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Friday, November 10, 2017

इस्राइल अब एक सच्चाई है लेकिन हम फिलिस्तीन को भी कैसे भूल सकते हैं! | अपूर्वानंद

दो नवंबर एक और वर्षगांठ का दिन था. लेकिन अपने आप में डूबे और खुद से जूझ रहे भारतवासियों को उसकी सुध न रहना स्वाभाविक ही था. सौ साल पहले ब्रिटेन के विदेश सचिव आर्थर जेम्स बेल्फर ने लार्ड रोथ्सचाइल्ड को एक ख़त लिखा. इस खत ने अरब का और खासकर फिलिस्तीन का नक्शा बदल दिया. यह ख़त आज लाखों फिलिस्तीनियों की ज़लावतनी के लिए जवाबदेह है और कई और लाख फिलिस्तीनियों पर इस्राइल के द्वारा हो रह जुल्म के लिए भी जिम्मेवार है.
बेल्फर ने इस ख़त में लिखा कि हिज मेजेस्टी की सरकार फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक राष्ट्रीय निवास के पक्ष में है और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगी. हालांकि इसमें यह भी कहा गया कि ऐसा करते हुए इसका ख्याल रखा जाएगा कि फिलिस्तीन में रहने वाले गैर यहूदियों के नागरिक और धार्मिक अधिकारों को कोई नुकसान न पहुंचे और दूसरे मुल्कों में रह रहे यहूदियों के अधिकारों और राजनीतिक अवस्था पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.
यह ज़िओनवादियों (फिलिस्तीन में इस्राइल बनाने के लिए आंदोलन चलाने वाले) को ब्रिटेन का खुला समर्थन था. इस ख़त के चार दशक बाद फिलस्तीन पर ‘नकबा’ या कहर टूटा जिसने उन्हें अपने ही वतन में बेगाना बना दिया और वहां इस्राइल नामक राष्ट्र का निर्माण हुआ. उस समय से आज तक फिलिस्तीनी अपनी ही ज़मीन पर एक स्वायत्त राष्ट्र की तरह रहने के हक के लिए लड़े आ रहे हैं लेकिन इस्राइल लगातार उन्हें पश्चिमी तट से भी बेदखल करता जा रहा है.
यहूदियों और इस्राइल का मानना है कि बेल्फर के इस पत्र ने सिर्फ उनके उस अधिकार को स्वीकार किया जो इस भूमि पर हजारों वर्षों से उनका रहा है क्योंकि यह उनकी पवित्र भूमि है.
इस गुजरे दो नवंबर को इस्राइल के प्रधानमंत्री ब्रिटेन पहुंचे और इस ख़त की शताब्दी का जश्न मनाया गया. क्यों न हो, क्योंकि इस ख़त के बिना इस्राइल का वजूद शायद मुमकिन न होता. लेकिन दूसरी तरफ फिलिस्तीनियों ने मांग की है कि ब्रिटेन इस ख़त के चलते ही उन पर जो ज़ुल्म फिछले सत्तर बरस से होता आ रहा है, उसके गुनाह में शरीक ठहरता है. और इसके लिए उसे माफी मांगनी चाहिए.
ब्रिटेन में भी बेल्फर के इस ख़त के खिलाफ एक जनमत है. लेकिन ब्रिटेन में इस्राइल के राजदूत कहना है कि जो भी बेल्फर के इस ख़त की आलोचना करता है वह इन्तिहापसंद है, दूसरे शब्दों में दहशतगर्द है. उनका कहना है कि इस ख़त के विरोध का अर्थ है यहूदियों के राष्ट्रीय निवास का विरोध जिसका सीधा मतलब है इस्राइल के अस्तित्व को अमान्य करना. उन्होंने चेतावनी दी कि यही रुख इरान का और हेज्बुल्लाह का भी है.
ब्रिटेन में ही ब्रिटेन के नागरिकों के खिलाफ इस तरह की जुबान के इस्तेमाल पर ब्रिटिश सरकार ने खामोशी साध ली. पत्रकार रॉबर्ट फिस्क ने अपनी सरकार की खामोशी को शर्मनाक बताते हुए कहा कि इस्राइली राजदूत के मुताबिक़ जो भी बेल्फर के इस पत्र का आलोचक है, वह आतंकवादी, यहूदी-विरोधी या नाजी मान लिया जाना चाहिए और उसे हमास का समर्थक घोषित कर दिया जाना चाहिए.
फिस्क ने याद दिलाया की इस पत्र में एक धोखाधड़ी है और वह यह कि यह यहूदियों के राष्ट्रीय निवास की तो बात करता है लेकिन उस वक्त 60000 यहूदियों के मुकाबले 700000 अरब लोगों के राष्ट्र के अधिकार की कोई चर्चा नहीं करता. वे ध्यान दिलाते हैं कि जहां यहूदी लफ्ज़ का इस्तेमाल है, वहीं न तो अरब और न मुसलमान शब्द का कोई उल्लेख इस पत्र में है. उन्हें सिर्फ ‘पहले से मौजूद समुदाय’ कहकर निपटा दिया गया है.
फिस्क पूछते हैं कि क्या यह बेईमानी न थी कि एक तरफ तो ब्रिटेन अपनी ज़मीन से दूर फिलस्तीन में यहूदियों के राष्ट्र की बात कर रहा था, दूसरी ओर खुद रूस और पूर्वी यूरोप से ब्रिटेन में यहूदियों के आने पर पाबंदी लगाने वाला क़ानून बना रहा था ! क्या बेल्फर यह चाहते थे कि ठन्डे और उदास ब्रिटेन की जगह यहूदी गर्म और उजले अरब प्रदेश का आनंद लें!
क्या यह भी सच नहीं कि हिटलर के कहर से बचकर भाग रहे यहूदियों को पनाह देने की उदारता ब्रिटेन ने न दिखाई, बल्कि उनसे पिंड छुड़ाने के लिए उन्हें फिलस्तीन का रास्ता दिखाया?
क्या यह भी सच नहीं कि पारंपरिक रूप से अरब मुसलमान और यहूदी फिलिस्तीन में शांति से रहते आए थे और अरब मुसलमानों ने उन्हें कभी बेदखल करने की कोशिश नहीं की थी. लेकिन यहूदियों ने अरब मुसलमानों की ज़मीन हड़प कर उन्हें खदेड़ने के लिए क्रूरता और हिंसा का लगातार सहारा लिया?
इस्राइल का यह ख्याल है कि फिलिस्तीनी उसके अस्त्तित्व को मिटा देना चाहते हैं और इसलिए आत्मरक्षा में उसे पहले से हमलावर कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है. अमरीका के खुले समर्थन के चलते अब तक सीनाजोरी के साथ वह फिलिस्तीनियों की ज़मीन पर कब्जा करता जा रहा है. बावजूद अंतर्राष्ट्रीय जनमत के इसके खिलाफ होने के वह ढिठाई से गाजा पट्टी या पश्चिमी तट पर नई-नई यहूदी बस्तियां बसाता जा रहा है. गाजा पट्टी में रह रहे फिलस्तीनी दूसरे दर्जे के इंसानों की तरह किसी तरह अपनी ज़िंदगी बसर कर रहे हैं. लेकिन इस्राइल से दोस्ती करने को बेताब मुल्क अब उनकी चीख या कराह सुनना नहीं चाहते.
इस्राइल एक अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त राष्ट्र है और उसे नक़्शे से मिटाना मुमकिन नहीं. लेकिन वह खुद एक दूसरे राष्ट्र का एक-एक चिह्न मिटाने की जो बेरहमी कर रहा है, क्या वह उसे कभी चैन से बैठने देगी? वह हमेशा ही एक जंग की हालत में रहने को मजबूर है और यह उसने खुद पर ओढ़ा है.
बेल्फर के ऐलान की शतवार्षिकी के मौके पर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री ने कहा कि इस ऐलान पर हमें गर्व करना चाहिए. इसके जवाब में फिलिस्तीनी राजनेता हनान अशरावी ने ठीक ही लिखा कि यह ऐलान एक औपनिवेशिक अहंकार का नमूना है जो हजारों मील दूर की भूमि और उस पर रहे लोगों के भाग्य का फैसला करने का अधिकार खुद अपने पास रखता है. इस ऐलान ने यहूदियों के अलावा, जो उस वक्त सिर्फ 11फीसदी थे और जिनकी ज़मीन की मिलकियत 1947 तक सिर्फ सात फीसदी थी, वहां रह रहे मुसलमानों और ईसाईयों को गैर-यहूदी कहकर दूसरे दर्जे पर ढकेल दिया.
बेल्फर के पत्र या ऐलान का विरोध भारत को भी करना ही चाहिए क्योंकि हम उसी ब्रिटिश औपनिवेशिक अहंकार का शिकार रहे हैं, जो फिलिस्तीनियों की विपदा का कारण है. लेकिन आज हम फिलिस्तीन की आज़ादी की चाहत को भूल गए, उसे देखना नहीं चाहते और हथियारबंद इस्राइल के साथ मुस्कराते हुए तस्वीर खिंचाने को बेताब हैं!

Friday, September 22, 2017

न्यायबोध के बिना बौद्धिकता या तो व्यर्थ है या सिर्फ उनके काम की जो न्याय में भरोसा नहीं रखते | अपूर्वानंद



जब आप महान को याद भी न कर सकें या उसका अवकाश ही आपके पास न रह जाए तो मान लेना चाहिए कि समय क्षुद्रता से आक्रांत हो चुका है. यही पिछले हफ्ते हुआ जब मुक्तिबोध की पुण्यतिथि गुजर गई और हम उन पर कायदे से बात भी न कर सके. लेकिन यह हफ्ता बेचैनी का था. मुक्तिबोध लेकिन शायद हमें माफ़ कर देंगे क्योंकि हमारा मन उनकी ही उज्जवल परंपरा की एक संवाहिका गौरी लंकेश की हत्या से क्षुब्ध, आलोड़ित था.
गौरी की हत्या के बाद अभिव्यक्ति की आजादी, विरोध के अधिकार के हनन के प्रश्न उठे. साथ ही हमने क्षुद्रता का नृत्य भी देखा, गाली-गलौज, गौरी और उनके मित्रों को लक्ष्य करके और जिस ढिठाई से उनकी हत्या का जो जश्न मनाया गया, उसने अनेक लोगों को स्तब्ध कर दिया.



यह था ‘खलई का हुलास.’ लेकिन खलता की पूरी विजय तब होती है जब समाज शुभ और सुंदर के साथ उदात्त का भी बोध खो बैठे. उदात्त के बिना मनुष्य का जीवित रहना असंभव है. खलता को स्वीकार कर लेना या उसका विरोध न कर पाना, यह मनुष्य को अपनी निगाह में छोटा बना देता है. उसकी भरपाई कुछ लोग उस खलता का औचित्य खोज कर, अपने मन को बहलाकर कर लेना चाहते हैं. लेकिन मन विद्रोह करता है. अपनी इस क्षुद्रता की सीमाबद्धता को तोड़ कर उदार के विस्तार में मिल जाना चाहता है.
गौरी लंकेश की ह्त्या के एक हफ्ते बाद ही बंगलुरु की सडकों पर जो जन क्षोभ का ज्वार उमड़ा, वह इस खोए हुए उदात्त को लेकर सामाजिक मन की तड़प की ही एक अभिव्यक्ति थी. कुछ समय पहले हिंसा के आगे जिस असहायता और बेबसी ने सबको छोटा बना दिया था, उसे जैसे एकबारगी ठोकर से उड़ा दिया गया.
महान या उदात्त क्षुद्रता के भीतर इतना हीनता बोध भर देता है, अनचाहे, कि वह हिंसा से भर उठती है. क्षुद्रता हर किसी को अपने सांचे में ढालना चाहती है और अपने स्तर पर खींच कर गिरा डालना चाहती है.
उदात्त का पतन समाज का नियम बन जाए तो फिर उसके पुनर्वास का संघर्ष भी कठिन हो जाता है. हालांकि वह उदात्त सबके भीतर है, कोई अपवाद नहीं है. लेकिन वह कुछ ऐसा है जो हमारी पहुंच में नहीं, कि हम उसके काबिल नहीं, ऐसा अकसर समाज के बहुलांश को समझा दिया जाता है. यह काम उन्हें काबू में करके किया जाता है जो उदात्त के उदाहरण हैं या हो सकते थे. यह आश्चर्य की बात न थी कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान कई लेखकों और कलाकारों को अपने घर चाय पर बुलाया. उनमें से अनेक गए भी जो हमारे आदर्श थे, जिन्हें देख कर हम महानता की कल्पना कर पाते थे. अज्ञेय ने इस पतन का हिस्सा होने से इनकार किया. भावी पीढ़ियां उनकी कृतज्ञ इस कारण भी हैं कि उन्होंने उदात्त के उदाहरण को भी जीवित रखा.
गोर्की जब तक लेनिन से सवाल करते रहे, उनका उदात्त स्वरूप सत्ता के लिए चुनौती बना रहा. लेनिन उन्हें सह न पाए तो सेहत सुधारने के बहाने इटली रवाना कर दिया. लेकिन गोर्की फिर लौटे अपने देश स्टालिन के दरबारी बन कर. और उनके साथी लेखकों और पाठकों का दिल बैठ गया. पास्तरनाक के उस दौर के संस्मरण में या बच्चों के लेखक चुकोव्स्की की डायरी में दर्दनाक ब्योरा मिलता है रूसी भाषा और साहित्य की प्रतिभाओं के आत्म हनन का.
कुछ वर्ष पहले जब हमने नंदीग्राम और सिंगूर की हत्याओं का समर्थन देखा अपने प्रिय बौद्धिकों के द्वारा तो तकलीफ इसकी हुई कि वे अपने सत्तासीन नेताओं का औचित्य साधन करते हुए अपनी बौद्धिकता की साख भी धूल में मिला रहे थे. बौद्धिकता सोचती है कि वह अपने बल पर किसी का औचित्य साबित कर देगी लेकिन इस क्रम में वह खुदकुशी कर बैठती है.
मुक्तिबोध की कविताओं में इस उदात्त को पालतू बनाने के अनेक चित्र हैं. ‘चुप रहो मुखे सब कहने दो’ कविता का आरंभ यों होता है:
‘गंदे थर साफ़ दीखते हैं
जिनमें डूबा
वह चांद थिरकता रहता है
धीरे-धीरे!!
आखिर यह क्यों, ऐसा क्यों है?
उज्ज्वल मन गहरे डूब रहे क्यों गटरों में?’
‘डबरे में सूरज’ के प्रसिद्ध बिंब के विरुद्ध मुक्तिबोध का यह बिंब है, गंदे पानी के थर में थिरकते हुए चांद का बिंब. यह दुःख भरा आश्चर्य कि उज्ज्वल मन गटर में डूबे गए.
दूसरा भीषण बिंब एक विशाल पर्वत का है जो कभी भी भूकंप नहीं कर सकता. वह एक भूतपूर्व ज्वालामुखी है जिसने अपनी विस्फोटक क्षमता को ही नष्ट कर डाला है. भ्रम भर रह गया है विशालता का क्योंकि वह खोखली है.
महानता के आत्म हनन का दृश्य लोमहर्षक है:
‘हैं बंधे खड़े,
ये महत्, बृहत्,
जिनके मुंह से प्रज्ज्वलित गैस-सी सांस-आग
वे इस जमीन में गड़े खड़े;
मशहूर करिश्मों वाले गहरे स्याह तिलस्मी तेज़ बैल
तगड़े तगड़े
अपने अपने खूंटों से सारे बंधे खड़े’
ये सब महान संभावनाओं से युक्त थे, प्रतिभा के स्वामी, लेकिन खुद को इन्होंने जिस खूंटे से बांध लिया है, वह स्वर्ण धातु का है,/ रत्नाभ दीप्ति का है,/ आत्मैक ज्योति का है,/ स्वार्थैक प्रीति का है.’, इसीलिए उन्होंने जो कुछ भी किया वह धूल बन गया. इस दुखदायी परिवर्तन को देखिए,
‘देदीप्यमान रेडियम मनोहर भावों का
क्रमशः काले जड़ सीसे में
परिवर्तित होता गया
कि वह प्रतिकूल बन गया
वे बड़े-बड़े पर्वत अंधियारे कुएं बन गये
जो कल कपिला गाय आज तेंदुए बन गए.
हाय हाय, यह श्याम कथानक है
आदमी बदल जाने की यह प्रक्रिया भयानक है.’
यह नाश अपना आदमी खुद ही करता है. जीने के नाम पर:
‘जीने के लिए, स्वयं से पृथक भिन्न होकर
तुमने किसी जिन्न की छोटी खटिया पर
अपने को उसकी बराबरी में करने
सही-सही लेटने
निज के ये ज़्यादा लंबे पैर
काट डाले
अपने ही ज्यादा लम्बे हाथ
छांट डाले.’
लेकिन यह सब होता है तो इसलिए कि कोई एक है ‘जिसके दासों के अनुदासों के उपदासों ने ही/ अपने दासों को उपदासों को अनुदासों को भी/ देश-देश में इस स्वदेश में, आसमान में भी/ मानव-मस्तक की राहों में छाहों के ज़रिये/ मनानुशासन, जीवन शोषण, समय-निरोधन के/ सब कार्यों में लगा दिया है सभी अनुचरों को.’
यह समझना आवश्यक है क्योंकि प्रायः इस शक्ति पर ध्यान केन्द्रित करने की जगह हम पदच्युत प्रतिभाओं पर ही निशाना साधने में ऊर्जा खर्च कर डालते हैं. और वह शक्ति मुस्कराती रहती है.
मनानुशासन, जीवन शोषण और समय-निरोधन, ध्यान देने योग्य शब्द हैं. यह जिनके माध्यम से किया जाता है वे बौद्धिक हैं लेकिन हैं ‘औचित्य-प्रदर्शक घोर दार्शनिक.’ ये खुद को निष्पक्ष विश्लेषक कहते हैं जो न्याय के पक्ष में खड़ा होना और अन्याय का विरोध करना, दोनों को ही बौद्धिकों के कामों में नहीं गिनते. उसे एक्टिविस्ट कहा जाता है कुछ मज़ाक उड़ाते हुए जो इसे शर्त बताता है.
मुक्तिबोध ऐसे विश्लेषकों से कहते हैं,
‘तुम खूब करो विश्लेषण जग का जीवन का
और डूब मरो
निःसंग बढी अंधियारे में चलती है
उसको चलने दो
और ऊब मरो .
तुम करो आत्म साक्षात्कार यह संभव है
पर, निज चरित्र-साक्षात्कार ही दुर्लभ है
चिंतन की शक्ति और चित्रण का शिल्प लिए
तुम खूब मरो.’
चिंतन की शक्ति हो या चित्रण का शिल्प, अगर वह न्याय बोध से खाली है तो व्यर्थ है. उसमें उदात्त की संभावना तो है लकिन वह चरितार्थ होगी इस न्याय बोध से संवलित होकर ही.
गौरी लंकेश इस न्याय बोध की मशाल थीं इसलिए बुझा दी गईं. लकिन फिर वह पूरे देश में और उसी बंगलुरु की सडकों पर हजार-हजार मशालों में जल उठीं. यह उदात्त पर साधारण का दावा है और आसानी से वह उसे छोड़ने वाला नहीं.

Sunday, September 10, 2017

हम शिक्षक को किनारे कर शिक्षण चाहेंगे तो शिक्षा का बंटाढार तो होगा ही | अपूर्वानंद

बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि शिक्षक बहुत कम काम करते हैं. हफ्ते में दस या बारह कक्षा उनके हिसाब से मज़ाक हैं. जैसे वे वैसे ही सरकारें शिक्षकों के सिर्फ दस-बारह कक्षाओं के काम को देखते हुए उनकी तनख्वाह का कोई तर्क समझ नहीं पातीं. ऊपर से दो महीने की गर्मियों की छुट्टियां शिक्षकों से और भी जलन का कारण बन जाती हैं. वैसे, छुट्टियों के दौरान जब कक्षाएं बंद हो जाती हैं, अध्यापकों को आराम रहता हो, ऐसा नहीं. परीक्षा समाप्त होने के बाद उत्तर पुस्तिकाओं की जांच से लेकर नए सत्र के लिए दाखिलों में वे किसी न किसी में व्यस्त ही रहते हैं. इसलिए दो महीने का अवकाश एक मिथ है.
पढ़ाई या कक्षा को लेकर एक प्रकार की मूढ़ समझ नेताओं और नौकरशाहों में पाई जाती है. मसलन कई लोग कहते मिल जाएंगे कि एक विभाग में क्या ज़रूरी है कि दस बीस अध्यापक हों. क्यों नहीं एक ही अध्यापक दिन में चार कक्षाएं ले सकता. विशेषज्ञता का तर्क उन्हें नकली और बकवास लगता है.
विश्वविद्यालयों में इतने किस्म के दफ्तरी काम हैं जो अब शिक्षकों के हवाले कर दिए गए हैं. सचिव स्तर की सहायता कम से कम की जा रही है. इस वजह से आपको अध्यापक वे काम करते मिल जाएंगे जो पहले कार्यालय में सचिव किया करते थे.
भारत में अध्यापकों के काम को ठीक तरीके से समझा नहीं गया है. इसलिए केंद्रीय संस्थाओं को यदि छोड़ दें तो राज्यों में अवकाश में लगातार कटौती और तनख्वाह पर सरकारी निगाह की सख्ती बढ़ती चली जाती है. प्रायः राज्य सरकारें उन्हें सरकारी कर्मचारियों के बराबर वेतन के लायक नहीं मानतीं. बहुत रो-धोकर और हील-हुज्जत के बाद वे केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों को उनके लिए लागू करने पर तैयार हो पाती हैं.
शिक्षक को एक कक्षा के लिए चार से छ घंटे की तैयारी चाहिए और एक बार की तैयारी काफी नहीं, यह समझाना भी कठिन है. बाहर के अध्यापक यह सुनकर हैरान हो जाते हैं कि यहां एक अध्यापक के पास दस कक्षाएं हैं!
अध्यापन क्यों एक अलग किस्म का काम है? क्यों ज्ञान का स्थानांतरण मात्र पर्याप्त नहीं? ज्ञान सृजन उनका प्राथमिक दायित्व है. किसी भी क्षेत्र में ज्ञान की अब तक उपलब्ध सामग्री से छात्रों को परिचित कराना उनका काम ज़रूर है लेकिन उसके साथ अपना संबंध बनाना और उसके प्रति अपना नज़रिया विकसित करना एक ज़्यादा श्रम साध्य काम है और मौलिकता वहां पैदा होती है. इसलिए जो यह समझते हैं कि पीएचडी के बाद फिर पढ़ने की ज़रूरत नहीं, वे ज्ञान के व्यापार की समझ नहीं रखते. वैसे उनकी इस समझ के लिए हम अध्यापक भी जिम्मेदार हैं क्योंकि साल दर साल हममें से कई एक ही बात दुहराते चले जाते हैं.
नएपन और ताजगी के लिए शोध और निरंतर अध्ययन आवश्यक है और उसके लिए संसाधन चाहिए. क्यों हमारे प्रबंधन संस्थान या आईआईटी अपने शिक्षकों के लिए ये साधन मुहैया करा सकते है और क्यों विश्वविद्यालय नहीं? क्यों राज्यों के शिक्षकों के लिए इस प्रकार की बात सपना ही है?
अध्यापक नामक संस्था का निरंतर क्षरण आम चर्चा का विषय होना चाहिए लेकिन नहीं हो पाता. राज्यों में ढाई सौ रुपया प्रति कक्षा या पंद्रह से पच्चीस हजार रुपया प्रति माह पर सेवानिवृत्त अध्यापकों से अथवा रोजगार की तलाश में भटक रहे युवाओं से काम लेने में सरकारों को फायदा नज़र आता है और समाज को कोई उज्र (आपत्ति) नहीं.
दिल्ली विश्वविद्यालय में यह क्षरण एक दूसरे रूप में भी दिखलाई पड़ता है. हर सत्र की शुरुआत में अध्यापकों की एक बड़ी फौज सांस रोककर इंतजार करती है कि उसे फिर से बहाल किया जाएगा या नहीं. ये खुद को और बाकी सब भी इन्हें एढॉक (तदर्थ) कहते हैं. बरसों के रोजाना इस्तेमाल के चलते यह शब्द अब हिंदी का हो चुका है. ये वे हैं जिन्हें चार-चार महीने के लिए नियुक्त किया जाता है और जिन्हें यह नहीं मालूम होता कि नए सत्र में वे वापस लिए जाएंगे या नहीं. यह अनिश्चितता उनकी आत्म छवि के साथ क्या करती है, इसपर न तो कोई शोध हुआ है न अध्ययन. जब वे काम करते भी रहते हैं तो अलग से दिखलाई पड़ते हैं और प्रशासन से लेकर स्थायी शिक्षक तक इन्हें बंधुआ मानते हैं जिनसे हर तरह का काम लिया जा सकता है.
क्यों दिल्ली विश्वविद्यालय में यह तदर्थ व्यवस्था स्थायी हो चुकी है? क्या इसमें सिर्फ प्रशासन का दोष है या सभी शिक्षक संगठनों का स्वार्थ भी उन्हें अनिश्चय में रखने में ही है ताकि वे उनके स्थायी मुवक्किल बने रह सकें जिनके लिए वे संघर्ष करते हुए दिखाई पड़ते हैं. एक वक्त था जब किसी स्थायी पद पर अस्थायी बहाली अधिकतम छह महीने के लिए ही हो सकती थी, फिर उसे स्थायी तौर पर भरना होता था लेकिन धीरे धीरे अस्थायित्व ही नियम बन गया. जब इन तदर्थ अध्यापकों को जनतांत्रिक अधिकार के नाम पर डूटा के चुनाव में मतदान का अधिकार दे दिया गया तो फिर प्रतिद्वंद्वी संगठनों के लिए वे एक ऐसा वोट बैंक बन गए जिसे वे असुरक्षित रखकर ही लाभ ले सकते हैं.
इनमें से कई स्थायी हो पाते हैं और कई नहीं. लेकिन इस क्रम में जो संस्कृति विकसित होती है वह सिर्फ इन तदर्थ अध्यापकों पर ही असर डालती हो, ऐसा नहीं. उससे कॉलेज और विश्वविद्यालय का वातावरण प्रभावित होता है. इन अध्यापकों में से अधिकतर का पूरा ध्यान स्थायित्व हासिल करने पर रहे तो इसमें क्या इन्हें दोषी माना जाए? अगर यह समझ नौजवानों में बने कि पढ़ने-लिखने से अधिक समय सही किस्म का संपर्क बनाने में लगाना चाहिए तो यह कैसे गलत है?
यह समस्या लेकिन सिर्फ भारत की नहीं. यूरोप और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में कम से कम खर्चे पर अधिक से अधिक अध्यापन का काम लेने में सरकारों और प्रशासन के यकीन से अब कुली अध्यापकों की बड़ी फौज बन चुकी है.
अध्यापकों से छुटकारा पाने का एक तरीका ऑनलाइन अध्यापन के मूक्स नामक संस्करण से पैदा हुआ है. किसी विषय के एक माहिर अध्यापक से व्याख्यानों की श्रृंखला तैयार कर उसे ऑनलाइन उपलब्ध कराने पर न इमारत की दरकार रहती है न अध्यापकों की. मात्र कुछ सहायकों से काम चल सकता है. भारत की सरकारें इससे काफी प्रभावित हुई हैं और एक विकल्प के तौर पर इसे प्रोत्साहित करने में लगी हैं. यह वे श्रेष्ठता के नाम पर कर रही हैं.
हम श्रेष्ठता के इस तर्क की जांच इससे कर सकते हैं कि जो नेता या नीति निर्माता देश की जनता के के लिए इसे लाभकारी मानते हैं तो वे क्यों अपने बच्चों को आईवी लीग (अकादमिक श्रेष्ठता का प्रतीक) विश्वविद्यालयों में भेजना चाहते हैं?
शिक्षा में काफी कुछ चर्चा करने को है लकिन अध्यापक एक ऐसा विषय है जिसपर ठहर कर सोचने के लिए हमें समय निकालना ही चाहिए.

Wednesday, September 6, 2017

आज राज्य क्यों ऐसा सोचता है कि गरीबों और अशिक्षितों को निजता के अधिकार की जरूरत ही नहीं है? | अपूर्वानंद

निजता प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है. राज्य उस पर दावा नहीं कर सकता. वह उसे यह नहीं बता सकता कि वह क्या खाए, क्या पहने, क्या पढ़े, कैसे रहे. वह उसकी ज़िंदगी में बेरोकटोक तांकझांक नहीं कर सकता, न उससे यह मांग कर सकता है कि वह खुद से जुड़ी हर जानकारी राज्य के हवाले कर दे. कुल मिलाकर व्यक्ति खुदमुख्तार है.
व्यक्ति अपना विचार बना सकता है और उसे व्यक्त भी कर सकता है. उसे ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता.
व्यक्ति के जीने का अधिकार तो मौलिक है लेकिन वह अर्थपूर्ण तभी है जब वह इज्जत के साथ जी सके. अगर मैं हमेशा दूसरे की निगरानी में रहने को मजबूर हूं तो जाहिर है मैं ससम्मान जीवन नहीं जी रहा.
24 अगस्त, 2017 को आज़ाद भारत के न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन की तरह याद किया जाएगा. इसलिए कि भारत की सबसे बड़ी अदालत ने एकमत से भारत के नागरिकों के सबसे पवित्र अधिकार को राज्य के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण बना दिया.


निजता को व्यक्ति का अधिकार घोषित करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले का जश्न ठीक ही मनाया जा रहा है. लेकिन उस उल्लास में हम भूल रहे हैं कि यह सब कुछ इसलिए है कि अब राज्य वह बन चुका है जो अपने नागरिकों को अपना मातहत मानता है और उनकी जिंदगियों पर कब्जा करने पर आमादा है. अभी तो उच्चतम न्यायालय ने उसकी इस सोच पर चोट कर दी है लेकिन यह मानना एक तरह की खुशफहमी होगी कि हर बार वह हमारी ढाल बन ही पाएगा.
उन तर्कों को देखें जो सरकार ने वैयक्तिक निजता को अधिकार माने जाने के खिलाफ दिए थे तो राज्य की मानसिकता का पता चलता है. उसने कहा कि निजता का तर्क आभिजात्यवादी है. यह तर्क अजीब है लेकिन ध्यान देने योग्य है. इन दिनों आभिजात्य होने को एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. प्रत्येक परिष्कृत विचार या आचरण को अभिजात या आभिजात्यवादी कहकर उसे तिरष्कृत कर दिया जाता है. या, अगर किसी विचार पर हमला करना हो तो पहले उसे अभिजात कह दिया जाता है.
सरकार ने अदालती फैसले के बाद यह कहना शुरू किया है कि यह दरअसल उसके ख्याल की ही तस्दीक है और अदालत में उसके वकील ने जो कुछ भी कहा था वह बस, कचहरी की बहस में हुई नोंकझोंक या बाता-बाती का हिस्सा है.
अदालत में सरकार के विचार या उसके रुख को उसका वकील ही सामने रखता है और अपनी दलील उसके निर्देश से पेश करता है. यह कहना कि वह तो यों ही बहस में मीर बनने को कह दिया गया था और उसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए, इसलिए चिंता का विषय है कि इसके मायने यह भी निकलते हैं कि हमारा सामना एक गैरजिम्मेदार सरकार से है.
अखबारों और कई लोगों ने ठीक ही पिछले तीन सालों में सरकार की दलीलों का रिकॉर्ड सामने रखकर सरकार के क़ानून मंत्री के इस दावे को मिथ्या बताया है कि सरकार तो शुरू से ही निजता को नागरिकों का मौलिक अधिकार मान रही थी. ठीक ही पूछा गया है कि अगर ऐसा था तो फिर छह लोगों को अदालत की गुहार ही क्यों लगानी पड़ी? यह मुक़दमा ही क्यों हुआ?
सरकारी वकील ने कहा कि भारत के नागरिक यह दावा नहीं कर सकते कि उनके शरीर पर उनका अधिकार पूर्ण है. मैं अपने शरीर, या उसके अंगों की जानकारी किसे दूं न दूं, यह मेरा निर्णय होगा. लेकिन सरकार का कहना यह था कि वह मेरे शरीर के बारे में निर्णय कर सकती है.
सरकारी तर्क यह था कि निजता वस्तुतः एक आभिजात्यवादी विचार है जो भारत के लिए अजनबी है. चूंकि भारत में रहने वाले अधिकतर गरीब हैं, इसलिए यह उन पर या उनके संदर्भ में लागू नहीं होता. यह तर्क अजीबोगरीब तो है ही, बहुत खतरनाक भी है. यह निजता या स्वतंत्रता के अधिकार के साथ-साथ एक तरह से समानता के अधिकार के साथ भी राज्य का खिलवाड़ है
यह याद रखने की ज़रूरत है कि किसी वक्त भारतीयों की गरीबी, उनकी अशिक्षा को कारण बताया गया था अंगरेज़ हुक्मरानों के द्वारा यह कहने के लिए कि वे आज़ादी जैसी चीज़ को बरतने के काबिल नहीं हैं. अशिक्षित व्यक्ति जनतंत्र जैसे विचार को भी नहीं समझ सकता. अब बताया जा रहा है कि गरीब लोगों के लिए निजता का कोई मतलब नहीं है.
मेरी गरीबी को मेरी संप्रभुता का हरण करने का तर्क कैसे बनाया जा सकता है! मेरी गरीबी कोई मेरा अस्तित्वगत गुण या अवगुण नहीं, वह नितांत ही सामाजिक है. जिसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं, उसे मेरे खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
गरीबी को एक तर्क की तरह इस्तेमाल किया जाता है अनेक प्रसंगों में व्यक्ति के जीवन में राजकीय हस्तक्षेप को जायज़ ठहराने के लिए. वह यह तय कर सकता है कि वह कितने बच्चे पैदा करे, यह कि वह कितनी कैलोरी ऊर्जा ले, यह कि किस तरह के घर में वह रहे. जब सरकार यह कहने लगती है कि स्कूल के दोपहर के खाने में बच्चे अंडे न खाएं, वह तय करेगी कि प्रोटीन का ज़रिया क्या होगा, तो वह उनकी निजता में ही दखल दे रही होती है.
समृद्ध या अमीर लोगों की तो कामनाएं होती हैं, गरीबों को वह अधिकार नहीं. यही बहस कार्ल मार्क्स आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों में कर रहे हैं कि मैं अपने श्रम का कैसे इस्तेमाल करूं और उसकी कीमत भी कितनी तय करूं, अगर यह मेरे बस में नहीं तो यह माना जाना चाहिए कि मुझसे मेरा आपा ही छीन लिया गया है.
निजता किसी दूसरे अधिकार के तहत नहीं है, वह अपने आप में वह संपूर्ण है, यह इस फैसले ने साफ़ किया. सरकार यह दलील दे रही थी कि अभी संविधान में इसे मौलिक अधिकार नहीं मना गया है. अदालत ने साफ़ कहा कि व्यक्ति राज्य की सृष्टि नहीं है और अगर कोई बात संविधान में अभी वर्णित नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसे लेकर दावा ही नहीं किया जा सकता.
निजता का यह अधिकार अब हमारा बुनियादी हक है. लेकिन यह कोई अदालत का प्रसाद भी नहीं है. ध्यान रहे कि अदालत को इस निर्णय के लिए प्रेरित करने के लिए छह लोग सरकार के खिलाफ अदालत में गए. उनके नाम जानना और उन्हें शुक्रिया अदा करना हर भारतीय का फ़र्ज़ है.
न्यायमूर्ति पुत्तुस्वामी के अलावा कल्याणी मेनन सेन, शांता सिन्हा, सुरेश वोमबातकेरे, डॉक्टर अनुपम सराफ, निखिल दे और बेजवाड़ा विल्सन ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और कहा कि निजता को एक हिंदुस्तानी से छीना नहीं जा सकता. इनमें से अधिकतर वे हैं जो गरीबों के साथ काम करते हैं. विल्सन तो उस तबके के लिए काम करते हैं जो भारत की गंदगी साफ़ करता रहा है. पिछले एक महीने में दिल्ली जैसे शहर में गटर साफ़ करते हुए इनमें से छह की मौत हो चुकी है.
याद रहे ये उन लोगों में हैं जिन्हें तिरस्कारपूर्वक मानवाधिकार कार्यकर्ता या झोलावाला गिरोह कहा जाता है. इन्हें और इनके संगठनों को अक्सर सबसे ज़्यादा सरकारी हमले का सामना करना पड़ता है. इनके चरित्र हनन का अभियान अक्सर चलाया जाता है.
यह भूलना मुश्किल है कि भारत के प्रधानमंत्री ने हमारे न्यायाधीशों को ही लज्जित करने की कोशिश की थी यह कहकर कि वे कभी-कभी फाइव स्टार एक्टिविस्टों के चक्कर में आ जाते हैं. इस मामले में कम से कम अदालत ने इन्हीं फाइव स्टार एक्टिविस्टों की दलीलों पर मुहर लगाई है.

Sunday, July 16, 2017

ल्यू शियाबो : एक दिन आएगा जब पूरा चीन उनसे सर झुकाकर माफी मांगेगा | Apoorvanand


ल्यू शियाबो मानते थे कि जब मानवीय स्वतंत्रता के स्थान पर संकीर्ण राष्ट्रवाद को बहुमत का समर्थन मिलता है तो वह सत्ता को निरंकुश होने की वजह भी मुहैया कराता है


‘यह सिर्फ अब है, सावधानी से पीछे मुड़कर देखते हुए कि मैं यह महसूस कर पाता हूं कि मेरी पूरी जवानी एक सांस्कृतिक बंजर में गुजरी थी और मेरा आरंभिक लेखन पूरी तरह घृणा, हिंसा और अहंकार से पोषित हुआ या दूसरे शब्दों में झूठ, चालाकी और असभ्यता से. पार्टी संस्कृति के इस ज़हर से चीनियों की अनेक पीढ़ियां बुझी हुई थीं और मैं भी कोई अपवाद न था...इस विष से मुक्त होने में हो सकता है मेरा पूरा जीवन लग जाए.’
यह सबकुछ ल्यू शियाबो ने कहा अपने बारे में. 2003 में ‘डेमोक्रेसी एक्टिविस्ट अवार्ड’ को स्वीकार करते हुए उन्होंने अपने वक्तव्य का आरंभ ही इस तरह किया. ल्यू बात चीन की कर रहे थे, उसकी साम्यवादी सत्ता की. जिस जहर की वे कर रहे थे, उसका एक नमूना मिलता है चीनी पार्टी के नियंत्रण में निकलने वाले ग्लोबल टाइम्स की उस खबर से जो ल्यू की मौत के बारे में सूचना देती है. इस खबर में कहीं भी इसका जिक्र नहीं है कि ल्यू को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला था. इसका तो सवाल ही नहीं उठता कि पाठकों को यह बताया जाए कि यह सम्मान उन्हें क्यों मिला था. वह ठंडे तरीके से सूचना देता है कि सरकार को अपदस्थ करने के षड्यंत्र के कारण उन्हें कैद की सजा मिली थी.
ग्लोबल टाइम्स की चिंता अपने पाठकों को सिर्फ यह विश्वास दिलाने की है कि उनका इलाज बेहतरीन था. वह यह बताना ज़रूरी समझता है कि सरकार ने सबसे योग्य चीनी डॉक्टरों के अलावा जर्मन और अमरीकी डॉक्टरों को भी उनके इलाज के लिए बुलाया गया था और उन्होंने कहा कि ‘वे इससे बेहतर विकल्प के बारे में सोच नहीं सकते...’
क्या चीनी पार्टी सचमुच यह सोचती है कि जनता को ल्यू के बारे में उतना ही और उसी तरीके मालूम होगा जितना और जैसे वह बताती है? और क्या चीनी जनता सत्ता के द्वारा अपने साथ किए जा रहे इस तरह के बर्ताव से अपमानित महसूस नहीं करती?
चीन की प्रगति और उसके विकास से चकाचौंध दुनिया को ल्यू की कितनी फिक्र होनी चाहिए और क्यों? ग्यारह साल की उनकी कैद चीन के लिए कोई पहली और आखिरी नहीं होने वाली है. लेकिन चीन इसके बारे में निश्चिंत है कि यह सबकुछ उसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति के रास्ते में कहीं बाधा नहीं बनेगा.
चीन इस वजह से भी निश्चिंत है कि उसे अपने मिथ्या अभियान में अपने बौद्धिक अभिजन के सहयोग का आश्वासन है. ल्यू अपने इसी संबोधन में कहते हैं कि ‘किसी हिंसा के डर से नहीं, बल्कि यह भौतिक उपलब्धि के लोभ की वजह से की जा रही सक्रिय भागीदारी है.’ वे कहते हैं कि ऐसी सत्ताओं को दरअसल बड़े हिंसक विद्रोह की फिक्र नहीं होती. उन्हें वे आसानी से दबा सकती हैं. उनके लिए सबसे भयंकर एक ऐसी स्थिति है जिसमें अपने भौतिक लाभ की परवाह किए बिना बौद्धिक जन और अन्य अभिजन झूठ बोलने से इनकार करें. खामोश रहना भी बुरा न होगा क्योंकि इससे होगा यह कि झूठ कम से कम दुहराया तो न जाएगा और लोग असत्य का जीवन जीने से इनकार कर देंगे. फिर व्यवस्था का गला घुट जाएगा. ल्यू की कैद और उनकी मौत इसकी त्रासद गवाही है कि चीन में उनकी बात सुनी नहीं गई.
चीन की निरंकुश साम्यवादी सत्ता की जड़ें दरअसल साम्यवादी अंतर्राष्ट्रीयतावाद से ज्यादा चीनी राष्ट्रवाद की मिट्टी में धंसी हैं और वहीं से उन्हें खाद पानी मिलता है. ‘चीनी राष्ट्रवाद की जड़ें’ शीर्षक वाले अपने लेख में ल्यू इसकी विस्तृत पड़ताल करते हैं कि क्यों एक आम चीनी राष्ट्रवाद की बीमारी से ग्रस्त है. राष्ट्रवाद बिना ‘शत्रुवादी मानसिकता’ के जीवित नहीं रह सकता.
चीन में इस शत्रु मानसकिता को एक लंबे समय तक वर्ग घृणा ने जीवित रखा. लेकिन माओ के गुजर जाने और देंग युग के आगमन ने वर्ग के स्थान पर राष्ट्र को स्थापित किया. माओ की प्रसिद्ध उक्ति ‘राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’ अब बदल जाती है. नई शक्ल में उसे यों पढ़ा जा सकता है – ‘राष्ट्रीय एकता और प्रतिष्ठा बंदूक की नली से निकलती है.’
चीन में आर्थिक तरक्की के बाद साम्यवाद पर लोगों का विश्वास उठ चुका है. इसलिए उसकी जगह अब नई विचारधारा चाहिए और वह राष्ट्रवाद है. ल्यू इस राष्ट्रवाद के साथ हिंसा का रिश्ता अनिवार्य मानते हैं. हिंसा एक बड़े समुदाय के लिए सिर्फ स्वीकार्य नहीं, पूज्य भी हो जाती है. वह एक संस्कृति में बदल जाती है. उसका पहला प्रमाण भाषा में मिलता है.
‘जब हम जैसे लोगों का, जो हीनता बोध से संघर्ष करते रहते हैं, अपनी राष्ट्रीय शक्ति की अपर्याप्तता से सामना होता है या दूसरों से अपेक्षित सम्मान के अभाव के बोध से, तो हम किसी भी ऐसे ऐतिहासिक प्रसंग को ललककर पकड़ते हैं जिससे हमें ज़रा भी गर्व की अनुभूति हो. किसी सफलता को बढ़ा-चढ़ा कर देखना भी उचित है अगर वह इस समूह की एक नंबर का होने की भावना को पुष्ट करती हो. अगर इससे इनकार करना असंभव हो कि हम दूसरों से भौतिक रूप से हीन हैं तो हम यह तो कह ही सकते हैं, जैसा माओ करते थे, कि हम आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ हैं. अगर हम दूसरों जितने अच्छे आज नहीं हैं, तो हम एक मिथ का निर्माण कर सकते हैं कि किसी न किसी दिन हम ज़रूर ताकतवर राष्ट्र बनेंगे क्योंकि हम अतीत में अवश्य ही शक्तिशाली थे.’
ल्यू शियाबो चेतावनी देते हैं कि जब मानवीय स्वतंत्रता और इज्जत के स्थान पर संकीर्ण राष्ट्रवाद को बहुमत का समर्थन मिलता है तो वह निरंकुश सरकार, सैन्यवादी दुस्साहस और बदमाशी के औचित्य के लिए राष्ट्रवाद का तर्क मुहैया कराता है.
ल्यू शियाबो ने सच बोलने की कीमत दी. तियानानमेन चौक में सरकारी दमन पर से पर्दा हटाने, जनतांत्रिक मूल्यों को राष्ट्रवाद और साम्यवाद के ऊपर रखने की वकालत करने और उससे बढ़कर चीनी जनता को आईना दिखाने का जुर्म बहुत बड़ा था.
ग्यारह साल की कैद, दुनिया से पूरी तरह अलग-थलग कर ल्यू की आत्मा को तोड़ देने की चीनी सरकारी कोशिश कामयाब नहीं हुई. हां! उसने उनके शरीर को ज़रूर क्षत-विक्षत कर दिया. और समाप्त भी. एक दिन आएगा, क्योंकि हर समाज के इतिहास में पीढ़ियों के उदासीन रहने के बाद भी वह आता दीखा है, जब उन सार्वभौम मूल्यों की समझ समाज में पैदा होगी जिनके लिए ल्यू का संघर्ष था, तब चीन सर झुकाकर उनसे क्षमा मांगेगा. वह दिन लेकिन अभी दूर लगता है.

Saturday, May 27, 2017

नेहरू अगर बड़े हो सके तो इसलिए भी कि वे अपने गुरु से अपनी असहमति बेझिझक और निरंतर व्यक्त कर सके | Apoorvanand

भारत वही होगा जो हम हैं. हमारे विचार और कार्य ही उसे आकार देंगे...हम उसके बच्चे हैं, आज के भारत के नन्हें टुकड़े, लेकिन हम कल के भारत के जनक भी हैं. अगर हम बड़े हैं तो भारत भी बड़ा होगा, अगर हम क्षुद्र मस्तिष्क और संकीर्ण नज़रिए वाले हुए तो भारत भी वैसा ही होगा. अतीत में हमारी परेशानियों की वजह यही संकरी निगाह और तुच्छ कार्य रहे, जो भारत की महान सांस्कृतिक विरासत से इतना बेमेल था.’
जवाहरलाल नेहरू आज़ादी मिलने के साल भर बाद स्वतंत्रता दिवस पर भारत के अपने लोगों को याद दिला रहे थे कि भारतीय होने का अर्थ अगर कुछ हो सकता है तो वह है क्षुद्रता, संकीर्णता और फूहड़पन से संघर्ष. इसी के आस पास भारत की औद्योगिक नीति के बारे में बात करते हुए उन्होंने समाज में बढ़ती आर्थिक असमानता की ओर इशारा किया और कहा कि अब यह फूहड़पन की हद तक बढ़ गई है.
आर्थिक या सामाजिक गैर बराबरी इसलिए बुरी है कि वह फूहड़ है, यह अब हम शायद ही किसी को कहते हुए सुनें. लेकिन नेहरू के लिए किसी भी नीति या क्रिया की कसौटी यही थी कि क्या वह हमारे अपने संकीर्ण स्वार्थ से प्रेरित है या वह किसी अधिक बड़े उद्देश्य को हासिल करने में कारगर है. क्या वह हमें जाती ज़िंदगी में और सामाजिक रूप से भी उदात्त के निकट ले जाती है या अपने ही छोटे दायरे में और भी अधिक कैद कर देती है?
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने, जो गांधी के निकटस्थ मित्रों में थे और एक समय उनके उत्तराधिकारी माने जाते थे और अपने समय के सबसे कुशाग्र मेधा के धनी भी, नेहरू की मृत्यु के बाद कहा कि हमारे बीच का आख़िरी सभ्य व्यक्ति नहीं रहा.
सभ्य और सुसंस्कृत बनना हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए, कि आर्थिक सम्पन्नता और शक्ति और उसके लिए दो शर्तें हैं: निर्भय होना और साधन और साध्य में एकता रखना. गांधी की याद अगर नेहरू अपने देशवासियों को बार-बार दिलाते थे तो मुख्यतः इसीलिए कि उन्होंने निर्भयता और साधन और साध्य की एकता की अनिवार्यता का मंत्र अपने देशवासियों, बल्कि पूरे विश्व को दिया था.
निर्भयता के बिना महानता संभव नहीं. इस निर्भयता का अर्थ यह है कि हम अपने निर्णयों और कार्यों की जिम्मेदारी लेने से कतराएं. स्वाधीनता आन्दोलन की विशेषता यही थी और गांधी ने यही सिखाया था कि तुम्हारे किसी भी कार्य में गोपनीयता और षड्यंत्र की बू नहीं आनी चाहिए. इसीलिए वे अपने हर अभियान का नोटिस उसे भी देते थे जिसके विरुद्ध वह शुरू किया जाने वाला था. चंपारण में निलहे साहबों को, अंग्रेज़ सरकार के हर महकमे को उन्होंने बताया कि वे क्या करने जा रहे हैं. सशस्त्र क्रांतिकारियों की वीरता में कोई संदेह था, लेकिन वह गोपनीयता और षड्यंत्र के बिना संभव थी.
नेहरू गांधी के शिष्य की तरह ही निष्कवच और उत्तरदायित्वपूर्ण निर्भयता के हामी थे. इसलिए उनमें से किसी ने वे जो कर रहे थे, उसके परिणाम से, जो कि प्रायः दीर्घ कारावास था और वह भी उसका सिलसिला, बचने की कोई कोशिश की.
नेहरू जैसा व्यक्तित्व अकेलेपन में भी समझा जा सकता है, लेकिन ऐसी शख्सियत शायद अपने जैसी ही और शख्सियतों के संसर्ग के बिना बन नहीं सकती
नेहरू जैसा व्यक्तित्व अकेलेपन में भी समझा जा सकता है, लेकिन ऐसी शख्सियत शायद अपने जैसी ही और शख्सियतों के संसर्ग के बिना बन नहीं सकती. और नेहरू का वक्त कितना निराला और भव्य है: तिलक और गोखले से लेकर, जिन्हें गांधी ने हिमालय और प्रशांत सागर की उपमा दी, गांधी, वल्लभ भाई पटेल, सरोजिनी नायडू, मौलाना आज़ाद, अली बंधु, सुभाषचंद्र बोस, अम्बेडकर या राजगोपालाचारी इनमें से कुछ नाम हैं. आप रवीन्द्रनाथ टैगोर और इकबाल को भूलें या प्रेमचंद, भारती, निराला और प्रसाद जैसे नामों को भी. यह महानता का युग था और इनमें से हर कोई एक दूसरे से रौशन भी हो रहा था. हर कोई दूसरे की कीमत जानता था और इस तरह उसकी अपरिहार्यता भी.
नेहरू अगर बड़े हो सके तो इसका कारण यह भी है कि वे अपने गुरु से अपनी असहमति बिना झिझक और भय के निरंतर व्यक्त कर सके. उन्होंने स्पष्ट ढंग से गांधी को एकाधिक बार कहा कि वे ज़मींदारों के प्रति उनकी सहानुभूति को नहीं समझ पाते और भारतीय गांवों के प्रति उनके अतिरिक्त मोह को भी नहीं.
उसी तरह धर्म के मामलों में गांधी से नाइत्तफाकी नेहरू ने कई बार जाहिर की. इनमें से एक प्रसंग दिलचस्प है. गांधी हिंदू धर्मावलंबियों को उदारता और सहिष्णुता की याद दिला रहे थे, जो उनके मुताबिक़ हिंदू धर्म की आतंरिक विशेषता थी. इनमें सबसे कठिन जीव वे थे जो खुद को सनातनी मानते थे. 1933 के एक ख़त में गांधी ने लिखा कि सनातनियों से उनका संघर्ष अधिक से अधिक दिलचस्प और कठिन होता जाता है. गांधी की समझ थी कि उनकी सफलता यह है कि ये सनातनी अपनी दीर्घ निद्रा और आलस्य से जाग रहे हैं. उनका विश्वास था कि अभी भले ही वे गांधी को गालियां दे रहे हों, लेकिन उनके अहिंसा के लेप से यह तूफ़ान शांत हो जाएगा...लेकिन मैं जितना ही गालियों को नज़रअंदाज करता जाता हूं, वे उग्र होती जाती हैं. लेकिन यह शमा के इर्ग गिर्द नाचने वाले फतिंगों का मृत्यु नृत्य ही है.’
नेहरू गांधी के सनातनियों से इस संघर्ष में उनके इस विश्वास से सहमत थे. उन्होंने हरिजन’ का अंक मिलने के बाद एक पत्र में उन्हें लिखा, ‘मुझे बेचारे सनातनियों पर दया आती है. उनके क्रोध, गालियों और उग्र शाप को देखते हुए मुझे लगता है कि वे इस सूक्ष्म आक्रमण के योग्य नहीं. मूर्खता, कट्टरता और विशेषाधिकार की ताकत हैरतअंगेज़ है. इस मेल को महात्मा और संत भी नहीं उलट सकते जब तक कि हालात इसके लिए ज़मीन तैयार कर दें.’
नेहरू की ज़िंदगी घाटियों के फूलों की खुशबू और हिमाच्छादित ऊंचाइयों की पुकार का जवाब थी. अपने मित्र गुरु की तरह ही, अधूरी, लेकिन ईमानदार
नेहरू ने लिखा कि हरिजन’ एक भी कट्टर सनातनी का हृदय परिवर्तन कर पाएगा लेकिन जिन अनेकानेक लोगों ने सामाजिक बुराइयों की ओर से आंखें मूंद रखी हैं, उनपर यह ज़रूर कुछ असर डाल सकेगा.
नेहरू का यह पत्र उस दौर के नेताओं में परस्पर आलोचना की संस्कृति का अच्छा उदाहरण है. इसका कि आपको विश्वास है कि आपकी आलोचना सुनी जाएगी, इसलिए इसमें कटुता नहीं, सद्भाव की सुगंध है. इस पत्र में आखिर में वे उस लिफ़ाफ़े पर टिप्पणी करते हैं जिसमें पत्र भेजा गया था: ‘आपका पत्र लिफ़ाफ़े के नाम पर जिस चीज़ में लपेट कर भेजा गया, उसपर मुझे ऐतराज करना ही होगा. अगर वल्लभभाई इसके लिए जिम्मेदार हैं, तो उनके प्रति अपनी सारी मुहब्बत के बावजूद मुझे कहना होगा कि लिफाफा बनाना उनके बस का नहीं.’
आगे वे लिखते हैं और यह दिलचस्प है, ‘मेरे इस सतहीपन के लिए माफ़ करेंगे. लेकिन मुझे अपने हीरे तराशे हुए और चिकने अच्छे लगते हैं. आपने हमें जिंदगी को शानदार तरीके से जीने की कला और शैली सिखाई है. वही असल बात है, लेकिन हम जीवन की छोटी छोटी चीज़ों में अंदाज और कलात्मकता को क्यों नज़रअंदाज करें? हममें से ज़्यादातर लोग हिममंडित ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच सकते. क्या आप हमें घाटियों के फूलों से भी वंचित रखेंगे?’
नेहरू की ज़िंदगी घाटियों के फूलों की खुशबू और हिमाच्छादित ऊंचाइयों की पुकार का जवाब थी. अपने मित्र गुरु की तरह ही, अधूरी, लेकिन ईमानदार.