Tuesday, February 8, 2011

Kahi-Ankahi

july-agust-sept 1999....
मैं 21 जुलाई को आया हूँ, बाकियों से 2 दिन Late....सब 19 को आ गये थे, मैं 21 को. पापा ने हॉस्टल में छोड़ते वक़्त कहा है, वो परसों मिलने आयेंगे. एक भैया से भी मिलवाया, वो 8th में पढ़ते हैं, उनके पापा मेरी मम्मी के स्कूल में Teacher हैं. पहला दिन है, कुछ-कुछ अच्छा लग रहा है, मैं वैसे भी मम्मी-पापा से अलग नाना-नानी के घर रहा ही हूँ. मुझे Bed नहीं मिला है, किसी के साथ शेयर करना पड़ेगा (अरे 10 साल के तो हैं सभी, एक Bed पे दो क्या तीन लोग भी आ सकते हैं) रवीश के साथ मैं Bed शेयर कर रहा हूँ (एक दिन रवीश ने अपनी मम्मी मेरी शिकायत भी की, कि मैं Bed पे सामान फैलाता हूँ. :)). उसके पापा पहले से ही मेरे पापा को जानते हैं, लेकिन हम एक ही जगह से नहीं हैं. सोते वक़्त येसा लगा जैसे नाना के यहाँ सो रहा हूँ, लेकिन बगल में नानी नहीं सो रही थी, 'समझदार बहू' की कहानी सुनाते हुए, या मौसी ने भी दूध से भरा गिलास नहीं दिया सोते वक़्त शाम का खाना भी ज्यादा अच्छा नहीं लगा.
सुबह से बड़ी जल्दी उठा दिया, बेचारा नन्ही सी जान, PT भी करनी पड़ती है, 5.30 से. अच्छा नहीं लगा मुझे इतने जल्दी उठना. सुबह के 8.00 बजते-बजते घर कि याद सताने लगी, इतने ज्यादा अनुशासन में तो कभी रहा नहीं हूँ ना! श्याम के साथ Main Gate पर गया, वहीं बैठे हम रोते रहे (बाद में श्याम बिहारी ने स्कूल छोड़ दिया.).......पापा फिर आये हैं, मैं उनके सामने रो रहा हूँ, पापा को भी 50km गाड़ी चलाते हुए आना पड़ता था. उन्होंने लालच दिया है, नए कपड़ों का और स्कूल कि Computer Education का, बेटा कंप्यूटर 70 हज़ार का आता है (उस वक़्त, बाद में मैंने लैपटॉप लिया और पापा को आजतक Use करना नहीं सिखा पाया हूँ.) और बाहर किसी भी स्कूल में सिखाते भी नहीं (बाद में मेरे कंप्यूटर Teacher ने Black & White Screan पर हमे सिर्फ गेम ही खिलाया, और कुछ भी नहीं सिखाया, और मैंने स्कूल में कंप्यूटर पर Game खेलने के कम मौके मिलने के कारण घर पर Video Game ले लिया :)). मैं फिर भी रो रहा हूँ लेकिन मैं कुछ-कुछ खुश हूँ कि मैं औरो से दो दिन Late आया, उनसे दो दिन ज्यादा घर पे रह लिया. अमित से कहा भी.
.......मैं 'पानी कि टंकी' पे बैठा रो रहा हूँ, अलका Ma'am ने उठाया और क्लास ले गईं. मैं जबरदस्ती उनके हाथ से छिटकने कि कोशिश कर रहा हूँ. वो हंस रही हैं, शायद अपनी स्थिति पर भी और मेरे पर भी.

प्रसाद सर ने Chess लाकर दिया है, उनकी लड़की को भी बहुत पसंद है, और मेरा तो Favourite गेम ही है. मेरे नाना expert हैं इसमें, और मुझसे झूठ-मूठ का हार भी जाते थे. मैं खेलता हूँ. बहुत दिनों तक मैंने उनका Chess वापिस नहीं किया और उनकी बेटी मांगती रही.
चाचा आये हैं, मैं पहली बार उन्हें चाचा कहा, घर के बाकी लोगों को देखकर मैं भी उन्हें उनके नाम से बुलाता था. बारिस हो रही है, मैं चाचा के जाने के बाद रोने लगा.....अनुराग उन्हें बुलाने Main Gate तक गया है, भीगता हुआ. चाचा मुझे मना रहे हैं, और मैं TC लेने कि बात कर रहा हूँ.
1 महीने मैं गिनकर 47 letters लिख चुका हूँ, कुछ पापा-मम्मी को, कुछ दादी (बाई)-दादा को, कुछ मौसी को. सब में एक ही बात है, मेरे लिए और सामान मत लाना, मुझे TC चाहिए.
...मुझे अभी पता चला है, वहां  का भी मम्मी रो-रो कर बुरा हाल है. हाँ, पापा ने नये कपडे खरीद कर दिए हैं.

March 2006.....
आखरी पेपर था, हिंदी का, हिंदी वैसे भी मेरी ठीक है. सब जाने कि तैयारी में हैं, 7 साल बाद स्कूल छोड़ रहे हैं. मेरे पास कैमरा भी नहीं है, कि फोटो ले सकूं. पहले मंगाने का ध्यान ही नहीं रहा, exams में busy था. किसी ने कहा, तुम 6th में दो दिन बाद आये थे. मैं सोच रहा हूँ, काश दो दिन और रह लेता....मैं Bed पर बैठा हूँ, माधव suitcase बंद कर रहा है (मुझे याद है उसने 12th में कभी suitcase lock नहीं किया.) हरिनारायण मेरे बगल में बैठ गया है......बड़ा emotional होके कहता है, 'विवेक तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे'  मैं फीका सा मुस्कुरा देता हूँ (उस Emotional Fool को कोई कभी नहीं भूलेग:)). राजेश जा रहा है, 6th में हम लड़े थे, मैं उसे सॉरी कहना चाहता हूँ लेकिन.......
    राकेश आकर मेरे पास बैठ गया है, 'हम तो मिलते रहेंगे, ज्यादा दूर थोड़ी रहते हैं.'(फिर पूरे 3 साल बाद हम मिले!) अमित की packing हो गई है (..और उस packing के साथ उसे आज तक झेल रहा हूँ, मेरा अभी भी roommate है) अरविन्द कि 'मडिया पार्टी' तैयार है (उस दिन से अबतक नहीं मिला 'अरविन्द दाऊ' से). श्री कान्त, जिसके साथ मैंने 6th में बहुत रोया है प्रवीण के साथ बैठा कुछ सोच रहा है (इनसे भी 5 साल से नहीं मिला). बहुत से Juniors रूम में आ गये है, किसी ने मेरी पेंसिल ले ली है, किसी ने पेन. मैं रूम से उठ कर भाग आया.प्रसाद सर के घर तक गया, लेकिन उनका दरवाजा खटखटाने कि हिम्मत नहीं हुयी. बाहर से ही लौट आया.
......पापा आ गये हैं, घंटे भर में मैं जा रहा हूँ. आते वक़्त भी आँसू थे, जाते वक़्त भी हैं.....पहले घर जाने को रोता था, अब घर जाने पर रो रहा हूँ.

feb 2011.....
लगभग सबका placement हो चुका है, सब कहीं ना कहीं चले जायेंगे, सब खुश है, engineering ख़त्म होने पर...मैं भी. लेकिन फिर वही कहानी दुहराई जाएगी, सब अलग-अलग हो जायेंगे. हमारी gang टूट जाएगी. मैं और यश दिन में 4 बार मिलते हैं, और अब वो कहीं और, मैं कहीं और...... अमित भी अब roommate कहाँ रहेगा!कॉलेज में 'आरक्षण' फिल्म कि शूटिंग चल रही है......असली ज़िन्दगी भी तो फिल्म के जैसी ही है, लेकिन एक Circle की तरह पुरानी चीजें यहाँ बार-बार दुहराती हैं!

Friday, February 4, 2011

........ये नींद टूटे ख्वाब ही दिखाती है!!

तुमने छुआ मुझे फिर....वैसे ही उन्नींदे.
जैसे, तारकों के बीच से,
कोई नई आकाश गंगा चमक उठी हो.
या गंगासागर तक का सफ़र गंगे ने
कर लिया हो तय, पल में ही.

चाँद शक्ल बदलता रहा, हर रात....अनवरत.
लेकिन तुम नहीं बदले,
इत्तेफाकन, देखो मैं भी नहीं बदला!!
सच तो ये है, तुम्हारी चाह ने मुझे बदलने नहीं दिया,
और तुम्हें तुम्हारे अहं ने.
मैं अब भी वहीं हूँ, तुम्हारी आस में.
तुम अब भी वहीं ठहरे बेगानी तलाश में!

तुमने छुआ मुझे फिर....वैसे ही उन्नींदे,
नींद के आगोश में, मैंने भी.
तुम्हें नहीं लगता, ये नींद टूटे ख्वाब ही दिखाती है.
जो सपने सच हो जाते हैं, वो नींद में कहाँ आते हैं!

Aarakshan (film)

Deepika Padukode in my colllege. yup. meine dekha,live!! She is b'ful, but not much, little lesser than my girl friend :))..... from Prakash Jha to Amitabh Bachchan, everyone were present in my college and students were treating them like VVVV......(1000 times) IP special (everyone wanna job Jr. artist in the movie).
seen: Deepika walking in the canteen..
take first-
She walked, one of Jr. artist came between.........cut, retake.

take two-
she walked, but not properly.......cut, retake

take third, fourth ,fifth, sixth, seventh.........

just boring......retake, retak, retake........!!!!!

Bechara mei bhag khada hua (film banana itna aasan nhi hai bidu)........Prakash Jha (director, directing this film 'Arakshan') kaise jhelta hoga!!

There is difference b/w Amitji and others (include Saif Ali, Deepika, Manoj Bajpai ).... the difference in treatment, everyone was (from crew) was treating Amitji as PM and others as AAM AADMI.

watch my college (film ki 40% shooting mere college se hai), watch Aarakshan film in september. :))

I am also in a seen........and my Jrs are in many. ::p

Monday, January 31, 2011

BakBak

मैंने एक बात सीखी, the great Indian thinking, एक गवर्मेंट Teacher महीने भर स्कूल नहीं जाता है, और बुराई सिस्टम की करता है, की यहाँ शिक्षा का स्तर डाउन हो रहा है. मध्य प्रदेश में पहली बार किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, और हमारे कृषि मंत्री ( जो खुद ही Agricultural Science से Ph. D हैं) का कमेन्ट आता है कि ''किसान अपने  किये की सजा भुगत रहे हैं. पहले विदेशी खाद का उपयोग किया और धरती बंजर कर दी.'' वाह भाई वाह! मान गये, साल्ला गलतियां खुद करो, गन्दी policies तुम बनाओ, ओला राहत का पैसा अपने रिश्तेदारों को तुम खिलाओ और जब बेचारे पेट के मारे लोग खुद को मारने लगे तो अपनी बेहूदा सी बकबक लेकर शुरू हो जाओ. इन राजनेतिक गधों के कुत्तेपन की कोई हद ही नहीं है. आज राजधानी में मेला लगा, 'अन्त्योदय मेला' सारे प्रदेश के लोग आये एक hope के साथ की कुछ benifit तो मिलेगा उन्हें, और पता है हमारे CM ने उन्हें क्या दिया??  ठेंगा......किसी को कुछ भी नहीं, इन पीड़ितों के लिए सरकार  के  पास कुछ भी नहीं है.निकम्मी सरकार के निकम्मे लोग अच्छाई का मुखोटा लगाये सरकार चला रहे हैं और लोग यहाँ ये सहने पर मजबूर हैं.

 केंद्र में एक साहब ने १.७६ लाख करोड़ का घोटाला किया हुआ है, साल्ले को पता भी नहीं होगा की कितने शून्य होते हैं इसमें. विदेश मंत्री की कुर्सी पे एक येसा बंदा बैठा है जो अपने घर के relations पड़ोसियों के साथ भी नहीं सम्हाल सकता, देश के क्या सम्हालेगा. लोगों का कहना है SC है तो रिवार्ड दिया है, विदेश मंत्रालय के रूप में, जैसे साल्ला विदेश मंत्रालय मंत्रालय ना होकर लड्डू-पेडा हो गया हो, किसी नौकर ने अच्छा काम किया तो दो पेड़े और दे दिए.......भैया देश की बात हो रही है, मजाक नहीं, पूरे  सौ करोड़ लोगों का सबाल है तो मंत्रालय येसे ही कैसे बाँट सकते हैं. नीता रादिया जैसे लोबिस्ट यहाँ भाग्य विधाता बन गये हैं और NDTV जैसे chennels मंत्री बना रहे हैं, जैसे सरदार जी (PM) की औकाद कुछ भी नहीं है, वो सिर्फ स्टंप ले के बैठे हैं, आओ मिलो तो तुमपर भी ठप्पा लगा देंगे. किसी देश के प्रमुख नेता को इतना बेचारा मैंने कभी नहीं देखा ना ही इतिहास में पढ़ा है.
 
तंग आ गया हूँ में इन सब से, इस कीचड से, इस गन्दी व्यवस्था से. पिछले महीने के विधानसभा सत्र के pass रखे रहे मेरे पास, लेकिन मैं नहीं देखने गया, साल्ला इन जुटे-चप्पल फेंकते असभ्यों को देखने का मन ही नहीं किया, और मैंने वही pass बगल बाले अंकल को दिया तो वो ऐसे चहके जैसे लाइफ टाइम  ऑफर मिल रहा हो.

इनके कुत्तेपन ने संन्यास लेने को मजबूर कर दिया है, atleast सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया है.
 
मेरे पापा आये हुए हैं, मुझसे मिलने. अगली बार दुनिया भर पिताओं के ऊपर...........

Sunday, January 23, 2011

Mumbai Diaries (Dhobi Ghat), review and more....

हर Movie में कोई ना कोई किरदार मुझे अपने करीब लगता है, और 'धोबी घाट' का अरुण तो मुझे अपने बिलकुल करीब लगा. वो Artist है, serious है लेकिन Simple भी. कभी वो इतना फालतू है कि यास्मिन के Video घंटो देखता रहता है और कभी इतना Busy कि Paintings से वक़्त ही नहीं मिलता. वो जिस तरह से Serious होकर सोचता है मुझे अच्छा लगता है. उसकी creativity को Area चाहिए, broad एरिया. इसीलिए उसे पुरानी मुंबई में फ्लैट चाहिए. ऐ फिल्म ही किसी epic के पहले अध्याय कि तरह है या किसी महाकाव्य के कुछ अधूरे पन्नों कि तरह जिसके बाकी पन्ने लिखना कवि भूल गया हो. मुन्ना बिलकुल मासूम है, बोलते वक़्त आँखे मिचकाता है, और एक ही वाक्य में बात ख़त्म कर देता है. ...और उसका वो कहना, कि वो दरभंगा बिहार से है, लेकिन घर कि याद नहीं आती क्यूंकि वहां उसे खाने कम मिलता था. मुंबई पता नहीं कितनों के लिए  एक स्वप्न कि तरह है, जाने कितने लोग यहाँ आये और मुन्ना कि तरह ही झुग्गियों में लगभग जानवरों सी ज़िन्दगी जी रहे हैं. मुन्ना चूहे भी मारता है (मुझे अभी पता चला कि गवर्मेंट ने झुग्गियों में चूहे मारने बाले लगा रखे हैं, जिससे प्लेग ना फैले.) और उसे अपने इस काम से नफरत है. लेकिन उसे 'शाई' से प्यार हो गया है. 'शाई' कुछ अजनबी सी है, खुद से ही. banker है लेकिन शौक Photography है. साईं को अरुण से पहली बार में ही प्यार हो गया जैसे उसे भी किसी कि तलाश थी जो उसी कि तरह अधूरा हो. उसे शायद US की साफ़ सड़के अच्छी नहीं लगी इसीलिए Shining India में असली भारत की तस्वीर ले रही है. और सबसे अहम् 'यास्मिन की दीदी' के वो चार विडियो ख़त..पूरी कि पूरी फिल्म उन्ही पे टिकी है. ज़िन्दगी कि जंग में कभी अरमान हमपर भारी होते हैं, कभी ज़िन्दगी और कभी अवसाद. जब अवसाद भारी होते हैं तो हम जंग हारना शुरू कर देते हैं. कितने अरमान के साथ उसे उसके माँ-बाप ने एक मुम्बईया से ब्याह था और वही उसकी ज़िन्दगी ले गया. उसकी आत्महत्या एक हत्या ही तो थी.
       ज़िन्दगी  में सपने पाल लो तो वे हमे अपनी ज़िन्दगी जीने नहीं देते और पूरे हो जाएँ तो बस जीवन ही जी लिया, एक पल में ही. कितनों के सपने ढल गये, कितनों के बह गये. लेकिन मुंबई वहीं खड़ा है, सागर किनारे अपने से बतियाता. Mumbai Diaries यही है, एक क्षितिज जो सपनों को दर्दनाक हकीकत से मिलवाता है.  किरण राव तुम्हें सलाम!

Thursday, January 13, 2011

मुनि क्षमासागर जी एक बहुत बड़े संत का नाम है, जिनका कहा और लिखा किवदंती की तरह प्रसिद्ध हुआ है, 'भारतीय ज्ञानपीठ' द्वारा प्रकाशित उनके काव्य संग्रह 'अपना घर' में से मैं यहाँ दो कवितायें प्रस्तुत कर रहा हूँ. प्रस्तुत कवितायें पढ़कर मुनि श्री का जादू शायद आप पर भी छा जायेगा.

सीढ़ी हूँ

मैं तो
लोगो के लिए
एक सीढ़ी हूँ,
जिस पा
पैर रखकर
उन्हें ऊपर पहुँचना है.

तब सीढ़ी का
क्या अधिकार
की वह सोचे,
की किसने
धीरे से पैर रखा
और कौन
उसे रौंदता चला गया.
              
               -मुनि श्री क्षमासागर जी
............

स्वयं अकेला

उसने
चाहा कि
उसके सब ओर
सागर हो
और अब
जब उसके
सब ओर
सागर फैला है,
वह स्वयं
एक द्वीप कि तरह
निर्जन
और अकेला है.

                 -मुनि श्री क्षमासागर जी

Saturday, January 8, 2011

बकबक

     'मैं गाँव से हूँ, मुझे नहीं पता क्या सच है क्या नहीं. लेकिन विकास पंहुचा हो या नहीं , साम्प्रदायिकता ज़रूर वहां पहुच गई है.' मैं चिल्ला कर कहता हूँ.
       'चिल्ला क्यूँ रहे हो?'
       'तो तुम अपनी बक-बक कब बंद करोगी? caste, caste, caste, भाड़ में गई ये caste, ये religion, ये बकबास.'
       'तो मैं क्या करूं? मैंने बनायी थी क्या?' .....बस मैं अपने पापा के oppose मैं नहीं जाउंगी.'
       'हां मुझे पता है, और मैं भी यही समझा रहा था. हम आगे तक नहीं जायेंगे लेकिन उसके लिए caste reason नहीं होगी, permission होगी. तुम्हें पता है? तुम्हें अपने माँ-बाप से ज्यादा कोई प्यार नहीं कर सकता, कभी नहीं.' मैं शालीनता से कहता हूँ.
       'ये 'माँ-बाप' वाला dilogue कहाँ से मारा?' वो उसी अदा से कहती है.
       'मेरे TPO ने बोला था एक दिन.' वो सुन कर मुस्कुरा दी. 'लेकिन एक बात बताओ, मुझे हमेशा येसी ही लडकियां क्यों मिलती हैं?' मैंने धीरे देकर कहा.
      'तुम्हारी choice ही गन्दी है.''
      'क्यूँ मैंने तुम्हें choose नहीं किया था.'
      'हाँ मैंने किया था, अब खुश! तुम कितने proudy हो. उसको तो तुमने किया था. हाँ, पता, वो तुमसे ज्यादा proudy है......तभी ना तुम्हें पानी पिला गई. हाहाहा.....' खिलखिला दी. उसका हंसना हमेशा अच्छा लगता है.
     'वो मेरी गलती थी.'
     'हाँ मुझे पता है, मेरी गलतियों पर भी तुम्ही सॉरी बोलते हो. हमेशा तुम ही गलत होते हो. देश के किसान मरे तो दुःख तुम्हें होता है, घोटाले हों तो भी तुम्हें दुःख होता है. जैसे सारे काम तुमने ही किये हों? मुझे पता है, तुम गलत नहीं हो. इश्क कोई खता नहीं, और उसे जताना भी.' वो कुछ serious हो कर बोली.
अब मेरी बारी थी, 'ये लास्ट बाला dilogue तुमने कहाँ से मारा?'
    'वो पढ़ा था कहीं, सिर्फ तुम्ही नहीं पढते-लिखते, कुछ-कुछ मैं भी करती हूँ.'
    'हाँ एक और बात, तुम अच्छे हो, thats why i love you, और मेरी choice कभी गलत नहीं होती.....'हम्म्म्म....'now i am leaving, भैया आ गये होंगे घर पर. तुम्हें छोड़ दूं? गाड़ी कब चलाना सीखोगे. तुम्हें तो बस Aptitude ही आता है, बस और कुछ नहीं.... बैठो....'

'..........काश तुम गलत होती....मैं तो बस उसे सही होते देखना चाहता हूँ. काश तुम मुझे ही गलत ठहराती..........'

*Story and Feelings are Real but not mine.

Wednesday, January 5, 2011

इंसान इंसान को कहाँ छूते हैं!

तेरे जो हैं, तूने लूटे हैं,
मेरे जो हैं, मेरे बूते हैं.

तेरा हर झूठ सच्चा है,
मेरे सारे ख्वाब ही झूठे हैं.

मुस्कुराने में ज़रा वक़्त लगेगा,
अपनी रूह से ही आप रूठे हैं.

खुदा भी मेरा हमराही है,
उसके भी कई ख्वाब टूटे हैं.

बड़ी मुद्दत से बनाया इंसान,
इंसान इंसान को कहाँ छूते हैं!

Sunday, January 2, 2011

.....रख सकता हूँ अपना ख्याल माँ!

तो तुम हो वो......
जो अनचाहे ही,
आ जाते हो,
कभी भी-कहीं भी,
बेवजह ही,
बिन कहे ही.

मैं नहीं चाहता,
इस तरह तुम यकायक से आओ..
बिन कहे ही,
मेरी संग चलो,
मुझे बिन बताये ही.

मैं रख सकता हूँ अपना ख्याल.
बच्चा नहीं रहा अब. 

तुम्हारे जन्म देने से अबतक,
पूरे कर लिए हैं कई पड़ाव.
......और फिर हमेशा ही बनी रही है आपकी छाँव.

अब मैं बच्चा नहीं रहा ना!
तो रख सकता हूँ अपना ख्याल माँ. 

~V!Vs***

Friday, December 17, 2010

कुछ अधूरे पन्ने......

May 2004....
पापा का हॉस्पिटल भी अजीब है, उसने मौत  को ज़िन्दगी से आगे निकलते देखा  है. जैसे उसे नहीं पता मौत क्या होती है, ज़िन्दगी क्या. मैं खुश हूँ दसवीं का रिजल्ट आया है, पर उस ढाई साल के मासूम का क्या जिसे आग का मतलब भी पता नहीं था.'अब ये मेरे बस में नहीं है छतरपुर ले जाना पड़ेगा'. Basic Treatment के बाद पापा ने सिटी रेफेर करने को बोल दिया. 'डॉक्टर साब पैसे नहीं हैं'. पापा ने चुपचाप 500 का नोट निकाल कर दे दिया. वो दुखिमन दुआ देता हुआ चला गया. 'अब ये नहीं बचेगा 80% जल चुका है.' पापा ने मेरी तरफ मुड़ते कहा. पापा की कोरें भीगी हुई हैं.
ये ख़ुशी भी अजीब होती है, खुश रहने कहाँ देती है!

March 2008...
इंजीनियरिंग मैं 'Sad Stories' नहीं होती, लेकिन Panjaabi sir को देखता हूँ तो  ये बात भी झूठ लगने लगती है. वो गर्व से बोलते हैं, वो 'Jyoti Talkies Circle' है  वो मेरे बेटे ने डिजाईन किया है...फिर 80 साल की बूढी आँखें छत ताकने लगती हैं. इस उम्र में Daily Basis पे  Lectures लेना उनका शौक है मजबूरी, उनकी कांपती हड्डियां बता ही देती हैं. आज बस इतना ही, वो Basic Civil की किताब उठा दरबाजे की तरफ बढ जाते हैं. मैं चुपचाप उन्हें जाते देखता हूँ. कहते हैं बहुत सी चीजें छुपाये नहीं छुपती.

May 2008...
कॉलेज  के एक Senior  के पापा  बीमार  हैं, उसके दोस्त  इलाज़  के लिय पैसे जोड़ रहे  हैं......लड़का हॉस्पिटल में है......उसके दोस्तों  के चेहरों  में  मुझे खुदा  नज़र  आता  है. एक Classmate  ने  100 रूपये  दिए  हैं.......ये 50 रूपये  वापस  लो, 50 रूपये से ज्यादा मत दो, तुम्हारे घर  से भी  तो  सीमित पैसे आते हैं.... बाहर सिगरेट  के टपरे पर  आज  कुछ  कम भीड़ देख  अच्छा लगता  है.


Oct 2008...
अबे पी ना, पी के देख, सोमरस है....मैं मुस्कुरा कर मना करता हूँ. ....अब  पेपर  उठा  लिया  हाथ  में  उसने, अबे ये लोग पी  कर गाड़ी  क्यूँ  चलाते  हैं, मरेंगे  ही साले, वो पेपर पढ़ के बोलता है...... उसे भी 10km दूर अपने रूम जाना  है, रात में ही...... अबे अभी तो 3 ही हुए हैं, 5 तक तो मुझे होश रहता है..... मैं मुस्कुराता हूँ.

Jan 2009...
मैं इस जगह नया नया रहने या हूँ..चाय के टपरे पर चाय पी रहा हूँ. 'भैया एक रूपये देदो ना.' चिथड़ों में एक 7-8 साल का लड़का पैसे मांग रहा है. 'अबे जा यहाँ से.' चायबाला चिल्लाता है. मैं एक रुपया दे देता हूँ. 'कितनों को पैसे दोगे भैया, यहाँ बहुत आते है.'....एक तरफ काले, बदसूरत लड़के मायूस से पैसे मांग रहे हैं....वहां HPCL के ग्रौंद पे गेंद खेली जा रही है. 'इनमें और उनमे सिर्फ एक गेंद का फ़र्क है.' यश दार्शनिक अंदाज़ में दुखी हो कहता है. मैं बस हाँ में जबाब देता हूँ.

Oct 2009...
फ़ोन बजा 'पचमढ़ी चलोगे आज रात?'...'किससे?'....'bike से जा रहे हैं, चलना हो तो चलो.'  मामी बैठी हुई हैं, 'विवेक, bike से मत जाना, मना कर दो.' मैं मना कर देता हूँ. सुबह फ़ोन बजा-'विवेक वो accident हो गया है, नर्मदा हॉस्पिटल पहुँचो.' मैं पहुँचता हूँ, सुबह 5.00 बजे निकले थे पचमढ़ी को, होशंगाबाद के पहले accident हो गया. यही एक गाड़ी थी जिसपे 2 लोग बैठे थे........अगर मैं गया होता तो इसी पे बैठता, सोचकर मैं सिहर उठता हूँ. ..........पहली बार किसी funeral में गया हूँ, एक्सिडेंट के बाद एक महीने ज़िन्दगी से लड़ते-लड़ते दोस्त नहीं रहा. बिहार से था...उसके पापा का चेहरा देखने की हिम्मत नहीं होती......लौट के आ बाथरूम में रो पड़ता हूँ. नहाते हुए आंसू भी धुल से जाते हैं..............एक महीने बाद सब नोर्मल है.

April 2010...
'मैं उसी से शादी करूंगी' वो मुस्कुरा के बोलती है......मैं Coaching के बाद Daily उसे स्टॉप तक छोड़ने जाता हूँ.  मेरे से 3 साल बड़ी है लेकिन मैंने आज तक उससे अच्छी लड़की नहीं देखी. उसे एक लड़के से प्यार, पंजाबी है लड़का, वो ब्रह्मिन....उसकी शादी तय हो रही है कहीं और, लड़का 1 Lakh per Month कमाता है, MNC में है. वो घर बालों को अपने प्यार के बारे में बता देती है. मैं उसे मुर्ख कहता हूँ.....लेकिन शायद वो अच्छी है, तो अच्छी है....उसके घर बालों ने अब उसका घर से निकलना बंद करवा दिया है. इश्क के पहरे क्यूँ हैं?

Aug 2010...
मेरे यहाँ जुलूस निकला है, मैं भगवान् की कांवर उठाये हुए हूँ. फ़ोन बजता है,फ़ोन पे Sumit है 'वो 'उसके' पिताजी नहीं रहे.' वो दुखी हो बोलता है. वो मेरे सबसे अच्छे दोस्त के बारे में बात कर रहा था.मैं निःशब्द हूँ. एक प्रश्न है, हम भगवान् क्यूँ पूजते हैं? अपनों की सलामती के लिए ही ना!
मैंने मंदिर जाना छोड़ दिया है.

Dec 2010...
कुछ नहीं. कुछ अधूरे पन्ने स्याह भी हैं.