यहां कविता उतनी ही कम है जितनी सांसों में शुद्ध वायु, रात में नींद, मुंह में राम वालों के हृदय में राम नाम का मर्म. और मेरे अंदर बचा रह गया तुम्हारे प्रति प्रेम.
यहां कविता नहीं है कुछ सच हैं, जो शब्दों में बदल जाते हैं. जैसा तुम्हारे स्पर्श से मैं बदल जाता था. जैसे सरकारी आंकड़ों में देश की तस्वीर बदल जाती है.
जितनी मेरे अंदर नहीं बची हो तुम, इसमें बस उतनी सी कविता है.
हरसूद की याद के नाले में पानी भर गया
जैसे रेवा ने जीवन लेना भी सीख लिया हो.
विस्थापन में शहर मर जाते हैं
यादें चिर जीवित बची रहती हैं.
दौलताबाद लोग दिल्ली साथ लेकर गए थे
मैं गांव साथ लेकर दिल्ली आया था.
पिता ने सपने देकर विदा किया
मैंने माँ से लेकर उसमें घी चुपड़ दिया.
वक़्त कितना अजीब है
कि काली रात के सफ़ेद चाँद में तुम्हारा चेहरा
धीरे-धीरे धुंधला रहा है
जैसे धुआं हो,
मध्धम ऊपर जा रहा है.
मैं धुएं संग उड़ तुम्हें चूमना चाहता हूँ
लेकिन विज्ञान कहता है
धुंआ चाँद तक नहीं पहुंच सकता.
आज को ऐसे जियो
कि टाइम-मशीन से भी
इसे बदलने जाने कि जरूरत न पड़े.
'नो रिग्रेटस!'
मैं आज में कफ़न बांध के चलना चाहता हूँ.
हरसूद में बांध ने कफ़न
बांध दिया था.
कफ़न के साथ बंधन नहीं खुल पाते.
वो गांव, हवा और लोग,
देसी घी संग चुपड़ा रखा एक सपना.
पेरिस कि गलियों में तुम्हें
मोम की पिघली दीवार मिलेगी
उसपर मेरा नाम उकेरना.
कफ़न ओढ़ने से पहले में आऊंगा
कफ़न लिए,
उन बारह लाशों पर रोने
जिन्हें ईश्वर ने गढ़ा था और ईश्वर के नाम पर मार दिया गया.
क्या उनके साथ उनकी भावनाएं भी मरी थीं?
वो अधूरे प्रेम,
अधूरे सपने,
जिनके लिए किसी रात
चाँद तक पहुंचने धुएं संग उड़ने की
उन्होंने कामनाएं की होंगी.
विज्ञान बीच में आ जाता है
विस्थापन बीच में आ जाता है
यथार्थ बीच में आ जाता है.
कहानी के हर किरदार के पात्र होते हैं
तुम्हारा किरदार ही पूरी कहानी है.
मैं नहीं कहूंगा की तुम लेफ्ट थे या समाजवादी
या तुम्हे कौन हाईजैक कर रहा है
मुझे तुम्हारी आइडियोलॉजी (विचारधरा) से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता
मुझे इस बात से फर्क पडता है
कि उम्र तेईस में तुममें राष्ट्र, आज़ादी और विचारधाराओं के प्रति
इतनी चेतना जागृत हो गई थी.
मैं तो स्व को ढूंढने में ही तेईस का हो गया था,
और अभी तक ढूंढ रहा हूँ.
जब आप महान को याद भी न कर सकें या उसका अवकाश ही आपके पास न रह जाए तो मान लेना चाहिए कि समय क्षुद्रता से आक्रांत हो चुका है. यही पिछले हफ्ते हुआ जब मुक्तिबोध की पुण्यतिथि गुजर गई और हम उन पर कायदे से बात भी न कर सके. लेकिन यह हफ्ता बेचैनी का था. मुक्तिबोध लेकिन शायद हमें माफ़ कर देंगे क्योंकि हमारा मन उनकी ही उज्जवल परंपरा की एक संवाहिका गौरी लंकेश की हत्या से क्षुब्ध, आलोड़ित था.
गौरी की हत्या के बाद अभिव्यक्ति की आजादी, विरोध के अधिकार के हनन के प्रश्न उठे. साथ ही हमने क्षुद्रता का नृत्य भी देखा, गाली-गलौज, गौरी और उनके मित्रों को लक्ष्य करके और जिस ढिठाई से उनकी हत्या का जो जश्न मनाया गया, उसने अनेक लोगों को स्तब्ध कर दिया.
यह था ‘खलई का हुलास.’ लेकिन खलता की पूरी विजय तब होती है जब समाज शुभ और सुंदर के साथ उदात्त का भी बोध खो बैठे. उदात्त के बिना मनुष्य का जीवित रहना असंभव है. खलता को स्वीकार कर लेना या उसका विरोध न कर पाना, यह मनुष्य को अपनी निगाह में छोटा बना देता है. उसकी भरपाई कुछ लोग उस खलता का औचित्य खोज कर, अपने मन को बहलाकर कर लेना चाहते हैं. लेकिन मन विद्रोह करता है. अपनी इस क्षुद्रता की सीमाबद्धता को तोड़ कर उदार के विस्तार में मिल जाना चाहता है.
गौरी लंकेश की ह्त्या के एक हफ्ते बाद ही बंगलुरु की सडकों पर जो जन क्षोभ का ज्वार उमड़ा, वह इस खोए हुए उदात्त को लेकर सामाजिक मन की तड़प की ही एक अभिव्यक्ति थी. कुछ समय पहले हिंसा के आगे जिस असहायता और बेबसी ने सबको छोटा बना दिया था, उसे जैसे एकबारगी ठोकर से उड़ा दिया गया.
महान या उदात्त क्षुद्रता के भीतर इतना हीनता बोध भर देता है, अनचाहे, कि वह हिंसा से भर उठती है. क्षुद्रता हर किसी को अपने सांचे में ढालना चाहती है और अपने स्तर पर खींच कर गिरा डालना चाहती है.
उदात्त का पतन समाज का नियम बन जाए तो फिर उसके पुनर्वास का संघर्ष भी कठिन हो जाता है. हालांकि वह उदात्त सबके भीतर है, कोई अपवाद नहीं है. लेकिन वह कुछ ऐसा है जो हमारी पहुंच में नहीं, कि हम उसके काबिल नहीं, ऐसा अकसर समाज के बहुलांश को समझा दिया जाता है. यह काम उन्हें काबू में करके किया जाता है जो उदात्त के उदाहरण हैं या हो सकते थे. यह आश्चर्य की बात न थी कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान कई लेखकों और कलाकारों को अपने घर चाय पर बुलाया. उनमें से अनेक गए भी जो हमारे आदर्श थे, जिन्हें देख कर हम महानता की कल्पना कर पाते थे. अज्ञेय ने इस पतन का हिस्सा होने से इनकार किया. भावी पीढ़ियां उनकी कृतज्ञ इस कारण भी हैं कि उन्होंने उदात्त के उदाहरण को भी जीवित रखा.
गोर्की जब तक लेनिन से सवाल करते रहे, उनका उदात्त स्वरूप सत्ता के लिए चुनौती बना रहा. लेनिन उन्हें सह न पाए तो सेहत सुधारने के बहाने इटली रवाना कर दिया. लेकिन गोर्की फिर लौटे अपने देश स्टालिन के दरबारी बन कर. और उनके साथी लेखकों और पाठकों का दिल बैठ गया. पास्तरनाक के उस दौर के संस्मरण में या बच्चों के लेखक चुकोव्स्की की डायरी में दर्दनाक ब्योरा मिलता है रूसी भाषा और साहित्य की प्रतिभाओं के आत्म हनन का.
कुछ वर्ष पहले जब हमने नंदीग्राम और सिंगूर की हत्याओं का समर्थन देखा अपने प्रिय बौद्धिकों के द्वारा तो तकलीफ इसकी हुई कि वे अपने सत्तासीन नेताओं का औचित्य साधन करते हुए अपनी बौद्धिकता की साख भी धूल में मिला रहे थे. बौद्धिकता सोचती है कि वह अपने बल पर किसी का औचित्य साबित कर देगी लेकिन इस क्रम में वह खुदकुशी कर बैठती है.
मुक्तिबोध की कविताओं में इस उदात्त को पालतू बनाने के अनेक चित्र हैं. ‘चुप रहो मुखे सब कहने दो’ कविता का आरंभ यों होता है:
‘गंदे थर साफ़ दीखते हैं
जिनमें डूबा
वह चांद थिरकता रहता है
धीरे-धीरे!!
आखिर यह क्यों, ऐसा क्यों है?
उज्ज्वल मन गहरे डूब रहे क्यों गटरों में?’
‘डबरे में सूरज’ के प्रसिद्ध बिंब के विरुद्ध मुक्तिबोध का यह बिंब है, गंदे पानी के थर में थिरकते हुए चांद का बिंब. यह दुःख भरा आश्चर्य कि उज्ज्वल मन गटर में डूबे गए.
दूसरा भीषण बिंब एक विशाल पर्वत का है जो कभी भी भूकंप नहीं कर सकता. वह एक भूतपूर्व ज्वालामुखी है जिसने अपनी विस्फोटक क्षमता को ही नष्ट कर डाला है. भ्रम भर रह गया है विशालता का क्योंकि वह खोखली है.
महानता के आत्म हनन का दृश्य लोमहर्षक है:
‘हैं बंधे खड़े,
ये महत्, बृहत्,
जिनके मुंह से प्रज्ज्वलित गैस-सी सांस-आग
वे इस जमीन में गड़े खड़े;
मशहूर करिश्मों वाले गहरे स्याह तिलस्मी तेज़ बैल
तगड़े तगड़े
अपने अपने खूंटों से सारे बंधे खड़े’
ये सब महान संभावनाओं से युक्त थे, प्रतिभा के स्वामी, लेकिन खुद को इन्होंने जिस खूंटे से बांध लिया है, वह स्वर्ण धातु का है,/ रत्नाभ दीप्ति का है,/ आत्मैक ज्योति का है,/ स्वार्थैक प्रीति का है.’, इसीलिए उन्होंने जो कुछ भी किया वह धूल बन गया. इस दुखदायी परिवर्तन को देखिए,
‘देदीप्यमान रेडियम मनोहर भावों का
क्रमशः काले जड़ सीसे में
परिवर्तित होता गया
कि वह प्रतिकूल बन गया
वे बड़े-बड़े पर्वत अंधियारे कुएं बन गये
जो कल कपिला गाय आज तेंदुए बन गए.
हाय हाय, यह श्याम कथानक है
आदमी बदल जाने की यह प्रक्रिया भयानक है.’
यह नाश अपना आदमी खुद ही करता है. जीने के नाम पर:
‘जीने के लिए, स्वयं से पृथक भिन्न होकर
तुमने किसी जिन्न की छोटी खटिया पर
अपने को उसकी बराबरी में करने
सही-सही लेटने
निज के ये ज़्यादा लंबे पैर
काट डाले
अपने ही ज्यादा लम्बे हाथ
छांट डाले.’
लेकिन यह सब होता है तो इसलिए कि कोई एक है ‘जिसके दासों के अनुदासों के उपदासों ने ही/ अपने दासों को उपदासों को अनुदासों को भी/ देश-देश में इस स्वदेश में, आसमान में भी/ मानव-मस्तक की राहों में छाहों के ज़रिये/ मनानुशासन, जीवन शोषण, समय-निरोधन के/ सब कार्यों में लगा दिया है सभी अनुचरों को.’
यह समझना आवश्यक है क्योंकि प्रायः इस शक्ति पर ध्यान केन्द्रित करने की जगह हम पदच्युत प्रतिभाओं पर ही निशाना साधने में ऊर्जा खर्च कर डालते हैं. और वह शक्ति मुस्कराती रहती है.
मनानुशासन, जीवन शोषण और समय-निरोधन, ध्यान देने योग्य शब्द हैं. यह जिनके माध्यम से किया जाता है वे बौद्धिक हैं लेकिन हैं ‘औचित्य-प्रदर्शक घोर दार्शनिक.’ ये खुद को निष्पक्ष विश्लेषक कहते हैं जो न्याय के पक्ष में खड़ा होना और अन्याय का विरोध करना, दोनों को ही बौद्धिकों के कामों में नहीं गिनते. उसे एक्टिविस्ट कहा जाता है कुछ मज़ाक उड़ाते हुए जो इसे शर्त बताता है.
मुक्तिबोध ऐसे विश्लेषकों से कहते हैं,
‘तुम खूब करो विश्लेषण जग का जीवन का
और डूब मरो
निःसंग बढी अंधियारे में चलती है
उसको चलने दो
और ऊब मरो .
तुम करो आत्म साक्षात्कार यह संभव है
पर, निज चरित्र-साक्षात्कार ही दुर्लभ है
चिंतन की शक्ति और चित्रण का शिल्प लिए
तुम खूब मरो.’
चिंतन की शक्ति हो या चित्रण का शिल्प, अगर वह न्याय बोध से खाली है तो व्यर्थ है. उसमें उदात्त की संभावना तो है लकिन वह चरितार्थ होगी इस न्याय बोध से संवलित होकर ही.
गौरी लंकेश इस न्याय बोध की मशाल थीं इसलिए बुझा दी गईं. लकिन फिर वह पूरे देश में और उसी बंगलुरु की सडकों पर हजार-हजार मशालों में जल उठीं. यह उदात्त पर साधारण का दावा है और आसानी से वह उसे छोड़ने वाला नहीं.
असंतोष, अलगाव, उपद्रव, आंदोलन, असमानता, असामंजस्य, अराजकता, आदर्श विहीनता, अन्याय, अत्याचार, अपमान, असफलता अवसाद, अस्थिरता, अनिश्चितता, संघर्ष, हिंसा… यही सब घेरे हुए है आज हमारे जीवन को.
व्यक्ति में एवं समाज में साम्प्रदायिकता, जातीयता, भाषावाद, क्षेत्रीयतावाद, हिंसा की संकीर्ण कुत्सित भावनाओं व समस्याओं के मूल में उत्तरदायी कारण है मनुष्य का नैतिक और चारित्रिक पतन अर्थात नैतिक मूल्यों का क्षय एवं अवमूल्यन.
नैतिकता का सम्बंध मानवीय अभिवृत्ति से है, इसलिए शिक्षा से इसका महत्त्वपूर्ण अभिन्न व अटूट सम्बंध है. कौशलों व दक्षताओं की अपेक्षा अभिवृत्ति-मूलक प्रवृत्तियों के विकास में पर्यावरणीय घटकों का विशेष योगदान होता है. यदि बच्चों के परिवेश में नैतिकता के तत्त्व पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं तो परिवेश में जिन तत्त्वों की प्रधानता होगी वे जीवन का अंश बन जायेंगे. इसीलिए कहा जाता है कि मूल्य पढ़ाये नहीं जाते, अधिग्रहीत किये जाते हैं.
देश की सबसे बड़ी शैक्षिक संस्था-राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के द्वारा उन मूल्यों की एक सूची तैयार की गयी है जो व्यक्ति में नैतिक मूल्यों के परिचायक हो सकते हैं. इस सूची में 84 मूल्यों को सम्मिलित किया गया है.
वास्तव में, नैतिक गुणों की कोई एक पूर्ण सूची तैयार नहीं की जा सकती, तथापि संक्षेप में हम इतना कह सकते हैं कि हम उन गुणों को नैतिक कह सकते हैं जो व्यक्ति के स्वयं के, सर्वांगीण विकास और कल्याण में योगदान देने के साथ-साथ किसी अन्य के विकास और कल्याण में किसी प्रकार की बाधा न पहुंचाए. विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि नैतिक मूल्यों की जननी नैतिकता सद्गुणों का समन्वय मात्र नहीं है, अपितु यह एक व्यापक गुण है जिसका प्रभाव मनुष्य के समस्त क्रिया- कलापों पर होता है और सम्पूर्ण व्यक्तित्व इससे प्रभावित होता है. वास्तव में नैतिक मूल्य/नैतिकता आचरण की संहिता है. हमें इस बात को भली भांति समझना होगा कि नैतिक मूल्य नितांत वैयक्तिक होते हैं. अपने प्रस्फुटन उन्नयन व क्रियान्वय से यह क्रमशः अंतयक्तिक/सामाजिक व सार्वभौमिक होते जाते हैं.
एक ही समाज में विभिन्न कालों में नैतिक संहिता भी बदल जाती है. नैतिकता/नैतिक मूल्य वास्तव में ऐसी सामाजिक अवधारणा है जिसका मूल्यांकन किया जा सकता है. यह कर्तव्य की आंतरिक भावना है और उन आचरण के प्रतिमानों का समन्वित रूप है जिसके आधार पर सत्य असत्य, अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित का निर्णय किया जा सकता है और यह विवेक के बल से संचालित होती है.
आधुनिक जीवन में नैतिक मूल्यों की आवश्यकता, महत्त्व अनिवार्यता व अपरिहार्यता को इस बात से सरलता व संक्षिप्ता में समझा जा सकता है कि संसार के दार्शनिकों, समाजशात्रियों, मनोवैज्ञानिकों शिक्षा शात्रियों, नीति शात्रियों ने नैतिकता को मानव के लिए एक आवश्यक गुण माना है.
खेद का विषय है कि हमारी शिक्षा केवल बौद्धिक विकास पर ध्यान देती है. हमारी शिक्षा शिक्षार्थी में बोध जाग्रत नहीं करती वह जिज्ञासा नहीं जगाती जो स्वयं सत्य को खोजने के लिए प्रेरित करे और आत्मज्ञान की ओर ले जाये, सही शिक्षा वही हो सकती है जो शिक्षार्थी में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को विकसित कर सके.
नैतिकता मनुष्य के सम्यक जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है. इसके अभाव में मानव का सामूहिक जीवन कठिन हो जाता है. नैतिकता से उत्पन्न नैतिक मूल्य मानव की ही विशेषता है. नैतिक मूल्य ही व्यक्ति को मानव होने की श्रेणी प्रदान करते हैं. इनके आधार पर ही मनुष्य सामाजिक जानवर से ऊपर उठ कर नैतिक अथवा मानवीय प्राणी कहलाता है. अच्छा-बुरा, सही गलत के मापदण्ड पर ही व्यक्ति, वस्तु, व्यवहार व घटना की परख की जाती है. ये मानदंड ही मूल्य कहलाते हैं. और भारतीय परम्परा में ये मूल्य ही धर्म कहलाता है अर्थात ‘धर्म’ उन शाश्वत मूल्यों का नाम है जिनकी मन, वचन, कर्म की सत्य अभिव्यक्ति से ही मनुष्य मनुष्य कहलाता है अन्यथा उसमें और पशु में भला क्या अंतर? धर्म का अभिप्राय है मानवोचित आचरण संहिता. यह आचरण संहिता ही नैतिकता है और इस नैतिकता के मापदंड ही नैतिक मूल्य हैं. नैतिक मूल्यों के अभाव में कोई भी व्यक्ति, समाज या देश निश्चित रूप से पतनोन्मुख हो जायेगा. नैतिक मूल्य मनुष्य के विवेक में स्थित, आंतरिक व अंतः र्स्फूत तत्त्व हैं जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में आधार का कार्य करते हैं,
नैतिक मूल्यों का विस्तार व्यक्ति से विश्व तक, जीवन के सभी क्षेत्रों में होता है. व्यक्ति-परिवार, समुदाय, समाज, राष्ट्र से मानवता तक नैतिक मूल्यों की यात्रा होती है. नैतिक मूल्यों के महत्त्व को व्यक्ति समाज राष्ट्र व विश्व की दृष्टियों से देखा समझा जा सकता है. समाजिक जीवन में तेज़ी से हो रहे परिवर्तन के कारण उत्पन्न समस्याओं की चुनौतियों से निपटने के लिए और नवीन व प्राचीन के मध्य स्वस्थ अंतः क्रिया को सम्भव बनाने में नैतिक मूल्य सेतु-हेतु का कार्य करते हैं. नैतिक मूल्यों के कारण ही समाज में संगठनकारी शक्तियां व प्रक्रिया गति पाती हैं और विघटनकारी शक्तियों का क्षय होता है.
नैतिकता समाज सामाजिक जीवन के सुगम बनाती है और समाज में अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रखती है. समाज राष्ट्र में एकीकरण और अस्मिता की रक्षा नैतिकता के अभाव में नहीं हो सकती है. विश्व बंधुत्व की भावना, मानवतावाद, समता भाव, प्रेम और त्याग जैसे नैतिक गुणों के अभाव में विश्व शांति, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, मैत्री आदि की कल्पना भी नहीं की जा सकती.
तीन हृदयाघात के कारण लुई वाश्कान्स्की का हृदय बहुत कमज़ोर हो चला था। मधुमेह उन्हें पहले से था। शरीर में रक्त को पम्प करने में अक्षम उस बीमार दिल के साथ उसे बहुत लम्बा नहीं चलना था कि तभी उसके जीवन में डेनीज़ डारवाल की मृत्यु का प्रवेश हुआ। डेनीज़ की मृत्यु एक कार-दुर्घटना में हुई थी। शराब के नशे में धुत एक कार-ड्राइवर ने उनके और उनकी माँ को रौंद डाला था। माँ की तुरन्त मृत्यु हो गयी थी और डेनीज़ का मस्तिष्क भी रक्त के अभाव में मृत हो गया था। यद्यपि उनका हृदय तब भी लगातार धड़क रहा था। उसी रात नौ बजे डॉक्टरों ने उन्हें बचाने के सारे उद्यम रोक दिये क्योंकि ऐसा करने के बाद भी मृत मस्तिष्क के साथ जीवन आगे सम्भव न था। डेनीज़ के पिता एडवर्ड से सम्पर्क स्थापित किया गया। उन्हें बताया गया कि उनकी पुत्री को वापस जीवित लाना अब सम्भव नहीं है। जीवन का अर्थ चेतना होता है। चेतना मस्तिष्क में अधिष्ठित है। मस्तिष्क रक्त न मिलने से मिनटों में मर जाता है। डेनीज़ मस्तिष्क-मृत यानी ब्रेन-डेड है। लेकिन एक काम क्या वे करना चाहेंगे ? क्या वे अपनी प्यारी बिटिया का हृदय बीमार लुई वाश्कान्स्की नामक एक अधेड़ व्यक्ति को दान में देना चाहेंगे ? अपनी बिटिया का मुस्कुराता चेहरा एडवर्ड के सामने तैरने लगा। कैसे उसने उसके लिए केक बेक किया था। नयी नौकरी की पहली तनख़्वाह और उसने अपने पापा के लिए बाथरोब ख़रीदा था। एडवर्ड अपने आँसू न रोक सके। महज़ चार मिनटों में उन्होंने यह निर्णय ले लिया था कि वे अपनी प्यारी बिटिया का हृदय इस अधेड़ आदमी के जीवन के लिए दान कर देंगे जिसे वे जानते तक नहीं हैं। दक्षिण अफ़्रीका में उस दिन डॉ.क्रिश्चियन बर्नार्ड ने मनुष्य से मनुष्य में वह पहला सफल हृदय-प्रत्यारोपण किया। डेनीज़ का हृदय लुई वाश्कान्स्की के सीने में रुकने से पहले अठारह दिन धड़का। डेनीज़ के वृक्क एक दस साल के अश्वेत बच्चे जॉनेथन वॉन विक को लगाये गये। हंगामा मचा : कैसे किसी श्वेत महिला के गुर्दे किसी अश्वेत को दिये जा सकते हैं ! पच्चीस वर्षीय डेनीज़ मरकर इतिहास रच गयी थीं। अपने देह के दो अंगों के दान से उसने लिंगभेद और नस्लभेद , दोनों को अपनी भाषा में सटीक प्रत्युत्तर दिया था। कई बार मृत्यु का शाश्वत मौन वह कर जाता है जो सम्पूर्ण जीवन शब्द-व्यापार करके भी नहीं कर पाता।
पाँच लोग परस्पर स्नेह पीकर अमर हो गये उस रोज़ : डेनीज़ डारवाल, डॉ.क्रिश्चियन बर्नार्ड , एडवर्ड डारवाल, लुई वाश्कान्स्की और जॉनेथन वॉन विक।
( आगामी पुस्तक 'यदा यदा हि स्वास्थ्यस्य' से एक अंश। चित्र इण्टरनेट से साभार। )
पिछले लेख में हमने हिंदी और हिंदी की दुर्दशा को ले के लेखकों, लेखक गुटों और सरकारी रवैये की बात की थी. लेकिन हिंदी की दशा के लिए सिर्फ यही लोग जिम्मेवार नहीं हैं. सच तो ये है कि अख़बारों, प्रकाशकों और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के रवैये ने भी इसमें कम योगदान नहीं दिया है.
आप हिंदी के किसी भी मुख्य पत्र को उठा लीजिये. पहला तो आर्थिक, सामाजार्थिक, राजनैतिक और भू-सामरिक मुद्दों पे कोई ढंग का विश्लेषण नहीं मिलेगा और मिलेगा भी तो उस स्तर का नहीं जो मिंट, द हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस जैसे अंग्रेजी के अख़बारों में मिलता है. इसलिए मेरे जैसे द्विभाषी व्यक्ति स्वतः अंग्रेजी की और आकर्षित होते हैं.
दूसरा, उदाहरण के लिए दैनिक भास्कर जैसे अख़बार की कोई सी भी एक खबर उठा लीजिये. एक शीर्षक देखिये- ' बेस्ट रायटर नहीं बेस्ट सेलिंग रायटर हूँ लकली.' इसमें हिंदी को देखो, कितनी है?
असल में समाचारपत्र ही तो भाषा प्रसार का प्रमुख कारक होते हैं और देखा जाये तो उनसे ही भाषा में परिवर्तन आते हैं. लेकिन ऐसे परिवर्तन!! हिंदी में ऐसे परिवर्तनों से तो अच्छा है कि परिवर्तन ही न आएं.
[ हिंदी पत्रकारिता का एक अन्य नमूना दूसरी कतरन में. ]
प्रकाशकों ने लेखन को कभी फायदे का सौदा नहीं बनने दिया. मुनव्वर राणा ने एक बार कहा था कि हिंदी के सारे प्रकाशक बेईमान हैं. उनका कहा गलत भी मान लिया जाये तो भी अगर मुक्तिबोध की ही बात करें तो वो जीते जी कभी प्रकाशित लेखक नहीं हो पाए. पहली किताब मृत्यु के बाद आई. हमेशा दरिद्रता से घिरे रहे. वैसे पहली बार प्रकाशित होने के लिए लेखक को पैसे देने होते हैं, ये बात किसी से छिपी नहीं है. किताब से हुई आय का एक छोटा हिस्सा ही लेखक को मिलता है.
हिंदी की दशा का कारण उसे राष्ट्रीय भाषा बनाने की झक भी है. मुग़ल काल में फ़ारसी राज्य की भाषा थी. आज देखने को नहीं मिलती, क्यूंकि कोई भी भाषा थोप कर राष्ट्रीय भाषा का दर्ज़ा अभी प्राप्त नहीं करती. असल में न तो हम अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के शब्द लेना चाहते हैं. हमपे 'शुद्धिकरण' हावी है. न देशज शब्दों को हिंदी के अंतर्गत दर्ज़ा देना चाहते हैं. फिर उसके भी बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते हैं.
अगर हिंदी को अपने हाल पर छोड़ दें तो शायद वो ज्यादा पनपती, क्यूंकि उसका विरोध जिस तरह से अभी तमिलनाडु और कर्नाटक में हो रहा है वैसा नहीं होता. जबरन किया गया प्रसार विरोध ही ले के आता है.
भारत की कोई आधिकारिक राष्ट्रभाषा नहीं है और संविधान में उल्लिखित 'सरकार हिंदी का प्रचार-प्रसार करेगी' को भी हमें हटा देना चाहिए. ये न सिर्फ हिंदी बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिए भी अच्छा ही होगा.
'हिंदी दिवस' की शुभकामनाएं. वैसे ये औपचारिकता भी हिंदी की दुर्दशा स्वतः व्यक्त करती है.
[ फोटो आशीष चौधरी जी और बीएस पाब्ला जी की फेसबुक टाइमलाइन से ]