Dear Shaurya,
अप्पू बुआ ने जो किताब भेजी है वह बड़ी सुंदर किताब है। अप्पू बुआ बहुत सुंदर किताबें भेजती हैं। मुझे याद है जब वो इन्फोसिस में मेरे साथ थी तो उसके पास डायरी ऑफ अ विम्पी किड (Diary Of A Wimpy Kid) की पूरी सीरीज थी! मैंने उस किताब का नाम बस सुना था। असल में, अप्पू का दिल आज भी एक बच्चे सा स्वच्छ और पाक-साफ है। मैंने बहुत कुछ उससे सीखा है।
शौर्य, चलो इस पत्र को आगे बढ़ाते हैं। जैसा कि मैंने तुम्हे पढ़कर सुनाया, अभिजीत बनर्जी का जन्म 1961 में मुंबई में हुआ और उनकी पढ़ाई कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज, फिर दिल्ली के JNU और अंत में अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुई। आज वे MIT में प्रोफ़ेसर हैं। 2019 में उन्हें अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला, अपनी पत्नी और सहयोगी एस्थर डुफ्लो और माइकल क्रेमर के साथ। पुरस्कार "वैश्विक गरीबी घटाने के प्रयोगात्मक तरीक़े" (Experimental Approach to Alleviating Global Poverty) के लिए दिया गया था। इस पुरस्कार के पहले उनका नाम बहुत कम भारतीयों ने सुना था। मैंने इसलिए सुना था क्योंकि मैंने उनके काम से संबंधित किताब 'पुअर इकोनॉमिक्स' (Poor Economics) पढ़ी थी। उसमें लेखकों ने अच्छे से अपने काम को एक्सप्लेन किया है। "वैश्विक गरीबी घटाने के प्रयोगात्मक तरीक़े" ये शब्द जितने भारी लगते हैं, विचार उतना ही सीधा है: जो उपाय हम विपन्नता मिटाने के लिए अपनाते हैं, क्या वे सच में काम करते हैं, और कितना?
दशकों तक इस पर बड़ी बहसें होती रहीं। कोई कहता था कि गरीब देशों को ज़्यादा विदेशी मदद दो, कोई कहता था कि मदद से कुछ नहीं होता, बाज़ार (Market) पर छोड़ दो। दोनों पक्ष बड़े-बड़े सिद्धांत देते थे, पर खेतों, स्कूलों और अस्पतालों में असल में क्या हो रहा है, इसके सबूत बहुत कम थे। बनर्जी और डुफ्लो ने कहा कि बड़े सवाल को छोटे-छोटे सवालों में तोड़ो और हर एक की जाँच करो। जैसे:- बच्चे स्कूल जाकर भी सीखते क्यों नहीं? टीके मुफ़्त हैं, फिर भी माँएँ बच्चों को क्यों नहीं लातीं? इन्हें परखने के लिए उन्होंने वही तरीक़ा अपनाया जो दवाइयों के परीक्षण में होता है। एक जैसे गाँव या स्कूल चुनकर लॉटरी से बाँट दिए जाते हैं। कुछ में नया उपाय आज़माया जाता है और कुछ में नहीं, और फिर दोनों की तुलना होती है। चूँकि चुनाव संयोग से हुआ, दोनों समूहों में जो भी फ़र्क़ आए, वह उपाय का ही असर माना जाता है। इसे रैंडमाइज़्ड कंट्रोल ट्रायल (RCT) कहते हैं।
इसी सोच को संस्था का रूप देने के लिए 2003 में उन्होंने डुफ्लो और सेंधिल मुल्लाइनाथन के साथ मिलकर MIT में J-PAL (अब्दुल लतीफ़ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब) शुरू की। आज इससे जुड़े शोधकर्ता दुनिया के कई दर्जन देशों में हज़ार से ज़्यादा परीक्षण कर चुके हैं। खास बात यह है कि ये लोग सिर्फ़ शोध-पत्र नहीं छापते। सरकारों और संस्थाओं के साथ मिलकर देखते हैं कि जो उपाय कारगर निकला, उसे बड़े पैमाने पर कैसे लागू किया जाए।
अब उनके कुछ शोध देखो, जो मुझे सबसे दिलचस्प लगे।
पहला राजस्थान के उदयपुर ज़िले का है, जहाँ "सेवा मंदिर" संस्था के साथ टीकाकरण पर प्रयोग हुआ। समस्या यह थी कि शिविर अक्सर लगते ही नहीं थे, क्योंकि नर्स गायब रहती थी, और लगते भी थे तो लोग कम आते थे। जब शिविरों को भरोसेमंद बनाया गया, यानी तय दिन पर ज़रूर लगें, तो पूरा टीकाकरण पाने वाले बच्चे लगभग 6 प्रतिशत से बढ़कर करीब 18 प्रतिशत हो गए। जब इसके ऊपर हर टीके पर परिवार को एक किलो दाल भी दी गई, तो यह आँकड़ा लगभग 38 प्रतिशत तक पहुँच गया। शायद जब तुम बड़े हो जाओगे तो इस बात पर हैरान होगे कि एक किलो दाल इतना बड़ा फ़र्क़ ला सकती है। पर यह हमें बताता है कि लोग टीके के फ़ायदे को नकारते नहीं हैं। उनके पास बस समय कम है, रोज़ की मजदूरी छूटती है, और आगे के फ़ायदे से ज़्यादा भारी आज की मुश्किलें होती हैं। थोड़ा-सा सहारा वह रुकावट हटा देता है। भारत सरकार ने इस प्रयोग के महत्व को समझा और अब सप्ताह का एक दिन (शायद प्रत्येक मंगलवार) टीके के लिए निश्चित है।
दूसरा शोध शिक्षा का है और मेरे हिसाब से उनका सबसे प्रभावशाली काम है। मुंबई और वडोदरा के स्कूलों में "प्रथम" संस्था के साथ बालसखी कार्यक्रम चला, जिसमें उसी मोहल्ले की कम पढ़ी-लिखी युवा महिलाएँ पिछड़े हुए बच्चों को अलग से पढ़ाती थीं। नतीजा यह रहा कि बच्चों के सीखने में साफ़ सुधार हुआ और खर्च बहुत कम आया। आगे चलकर इस समझ से Teaching at the Right Level (TaRL) का तरीक़ा निकला। इसमें बच्चों को कक्षा के हिसाब से नहीं, बल्कि उनके असली स्तर के हिसाब से बाँटा जाता है। जो तीसरी कक्षा में है पर अक्षर नहीं पढ़ पाता, उसे पहले वहीं से शुरू कराया जाता है जहाँ वह खड़ा है। यह तरीक़ा भारत के लाखों बच्चों तक पहुँचा और अफ़्रीका के कई देशों ने भी इसे अपनाया। एक साधारण-सी बात, कि पाठ्यक्रम से पहले बच्चे को देखो, सबूतों की वजह से नीति बन गई।
तीसरा शोध सूक्ष्म-ऋण यानी माइक्रोक्रेडिट पर है। दुनिया भर में माना जाता था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को छोटे कर्ज़ दे दो तो वे अपना धंधा खड़ा करके विपन्नता से बाहर आ जाएँगे। हैदराबाद में हुए प्रयोग में पाया गया कि कर्ज़ से कुछ लोगों ने छोटे कारोबार ज़रूर शुरू किए, पर औसतन उनकी कमाई, स्वास्थ्य या बच्चों की पढ़ाई में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा। यह नतीजा कड़वा था, पर उपयोगी भी, क्योंकि इससे पता चला कि माइक्रोक्रेडिट कोई जादू की छड़ी नहीं है। इसके उलट, कुछ परिवारों के लिए बना "ग्रेजुएशन प्रोग्राम" बेहतर निकला। इसमें परिवार को एक संपत्ति (जैसे बकरियाँ), कुछ समय का सहारा, प्रशिक्षण और लगातार मार्गदर्शन मिलता है। कई देशों में हुए परीक्षणों में इसका असर सालों तक टिका दिखा, और पश्चिम बंगाल में हुए अध्ययन में भी। दोनों नतीजों को साथ रखने पर सीख यह मिलती है कि जरूरतमंद को सिर्फ़ पैसा देना काफ़ी नहीं, यह भी देखना पड़ता है कि किसे, कैसे और किसके साथ दिया जाए।
उनके काम में एक और उदाहरण है जो मुझे बहुत पसंद आया। राजस्थान के कुछ स्कूलों में शिक्षक अक्सर गैरहाज़िर रहते थे। वहाँ कैमरे वाले प्रयोग में शिक्षकों की उपस्थिति पर नज़र रखी गई और उसके आधार पर प्रोत्साहन दिया गया, तो गैरहाज़िरी काफ़ी घट गई। यानी जहाँ व्यवस्था की कमी थी, वहाँ व्यवस्था सुधारी गई। इसके आगे आजकल पारदर्शिता बढ़ाने सरकारी स्कूलों में ऑनलाइन अटेंडेंस सिस्टम शुरू हुआ है।
इन्हीं अनुभवों को बनर्जी और डुफ्लो ने 2011 की किताब Poor Economics में सरल भाषा में समेटा, और मैंने इसी से उनसे प्रथम परिचय पाया था। किताब की पहली और सबसे बड़ी सीख यह है कि लोग हमारी कल्पना से कहीं ज़्यादा समझदार होते हैं। जिनके पास पर्याप्त पैसे नहीं होते, उनके हर फ़ैसले में जोखिम होता है, और वे दिन-रात हिसाब लगाकर जीते हैं। एक गरीब परिवार कभी पूरा दिन एक बीमार बच्चे के लिए दवा और मजदूरी में से एक चुनता है। जब कुछ लोग ऐसे लोगों को "आलसी" या "अज्ञानी" कहते हैं, तो असल में हम उनकी मजबूरियों को नज़रअंदाज़ कर रहे होते हैं। किताब हमें उनके (गरीबी या अन्य किसी हालात से मजबूर व्यक्ति) नज़रिए से दुनिया देखना सिखाती है, और मुझे यही सबसे मानवीय बात लगी।
दूसरी बात यह कि छोटी-छोटी चीज़ें बड़ा असर करती हैं। लेखकों ने बताया है कि गरीबी की जड़ में अक्सर तीन "I" होते हैं:
1. Ideology यानी हमारी पहले से बनी धारणाएँ,
2. Ignorance यानी सही जानकारी की कमी, और
3. Inertia यानी आदत या आलस्य के कारण हम वही करते रहते हैं जो हमेशा से होता आया है, भले वह फ़ायदेमंद न हो।
इसीलिए कई बार बस थोड़ी-सी जानकारी, थोड़ा प्रोत्साहन या फ़ैसले को आसान बना देना काफ़ी होता है। टीके वाला उदाहरण इसका बेहतरीन नमूना है। इसका मतलब यह भी है कि कई बार बड़े बजट की नहीं, अच्छी डिज़ाइन की ज़रूरत होती है।
तीसरी बात उम्मीद और "गरीबी के जाल" की है। जब किसी के पास इतना कम होता है कि आगे बढ़ने का कोई रास्ता ही नहीं दिखता, तो वह लंबी योजना बनाना छोड़ देता है। किताब बताती है कि थोड़ा-सा सहारा, जैसे कोई संपत्ति या भरोसेमंद सेवा, जब किसी को उस मोड़ तक पहुँचा देती है जहाँ से आगे बढ़ना संभव लगे, तो वही व्यक्ति फिर तेज़ी से आगे बढ़ता है। इसलिए मदद का मतलब सिर्फ़ रोटी देना नहीं, आगे बढ़ने की उम्मीद देना भी है। मैं हमेशा इसलिए कम्युनिटी किचन (जैसा लंगर, मंदिर में मुफ़्त भोजन), कम्युनिटी गैदरिंग (समाज के हर तबके का साथ उठना-बैठना) एडमायर करता हूं।
चौथी और शायद सबसे ज़रूरी बात विनम्रता की है। लेखक बार-बार कहते हैं कि वे हर समस्या का एक जवाब नहीं देते। हर जगह, हर समुदाय और हर समय के लिए अलग हल चाहिए, और कौन-सा हल चलेगा, यह देखकर ही पता चलता है, अंदाज़े से नहीं। जो उपाय सुनने में बहुत अच्छा लगता है, ज़रूरी नहीं कि काम भी करे। इसलिए अपनी राय से प्यार मत करो, सबूत से करो, और गलत साबित होने पर खुश होना सीखो क्योंकि उसी से आगे की समझ बनती है।
इस सोच का समाज पर सकारात्मक असर बहुत बड़ा है। सबसे पहले तो पैसे का सही उपयोग होता है। सरकारों और संस्थाओं के पास सीमित संसाधन होते हैं, और जब पता हो कि कौन-सा कार्यक्रम असरदार है, तो वही आगे बढ़ता है और बेकार योजनाओं पर धन नहीं बर्बाद होता। दूसरे, नीतियाँ अब राय या विचारधारा से नहीं, ठोस प्रमाण से बनने लगी हैं, जिससे जवाबदेही बढ़ती है। तीसरे, सबसे कमज़ोर लोगों की आवाज़ और सम्मान को केंद्र में रखा जाता है, क्योंकि यह मान लिया जाता है कि वे अपने जीवन के सबसे अच्छे जानकार हैं। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की योजनाएँ ज़्यादा लोगों तक और बेहतर ढंग से पहुँच सकती हैं।
शौर्य, इस पत्र और अभिजीत बनर्जी के काम से मैं तुम्हें यही सिखाना चाहता हूँ कि किसी की मदद दया से नहीं, समझदारी और सम्मान से शुरू होती है। पहले सुनो, फिर समझो, फिर परखो, और तब जाकर कोई निर्णय लो। यह बात केवल गरीबी पर नहीं, ज़िंदगी के हर छोटे-बड़े सवाल पर लागू होती है, चाहे पढ़ाई हो, दोस्ती हो या कोई कठिन फ़ैसला।
चलो, आज अप्पू बुआ की किताब से हम अगला चैप्टर पढ़ेंगे और अगले व्यक्ति के काम और सामाजिक प्रभावों के बारे में अच्छे से जानेंगे। तब तक तुम जिज्ञासा बनाए रखना और सवाल पूछते रहना।
ढेर सारा प्यार,
तुम्हारे पापा
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