Monday, December 4, 2023

Papa's Letters to Shaurya #NinthLetter


तुम्हारी नानी एक संत को सुन रही हैं। उनके कई सारे फॉलोअर्स हैं। वे एक प्रश्न के जवाब में कहते हैं "स्त्रियों को जॉब न करके घर चलाना चाहिए। बच्चे बड़े करने चाहिए। क्या आपकी मां जॉब करती तो आप जो बन पाए हैं वह बन पाती?" वह प्रश्न पूछने वाली महिला (जो खुद एक वर्किंग वुमन है) से प्रश्न करते हैं। मुझे उनकी बात सुनकर हंसी आ जाती है। ऐसा नहीं है कि वह अच्छे विचारक नहीं है। वह एक बहुत अच्छे विचारक हैं। कई बार मैं उनको सुनकर, उनकी फॉरवर्ड थिंकिंग को देखकर आश्चर्यचकित रह जाता हूं। लेकिन मैंने अक्सर देखा है कि अच्छे विचारक भी अपने अंदर से बरसों से चली आ रही रूढ़ियों को निकाल नहीं पाते हैं।
तुम्हारी दादी भी वर्किंग है और तुम्हारी मां भी और दोनों ही सुपर वुमन हैं। तुम्हें दो बातें बताता हूं-
पहली, बच्चे सम्हालना, घर संभालना सिर्फ महिलाओं का काम नहीं है। यह वर्क डिवीजन हमने ही बनाए हुए हैं। जबकि घर और बच्चे महिला और पुरुष दोनों के होते हैं। इसलिए ये काम भी दोनों को करने मिलकर चाहिए या या जिसको करना है वो कर सकता है। इस तरह के डिवीजन पुरुषवादी समाज ने अपनी सहूलियत के लिए बनाए हैं।
तुम्हें बड़े होने के साथ यह समझना जरूरी होगा कि एक उन्नत समाज के लिए इक्वलिटी आवश्यक है। जो 'घर' से शुरू होती है... आपके अपने घर से...
दूसरी, ये कि स्त्रियों को इसलिए जॉब नहीं करनी है कि घर में पैसे की आवश्यकता है। बल्कि इसलिए करनी है-
1. for financial freedom
2. for their self respect
3. for their self development, and
4. because they want to work
( 1. आर्थिक आजादी के लिए
2. अपने स्वाभिमान के लिए
3. उनके स्व-विकास के लिए, और
4. क्योंकि वे काम करना चाहती हैं )
सदियों से लड़कियों को कम पढ़ाया जा रहा है क्योंकि लोग सोचते हैं कि 'बड़े होकर उन्हें कौन सा काम करना है!' उनकी एजुकेशन हमेशा सेकेंडरी रही है। यह बहुत स्टुपिड सा लॉजिक है, जिसे मैं ना समझ पाता हूं, ना ही पचा पाता हूं।
हालांकि हम 19वीं सदी में से ईश्वर चंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती, ज्योतिबा और सावित्री फुले, महर्षि कर्वे (20वीं सदी) द्वारा स्त्री शिक्षा पर किए बहुत सारे कामों से काफी आगे जाकर हम स्त्री साक्षरता में अब 77% पर पहुंच गए हैं और लगभग 33% भारतीय महिलाएं वर्किंग वुमन हैं। लेकिन समाज के रूप में अभी भी ऐसी सोच से हमें काफी आगे आने की आवश्यकता है।
हॉपफुली, बड़े होकर जो मैं लिख रहा हूं उसके मायने समझोगे और मम्मा क्यों सुपर वुमन है ये भी।
तुम्हारे पापा

Sunday, December 3, 2023

शौर्य गाथा 93

 भाईसाहब ओवरलोडेड विद क्यूटनेस हैं। तोतली आवाज में बहुत सी बातें, बहुत सी प्यारी प्यारी हरकतें, स्कूल के झूठे-सच्चे तोतले किस्से। ऐसे लग रहा है कि ये लम्हे फ्रीज हो जाएं और भाईसाहब इसी उमर में ठहर जाएं।

कितना सुंदर है बचपन। प्यारी प्यारी शिकायतें, छोटी छोटी डिमांड्स, छोटी छोटी बात में बड़ी सी खुशियां, बेखौफ हंसी, निश्छल प्रेम। बचपन देख आप ज़िंदगी से मोहब्बत में कई दफ़े पड़ सकते हैं, कई-कई बार!
इनकी बीमारियां महज़ अपनी बहन को देखकर ख़त्म हो जाती हैं! चॉकलेट पे खुशियां बिखर जाती हैं! पेपर टेप की नेमप्लेट से भाईसाहब का जैसे दिन बन जाता है! किताबें अपनी भाषा में ऊलजलूल पढ़ ली जाती हैं! इतना खूबसूरत जिंदगी का और कौन हिस्सा होता होगा...

ख़त

 



मैं पलंग पे लेटा हुआ था. वो आये 'कैसे हो मियां?' औपचारिक मुस्कुराये. मैंने अपना पांव हाथों से उठा के बैठने की कोशिश की. 'नहीं, नहीं लेटे रहो, और ये पकड़ो.' उन्होंने एक लिफाफा मेरी और बढ़ा दिया. 'गवर्मेंट ने सेवन लाख की जो घोषणा की थी, उसकी डिटेल्स है. कुछ दिन में पैसे तुम्हारे अकाउंट में पहुँच जायेंगे.' मैंने लिफाफा सायमा को थमा दिया. '...और हाँ, टीवी पर 'फारेस्ट गम्प' और 'शाव्शंक रिडेम्पशन' किस्म की फिल्म देखते रहना अच्छा लगेगा. उन्होंने जाते-जाते कहा. 'शुक्रिया...' मैंने धीरे से कहा और अपना घुटनों तक कटा पांव सरकाने की कोशिश की.

सायमा ने दरवाजा बंद किया. वो मेरे पास आई, मैंने उसे लिफाफा थमा दिया. 'इसका अब क्या करेगें?' उसने धीरे से कहा फिर मेरे से लिपट गई. 'सब ठीक हो जाएगा सायमा, बस एक पैर ही तो कटा है, जिंदा तो हूँ न.' मैंने उसे पांचवें दिन और पचासवीं बार एक ही वाक्य दुहराते हुए दिलासा दी. वो मेरे से चिपकी रही. मैंने उसके बालों को सहलाया. 'मुझे तुमसे कुछ कहना है सायमा.' 'हाँ कहो,' उसने सर उठाते हुए कहा. मैंने तकिये के नीचे से निकालकर उसके हाथ में एक लिफाफा थमा दिया.
'पढो.'
'उर्दू में है ये, किसने भेजा? अच्छा पढ़ के सुनाती हूँ.'

'अब्बू, यहाँ सब खैरियत से है. मैं अच्छे से पढ़ रही हूँ, हर रोज़ स्कूल भी जाती हूँ. इस बार रोज़े नहीं रखे थे, अम्मी ने कहा है और बड़ी हो जाओ तो रखना. नये कपडे लेने थे लेकिन अम्मी कहती है आपके भेजे पैसे ज्यादा दिन नहीं चलते और दादी का इलाज़ भी कराना पडता है. इस बार ज्यादा पैसे भेजना. मैंने कहा था न इस बार अच्छे से लिखना सीख जाउंगी, देखो सीख गई. अब सदीक़ स्कूल में एडमिशन दिला दो तो और अच्छे से पढूंगी. अम्मी कहती उसके पास साल भर की फीस भरने पांच हज़ार रूपये नहीं है. -आपकी नाजिया'

'रंजीत, किसने लिखा ये? तुम्हारे पास कैसे आया?' '
मुझे नहीं अनवर अली के लिए आया था'
'कौन अनवर अली?'
'पाकिस्तानी जिसे मैंने मारा था. उसकी जेब में था ये. मैं चेक कर रहा था तब मुझे मिला.'
'तो....?'
'मैं नाजिया के बाप का कातिल हूँ.'
'तुमने जानबूझ के तो नहीं किया न रंजीत, अगर तुम नहीं मारते तो वो तुम्हें मार देता. देखो पांव तो काटना ही पड़ा न.'
'लेकिन....'
 'लेकिन क्या? तुम्हारी गलती नहीं है, अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो मैं और रिद्मा कैसे रहते? रिद्मा तो तीन साल की उम्र में ही अनाथ हो जाती न. पता नहीं तुम क्या सोच रहे हो.' सायमा थोडा गुस्से में बोली.
'अगर हम इन सात लाख में से पांच हज़ार अनवर के घर भेज दे तो? हमारी रिद्मा के जैसे उसकी नाजिया भी पढ़ लेगी.' मैंने धीरे से कहा.

सायमा ने थोड़ी देर ख़ामोशी से एक टक मेरी तरफ देखा. फिर 'मेजर रंजीत तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है.' कह के  मेरे से  चिपक गई. 'मेरी और अनवर की कोई दुश्मनी नहीं थी....सियासत की थी. सैनिक हाथों में हथियार नहीं लेना चाहते सायमा, सियासतें उन्हें मजबूर करती हैं.' मैंने उसे चूमते हुए कहा.

अगले पंद्रह साल तक नाजिया को पैसे मिलते रहे और एक ख़त भी, जिसपे सिर्फ 'सॉरी बेटा' लिखा होता था.


[चित्र 2002 में प्रदर्शित 'वी वर सोल्जर' के अंतिम दृश्यों में से एक दृश्य का है. चित्र के साथ 'सब टाइटल्स' पे ज़रूर ध्यान दें.]

Wednesday, November 29, 2023

Papa's Letters to Shaurya #EighthLetter


कभी-कभी ऑफिस से आकर तुमसे मिलता हूं तो अंदर से गिल्ट (Guilt) महसूस होती है। अपने सपने के लिए सिर्फ व्यक्ति sacrifice नहीं करता, उनके बच्चे भी करते हैं। वर्किंग पेरेंट्स का गिल्ट में होना कोई नया नहीं है, किंतु मेरे लिए पहला अनुभव है। मेरे फ्रेंड्स बोलते हैं बच्चों को भी आदत हो जाती है और दोपहर में सोने के बाद जागकर तुम अपनी आया का नाम लेते हो तो ऐसा सही भी लगने लगता है। मम्मा या मेरे ऑफिस से लौटकर आने के बाद जिस तरह तुम चहक जाते हो, देखते ही बनता है। तुम्हारी नानी भी यही बोलती हैं कि मम्मा पापा के आने के बाद जैसे शौर्य को दुनिया मिल जाती है।
किंतु तुम्हारा जो दिन भर का इंतजार है वह मेरे लिए तकलीफदेय है। इसलिए भी कि बोर्डिंग में रहते मैंने भी रविवार के इंतजार किए हैं। तुम्हारे दादा-दादी ने भी बिना नागा किए हर रविवार आने की चेष्टाएं की हैं। मैं उनका दर्द, उनका रविवार का इंतजार अब समझ सकता हूं।
बच्चों के साथ पैरेंट्स भी जन्म लेते हैं अब मैं यह समझ सकता हूं। तुम्हारी मम्मा और मेरी फ्यूचर और करियर को लेकर अपने से जो अपेक्षाएं थीं, वह भी कम हुई है। हमारी जिंदगी का केंद्र बिंदु तुम हो। सब कुछ तुम्हारे आसपास ही घूमता है और जब तुम्हें तकलीफ होती है तो हम भी तकलीफ में होते हैं। गिल्ट से भर जाते हैं।
मुझे एक शहर हमेशा जिंदा सा लगता है। कई विचार, कई सड़कें, कहीं लाइटें, कई लोग सबकुछ एक साथ से चलते, आगे बढ़ते, समय में ढलते लगते हैं। जीवंतता का वो शहर जैसे मेरे अंदर समा गया है। जब से तुम जिंदगी में आए हो। कई फिकरें, कई सपने, ढेर सारा प्रेम, उम्मीद, तुम्हारे करतब सब एक साथ आंखों और जेहन में चलते हैं। उसे तुम्हारे आने के बाद समग्र सा होने लगा हूं।
मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं शायद कभी कह नहीं पाऊंगा। कोई पेरेंट्स अपनी संतान को कितना चाहते हैं वे कभी नहीं कह पाते हैं। लेकिन इस उम्मीद में कि एक दिन तुम पढ़ोगे तो समझोगे, इसलिए लिख रहा हूं। साथ ही इस उम्मीद में कि पढ़ने वाले पाठक भी समझ पाएं कि उनके पैरेंट्स उन्हें कितना प्यार करते हैं, लिख रहा हूं।

Sunday, November 26, 2023

शौर्य गाथा : 90. By Chachu

 आज ब्रो की सुबह जल्दी हो गयी है,ब्रो की हरकतें और बातें एकदम नेक्स्ट लेवल पर जा रहीं है।

ब्रो अब पॉटी बतानें लगे हैं...यार दोस्त तातू पोत्ती आ ली...और फिर दोनों दौड़ लगाते हैं वाशरूम की ओर...
इनको चाहिए कि चाचू भी वहीं बैठें और इनकी बकर सुनें...जैसे याल तातू डंप तृक की स्तोरी सुना दूँ?
'तातु वो तबूतर बुला ला था आपतो...'
'में पोलित अंतल हूँ'
'पुलिस अंतल पेण्त में पोत्ती नहीं तलते'
अभी कुछ दिन पहले ब्रो को ब्रश करना सिखानें में चाचू की ड्यूटी लगी थी।
भाभी नें ये कहते हुये जिम्मेदारी सौंपी की ब्रो तो रोज़ अपना पेस्ट खा लेते हैं....
दो चार दिन साथ ब्रश करनें के बाद भी ब्रो अपना पेस्ट मौका देख धमक देते हैं...थोड़ा सीख गए हैं।
इनके साथ जीना एकदम लाज़बाब है।
जैसे ही में बोलता हूं 'शौर्य भगवान की जय'
भाई पोत्ती शीट पर दम लगाते हुए बोलते हैं
'थोतू तातू भदवान ती दये'
😃

Sunday Notes: इतिहास

 


एक शहर है जो हर दिन बदलता है। कुछ चेहरे उसमें जुड़ते हैं, कुछ भी बिछड़ते हैं। लेकिन फिर भी वो स्थिर है। उसकी गलियां वही हैं, घरों की जगह वही है। करीब 3000 वर्षों बाद जब उसे खोज़ा जाएगा, हड़प्पा की तरह तो हम कहेंगे उम्दा शहर था, नगरीय व्यवस्था थी। आज वहां पर फुटपाथ पर ठंड में मरा वह बूढ़ा इसके खिलाफ गवाही है! इतिहास रुलर्स हैं, पॉलिसीज़ हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर है... पर जो नहीं है वह बूढ़ा जो ठंड में फुटपाथ पर मर गया। जिसका कहीं नाम नहीं है। किसी सरकारी कागज में दर्ज भी हो तो खो जाएगा। 'अज्ञात व्यक्ति' का पुलिस दाह संस्कार कराएगी। 

इतिहास में दर्ज तो पुलिस भी नहीं है।सारे ' सरकारी' कर्मचारी ही। वे लोग बस हैं जिनके लिए ये काम करते हैं- सत्ताधीश। 

मोहम्मद बिन तुगलक की कितनी ही पॉलिसीज़ गलत थीं। कोई तो अधिकारी रहा होगा जिसने उसका विरोध किया होगा। किसी ने तो विरोध में इस्तीफा दिया होगा। किसी ने तो उसका आदेश मानने से इंकार किया होगा। उसका भी तो नाम इतिहास में होना था।

इतिहास की कहानियों में इमरजेंसी में इंदिरा गांधी के नाम के साथ उनका आदेश न मानने वाले अधिकारियों के नाम की दर्ज होने थे। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के साथ विनायक सेनों, संजीव भट्टों के नाम भी दर्ज होने थे। 

जीवनगाथाओं, बायोग्राफीज़ में बेहतरीन कामों के अलावा गलतियों का भी जिक्र होना चाहिए। दर्ज़ होना चाहिए कि उनकी इस गलती की वजह से आज देश को क्या भुगतना पड़ रहा। दर्ज़ होना चाहिए कि महान विभूति होते हुए भी उन्होंने ऐसी तमाम गलतियां की जो भविष्य में याद रखी जाएंगी और चेतायेंगी कि ऐसी गलतियां हमें आगे नहीं करनी है। लेकिन अफसोस इतिहास में दर्ज़ होते हैं सत्ताधीश, पॉलिसीज़, इंफ्रास्ट्रक्चर और गुम होते हैं वे लोग जिनके लिए ये सब बनाए जाते हैं या थोपे जाते हैं। विद्रोह... विद्रोह बस कभी-कभी दर्ज़ होता है। बहुत कम ही... किसी नेल्सन मंडेला का, किसी बहादुर शाह जफर का या किसी बिरसा मुंडा का और 200 वर्ष के अंतराल में सत्ताधीश रह जाते हैं, विद्रोह गायब हो जाते हैं... इतिहास से।

#SundayNotes

Saturday, November 25, 2023

क़त्ल

 यकीन मानिये, ये कहानी नहीं थी. ये आत्महत्या के वक़्त लिखा गया नोट था. लेकिन पुलिस को ये कहानी जैसा लगा था और इसलिए इसे सुसाइड नोट नहीं माना था और फाड़ के फेंक दिया था! पढ़िए और बताइए आपको क्या लगता है :--





मैं लिखता था, लेकिन चूँकि देश के हर लिखने वाले की नियति यह होती है कि वो सिर्फ लिखकर के पेट नहीं भर सकता तो मैं काम भी करता था. आप इसे उल्टा भी कह सकते हैं, कि मैं काम करता था लेकिन लिखता भी था. वो इसलिए क्यूंकि अब मैं काम हर दिन करता था और लिखता कभी-कभार था. फ़िलहाल मुद्दा ये नहीं है कि मैं लिखता था तो अब सिर्फ कहने को यही बचता है कि मैं काम करता था.

मैं जहां काम करता था वहां एक से लोग थे, एक से कपडे पहिन के हर दिन लगभग एक सा काम करते थे.  ये मुझे बंधुआ मजदूरी का नया सुधरा रूप लगता था. मेरी कंपनी बड़ी थी, जिसके सारे ग्राहक विदेशी थे. 'ग्राहक' सुनकर आप अपना खाली दिमाग नहीं चलाईएगा क्यूंकि मैं किसी लाल-बत्ती-क्षेत्र (आप अपनी भाषा में रेड लाइट एरिया भी बोल सकते हैं.)  में काम नहीं करता था. हाँ 'विदेशी' सुनकर ज़रूर आप कुछ कह सकते हैं. चलिए आप नहीं कहते तो मैं ही कहे देता हूँ, आपको इस तरह का काम नये तरीके कि गुलामी लग सकता है और दफ्तर किसी विदेशी हुकूमत की जेल.

मेरे आस पास जितने भी काम करते थे उन्हें सिर्फ काम से मतलब था, उन्हें बाहर की दुनिया नहीं पता थी. मैंने अपनी 'लीड' (जिसे फिर से आप अपनी भाषा इस्तेमाल करके 'बॉस' कह सकते हैं.) से कहा कि 'सचिन ने खेलना छोड़ दिया है.' उसने मुझे देखा, इस तरह से देखा जैसे मैंने किसी दूसरी दुनिया की कोई बात की हो. फिर कड़क के दक्षिण भारतीय हिंदी में पूछा कि ' एम् आर डी की सोर्स फाइल्स कॉपी हुआ की नहीं?' (एम् आर डी वाली बात में आपको आपकी भाषा में नहीं समझा सकता क्यूंकि समझाते-समझाते ही ये कहानी ख़त्म हो जाएगी फिर भी आप पूछेंगे कि ये एम् आर डी  होता क्या है. फ़िलहाल इतना समझ लीजये कि कोई पकाऊ सा काम है, जिसे करना ज़हर पीने के बाद मरने का इंतज़ार करने जैसा है.) फ़िलहाल मुझे हंसी आ गयी. इसलिए नहीं कि उसे कुछ नहीं पता था, इसलिए की आप ये समझते हैं कि क्रिकेट देश का सबसे पसंद किया जाने वाला खेल है और सचिन भगवान् की तरह है. गनीमत ये थी कि मैंने काम कल ही देर रात दस बजे तक दफ्तर में बैठ के ख़त्म किया था तो 'लीड' को अपने प्रश्न का उत्तर सकारात्मक मिला और मैं और भी कुछ सुनने से बच गया. फिर मैंने अपने पास बैठे दिनेश से पूछा, उसने भी मुझे अजीब तरीके से देखा जैसे मैंने उसकी बहिन की ख़ूबसूरती की चर्चा कर दी हो. हाँ, मैं ये सिर्फ इसलिए बता रहा हूँ, कि आपको ये न लगे कि मेरी 'लीड' औरत थी तो शायद उसे क्रिकेट के बारे में पता नहीं होगा.

'लीड' बनना कोई छोटी बात नहीं होती, क्यूंकि उसके लिए आपको सुबह आठ से शाम, माफ़ कीजिये रात दस बजे तक छ:- सात साल तक काम करना पड़ता है. हाँ लेकिन उसके बाद आपको ज्यादा काम करने की ज़रूरत नहीं होती, क्यूंकि आप आराम से अपना काम दूसरों पे थोप सकते हो. आप आराम से दूसरों पे हुक्म चला सकते हो या दूसरों के काम के बीच अपनी भद्दी सी फटी बिवाई वाली टांग अड़ाकर उसे परेशान कर सकते हो. कभी-कभी तो किसी के द्वारा किये काम का श्रेय भी ले सकते हो. हाँ आपने पिछले छ:- सात साल सिर्फ काम करते गुज़ारे हैं तो अब आप उसका गुस्सा भी लोगों पे निकाल सकते हो. ऐसे ही एक बार मैंने अपने पुराने 'लीड' से पूछा था, कि वो मुझे कुछ चीज़ समझाएगा क्या? लेकिन उसने मेरी तरफ कुछ-कुछ खा जाने वाली नज़रों से देखा और कहा कि मैं खुद सीख लूँ, क्यूंकि उसने भी भी खुद ही सीखा था, और मेरा बाप उसे सिखाने नहीं आया था. मैंने उसकी बात को अपने सर मैं बैठा लिया और खुद ही सीखा. लेकिन सीखने के बाद में बहुत हंसा, क्यूंकि मुझे पता चल गया था कि जो मेरे लीड को आता है वो अधूरा ज्ञान है. लेकिन मैंने उसकी गलतियां उसे नहीं बताईं क्यूंकि मैं शायद उसके अहं में छेद कर बात आगे नहीं बढाना चाहता था.

मेरे पुराने और नये लीड के बीच सम्बन्ध थे, ये बाद मुझे बाद में पता चली. इस बार आप सही हैं, उन दोनों के बीच अनैतिक सम्बन्ध ही थे. दोनों ही भद्दे लगते थे, लेकिन उनके बीच सम्बन्ध थे. अक्सर हम मान लेते हैं कि एक खूबसूरत लड़का और एक खूबसूरत लड़की ही प्यार कर सकते हैं. हमारी फिल्मों में भी यही दिखाया जाता है. लेकिन आदतन प्यार अंधा होता है तो एक भद्दी औरत के एक भद्दे आदमी से सम्बन्ध थे. खैर, मुझे उनके अनैतिक संबंधों से कुछ लेना-देना नहीं था. बात ये थी कि वो ऑफिस के वक़्त बाहर घूमने जाते थे और अपनी लीड का काम हमें करना पड़ता था. जो बंटकर मेरे हिस्से में पच्चीस प्रतिशत आता था. पच्चीस प्रतिशत मतलब दो घंटे ज्यादा, दो घंटे ज्यादा मतलब दस बजे तक काम करना. इतना काम करना मुझे कतई पसंद नहीं था और मेरी हिम्मत जवाब दे देती थी. मैं बेहताशा थक जाता था.

मैं परेशान था. काम के बोझ तले दबा महसूस कर रहा था. एक दिन मैं बीमार पड़ गया. मैंने अपनी लीड को बताया. लेकिन आपको जैसे पता ही है जहां मैं काम करता था वहां सबको मशीन समझा जाता था और आपका बीमार होना किसी कंप्यूटर प्रोग्राम में वायरस आने जैसा था. शायद इसीलिए उसने मुझपे चिल्लाया कि 'मैं कैसे बीमार पड़ सकता हूँ?' उसकी इस हरकत पे मैं हंसना चाहता था क्यूंकि बीमार 'कैसे पड़ा' ये तो बीमार पड़ने वाले को भी नहीं पता होता! लेकिन शायद मैं बीमार था तो मैंने रो दिया. उसदिन मैं बरसों बाद रोया था. मुझे माँ की बहुत याद आ रही थी मैंने अपनी माँ को फ़ोन किया, लेकिन मैं माँ के सामने रोना नहीं चाहता था, क्यूंकि इससे माँ परेशान हो जाती. 'कैसे हो बेटा?' माँ ने पूछा. मैंने 'अच्छा हूँ' जवाब दिया फिर उगते सूरज, पूरे चाँद और तारों की बातें की. घर के क्यारी में खिले फूलों में बारे में पूछा और सावन की बारिश का हाल बताया. जब उसे यकीन हो गया कि मैं खुश हूँ तो मैंने फ़ोन रख दिया.

मैं 'शम्भू के रेस्तरां में खाना खाता था. वो अच्छा खाना खिलाता था. वो 35  रूपये में एक थाली खिलाता था. खाना अच्छा था क्यूंकि 35 रूपये में था. हाँ, उस अच्छे खाने की दाल पतली होती थी और सब्जी में एकाध बार कीड़े भी निकले थे. वो बारस सौ किलोमीटर से यहाँ रेस्तरां खोलने आया था और यहाँ की भाषा भी सीखी थी, इसलिए ज्यादा पैसे कमाना अपना हक समझता था. इसीलिए सब्जी में हमेशा सड़े टमाटर ही डालता था. मुझे पहले से ही शक था इसका खाना खा के मैं बीमार पडूंगा लेकिन मेरे पास और कोई चारा नहीं था. ऑफिस से आते-आते मुझे दस बज जाते थे और उसके बाद न तो खाना बनाने कि इच्छा होती थी न ही हिम्मत.

मैं चीज़ें भूलने लगा था. मुझे पहले लगा शायद ये मेरा भ्रम है लेकिन फिर गूगल पे ज्यादा तनाव से होने वाली इस बीमारी के बारे में पढ़ा तो मुझे इस भूलने की बीमारी के बारे में पता चला. एक दिन में ऑफिस के लिए निकला लेकिन भूलने के कारण में बाज़ार पहुँच गया. वहां मैंने कच्चे आलू खरीद कर खाए. यकीन मानिये मैंने कच्चे आलू ही खाए थे. हाँ कच्ची प्याज नहीं खाई थी. प्याज ने एक बार देश की सरकार गिराई थी शायद इसलिए मैं उससे डरता था. जब मुझे होश आया तो भागता ऑफिस पहुँचा, लेकिन देर से पहुंचा और फिर डांट खाई.

एक बार मैंने 'शम्भू के रेस्तरां' में खाना खाया. जैसा कि  आपको पता है, बिल 35 रूपये आया. कोई नेता ये कह सकता है कि मैंने तीन लोगों का खाना एक साथ खाया है. क्यूंकि देश में भरपेट खाना अब भी 12  रूपये में मिलता है. खैर, मैंने पैसे देने जेब में हाथ डाला लेकिन शायद मैं पर्स भूल गया था.(लड़कियों को आपत्ति हो तो वो पर्स को वॉलेट भी पढ़ सकती हैं.) मैंने दस मिनट में पैसे लेकर आने का वादा किया, लेकिन बदले में उसने मेरा मोबाइल गिरवी रख लिया. दस मिनट बाद में पैसे लेकर आया तो उसमें माँ के 16 मिस्ड कॉल थे. उन्होंने बार-बार फ़ोन किये शायद उन्हें कोई अनहोनी की आशंका हुई होगी. (बाद में मैं मुझे पता चला कि माँ को अपने बच्चों कि नियति पहले से पता होती है!) वो फ़ोन पे रो दी. मैंने झूठ बोल कि मैं बाथरूम था. वो चुप हो गई. मैं दस मिनट चुपचाप सड़क पे बैठा रहा.

मैं कभी-कभी नित्या को फ़ोन करना चाहता था. नित्या मेरा पुराना प्यार थी. हमने एक ही कॉलेज से पढाई की थी. साथ-साथ चार साल गुज़ारे थे. हम एक दुसरे के बहुत पास था. शायद इसलिए क्यूंकि हमने एक ही कॉलेज में नहीं एक ही रूम में भी पढ़ा था, और पढने के अलावा और भी कुछ किया था. हर बार उस 'कुछ' के बाद कपडे पहिनने से पहले हम एक ही ख्वाब देखा करते थे, जिसमें हमारे तीन-चार छोटे-छोटे बच्चे हुआ करते थे. अब आप उत्सुकतावश उन बच्चों का जेंडर मत पूछियेगा, क्यूंकि हमने ख्वाबों में बच्चों की चड्डी उतार जेंडर नहीं देखे थे. पहले हम बहुत बातें किया करते थे, लेकिन फिर में व्यस्त हो गया और वो नाराज़ हो गई. इसे मैं उसकी गलती नहीं कह सकता, क्यूंकि मेरे पास ही वक़्त नहीं था. लेकिन ये मेरी भी गलती नहीं थी. किसी ने समझदार आदमी ने था कि लम्बी दूरी का प्यार (आपकी भाषा में लॉन्ग-डिस्टेंस-रिलेशनशिप)  नहीं चलता , ये उसी आदमी की समझदारी का परिणाम था. खैर, धीरे-धीरे नित्या में मेरा फ़ोन उठाना बंद कर दिया और मेरे प्यार का अंत हो गया, और हमारे बच्चे कभी ख्वाबों से बाहर ही नहीं निकले!

मैं निराश था और निराशावश मैंने लौट के घर जाने का सोचा. घर पे मैं फिर से लिखना शुरू कर सकता था. लेकिन फिर मैंने ये ख़याल त्याग दिया. हुआ ये था कि एक बार मैंने 'बाढ़-राहत-कोष' में पाँच हज़ार रूपये जमा किये थे. जब मैंने ये बात अपने बाप को बताई तो उन्होंने कहा कि 'बीस हज़ार कमाने वाले पांच हज़ार दान नहीं करते.' उसके बाद उन्होंने बहुत सी बातें की जो मुझे कुछ-कुछ गाली जैसी लगी थी और मैं उन्हें यहाँ दुहराना नहीं चाहता. मैं सिर्फ लिखने से बहुत सारे पैसे नहीं कमा सकता था और उनसे पैसे मांगने से डर रहा था.

आखिर मैंने आत्महत्या करने की सोची. हाँ, इस चकाचौंध भरी दुनिया से, जहाँ एकबार मैं खुद ही आना चाहता था, काम करना चाहता था, से आखिर निराश होकर मैंने आत्महत्या करने की सोची. आत्महत्या बड़ा अजीब ख़याल होता है. खुद को मारना बड़ा अजीब ख़याल होता है. यह आपको पापी बना देता है, कमजोर प्रदर्शित करता है. इसलिए मैंने आत्महत्या का ख़याल त्याग दिया. लेकिन इसे हादसे का रूप देने का सोचा. मैंने दौड़ते हुए, दौड़ती कार के सामने आने का सोचा, लेकिन इस तरीके से बेगुनाह कार वाले को जेल जाना पड़ सकता था. लेकिन फिर मुझे लगा हम सब अपनी ज़िन्दगी में दो-चार दिन जेल में बिताने लायक गुनाह तो करते ही हैं, तो एक रात मैं तेजी से दौड़ती कार के सामने तेजी से आ गया. मैं दो मीटर दूर उछला और मर गया. लोगों ने कार को घेर लिया. कार में से एक औरत निकली. वह औरत मेरी लीड थी. मैं मरते-मरते भी अपनी मौत और उसकी किस्मत पे मुस्कुरा दिया.

अगले दिन अखबार में खबर छपी, 'फलाना सूचना प्रोद्योगिकी कंपनी में काम करने वाला चौबीस वर्षीय 'ढिमका' सॉफ्टवेर इंजिनियर सड़क हादसे में मारा गया.....' पुलिस ने इसे हादसा कहा था. मैंने आत्महत्या का नाम दिया है. लेकिन पढने के बाद आप समझ सकते हैं कि ये एक क़त्ल था. अत्यधिक काम और तनाव द्वारा किया गया क़त्ल!

(देश में हर साल औसतन 9500 लोग अत्यधिक काम से तनाव में आ आत्महत्या करते हैं. लेकिन बस खनकते पैसे गिनने वाली सरकार बहादुर चुप है और हम-आप के पास तो ये सोचने का वक़्त ही नहीं है!)

[ चित्र 2011 में प्रदर्शित मेरी फेवरेट फिल्म 'शेम', अभिनेता 'माइकल फ़ासबेंडर' का है. अगर आप वालिग है तो ही इसे देखिये, क्यूंकि ये एक NC-17  सर्टिफिकेट प्राप्त फिल्म है. ]

Thursday, November 23, 2023

शौर्य गाथा 90

 भाईसाहब समझदार हो रहे हैं और इनकी समझदारी धीमे धीमे बहुत प्यारी लगने लगी है। वे बैट बॉल से खेल रहे हैं और बॉल मम्मा को लग जाती है। वे तुरंत मम्मा के पास पहुंचते हैं "मम्मा आपको लगी तो नहीं? " और तुरंत Hug कर लेते हैं।

ऐसे ही भाईसाहब चाचू के साथ खेल रहे हैं। चाचू को बैट लग जाता है। भाईसाहब तुरंत जाते हैं, चाचू से कहते हैं "धुको... धुको (झुको)..." और झुकते ही गाल पर पुच्ची कर लेते हैं। फिर कहते हैं "चाचू मैं एंबुलेंस बुलाता हूं... आप चिंता नहीं करो."
फोटो: चाचू और शौर्य
May be an image of 2 people, child and people smiling

#SundayNotes



 मोहब्बत किसी एक किनारे पर रखकर आप जिंदगी नहीं चला सकते। जिंदगी चलाने इश्क, एतबार, उम्मीद, वादे और थोड़ा स्लो-मोशन में ठहरकर जिंदगी देखना लगता है।

पास्ट... पीछे मुड़-मुड़ देख आप कभी बाइक ढंग से चला पाए हैं? भाईसाहब एक्सीडेंट का खतरा हमेशा बना रहता है। जिंदगी भी पीछे मुड़-मुड़ देख नहीं चल सकती। आगे नई राह, नई जिंदगी और नया एडवेंचर आपका हमेशा इंतजार कर रहा होता है... हमेशा।
आपको बस मुस्कुरा कर आगे बढ़ने की जरूरत होती है बिना पीछे मुड़कर देखे।
तो आगे बढ़िये, पिछला पीछे छोड़कर के मुस्कुराइए... और नए सफर में, नई स्पीड के साथ जिंदगी की बाइक घुमा दीजिए। नई राह पर, नई उम्मीद में, नए विश्वास के साथ... किसी नए एडवेंचर की तरफ...

शौर्य गाथा 89.



 भाईसाहब बोलते हैं "पापा, आओ... इधर आओ..." पापा कहीं व्यस्त हैं। इग्नोर कर देते हैं।

भाईसाहब फिर चिल्लाते हैं "पापा, पापा विदेत... विदित पापा..." पापा फिर सुनते नहीं हैं।
अब भाईसाहब अपनी आवाज का माड्यूलेशन बदलते हैं, थोड़ा सा प्यार आवाज में डालते हैं और बोलना शुरू करते हैं "विवू ... विवु... विदेत... सुनो न... विवु विदेत..." पापा की ये सुनकर हंसी छूट जाती है। पापा उन्हें गोद में उठा लेते हैं। ये 'विवू' भाईसाहब ने कभी मम्मा को बोलते सुना है इसलिए जुबां पर आ गया है।
अभी दो-तीन महीने से ज्यादा समझने लगे हैं। बहुत सारा ऑब्जर्व करते हैं... बहुत सारा बोलने लगे हैं।
पापा अगर घर पर कुछ बोलें भाईसाहब वाइस मॉड्यूलेशन तक कॉपी कर रिपीट करते हैं। मसलन ऑफिस से आकर बोलें "निधि मैं थक गया..." तो भाईसाहब भी मम्मा की ओर पलटकर तुरंत पापा को रिपीट करके बोलेंगे "निधि, मैं थक गया हूं.. थक गया हूं..." हम सब उनकी ऐसी हरकतें देख हंस पड़ते हैं।
मुझे लगता है बच्चों की इस उम्र (ढाई से तीन वर्ष) में हमें बहुत कुछ सोच समझकर बोलने और कहने की जरूरत होती है। ये सब कुछ तुरंत सीख लेते हैं। मैं कोशिश कर रहा हूं की सोच समझकर इनके सामने बोलूं। अगर इसी उम्र में आपका बच्चा है तो आप भी कीजिए...
फोटो: भाईसाहब और चाचू