Saturday, November 2, 2013

चार कवितायेँ


आंकड़े 


सन पंचानवे के बाद से अब तक
तीन लाख किसानों ने कर ली
आत्महत्या.
कॉलगेट और 3G मिला के
तीन लाख करोड़ से भी
अधिक का हुआ घपला.

कितने समान्तर से आंकड़े हैं ये
और आप कहते हैं इंसान अपनी मौत मरता है.

---***---


संवेदना



मैं एसी बस में ऑफिस जाते
निहारता हूँ भूखे नंगे
फिर उनपे लिखता हूँ एक कविता.

आप पढ़ के कहते हैं
'बहुत भावुक हूँ मैं.'
एसी मैं बैठ 
कवितायेँ लिखना
प्रमाण नहीं संवेदना का.

मैं हूँ संवेदनहीन,
और आपकी भी संवेदनाएं मरी हैं
मुझसे भी कहीं ज्यादा.

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एक्स-गर्लफ्रेंड


ऐसी औरत
जिसने कभी इश्क़ नहीं किया कभी
'जितना दोगे, उतना पाओगे' को
झुठला दिया
...और ज़रूरतों में मेरी
चुचाप मुंह छिपा चली गयी.

अब मत पूछना 
कैसे याद करूँगा मैं तुम्हें
मेरी एक्स-गर्लफ्रेंड.

ये इश्क़ एकतरफ़ा तो नहीं था.

---***---


मौसम 


गली के कोरों से, मुसलसल टपकता
नुक्कड़ पे भिगोता है पुराने ख़त.
यार! कहने को मौसम बहुत हैं मगर,
यहाँ बस बरसता है तसव्वुर तेरा!

Sunday, October 27, 2013

जिस्म, इश्क और नज़्म


रूह से निकल नज्में
हलक में अटक जाती हैं.
तुम्हारा इश्क सबा है,
सहर-दर-सहर हौसला देता है
आप ही अल्फ कागज़ पे उतर जाते हैं.

दवाख़ाने का बूढ़ा कहता है
उसकी दवा से मोहब्बत फिर जवां होती है.
गलत है वो...
मोहब्बत जिस्म का खेल होता
तो मेरी नज्मों को तुझसे इश्क न होता!    ~V!Vs


Pic: K. Madison Moore

Monday, October 21, 2013

मीना कुमारी




....और तुम्हारे नाटक से
हम सच के सपने लिख लेते
ग़र तुम्हारा अभिनय भी
मीना कुमारी की तरह जानदार होता.

पटक के रख दो ख्वाब अपने
फिर शराब हाथों में ले
लिख दो चार नगमे.
...और मर जाओ खामोश मौत,
गर तुम मीना कुमारी हो तो.

कौन कहता है
आदमी की ज़रूरत में शामिल
बस एक भूख ही है.
रूह तमाम रिश्तों को ढूंढती है जब
तो ऊँचाई पे चढ़े लोग भी
खा नहीं पाते पेट भर.
मीना कुमारी की तरह.

मेरे हम-शाख़
न गलत तुम, न गलत हम
माना मीना कुमारी न तुम, न ही हम
फिर कभी क्या, छूटते-छोड़ते
'जवानी हमारी लौटाओगे मेहर के साथ?'

Tuesday, October 15, 2013

अन्नदाताओ, कर लो सामूहिक आत्महत्या




देखो, वो लोग जो
महलों में रहते हैं,
एक दिन जब तुम न उगाओगे अन्न
तो खा लेंगे
महलों की दीवारें.
तुम  न सहोगे तो
हुक्म चला लेंगे अपनी औरतों पे.
उनके हुक्म से औरतें बन जाएगी पैसे
और खरीद लेंगे
ऎशो-आराम.

देखो तुम्हारे भूखे मरने से
न यहाँ की संसद हिलेगी, न यहाँ के महल.

मैं तो कहता हूँ,
तुम सब एक बार में, एक साथ ही मर जाओ.
एक-एक कर मर
क्यूँ इन्हें अन्न  उगा-उगा एहसान जताते हो.

विदर्भ, छत्तीसगढ़, मध्य भारत के अन्नदाताओ
मर जाओ सब,
कर लो सामूहिक आत्महत्या.

मैं देखना चाहता हूँ,
तुम्हारी मौत का तमाशा देखने वाला
यह समाज
क्या खाकर जिंदा रहता है.

Wednesday, October 2, 2013

Wednesday, September 18, 2013

'विद्रोही' कवितायेँ


[ उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में जन्मा प्रगतिशील चेतना का यह प्रखर कवि विद्रोही’ नाम से विख्यात है. दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्रों के बीच उनकी कविताएँ ख़ासी लोकप्रिय रही हैं. वाम आंदोलन से जुड़ने की ख़्वाहिश और जेएनयू के अंदर के लोकतांत्रिक माहौल ने उन्हें इतना आकृष्ट किया कि वे इसी परिसर के होकर रह गए. उन्होंने इस परिसर में जीवन के 30 से भी अधिक वसंत गुज़ारे हैं. शरीर से कमज़ोर लेकिन मन से सचेत और मज़बूत इस कवि ने अपनी कविताओं को कभी कागज़ पर नहीं उतारा। उनकी कविताओं में कई तो अंधेरे में और राम की शक्ति पूजा की तरह की लंबी कविताएँ हैं. उन्हें अपनी सारी कविताएँ याद है और वे बराबर मौखिक रूप से अपनी कविताओं को छात्रों के बीच सुनाते रहे हैं. ख़ुद को नाज़िम हिकमत, पाब्लो नेरूदा, और कबीर की परंपरा से जोड़ने वाला यह कवि जेएनयू से बाहर की दुनिया के लिए अलक्षित सा रहा है. ]


हमारे खुरदरे पांवो की ठोकर से धसक सकती है ये तुम्हारी ज़मीन, 
हमारे थर्राए हुए हाथों की रगड़ से लहुलुहान हो सकता है ये तुम्हारा कोमल आसमान.
हम अपने खून चुते नाखूनों से चीर देंगे तुम्हारे मखमली गलीचों को ,
और हम जब एक दिन ज़मीन से आसमान तक खड़े कर फाड़ देंगे तुम्हारी मेहराबे,
तब उसमे से ना कोई कश्यप निकलेगा और ना कोई नरसिंह.


---**---


औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं,
औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं.
औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं
मरद इतनी जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं.
इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता.
लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूँगा.


---**---


मैं किसान हूँ,
आसमान में धान बो रहा हूँ.
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता.
मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है.
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा,
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा.


Monday, September 9, 2013

UNICEF's award winning advertisements..!! (Awesome must read)







Change the way of thinking.... UNICEF

 1.



 

FIRST 
Fashion Claims more Victims than you think 

Save the Animals



 2.

 

CCA-Unicef Special Mention 
Gender in Education




3. 

 

Special Mention 
Against Corruption




4. 

 

Special Mention 
Road Safety




5. 

 

Special Mention 

Nature is incomplete without Female Gender. Save girl child









6. 

 

Special Mention 
Save Trees




7. 

 

Special Mention 
Road Safety



Sunday, September 1, 2013

बात इतनी सी है बस

बात इतनी सी है बस
कि औरत मरती है सुबह से शाम,
खपती है
चूल्हा-बर्तन से लेकर
सड़क पे ईमानदारी से घूरते हम-आप के 
बीच से गुजरते हुए.
बॉस को अक्सर
ऑफिस की औरतें 
सपने में हमबिस्तर नज़र आती हैं.


सरेआम छेड़ते, 'फील' करते 
चुपचाप लोग.
हर दिन ही कनखियों से  'रेप' करते
लोगो के सामने से हर दिन निकलती है.


बात इतनी सी है बस
कि कोख से कब्र तक
औरत की आत्मा पे
ढेरों घाव होते हैं,
जिन्हें गिना नहीं जा सकता.


बात इतनी सी है बस
बात घावों की है बस
बात औरत की है बस,
जिसे दोयम दर्ज़े का तुम्हारा ईश्वर भी 
बनाकर भूल गया सा लगता है.  

बातें इतनी सी हैं बस,
फिर क्यूँ मैं लिख रहा हूँ कविता
छोटी-छोटी बातों पे. 
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बात इतनी सी है बस
कि इक पौने अठारह साल का लड़का
करता है घिनौने कृत्य,
फिर भी कानून 'दूध पीता अनजान' है!    #Juvenile_Justice

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बात इतनी सी है बस
कि इक बहत्तर साल के देवता से भी
हमारी तेरह साल की बेटियाँ
सुरक्षित नहीं हैं.               #AsaramBapu

बात इतनी सी है बस,
कि हम खुद शैतान हैं
और शैतान को पूजते हैं.

Monday, August 26, 2013

Friend, Gulzar!




साहिल पे रखकर ख़ामोशी
उदास चाँद
ज्वार-भाटे भी नहीं लाता;
लहरों पे बहने का सुकूं
दिन की ख़ामोशी में गुजरता है.

साथी तेरी याद में
सुनसान गली के, वीरान मकाँ में
'गुलज़ार' पकड़े
तन्हाई गुजार रहा हूँ!

On Gulzar's B'day, 18 Aug

Saturday, August 17, 2013

पता करो, जीवन किसलिए मिला था.

जिंदा रहते
ज़र, जोरू, ज़मीन,
मरते-मरते
जन्नत.

आकाँक्षाओं में जीते तुम.
फिर एक मौत
और खामोश होते तुम.

प्रकृति ने तुम्हें
आकांक्षाएं पाल
प्रकृति को ही नष्ट करने
तो जीवन नहीं दिया होगा.

ज़रा पता करो,
जीवन किसलिए मिला था.