भाईसाहब समझदार हो रहे हैं और इनकी समझदारी धीमे धीमे बहुत प्यारी लगने लगी है। वे बैट बॉल से खेल रहे हैं और बॉल मम्मा को लग जाती है। वे तुरंत मम्मा के पास पहुंचते हैं "मम्मा आपको लगी तो नहीं? " और तुरंत Hug कर लेते हैं।
प्यार करना बहुत ही सहज है, जैसे कि ज़ुल्म को झेलते हुए ख़ुद को लड़ाई के लिए तैयार करना. -पाश
Thursday, November 23, 2023
शौर्य गाथा 90
#SundayNotes

मोहब्बत किसी एक किनारे पर रखकर आप जिंदगी नहीं चला सकते। जिंदगी चलाने इश्क, एतबार, उम्मीद, वादे और थोड़ा स्लो-मोशन में ठहरकर जिंदगी देखना लगता है।
शौर्य गाथा 89.
भाईसाहब बोलते हैं "पापा, आओ... इधर आओ..." पापा कहीं व्यस्त हैं। इग्नोर कर देते हैं।
शौर्य गाथा 88.
दिन निकल गया है और सारे घर में भाईसाहब के खिलौने बिखरे पड़े हैं, कुछ बर्तन हैं यहां-वहां, भाईसाहब के बिखेरे... दस बार खाने को बनवाया है, दस बार जिद की तब तीन बार खाया है। दिन भर में मैं भी झल्लाकर गुस्सा हुआ हूं, एक दो बार थोड़ा सा डांटा भी। लेकिन भाईसाहब पास आएं और गाल पे प्यार कर लें, कोई गुस्सा रह सकता है भला!
Papa's Notes. शौर्य गाथा 87.
Tuesday, November 7, 2023
Papa's Letters to Shaurya #seventhletter #God
प्रिय शौर्य,
मैं नींद को त्यागता हूं तो लिख पाता हूं. मैं स्वयं को त्यागता हूं तो मंदिर तक पहुंचता हूं, नहीं तो बाहर से ही कई बार लौटा हूं. मैं तुम्हारी मम्मा के साथ होता हूं तो कुछ और होता हूं... यही प्रेम है. एक अजनबी दुनिया में रह रहा हूं जो इतनी पुरानी है कि मेरा जीवन उसका नैनो सेकंड (उससे भी कई गुना कम) है और इतनी अनसर्टेन की कब खत्म हो जाए पता ही नहीं. किंतु इस छोटे से काल का भी अतीत है! एक भविष्य है! इसलिए जीवन बीमा कराया हुआ है. स्वयं के कुछ होने के मुगालते पाले हुए हैं. बैर बांधे हुए हैं, मित्रताएं निभाई जा रही हैं. इस उम्मीद में की एक दिन तुम पढ़ोगे और वो माइक्रो-चैंजेज़ जो मुझमें होने थे, समय पर नहीं हो पाए, तुममें आएंगे... ये पत्र लिखे जा रहे हैं. इस दुनिया की उम्र को देखें तो एक नैनो सेकंड की जिंदगी की कितनी ख्वाहिश हैं! यही जिंदगी है.
राह दिखाने हम जिस मनुष्य को खोज करके लाए थे वो 'अप्पो दीपो भव' कह चला गया. उसने जो मार्ग दिखाया उसके मानने वालों ने उसी मार्ग में पत्थर रख दिए और अपनी कामेच्छाओं की पूर्ति हेतु चल दिए! 'मारा' जिसका कुछ न बिगाड़ सका उसके अपनों ने बिगाड़ा...! जिसका अहसास उन्हें पहले से था, इसलिए वह अपना मार्ग पुनीत (sacrosanct) बताएं बिना 'अप्पो दीपो भव' कह चले गए. बरसों बाद ऐसे ही जब जद्दू (J. Krishnamurti) को लोगों ने ईश्वर बनाना चाहा तो वह इन्हीं के सच्चे शिष्य (true disciple) बनकर उभरे और सीधा कहे "ना मैं अवतार, ना तुम. ना कोई सक्सेसर, ना कोशिश करना तुम. ढूंढो, मुझमें जो मिले सो ले लो, फिर खुद को खोज़ लो! मिल जाए तो अच्छा, न मिले तो तुम जानो."
ऐसे ही दाजी (Heartfulness Guide) कहते हैं " concentrate within... light is within you... meditate, be pure..." ...और दाजी के परम भक्तों को मैंने झमेले का झोला टांगे पाया है.
मैंने कई क्षमावानियाँ की. प्रण किए कि "सबसे क्षमा, सबको क्षमा" और कइयों को माफ नहीं कर पाया, कई जगह पर तो खुद को भी नहीं!
मैं आचार्य विद्यासागर जी के बिल्कुल पास तक गया वह मुस्कुराए मैं भाव्हाल्वित था. मुझे वह ईश्वर से लगते हैं किन्तु कितना कुछ है जो उनसे सीखे बिना मैं उनके व्यक्तित्व से ही विभोरित हो गया!
मुझे हमेशा से लगता है कि ईश्वर नहीं है या था तो किसी नवजात कि मृत्यु के साथ ही बहुत पहले मर चुका है. इसलिए उसे प्राप्त करना व्यर्थ है. किंतु रह-रह कर शाक्यमुनि ने जो कहा वही शाश्वत सत्य लगता है- 'अप्पो दीपो भव' और स्वयं को प्रकाशित कर स्वयं से, स्वयं को, स्वयं में खोजना ही तो सबसे मुश्किल है.
इस नैनो सेकंड जिंदगी के इतने सारे झमेले! एक दिन बड़े होकर तुम भी समझोगे...
तुम्हारे पापा.
Photo: My Little Monk(ey).
#शौर्य_गाथा #Shaurya_Gatha 86.
Friday, November 3, 2023
मैं अक्सर किसी पेड़ से लिपट जाना चाहता हूं...
'जब रुलाई फूटे किसी पेड़ से लिपट जाना...'
मैं अक्सर लिपट जाना चाहता हूं किसी पेड़ से. पूछना चाहता हूं खैरियत. बाप, दादा ,चाचा किधर हैं? पुरखे किस बीज से पनपे थे? एल्गी (Algae) से अब तक ऐसे विकसित नहीं हुए कि काट पाओ किसी को? देखो आदमी तो 2 लाख साल में ही डेवलप कर गया है...इतना कि शुरू से भोजन दिया जिसने, सांसे दे रहा है जो, उसी को मशीनों से आधे घंटे में काट डालता है.
'विलुप्ति (Extinction) के कगार पर तो नहीं हो तुम?' ' बचे हैं तुम्हारे प्रजाति के कुछ लोग?' पूछते पूछते साथ में रो देना चाहता हूं...
कुछ अपना भी है जो कहना है. कुछ रिश्ते हैं जिन्हें निभा नहीं पाया. कुछ जिंदगियां जिनसे अंतिम समय मिल नहीं पाया. एक वह मंदिर है जहां पर बचपन खेलने में बीता, वहां बमुश्किल जा पाता हूं. कुछ एहसास हैं जो नौकरी के साथ खत्म हो गए, कुछ हैं जो बढ़ गए. उनके बारे में बताना चाहता हूं.
वक्त के साथ बेबी केयर, फ्यूचर प्लानिंग, फाइनेंशियल प्लानिंग, स्टेबिलिटी जैसे लफ्ज़ जुड़ गए हैं. उनको तुम्हें समझाना चाहता हूं. मैं अक्सर किसी पेड़ से लिपट जाना चाहता हूं...
कितने पक्षी बैठे? कितनो को दाना दिया? कितने बच्चे खेले हैं? कितने मुसाफिरों को छांव दी? किसी की आंखों में चोर तो नहीं दिखा? पूछना चाहता हूं.
अच्छा बताओ, यहीं खड़े रहकर पिछले कई दशकों में कितनी दुनिया बदलते देखी? कितने लोगों ने मेरे जैसे बात करने की कोशिश की? कितनों ने तुम्हें चुभन दी? कितनों ने सोचा होगा तुम्हें काटने का...? पूछना चाहता हूं. मैं अक्सर किसी पेड़ से निपट जाना चाहता हूं...
#wildstories #जंगल_की_कहानियां #ForestLife
Photo: Monitor Lizard by Sumit Shrivastava
Tuesday, October 31, 2023
जंगल की कहानियां : कोयंबटूर का वृक्ष पुरुष
पिछले कुछ वर्षों में जलवायु और जैव विविधता संकट के खतरनाक रूप से हमारे नियंत्रण से बाहर होने के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 1980 के दशक के बाद से, प्रत्येक दशक पिछले दशक की तुलना में अधिक गर्म रहा है, पिछला दशक, 2011-2020, रिकॉर्ड पर सबसे गर्म रहा है। हर साल, पर्यावरणीय कारक लगभग 13 मिलियन लोगों की जान ले लेते हैं, और अत्यधिक पानी की कमी वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है।
पर्यावरण एक अनिश्चित स्थिति में है और हमारी दुनिया को बचाने के लिए हम सभी को आगे आना होगा। कुछ हरित योद्धा स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ा रहे हैं और यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि हम सभी कुछ न कुछ प्रकृति बचा लें। उन्हीं में से एक कोयम्बटूर तमिलनाडु के मरीमुथु योगनाथन (Marimuthu Yoganathan) भी हैं.
12 साल की उम्र में, मारीमुथु योगनाथन ने खुद को नीलगिरी में लकड़ी माफिया से लड़ते हुए पाया। कोयंबटूर में तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम (टीएनएसटीसी) की एक बस के 55 वर्षीय बस कंडक्टर ने बताते हैं "मेरे माता-पिता नीलगिरी में एक चाय बागान में काम करते थे, जहां लकड़ी माफिया पेड़ों की अवैध कटाई जैसी गतिविधियों में शामिल थे। एक दिन, मैंने उनको रोकने के लिए उनके रस्ते में जमीन पर लेटकर विरोध करने का फैसला किया। लेकिन मुझे गुंडों ने पीटा . जागरूकता पैदा करने के लिए मैं कलेक्टर को पत्र लिखा और कोटागिरी में सार्वजनिक दीवारों पर हस्तलिखित पोस्टर चिपकाए। कुछ रातें मैं जंगल में सोया, पेड़ काटने वाले लोगों को पकड़ने की कोशिश की। लेकिन जब मैंने देखा कि माफिया के सामने मेरा कोई मुकाबला नहीं है, मैंने अधिक पेड़ लगाकर उनका मुकाबला करने का फैसला किया।" योगनाथन पिछले 40 सालों से अपने यात्रियों को मुफ्त में पौधे बांट रहे हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उन्हें "कोयंबटूर का वृक्ष पुरुष" कहा जाता है।
1987 से, उन्होंने तमिलनाडु में चार लाख से अधिक पौधे लगाए हैं, वह जागरूकता पैदा करने के लिए अपना खाली समय स्कूलों और कॉलेजों में भी बिताते हैं। एक प्रोजेक्टर जो उन्होंने पीएफ ऋण पर खरीदा था वह उनका निरंतर साथी है। "आपको इसे छात्रों के ध्यान के लिए दिलचस्प बनाना होगा। प्रोजेक्टर मुझे दिलचस्प तथ्य साझा करने में मदद करता है कि हमें पानी कैसे मिलता है, डोडो पक्षी किस कारण से विलुप्त हो गया, और देश भर में दुर्लभ पेड़ हैं।" भारथिअर विश्वविद्यालय के परिसर में, जल्द ही एक कुयिल थोप्पू (तमिल में पक्षी अभयारण्य) होगा, योगनाथन के प्रयासों के लिए धन्यवाद, जो अभयारण्य के निर्माण में व्यस्त हैं, जिसमें कोयंबटूर में देशी, दुर्लभ और फल देने वाले पेड़ों के 2,000 पौधे होंगे।
लेकिन उनका अंतिम सपना यह सुनिश्चित करना है कि भारत के प्रत्येक गांव में प्रत्येक घर में आम, चीकू, नारियल, अमरूद और कटहल के पांच पौधे लगाए जाएं। "अगर हर घर के पिछवाड़े में ये पांच पेड़ होते, तो वे एक सहकारी समिति और व्यवसाय बना सकते हैं। कोई भूख नहीं होगी, और हमने फलों का जंगल बनाया होगा।"
योगनाथन का सुझाव है कि "एक पौधा लगाना और उसकी देखभाल करना स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए। सरकार को वर्षा जल संचयन और पार्किंग स्थान आरक्षित करने की तरह, रियल एस्टेट डेवलपर्स के लिए निर्माण शुरू करने से पहले एक निश्चित संख्या में पौधे लगाना अनिवार्य बनाना चाहिए।"
जानकारी एवं फोटो: साभार इंटरनेट
#wildstories #जंगल_की_कहानियां #GreenWarriors
Sunday, October 29, 2023
एक बौद्ध भिक्षु की कथा
एक बौद्ध भिक्षु की कथा है कि वह एक ब्राह्मण के द्वार पर भिक्षा मांगने गया। ब्राह्मण का घर था, बुद्ध से ब्राह्मण नाराज था।
उसने अपने घर के लोगों को कह रखा था कि और कुछ भी हो, बौद्ध भिक्षु भर को एक दाना भी मत देना कभी इस घर से। ब्राम्हण घर पर नहीं था, पत्नी घर पर थी; भिक्षु को देखकर उसका मन तो हुआ कि कुछ दे दे। इतना शान्त, चुपचाप, मौन भिक्षा-पात्र फैलाये खड़ा था, और ऐसा पवित्र, फूल-जैसा। लेकिन पति की याद आयी कि वह पति पण्डित है और पण्डित भयंकर होते हैं, वह लौटकर टूट पड़ेगा। सिद्धान्त का सवाल है उसके लिए। कौन निर्दोष है बच्चे की तरह, यह सवाल नहीं है, सिद्धान्त का सवाल है--भिक्षु को, बौद्ध भिक्षु को देना अपने धर्म पर कुल्हाड़ी मारना है। वहां शास्त्र मूल्यवान है, जीवित सत्यों का कोई मूल्य नहीं है। तो भी उसने सोचा कि इस भिक्षु को ऐसे ही चले जाने देना अच्छा नहीं होगा। वह बाहर आयी और उसने कहाः क्षमा करें, यहां भिक्षा न मिल सकेगी।
भिक्षु चला गया। पर बड़ी हैरानी हुई कि दूसरे दिन फिर भिक्षु द्वार पर खड़ा है। वह पत्नी भी थोड़ी चिन्तित हुई कि कल मना भी कर दिया। फिर उसने मना किया।
कहानी बड़ी अनूठी है; शायद न भी घटी हो, घटी हो। कहते हैं, ग्यारह साल तक वह भिक्षु उस द्वार पर भिक्षा मांगने आता ही रहा। और रोज जब पत्नी कह देती कि क्षमा करें, यहां भिक्षा न मिल सकेगी, वह चला जाता। ग्यारह साल में पण्डित भी परेशान हो गया। पत्नी भी बार-बार कहती कि क्या अदभुत आदमी है! दिखता है कि बिना भिक्षा लिये जायेगा ही नहीं। ग्यारह साल काफी लम्बा वक्त है। आखिर एक दिन पण्डित ने उसे रास्ते में पकड़ लिया और कहा कि सुनो, तुम किस आशा से आये चले जा रहे हो, जब तुम्हें कह दिया निरन्तर हजारों बार?
उस भिक्षु ने कहा, “अनुगृहीत हूं। क्योंकि इतने प्रेम से कोई कहता भी कहां है कि जाओ, भिक्षा न मिलेगी! इतना भी क्या कम है? भिखारी के लिए द्वार तक आना और कहना कि क्षमा करो, भिक्षा न मिलेगी, क्या कम है? मेरी पात्रता क्या है! अनुगृहीत हूं! और तुम्हारे द्वार पर मेरे लिए साधना का जो अवसर मिला है, वह किसी दूसरे द्वार पर नहीं मिला है। इसलिए नाराज मत होओ, मुझे आने दो। तुम भिक्षा दो या न दो, यह सवाल नहीं है।’
ओशो
महावीर वाणी, भाग-2, प्रवचन-49
#ओशो #Osho #दर्शन
Saturday, October 28, 2023
शौर्य गाथा 84.
भाईसाहब क्लिप लेकर आए हैं "पापा मैं आपकी टी शर्ट सुखा दूं?" भाईसाहब ने पापा की टी शर्ट पर क्लिप लगा दी है।
पापा लेटे हुए हैं। भाईसाहब अपनी तोतली आवाज में कुछ बोलते हैं, जिसका सार है "पापा मैं आपके ऊपर सो जाऊंगा" भाईसाहब ने पूरी मेहनत कर उल्टा लिटा दिया है। अब वो पीठ पर लेट गए हैं। फिर खिलखिलाना शुरू कर देते हैं " पापा मैं आपके जैसे लेट गया... मैं आपके जैसे लेट गया।"
फिर बैठकर पीठ बजाना शुरू कर दिया है। गा रहे हैं "व्हील्स ऑन द बस गो..."
पापा को हंसी आ रही है। पापा की पीठ पर जोर से धोल पड़ता है "पापा हंसते नहीं... नहीं हंसते।"
भाईसाहब फिर से एक और धोल जमाएं उसके पहले ही पापा पलटी लेकर भाईसाहब को बेड पर गिरा देते हैं। 🤣
#शौर्य_गाथा 85. #Shaurya_Gatha




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