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Thursday, December 22, 2016

स्त्री के सपने


मेरे साथ जो स्त्री रहती है
वो सोती है, उसके सपने जागते हैं.
वो रोती है,
उसके सपने झरते हैं.
वो सीने से लगती है,
हिदायत देती सी लगती है,
कि उसके सपने न मरोड़ूँ.

मैं आदमी हूँ,
मेरा दम्भ
उसके सपनों पे धाड़ से पड़ता है
छनाक! उसके सारे सपने टूट जाते हैं.

वो एक आस लिए
फिर रोटी संग सपने बेलती है
चूल्हे पे आंच देती है,
कि मैं कायर किसी दिन
मर्द बनूँगा
और उसके सपने नहीं तोड़ूंगा.

मैं आदमी हूँ,
सभ्यता के आदि से कायर ही हूँ!

Friday, May 20, 2016

सैनिटरी पैड और हम



माम लोगों ने अपने हिस्से की रोशनी का इंतजार किया और इंतजार के उस पार अपनी जिंदगी की लौ बुझा दी...ये जानकर कि ऐसा हमेशा नहीं होता कि सबके हिस्से में सूरज आए। लेकिन तुमने साबित किया अपना लोहा और ये भी कि तुम उनमें से नहीं थे। तुमने अपने होने की वजहों के हजारों-लाखों चिराग बनाए और दिन-रात की अथक मेहनत से नया सूरज उगाया। अब सूरज तुम्हारे इशारे पर उगता है...देखता हूं कि कैसे लोग चरागों की शक्ल में तुमसे लिपटते जाते हैं और तुम उनका स्याह लेकर रोशनी की उम्मीद बांटते हो....बिना रुके, बिना थके।


कपड़ों के कितने मतलब होते हैं...किसी के लिए साज-सिंगार तो किसी के लिए अस्मत ढंकने का जरिया...कोई दिन में चार बदले तो किसी के पास चार दिनों के लिए एक। कपड़े वो सब छुपा लेते हैं जिन्हें हम दुनिया के सामने नहीं लाना चाहते, लेकिन यही कपड़े वो सच नहीं छुपा सके जिससे रुबरू होते ही आपकी रूह कांप उठेगी। मुमकिन है थोड़ी देर को नजरें बर्फ हो जाएं, और अंदर कुछ ठहर जाए। मैं सहम गया हूं। देश की हजारों औरतों को बच्चेदानी यानी यूटेरस का कैंसर होता है, या इन्फेक्शन की वजह से इस दुनिया का सृजन करने वाला वो अंग काटकर निकाल दिया जाता है क्योंकि उन हजारों लाखों औरतों के पास मेन्सट्रुएश्नल साइकल बिताने के लिए गज भर का साफ कपड़ा नहीं होता। सैनिटरी पैड की बात कौन करे। साथ ही ये आंकड़ा भी कि वूमन एम्पावरमेंट की बहसों के लिए सरकारों ने सैकड़ों करोड़ फूंक दिए। वूमन एम्पावरमेंट? ? ?

ऐसे में हर महीने के उन तकलीफदेह दिनों को बिताने के लिए देश के मुख्तसर इलाकों में बेइंतहां गरीब तबके की औरतें किन-किन चीजों का इस्तेमाल करती हैं...जरा दिल थामकर सुनिए...पॉलीथीन, अखबार या रद्दी के कागजों की चिंदियां, जूट की बोरी के टुकड़े, नारियल का बूज, गंदे कपड़ों पर राख यानी ऐश, पहले से इस्तेमाल किए जा चुके(कूड़े के ढेर पर फेंके) सैनिटरी पैड्स, पूराने-बेकार हो चुके कपड़े या फिर कुछ नहीं। ये औरतें सेप्टिक हो चुके इस कपड़े को धूप भी नहीं दिखा पातीं, वजह शायद बतानी जरूरी नहीं। नतीजा, यूटरस में होने वाला लाइलाज इन्फेक्शन। कपड़ा, ये एक शब्द कितना बड़ा लगता है।
ऐसे में तुमने उम्मीदों का नया उफक खोला...दुनिया से कहा कि वो कपड़ा जो तुम्हारे लिए बेमतलब हो चुका है उसे दान कर दो। रिसाइक्लिंग की, रेनोवेट किया और मुफ्त की सैनिटरी पैड बनाई, उन लोगों के लिए जहां वूमनहुड एक अभिशाप से ज्यादा कुछ नहीं। धीरे-धीरे इसे एक उद्यम में बदला। सोशल आंत्रेप्रेन्योरशिप के एक उम्दा मॉडल में। गरीब को सम्मान मिला, बदलाव की किरण दिखी और दे सकने वालों को एक वजह। एक कारण। सार्थकता का बहुमूल्य भाव। संतोष।

गूंज, जो संस्था तुम चलाते हो वो आज हर साल एक हजार टन से ज्यादा पुराने कपड़ों को इकट्ठा करती है, रीसाइकल करती है और गरीब तबके की उन औरतों के लिए सैनिटरी पैड रीप्रड्यूस करती है जो उन्हें नई जिंदगी दे रहा है। हिंदुस्तान के 21 राज्यों में गूंज की गूंज सुनाई देती है...छोटे-मोटे करीब 200 गैरसरकारी संस्थाओं, इतने ही बिजनेस हाउस, 100 स्कूल और 500 से ज्यादा स्वयंसेवी क्लॉथ फॉर वर्क की इस अनूठी योजना को अमली जामा पहना रहे हैं...वो भी कुल जमा 97 पैसे प्रतिकिलोग्राम के खर्च पर।

इस शख्स का नाम अंशु गुप्ता है। अंशु की उम्र ज्यादा नहीं लेकिन हौसले आसमान छूते हैं। मैंने अंशु को कहीं बोलते सुना...पांच मिनट में जो सुना और फिर पढ़ा, ये पोस्ट उसी का सार है। पहले अंशु ने कहा कि वो सैनिटरी पैड पर काम करते हैं। पहले मैं भी अचकचाया था, आप ही की तरह। लेकिन उन पांच मिनटों में बहुत कुछ बदला। अब ये शब्द बोलने में संकोच का भाव नहीं आता। अगर आपको आता हो तो गूंज के बारे में डब्लूडब्लूडब्लू डॉट गूंज डॉट कॉम पर जाकर पढ़ें। और ये भी कैसे उनके बीस लाख से ज्यादा सैनिटरी पैड्स ने हजारों लाखों औरतों की जिंदगियां बदली हैं।

ये लिखते हुए बालकनी से सूरज को डूबते देखता हूं और अचानक फिर से सोचता हूं, जीने की वजह के बारे में। अब वो हर जगह दिखाई देती है। चमकती सी। रोशनी की गूंज सी...तुम भी आसपास ही हो कहीं और खुश भी। कितना कुछ तो है...कितना-कुछ, खत्म होने के बाद भी।

--

Wednesday, March 18, 2015

जादू से कोख भर देते हैं

ओट में छुप जाओ की चुम्बन लेना यहां वर्जित है
हाँ, हाँ पेशाब कर लो, सड़क आदमी के बाप की है
शुक्र मनाओ आप भारत में हैं.
उफ़! औरतें ये पर्दा भी नहीं करतीं
ये हैं संस्कार आज के
मादर##, बेन## पश्चिमी संस्कृति का असर है!
हटो की लुंगी पहिन लूँ अब
कच्छे में बहुत क़स्बा नाप लिया.
मेरे क़स्बे के यहां से भी
एक हाइवे निकलना चाहिए.
हमारी औरतें तो कम से कम नित्यक्रिया
आराम से कर सकें!
रहने दो, रेल निकलवा दो
पटरियां काम आएंगी.
गौ-हत्यारी है वो कौम,
ये नहीं सहेगा हिन्दू.
अबे हटा सड़क से वो गाय
मार दो-चार लट्ठ,
किसने साली को यहां छोड़ दिया?
अब क्या इतने भी बुरे दिन हैं कि
रात भर बैठ मानस पढ़ेंगे?
कैसी हिंदी लिखी तुलसी ने,
आधी बात समझ नहीं आती.
सुनो, राम मंदिर वहीं बनेगा
रामजन्म भूमि है वो,
ए. सी. में बैठ हमारे संत यही कह रहे हैं.
हमारे पीर/ संत देवता होते हैं... जादू से कोख भर देते हैं.
बलात्कारी तो एक-दो निकले बस.

Sunday, January 18, 2015

Lifting Olympus / Justice Katju

Tuesday, October 7, 2014

Street Children



मैंने सूट पहना
टाई बांधी
चमचमाते जूते पहने,
कार की चाबी उठाई
और आईने में निहारा.
न आईना मुस्कुराया न मैं.

अक्सर सिग्नल पे
हँसते बच्चे देख सोचता हूँ-
'कचरे में ख़ुशी पलती कैसे है?'

हम पा कर भी 
बहुत कुछ खो देते हैं.
न पा कर भी
वे बहुत कुछ पा लेते हैं.

Wednesday, October 1, 2014

जी पी भगत का भाव

( कभी कभी आप लिखना चाहते हो... लेकिन कुछ पढ़के लगता है... 'बस इससे अच्छा और कुछ नहीं लिखा जा सकता था.'  रवीश कुमार ऐसा ही कुछ लिख देते हैं....अक्सर ही. ...उधार लेकर उनका लिखा दूसरी बार अपने ब्लॉग पे चस्पा रहा हूँ... पढ़िये. शायद आप की ऑंखें भी गहराई में खो जायें ).

सुबह सुबह ही दफ्तर पहुंच गया। कहीं से कोई धुन सवार हो गया था कि इस स्टोरी को आज ही करनी है। दिल्ली फरीदाबाद सीमा पर मज़दूरों की विशालकाय बस्तियां बसी हैं। हम जल्दी पहुंचना चाहते थे ताकि हम उन्हें कैमरे से अचेत अवस्था में पकड़ सके। अखबारों में कोई विशेष खबरें नहीं थीं कि आज वृद्धोंं के लिए कोई दिन तय है। टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर दिखी जिसे कार में जल्दी जल्दी पढ़ने लगा। इतने प्रतिशत वृद्ध हैं। उतने प्रतिशत अकेले रहते हैं तो फलाने प्रतिशत गांव में रहते हैं तो चिलाने प्रतिशत शहर में। अपोलो अस्पताल से आगे धूल धूसरित मोहल्ले की तरफ कार मुड़ गई। वृद्ध आश्रम का बोर्ड दिखने लगा। शूटिंग ठीक से हो इसलिए पहले ही मोबाइल फोन बंद कर दिया। कभी करता नहीं पर पता नहीं आज क्यों बंद कर दिया।
सड़े गले शौचालय के पीछे का वृद्ध आश्रम। निम्नतम मध्यमवर्गीय इलाका। नियो मिडल क्लास नामकरण गरीबों के साथ धोखा है। जिसके पास किसी तरह से स्कूटर या कूलर आ जाए और उसके पास कच्चा पक्का सा मकान हो हमने उसे गरीब कहना छोड़ दिया है। नियो मिडिल क्लास हते हैं ताकि लगे कि गरीबी खत्म हो गई है। मगर इनकी गरीबी उन पैमानों से भी खूब झांकती है। खैर मैं आश्रम के  बड़े से दरवाज़े को ठेलते हुए अंदर आता हूं। जो देखा ठिठक गया। बहुत सारे वृद्ध। बेहतरीन साफ सफाई। डिमेंशिया और अलज़ाइमर के शिकार वृद्धों को नहलाया जा रहा था। फर्श की चमाचम सफाई हो चुकी थी। सबको कुर्सी पर बिठाया गया था। इज्जत और प्यार के साथ। कैमरा लगातार रिकार्ड किये जा रहा था।  है।
इस संस्था के संस्थापक जी पी भगत कुछ दिन पहले दफ्तर आए थे। कहा कि आपको सम्मानित करना चाहते हैं। मैंने यूं ही पूछ लिया कि काम क्या करते हैं। सुना तो कहा सम्मान छोड़िये। बहुत मिल चुका सम्मान, अब उस तरफ देखने का मन भी नहीं करता। आपका काम अच्छा है तो कभी आऊंगा मगर बताकर आऊंगा। मैं गया बिना बताये। शायद यही वजह है कि उस जगह की कुछ गहरी छाप पड़ गई। तिरासी के साल में जे एन यू से कंप्यूटर साइंस में एम फिल करने वाले जी पी भगत ने अपनी जिंदगी बुजुर्गों के लिए लगा दी है। वो उनका पखाना और पेशाब अपने हाथों से साफ करते हैं। उनके साथ काम करने वाले भी हाथ से साफ करते हैं। भगत ने बताया कि कई बुजुर्ग तो ऐसी अवस्था में दिल्ली की सड़कों से मिले कि उनमें कीड़े पड़े हुए थे। उन्हें उठाकर लाना, नहाना, साफकर दवायें लगाना ये सब करते करते एक बुजुर्ग के पीछे साल गुज़र जाते हैं तब वे कुछ सम्मान जनक स्थिति में पहुंच पाते हैं। फिर तो उसके बाद अनुभवों का जो पन्ना खुलते गया मैं सुन सुनकर नया होने लगा। जो कुछ भी भीतर बना था वो सब धाराशाही हो गया।
भगत बताये जा रहे थे। जितिन भुटानी का कैमरा रोल था। हमारे सहयोगी सुशील महापात्रा की आंखें भर आ रही थीं। मैं खुद हिल गया। फर्श की सफाई किसी अच्छे अस्पताल से भी बेहतर की गई थी. सबको प्यार से डायपर पहनाकर कुर्सी पर बिठा दिया गया था।  दो चार लोग दिल्ली के घरों से फेंक दिये गए, कुछ बुजुर्ग भटक कर लापता हो गए।  मैंने त्याग और करुणा का सर्वोच्च रूप देखा। भगत ने कहा कि लोगों को घिन आती है। पखाना पेशाब साफ करने में। इसलिए सड़कों पर छोड़ देते हैं। अस्पताल के बाहर छोड़ देते हैं। कई बुजुर्ग तो इस अवस्था में भी मिले कि उनके अंगूठों पर नीली स्याही के निशान ताज़े थे। ऐसा कई केस आ चुका है। संपत्ति के दस्तावेज़ पर अंगूठा लगवाकर इन बुजुर्गों को लोग फेंक देते हैं। स्याही सूखने का इंतज़ार भी नहीं किया।  कई लोग तो फोन कर छोड़ देते हैं कि दस बारह हज़ार का महीना ले लो लेकिन अपने पास रख लो। भगत ने कहा कि मैं काफी समझाता हूं कि अपने पास रखिये फिर उनके सामने कड़ी शर्तें रखता हूं कि मिलने नहीं दूंगा मगर कोई यह नहीं कहता कि दूर से भी देख लेने देना। मां बाप को छोड़ कर जाते हैं तो दोबारा नहीं आते। एक बेटी से कहा कि फिर नहीं आओगी तो उसने कहा मंज़ूर है। फिर कहा कि देखो अगर तुम्हारी मां गुज़र गईं तो अंतिम संस्कार भी नहीं करने दूंगा तो उस पर भी वो मान गई। ऐसे तमाम बेटों की कहानी है कि पता चल गया कि मां बाप यहां हैं। कोई लंदन है कोई लुधियाना तो कोई अफसर मगर कोई लेने नहीं आता।
भगत के पास समाज की जो हकीकत है वो न तो ओबामा के पास है न मोदी के पास न किसी पत्रकार के पास। उनका अनुभव बोले जा रहा था। बुजुर्ग औरतें और पुरुष भगत और उनके सहयोगियों को बहुत प्यार करते हैं। सोहन सिंह को हिन्दू महिला सोहन कहती है तो मुस्लिम हैदर। सोहन ने बताया कि जो नाम याद आता है इन्हें बुला लेती हैं। भगत ने कुर्सी पर कोने में दुबके पांडे जी से कहा कि ये सिर्फ केला खाते हैं। मैंने कहा कि ये कैसे पता चला। तो कहने लगे कि महीनों तजुर्बा करते करते समझ आ गया। जो डिमेंशिया या अलज़ाइमर  के मरीज होते हैं  उन्हें अपने बच्चों के नाम याद रह जाते हैं। पोते पोतियों के नाम याद रह जाते हैं। जाति याद नहीं रहती मगर धर्म याद रहता है और हां स्वाद याद रहता है। इसलिए बाकी लोग स्वादिष्ट दलिया और हार्लिक्स पी रहे हैं मगर पांडे जी केला खा रहे हैं। आश्रम के सेवक कुछ औरतों को खैनी खिला रहे थे। कहा कि इसकी आदत है नहीं दो तो रोने लगती हैं।
भगत ने अमीरी गरीबी का भी भेद खोल दिया। कहा कि कई अमीर हैं जो अपने मां बाप की खूब सेवा करते हैं। तब पता चलता है जब वे उनके गुजरने के बाद महंगी मशीने और डायपर लेकर आते हैं। दाने देने के लिए। मगर अमीर ही अपने मां बाप को सड़कों पर छोड़ देते हैं। हां लेकिन गरीब अपने मां बाप को नहीं फेंकता है। वो सेवा कर लेता है। कहा कि दान मांग कर और खुलकर मांग कर इनकी सेवा करता हूं। ऐसा हिसाब लगा रखा है कि पैसा बचेगा ही नहीं। बचने से समस्या पैदा होती है। मैंने खुद देखा। बेहतरीन साफ सफाई के साथ खाना बन रहा था। सबको अच्छे कपड़े दिये गए थे। हैदर ने बताया कि एक बार  घिन आ गई तो किसी बुजुर्ग के पखाने को ब्रश से साफ कर दिया। भगत जी तो भगाने लगे कि भागो यहां से। ब्रश से जख्म हो जाएगा। हाथ से साफ करो। अब सामान्य ही लगता है सबकुछ।
उस आश्रम में अनगिनत किस्से हैं। हर किस्सा आपको गिरा कर नए सिरे से खड़ा कर देता है। भगत जी ने कहा कि हम सबका धर्म के हिसाब से संस्कार करते हैं। हज़ार लोगों का अंतिम संस्कार कर चुका हूं। अब तो मेरे पास चार आदमी हैं मगर जब यह काम शुरू किया था तब अपने हाथ से उठाकर मृत शरीर को गली के बाहर तक ले जाता था। मुझे तो हिन्दू मां भी बेटा कहती है तो मैं हिन्दू हो गया, मुस्लिम मां भी बेटा कहती है तो मुसलमान हुआ जब मां मुसलमान है तो बेटा भी मुसलमान हुआ, ईसाई मां ने बेटा कहा तो ईसाई हो गया। उनकी इस बात ने छलका दिया मुझे। हम किन वहशी लोगों के गिरफ्त में आ जाते हैं। धर्म पहचान कर अलग कर देते हैं। आश्रम की तख्ती पर कुरान की आयतें, गुरु नानक देवजी, ईसा मसीह के बगल में दुर्गी जी, कबीर,रविदास जी।  सब एक साथ। ये होती है इंसानियत की इबादत। इंसानों को भगवान मानकर सेवा की तब भगवान एक से लगने लगे।
जो देखा खुद को काफी भरोसा देने वाला था। भगत ने कर के दिखाया है। उनके नब्बे साल के पिता ने कहा कि मैं नहीं भी रहा तो भगत के मां बाप हमेशा दुनिया में रहेंगे। इतने लोग  इसे बेटा बेटा कहते हैं तो कभी होगा ही नहीं कि इसकी कोई मां नहीं होगी, इसका कोई पिता नहीं होगा। मैं नहीं रहूंगा तो क्या हुआ। इस कहानी ने भीतर तक तर कर दिया। सहयोगी सुशील बहुगुणा ने कहा कि फुटेज देखकर रोना आ गया। मैं यही सोचता हुआ दफ्तर से निकला कि इसे कहते हैं आदमी होने की सर्वोच्च अवस्था जब आप पखाने में उतरकर उसकी सेवा कर दें। कार में बैठा ही था कि कई मिस्ड काल नज़र आने लगे तो सुबह आए होंगे। सूचना मिली कि मेरी अपनी बड़की माई गुज़र गईं हैं। दो बुजुर्गों की दुनिया में बंट गया। हमारे बाबूजी को बहुत प्यार करती थी, कहती थीं मेरा देवर होता तो ये कर देता वो कर देता। छठ के समय बड़किया का बनाया रसियाव आज तक याद है। बचपन की स्मृतियों का आधार है। कसार अब नहीं खा सकेंगे। वो चली गई। इस वक्त जब मैं यह लिख रहा हूं मेरे बड़े भैया उन्हें अग्नि दे चुके हैं। बता रहे थे कि हम सब घाट पर हैं। अगर भगत से नहीं मिला होता तो इस खबर से मैं टूट जाता । मगर भगत के माता-पिता की कहानी सुनकर लगता है कि मेरी बड़किया किस्मत वाली है। उसकी बहू ने खूब सेवा की, बेटे ने भी की।  संपन्न बेटी- दामादों ने की या नहीं मालूम नहीं। किया ही होगा। बिना जाने कुछ नहीं कहना चाहिए मगर भगत की बातें सुनकर बिना जाने यकीन भी नहीं होता। अपने रिश्तेदारों से न के बराबर संपर्क रखता हू। भगत का स्केल देखकर ऐसा लग रहा था कि हमने भी अपने बाबूजी की कम सेवा की। मां की कम सेवा करता हूं। मुझे लगता है कि बहुत ख्याल रखता हूं मगर कोई भगत के भाव की बराबरी नहीं कर सकता है।
--रवीश कुमार, क़स्बा ब्लॉग पे ( 'चल गईलू नू बड़की माई' शीर्षक से )


Saturday, September 13, 2014

हक़



मैं तुम्हारे ज़िस्म में
अनाज उगा दूंगा,
धान बो दूंगा
फिर कहूँगा-
तुम ज़मीन हो
और इसपर मेरा हक़ है.

हक़ हमेशा का सबल का होता है
देखो धर्म में भी यही लिखा है.
सात अक्षौहिणी सेनाएं
जिनके तमाम सैनिक मारे गए,
तमाम विधवाएं बिलखती रहीं.
उनके बच्चे आज भी सड़क पर
भीख मांगते हैं,
कचरा बीनते हैं.
लेकिन हक़ पांडवों के हाथ आया.
यश, साम्राज्य, जीत, सबकुछ.
और देखो उनके साथ ईश्वर था,
कृष्ण चक्र और बांसुरी लिए साथ खड़े थे.
बांसुरी से विधवाएं बहला रहे थे
चक्र से आंदोलन-कारियों को डरा रहे थे.
देखो, मैंने कहा था न,
भगवान सबल के साथ होता है.

हाँ, तो तुम जब
मेरे हक़ में आ जाओगे
तो मैं तुम्हारे चारों तरफ
नालियां खोद दूंगा,
जिनमें तुम्हारा खून बहेगा, पानी नहीं.
जो तुम्हें ज्यादा उर्वरक बनाएगा
और मुझे ज्यादा फायदा पहुँचायेगा.

क्यूंकि मुझे बस फायदे से मतलब है
चाहे तुम मरो,
देश बिके
या खण्ड खण्ड हो.
तेलंगाना, झारखण्ड हो,
उन्तीस खण्ड या हज़ार खण्ड हो.
क्यूंकि मैं
सरकार हूँ, निकम्मा हूँ.
मेरे पांव के नीचे
भुखमरी से लाशें बिछ जाती हैं
और मैं दूरबीन ले
अन्न बांटने गरीब तलाशता रहता हूँ,
फायदा इसी दूरदर्शिता से आता है,
सरकारें ऐसे ही बनती हैं,
नेता महान ऐसे ही होते हैं,
और इतिहास के पन्नों में जगह पाते हैं.

हज़ार साल से
कवि चिल्ला रहा है.
पहले चंदबरदाई चिल्लाया,
राजा नहीं बदले
औरतें पाने बलि चढ़ गए,
पृथ्वीराज मारा गया.
फिर कबीर चिल्लाया
न हिन्दू बदले, न मुस्लमान,
तब भी कट रहे थे,
आज भी कट रहे हैं.
बाद मैं रैदास चिल्लाया-
'सब जन इक समाना'
लेकिन अछूत आज भी अछूत ही हैं!

चिल्लाते-चिल्लाते ये कवि भी मर जाएगा,
वो धान बो देंगे,
तुम्हें ज़मीन बना देंगे
तुम न बने तो
धर्म से बहका देंगे,
खरीद लेंगे.
क्यूंकि उनके पास बल है
और हक़ और ईश्वर सबल का है!

Friday, September 12, 2014

ग़दर



ये सरकारें
जिन्हे कहने-सुनने की
ज्यादा आदत नहीं है,
जिन्हें बस तोपों की भाषा आती है.
जिनके सामने
गांधी, नेल्सन और लूथर
चिल्लाते, दहाड़ते, सर पटकते रहे
और एक दिन मर गए.

इन सरकारों से
मैं कहता हूँ,
समाज जाग रहा है
सम्हल जा.
लोगों की आँखों में गुस्सा है,
हाथ में पत्थर
और दिल में मजबूत इरादे हैं.
सरकारो, तुम्हें बदलना होगा,
क्यूंकि मुल्क की गुलाम जनता
अपनी नियति अपने हाथ से
लिखने पे आमदा है,
आज मजबूत इरादा कर के आई है.

सरकार बिलबिलाती है,
थोड़ा शोर, फिर ठहर जाती है.
हा! हा! कर जोर से
अट्ठहास लगाती है
और मुझे विक्षिप्त कहती है.
मैं समझ नहीं पाता हूँ
क्यूंकि कवि सरकारें नहीं होते
सच होते हैं,
और सरकारें कवि नहीं होती
प्रपंच होती हैं.

मैं यानि कवि की कलम
किसी नाली में टूटी मिलती है
और मेरी लाश
किसी चौराहे पे लटकती.

वह समाज जो बदलने पे आमदा था,
उसका नेता फरार है,
शायद कभी लौट के न आ पाये.
समाज, जनता सब चुप हैं,
जैसे दही जमा हो होंटों पे
या सौ-सौ के कई नोटों को
मुंह में चिपका
उनकी बोलती बंद कर दी गयी हो.

हे! क्रान्तिकारियो,
ग़दर का चिराग जलाने से पहले
ज़रा बचना, सोचना
क्यूंकि ये सरकारें
तुम्हें भी खरीदना जानती हैं.

हे! युवको, युवतियों
कोई भी आंदोलन
समाज के उत्थान के लिए करना
अपने स्वार्थ के लिए नहीं,
अपने नैतिक पतन के लिए नहीं.

कवि तो जन्म से वैधव्य ओढ़ के आया है
उसके कहे का असर नहीं होता,
उसका मरना खबर नहीं होती.
पर तुम बचा लो,
अपनी नैतिकता, अपना कल,
अपनी क्रांति, अपना मुल्क.


Wednesday, September 10, 2014

छल



परेशानी ये है
कि बिम्बिसार है महत्वपूर्ण
श्रेणिक बन जैनों में, बिम्बिसार बन बौद्धों में
और ब्राह्मणों में.
परेशानी ये है
कि अजातशत्रु ने पिता बिम्बिसार का
कर वध पाया साम्राज्य,
फिर भी पायेगा मोक्ष एक दिन
हर मतानुसार.
असल परेशानी ये है
धर्म बढ़ता है राजनीति के संरक्षण में
और राजनीति को भी चाहिए
धर्म की ओट.

परेशानी ये है
कि मुझे प्रेम है 'साहिरा' से
वो मुस्लिम, मैं हिन्दू!
परेशानी ये है
सत्तापक्ष ने कहा है इसे 'लव जिहाद'.
अल्पसंख्यक समूह भी
करना चाहता है हमारा क़त्ल.
परेशानी ये है
अब हमारा प्रेम हमारे घर वालों की बस
परेशानी नहीं रहा
न रहा हम तक सीमित.
परेशानी ये है
राजनीति ने धर्म की ओट ली
धर्म ने राजनीति का संरक्षण.

उस टीले पे, जहां
चारों तरफ बिखरी पड़ी हैं लाशें,
मैं कतार में खड़ा
हमारी बारी का इंतज़ार कर रहा हूँ
मेरे पीछे खड़ी है 'साहिरा'.
मेरे कंधे की ओट से
आँखों में डर, दया और बेचारगी ले
झांक रही है.
उसे शायद अब भी यकीन होगा कि
मेरा पौरुष उसे बचा लेगा.

परेशानी ये है कि
सामने धर्मांध खड़े हैं,
सिकंदर नहीं कि
किसी हारे पुरू के पौरुष पे
अभयदान मिले.

परेशानी ये है
कि धर्म डर से चलता है
धर्मांध डरपोक होते हैं
जो अपना डर आमजन तक फैलाते हैं.

मुझे मौत से पहले
गांधी का कहा याद आता है-
'स्वतंत्रता वे डरपोक लोग छीनते हैं,
जिन्हें स्वतंत्रता छिनने का डर रहता है.'

हमारी लाशें जुलूस बन जाती हैं,
गन्दगी, जिसे समाज कहते हैं
हमारा उदाहरण ले सबको डराती है.
हमारे वालिद भी मौत पे
आंसू नहीं बहाते.
किसी भी थाने में हमारी हत्या का केस
दर्ज़ नहीं!

परेशानी ये है
जब राजनीति को धर्म की ओट
और धर्म को राजनीति का संरक्षण मिलता है
समाज छला जाता है.


Tuesday, July 8, 2014

डेमोक्रेसी




मैं कहता हूँ
डेमोक्रेसी किसी मचान पे बैठ मुर्गे खाना
फिर नशे में दो चार इंसानों के शिकार करना है.

चुपचाप से चले जाओ बारिश में
भीगकर कौन सा पिघलने वाले हो,
कौन सा पत्थरों पे चल एड़ियां घिस जाएँगी.
अस्तित्व के इशारे पे बकलोली मत करो अब,
कौन सा तुम मरे तो धरती कांपने लगेगी.

चार किताबों के पांच सिद्धांत और
नर्मदा बचाओ चिल्लाने से भी कहीं कुछ बचता है?
तुम्हारे शरीर से बस
आग जला रोटियां सेंकी जा सकती हैं.
तुम्हारी जमीन पे फैक्ट्रियां धुआं उगल सकती हैं,
उस धुएं में तुम्हारी लाशें भी न दिखेंगी किसी को.
तुम्हारी बेटियां बस मरने के लिए बनी हैं,
जिस्म लूट लेंगे, दहेज़ को जला देंगे,
बचीं तो गांव में नंगा घुमा देंगे.

पूजते रहो अनाप-शनाप 'ब्लडी गॉड्स',
इन्ही के नामों पे चढ़ तुम्हारे जिस्म नौंचे जायेंगे.
तुम नहीं समझोगे कि तुम्हारे आराध्य तुम्हें ही मारेंगे.
तुम्हारी शिक्षा को नशे में दे देंगे-
राष्ट्रहित, वक़्त और बदलाव, या थोड़ी अक्ल बची रही तो
अबकी बार, तबकी बार के चार नारे.
डेढ़-लाख करोड़ के ज़ीरो गिने हैं?
इतने में हमारे कुत्ते का पेट भी नही भरता!

'उन्हें डेमोक्रेसी किसी मचान पे बैठ मुर्गे खाना
फिर नशे में दो चार इंसानों के शिकार करना है.'
लपक के मेरे सीने से बारूद पार हो जाता है.
अगली आवाजें 'डेमोक्रेसी...', 'डेमोक्रेसी...' चिल्लाती हैं,
खद्दर को साफ़ कर वो कहते हैं...' ब्लडी फूल्स'.

Saturday, June 7, 2014

दो किलो की रद्दी के कागज़




मेरे पिता को मारा था दो किलो प्याज ने.
माँ कहती है-
गए थे बाज़ार लेने दो किलो प्याज़
और वही मर गए.
सुना है प्याज़ शरीर पे चिपकी मिली थी
तो माँ को लगता है
उन्हें मारा है दो किलो प्याज़ ने.

उनकी दाढ़ी बड़ी थी
पहली भीड़ ने त्रिशूल घोंपे.
फिर दूसरी भीड़ ने पूछा नाम,
और कर दिए गए हलाल.
अख़बार ने छापा है
दंगों में मरने वालों में मेरे बाप का नाम.

मुझे लगता है,
मेरे पिता को मारा धर्मग्रंथों ने.
क्यूंकि भड़क के भीड़ में शामिल
कभी मैं भी हो सकता हूँ,
या मेरे पिता हो सकते थे;
और मरने वाले आपके पिता.

मुझे नहीं लगता दंगों ने मारा,
मुझे बस लगता है-
मेरे पिता को मारा धर्मग्रंथों ने.
जिनमें भरी पड़ी है तमाम दकियानूसी,
कपडे-लत्तों के कायदे,
जीने-मरने के कायदे,
मरने-मारने के कायदे,
लड़ने-भिड़ने के कायदे.

कल धर्म-संसद में भी
दोहराया मैंने कि,
मेरे बाप को मारा धर्मग्रंथों ने.
कल क़त्ल किया मेरा, सारे धर्मों ने एक साथ.

मेरे पिता को मारा था दो किलो प्याज ने.
नहीं, दो किलो की रद्दी के कागज़ ने,
जो तुम्हारे लिए पवित्र हैं.


Saturday, May 17, 2014

सुगना की बेटियां





सुगना ने बेटियां की पैदा चार,
एक मरी डेंगू से हो बीमार.
लाला से उधारी थी अनेक
तो दूसरी चढ़ी लाला की भेंट.
तीसरी जन्मते ही दफना दी गई,
लड़की होने की सज़ा जन्मते पा गई.

सुखना की पांचवी संतान बेटा है
इसलिए चौथी बेटी कुपोषित है,
मावा-मच्छी बेटे को समर्पित है
इसलिए चौथी की मौत नियोजित है.

आप पूछते हैं- 'सुगना का घर कहाँ है?'
बुंदेलखंड के हर दूसरे घर में सुगना है. 



Sunday, April 14, 2013

..... बात एक सुदीप्ता की नहीं है.




             सुदीप्ता गुप्ता की हत्या मुझे एक बहुत पुराना जुमला याद दिला रही है- गाँधी के रामराज्य के सपने, गाँधी के साथ ही ख़त्म हो गये थे. ....एक लड़की जो कोलकाता की गन्दी सी गली में निचले मध्यम वर्ग में जन्मी और स्टूडेंट पॉलिटिक्स से सीड़ियाँ चढ़ती हुई प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी (ममता बनर्जी). वही लड़की (अब औरत) अब  स्टूडेंट पॉलिटिक्स से इतना डरी हुई है कि 21  साल के एक लड़के की हत्या पुलिस कस्टडी में की जाती है....जो न तो कोई क्रिमनल है और देखा जाये तो राजनीतिक बंदी भी नहीं है. उसकी हत्या पुलिस कस्टडी में!!! लीगली पुलिस हाथ भी नहीं उठा सकती थी....और पुलिस की कोई व्यक्तिगत दुश्मनी तो है नहीं ( सॉरी 'है' नहीं 'थी', अब वो मर चुका है!) कि वो उसे मौत के घाट उतारे.....अब बचता सिर्फ एक ही रीज़न है....वो क्या है आप समझ सकते हैं.
 
             शायद ममता बनर्जी ने खुद भी नहीं सोचा होगा की इतनी बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा होंगे.....शायद खुद भी नहीं सोचा होगा की एक 21  साल के लड़के की हत्या करना (हाँ, शायद जिससे वो डरती थी!) एक आन्दोलन का रूप ले लेगा.

              सच तो ये है, यहाँ बात सिर्फ सुदीप्ता की नहीं हैं, बात देश के युवाओ की है जो देश की जनसँख्या का आधे से भी बड़ा (60 %) हिस्सा हैं.

                 देश के सिर्फ 30% छात्र ही कॉलेज पहुँच पाते हैं.....जहां हर उर्जावान को गरीबी, शिक्षको और बुद्धिजीवियों की कमी, संसाधनों की कमी से लड़ते हुए सपने पूरे करने हैं....जहां हर एक के मन में हमारे देश को बदलने का जज्बा है और कई सारे सवाल भी....गरीबी, कुपोषण, समाज और राजनीति से उठते सवाल......भविष्य को ले कर उठाते सवाल और आने बाले कल की बेरोजगारी की वजहों को लेकर सवाल.

                इन सवालों के जवाब न तो पहले थे और शायद अब तो और भी नहीं होंगे, क्यूंकि डर है उठती आवाज़ इसी तरह (सुदीप्ता गुप्ता की तरह) गिरा दी जाएगी.

              देश के युवाओं की उर्जा का सही दोहन कर देश उन्नत भी हो सकता है और विकसित भी लेकिन आज के मौजूदा राजनैतिक हालात (और ये सिर्फ एक प्रदेश या एक पार्टी तक सीमित नहीं हैं.) फ्रस्टरेटेड  युवाओं की फौज कड़ी करने में लगा है जो की देश और समाज के लिए घातक है. हमारा तंत्र हमें तरक्की नहीं पतन की और ले कर जा रहा है.....और इनमे वो लोग शामिल हैं जिनके रिज्यूमे 13 -13  पन्नों के हैं, वो लोग भी शामिल हैं जो होवार्ड, कैम्ब्रिज जैसे उच्च संस्थानों से शिक्षित हैं और वो छोटी सोच के लोग भी शामिल हैं जो चाहते हैं की देश की आवादी एक रूपये गेंहू दो रूपये के चावल खा के हमें वोट देती रहे...... या की चाहती है की बस ६००० रूपये साल के गारंटी रुपयों में अपना खर्च निकले और हमें वोट दे. (शायद एसे घटिया लोग 'स्किल्ड लेबर' के फेवर में नहीं या या शायद स्किल डेवलपमेंट के पक्ष में भी नहीं!)

                 यहाँ बात एक सुदीप्ता की नहीं है, यहाँ बात हजारों सुदीप्ताओं के कल की है, यहाँ बात 60 % युवाओं की है, यहाँ बात लोगों के जज्बे को क़त्ल करने को की गयी कोशिशों की है.....और बात बुद्धिमानों के द्वारा बुद्धि के दुरूपयोग की है (या यों कहें तो बुद्धि का उपयोग जनता के खिलाफ करने की है.)

शायद आज का युवा वो भैंसे बन के रह जायेगा (या गया है) जिसे लाठी के बल पे कुछ गधे हांक रहे हैं!