Wednesday, January 29, 2014

संस्कृति




तुम जड़ हो पत्थर पे उस कोने में बैठ जाना
जहां से किवदंतियां सच लगती हैं,
फिर पुकारना अपना महान अतीत,
करना उसका गुणगान,
और जब कुछ न बचे,
लोग न माने
तो बिछा देना लाशें.

आखिर तुम्हारी महान संस्कृति,
महान अतीत के खातिर
वर्त्तमान की
दो चार लाशें गिरना तो बनता है!

Thursday, January 16, 2014

पार्टीशन




मैं अक्सर पाकिस्तान के
उस टूटे घर के बारे में सोचता हूँ,
जो सलामत था जब मैं निकाला गया!
उस राख के बारे में भी
जो बिखरेगी यहाँ की सरजमीं पे.

मुंतज़िर हूँ  मैं
कि कभी ऐसा होगा.
मेरी बिखरी राख,
और वो टूटा घर
मिलेंगे,
बतियाएंगे,
मुझे याद करेंगे.
मेरा बचपन,
जवानी
और बुढ़ापा.

सुना है,
जर्मनी के दो धड़े
मिल एक हुए थे कभी.
मुझे यकीं है,
मिलेंगे कभी
मेरा टूटा घर और मेरी आँख.
और मैं न बचा तो,
मेरा टूटा घर और मेरी राख.

पार्टीशन कभी दिलों का नहीं हुआ.
ज़मीं का हुआ, जिसे खुदा  ने बख्शा,
सियासत का हुआ,
जिसे अकलमंदों ने चाहा.

मैंने और मेरे जैसों ने,
अपना मोहल्ला, अपना घर,
अपने लोग
जिनका मजहब से कोई वास्ता ही नहीं,
बस इतना ही चाहा था.

तुमने हमें निकाला
हमारे घर, हमारे मोहल्ले,
हमारे लोगों से,
हमनें उन्हें यादों में बसा लिया
एक यकीं लेकर-
कि मिलेंगे  कभी,
मेरा टूटा घर और मेरी आँख.
और मैं न बचा तो,
मेरा टूटा घर और मेरी राख.

मैंने कीमतों में इश्क़ चुकाया है.



कौन कहता है,
टूटा रिश्ता काम का नहीं होता.
वजहें नहीं ढूंढनी पड़ती कभी आंसू बहाने.
भूख भी भुला सकता हूँ,
इश्क़ की याद में.
...और तेरे जाने के बाद,
अब कोई बेवफा भी नहीं लगता.

कीमत चुकानी पड़ती है इश्क़ की.
हर अश्क़ की कीमत है,
मैंने कीमतों में इश्क़ चुकाया है.

Tuesday, January 14, 2014

वसीयत




वसीयत में लिख दो तुम,
दो किलो अचार माँ.
लिख देना अपनी गोद और मेरा सिर,
माथे पे दो चुम्बन और
चूल्हे से सीधे उतारे दो-चार फुल्के.

वसीयत में लिखना सारा वात्सल्य,
अगले जन्म का वादा....बस, इतना काफी है.

Sunday, January 12, 2014

रोज़गार




इक सवाल की तरह पनपी हो तुम
अब मुश्किल है कह पाना
कि रोटियों की तड़प ज्यादा है या तुम्हारी.

उफ़! रात की हथेली पे चाँद का रुपया
बरवस तुम्हें भुलाता है.
छू लूँ चाँद या तोड़ लूँ,
खरीद लूँ दो रोटियां
जिससे तुम्हें याद कर पाऊँ, भरपेट.

Saturday, January 4, 2014

Social discrimination




बीच का अंतर ढहा क्या?
दिल में जमा था, बहा क्या?

एक आईने में मैं,
एक आईने में तुम
एक जैसे अक्स पर
जो मैंने सहा,
तुमने सहा क्या?

हर रोज सुबह मद्धम है,
हर रात ज़रा ज्यादा काली.
मिट्टी के तुम
मिट्टी के हम
फूट तो बस पैसे ने डाली.
बीच का अंतर ढहा क्या?
जो मैंने सहा, तुमने सहा क्या?

मानव तुम, मानव हम,
खाते रोटी तुम, तो हम,
दो कपडे तुम्हें ज़रूरी,
बस दो ही पहने हम.
फिर भी, मन जैसा मेरा
तेरा वैसा रहा क्या?
पैसा-औकात के आगे
सोचने कुछ बचा क्या?
बीच का अंतर ढहा क्या?
जो मैंने सहा, तुमने सहा क्या?

Thursday, December 26, 2013

धम्मा...

1.


लोगों ने महावीर, बुद्ध के कहे को
सत्य माना,
उन्हें इंसान नहीं भगवान कहा.
उनके पत्थर के प्रतिमान बनाये,
फिर उनका कहा, उन्हीं पत्थरों में तज दिया.

मूर्तियां भगवान् बन गई,
...और महावीर, बुद्ध का कहा कहीं खो गया.

हम सिर्फ मूर्तिपूजक थे, मूर्तिपूजक ही रहे.



---

2.


धर्म बदले, भगवान बदले,
मूर्तियां बदलीं, पूजा के तरीके बदले,
बस हम नहीं बदले.

न महावीर का कहा माना,
न बुद्ध का कहा माना.
हमने बस धर्म बदले, हम नहीं बदले.

हम सिर्फ मूर्तिपूजक थे, मूर्तिपूजक ही रहे. 



Wednesday, December 25, 2013

क्यूंकि मरे हुए लोग फिर से नहीं मर सकते.




मैं चाहता हूँ
दफ़न कर दी जाएँ
चाँद की कसम ले के
कही गयीं तमाम बातें,
बेदखल कर दिए जाएँ
ईमानदारी से रिश्ते निभाते लोग.

हर रात कर  दी जाये अमावस और बुझा दिए जाएँ सारे तारे.
किसी करवट पे पड़े ख्वाब तोड़ दिए जाएँ,
निर्वासित कर दी जाएँ वो ऑंखें
जिन्हें देख,
ख़ुदा यहीं-कहीं नज़र आता था.

कठघरे में खड़ा कर देता हूँ,
कभी खुद को, कभी तुमको.
हर दफे तुम्हें देता हूँ सज़ा-ए-मौत.
फिर ज़िंदा ही दफ़न करता हूँ खुद को,
क्यूंकि मरे हुए लोग फिर से नहीं मर सकते.

Sunday, December 15, 2013

एक गांव, एक शहर

तुम्हारे शहर के किसी कोने में पड़ा है
मेरा गांव,
तुम्हारा शहर बढ़ता जा रहा है,
मेरा गांव खाता जा रहा है.

यकीनन जब गांव शहर बनते हैं,
अच्छा लगता है.
लेकिन गांव-सा अपनापन मरता है,
अंदर से आदमी कुछ-कुछ मर जाता है.

तुम्हारे इस शहर के कोने में,
मेरा गांव हुआ करता था कभी.
अब इसे भी
शहर कहते हैं....तुम्हारा शहर.

एक मरे गांव कि अस्थियां भी
विसर्जित करने नहीं मिली!
गांव मर गया....
शहर दो फलांग और बढ़ गया.

Monday, December 9, 2013

हम लड़ेंगे साथी / पाश




हम लड़ेंगे साथी,उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी,गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी,जिन्दगी के टुकड़े

हथौड़ा अब भी चलता है,उदास निहाई पर
हल अब भी बहते हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता,प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी

कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हम लड़ेगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले खुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखो वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने ही भाइयों का गला घोंटने को मजबूर हैं
कि दफ्तर के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर....
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है....
जब बन्दुक न हुई,तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई,लड़ने की लगन होगी
कहने का ढंग न हुआ,लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी....

हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी.....

- पाश (
Avtar Singh Sandhu)