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Friday, December 5, 2014

'गोलू' तुम्हारे लिए




              अगर हथौड़ा होता मेरे पास तो मैं वक़्त तोड़ डालता...एक एक पल रखता और 'धाड़' से करता चकनाचूर... लेकिन मुझे हथौड़ा चलाना नहीं आता और लम्हे भी तो साल्ले कांच के नहीं बने होते!... खैर इतना मुझे पता है कि तुम्हें पढ़ने में दिक्कत होगी और शायद समझने में भी... उतनी ही जितनी कि मुझे कन्नड़ समझने में होती है... लेकिन फिर भी तुम पढोगे... तुम शायद यकीन करो तो मैसूर से जो मैंने पाया है और जो अब तक बचा के अपने पास रखा है उनमें से एक तुम हो. खैर अगर तुम मेरी अच्छी दोस्त नहीं होती तब भी उतनी ही स्वीट होती और उतनी ही अच्छी... जितनी हो. सच कहूँ, तुम्हारे कल के लिए थोड़ा सा डर रहा हूँ. तुम जैसे हो बस मैं हमेशा तुम्हें वैसे ही देखना चाहता हूँ.. बेपरवाह, खुश-दिल और हँसते हुए. शादी मुबारक 'गोलू'. मेरा अभी वहां न होना एक छोटा पल है और कभी मेरा वहां होना एक खूबसूरत लम्हा होगा...

Friday, August 5, 2011

प्यार, इश्क.....और मोहब्बत

 प्यार-                                                                                                                               'मुझे नहीं पता ये क्या है, but मुझे तो अब खुद पे ही doubts हैं. उसने मुझे function में इतनी बार बुलाया फिर भी मैं तुम्हारे साथ क्यूँ गयी, जबकि मैं पहले भी जा  चुकी थी. पता नहीं लेकिन तुम्हे मैं preference दे रही हूँ.' वो बोलती है...... मैं मुस्कुराता हूँ, कहता कुछ नहीं, कहना चाहता हूँ, ये तो मुझे पिछले कई सालों से हो रहा है लेकिन चुप रहता हूँ. 'ये प्यार नहीं है, तुम्हे पता है न मेरे पापा-मम्मी नहीं मानेंगे, और मैं उनके खिलाफ नहीं जाउंगी, तुम समझ रहे हो न मैं क्या कह रही हूँ? और मैं अपने अन्दर कोई doubts भी नही रखना चाहती.' वो फिर से बोलती है......मैं बस मुस्कुराता हूँ. .....पीछे कहीं से song बज रहा है 'मैं तेरी आँखों में रहता हूँ, तुझे पता न चले'......Jal उसका favorite band है.   

श्क -    
'उसका कॉल आया था, बोल रही थी, मैं उसे भूल जाऊ. एसे कैसे भूल जाऊ यार, येसा थोड़ी न होता है.'  वो बोलता है.....मैं निःशब्द हूँ. ज़िन्दगी सीधे तरीके से क्यूँ नहीं चल सकती है! सोचता हूँ, लेकिन चुप अब भी हूँ. अभी सात-आठ महीने पहले कि ही तो बात थी जब उसकी गर्लफ्रेंड बीमार हुई थी, और उसे कुछ भी याद नहीं था, यहाँ तक कि अपने माँ-बाप भी नहीं, अपना नाम भी नही but उसे अपने बॉयफ्रेंड, मेरे सामने बैठे दोस्त का नाम ज़रूर याद था और वही बोल रही थी बस!! 'क्या तुझे लगता है वो तुझसे प्यार नहीं करती?' मैं अपना मुंह खोलता हूँ. 'पागल है क्या?' वो अजीब तरीके से देखता है, हमारी चाय ख़त्म हो चुकी है और तीसरी बार दो चाय का आर्डर करता हूँ. 'साल्ले तुझे लगता है? तीन साल का प्यार तीन दिन में ख़त्म हो जाता है क्या? उसके बाप ने मना किया होगा.' 'तो उसे प्रॉब्लम क्या है यार?  u r placed in a  good-company- और u r a good guy ! और क्या चाहिए उसे?'..... 'पैसा! मेरा बाप करोडपति नही है, शायद हमारा status मैच नहीं करता.' वो चश्मे से देखता हुआ कहता है.........मुझे पता है उसकी गर्लफ्रेंड का बाप उससे अच्छा लड़का नही ढून्ढ पायेगा, ना ही उससे अच्छी जॉब बाला......फिर भी 'तेरे ससुर को क्या तेरी गर्लफ्रेंड कि शादी तेरे बाप से करानी है?' कहते-कहते रुक जाता हूँ. चाय ख़त्म हो गई है.....मैं चोथी चाय आर्डर करते करते रुक जाता हूँ........मुझे अपनी का ज्यादा चाय पीने  से मना करना याद आ जाता है.

और मोहब्बत....
'साल्ले ज़िन्दगी ट्रायोड नहीं है, यहाँ दो ही चीज़ होती हैं या तो 'हाँ' या 'न' पूछ अपनी उस 'मे बी, मे नोट बी टाइप कंफ्यूज्ड गर्लफ्रेंड से.....या तो इस पार जाए या उस पार........और वैसे भी तू बचपन से बायनरी पढ़ रहा है लेकिन आज तक तुझे ये समझ नहीं आया की ज़िन्दगी भी बायनरी समझती है.' वो लगभग चिल्लाते हुए कहता है. '.....और सच तो ये है की तेरे होने या न होने से उसे कोई फर्क नहीं पडता, रत्ती भर भी नहीं.....और अगर पडता होता तो तेरा कॉल ज़रूर उठा रही होती. साल्ला दिल की एक 'सेल'(कोशिका) भी दर्द करे तो तो पूरा शरीर दहलता है....तू तो समझ रहा होगा न! तेरा जो हाल है, वही हाल उसका होता. लेकिन नहीं है, अगर होता तो तेरे 25 काल्स में से एक का जबाब तो देती, या एक मेसेज ही करती ....'    ........मैं शांत रहकर उसकी बात सुनता रहता हूँ. मुझे पता है वो सही कह रहा है.......पूरा नहीं तो थोड़ी बहुत सो सच्चाई है........'चल अब कहीं मूड फ्रेश करने चल. वो मेरा हाथ पकड़ लगभग खींचते गले लगा लेता है. वो मेरी नम आँखों को पढ़ सकता है. मैं कहना चाहता हूँ यही तो मोहब्बत है. हम यादव की चाय पीने जा रहे हैं......सुना है जो दारु नहीं पीते चाय से काम चलाते हैं.

                  

                                                                                                          ~VIVs***


Thursday, April 7, 2011

BakBak: Yeh Saali Zindagi

        Enrique चाचू के पाँचों एल्बम बार-बार सुनने के बाद अब नये सिंगर को खोजा जा रहा है,  और खोज ख़त्म हुई है Arash पर, इनके फारसी गाने समझ में न आये लेकिन ताश के पत्तों के बीच  सिर्फ म्यूजिक ही याद रहता है, इसलिए हमें ज्यादा फर्क नहीं पड़ता...... इसके साथ  'Always' सोंग गाने बाली Aysel की आवाज़ तो 'सुपर सेक्सी' है....दोस्त की बात सुन हम हँसते हैं.......2 महीने का कॉलेज, फिर पकाऊ ज़िन्दगी, कॉलेज के इस तरफ हम ज़िन्दगी को घुमाते हैं, और उस तरफ ज़िन्दगी हमें......'रंग दे बसंती' का हर डायलोग सच नज़र आता है.....

      'सॉरी, वो उस दिन के लिए तुम गुस्सा तो नहीं थे न?' वो बोलती है......दुनिया की जहां आधी आवादी को खाने को नहीं मिलता है, जहां 66% भारतीय बच्चे कुपोषित हैं, जहां सरकारें बजट का 70% तक खुद डकार जाती हैं, और बच्चे 'माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर, जाढे की रात बिताते हैं', वहीं इन्हें इन फ़ालतू के Emotions की पड़ी है, कितने लकी हैं हम जिनका पेट भरा है, तो इश्क के बारे में सोच तो सकते हैं. अभी इतनी रात को फुटपाथ पर भूखे बैठे होते तो चाँद में भी रोटी नज़र आ रही होती, उसकी शक्ल नहीं.......मैं मेरे पापा को थैंक्स कहता हूँ की उन्होंने इतना कमाया की हमारा पेट भरा है और इतना Capable बनाया की अपना पेट भर सकता हूँ, जबकि देश की आधी आवादी मूलभूत रोटी, कपडा और मकान के लिए तरश रही है........और इसलिए भी की उन्होंने उस वहां हेल्थ फेसिलिटीज़ दी, जहां से एक ढंग का अस्पताल 50 किलोमीटर दूर है, और जाने के साधनों में सिर्फ ट्रेक्टर है.....बेचारा बीमार तो पहुँचते-पहुँचते ही मर जायेगा......
             ' तुम Administration (PSC) की तैयारी करो, तुम्हारा GK अच्छा है.'......मेरे अन्दर एक प्रश्न है, अफसर बनकर किसपर हुक्म चलाओगे? यहांके आधे लोग इतने भूखे की एक हज़ार रूपये के लिए कई जान ले ले और साहूकारों के सामने बहु-बेटियाँ तक चढाने को तैयार हैं, जब कुछ भी नहीं है बेवसी में आत्महत्या कर रहे हैं या इतने सताए की आप उनपर अपना शासन चला के भी कुछ नहीं उखाड़ पाओगे, हज़ारों बर्वरता से पुलिस द्वारा मारे जाते हैं, और आतंकी या नक्सली करार कर दिए जाते हैं, या कुछ इतने निष्ठुर की चंद पैसों से आगे उनके सोचने की क्षमता नहीं जाती......कभी-कभी लगता है, हम उस दल-दल के कीड़े है, जिन्हें रेंगना है, और वो भी उतना ही जितना की सरकार हुक्म दे.....हुक्मरानों की बिछाई बिसात पे मोहरे बदले जाते हैं और हम तो वो पैदल भी नहीं जिन्हें जंग में ही सही कम से कम इज्ज़त की मौत तो नसीब होती है......मैं कभी-कभी चीखना चाहता हूँ, कि मैं इस दल-दल का हिस्सा बनना नहीं चाहता.

                 सड़क पर कचरा बीनने बाले बच्चे 'Right to Education' पर गन्दा मज़ाक लगते हैं, उन्ही में से कोई सड़क पर हादसे का शिकार हो जाये.........और उसके शरीर को उठाने बाला भी कोई न हो तो........!!!.......... लावारिश सी ज़िन्दगी में वो लावारिश लाश ज़िन्दगी भर याद रहेगी. 

कुछ हाल भोपाल की सडको से--

                  




              ******

अन्ना हजारे, तुम्हारे प्रयास व्यर्थ न जाये.........तुम्हें प्रणाम!!

Friday, February 4, 2011

Aarakshan (film)

Deepika Padukode in my colllege. yup. meine dekha,live!! She is b'ful, but not much, little lesser than my girl friend :))..... from Prakash Jha to Amitabh Bachchan, everyone were present in my college and students were treating them like VVVV......(1000 times) IP special (everyone wanna job Jr. artist in the movie).
seen: Deepika walking in the canteen..
take first-
She walked, one of Jr. artist came between.........cut, retake.

take two-
she walked, but not properly.......cut, retake

take third, fourth ,fifth, sixth, seventh.........

just boring......retake, retak, retake........!!!!!

Bechara mei bhag khada hua (film banana itna aasan nhi hai bidu)........Prakash Jha (director, directing this film 'Arakshan') kaise jhelta hoga!!

There is difference b/w Amitji and others (include Saif Ali, Deepika, Manoj Bajpai ).... the difference in treatment, everyone was (from crew) was treating Amitji as PM and others as AAM AADMI.

watch my college (film ki 40% shooting mere college se hai), watch Aarakshan film in september. :))

I am also in a seen........and my Jrs are in many. ::p

Monday, January 31, 2011

BakBak

मैंने एक बात सीखी, the great Indian thinking, एक गवर्मेंट Teacher महीने भर स्कूल नहीं जाता है, और बुराई सिस्टम की करता है, की यहाँ शिक्षा का स्तर डाउन हो रहा है. मध्य प्रदेश में पहली बार किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, और हमारे कृषि मंत्री ( जो खुद ही Agricultural Science से Ph. D हैं) का कमेन्ट आता है कि ''किसान अपने  किये की सजा भुगत रहे हैं. पहले विदेशी खाद का उपयोग किया और धरती बंजर कर दी.'' वाह भाई वाह! मान गये, साल्ला गलतियां खुद करो, गन्दी policies तुम बनाओ, ओला राहत का पैसा अपने रिश्तेदारों को तुम खिलाओ और जब बेचारे पेट के मारे लोग खुद को मारने लगे तो अपनी बेहूदा सी बकबक लेकर शुरू हो जाओ. इन राजनेतिक गधों के कुत्तेपन की कोई हद ही नहीं है. आज राजधानी में मेला लगा, 'अन्त्योदय मेला' सारे प्रदेश के लोग आये एक hope के साथ की कुछ benifit तो मिलेगा उन्हें, और पता है हमारे CM ने उन्हें क्या दिया??  ठेंगा......किसी को कुछ भी नहीं, इन पीड़ितों के लिए सरकार  के  पास कुछ भी नहीं है.निकम्मी सरकार के निकम्मे लोग अच्छाई का मुखोटा लगाये सरकार चला रहे हैं और लोग यहाँ ये सहने पर मजबूर हैं.

 केंद्र में एक साहब ने १.७६ लाख करोड़ का घोटाला किया हुआ है, साल्ले को पता भी नहीं होगा की कितने शून्य होते हैं इसमें. विदेश मंत्री की कुर्सी पे एक येसा बंदा बैठा है जो अपने घर के relations पड़ोसियों के साथ भी नहीं सम्हाल सकता, देश के क्या सम्हालेगा. लोगों का कहना है SC है तो रिवार्ड दिया है, विदेश मंत्रालय के रूप में, जैसे साल्ला विदेश मंत्रालय मंत्रालय ना होकर लड्डू-पेडा हो गया हो, किसी नौकर ने अच्छा काम किया तो दो पेड़े और दे दिए.......भैया देश की बात हो रही है, मजाक नहीं, पूरे  सौ करोड़ लोगों का सबाल है तो मंत्रालय येसे ही कैसे बाँट सकते हैं. नीता रादिया जैसे लोबिस्ट यहाँ भाग्य विधाता बन गये हैं और NDTV जैसे chennels मंत्री बना रहे हैं, जैसे सरदार जी (PM) की औकाद कुछ भी नहीं है, वो सिर्फ स्टंप ले के बैठे हैं, आओ मिलो तो तुमपर भी ठप्पा लगा देंगे. किसी देश के प्रमुख नेता को इतना बेचारा मैंने कभी नहीं देखा ना ही इतिहास में पढ़ा है.
 
तंग आ गया हूँ में इन सब से, इस कीचड से, इस गन्दी व्यवस्था से. पिछले महीने के विधानसभा सत्र के pass रखे रहे मेरे पास, लेकिन मैं नहीं देखने गया, साल्ला इन जुटे-चप्पल फेंकते असभ्यों को देखने का मन ही नहीं किया, और मैंने वही pass बगल बाले अंकल को दिया तो वो ऐसे चहके जैसे लाइफ टाइम  ऑफर मिल रहा हो.

इनके कुत्तेपन ने संन्यास लेने को मजबूर कर दिया है, atleast सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया है.
 
मेरे पापा आये हुए हैं, मुझसे मिलने. अगली बार दुनिया भर पिताओं के ऊपर...........

Sunday, January 23, 2011

Mumbai Diaries (Dhobi Ghat), review and more....

हर Movie में कोई ना कोई किरदार मुझे अपने करीब लगता है, और 'धोबी घाट' का अरुण तो मुझे अपने बिलकुल करीब लगा. वो Artist है, serious है लेकिन Simple भी. कभी वो इतना फालतू है कि यास्मिन के Video घंटो देखता रहता है और कभी इतना Busy कि Paintings से वक़्त ही नहीं मिलता. वो जिस तरह से Serious होकर सोचता है मुझे अच्छा लगता है. उसकी creativity को Area चाहिए, broad एरिया. इसीलिए उसे पुरानी मुंबई में फ्लैट चाहिए. ऐ फिल्म ही किसी epic के पहले अध्याय कि तरह है या किसी महाकाव्य के कुछ अधूरे पन्नों कि तरह जिसके बाकी पन्ने लिखना कवि भूल गया हो. मुन्ना बिलकुल मासूम है, बोलते वक़्त आँखे मिचकाता है, और एक ही वाक्य में बात ख़त्म कर देता है. ...और उसका वो कहना, कि वो दरभंगा बिहार से है, लेकिन घर कि याद नहीं आती क्यूंकि वहां उसे खाने कम मिलता था. मुंबई पता नहीं कितनों के लिए  एक स्वप्न कि तरह है, जाने कितने लोग यहाँ आये और मुन्ना कि तरह ही झुग्गियों में लगभग जानवरों सी ज़िन्दगी जी रहे हैं. मुन्ना चूहे भी मारता है (मुझे अभी पता चला कि गवर्मेंट ने झुग्गियों में चूहे मारने बाले लगा रखे हैं, जिससे प्लेग ना फैले.) और उसे अपने इस काम से नफरत है. लेकिन उसे 'शाई' से प्यार हो गया है. 'शाई' कुछ अजनबी सी है, खुद से ही. banker है लेकिन शौक Photography है. साईं को अरुण से पहली बार में ही प्यार हो गया जैसे उसे भी किसी कि तलाश थी जो उसी कि तरह अधूरा हो. उसे शायद US की साफ़ सड़के अच्छी नहीं लगी इसीलिए Shining India में असली भारत की तस्वीर ले रही है. और सबसे अहम् 'यास्मिन की दीदी' के वो चार विडियो ख़त..पूरी कि पूरी फिल्म उन्ही पे टिकी है. ज़िन्दगी कि जंग में कभी अरमान हमपर भारी होते हैं, कभी ज़िन्दगी और कभी अवसाद. जब अवसाद भारी होते हैं तो हम जंग हारना शुरू कर देते हैं. कितने अरमान के साथ उसे उसके माँ-बाप ने एक मुम्बईया से ब्याह था और वही उसकी ज़िन्दगी ले गया. उसकी आत्महत्या एक हत्या ही तो थी.
       ज़िन्दगी  में सपने पाल लो तो वे हमे अपनी ज़िन्दगी जीने नहीं देते और पूरे हो जाएँ तो बस जीवन ही जी लिया, एक पल में ही. कितनों के सपने ढल गये, कितनों के बह गये. लेकिन मुंबई वहीं खड़ा है, सागर किनारे अपने से बतियाता. Mumbai Diaries यही है, एक क्षितिज जो सपनों को दर्दनाक हकीकत से मिलवाता है.  किरण राव तुम्हें सलाम!