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Thursday, January 22, 2026

नन्ही जान और वो लंबी रात: एक टाइगर शावक का रेस्क्यू

कहते हैं जंगल में कब, क्या और कैसे हो जाए, कोई नहीं जानता। अभी कुछ ही समय हुआ है इस जगह का अतिरिक्त प्रभार लिए, लेकिन यह अनुभव ताउम्र के लिए जेहन में दर्ज हो गया है। 

दिसंबर 2023.. सर्दी की एक रात का वक्त था, गश्त के दौरान अचानक पंकज से खबर मिली कि जंगल के बीचों-बीच एक बाघ का बच्चा अकेला पड़ा है। हम मौके पर पहुंचे तो देखा—हथेली जितना छोटा, आंखें भी पूरी तरह नहीं खुली थीं, बस धीमी सी आवाज़ में अपनी मां को पुकार रहा था। लगभग 8 दिन की उम्र... यानी वह पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर था। आसपास बाघिन के पदचिह्न तो थे, लेकिन वह कहीं दिख नहीं रही थी।

नियम और भावना के बीच की कशमकश शुरू हुई। हमारा पहला मकसद था कि बच्चा अपनी मां से मिल जाए, क्योंकि मां के आंचल से बड़ी कोई सुरक्षा नहीं होती। हमने तय किया कि हम दूर से निगरानी रखेंगे। पूरी रात हम वहीं रहे, सांसें थामे इंतजार करते रहे कि शायद बाघिन वापस आए और उसे ले जाए। अंधेरी रात, जंगल की खामोशियां और वह नन्हा शावक—वक्त जैसे ठहर गया था।

लेकिन सुबह की पहली किरण तक भी कोई हलचल नहीं हुई। बाघिन का न आना खतरे की घंटी थी। शायद वह किसी वजह से उसे छोड़ के (परित्याग कर) चली गई थी (जंगल में अक्सर इस होता है)। अब उस बच्चे को वहां छोड़ना उसे मौत के मुंह में धकेलने जैसा था।

सुबह होते ही हमने वरिष्ठों के निर्देश पर प्रोटोकॉल के तहत उसका मेडिकल परीक्षण (Health Checkup) करवाया। वह बहुत कमजोर था और उसे तत्काल देखभाल की जरूरत थी। अंततः भारी मन से, लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए, निर्णय लिया गया कि उसे मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी, सतना भेजा जाए।

सफर के दौरान जब वह नन्हा बच्चा हमारी टीम की तरफ देख रहा था, तो लगा जैसे वह पूछ रहा हो कि "मेरी मां कहां है?" लेकिन एक फॉरेस्ट ऑफिसर के तौर पर कभी-कभी हमें 'पिता' बनकर कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। उसे मुकुंदपुर में सुरक्षित छोड़ दिया गया।

वो 8 दिन का नन्हा मेहमान आज भी याद आता है, टाइगर स्टेट की उम्मीद की एक किरण सा...

फोटो: नन्हा बाघ का बच्चा परीक्षण के दौरान।



#wildstories #जंगल_की_कहानियां 7 #ForestLife #TigerRescue #SaveTheTiger

Friday, November 3, 2023

मैं अक्सर किसी पेड़ से लिपट जाना चाहता हूं...

 


'जब रुलाई फूटे किसी पेड़ से लिपट जाना...'

मैं अक्सर लिपट जाना चाहता हूं किसी पेड़ से. पूछना चाहता हूं खैरियत. बाप, दादा ,चाचा किधर हैं? पुरखे किस बीज से पनपे थे? एल्गी (Algae) से अब तक ऐसे विकसित नहीं हुए कि काट पाओ किसी को? देखो आदमी तो 2 लाख साल में ही डेवलप कर गया है...इतना कि शुरू से भोजन दिया जिसने, सांसे दे रहा है जो, उसी को मशीनों से आधे घंटे में काट डालता है.

'विलुप्ति (Extinction) के कगार पर तो नहीं हो तुम?' ' बचे हैं तुम्हारे प्रजाति के कुछ लोग?' पूछते पूछते साथ में रो देना चाहता हूं...

कुछ अपना भी है जो कहना है. कुछ रिश्ते हैं जिन्हें निभा नहीं पाया. कुछ जिंदगियां जिनसे अंतिम समय मिल नहीं पाया. एक वह मंदिर है जहां पर बचपन खेलने में बीता, वहां बमुश्किल जा पाता हूं. कुछ एहसास हैं जो नौकरी के साथ खत्म हो गए, कुछ हैं जो बढ़ गए. उनके बारे में बताना चाहता हूं.

 वक्त के साथ बेबी केयर, फ्यूचर प्लानिंग, फाइनेंशियल प्लानिंग, स्टेबिलिटी जैसे लफ्ज़ जुड़ गए हैं. उनको तुम्हें समझाना चाहता हूं. मैं अक्सर किसी पेड़ से लिपट जाना चाहता हूं...

कितने पक्षी बैठे? कितनो को दाना दिया? कितने बच्चे खेले हैं? कितने मुसाफिरों को छांव दी? किसी की आंखों में चोर तो नहीं दिखा? पूछना चाहता हूं.

अच्छा बताओ, यहीं खड़े रहकर पिछले कई दशकों में कितनी दुनिया बदलते देखी? कितने लोगों ने मेरे जैसे बात करने की कोशिश की? कितनों ने तुम्हें चुभन दी? कितनों ने सोचा होगा तुम्हें काटने का...? पूछना चाहता हूं. मैं अक्सर किसी पेड़ से निपट जाना चाहता हूं...

#wildstories #जंगल_की_कहानियां #ForestLife

Photo: Monitor Lizard by Sumit Shrivastava

Tuesday, October 31, 2023

जंगल की कहानियां : कोयंबटूर का वृक्ष पुरुष

 


पिछले कुछ वर्षों में जलवायु और जैव विविधता संकट के खतरनाक रूप से हमारे नियंत्रण से बाहर होने के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 1980 के दशक के बाद से, प्रत्येक दशक पिछले दशक की तुलना में अधिक गर्म रहा है, पिछला दशक, 2011-2020, रिकॉर्ड पर सबसे गर्म रहा है। हर साल, पर्यावरणीय कारक लगभग 13 मिलियन लोगों की जान ले लेते हैं, और अत्यधिक पानी की कमी वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है।

पर्यावरण एक अनिश्चित स्थिति में है और हमारी दुनिया को बचाने के लिए हम सभी को आगे आना होगा। कुछ हरित योद्धा स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ा रहे हैं और यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि हम सभी कुछ न कुछ प्रकृति बचा लें। उन्हीं में से एक कोयम्बटूर तमिलनाडु के मरीमुथु योगनाथन (Marimuthu Yoganathan) भी हैं.

12 साल की उम्र में, मारीमुथु योगनाथन ने खुद को नीलगिरी में लकड़ी माफिया से लड़ते हुए पाया। कोयंबटूर में तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम (टीएनएसटीसी) की एक बस के 55 वर्षीय बस कंडक्टर ने बताते हैं "मेरे माता-पिता नीलगिरी में एक चाय बागान में काम करते थे, जहां लकड़ी माफिया पेड़ों की अवैध कटाई जैसी गतिविधियों में शामिल थे। एक दिन, मैंने उनको रोकने के लिए उनके रस्ते में जमीन पर लेटकर विरोध करने का फैसला किया। लेकिन मुझे गुंडों ने पीटा . जागरूकता पैदा करने के लिए मैं कलेक्टर को पत्र लिखा और कोटागिरी में सार्वजनिक दीवारों पर हस्तलिखित पोस्टर चिपकाए। कुछ रातें मैं जंगल में सोया, पेड़ काटने वाले लोगों को पकड़ने की कोशिश की। लेकिन जब मैंने देखा कि माफिया के सामने मेरा कोई मुकाबला नहीं है, मैंने अधिक पेड़ लगाकर उनका मुकाबला करने का फैसला किया।" योगनाथन पिछले 40 सालों से अपने यात्रियों को मुफ्त में पौधे बांट रहे हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उन्हें "कोयंबटूर का वृक्ष पुरुष" कहा जाता है।

1987 से, उन्होंने तमिलनाडु में चार लाख से अधिक पौधे लगाए हैं, वह जागरूकता पैदा करने के लिए अपना खाली समय स्कूलों और कॉलेजों में भी बिताते हैं। एक प्रोजेक्टर जो उन्होंने पीएफ ऋण पर खरीदा था वह उनका निरंतर साथी है। "आपको इसे छात्रों के ध्यान के लिए दिलचस्प बनाना होगा। प्रोजेक्टर मुझे दिलचस्प तथ्य साझा करने में मदद करता है कि हमें पानी कैसे मिलता है, डोडो पक्षी किस कारण से विलुप्त हो गया, और देश भर में दुर्लभ पेड़ हैं।" भारथिअर विश्वविद्यालय के परिसर में, जल्द ही एक कुयिल थोप्पू (तमिल में पक्षी अभयारण्य) होगा, योगनाथन के प्रयासों के लिए धन्यवाद, जो अभयारण्य के निर्माण में व्यस्त हैं, जिसमें कोयंबटूर में देशी, दुर्लभ और फल देने वाले पेड़ों के 2,000 पौधे होंगे। 

लेकिन उनका अंतिम सपना यह सुनिश्चित करना है कि भारत के प्रत्येक गांव में प्रत्येक घर में आम, चीकू, नारियल, अमरूद और कटहल के पांच पौधे लगाए जाएं। "अगर हर घर के पिछवाड़े में ये पांच पेड़ होते, तो वे एक सहकारी समिति और व्यवसाय बना सकते हैं। कोई भूख नहीं होगी, और हमने फलों का जंगल बनाया होगा।"

योगनाथन का सुझाव है कि "एक पौधा लगाना और उसकी देखभाल करना स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए। सरकार को वर्षा जल संचयन और पार्किंग स्थान आरक्षित करने की तरह, रियल एस्टेट डेवलपर्स के लिए निर्माण शुरू करने से पहले एक निश्चित संख्या में पौधे लगाना अनिवार्य बनाना चाहिए।"

जानकारी एवं फोटो: साभार इंटरनेट

#wildstories #जंगल_की_कहानियां #GreenWarriors

Thursday, October 26, 2023

जंगल की कहानियां 4.


14 जनवरी... मकर संक्रांति... आप सभी फेस्टिवल एन्जॉय कर रहे होंगे... तिल के लड्डू खा रहे होंगे. मेरा स्टाफ मेरे साथ ऑफिस में बैठा है. मैं पिछले दो घंटे से मीटिंग ले रहा हूँ, हम विभिन्न मुद्दों पर बात कर रहे हैं. वैसे भी फील्ड स्टाफ की छुट्टी कहाँ होती है.

दोपहर के लगभग दो बज रहे हैं. फोन बज उठता है. किसी गांव के सरपंच का फोन है. वे थोड़ी घबराई सी आवाज़ में बात कर रहे हैं. "सर, यहाँ एक व्यक्ति के खेत में कुआं है, उसमें एक साथ आठ जंगली सुअर गिर गए हैं. उनमें कुछ सुअर के बच्चे भी हैं साब" आठ सूअर एक साथ! दोपहर है लेकिन ठण्ड बहुत है, पानी भी अभी ठंडा होगा.  मैं मीटिंग तुरंत ख़त्म करता हूँ, स्टाफ को आवश्यक रेस्क्यू सामन रखने को बोलता हूँ और अगले पांच मिनट में निकल जाता हूँ. 

पच्चीस किलोमीटर दूर पहुँचने में हमें गांव के घुमावदार पहुंचमार्ग से भी पहुँचने में मात्र बीस मिनट लगते हैं. पंद्रह बीस लोग कुएं पास जमा हैं. हमारी गाड़ी आती देख और भी लोग आना शुरू हो गए हैं. शुक्र है खेत की झाड़ियों से बागड़ (फेंसिंग) है और बस एक ही अंदर जाने का रास्ता है. मैं खेत की बागड़ के पास दो स्टाफ नियुक्त कर देता हूँ जिससे बाकि गांव वाले अंदर ना आ पाएं. खेत मालिक मुझे देखकर बताना शुरू करते हैं "साब, ये सूअर अपना कुनबा ले के जा रे था. साब, अपना खेत सड़क से लगा हुआ है. कुनबा सड़क पे पहुंचा कि एक बस हॉर्न देती आई. पूरा का पूरा सूअर उल्टा दौड़ गया और कुएं में आकर गिर गया." 

कुआं का मुआयना किया जाता है. कुआँ में करीब पंद्रह फ़ीट नीचे पानी है. कुएं में पांच सूअर के बच्चे और तीन एडल्ट हैं. शायद पूरा का पूरा परिवार है. हम अपना काम शुरू करते हैं. इतने में गाँव के सरपंच आ गए हैं. वो मुझे धन्यवाद प्रेषित करते हुए जाल की रस्सी का एक सिरा खुद थाम लेते हैं. कुएं के बीच वाले हिस्से (Diameter)  होकर रस्सी की मदद से जाल अंदर डाला जाता है, इतना कि तैर रहे सूअरों के पैरों के भी नीचे पहुँच जाए. फिर रस्सी के चारों सिरे चार लोग चारों कोनों की और जाते हैं. अब उनके नीचे जाल फ़ैल गया है. दो तीन स्टाफ बांस लिए है और सूअरों को कुएं के मध्य की और हरका रहा है. जिससे वे जाल के अंदर आ जाएँ.

पहली बार में हम जाल ऊपर की और खींचते हैं और तीन बच्चे जाल के ऊपर हैं. हम रस्सी के एक सिरे को दुसरे की और लेकर आते हैं. कुएं की एक दिशा रोड की और है और वहां लोग भी काफी जमा हो गए हैं. वहां हम सुअरों को छोड़ नहीं सकते. दूसरी और ऊंचाई है, शायद कुएं बनाने के बाद निकली मिटटी वहां जमा की है. इसलिए वहां भी नहीं छोड़ सकते, एक ओर कुएं की बंधान कुछ ज्यादा ऊपर इसलिए वहां भी नहीं. बची हुई एक ही दिशा है जिस ओर निकालने के बाद छोड़ा जा सकता है.  

उन्हें उपर्युक्त दिशा की ओर छोड़ देते हैं. वे छूटते ही दौड़ लगा गए हैं.

अगली बार फिर प्रयास किया जाता है और दो सूअर ऊपर आ गए हैं. एक बच्चा पानी और ठण्ड की वजह से दौड़ने की बजाये वहीँ बैठ गया है. मेरा एक स्टाफ उसे सहलाने जा रहा है. ये खतरनाक हो सकता है. कहते हैं जंगली सुअर जब दौड़ता है और आदमी सामने खड़ा हो तो उसकी जांघ फाड़ के निकल जाता है! मैं मना करता हूँ, तबतक उसने उसके पीठ पर हाथ फेर पुचकार ही दिया है. वो बच्चा भी भागने लगा है.

अगली बार में दो और निकाल लिए हैं और अंत में सबसे शक्तिशाली जंगली सूअर बचा हुआ है. बड़ी मेहनत से उसे आखिर में निकाला जाता है. वो उल्टा कुएं की ओर ही दौड़ लगाने लगा है. उपस्थित लोगों में भगदड़ सी होने लगी है कि मेरे स्टाफ ने डंडों से उसे हरका दिया है. वो भी तेजी से दौड़ता खेतों में गुम हो गया है. लोगों में ख़ुशी का माहौल है. उन्होंने चिलाना और ताली पीटना शुरू कर दिया है.

हमने पहुँचने के लगभग अगले पंद्रह मिट में ही ये सब कर लिया है. हमने राहत कि साँस ली है. ठण्ड और पानी से मरने से हमने उन्हें बचा लिया है... हमारे लिए यही त्यौहार है.

 फोटो/वीडियो: टीम.

#wildstories #जंगल_की_कहानियां #ForestLife #Rescue 4.

Thursday, May 5, 2022

India As I Know: Story of The #SaveBuxwahaForest Movement.



#SaveBuxwahaForest Movement को सोशल मीडिया पर मैं करीब से शुरू से ही देख रहा था. यह पर्यावरण से जुड़ा Movement था इसलिए इसमें मेरी उत्सुकता कुछ ज्यादा थी। लेकिन अब तक मुझे वही पता था जो मैंने सोशल मीडिया पर पढ़ा था इसलिए मैंने और कुछ जानने के लिए संकल्प से संपर्क किया। संकल्प उसी क्षेत्र से हैं और आंदोलन की शुरुआत संकल्प और उनके कुछ साथियों ने ही मिलकर की थी।


संकल्प से मैं मुख्यतः था 2-3 प्रश्न करता हूं कि आंदोलन शुरू कैसे हुआ? इस आंदोलन से अब तक क्या-क्या फायदे हुए हैं? और इस आंदोलन से आप और आपके मित्रों ने क्या सीखा? अंतिम प्रश्न इन युवाओं की सोच जानने के लिए किया गया था।


मात्र 24 वर्षीय संकल्प बताना शुरू करते हैं। ' भैया अप्रैल 2021 की बात है, मैं और मेरे साथी को कोविड में काम कर रहे थे उसी दौरान अखबार में एक खबर आई कि बक्सवाहा के आसपास के जंगल का क्षेत्र आदित्य बिरला ग्रुप की एक कंपनी के लिए लीज पर दिया जा रहा है जिससे वहां हीरे का उत्खनन किया जा सके। क्योंकि बक्सवाहा क्षेत्र और पूरा संपूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र ही गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा और रोजगार की कमी से प्रभावित रहा है इसलिए मेरे लिए खुश कर देने वाली खबर थी। लेकिन मैंने अखबार की हेडलाइंस को फॉलो करना शुरू कर दिया तो पता चला इसके लिए तकरीबन 2,15,875 (दो लाख पंद्रह हजार आठ सौ पचहत्तर) पेड़ काटे जाने हैं जिससे उस क्षेत्र के तकरीबन 10 हजार लोग प्रभावित होने वाले थे। अधिकतर लोग लघु वनोपज- महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी गुठली, जलाऊ लकड़ी और चारे के लिए जंगल पर निर्भर हैं। इसलिए उन पर प्रभाव ज्यादा पडने वाला था। साथ ही मैंने पड़ा कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मात्र 400 लोगों को वहां पर रोजगार मिलने वाला था जिसमें से अधिकतर कुशल (skilled) और अर्ध कुशल (Semi-Skilled) लेबर का उपयोग होना था मतलब की स्थानीय लोगों को बहुत ज्यादा फायदे वहां पर नहीं थे किंतु उनकी आय जरूर खतरे में थी। 


मैंने और मेरी अन्य साथियों ने मिलकर रिसर्च की तो पता चला कि यह क्षेत्र केन्‍द्रीय भूमि जल बोर्ड ( Central Ground Water Authority (CGWD))  द्वारा 2017 में सूखा प्रभावित क्षेत्रों (Semi Critical Condition) में घोषित है किंतु यहां पर 160 लाख लीटर पानी प्रतिदिन उपयोग किया जाना था मतलब साफ था पानी का अत्यधिक उपभोग उस जगह होना था जहां पर पानी की पहले से ही कमी है। इसके लिए वहां पर वन में उत्सर्जित होने वाली धाराओं पर बांध बनाए जाने थे मतलब साफ था कि छोटे-छोटे नाले सूख जाने थे। छोटे नालों से पानी नदी में बहकर जाता है। इसलिए बेतवा, शासन नदियां भी प्रभावित होने वाली थीं। साथ ही यह ओपन कास्ट माइनिंग का प्रोजेक्ट था अतः भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge System) भी खत्म होने वाला था और भौम जलस्तर (Water Table) भी तीव्रता से नीचे जाने वाली थी। मतलब साफ था कि  स्थानीय लोगों को ना तो रोजगार था वहां पर ना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा फायदा होने वाला था, जबकि ढेर सारे घाटे सामने आने वाले थे। जिसमें सबसे बड़ी समस्या पानी की होने वाली थी।


हमने संपूर्ण रिसर्च की थी और उसका डाटा सोशल मीडिया पर पोस्ट और वीडियो के माध्यम से डालना शुरू किया। धीमे धीमे अन्य डॉक्यूमेंट पढ़े

तो पता चला 2014 में जो फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट दी गई थी उसमें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wild Life (Protection) Act, 1972) के Schedule-I की 7 प्रजातियां वहां पर दिखाई गई थी साथ में बहुत सारे जानवर (तेंदुआ, भालू, काला हिरण, चीतल, मोर, लकड़बग्घा, फॉक्स इत्यादि)  वहां पर प्रदर्शित किए गए थे लेकिन नई फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट में ये सब प्रदर्शित ही नहीं किए गए थे। प्रदर्शित किया गया था कि एक भी जानवर 382 हेक्टेयर के जंगल में नहीं है! जबकि सच ये नहीं था।


 इंटरेस्टिंग बात तो यह है भैया कि मात्र 19 किलोमीटर पर पन्ना टाइगर रिजर्व की बफर जोन है। साथ ही यही क्षेत्र पन्ना टाइगर रिजर्व और नौरादेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी के बीच में एक कॉरिडोर का भी काम करता है, इसलिए वाइल्डलाइफ के हिसाब से भी यह बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।


हमने सारी डिटेल को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना शुरू कर दिया और देखते ही देखते न्यूज़ वालों ने हमारी खबरों को सोशल मीडिया से उठा उठा कर के अपने न्यूज़पेपर में और न्यूज़ चैनल में डालना शुरू कर दिया। मजेदार था कि उनकी खुद की रिसर्च कुछ भी नहीं थी, वह हमारी सोशल मीडिया अकाउंट से उठा उठा कर के ही फैक्ट डाल रहे थे।


धीमे धीमे यह हुआ कि देश की सबसे बड़ी पर्यावरण (Environment) से संबंधित मैगजीन डाउन टू अर्थ (Down To Earth) में भी इसके बारे में छपा, ज़ी न्यूज टीवी चैनल ने भी उसके बारे में डाला और झारखंड के, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र संघ, छोटे-बड़े एनजीओ भी हमारे साथ आना शुरू कर दिया।


हम सब ने मिलकर के छोटे बड़े एनजीओ के साथ विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2021 को #SaveBuxwahaForest मूवमेंट  ट्विटर पर चलाया और उस दिन वह टॉप 3 ट्रेंडिंग हैशटैग में से एक था।


हम युवा अपना हर कदम फूंक-फूंक कर के रख रहे थे. क्योंकि हमें रिसर्च भी करनी थी, हमें यह भी ध्यान देना था कि यह आंदोलन गलत हाथों में ना चला जाए, हमें यह भी ध्यान रखना था कि हम कानून का किस तरीके से उपयोग कर पाएंगे और किस तरीके से समाज के हर तबके को शामिल कर (सोशल मोबिलाइजेशन) के लोगों को अपने साथ शामिल करवाएं.


इसके लिए हमने अलग अलग टीम बनाई। दृगपाल सिंह, अभिषेक जैन ने बहुत अच्छी तरीके से सोशल मोबिलाइजेशन किया। विवेक दांगी, अनुज पाटनी ने बहुत अच्छी तरीके से सर्च की। आशिक मंसूरी ने इमली घाट, कसेरा, बक्सवाहा में नुक्कड़ सभाएं की। हमारी मेहनत देख ग्राउंड पर और सोशल मीडिया पर लोगों ने जुड़ना शुरू कर दिया।


इसका फायदा यह हुआ कि मूवमेंट के सपोर्ट में देश भर से लोग आ गए सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट में कई लोगों ने याचियाएं लगाईं। डॉ धरनेंद्र द्वारा एनजीटी में केस दर्ज किया गया और उनकी याचिका पर एनजीटी ने बुक्सवाहा में माइनिंग के खिलाफ अगस्त में स्टे लगा दिया। उस पर मुहर लगाते हुए हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2021 में स्टे ऑर्डर दे दिया।


संकल्प इतनी सारी बातें इतनी आराम से मुझे बता रहे थे कि मैं उनके ज्ञान, उनकी कोशिशों को देखकर हतप्रभ था। इसलिए मैंने उनसे पूछ ही लिया कि "आपका क्या पॉलिटिक्स में आने का इरादा है?" 

वे बोलते हैं "नहीं भैया, मेरा कोई इरादा राजनीति करने का नहीं था। इनफैक्ट हम में से किसी का भी इरादा राजनीति करने का नहीं था। हम लोग अपने क्षेत्र के लोगों का सोच कर के यह कार्य कर रहे थे। अभी भी मैं समाज के अंदर जाकर के कुछ बदलाव लाने के लिए सिविल सर्विसेस की तैयारी कर रहा हूं।"


मैंने उनसे पूछा "आप और आपके दोस्तों पर इस आंदोलन का क्या प्रभाव पड़ा?"


  वह बोलना शुरू करते हैं "भैया सबसे बड़ी बात तो हम सब का ज्ञानवर्धन हुआ। हमें पहली बार पता चला कि क्या-क्या क्लीयरेंस देश में माइनिंग के लिए ली जाती है। इसके अलावा हम लोगों को जोड़ पाए थे, हमारी सभा में लोगों ने हमें सुना था। पहली बार हम लगा था कि हम सब मिलकर काम करें तो वह बेहतरीन काम कर सकते हैं। पहली बार हम एक टीम के रूप में आए थे जिनमें से अधिकतर लोगों को तो मैं पहले से जानता भी नहीं था और कुछ से तो अभी तक नहीं मिला हूं।


हमने सीखा कि First Study, Learn then Act (पहले पढ़ो, सीखो, फिर काम करो) हमने सीखा कि किस तरीके से सरकार के द्वारा बनाए गए चैनल/कानून का जैसे एनजीटी, आरटीआई, हाईकोर्ट का सही तरीके से प्रयोग किया जाता है। लोगों का साथ कैसे मिलता है, मैनेजमेंट कैसे किया जाता है और नकारात्मक लोगों से कैसे दूर रहा जा सकता है।


मजेदार तो ये था कि हमें कुछ लोगों ने देशद्रोही तक घोषित करने की कोशिश की। फेसबुक पर कुछ ग्रुप के द्वारा हमारे खिलाफ वीडियो डाले गए, स्थानीय विधायक ने हम लोगों के लिए "भटके हुए युवा जो विकास के खिलाफ हैं" तक कहा।


तब भी हम सब  उन सब के खिलाफ डटे हुए थे। हमारी अच्छी कोशिशें देख वाटरमैन ऑफ इंडिया श्री राजेंद्र सिंह, मेधा पाटेकर,आशीष गौतम, एक्टर अखलेंद्र मिश्र, आशुतोष राणा,  जी पाटन ऑफ इंडिया मेघा पाटेकर राम आशीष गौतम, धरनेंद्र जी, अंकिता जैन, निखिल दवे साथ आए, डाउन टू अर्थ, द वायर, क्विंट हिंदी, भास्कर आदि ने इस आंदोलन के बारे में लिखा।'


अंत में संकल्प मेरे से एक बात कहते हैं, " भैया कैंपा एक्ट (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority (CAMPA) Act) अंतर्गत हुए compensatory Afforestation (प्रतिपूरक वृक्षारोपण) से उसी गुणवत्ता का जंगल खड़ा नहीं सकता है। बिना वाइल्डलाइफ के यह चंद पेड़ों का समूह बस होगा।"


बक्सवाहा के जंगलों की स्थिति अभी ये है कि उत्खनन पर हाई कोर्ट के आदेशानुसार फिलहाल रोक लगी हुई है। सागर विश्वविद्यालय ने उसी क्षेत्र में 9000 साल पुराने भृत्तिचित्रों की ख़ोज की है,  इसलिए इस क्षेत्र को सुरक्षित रखने का एक और कारण हमारे पास पास है।


#indiaasiknow #youthiconofindia


(तस्वीरें: संकल्प और बक्सवाहा के जंगल)

Tuesday, December 14, 2021

India As I Know: Couple with a Forest Dream. The SAI Sanctuary Story

 


साई सैंक्चुअरी (SAI (Save Animals Initiative) Sanctuary) ब्रह्मगिरि पहाड़ियों की तलहटी (foothills) में स्थित एक वन्यजीव अभ्यारण्य है. ब्रह्मगिरि हिल्स कोडागु जिले, कर्नाटक में स्थित हैं. ये वही पहाड़ियां हैं जहाँ से कावेरी नदी निकलती है. वही नदी जिसका पानी प्राप्त करने के लिए तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकारें और किसान युद्धरत रहते हैं, ये वही ब्रह्मगिरि हिल्स हैं जहाँ पर प्रसिद्ध ब्रह्मगिरी वन्यजीव अभ्यारण्य स्थित है. लेकिन फिर भी मैं यहाँ मात्र 300 एकड़ में फैले साई सैंक्चुअरी की बात क्यों कर रहा हूँ? इसमें ऐसा क्या है?

साई सैंक्चुअरी देश का पहला और एक मात्र प्राइवेट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी है. एक युगल पामेला और अनिल मल्होत्रा 1991 में हिमालय से लौट कर यहां आते हैं और शुरू में 12 एकड जमीन खरीद कर इसकी अवधारणा रखते हैं. अनिल पिता की बीमारी के कारण अमेरिका से लौट कर वापिस आये थे. जब पिता की मृत्यु उपरांत अस्थिविसर्जन हेतु पामेला और अनिल हरिद्वार गए तो हिमालय देख कर यहीं का होने का निश्चय लिया लेकिन वक्त के साथ उन्हें समझ आया कि अगर जंगलों को नहीं बचाया तो न तो बारिश होगी, न पानी बचेगा और न ही हम ये जैवविविधता ,(Bio Diversity) देख पाएंगे. इसलिए उन्होंने एक वर्षावन (Rain Forest) बनाने का निर्णय लिया.

1991 में वे दक्षिण आ गए और ब्रह्मगिरि हिल्स के पास 12 एकड जमीन खरीदी. इनके लिए ज़मीन खरीदना इतना आसान नहीं था. भारत में कानूनन पेंच और इनका बाहरी होने के कारण इन्हें ज़मीन आसानी से नहीं मिल रही थी, साथ ही जानने वालों ने इन्हें बेवकूफ कहा. कारण? कौन व्यक्ति अपनी सारी जमा पूँजी लगाकर जमीन ख़रीददता है और वो भी एक जंगल बनाने! इससे किसका फायदा है? आर्थिक लाभ (Economic Benefits) क्या होंगे?

लेकिन पामेला का ये जूनून था और अनिल को पामेला से प्यार, इसलिए एक ऐसा जंगल बना जिसे हम आज साई सैंक्चुअरी के नाम से जानते हैं.

ब्रह्मगिरि वन्यजीव अभयारण्य के साथ स्थित यह प्राइवेट अभ्यारण्य 1.2Km की एक एक्स्ट्रा बफर ज़ोन का निर्माण करता है. यहां से एक नाला भी बहता है.

बहुत सारी तितलियों, सभी तरह के पक्षियों, तेंदुओं, चीतल, हाथियों, बार्किंग डियर का ये घर है.

'यहां आकर जंगली जानवर बच्चों को जन्म देते हैं क्यूंकि वो यहाँ ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं.जेड पामेला एक इंटरव्यू में बताती हैं.

रेनफॉरेस्ट दुनिया में पानी, बादल निर्माण, जल स्त्रोतों और ऑक्सीजन देने के लिए जाने जाते हैं. जहाँ कावेरी नदी के लिए हम लड़ रहे हैं, वहीँ हमने कभी कावेरी नदी सिस्टम, उसके आसपास के जंगल को बचाकर नदी जल स्तर सुधारने का कभी सोचा ही नहीं है उल्टा पश्चिमी घाट को ख़त्म ही करते जा रहे हैं. इसलिए साई सैंक्चुअरी हाई होप्स (बड़ी उम्मीद) बनकर सामने आता है.

'हमने शुरू में ही निर्णय लिया था कि हमारे बच्चे नहीं होंगे, मतलब मानव संतान (Human Offsprings). लेकिन हमारे इतने सारे बच्चे होंगे कि एक भरे पूरे जंगल का निर्माण करेंगे ये नहीं सोचा था.' अनिल ने एक इंटरव्यू में बताया था. 'जो ख़ुशी हमें यहाँ मिली दुनिया में शायद कहीं और किसी काम में नहीं मिलती.' पामेला ने उसी इंटरव्यू में कहा.

भगवत गीता के निस्स्वार्थ सेवा कर्म का पामेला और अनिल मल्होत्रा एक अपूर्व उदहारण हैं. जिन्होंने अपनी जीवनभर कि पूँजी सिर्फ आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य बचाने के लिए कुर्बान कर दी. वे उदहारण हैं कि यदि बड़े कॉर्पोरेट हाउस ऐसे ही जंगल आवश्यकता अनुरूप खड़ा करें तो महाराष्ट्र एवं देश के अन्य हिस्सों की पानी की समस्या को काम किया जा सकता है.

ये कहानी इसलिए भी सुना रहा हूँ क्यूंकि पिछले महीने, 22 नवंबर 2021 को अनिल मल्होत्रा का 80 की उम्र में निधन हो गया है. लेकिन जो वे पीछे छोड़ के गए हैं वो वर्षों याद रखा जायेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए उदहारण बना रहेगा.

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ऐसी कहानियां हमें जिंदा रखती हैं. जहां लोग जंगलों को उजाड़ रहे हैं, सरकारी पैसे और वन विभाग की अथाह मेहनत से बने प्लांटेशन पर कब्ज़ा कर रहे हैं वहीं अनिल और पामेला गेल मल्होत्रा जैसे उदाहरण हमारे बीच हैं.

[फोटो: खुद के विकसित किए जंगल में अनिल और पामेला]



Wednesday, December 8, 2021

India as I Know: Solanki, IFFDC and 19331 Unsung Environmental Heroes

 


 

वन विकास और विस्तार (Forest Development and expansion) के लिए काम करने वालों में सबसे पहले हमारे दिमाग में ये नाम आते हैं- शायद फारेस्ट मैन ऑफ इंडिया जादव पेयेंग का या स्वयं 122 हेक्टेयर बैरन लैंड (अनुर्वर भूमि) खरीद कर जंगल खड़ा करने वाले दंपत्ति पामेला और अनिल मल्होत्रा. (अगर इनके नाम आपने नहीं सुने हैं तो कमेंट में लिखिए, मैं अगली पोस्ट में इनके बारे में लिखूंगा.)  लेकिन मैं इनके अलावा एक नई कहानी कहने जा रहा हूं.


मैं जहां पोस्टेड हूं पहले दिन ही एक व्यक्ति मिलने आते हैं मिलनसार, हंसमुख, स्पष्टवादी. उनकी समस्या सुनता हूं और स्टाफ से उनके बारे में पूछता हूं.


'सर ये दीनानाथ सिंह सोलंकी जी हैं. एक समिति के अध्यक्ष हैं. समिति ने 265 हेक्टेयर  का जंगल खड़ा कर दिया है. तमाम उदहारण मेरे पास में इस क्षेत्र में जंगल उजाड़ने वालों के हैं, लकड़ी चोरों के हैं. इसलिए में क्यूरियस हो जाता हूँ. मैं सोलंकीजी  के बारे में पता करता हूं, उनसे मुलाकात करता हूं तो एक नई दुनिया ही सामने आती है.


 बात 1998 की है. सागर के देवरी-गौरझामर क्षेत्र में वेस्टलैंड मैनेजमेंट (बंजर/ऊसर भूमि प्रबंधन) के लिए कुछ ज़मीनों को आईएफएफडीसी की पहल पर समितियों को आवंटित किया गया. उद्देश्य था- वन विकास और विस्तार. इस प्रोजेक्ट को फाइनेंस भी आईएफएफडीसी के माध्यम से ही किया गया.


 जैतपुर कछिया उन्हीं में से एक समिति थी जिसके अध्यक्ष है दीनानाथ सोलंकी जी. इस समिति ने 23 साल के प्रयास से 265 हेक्टेयर का एक बड़ा जंगल खड़ा कर दिया है जिसमें न सिर्फ विभिन्न प्रकार के पेड़ बल्कि नीलगाय, चिंकारा जैसे विभिन्न  जंगली जानवर और ढेर सारे पक्षियों के आसियाने भी हैं. मतलब एक भरा पूरा जंगल.


हर समिति/ संस्था के सफल नहीं हो सकती जबतक एक कुशल नेतृत्व, अच्छा निर्देशन और समूह के ईमानदारी से किये गए अथक प्रयास न हों. 

मैं उनसे समिति की सफलता के राज पूछता हूँ.


वह और समिति के सचिव अनिल मिश्रा जी बताते हैं- 

1. साफ नियत. 

2. सबके साथ लेकर के किया गया प्रयास. 

3. समिति सदस्य एवं गांव के हर व्यक्ति की सहभागिता. 

4. 95% सामूहिक सहभागिता से लिए गए  निर्णय और

5. अध्यक्ष का मैनेजमेंट उनकी सफलता का सहभागी है 

साथ में हमारा रोपण बहुत अच्छा रहा, स्पेशलिस्ट ने जो भी हमें जानकारी दी उसका हमने सदुपयोग किया. कौन सी जमीन में कौन सा पौधा रोपण करना है स्पेशलिस्ट के बताने के अलावा हमें अनुभव के साथ आया. साथ में हमारे गांव के लोगों में समर्पण की भावना भी है.


मैं उनसे फिर पूछता हूं कि देवरी तहसील (जिला सागर म.प्र.) में ही सरखेड़ा समिति है या जिला टीकमगढ़ (म.प्र.) की मोहनगढ़ समिति है वे इतनी सफल नहीं हैं. उसके पीछे का कारण क्या है?


वह बोलते हैं कि इसमें मुख्य बात यह है कि-

1. इन समितियों में 3 से  5 गांव के लोग सदस्य तो गांव के हिसाब से लोगों कि सोच बाँट जाती है, उद्देश्य बाँट जाते हैं. अब सोच के बंटवारा होता है तो असफल होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. समिति में एक ही सोच के व्यक्ति हों तो सफलता की संभावनाएं ज्यादा होती हैं.

2. कुछ जगह पर गलत एवं लालची लोगों को जुड़ाव भी समिति में हुआ है.

3. कुछ जगह पर ऐसा हुआ है कि शुरुआत में पौधों की देख रेख अच्छे से नहीं पाई. पौधों का विकास अच्छा नहीं हुआ तो लोगों का लगाव कम हो गया.

4. कुछ जगह पर मैनेजमेंट बहुत अच्छा नहीं रहा और

5. कहीं खाते के आय-व्यय में पारदर्शिता नहीं रही.


इसी बीच में सोलंकी जी से हंसते-हंसते पूछ लेता हूं कि 'कहां तक पढ़े हैं?' सोलंकीजी पहले थोड़ा सा असहज होते हैं फिर मुस्कुरा कर कहते हैं 'सर, पांचवी पास हूँ.'  भले ही वे पांचवी तक पढ़े हैं लेकिन उनके द्वारा किया गया काम, उनके द्वारा लिए गए निर्णय, उनकी लीडरशिप क्वालिटी किसी बड़े मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट से पढ़े हुए व्यक्ति से भी बेहतर है. इसलिए वह राष्ट् स्तर पर आईएफएफडीसी के निर्देशक मंडल के ग्यारह सदस्यों में से एक हैं.


मैं सोलंकी जी से नंबर लेकर हरीश गेना जी, चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर से बात करता हूं और वही प्रश्न दोहराता हूं. वो बोलते हैं हमने 1993 के बाद समितियों को जब चुनाव किया  तो कम्युनिटी मैनेजमेंट, अध्यक्ष की रूचि और सेल्फलेसनेस को ध्यान में रखा.


फिर मैं उन पर नया सवाल दाग देता हूं कि "आपने जो जमीन और सोसाइटी के लिए लोगों को चयन किया, क्षेत्र का चयन किया तो क्या-क्या मापदंड रखे थे?"


वह कहते हैं "हमारा पहला उद्देश्य था कि जिस हम जमीन का सिलेक्शन करें वह जमीन डेढ़ सौ हेक्टेयर के करीब वेस्टलैंड (अनुपयोगी या बंजर ज़मीन) होना चाहिए .साथ में जो लोग जुड़े हैं उनकी प्रोफाइल लो (आर्थिक रूप से पिछड़ा तबका)  होना चाहिए. अधिकतर लोग मार्जिनल सेक्शन से, खेतिहर मजदूर या भूमिहीन किसान होने चाहिए. हमने ग्राम पंचायत से मीटिंग की पीआरए (Participatory rural appraisal)* एक्सरसाइज की और फिर कम्युनिटी के साथ मिलकर के सब कुछ प्लान किया. हमने वीमेन पार्टिसिपेशन (महिलाओं की सहभागिता) का विशेष ध्यान रखा. इसीलिए जब फारेस्ट प्रोटेक्शन ग्रुप (वन संरक्षण समूह) बनाये तो उसमें से 50-60% तक महिलाएं थीं.  


मैं डिप्टी प्रोजेक्ट मैनेजर आरके द्विवेदीजी से भी बात करता हूं. उनसे मेरा सबसे पहला प्रश्न यह होता है कि 'यह पहले से ही दिमाग में था कि हमें ग्रासरूट लेवल पर लीडरशिप डेवलपमेंट करनी है और सोलंकीजी जैसे ग्रासरूट लेवल से उठकर आये लीडर्स को नेशनल लेवल पर लाकर के डायरेक्टर बनाना है?'


 वह कहते हैं 'हां, हमारा शुरुआत से ही उद्देश्य था. लोगों में सेंस ऑफ ओनरशिप (स्वामित्व की भावना) विकसित करना, माइक्रोमैनेजमेंट, माइक्रोफाइनेंस गांव-गांव में सिखाना और वीमेन पार्टीशन बढ़ाना और जो लीडरशिप डेवलप हो उसको एक बड़ा प्लेटफार्म देना.'


 पंचायत अधिनियम के उद्देश्य मेरे सामने घूमने लगते हैं. उनके भी कुछ कुछ ऐसे उद्देश्य थे. वे कितने सफल हुए हैं?


आईएफएफडीसी शब्द हम बार बार प्रयोग कर रहे हैं तो अब हम इसे भी जान लेते हैं. इफको (IFFCO: Indian Farmers Fertiliser Cooperative ) ने 1993 में 'इंडियन फार्म फॉरेस्ट्री डेवलपमेंट कोऑपरेटिव लिमिटेड' (आईएफएफडीसी) नामक एक अलग बहु-राज्य सहकारी समिति को बढ़ावा दिया, जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीबों, आदिवासी समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बढ़ाने के लिए स्थायी प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के माध्यम से पर्यावरण के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को कम करना था और विशेष रूप से महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना था.


 उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड में अब तक 29,421 हेक्टेयर बंजर भूमि को बहुउद्देशीय जैव विविधता वन के रूप में विकसित किया गया है. ये वन समुदाय की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं और सालाना लगभग 1.41 लाख टन वायुमंडलीय कार्बन का संग्रह कर रहे हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन को कम करने में मदद मिल रही है.  इन वनों का प्रबंधन 152 ग्राम स्तरीय प्राथमिक कृषि वानिकी सहकारी समितियों (पीएफएफसीएस) द्वारा किया जाता है, जिसमें 19,331 सदस्य हैं, जिनमें से लगभग 38 प्रतिशत भूमिहीन हैं, 51 प्रतिशत छोटे/सीमांत किसान हैं. महिलाओं की कुल सदस्यता का 32 प्रतिशत हिस्सा है.

 वर्तमान में, आईएफएफडीसी कृषि वानिकी, एकीकृत वाटरशेड विकास, जलवायु प्रूफिंग, ग्रामीण आजीविका विकास, महिला सशक्तिकरण, सीएसआर (Corporate Social Responsibility) आदि पर 22 परियोजनाओं को लागू कर रहा है. इससे 8 राज्यों के लगभग 9,554 गांवों में किसानों और ग्रामीण गरीबों की आय बढ़ाने में मदद मिली है. नाबार्ड और राज्य सरकारों की साझेदारी में विभिन्न राज्यों में वाटरशेड के तहत 17,330 हेक्टेयर विकसित करके लगभग 15,171 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को सिंचाई के तहत लाया गया.  महिला सशक्तिकरण के लिए, IFFDC कौशल और सूक्ष्म उद्यम विकास आदि के माध्यम से 18,465 सदस्यों (95 प्रतिशत महिला सदस्यों) वाले 1,825 स्वयं सहायता समूहों (SHG) का पोषण कर रहा है.


 इफको ने बीज उत्पादन कार्यक्रम (एसपीपी) आईएफएफडीसी को सौंपा है.  तदनुसार, आईएफएफडीसी ने हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान राज्यों में स्थित अपनी 5 अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी बीज प्रसंस्करण इकाइयों (एसपीयू) के साथ किसानों के खेतों पर विभिन्न फसलों की उच्च उपज और आशाजनक किस्मों का एसपीपी शुरू किया है. वर्ष 2019-20 के दौरान कुल 3.73 लाख क्विंटल प्रमाणित धान, हाइब्रिड धान, मूंग, सोयाबीन, उड़द, तिल, हाइब्रिड बाजरा, हाइब्रिड मक्का, सूडान ज्वार घास खरीफ और गेहूं, जौ, चना, सरसों, जीरा, बरसीम के दौरान प्रमाणित  इफको किसान सेवा केंद्र (एफएससी), इफको-ई बाजार, आईएफएफडीसी किसान सेवा केंद्र (केएसके), आईएफएफडीसी कृषि वानिकी सेवा केंद्र (एएफएससी) और प्राथमिक कृषि वानिकी सहकारी समितियों (पीएफएफसीएस) के माध्यम से किसानों को उपलब्ध कराई गई.


आईएफएफडीसी राष्ट्रीय तिलहन और पाम आयल मिशन (एनएमओओपी) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम), भारत सरकार की मिनीकिट योजना के तहत कृषि विभाग को बीज की आपूर्ति करता है.  वर्ष 2019-20 के दौरान 16 विभिन्न फसलों के कुल 385 किलोग्राम सब्जी बीज भी किसानों को उपलब्ध कराए गए हैं.


साथ ही अभी यह संस्था ToF (Trees Outside Forest ) प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है. एग्रोफोरेस्ट्री विकास में जोर शोर से काम कर रही है.


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नवंबर की सर्द रात है. रात (या सुबह) के 3 बजने को हैं. मैं रात्रि गश्ती पर हूँ. एक टीम दूसरी तरफ गश्तिरत है. मेरा फ़ोन बजता है. 'सर, एक अपराधी पकड़ा है. पेड़ काट रहा था.' 


'कहाँ पर?' मैं पूछता हूँ. 

'सर, कछया के पास से.'

'उफ्फ्फ्फ़....'


यह देश की एक दूसरी तस्वीर है. जहँ पर आईएफएफडीसी और सोलंकीजी जैसे लोग जंगल ऊगा रहे हैं वहीँ कुछ असामाजिक तत्व जंगल को काटने पर तुले हुए हैं. 


वन विकास और वन सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है. जैव विविधता बनाये रखने, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में आईएफएफडीसी की समितियों के मात्र 19331 सदस्य नहीं बल्कि हम सबके सामूहिक सहयोग की आवश्यकता होगी.


[ *Participatory rural appraisal (PRA) is an approach used by non-governmental organizations (NGOs) and other agencies involved in international development. The approach aims to incorporate the knowledge and opinions of rural people in the planning and management of development projects and programmes.


आईएफएफडीसी के बारे में जानकारी साभार इफको कि वेबसाइट से.]