Wednesday, April 4, 2018

तेरे-मेरे

गम के हिस्से कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे हैं
कुछ आंसू तेरे हिस्से हैं, कुछ मेरे हैं
किरचनें ख्वाबों की चुभती हैं
ख्वाब टूटे कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे हैं.
बंद पड़ी ढेरों बातें हैं, 
कुछ बेरंग खत तेरे हैं, कुछ मेरे हैं.
एक बाढ़ छुपी तेरे सीने में हैं
एक मचली नदी मेरे सीने में है.
कुछ नकली रेखाएं तेरी हथेली पर
एक टूटी नियति मेरे जीने में है.
दर्द तेरी बातों में कुछ है
कुछ पिघले लफ्ज़ मेरे हैं
तुझे खुशियां सीने से लगानी मेरे है
मुझे माथे पे सूरज उगाना तेरे है.
लेकिन ज़ख्म नए-पुराने तेरे-मेरे हैं
सारे अरमान अधूरे तेरे-मेरे हैं
सबको हाथ छुड़ाने तेरे-मेरे हैं
क्यूंकि दिल दीवाने तेरे-मेरे हैं
क्यूंकि दिल दीवाने तेरे-मेरे हैं.

Monday, April 2, 2018

[The Blue Canvas] ६

नज़्म तुम्हारे होंठों के नीचे तिल का उगना है... जो अनायास ही उग आया है लेकिन खूबसूरती में चार चाँद लगा देता है.
तुम्हारे होंठों की वो प्यारी सी मुस्कान है जो मुझे बेहद पसंद है... जिसे बनाये रखने मैं अपने को तक जाया कर सकता हूँ.
नज़्म तुम्हारा सीने से चिपकना है और फिर लेटे लेटे आसमान ताकना है... तब ऐसा लगता है जैसे जहां में सिर्फ दो ही लोग हों... शायद एक छोटी सी दुनिया बन जाती है जिसमे हम बस दो लोग रह रहे होते हैं.
नज़्म तुमसे झगड़ना है... सच कहो तो उसके बिना दिन पूरा नहीं होता.
ुम्हारी आँखें... जिनमें कई ख्वाब पले हैं, उन्हें चूमना है. चूमने से लगता है जैसे तुम्हारे ख्वाबों को अपना बना रहा हूँ.
नज़्म वो वक़्त है जो तुम्हारे साथ बीतता है... और वो वक़्त भी जो तुम्हारे साथ नहीं बीतता... क्यूंकि वो तुम्हारी याद में बीतता है.
कुछ किताबें हैं... जो मैंने गिफ्ट की थीं... फैज़ की 'सारे सुखन हमारे' है जो तुमने गिफ्ट की थी.
मेरी नज़्में वो सारी नज़्में हैं जो तुमने मुझपर लिखीं... और तुम्हारी नज़्में वो सारी नज़्में हैं जो मैंने तुमपर लिखीं.
तुम्हारा हाथों का छूना और फिर कंधे पर सर टिकाना. आँखों का मलना फिर मेरी आँखों में डूब जाना.
हांथों का चूमना और खो जाना. इन सबसे बेहतर नज़्में नहीं हैं.
नज़्म तुम्हारा मेरे एहसास में जीना है और मेरा सिर्फ तुम्हारे बारे में सोचना है.
नज़्में लफ्ज़- लफ्ज़ नहीं हैं... नज़्में हमारी साथ बीतती ज़िन्दगी है. जिसका अंत पहले ही लिख दिया गया है.... किसी ना-मुकम्मल नज़्म सा.

Saturday, March 31, 2018

राशिदी और सक्सेना को सुनने के लिए कलेजा चाहिए | रवीश कुमार

“मैं शांति चाहता हूं। मेरा बेटा चला गया है। मैं नहीं चाहता कि कोई दूसरा परिवार अपना बेटा खोए। मैं नहीं चाहता कि अब और किसी का घर का जले। मैंने लोगों से कहा है कि अगर मेरे बेटे की मौत का बदला लेने के लिए कोई कार्रवाई की गई तो मैं आसनसोल छोड़ कर चला जाऊंगा। मैंने लोगों से कहा है कि अगर आप मुझे प्यार करते हैं तो उंगली भी नहीं उठाएंगे। मैं पिछले तीस साल से इमाम हूं, मेरे लिए ज़रूरी है कि मैं लोगों को सही संदेश दूं और वो संदेश है शांति का। मुझे व्यक्तिगत नुकसान से उबरना होगा।”

अपने 16 साल के बेटे सिब्तुल्ला राशिदी की हत्या के बाद एक इमाम का यह बयान दिल्ली के अंकित सक्सेना के पिता यशपाल सक्सेना की याद दिलाता है। हिंसा और क्रूरता के ऐसे क्षणों में कुछ लोग हज़ारों की हत्यारी भीड़ को भी छोटा कर देते हैं। 16 साल के सिब्तुल्ला को भीड़ उठाकर ले गई और उसके बाद लाश ही मिली। बंगाल की हिंसा में बंगाल की हिंसा में चार लोगों की मौत हुई है। छोटे यादव, एस के शाहजहां, और मक़सूद ख़ान। इस हिंसा
“मैं भड़काऊ बयान नहीं चाहता हूं। जो हुआ है उसका मुझे गहरा दुख है लेकिन मैं मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का माहौल नहीं चाहता। मेरी किसी धर्म से कोई शिकायत नहीं है। हां, जिन्होंने मेरे बेटे की हत्या की, वो मुसलमान थे लेकिन सभी मुसलमान को हत्यारा नहीं कहा जा सकता है। आप मेरा इस्तमाल सांप्रदायिक तनाव फैलाने में न करें। मुझे इसमें न घसीटें। मैं सभी से अपील करता हूं कि इसे माहौल ख़राब करने के लिए धर्म से न जोड़ें।“
यह बयान दिल्ली के यशपाल सक्सेना का है जिनके बेटे अंकित सक्सेना की इसी फरवरी में एक मुस्लिम परिवार ने हत्या कर दी। अंकित को जिस लड़की से प्यार था,उसने अपने मां बाप के ख़िलाफ़ गवाही दी है। यशपाल जी ने उस वक्त कहा था जब नेता उनके बेटे की हत्या को लेकर सांप्रदायिक माहौल बनाना चाहते थे ताकि वोट बैंक बन सके। आसनसोल के सिब्तुल्ला को जो भीड़ उठा कर ले गई वो किसकी भीड़ रही होगी, बताने की ज़रूरत नहीं है। मगर आप सारे तर्कों के धूल में मिला दिए जाने के इस माहौल में यशपाल सक्सेना और इमाम राशिदी की बातों को सुनिए। समझने का प्रयास कीजिए। दोनों पिताओं के बेटे की हत्या हुई है मगर वे किसी और के बेटे की जान न जाए इसकी चिन्ता कर रहे हैं।
सांप्रदायिक तनाव कब किस मोड़ पर ले जाएगा, हम नहीं जानते। दोनों समुदायों की भीड़ को हत्यारी बताने के लिए कुछ न कुछ सही कारण मिल जाते हैं। किसने पहले पत्थर फेंका, किसने पहले बम फेंका। मगर एक बार राशिदी और सक्सेना की तरह सोच कर देखिए। जिनके बेटों की हत्याओ को लेकर नेता शहर को भड़काते हैं, उनके परिवार वाले शहर को बचाने की चिन्ता करते हैं। हमारी राजनीति फेल हो गई है। उसके पास धार्मिक उन्माद ही आखिरी हथियार बचा है। जिसकी कीमत जनता को जान देकर, अपना घर फुंकवा कर चुकानी होगी ताकि नेता गद्दी पर बैठा रह सके।
आपको समझ जाना चाहिए कि आपकी लड़ाई किससे है। आपकी लड़ाई हिन्दू या मुसलमान से नहीं है, उस नेता और राजनीति से है जो आपको भेड़ बकरियों की तरह हिन्दू मुसलमान के फ़साद में इस्तमाल करना चाहता है। आपकी जवानी को दंगों में झोंक देना चाहता है ताकि कोई चपेट में आकर मारा जाए और वो फिर उस लाश पर हिन्दू और मुसलमान की तरफ से राजनीति कर सके। क्या इस तरह की ईमानदार अपील आप किसी नेता के मुंह सुनते हैं? 2019 के संदर्भ में कई शहरों को इस आक्रामकता में झोंक देने की तैयारी है। इसकी चपेट में कौन आएगा हम नहीं जानते हैं। मुझे दुख होता है कि आज का युवा ऐसी हिंसा के ख़िलाफ़ खुलकर नहीं बोलता है। अपने घरों में बहस नहीं करता है। जबकि इस राजनीति का सबसे ज़्यादा नुकसान युवा ही उठा रहा है। बेहतर है आप ऐसे लोगों से सतर्क हो जाएं और उनसे दूर रहें जो इस तरह कि हिंसा और हत्या या उसके बदले की जा सकने वाली हिंसा और हत्या को सही ठहराने के लिए तथ्य और तर्क खोजते रहते हैं। नेताओं को आपकी लाश चाहिए ताकि वे आपको दफ़नाने और जलाने के बाद राज कर सकें। फैसला आपको करना है कि करना क्या है।
Publishedd on Nai Sadak

Monday, March 26, 2018

[ The Obtuse Angle ] 2

मैं सोचता हूँ अगर स्टीफन हाकिंग भारत में होते तो कैसे रहे होते? क्या हमारे देश में उनकी अपंगता ने उन्हें जीने दिया होता? क्या हमारी 'महान' परिवार व्यवस्था, जिसकी हम मिसालें देते हैं ने उनके टैलेंट को ध्यान रख जरूरतें मुहैया कराई होतीं? क्या ख्याल रखा होता? और क्या हमारी 'महान' गुरु-शिष्य परंपरा में शिष्यों ने उसी तरह उनका ख्याल रखा होता जिस तरह उनके छात्रों ने उनका रखा था?

आपको भी जवाब पता हैं और मुझे भी. सच तो ये है कि हमारी 'महान' व्यवस्थाएं अंदर से सड़ चुकी हैं. इतनी अधिक कि उनकी 'महानता' पर गर्व कर लीपा-पोती करने कि बजाय हमें शर्म करते/रखते हुए उन्हें सुधारने की आवश्यकता है.

लेकिन बजट भी हमारे बजट भाषण में शिक्षा और स्वास्थ्य पर किये वादे में से भी कुछ प्रतिशत की कमी करने के बाद बिना की बहस के आधे घंटे में पास हो जाता है और इसका विरोध करना न हमारी प्रायोरिटी बनता है न मीडिया की.

सच तो ये है कि सिर्फ मीडिया नहीं हम सब ही बाथटब में डूबे हुए हैं और श्रीदेवी के बहुत पहले से ही.

#TheObtuseAngle

Tuesday, March 13, 2018

जैन-बैल-खेल


कभी लगा वो लोग खुशकिस्मत हैं 
जो खुद की देह में ही अजनबी हो गए
उनसे जो खुद के घर में अजनबी हुए हैं.

फिर कभी उल्टा लगा.
मतलब खुद के घर में अजनबी होना अच्छा है
खुद की देह में अजनबी होने के.

फिर दोनों ही ख्याल अजीब लगने लगे
जैसे बचपन में 'त्रिशला-नन्दन महावीर' भजन निरर्थक था.
वैसे वो आज भी निरर्थक ही है.

मेरे पिता ने मुझसे बेहतर जैन बनने को कहा
मेरे हर बार बेहतर जैन बनकर पहुंचा
उन्हें हर बार और भी कमतर जैन महसूस हुआ.

उनका धर्म मंदिर ले जाता था
और मैं ज्यूँ ज्यूँ धर्म के करीब आता गया
 मंदिर से दूर होता गया
और अपने में धर्म के पास.

न उन्हें कभी समझ आया
न मुझे शायद धर्म.

खैर, मुद्दे की बात ये है कि
मैंने उनसे ये ज़िन्दगी नहीं मांगी थी
उन्होंने दी वो भी रिश्ते-नाते, परिवार समाज, धर्म
और बने-बंधे कायदों के साथ.
मैं जुते हुए बैल कि तरह पैदा हुआ था
जिसे सीढ़ी धुरी में चलना था
और डंडे से रास्ता दिखाया जाना था.

मैंने इससे इंकार कर दिया.

मैंने एक प्रेमिका चुनी
एक सपना चुना
एक गीत लिखा
दो सौ रूपये की आज़ादी वाली किताब खरीदी 
और जूतों में पंख लगा उड़ गया.

प्रेमका ने दिल तोडा
सपना बिखर गया
गीत को किसी ने न गुनगुनाया
किताब का लेखक कर्मों से लिखे जैसा न था
और जूते घिस गए.

...और मुझे लगने लगा मेरे पिता सही थे.
जुते हुए बैल सा जीना ही सही है.

लेकिन देह और घर दोनों जगह ही अजनबी इंसान 
ऐसे ज़िंदा कैसे रहता.
इसलिए मैंने मरना चुना.
किन्तु आत्महत्या अपराध था
और मेरा सुसाइड-नोट पोएटिक था.
मेडिकल साइंस ने भी तरक्की कर ली थी. बचा लिया गया.

इसलिए मैंने दौड़ना शुरू किया
और खेत से बाहर आने तक दौड़ता रहा.
ये क्रांति थी
अबतक किसी ने दौड़ा न था.
और जो दौड़े थे बांधे गए थे.

मैं किरणों संग भाग रहा हूँ
सबेरे से 
और अँधेरे के पार भागूंगा
अगली उम्मीद तक.

तुम रस्सियां बंटना शुरू कर दो.
बाँधने लम्बी लगेगी.
आकाशगंगा के पार तक.

Wednesday, March 7, 2018

[ The Obtuse Angle ] 1

लेनिन क्या था से ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि लेनिन क्यों था... और क्यों आज़ादी के आंदोलन के वक़्त युवाओं के लिए ( जिनमें भगत सिंह भी शामिल थे) प्रेरणा का स्रोत रहा. बाकि सेंट पीटर्सबर्ग को बदल के पेत्रोग्राद कर दो और पेत्रोग्राद को बदल के लेनिनग्राद... अंत में होना उसे वापस सेंट पीटर्सबर्ग ही है. नाम बदलने से न तो लेनिन यकायक से पैदा हो गए थे न ही मर गए. न मूर्तियां बनने से लेनिन को जन्मना था न ही ढहाने से मरना था. बस बनाना और ढहाना हमारी सोच हैं. बनाना मुश्किल होता है ढहाना आसान. उदहारण के लिए चरित्र ही को ले लो. मूर्तियां ढहाने पे मुझे मूर्ति से ज्यादा कास्तकार के लिए दुःख होता है. उसने कितने जतन से बनाया होगा.

सोचता हूँ, ढहाने वालों लेनिन के बारे में पढ़ा हो तो बेहतर है. कम से कम भगत सिंह के लेनिन के प्रति रखी सोच ही पढ़ी हो. ...और दुःख जताने वालों ने भी दुनिया भर से लेनिन की मूर्तियां ढहने के कारण जाने हों तो बेहतर हो. कम से कम लेनिनग्राद के सेंट पीटर्सबर्ग हो जाने के कारण ही जाने हो.

मुझे मूर्ति गढ़ने वाले शिल्पी के लिये ज्यादा दुःख है. मूर्तियां गिरा लो, मंदिर या मस्जिद. हत्या आर्ट की ही होनी है.

Monday, February 26, 2018

[The Blue Canvas] ५

एक उम्र के बाद आपको पता चलता है कि पैसे ने बहुत कुछ डिसाइड कर दिया है... आपका करियर, दोस्त, साथ उठने-खेलने वाले लोग, रिश्ते और रिश्तेदार और यहाँ तक की प्रेम भी!
---

एक दोस्त जो हमेशा ज़िन्दगी के नुस्खे दिया करता था इश्क के मोड़ पे फ़ैल हो जाता है... तब आपको एहसास होता है कि नुस्खे और असल ज़िन्दगी में बड़ा फ़र्क है.
 ---

वो लड़की जो मात्र दो महीने लड़के के साथ लिव-इन में रही है और बेवजह ही अलग हुई है एक रात लड़के को फ़ोन करके कहती है ‘तुमसे बिछड़े पांच साल हो गये यार लेकिन तुमसे बिछड़ नहीं पाए. एक अच्छा कमाऊ पति है लेकिन पता नहीं कहाँ क्या कम है.’

लड़के को ऐसा ही कुछ महसूस होता है लेकिन इस लड़की के लिए नहीं किसी और के लिए... पता नहीं हम दिल के किस हिस्से में कौन सा जज्बात छुपाये जी रहे हैं कि जी ही नहीं पा रहे हैं.

लड़का ‘सेम हेयर’ कह के फ़ोन काट देता है.
---

लड़की लड़के से कहती है ‘ मैं नहीं हूँ तो क्या... तुम खुश रहना सीखो, मेरे बिना जीना सीखो.’

लड़का हँस देता है. फिर पंद्रह मिनट तक खुश हो के बातें करता है जैसे बेहद खुश है वो.... और फ़ोन काटते ही रो देता है.

लड़की जो उसी चाँद के नीचे है जिसके नीचे लड़का, लड़के का रोना नहीं देख पाती... चाँद देख के भी नहीं बता पाता.
---

मैं उस लड़के को ढाढस देना चाहता था जो अपनी प्रेमिका को ‘आई लव यू एनफ टू लेट यू गो पीसफुली’ कह चला आया था और अब सड़क पे चलते चलते ही फफक फफक के रो देता है तो कभी उस लाइब्रेरी में जहाँ मैं बैठता हूँ.


मैं दुखी हूँ की उसके खुद की जान लेने की आखिरी कोशिश तक उसे दिलासा क्यूँ नहीं दे पाया.

#TheBlueCanvas

Thursday, February 22, 2018

[ The Blue Canvas ] ४

मुझे सिर्फ रातें नहीं बितानी पूरे पूरे दिन गुज़ारने है तुम्हारे साथ मुझे बनना है हिस्सा तुम्हारी सुबह की अलसाई हुई अंगड़ाई का और फिर पी लेनी है
तुम्हारे हिस्से की थोड़ी सी चाय!
नहीं करनी सुबह तुम्हारी किसी गुड मॉर्निंग के मैसेज से बल्कि तुम्हारे माथे को चूमके वहाँ सूरज बिठा देना है!!
मुझे मैसेज वाले ब्लू टिक नहीं इकरार देखना है तुम्हारी आँखों में और तुम्हारी उस शरारती मुस्कान को सिर्फ़ फ़ोन पर ही नहीं महसूस करना बल्कि सामने से देखकर उसे दिल में उतार लेना है!
तब मिलना है तुमसे
जब तुम सबसे बेतरतीब और बेढंगी हालत में हो ताकि मैं बता सकूँ तुम्हें कि तुम कैसे अब भी
इस दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हो!
मुझे तुम्हारे साथ सर्दियों की रात और गर्मियों का दिन बनना है ताकि बिता सकूँ मैं तुम्हारे साथ अपना सबसे लंबा वक्त!
मुझे करना है तुम्हारे साथ घर का हर काम इसलिए नहीं कि मुझे वो पसंद है, दरअसल मुझे तुम्हारे हाथों को छूने का एक बहाना चाहिए!
मुझे नहीं चाहिए सिर्फ़ तुम्हारी हँसी बल्कि मुझे वो हर बात सुननी है जिससे तुम्हारी पेशानियों पर बल पड़ता है और जिसको कहते समय कांप उठते है तुम्हारे होंठ ताकि मैं मिटा सकूँ इस दुनिया से ऐसी हर एक बात का वजूद!
मुझे तुम्हारे साथ बैठके माँगना है तुम्हें और तब तक देखना है तुम्हें जब तक मैं भर ना जाऊँ तुम्हारी आंखों में और देख सकूँ उनमें अपना मुस्कुराता हुआ अक्स!
मुझे दिन भर के हजार किस्सों के बीच आने जाने वाले तुम्हारे चेहरे का हर रंग देखना है और उसमें हमारे इश्क़ का लाल रंग मिलाके उन्हीं रंगों से अपनी दुनिया सजा लेनी है!
यकीन मानो
मुझे पूरे पूरे दिन गुज़ारने है तुम्हारे साथ, मुझे एक पूरी जिंदगी गुज़ारनी है तुम्हारे साथ!!

#TheBlueCanvas

Monday, February 19, 2018

एक अंडा फूट गया था

मैं बदहवास घर के चप्पे चप्पे में तुम्हें खोजता हूँ
लेकिन तुम नहीं मिलते
उन दीवारों में भी नहीं जिनसे टिककर मैंने तुम्हें चूमा था.
तुम्हरी यादें रोटियों की शक्ल ले लेती है
तुम्हारा जिस्म कविता हो जाता है
और तुम्हारी रूह गौरैया सी लगती है
बचपन में जिसके घोंसले से गिर
एक अंडा फूट गया था.
उस गलती की सजा शायद मैं अब भुगत रहा हूँ.

Sunday, February 18, 2018

[The Blue Canvas] ३

बहुत पहले बड़ी दूर से चलकर आता है लड़का लड़की से मिलने. वो घूमते हैं लड़की का शहर और एक जगह एक बाबा से इक्यावन रुपए में पूछते हैं अपना भविष्य.
बाबा लड़के का हाथ देख चहक के बोल उठता है कि अगर वो इंजीनियर होता तो विदेश जाता.
लड़का हंसकर बोलता है कि उसे इसी देश में मरना है... और वर्षों बाद सचमुच विदेश जाने का मौका छोड़ यहीं का रह जाता है.
...और भी बहुत कुछ बताता है बाबा जो अब याद नहीं. लेकिन जब भी लड़का या लड़की पूछते हैं कि क्या वो दोनों उम्रभर साथ होंगे?
बाबा टाल जाता है और कुछ और ही बोलने लगता है.
लड़की समझ जाती है, लड़का भी... और होता भी वही है. लड़का कहीं और है लड़की कहीं और ब्याही है.
इक दिन लड़की के पति ने हाथ उठाया लड़की पर और लड़की ने भी पलट के पीटा उसे. उससे कहीं ज्यादा.
लड़के को कहीं से पता चलता है तो मुस्कुरा देता है. खुश होकर चीखता है, ' वो बाबा झूठा था. किसने कहा मैं उसके साथ नहीं. वर्षों मैंने लड़की को यही तो सिखाया था.. हर राइट्स, इक्वालिटी एंड सेल्फ रेस्पेक्ट. देखो मैं अब भी साथ हूं.'
लड़के की मौजूदा प्रेमिका मुस्कुरा कर गले लग जाती है.
----

'हमेशा मेरे साथ ऐसा क्यों होता हैं? कोई अपने बाप की ज़िन्दगी का बहाना ले चली जाती है कोई अपनी माँ की ज़िन्दगी का बहाना ले. कोई सच क्यों नहीं बोलता यार!' लड़के के हाथ में आदतन ब्लैक लेवल है और आँखों में ढेर सारे आंसू. मैं उसे तसल्ली देता हूँ. वो झिटक देता है. 'नहीं, तू बता मुझको... सच बोलने में क्या चला जायेगा. कुछ तो कारण होंगे- जॉब, पैसा, लुक्स. कुछ तो होता होगा यार. सीधे सीधे क्यों नहीं बता के जाता कोई. ये दूसरी बार है जब ऐसा हुआ था कि मैं किसी के साथ ज़िन्दगी के ख्वाब देख रहा था. उसके पास्ट को जानकर भी!'

मुझे मसान का 'ये दुःख काहे ख़त्म नहीं होता वे' वाला सीन याद आता है. मैं लड़की को फ़ोन करता हूँ. उसकी अपनी मजबूरियां हैं. मैं रख देता हूँ.

मैं सम्हालता हूँ और सम्हालने में असफल हो जाता हूँ. छह दिन बाद उसकी डेड बॉडी की शिनाख्त के लिए  बुलाया जाता है. ऐसे लगता है मैं खुद की ही लाश देख रहा हूँ. मैं टूट जाता हूँ. खुद को ज्यादा दोषी मानता हूँ.

सबकुछ सम्हाल लड़की को फ़ोन लगता हूँ. वो उसे अंतिम बार देखने भी नहीं आती. उसकी अपनी मजबूरियां हैं. शायद उसके आंसू भी न निकले हों. आंसुओं की भी अपनी मजबूरियां होती हैं.
#TheBlueCanvas