Thursday, February 15, 2018

[The Blue Canvas] २

एक बड़े दौर से गुजरते हम अपने को खोते से जा रहे हैं. जैसे माँ-बाप के पास एक बड़ी समस्या है... वो चाहते तो हैं कि उनकी संतान उनसे बेहतर करे- बेहतर इंसान हो, बेहतर रोज़गार हो, बेहतर ज़िन्दगी हो. लेकिन वो चलाना उन्हें अपनी सोच से चाहते हैं. अपने अनुभवों को उनपे थोपने में कोई कसर नहीं छोड़ते, अपने विचार थोपना अधिकार समझते हैं और उन्हें लगता है कि उम्र में बड़ा होना और बाप होना उन्हें तमाम अधिकार दे देता है.
वो इस बात से शायद कभी बाहर ही नहीं आना चाहते कि जो परम्पराएं उनने निभाई है जरूरी नहीं है वो सही हों और जिस सामाजिक माहौल में वो रहे हैं उसे बदलने का वक़्त आ गया है. समझो, उन्नीसवीं सदी में जैसा था- सती, बाल विवाह, स्त्री अशिक्षा, अब वैसा नहीं है. आज जैसा है कल वैसा नहीं रहने वाला. लेकिन इस बदलाव के लिए शायद वो अपने आप को तैयार नहीं करना चाहते या शायद तैयार नहीं है.
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गौरव सौलंकी जब कहता है कि इश्क़, मोहब्बत, उदासी, सामाजिक समस्याएं के साथ सेक्सुअलिटी भी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा है उनके बारे में बात होनी चाहिए. मैं सोचता हूँ कि क्या उसने कभी बातें अपने माँ बाप से कर पाई होंगी. यादों में खगांलता हूँ तो शायद ही मेरे माँ-बाप ने इनपे मेरे से बातें की हैं. जैसे मोहब्बत कोई सजा हो यहां और उदास होना जैसे किसी के हिस्से में न आया हो. सेक्स और सेक्सुअलिटी... छोड़ ही दो वो... हम कृष्णा-राधा को पूजने वाले लोग हैं जनाब जो आशिक़ों कि हत्याएं करते हैं और फिर सेक्स का तो 'स' भी हमारे मुंह से निकलना गुनाह है.
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मैं सोचता हूँ कि मेरी टीन ऐज में प्रवेश कर रही अपनी बहन से बात करूँ.. उसे 'गुड टच, बेड टच' के बारे में बताऊँ, दुनिया के मजहबी भेंगेपन के बारे में बताऊँ, मैरिटल रेप, घरेलु हिंसा और हरासमेंट के बारे में वो जाने... लेकिन चुप हो जाता हूँ कि उसके पिता को ये सब अच्छा नहीं लगेगा. शायद हम समाज के रूप में सच अपने बच्चों तक पहुँचाने लायक अभी तक विकसित नहीं हुए हैं.
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पार्लियामेंट में बहसें होती हैं कि आज़ादी नेहरू ने दिलाई या पटेल ने. मैं सोचता हूँ कि क्या हम आज़ाद हैं? माँ बाप बच्चों को अपनी जागीर समझ रखते हैं. समाज उन्माद में हत्याएं कर रहा है. कल ही दिलीप सरोज को सड़क पर पीट पीट कर मार डाला गया... और एक उम्मीद भी है जो माँ बाप बच्चों से पाल के रखे हुए हैं कि वो इस तरह जियें, ऐसे न जियें... और उनकी सेक्सुअलिटी... खैर इसके बारे में तो बात ही न कि जाये. ये उम्मीदें किस तरह से अंदर से लोगों को खा रही हैं इसका भान किसी को भी नहीं है.
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बचपन में डायनामिक बच्चे क्यों अक्सर बड़े होते होते थकने लगते हैं. हमने बड़ों कि ऐसी कैसी दुनिया बानी हुई है कि जहां उनके लिए जगहें बहुत कम हैं. क्यों ऐसा होता है कि बड़े होकर लोग गुमनामी के अँधेरे में चले जाते हैं. हमें सोचना होगा कि हमने अपनी दुनिया में कहानी गलतियां की हैं. ... और क्यों हमने घोड़ों, मछलियों, कबूतरों और हाथियों को एक ही रेस में दौड़ाया है.
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हम आज भी उस दौर में रह रहे हैं जहाँ लड़की से नहीं पूछा जाता कि उसे किससे शादी करनी है, कैसे लड़के से करनी है और चुपचाप लड़के ढूंढ लिए जाते हैं. पढ़ी लिखी लड़की से भी नहीं. जैसे लड़कियां गायें हों जो घर के खूंटे से बंधी है और उन्हें दूसरे खूंटे से बांध दिया जाना है... और हाँ माँ-बाप एज़ यूजुअल उनके मालिक हैं, जागीरदार हैं.
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माँ-बाप बच्चों के जागीरदार नहीं हैं... और न ही प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं के. समय यह समझने का है. किसी को समझ आ रहा है?? सुनाई दे रहा है???

Tuesday, February 13, 2018

[The Blue Canvas] १

मोहब्बतें कुछ ऐसी कश्तियाँ हैं जो कागज़ की बनी हैं. डूबना तय है. अब ये तुम पर है कि उन्हें कितनी देर सम्हाल सकते हो. कार्डबोर्ड आता महंगा जरूर है और कश्तियाँ बनाना आसान भी नहीं उससे. लेकिन एक बार बन जाये तो चलती बहुत है.
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उसके अपने दुःख हैं, उसकी अपनी मजबूरियां हैं. वो कहती है मैं बस शरीर हो गई हूँ. जैसे हलक से निकल रूह कहीं गुम हो.
मैंने टटोला. रुह अब भी थी उसमें. हाँ, मेरा नाम लिखा था उसपे, शायद इसलिए वो उसे पढ़ना नहीं चाहती थी.
सबकी अपनी अपनी मजबूरियां होती हैं.
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'आदतें सरकारी होती जाती हैं वक़्त के साथ. जैसे पहली गर्लफ्रेंड के दिए गुलाब अब भी कहीं सीने में ज़िंदा लगते हैं, लेकिन काँटों की चुभन धीमे-धीमे कम होती जाती है. इसलिए शायद हर बार अपने लिए नए ग़म खोज लेता हूँ.'
वो हँसते-हँसते बोल देता है. उसकी कोरों में मोती से आंसू हैं.
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'ये 'वाई' है, मेरा बॉयफ्रेंड' वो मिलवाती है. बताओ कैसा है, वो फिर धीरे से लड़के के कान में कहती है.
वो लड़का कुल एक घंटे की मुलाकात में लड़की के बॉयफ्रेंड को ओके कर देता है. 'शायद मेरे से बेहतर है.' वो लड़की से जाते जाते बोलता है.
लड़का लड़की का एक्स था. लड़की जाते जाते लड़के की आवाज की कम्पन में अपने लिए इश्क़ के कतरे ढूंढ लेती है.
अब लड़की 'वाई' के साथ नहीं लड़के के साथ है, दोनों साथ बूढ़े हो रहे हैं.
कुछ प्रेम कहानियां 'द एन्ड' के बाद भी चलती रहती हैं.
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लड़का लेखक है. लड़की भी लिखती है.
दोनों मिलते हैं. एक दूसरे के लिए ढेर सारा लिखते हैं. अपनी ही कहानी साथ नहीं लिख पाते.
वर्षों बाद लड़की अब भी लिखती है. अधिकतर उसी लड़के के बारे में जिससे वो वर्षों से नहीं मिली है.
वर्षों बाद लड़के ने लिखना छोड़ दिया है. शायद इश्क़ में जागी रातें पूरी कर रहा है.
वर्षों बाद दोनों मिलते हैं. लड़की उसे अपनी नई किताब देती है. लड़के को जैसे हर शब्द खुद का लिखा लगता है. उसे लगता है जैसे वर्षों बाद लड़की मुझपे लिखते लिखते 'मैं' हो गई है.
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वो लड़के से बोलती है 'देखो, इस रास्ते को छोड़ दो. यहां कुछ नहीं रखा है. अंत में रोओगे. मुझे वैसे भी अपने आसपास रोने वाले लोग अच्छे नहीं लगते.' वो उस लड़की की रूममेट है जिससे लड़का प्यार करता है. शायद वो लड़की और सिचुएशन दोनों को अच्छे से जानती है.
लड़का लाख कोशिशें कर भी राह नहीं बदल पाता... और हश्र वही होता है जिसका डर था.
'देखो भाई, मैंने कहा था.' वो बोलती है.
'मुझे पता था लेकिन शायद मुझे दर्द की आदत हो गई है.' लड़का जवाब देता है. वो उसे पागल कहती है. इस बार पतझड़ में पत्ते कुछ ज्यादा गिरे हैं.
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'तुम्हारी आखिरी ख्वाहिश क्या होगी.' वो लड़के से कॉलेज के आखिरी दिन पूछती है. दोनों ने कभी ज्यादा बात नहीं की. क़स्बे के कॉलेज का माहौल थोड़ा ऐसा ही था.
'ज़िन्दगी की आखिरी रात तुम्हारे साथ बिताना.' वो आँखों में आँखें डाल कहता है.
वर्षों से दोनों एक साथ जी रहे हैं. आखिरी रात को मुकाम तक पहुँचने में काफी वक़्त है.
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'तुम्हें पता है, जिन कहानियों में प्रेम अंत में जीत जाता है वो कहानियां फेमस नहीं होती.' लड़की कहती है. लड़के को निदा फ़ाज़ली का 'दुनिया जिसे कहते है जादू का खिलौना है, मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है' याद आता है.
'मैं हमारी कहानी फेमस नहीं होने देना चाहता.' वो उत्तर देता है.
वर्षों बाद लड़के की लिखी किताब बहुत फेमस हुई है.
'शायद इस बार थ्योरी गलत हो गई. प्रेम और कहानी दोनों मुकम्मल निकले, फेमस भी हुए.' लड़का लड़की से जो उसकी बीवी और को-ऑथर है धीरे से मुस्कुराते हुए कहता है.
लड़की इस नज़र से देखती है जैसे हमेशा से यही चाहती हो.
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'तुम दसवें माले पे भी इतने खुश कैसे रह लेते हो? अजनबीपन का एहसास नहीं होता?'
'शायद तुम्हारे जैसे लोगों की वजह से.' लड़की जवाब देती है.
लड़की ने 2002 दंगे अपनी नंगी आँखों से देखे हैं. लड़के ने भी दस वर्ष की उम्र में अपना घर छोड़ा है. अपने आसपास की दुनिया बदलते नंगी आँखों से देखी है.
'मेरे कैनवास के रंगों में अक्सर तुम दिखते हो.' लड़की बोलती है.
'और मेरे लफ़्ज़ों में मुझे अक्सर तुम.'
राइटर लड़का अपना चश्मा ठीक करता है और चश्मे वाली पेंटर लड़की को हमेशा के लिए छोड़ जाने कहीं के लिए चला जाता है. लड़की जाने क्या सोचती पीछे खड़ी रह जाती है.
पिछले ज़ख्म शायद इतने हरे थे कि आगे के रास्ते दिखे ही नहीं. लड़की ब्लू कैनवास पे चंद लफ्ज़ लिखती है... लड़के का नाम.



Sunday, February 11, 2018

सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि

आईआईटी के दो गणितज्ञों ने यह पाया है, काफ़ी परिष्कृत विधि और यन्त्र-विद्या का उपयोग कर, कि सिन्धु घाटी सभ्यता की जो लिपि अब तक अबूझ बनी हुई है वह दायें से बायें की ओर लिखी जाती थी. इसका आशय यह हुआ कि वह लिपि अरबी जैसी लिपि की तरह थी. हमारी सभी भारतीय भाषाएं, उर्दू को छोड़कर, बायीं से दायीं ओर लिखी जानेवाली लिपि में हैं. इस तरह की खोज को कई ‘वैज्ञानिक’ कारणों से निरस्त किया जाना चाहिए.

पहला तो यह कि देववाणी संस्कृत और अन्य भाषाओं की जो लिपि-पद्धति अनादि काल से रही है उससे भी प्राचीन पद्धति को कैसे स्वीकार किया जा सकता है. दूसरा यह कि ‘अरबी’ से समानता तो देशद्रोह माना जा सकता है. वह हमारी जातीय शुद्धता पर हमला है. इन दो गणितज्ञों को अग्रिम जमानत तुरन्त ले लेना चाहिए. तीसरा यह कि ऐसी सारी वैज्ञानिक खोजें अस्वीकार्य हैं जो हमारे प्राचीन ज्ञान को किसी और आलोक में देखने की ओर प्रेरित करती हैं. चौथा यह कि यह खोज हमारे जगतगुरु होने की प्रतिज्ञा से मेल नहीं खाती. आईआईटी शुरू से ही भारत-विरोधी खोजें करते रहे हैं: इनकी अभारतीय वैज्ञानिकता पर रोक लगाना चाहिए! अगर क़ानूनन संभव न हो तो हमारे हिंसक युवा दल प्रदर्शन-प्रहार-हिंसा द्वारा उन्हें भारतीयता के रास्ते पर ला सकते हैं!!

- अशोक वाजपेई (का सत्याग्रह.कॉम में लिखा व्यंग्य)

Tuesday, February 6, 2018

मुकम्मल कविता

तुम इक मुकम्मल कविता की तलाश में
सबेरे-सबेरे निकाल पड़ते हो
एहसासों की यात्रा में
लेकिन रास्ते में तुम्हें वह दारुण बच्चा मिलता है
जिसके पिता ने आर्मी में दी है जान
लेकिन उसे एक अच्छे स्कूल में नहीं मिला एडमिशन.
तुम उसकी विधवा मां की करुण आंखों में
कविता कहने का सपना छोड़ देते हो.
सबेरे-सबेरे मुकम्मल कविता की तलाश में निकलते
तुम्हें एक मजदूर मिलता है
जिसका आधार कार्ड तो है
लेकिन उंगलियां मजदूरी करते घिस गईं हैं
सरकारी लाभ से वंचित इस 'सेकेंड सिटिज़न'
की पोरों में छोड़ आते हो एक अलिखित कविता.
एक लड़की
जिसने नंगी आंखों से दंगों के
मरते देखा होता है अपना परिवार
और देखा होता है होता खुद का बलात्कार.
उस लड़की के विक्षिप्त मन में उतरते
कविता का 'क' भी नहीं कह पाते हो.
एक स्कूल बस मिलती है
जिसे ऐसे जाहिलों ने जलाया होता है
जो कभी स्कूल नहीं गए
लेकिन अपने निम्न इतिहास बोध के कारण
दंगे-फसाद-भय-जुर्म से राजनीति सेंकना चाहते हैं
तुम सिर फूटे चार साल के स्कूली बच्चे के
रिसते घाव में कविता का भाव छोड़ आते हैं.
थक हार जब मिलती नहीं कोई मुकम्मल कविता
तब नेरुदा उठा पढ़ना शुरू करते हैं
लेकिन वहां भी श्रीलंकन-तमिल औरत
निर्वस्त्र खड़ी दिखती है
जिसका नेरुदा ने कभी बलात्कार किया था.
... और तुम कविता लिखने का ख्याल
अख़बार के पन्नों, नेरुदा की किताब
और अपने आदमी होने के एहसास के साथ जला देते हो.

Monday, February 5, 2018

मैं लालायित तुम्हारे मुख, तुम्हारी आवाज, तुम्हारे बालों का / पाब्लो नेरूदा


मत जाओ बहुत दूर
नहीं एक दिन के लिये भी नहीं
मत जाओ बहुत दूर एक दिन के लिये भी नहीं क्योंकि--
क्योंकि-- नहीं जानता कैसे कहूँ : एक दिन बहुत लंबा वक़्त होता है
और मैं तुम्हारा इंतज़ार करता रहूँगा जैसे खड़ा किसी खाली स्टेशन पर
जब कि ट्रेनें खड़ी हों कहीं और, नींद में......

घंटे भर को भी मुझे मत छोड़ना क्योंकि
तब पीड़ा की सारी छोटी-छोटी बूँदें बहने लगेंगी एक साथ
एक घर की खोज में भटकता है जो धुआँ वो
बह आयेगा मेरे भीतर, मेरे खोए हृदय का दम घोंटता.

ओह! सागरतट पर तुम्हारी प्रतिच्छाया विलीन न हो कभी
न कभी फड़फड़ाएँ तुम्हारी पलकें किन्हीं निर्जन फासलों पे
मुझे एक क्षण को भी मत छोड़ना मेरी प्रियतम!!

क्योंकि उस एक क्षण में तुम इतनी दूर जा चुकी होगी
कि मै पूरी पृथ्वी पर भटकूँगा भूला हुआ-सा
पूछ्ता
क्या तुम वापस आओगी?
क्या तुम छोड़ दोगी मुझे यहाँ
मरता?

--पाब्लो नेरूदा

Wednesday, January 31, 2018

बुद्ध होना


बुद्ध होना चाहता हूं, किन्तु तुम्हारे साथ.
तुम यशोधरा नहीं
न मैं सिद्धार्थ,
कि छोड़ तुम्हें उम्र भर करूंगा साधना.
तुम्हारे पोपले गाल,
झुर्रियों वाला चेहरा
और वही प्रकाशित दिल
मेरी साधना - तुम्हें इस उम्र तक प्यार करना है.
तुम्हें छूना योग है,
तुम्हें चूमना भक्ति है,
तुमसे लिपटना बोधिसत्व होना है.
मेरे बोधिवृक्ष!
तुम्हारी बाहें वे टहनियां हैं
जिनकी छांव में
मैं बोधिसत्व पाऊंगा.
तुम्हारी ऊष्मा
वह स्वर्गीय प्रकाश उपजाती है
जिसमें मुझे केवल्य मिलेगा.
अगर तुम्हारे बिना
मेरा बुद्ध होना नियति है
तो मैं इसका त्याग करता हूं.
क्योंकि तुम्हारे साथ होना ही
मेरा बुद्ध होना है.

Sunday, January 28, 2018

Kunwar Narayan

कल फिर एक हत्या हुई
अजीब परिस्थितियों में
मैं अस्पताल गया
लेकिन वह जगह अस्पताल नहीं थी
वहां मैं डाॅक्टर से मिला
लेकिन वह आदमी डाॅक्टर नहीं था
उसने नर्स से कुछ कहा
लेकिन वह स्त्री नर्स नहीं थी
फिर वे मुझे आॅपरेशन रूम में ले गये
लेकिन वह जगह आॅपरेशन रूम नहीं थी
वहां बेहोश करने वाला डाॅक्टर पहले से मौजूद था
लेकिन वह भी दरअसल कोई और था
फिर वहां एक अधमरा बच्चा लाया गया
जो बीमार नहीं भूखा था
डाॅक्टर ने मेज पर से आॅपरेशन का चाकू उठाया
मगर वह चाकू नहीं जंग लगा भयानक छुरा था
छुरे को बच्चे के पेट में भोंकते हुए
उसने कहा- अब यह बिल्कुल ठीक हो जाएगा!

Friday, January 26, 2018

मां से दूर रहने के बाद


मां से दूर रहने के बाद भी
आप खाना बनानेवाली से
कहते हैं मां के जैसी दाल बनाने को
और धोबी को मां की तरह ही
अच्छे कपडे धुलने को.
दोनों ही नहीं जानते मां को
और 'हां भैया' कह मुस्कुरा देते हैं.

मां से दूर रहने के बाद
आप बेइंतहां अकेलेपन-अजनबीपन में
मां की तरह ही
प्रेमिका को लगा लेते हैं जोर से गले
और बहा देते हैं कुछ आंसू
वो 'क्या हुआ?, क्या हुआ?' कहती रह जाती है.
माथे को चूमने वाला कोई नहीं होता
ना सिर पे हाथ फेरने वाला.
बस आप याद में मुस्कुरा देते हैं.
मां से दूर रहने के बाद
खुद से कहते हैं कि 'बेटा, पढ़ लो'
और खुद को ही कर देते हैं पढ़ाना शुरू.
कभी कभी प्रेमिकाएं हो जाती हैं आपकी मां
और प्रेमिका का माथा चूमते वक़्त
मां तरह ही आप
मन ही मन देने लगते हैं ढेरों आशीष.
मां से दूर रहने के बाद
दाल बनाते वक़्त,
जीन्स धोते वक़्त,
प्रेमिका का माथा चूमते वक़्त,
और खुद की उंगली खुद थाम
सड़क पार करते वक़्त,
आप खुद ही हो जाते हैं थोड़े थोड़े मां.
और समझौतों के साथ खुद ही
रखना शुरू कर देते हैं खुद का ख्याल.
मां से दूर रहने के बाद
आप उसकी बीमारी में
खुद को थोड़ा थोड़ा बीमार पाते हैं,
और प्रेमिका की मां का भी
अपनी मां सा ख्याल रखने लगते हैं.

Tuesday, January 23, 2018

बाहर रहने के अठारह साल बाद


बाहर रहने के अठारह साल बाद
आप महसूस करते हैं
कि घर की दीवारों ने पहचानने से कर दिया है इंकार.
बाहर रहने के अठारह साल बाद
आप महसूस करते हैं
कि हर शहर में आपने बनाने की कोशिश की है
एक नया घर,
कुछ नए रिश्ते,
और फिर सारा समेट यादों में
आप पलायन कर गए वही दुहराने.
बाहर रहने के अठारह साल बाद
आप महसूस करते हैं
कि कई अलग अलग लड़कियों में
आपने देखी है अपनी मां
और कई अलग अलग कमरों में
बनाने की कोशिश की है अपना घर.
बाहर रहने के अठारह साल बाद
आप खुद से लड़ लेते हैं
और खुद को ही खुद ही नोंच लेते है
भाइयों की याद आने पर.
बाहर रहने के अठारह साल बाद
आपको पिता की डांट याद नहीं रहती
और खुद को आइने के सामने रख
डांट लेते है एक- दो दफा.
फिर प्रण लेते हैं कोई गलती न दोहराने का.
बाहर रहने के अठारह साल बाद
आप कई लड़कियों के संग
बनाने का सोचते हैं घर,
जो बिल्कुल बचपन के घर सा होता है.
लेकिन...
बाहर रहने के अठारह साल बाद,
आप प्रण लेते हैं
कि आपके बच्चे नहीं होंगे विस्थापित.
और एक गहरी सांस ले
घर की याद में
टपरे की चाय संग फूंकते हैं एक सिगरेट
कि जैसे यादें भी फुंक जाएंगी इस तरह.
इतने वर्ष बाद
आप खुद ही हो चुके होते हैं अपना घर,
मां और पिता अपने भी,
प्रेमिका के भी
और प्रेमिका भी हो चुकी होती है
थोड़ी थोड़ी मां.
लेकिन यादों में सालता रहता है घर
और वो दो जोड़ी आंखें
जो घर से जाते वक़्त रास्ता तकती रहती हैं,
पुन: लौट आने तक.

Monday, January 22, 2018

धूमिल की कवितायेँ

सार्वजनिक ज़िन्दगी

मैं होटल के तौलिया की तरह
सार्वजनिक हो गया हूँ
क्या ख़ूब, खाओ और पोंछो,
ज़रा सोचो,
यह भी क्या ज़िन्दगी है
जो हमेशा दूसरों के जूठ से गीली रहती है।
कटे हुए पंजे की तरह घूमते हैं अधनंगे बच्चे
गलियों में गोलियाँ खेलते हैं
मगर अव्वल यह कि
देश के नक़्शे की लकीरें इन पर निर्भर हैं
और दोयम यह कि
न सही मुझसे सही आदमी होने की उम्मीद
मगर आज़ादी ने मुझे यह तो सिखलाया है
कि इश्तहार कहाँ चिपकाना है
और पेशाब कहाँ करना है
और इसी तरह ख़ाली हाथ
वक़्त-बेवक़्त मतदान करते हुए
हारे हुओं को हींकते हुए
सफलों का सम्मान करते हुए
मुझे एक जनतान्त्रिक मौत मरना है।

---

कुछ सूचनाएं

सबसे अधिक हत्याएँ
समन्वयवादियों ने की।
दार्शनिकों ने
सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।
भीड़ ने कल बहुत पीटा
उस आदमी को 
जिस का मुख ईसा से मिलता था।

वह कोई और महीना था।
जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,
किंतु इस बार तो 
मौसम बिना बरसे ही चला गया
न कहीं घटा घिरी
न बूँद गिरी
फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु
कई प्रतिशत बढ़ गए

कई बौखलाए हुए मेंढक
कुएँ की काई लगी दीवाल पर
चढ़ गए,
और सूरज को धिक्कारने लगे
--व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है
सूरज कितना मजबूर है
कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।

हवा बुदबुदाती है
बात कई पर्तों से आती है—
एक बहुत बारीक पीला कीड़ा
आकाश छू रहा था,
और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर
शौचालयों के सामने 
पँक्तिबद्ध खड़े हैं।

आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं
लोग खोई हुई आवाज़ों में 
एक दूसरे की सेहत पूछते हैं
और बेहद डर गए हैं।

सब के सब 
रोशनी की आँच से
कुछ ऐसे बचते हैं
कि सूरज को पानी से 
रचते हैं।

बुद्ध की आँख से खून चू रहा था
नगर के मुख्य चौरस्ते पर
शोकप्रस्ताव पारित हुए,
हिजड़ो ने भाषण दिए
लिंग-बोध पर,
वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं
आत्म-शोध पर
प्रेम में असफल छात्राएँ
अध्यापिकाएँ बन गई हैं
और रिटायर्ड बूढ़े
सर्वोदयी-
आदमी की सबसे अच्छी नस्ल
युद्धों में नष्ट हो गई,
देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य
विद्यालयों में 
संक्रामक रोगों से ग्रस्त है

(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को
सड़को पर
किश्तियों की खोज में
भटकते हुए देखा है)

संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ
भीतर ही भीतर
एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है

पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ
प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं
सबसे अच्छे मस्तिष्क,
आरामकुर्सी पर 
चित्त पड़े हैं।

---
लोहे का स्वाद 

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह 
लोहे की आवाज़ है या 
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून 
का रंग। 

लोहे का स्वाद 
लोहार से मत पूछो 
घोड़े से पूछो 
जिसके मुंह में लगाम है।

---

किस्सा जनतंत्र

करछुल...
बटलोही से बतियाती है और चिमटा
तवे से मचलता है
चूल्हा कुछ नहीं बोलता
चुपचाप जलता है और जलता रहता है

औरत...
गवें गवें उठती है...गगरी में
हाथ डालती है
फिर एक पोटली खोलती है।
उसे कठवत में झाड़ती है
लेकिन कठवत का पेट भरता ही नहीं
पतरमुही (पैथन तक नहीं छोड़ती)
सरर फरर बोलती है और बोलती रहती है

बच्चे आँगन में...
आंगड़बांगड़ खेलते हैं
घोड़ा-हाथी खेलते हैं
चोर-साव खेलते हैं
राजा-रानी खेलते हैं और खेलते रहते हैं
चौके में खोई हुई औरत के हाथ
कुछ नहीं देखते
वे केवल रोटी बेलते हैं और बेलते रहते हैं

एक छोटा-सा जोड़-भाग
गश खाती हुई आग के साथ
चलता है और चलता रहता है
बड़कू को एक
छोटकू को आधा
परबती... बालकिशुन आधे में आधा
कुछ रोटी छै
और तभी मुँह दुब्बर
दरबे में आता है... 'खाना तैयार है?'
उसके आगे थाली आती है
कुल रोटी तीन
खाने से पहले मुँह दुब्बर
पेटभर
पानी पीता है और लजाता है
कुल रोटी तीन
पहले उसे थाली खाती है
फिर वह रोटी खाता है

और अब...
पौने दस बजे हैं...
कमरे में हर चीज़
एक रटी हुई रोज़मर्रा धुन
दुहराने लगती है
वक्त घड़ी से निकल कर
अंगुली पर आ जाता है और जूता
पैरों में, एक दंत टूटी कंघी
बालों में गाने लगती है

दो आँखें दरवाज़ा खोलती हैं
दो बच्चे टा टा कहते हैं
एक फटेहाल क्लफ कालर...
टाँगों में अकड़ भरता है
और खटर पटर एक ढड्ढा साइकिल
लगभग भागते हुए चेहरे के साथ
दफ्तर जाने लगती है
सहसा चौरस्ते पर जली लाल बत्ती जब
एक दर्द हौले से हिरदै को हूल गया
'ऐसी क्या हड़बड़ी कि जल्दी में पत्नी को चूमना...
देखो, फिर भूल गया।