर
तेरे पाँव के तले भी होगा
जाने किस जल्दी में थी
जन्म दिया, दौड़ गयी
क्या खुदा देख लिया था
कि मुझे छोड़ गयी
मेल के देखता हूं
मिल ही जाए तुझसी कहीं
तेरे बिन ओपरी लगती है
मुझे सारी जमीं
तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं

Saturday, December 10, 2016

खुला ख़त गुलज़ार को

गुलज़ार,
यूं तो कुछ चीज़ें नवाज़िशों से ऊपर होती हैं, पर यह सच है कि जब आपको सिने दुनिया का सबसे बड़ा अवॉर्ड मिलने की ख़बर सुनते हैं तो खुशी का एक भीगा हुआ फाहा हमारे गालों को छू जाता है. दादा साहब फाल्के जहां भी होंगे, आज खुश होंगे.
नाम भी क्या ख़ूब रखा है, ‘गुलज़ार’. जो हमेशा खिला ही रहेगा. ताज़ादम बना रहेगा. उस पौराणिक और आध्यात्मिक से नजर आने वाले आले की तरह, जहां हर सुबह न जाने कौन एक ताजा फूल रख जाता है.
गुलज़ार दद्दा, इसी बहाने हम आपको अपने हिस्से की वो धूप दिखाना चाहते हैं, जो बीते बरसों में आपकी नज़्मों, नग़मों और फिल्मों से हमने चुराई है. आपके एहसासों के खजाने के इस्तेमाल से हमने ‘कभी रिप्लेस न किए जा सकने वाले’ अनगिन पल कमाए हैं. इसलिए हमारी ओर से एक शुक्राने की नमाज़ तो बनती है.
बचपन से ही शुरू करते हैं. जब हम चाय-पराठे खाकर जंगल बुक देखने बैठे थे और ‘चड्ढी पहनकर फूल खिला है’ सुनकर मस्त हो गए थे. इसे सुनकर ही हमने चड्ढी में शर्माना बंद किया था. हमें लगा था कि चड्ढी पहनकर इतराना इतनी बुरी चीज भी नहीं है. इसमें खिला भी जा सकता है.
फिर हम कुछ बड़े हो जाते हैं तो एक दिन धूल खाए स्टोर में चौथे दर्जे की एक कॉपी मिलती है. जिस पर कुछ तिरछे ढंग से लिखा हुआ हमारा एक नाम होता है. और एक खुशी होती है जो बयान नहीं की जा सकती. या कि लकड़ी की अलमारी के नीचे मिली वह पुरानी सी गेंद, जो अभी भी इस्तेमाल की जा सकती है. ठीक ऐसा ही लगता रहा, जब बरसों तक एक गीत सुनने के बाद हम किसी दिन अपने दोस्त से पूछते- ‘ये किसने लिखा है?’ तो वह कहता, ‘अफकॉर्स गुलज़ार’ और हम हर बार सुखद आश्चर्य से भर जाते कि ‘अच्छा ये भी गुलजार ने लिखा था!’
‘डोले रे डोले रे, नीला समंदर है आकाश प्याजी, डूबे न डूबे मेरा जहाजी’, सुनते हैं तो लगता है कि लिखने वाला बच्चा ही रहा होगा. गुलजार, आप सबके लिए अलग-अलग गुलजार हैं. नजर आने वाला गुलजार ऐसा है कि जैसे कवि न हो, हर रहस्य जानने वाला बुजुर्ग हो, जो कह रहा हो कि देखो बेटा कलफ लगा कुर्ता ऐसा लगता है. कभी ऐसा लगा कि पक्का ये गोलमाल वाले अमोल पालेकर का भाई है. छोटे कुर्ते का आख्यान हमने वहीं से पाया है.
थोड़े और बड़े हुए तो लगा कि गुलज़ार वो है जो संवेदनशील फिल्में बनाता है जिसे हमारे पापा जो गोविंदा छाप फिल्में नहीं देखते, भी देखने जाते हैं. माचिस, इजाजत, आंधी, मासूम, परिचय और भी ढेर सारी. फिर मिर्ज़ा ग़ालिब को पर्दे पर लाने की खुशनसीबी भी आप ही के हिस्से आई.
बहुत बाद में समझ आया कि गुलज़ार, आप सैकड़ों कंचों की एक पोटली की तरह हैं. जिसके पास जो कंचा आया, उसने उसी तरह समझ लिया. हमारा ख़्याल है कि आप इकलौते हैं जो हमारे बाबा से लेकर हमारे बेटे तक पसरे हुए हैं. नाना के लिए आप क़यामतख़ेज़ कहानियां फिल्माने वाले शख्स रहे होंगे. किसी के लिए गीत लिखने वाली शोख तोतली आवाज की बच्ची की तरह होंगे जो पोल्का डॉट्स वाले पायजामों में इतराती भी होगी. आप पर ऐसा यकीन बना कि गुलजार का लिखा डायनासोर होगा तो उसमें भी ‘क्यूटत्व’ खोजा जा सकेगा.
आपने अपनी बेटी का गोया आइसक्रीम-सा नाम रखा, ‘बोस्की’. बाहरी दुनिया के लिए वह मेघना हो गई हों, पर घर पर बोस्की ही रहीं. बचपन में हमने कई तरह से गणनाएं सीखी. एक, दो तीन. वन टू थ्री. प्रथमा द्वितीया, तृतीया. पर जवान हुए तो आपने हमें नई गिनती सिखाई. 116 चांद की रातें और एक तुम्हारे कांधे का तिल. रात टुकड़ों में बसर होती रही, हम नींद से कोसों दूर कुछ-कुछ कुछ-कुछ गिनते रहे.
गुलज़ार, आप ही थे जिसने बताया कि हमारे रोजमर्रा के आस-पास के लफ़्ज कितने जिंदा हैं. उन्हें सुनना कुछ ऐसा था कि जैसे घास पर देर तक पसरे हुए ख़ुद घास हो गए हों और फिर एक काला-लाल वो कीड़ा होता है गोल सा, जो छूते ही फुर्र हो जाता है. या कि हांडी में पकी उस सिंदूरी दही का स्वाद. वैसा ही जमीनी और असल एहसास आपके लफ्जों में होता रहा और बहुत कुछ पीछे छूटने से बचता रहा.
अपनी महबूबा के बारे में सोचते हुए कल्पना के कैनवस पर हमने जो पहला स्ट्रोक मारा तो एक गोरी का ही तसव्वुर बुना. धोखे से एफएम पर गाना बज गया कि मेरा गोरा रंग लइले, मोहे श्याम वर्ण दइ दे. तो हमें नहीं पता होता था कि यह आपका लिखा पहला गाना था. लेकिन इसे सुनने के साथ हम एक पवित्र चेष्टापूर्ण पुलक से भर जाते थे और सांवले होने के बावजूद इस अभिनव अपराजित मंत्र की तरह एक गोरी कन्या की मासूम आकांक्षा करते थे; जो एक दिन आएगी और हमसे हमारा सांवला रंग ले लेगी.
हम जब शोख हुए और हमने प्यार किया, तो जाना कि जिगर से बीड़ी जलाने का मतलब क्या होता है. ‘मैं चांद निकल गई दैया रे, भीतर भीतर आग जले’. इससे पहले बीड़ी को लेकर हमारे मन में जो छवि थी, उसमें काले होंठ थे, खांसी थी, झुर्रियों वाली उंगलियां थीं. लेकिन आपने सब पलट दिया. बीड़ी को मलिनता से उठाकर इश्क से रफू कर दिया. उस वक्त लगा कि बीड़ी पीने के बाद बिपाशा सी नमकीन नायिका भी आपके साथ नाच सकती है. यह वैसा ही था कि जैसे राजीव गांधी गन्ना खा लें तो गन्ना डीपीएस में भी ट्रेंड कर जाए. लफ़्ज़ों में असीम ताकत है.
फिर जब गांव और कस्बों से सामान बांध हम अपने संघर्ष पथ के लिए निकले तो आपने हमें हमारे वक्त का एंथम दिया. ‘छोटे-छोटे शहरों से, खाली बोर दुपहरों से, हम तो झोला उठाकर चले.’ यह बात भी आपको औरों से अलग बनाती रही कि आप हिंदी में नहीं लिखते, हिंदुस्तानी में लिखते हैं, और अंग्रेज़ीदां शब्दों को इज्जत बख्शने से भी गुरेज नहीं करते. किसी मुलाकात में सिगरेट की डिबिया पर बनाया गया पौधा और बाद में उस पर उग आया फूल, आपकी नज़्म का हिस्सा होता रहा. हमने जवानी का पहला कश लगाया तो याद आया कि यह खुमारी सर चढ़ी है, लब पर जो चल रही है.
गुलजार, आपने अलमारी में रखे और छज्जों पर घास से उगाए गए शब्दों को बाहर निकाला और उनका रंग हमारी रुटीन लाइफ पर हौले से छिड़क दिया. उस दौर में जब हम शहरी होने और होते चले जाने पर आमादा थे, आपने तमाम भदेस चीज़ों की लड़ाई लड़ी. आपने हमें 'हम' बनाए रखने में मदद की. हमारे कस्बाईपन को बचाए रखने का हौसला दिया. ख़ुद को ‘तत्सम’ न होने देने की सारी लड़ाई में हमें ‘तद्भव’ बने रहने में मदद की.
आपने हमारे इर्द- गिर्द फैली हुई प्रकृति को एक इंसान के भीतर ठूंस दिया और फिर उससे कहा कि अब हरकतें करो. तो हुआ ये कि चांद नंगे पांव आ गया और सूरज एक सूदखोर में तब्दील हो गया. फड़फड़ाते हुए किताबों पर दस्तक देने वाली हवाएं प्रेमिकाएं हो गईं और कुछ पुराने चेहरे कल के अखबार हो गए. यह कितना रोमांचकारी था, कॉलेज के उन लड़के-लड़कियों के लिए.
आपने हमें प्यार करना सिखाया. उससे भी जरूरी प्यार में ईमानदार रहना सिखाया. यह बेबाकी सिखाई कि हम कह सकें कि चुनरी लेकर सोती थी, तो कमाल लगती थी. सात रंग के सपने बुनना सिखाया. सोनू निगम की आवाज को सुनते हुए आप ही के लफ्जों के सहारे हमने यह उम्मीद बांधे रखी कि हया की लाली खिलेगी और जुल्फ के नीचे गर्दन पर सुबह-ओ शाम मिलती भी रहेगी. अपनी कुछ सबसे अच्छी दोस्तों को जीभ चिढ़ाते हुए हमने पीली धूप पहनकर बाग में न जाने की नसीहत दी.
कि इक खटास भी मामूली सी रिश्ते में आई कभी तो हम अधीर नहीं हुए. क्योंकि हम जानते थे कि झक सफेद कुर्ते और भारी सी आवाज वाला एक शख्स कहता है कि हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं टूटा करते. फिर एफएम पर आपका गाना डेडिकेट कर हमने माफी का इज़हार किया. कि हमको मालूम है इश्क मासूम है, इश्क़ में हो जाती हैं गलतियां. सब्र से इश्क महरूम है.
भयानक पराजय के क्षण में कमरे में फूट-फूट कर रोने के बाद हमने ईयरफोन लगाकर आप ही के नाम वाला फोल्डर खोला हमेशा. उबरने के दौरान जिंदगी से गले लगाने की दरख़्वास्त की. भयानक खुशी के क्षण में भी आपके लिखे गाने पर कुछ ज्यादा ही जोर से थिरके. सबसे सुकून वाले पलों में ‘तुझसे नाराज नहीं ऐ जिंदगी’ ही लगाया हमेशा. कभी-कभी तो हैरत होती है कि हमारे सारे जज्बातों के लिए आपके पास लफ्ज़ हैं. आप के नग़मे हम सब की भावनाओं के प्रतिनिधि हो गए हैं. कि हमारा सारा सामान आपके पास पड़ा हो जैसे.
गुलज़ार आप पर इल्ज़ाम भी लगे. कुछ लोग कहते हैं कि कुछ फिल्में प्रेरित होकर बनाई गईं. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के ‘इब्ने-बतूता’ का इस्तेमाल आपने किया. लेकिन क्या है दद्दा, कि हम भावुक लोग हैं और अपनी भावना में हम बड़े ईमानदार होते हैं. इल्जाम लगता है तो लगता है कि यह गलती हमने की है. रेशम के कुछ धागों को अपने जादुई चरखे में कातकर आपने धन्य कर दिया, पर वे धागे किसी और के ही रहे होंगे. और आपके पास तो अपना बाग है. बचा जा सकता था न.
पर आपको जितनी बार पढ़ते हैं, ताज़ा लगता है. यह अऩिवार्य रूप से रहस्यमयी है. अरण्य को कितनी बार भी देख लो, कौतुक बना रहता है. हो सकता है कि पोखर देख लिया हो पर उन नाजुक कमलडंडियों पर नजर न गई हो. किसी दरख्त पर बुलबुल का कोई खूबसूरत घोंसला देखने से छूट गया हो. पढ़कर सोचता रहता हूं देर तलक. रात पश्मीने की होती तो कैसा होता.
और वह बात जो साहिर लुधियानवी के बारे में हम फख्र से कहते हैं कि उनके लिखे हुए में एक राजनीतिक-सामाजिक पहलू भी है. कुछ लोग असहमत होंगे शायद, पर हमें लगता है कि आपने उसे भी एक जरूरी हिस्से की तरह बनाए रखा. ‘आंखों को वीजा नहीं लगता, सपनो की सरहद होती नहीं’ जैसी कालजयी पंक्ति इस दौर को आपका बेशकीमती तोहफा है. फिर उस नज्म को कौन भूल सकता है, जिसमें ख्वाब की दस्तक पर सरहद पार से कुछ मेहमान आते हैं और फिर गोलियों के चलने के साथ ऐसे हसीन ख्वाबों का खून हो जाता है. या अपनी त्रिवेणी में जब आप कहते हैं कि ‘चूड़ी के टुकड़े थे, पैर में चुभते ही खूं बह निकला/ नंगे पांव खेल रहा था लड़का अपने आंगन में/ बाप ने कल दारू पी के मां की बांह मरोड़ी थी.’ या जब ईश्वर से मासूम सवाल दागते हैं कि इक जरा छींक ही दो तुम तो यकीं आए कि सब देख रहे हो. आप हर बार मुझे ख़ालिस इंसान लगे हैं, दद्दा.
अपने आप में यही बात हमें रोमांचित कर देती है कि 76 साल की उम्र में आप ‘दिल तो बच्चा है जी’ लिख रहे थे, और वो भी पूरी ठसक के साथ, यह बताते हुए कि उम्र के सुफैद हो जाने के बाद भी जवानी की कारी बदरी कई बार नहीं छंटती है. शुक्रिया गुलज़ार. तहे-दिल किधर होता है मालूम नहीं. पर शुक्रिया. ये ऊपर वाली तस्वीर में जो कांच का यूनिवर्सल गिलास दिख रहा है न, उसी में आपके साथ इक अदरक वाली चाय पीने का मन है दद्दा. क्या करूं, खुशी से उपजी ख्वाहिश है.
बेलग़ाम उड़ती हैं कुछ ख़्वाहिशें ऐसे दिल में
‘मैक्सिकन’ फिल्मों में कुछ दौड़ते घोड़े जैसे
थान पर बांधी नहीं जाती सब ख़्वाहिशें मुझसे। :)
लेखक -कुलदीप मिश्र, Source: http://aajtak.intoday.in/story/an-open-letter-to-gulzar-1-760970.html

Friday, January 8, 2016

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर : गुलज़ार

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैने,
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैने

काले घर में सूरज चलके, तुमने शायद सोचा था
मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे.
मैने एक चराग जलाकर रोशनी कर ली,
अपना रस्ता खोल लिया

तुमने एक समन्दर हाथ में लेकर मुझपे ढेल दिया,
मैने नोह की कश्ति उस के ऊपर रख दी

काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा,
काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा
मैने काल को तोड़कर,
लम्हा लम्हा जीना सीख लिया

मेरी खुदी को मारना चाहा
तुमने चन्द चमत्कारों से
मेरी खुदी को मारना चाहा तुमने
चन्द चमत्कारों से
और मेरे एक प्यादे ने चलते चलते
तेरा चांद का मोहरा मार लिया

मौत की शह देकर तुमने समझा था अब
तो मात हुई
मौत की शह देकर तुमने समझा था अब
तो मात हुई
मैने जिस्म का खोल उतारकर सौंप
दिया,
और रूह बचा ली

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब
तुम देखो बाज़ी...

Thursday, January 7, 2016

त्रिवेणियाँ : गुलज़ार

१.
मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने
रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे
२.
सारा दिन बैठा,मैं हाथ में लेकर खा़ली कासा(भिक्षापात्र)
रात जो गुज़री,चांद की कौड़ी डाल गई उसमें
सूदखो़र सूरज कल मुझसे ये भी ले जायेगा।
३.
सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी की
मुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर
कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।
४.
शोला सा गुज़रता है मेरे जिस्म से होकर
किस लौ से उतारा है खुदावंद ने तुम को
तिनकों का मेरा घर है,कभी आओ तो क्या हो?
'५.
ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी
खुदा से कहिये,कभी वो भी अपने घर आयें!
६.
लोग मेलों में भी गुम हो कर मिले हैं बारहा
दास्तानों के किसी दिलचस्प से इक मोड़ पर
यूँ हमेशा के लिये भी क्या बिछड़ता है कोई?
७.
आप की खा़तिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के!
चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खू़न आ जायेगा
८.
पौ फूटी है और किरणों से काँच बजे हैं
घर जाने का वक्‍़त हुआ है,पाँच बजे हैं
सारी शब घड़ियाल ने चौकीदारी की है!
९.
बे लगाम उड़ती हैं कुछ ख्‍़वाहिशें ऐसे दिल में
‘मेक्सीकन’ फ़िल्मों में कुछ दौड़ते घोड़े जैसे।
थान पर बाँधी नहीं जातीं सभी ख्‍़वाहिशें मुझ से।
१०.
तमाम सफ़हे किताबों के फड़फडा़ने लगे
हवा धकेल के दरवाजा़ आ गई घर में!
कभी हवा की तरह तुम भी आया जाया करो!!
११.
कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे
ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।
१२.
वह मेरे साथ ही था दूर तक मगर इक दिन
जो मुड़ के देखा तो वह दोस्त मेरे साथ न था
फटी हो जेब तो कुछ सिक्के खो भी जाते हैं।
१३.
वह जिस साँस का रिश्ता बंधा हुआ था मेरा
दबा के दाँत तले साँस काट दी उसने
कटी पतंग का मांझा मुहल्ले भर में लुटा!
१४.
कुछ मेरे यार थे रहते थे मेरे साथ हमेशा
कोई साथ आया था,उन्हें ले गया,फिर नहीं लौटे
शेल्फ़ से निकली किताबों की जगह ख़ाली पड़ी है!
१५.
इतनी लम्बी अंगड़ाई ली लड़की ने
शोले जैसे सूरज पर जा हाथ लगा
छाले जैसा चांद पडा़ है उंगली पर!
१६.
बुड़ बुड़ करते लफ्‍़ज़ों को चिमटी से पकड़ो
फेंको और मसल दो पैर की ऐड़ी से ।
अफ़वाहों को खूँ पीने की आदत है।
१७.
चूड़ी के टुकड़े थे,पैर में चुभते ही खूँ बह निकला
नंगे पाँव खेल रहा था,लड़का अपने आँगन में
बाप ने कल दारू पी के माँ की बाँह मरोड़ी थी!
१८.
चाँद के माथे पर बचपन की चोट के दाग़ नज़र आते हैं
रोड़े, पत्थर और गु़ल्लों से दिन भर खेला करता था
बहुत कहा आवारा उल्काओं की संगत ठीक नहीं!
१९.
कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चुटख़े हुये हैं कब से
टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझ को!
२०.
कोने वाली सीट पे अब दो और ही कोई बैठते हैं
पिछले चन्द महीनों से अब वो भी लड़ते रहते हैं
क्लर्क हैं दोनों,लगता है अब शादी करने वाले हैं
२१.
कुछ इस तरह ख्‍़याल तेरा जल उठा कि बस
जैसे दीया-सलाई जली हो अँधेरे में
अब फूंक भी दो,वरना ये उंगली जलाएगा!
२२.
कांटे वाली तार पे किसने गीले कपड़े टांगे हैं
ख़ून टपकता रहता है और नाली में बह जाता है
क्यों इस फौ़जी की बेवा हर रोज़ ये वर्दी धोती है।
२३.
आओ ज़बानें बाँट लें अब अपनी अपनी हम
न तुम सुनोगे बात, ना हमको समझना है।
दो अनपढ़ों कि कितनी मोहब्बत है अदब से
२४.
नाप के वक्‍़त भरा जाता है ,रेत घड़ी में-
इक तरफ़ खा़ली हो जबफिर से उलट देते हैं उसको
उम्र जब ख़त्म हो ,क्या मुझ को वो उल्टा नहीं सकता?
२५.
तुम्हारे होंठ बहुत खु़श्क खु़श्क रहते हैं
इन्हीं लबों पे कभी ताज़ा शे’र मिलते थे
ये तुमने होंठों पे अफसाने रख लिये कब से?

Sunday, April 19, 2015

4 Books



Books. I survived in Engineering on Books and Movies. Every book is a different world. Every story is lake of emotions. I read biographies, autobiographies, Premchand, Sarat chand Chattopaddhyay in school days. Some interesting books were part of school syllabus and now I am a student of Hindi Literature many are in my syllabus. NCERTs are more then just syllabus-books. Contain thoughts and knowledge of different scholars, they are my favourite; Especially Geography, Civics, Polity, History and Maths NCERTs. 

Here is my list of 'Four Books'

1. Maila Aanchal: 'Anchalik Upanyas' (regional novel) by Phanishwar Nath Renu reveals condition of Indian villages in 1940s, when politics was on peak, 'Bharat Chhodo Andolan' started and after that India got freedom. The politics, people, corruption and society; 'Maila Anchal' is account of each and everything. 

'Godan' by Premchand is another pioneer 'Anchalik Upanyas'. I loved that too.




2. Gulzar's Poetry Books: Instead of choosing one book, adding all here. Because we can't choose a single poem as 'Best Poem', neither particular book. Gulzar is my favourite, will always remain. 



3. Paulo Coelho's 'Veronica Decided to Die': A slow novel with few characters and story with philosophy. I guess people rarely put it in their favourite list as 'The Alchemist' and 'The Zaheer' are much famous and sold out. I liked both but 'Veronica...... ' is favourite.



4. India's Struggle for Independence by Bipin Chandra and Others: An account of Freedom Struggle, favourite of Civil Service Aspirants. I liked it coz of the way its written. Most realistic book I ever read.


Other books I loved includes Gandhi's Autobiography ( My experiments with truth ), Rediscovery of India by Meghnad Desai, Nehru's letters, Gunahon ke Devta by Dharmveer Bharti, Javed Akhtar's Gazal Collections (Lava, Tarkash), Munavvar Rana's poems, Vishnu Prabhakar's biography of Bhagat Singh, Ramchandra Guha's India after Gandhi, Karan Bajaj's novels, Aha! Zindagi Magazine and many more....


Saturday, February 7, 2015

मुझको भी तरकीब सिखा कोई, यार जुलाहे / गुलज़ार

मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे 
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते 
जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ 
फिर से बाँध के 
और सिरा कोई जोड़ के उसमें 
आगे बुनने लगते हो 
तेरे इस ताने में लेकिन 
इक भी गाँठ गिरह बुनतर की
देख नहीं सकता है कोई 
मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता 
लेकिन उसकी सारी गिरहें 
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे.

Sunday, February 23, 2014

दर्द और गुलज़ार




हर दफ़े निखर निखर आता हूँ ग़मों से,
हर दफ़े एक नया ग़म पनप आता है...
डर है कहीं दर्द का 'एडिक्ट' न हो जाऊं!


-*-

तेरे जैसा लिखना-पढ़ना मुझे कभी न आया,
न दिन ढला, न रात उगी, न चाँद शरमाया,
निर- मूरख मैं तुझको पढ़- पढ़ बार-बार हर्षाया,
मुझे भी तरकीब बता 'गुलज़ार' हुनर कहाँ से लाया?