वर्ल्डकप को इक महीना हो गया है लेकिन भाईसाहब अभी भी क्रिकेट की ही खुमारी में हैं। "पापा मैं तोहली अंकल बनूंगा, आप बॉल फेंको।" पापा बॉल करते हैं।
प्यार करना बहुत ही सहज है, जैसे कि ज़ुल्म को झेलते हुए ख़ुद को लड़ाई के लिए तैयार करना. -पाश
Sunday, December 24, 2023
शौर्य गाथा 97/98
Friday, December 22, 2023
Papa's Letters to Shaurya #11thLetter
Tuesday, December 19, 2023
प्रेम बस प्रेम की कवितायें
कुछ लड़कियां ज़मीं होती हैं, कुछ आसमां,
कुछ नींद होती हैं, कुछ ख़्वाब,
कुछ नदी होती हैं, कुछ समंदर,
कुछ लड़कियां छत होती हैं, कुछ घर.
तुम रेयर कॉम्बिनेशन हो,
तुम ये सबकुछ हो!
*
भाषा खत्म हो जाएगी,
मैं तुम्हें कविता से पुकारूंगा.
कविताएं भाषाओं से नहीं
संवेदनाओं से लिखी जाती हैं.
कविताएं मुख से नहीं
एहसासों से कही जाती हैं.
*
तुम्हारे होंठों को चूमकर
ईश्वर के सबसे करीब होता हूं.
सीता ने
प्रेम से राम को
राधा ने
प्रेम से कृष्ण को
ईश्वर बनाया है!
*
तुम्हारी हंसती आंखों में
निश्छलता रहेगी जबतक
प्रेम
बना रहेगा धरती पर
तबतक.
*
मुझे यकीं है
सिर्फ प्रेम ही
किसी को पवित्र कर सकता है
कर्मकांड नहीं!
*
यौवन के
हर कोने पर निशां हैं.
देह के
हर हिस्से पर कोंपल सा फूटा हूं.
तुम्हारी आत्मा पर
कविता बोई है मैंने.
कैसे और कहां
जाओगे मुझे छोड़कर!
*
मैंने जब
नौकरी की,
रीढ़ की हड्डी खोई,
फाइनेंशियल मैनेजमेंट सीखा
सोशल सिक्योरिटी की परतें ओढ़ी.
सोशल स्टेटस समझा,
फिर लोगों को आंखों में
उसका दंभ देखा...
मैं जान गया
मैं इस दुनिया के लिए
नहीं बना हूं.
*
जब जब मैं मद्धम पड़ता हूं
तुम उग आते हो
उजाले की तरह.
*
किसी कविता सी तुम
फूट पड़ती हो घावों से
दर्ज़ के बीज से जैसे
फूट पड़ा है कोई पौधा.
जख्मों से
निकल पड़ी हैं कविताएं,
कहानियां, कई चित्र.
शुक्रिया दर्द का, जख्मों का.
*
मैंने तुम्हें ज़िंदा रखा है
किस्सों में, कहानियों में,
कविताओं में.
देह...
देह से परे
कवि ही किसी को
ज़िंदा रख सकता है...
कलम से.
*
लेट होने पर जो तुम
गुस्सा करती हो
मॉर्निंग वॉक न करूं तो
मुंह फुलाती हो
ऑफिस से आ कितना बतियाती हो
कुछ बातों पर कितना घबराती हो
मेरे मजे लेती हो
कितना खिलखिलाती हो
बच्चे से चिपक
मासूम सो जाती हो
भीड़ में हाथ पकड़
जो मुस्कुराती हो
किसी पार्टी में
कोने में ले जा बतियायी हो
चूम लूं, लजाती हो.
तुम बहुत भाती हो.
*
कुछ कविताएं
कितनी गरम होती हैं
जैसे पीठपर
तुमने अधर रख दिए हों.
*
मेरे सीने में जमा
जो समंदर है
कहो
क्या तुम्हारे भी अंदर है?
सही की धार में बहते हो?
गलत को गलत कहते हो?
*
मैं अगढ़ ही रहना चाहूं तो?
तराशकर कहीं रखा जाऊं
सब देखें, पूजा करें.
मैं किसी पहाड़ का,
किसी नदी में बहता
अगढ़ पत्थर ही रहना चाहूंगा.
*
ईश्वर को सबसे ज्यादा याद
कृषक ने किया.
ईश्वर ने सबसे कम
कृषक की सुनी.
*
एक शहर था
जहां तुम्हारे होने तक मैं था
तुम्हारे होंठों को चूम मैंने
उस शहर को छोड़ा.
वो शहर
तुम होंठो में जमाकर
साथ ले गई हो.
बड़ा ताल जमा किया था होंठों पर
प्यास में फिर भी वे
सुना है मेरी राह तकते हैं!
*
कि मेरे शहर आओ
वो पेड़ अब भी चहचहाता है
वैसे ही,
वो नदी अभी बजे जा रही है
वैसे ही,
चौराहा वो निरंतर जी रहा है
वैसे ही.
तुम्हारे हमारे जाने से
कुछ तो नहीं बदला.
एक रिश्ता,
एक सपनों के घर के अलावा.
*
मैं तुम्हें सुलगा लेता हूं जानम
किसी शाम कातर होती आंखों में
भर जाता है उम्मीद का धुंआ.
*
एक दिन
कविता यूं ही अटक जायेगी
एक सांस
यूं ही थम जायेगी
कोई ख्वाब
यूं ही आंखों में रह जायेगा
एक टीस
बची रह जायेगी.
आसमां के गीत पर
सुबह को चादर ओढ़ गुनगुनाऊंगा.
एक रोज दुनिया से निकल
मैं दुनिया का हो जाऊंगा.
*
तुमसे एक अंतिम बात कहनी थी
ख्वाब सड़क पर पड़ी टहनी थी
एक सिरे पे जिसके तुम्हारा नाम था
पेड़ की दूसरे सिरे पे आस बंधी थी.
मेरे जिस्म में पत्ती रहनी थी.
ख्वाब सड़क पर गिरी टहनी थी.
*
तुम्हारे पास
जान रखकर वो लड़का
ज़िंदगी ढूढने चला है.
जिंदगी ढूंढ ले वो
तो बताना
बेजान जीने की अगर कला है.
*
मैंने कविताएं लिखीं
प्रेम सार्वजनिक कर दिया
मैंने कविताएं लिखीं
दुःख सार्वजनिक कर दिया.
मेरे दोस्त,
सबकुछ तुम्हारे साथ ही नहीं
घटित हो रहा है पहली बार.
यकीन न हो तो
मेरी कविताएं पढ़ लेना.
*
प्रेम के खातिर
मारे जाते हों युवा
जिस समाज में
वो समाज कैसे कहला सकता है?
कहला भी ले तो
सभ्य कैसे कहा जा सकता है?
*
इंतजार करते रहे हम
कि सुंदर होगा जहां में कुछ और.
और बस गए हम.
तुम्हारे होंठों में बना घर
ताउम्र रह गए हम.
Monday, December 18, 2023
ईश्वर और प्रेम कि कवितायेँ
मुझसे कहा गया
मैं मंदिर जाऊंगा वहां ईश्वर मिलेगा.
मैंने तुम्हारी आँखों में देखा
ईश्वर वहां मुस्कुराता झांक रहा था.
--**--
बुद्ध, महावीर
मूर्तियों में क़ैद कर दिए गए.
उनका कहा
बड़ा कठोर, नग्न सच था.
उनका हश्र
यही होना था!
--**--
जब मेरी उँगलियों की पौरें,
तुम्हारी उँगलियों की पौरों को
आहिस्ता-आहिस्ता छूती हैं...
तब सृष्टि का निर्माण
हौले-हौले शुरू होता है...
--**--
मेरे माथे को चूम खिलखिलाना,
मेरी हंसी में बस जाना.
मुझे गले लगाना,
मेरे सीने में समा जाना.
मेरे होंठों पे जमा कर देना खुद को,
चूमकर.
हाथों में लम्स,
छूकर.
देखें,
फिर हमें कौन जुदा करता है.
--**--
मुझे कोई देखे,
उसकी नज़र
तुम्हारी मुस्कान पर ठहर जाये!
तुम समाना
इस तरह
मेरे अंदर!
--**--
मेरे पास खेत नहीं कि
धान उगाता.
मेरे पास प्रेम था,
मैंने प्रेम उगाया.
शहर में प्रेम की कवितायेँ
कितना वक़्त था
जो तुम्हारे बगैर
काटा न जा सकना था.
पर सारा ही कट रहा है
तुम्हारे बगैर.
--**--
मुझसे जब तुम
उस शहर में मिलती हो
ज्यादा खूबसूरत लगती हो.
आँखें और बड़ा ताल,
माथा और मानव संग्रहालय
होंठ और भारत भवन.
कितनी समानता है न?
आँखों में जो सैलाब है
झील से कुछ ज्यादा ही है.
माथे पर बल
मानव संग्रहालय में दर्ज़ सभ्यताओं से ज्यादा हैं.
होंठों से झिरते लफ्ज़...
भारत भवन में भी उतने सुन्दर नहीं कहे किसी ने.
तुम हो मेरा शहर.
तो बताओ मेरे शहर,
तुमसे इश्क़ कर
क्यों न जाऊं तर!
जब तुम उस शहर होती हो,
ज्यादा खूबसूरत होती हो.
--**--
तुम्हारे चूमकर पैर
मैं जाऊंगा घर.
पैर चूमकर
रिश्ता न सही
प्रेम मुकम्मल सा लगता है.
--**--
तुमसे बात करने के बाद
कवितायेँ झरने लगती हैं.
--**--
हम प्रेम को नहीं चुनते
प्रेम हमें चुनता है.
प्रेम मुकम्मल होगा या नहीं
ये समाज चुनता है.
(हीर की कब्र पर फूल हरे होंगे.)
--**--
जिसके सीने से लिपट
क्रोध, मोह, माया, स्वार्थ,
काम, अहंकार, घृणा, द्वेष
त्यागा सा लगे.
उसी से तुम्हें सच्चा प्रेम है.
--**--
कितने इतवार काटे मैंने
तुम्हारे इंतज़ार में.
बावन? पांच सौ बीस?
अब तो गिनती ही नहीं.
शतायु को बावन सौ
इतवार मिलते हैं.
तुम्हारे बगैर
हर इतवार शतायु होता है.
--**--
मैं किसी दिन लिखूंगा
कोई कविता,
जो तुमसे ज्यादा खूबसूरत होगी.
--**--
मैं चाहता हूँ,
किसी सिंधु घाटी सभ्यता
के किनारे
गढ़ना तुम्हें किसी कविता में.
हज़ारों साल बाद कोई देखे
कहे 'ओह! ब्यूटीफुल डांसिंग गर्ल!'
--**--
तुम्हारी नाक
महावीर टेकरी सी है.
तुम्हारे अंगूठे
कोलर डैम छूटे हैं.
तुम मोहब्बत में जानं
मेरा भोपाल शहर हो जाती हो!
--**--
कितने लोग थे
जिनके हिस्से पूरा प्यार नहीं आया.
और वे अधूरे जीते रहे.
तुन्हें कभी पता ही नहीं चला
की प्रेम के बाद
दुनिया कैसी होती है!
Sunday, December 10, 2023
Papa's Letters to Shaurya #TenthLetter
Thursday, December 7, 2023
युद्ध और प्रेम की कविताएं
तुम्हारे ब्रह्मांड में जा
तुम्हारे होंठों को चूम ले.
मेरी कविता की बस यही चाह है.
---
तुम्हारी पीठ पर
जो कवितायें लिखीं गईं
वे ही सबसे सुंदर कवितायें थीं.
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जिन कविताओं को
तुमने होंठों से लगाया.
वे ही मुकम्मल घोषित की गईं.
---
मेरे पास बंदूक है
मैं उस पर कविता रख
सुकूं से सो जाता हूं.
सिर्फ कविता
बंदूक सुला सकती है,
शांति स्थापित कर सकती है.
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मैं लिखता हूं
कविता,
कि एक रोज
तुम तक पहुंच ये
तुम्हारे होंठों को चूमेगी.
मेरी याद में तुम हथेलियां सहलाओगी.
---
एक कविता युद्ध को सहला रही थी
युद्ध जर्जर था युद्धोपरांत.
युद्ध दौरान कविता
टूटी मानवता को सहलाती रही,
युद्ध उपरांत युद्ध को.
युद्ध और क्रोध तोड़ते हैं विरोधी,
साथ ही स्वयं को...
कविता ने कहा उस रोज.
---
युद्ध और प्रेम में हमेशा
युद्ध चुना गया.
होंठों और बंदूक में
बंदूक चुनी गई.
यह मानवीय निर्बलता है
कि युद्ध आसान है,
प्रेम कठिन.
गले लगाना, होंठ चूमना
बंदूक उठाने से
ज्यादा साहस का काम है.
---
तुमसे प्रेम
अनायास नहीं था.
तुम्हारी सुंदर आंखों में
आंसू
सीने में सैलाब
जिस्म में जज़्बा
जेहन में विचार
इरादों में पंख थे.
ये रेयर कॉम्बिनेशन हैं.
तुम्हें छू में तरंगित था
चूमकर बुद्ध हुआ
जब जब सीने से लगे तुम
मैं खुद को खोता गया,
तुम्हारा होता गया।
बताओ,
तुमसे प्रेम न हो तो किससे होता!
---
तुम्हारी पीठ पर लिखे हैं
मैंने सबसे सुंदर शब्द
तुम्हारे हाथों में छोड़ी है
सबसे सुंदर एहसास.
मैं कहीं भी रहूं,
तुम जहां भी रहो
थककर, हारकर
आंसू, उन्माद लिए
तुमतक पहुंच जाता हूं.
तुम मेरा घर हो.
तुमसे प्रेमकर मैंने जाना दोस्त,
घर सिर्फ जगहें नहीं होती
लोग भी होते हैं!
---
फोटो : इंटरनेट
Monday, December 4, 2023
Papa's Letters to Shaurya #NinthLetter
Sunday, December 3, 2023
शौर्य गाथा 93
भाईसाहब ओवरलोडेड विद क्यूटनेस हैं। तोतली आवाज में बहुत सी बातें, बहुत सी प्यारी प्यारी हरकतें, स्कूल के झूठे-सच्चे तोतले किस्से। ऐसे लग रहा है कि ये लम्हे फ्रीज हो जाएं और भाईसाहब इसी उमर में ठहर जाएं।



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