Monday, January 15, 2018

गुलज़ार

गुलज़ार मुझे सर्दियों के सुबह पार्क में नंगे पैर शोव्ल ओढ़े टहलने में सबसे ज्यादा याद आते हैं. कुछ खोना और उसकी कसक किसी ठंढे पल में महसूस  करना... उन्ही की कुछ नज्में...




१.
ठीक से याद नहीं...


ठीक से याद नहीं, 
फ़्रांस में "बोर्दो" के पास कहीं 
थोड़ी-सी देर रुके थे.
छोटे से कसबे में, एक छोटा-सा लकड़ी का गिरजा,
आमने "आल्टर'' के, बेंच था...
एक ही शायद 
भेद उठाये हुए एक "ईसा" की चोबी मूरत !
लोगों की शम'ओं से /पाँव कुछ झुलसे हुए,
पिघली हुई मोम में कुछ डूबे हुए,
जिस्म पर मेखें लगी थीं
एक कंधे पे थी, जोड़ जहाँ खुलने लगा था
एक निकली हुई पहलु से, जिसे भेद की टांग में ठोंक दिया था
एक कोहनी के ज़रा नीचे जहाँ टूट गयी थी लकड़ी..
गिर के शायद... या सफाई करते.

२.
कभी आना पहाड़ों पर

कभी आना पहाड़ों पर...
धुली बर्फों में नम्दे डालकर आसन बिछाये हैं 
पहाड़ों की ढलानों पर बहुत से जंगलों के खेमे खींचे हैं 
तनाबें बाँध रखी हैं कई देवदार के मजबूत पेड़ों से
पलाश और गुलमोहर के, हाथों से काढ़े हुए तकिये लगाये हैं 
तुम्हारे रास्तो पर छाँव छिडकी है
में बादल धुनता रहता हूँ,
की गहरी वादियाँ खाली नहीं होतीं
यह चिलमन बारिशों की भी उठा दूंगा, जब आओगे.
मुझे तुमने ज़मीं दी थी 
तुम्हारे रहने के काबिल यहाँ एक घर बना दूँ मैं
कभी फुर्सत मिले जब बाकी कामों से, तो आ जाना 
किसी "वीक एंड"  पर आ जाओ 

३.
दोनों एक सड़क के आर-पार चल रहे हैं हम

दोनों एक सड़क के आर-पार चल रहे हैं हम
उस तरफ से उसने कुछ कहा जो मुझ तक आते-आते
रास्ते से शोर-ओ-गुल में खो गया..
मैंने कुछ इशारे से कहा मगर,
चलते-चलते दोनों की नज़र ना मिल सकी
उसे मुगालता है मैं उसी की जुस्तजू में हूँ 
मुझे यह शक है, वो कहीं
वो ना हो, जो मुझ से छुपता फिरता है !
सर्दी थी और कोहरा था,
सर्दी थी और कोहरा था और सुबह
की बस आधी आँख खुली थी, आधी नींद में थी !
शिमला से जब नीचे आते/एक पहाड़ी के कोने में 
बसते जितनी बस्ती थी इक /बटवे जितना मंदिर था
साथ लगी मस्जिद, वो भी लाकिट जितनी
नींद भरी दो बाहों जैसे मस्जिद के मीनार गले में मंदिर के,
दो मासूम खुदा सोये थे

source: http://bairang.blogspot.in/2010/10/blog-post.html

एनिमल फ़ार्म

जॉर्ज ऑरवेल द्वारा १९४४ में लिखा उपन्यास एनिमल फ़ार्म जब पूरा हो गया तो कोइ भी प्रकाशक इसे छापने को तैयार नहीं था.बाद में जब ये छपा तो अपने अद्भुत शिल्प के कारण इसने तहलका मचा दिया.२५ जून १९०३ को भारत में  जन्मे जार्ज ऑरवेल की शिक्षा इंग्लॅण्ड में हुई और नौकरी बर्मा पुलिस में की.वह सम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ थे,पुलिस की नौकरी छोड़ के मामूली नौकरियां करते रहे.इन्होने बी बी सी में भी नौकरी की.इनका  असली नाम "एरिक आर्थर ब्लयेर" था.
  एनिमल फ़ार्म एक फैंटेसी से बुनी गयी रोचक काल्पनिक कथा है.कहानी का शिल्प रोचक है.कहानी कहने वाला अज्ञात है.उसकी कहानी में कोई भूमिका नहीं है फिर भी हर बात सटीक करता है. ये उपन्यास १९१७ से १९४३ तक रूस में घटित घटनायों पर आधारित समझा जाता है.खेत साम्यवादी व्यवस्था का प्रतीक है.जानवरों के माध्यम से ये बताना चाहा है सत्ता और नेतृत्व पा लेने से किस प्रकार भ्रष्टाचार फैलता है.अपने ही लोगो को मारा जाता है.(जैसे स्टालिन ने अपनी तानाशाही बनाये रखने के लिए अपने ही लोगों कई लोगों की  हत्या करवा दी) बुद्धिमान जानवर झूठ और छल से सत्ता पर कब्ज़ा जमा लेते हैं.बुद्धि से कमजोर जानवरों को ठगा जाता है.धोखे से शक्ति हासिल करके हर नियम को ताक पर रखा जाता है.जानवरों पर जानवरों के राज की एक विचित्र कहानी ....

  मेजर(सफेद सूअर) सभी जानवरों की एक बैठक में बताता है कि वो जल्दी ही मरने वाला है पर मरने से पहले सबको वो ज्ञान देना चाहता है जो उसने जीवन में अर्जित किया है.वो बताता है कि इंग्लैंड में कोई भी जानवर स्वतंत्र नहीं है.वह गुलामी का जीवन जीते है.उन्हें उतना ही खाने को दिया जाता है जिससे बस साँस चलती रहे.इंसान बगैर उत्पादन किये उपभोग करता है.फिर भी जानवरों पे राज करता है.मेजर कहता है कि मानव जाती को उखाड़ फैंकने के लिए विद्रोह करना होगा.

तीन दिन बाद मेजर मर जाता है.मालिक जोन्स जब रात  नशे में सो जाता है तो स्नोबॉल, नेपोलियन विद्रोह की तैयारी करते हैं.बैठकें चलती रहीं और जानवरों की उम्मीद से कहीं जल्दी और आसानी से विद्रोह हो गया.एक दिन जब जानवरों को शाम तक खाना नहीं मिला तो उन्होंने अपने सींगों से भण्डार का दरवाजा तोड़ दिया.जिसे जो मिला खाने लगा.जोन्स के आदमी जानवरों को कोड़े मरने लगे तो भूखे जानवर उनपर टूट पड़े और उन्हें खदेड़ दिया.विद्रोह संपन्न हुआ .जोन्स को निकाल कर फ़ार्म पर जानवरों का अधिकार हो गया.रस्सियों,
चाबुक आदि चीजों को जला दिया गया.मुख्य गेट पर"मैनर फ़ार्म" की जगह "एनिमल फ़ार्म" लिख दिया गया.स्नोबॉल ने दीवार पर सात नियम लिख दिए-1. जो  दो पैरों पर चलता है वह दुश्मन है.2. जो चार पैरों पर चलता है या पंख है, दोस्त है.3. कोई जानवर कपड़े नहीं पहनेगा. 
4. कोई जानवर  बिस्तर में नहीं सोएगा.5. कोई जानवर शराब नहीं पिएगा. 
6. कोई जानवर किसी भी दूसरे जानवर को नहीं मरेगा.7. सभी जानवर बराबर  हैं.

गायों को दुहा गया और बाल्टियाँ भर कर ढूध रख कर जानवर स्नोबॉल की अगुवाई में फसल काटने चले गये.लौट कर आये तो ढूध गायब हो गया था.जानवर मेहनत कर रहे थे,पसीना बहा रहे थे पर अपनी सफलता से खुश थे.आशा से ज्यादा परिणाम मिल रहे थे.
प्रत्येक जानवर अपनी क्षमता के अनुसार काम करता था और भोजन का एक उचित हिस्सा पाता था.सूअर खुद काम  नहीं करते थे,बल्कि वह जानवरों को निर्देश देते थे और काम का निरिक्षण करते थे.नेतृत्व उनके पास आ गया था.

हर रविवार स्नोबॉल, और नेपोलियन बड़े खलिहान में सभी जानवरों की एक बैठक का नेतृत्व करते थे.अगले हफ्ते के काम की रूपरेखा तैयार की जाती थी.सूअर ही प्रस्ताव रखते थे,बाकी जानवर केवल मतदान ही करते थे.स्नोबॉल और नेपोलियन बहस में सक्रिय रहते पर दोनों में कम ही सहमति हो पाती थी.एक के प्रस्ताव का दूसरा जरूर विरोध करता.


जानवर साक्षर हो रहे थे.सूअर पढ़ने लिखने में पूरी तरह सक्षम हो गये थे.कुछ अल्पबुद्दि जानवर सात नियम सीख नहीं पाए थे,स्नोबॉल ने सात नियमों को एक सूत्र वाक्य में व्यक्त किया-"चार पैर अच्छा,दो पैर बुरा"
वक़्त बीतने के साथ सूअरों के खुद को पुरस्कार, नियंत्रण में वृद्धि और 
अपने लिए विशेषाधिकार बढ़ते ही जा रहे थे.दूध के गायब होने का रहस्य भी जल्दी ही खुल गया.ये रोज सूअरों की सानी में मिलाया जा रहा था.सेबों के पकने पर जानवरों की राय थी की इन्हें आपस में बराबर बाँट लिया जाये लेकिन ये आदेश आया की इन्हें सूअरों के साजो सामान वाले कमरे में पहुँचा दिया जाये.जानवर भुनभुनाये पर सूअर सहमत थे यहाँ तक कि स्नोबॉल और नेपोलियन भी.जानवरों को शांत करने का काम सूअर स्क्वीलर को सौंपा गया-

"साथियों!"वह चिल्लाया,"आपको लगता है कि हम लोग ये सब अपनी सुविधा या स्वार्थ के लिए कर रहें हैं?हम में से बहुत तो ढूध और सेब पसंद भी नहीं करते.मुझे खुद ये अच्छे नहीं लगते.इन चीज़ों को हासिल करने के पीछे हमारा मकसद अपने स्वास्थ्य की रक्षा करना है.दूध और सेब(ये विज्ञान द्वारा प्रमाणित है साथियों )में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो सूअरों के लिए लाभदायक हैं.हम सूअर दिमाग़ी कार्यकर्ता हैं.इस फ़ार्म का संगठन और प्रबंधन हमारे ऊपर निर्भर है.हम लोग दिन-रात आपके कल्याण के लिए कार्य कर रहें हैं.हम लोगों का ढूध और सेब का सेवन करना आप लोगों के हित में हैं.क्या आप जानते हैं-अगर हम सूअर अपना कर्तव्य निभाने में विफल रहे,तो क्या होगा?जोन्स वापिस आ जायेगा." 


जानवर कभी नहीं चाहते थे मिस्टर जोन्स वापिस लौटे इसलिए वे कुछ कहने की स्थिति में नहीं रह गये.नेपोलियन भी नौ नवजात puppies को एक मचान में रख के शिक्षित कर रहा था.
खेती में सुधार के लिए योजनायें बनाई जाने लगी.स्नोबॉल ने पवन चक्की बनाने की घोषणा की नेपोलियन पवन चक्की के खिलाफ था.पवन चक्की को ले कर जानवर बराबर-बराबर बँटे हुए थे.स्नोबॉल ने अपने भाषण से जानवरों को प्रभावित किया एनिमल फ़ार्म की सुखद तस्वीर पेश की.सिर्फ पवन चक्की ही नहीं बिजली से चलने वाली बहुत सी चीजों की बात की.स्नोबॉल के भाषण खत्म होते-होते कोई शंका नहीं रह गयी थी 
कि मतदान किसके पक्ष में होगा लेकिन तभी  नेपोलियन के नौ भयंकर प्रशिक्षित कुत्तों ने खेत से स्नोबॉल को खदेड़ दिया उसके बाद वह कभी नज़र नहीं आया.स्नोबॉल की बेदखली के तीसरे रविवार जानवर नेपोलियन की ये घोषणा सुन कर दंग रह गये कि पवन चक्की बनायी जाएगी.

साल-भर जानवर खटते रहे.पर वह खुश थे 
कि अपने लिए काम कर रहें हैं दुष्ट और कामचोर इंसानों के लिए नहीं.पवन चक्की बनाने के कम के कारन अन्य जरूरी काम प्रभावित होने लगे थे.नेपोलियन ने पड़ोसी फ़ार्म से व्यापार की घोषणा की.सूखी घास,थोड़ा गेहूं और ज्यादा पैसे के लिए मुर्गियों के अंडे बेचने की बात भी कही.विलिंग्डन के मिस्टर विम्पर ने बिचोला बनना स्वीकार कर लिया.

सूअरों ने मिस्टर जोन्स के फ़ार्म हॉउस को अपना घर बना लिया.वह बिस्तर पर सोने लगे.कलेवर से चौथा नियम नहीं पढ़ा गया तो उसने मुरियल को पढने के लिए कहा कि मुझे बताओ कि क्या चौथे नियम में बिस्तर पे सोने को मना नहीं किया तो मुरियल ने पढ़ा-कोई जानवर बिस्तर में....चादर के ऊपर नहीं सोयेगा.कुत्तों ने उन्हें बताया कि बिस्तर पे सोने के खिलाफ नियम नहीं था बिस्तर का अर्थ है सोने की जगह,देखा जाये तो तिनको का ढेर भी बिस्तर ही है. ये नियम चादर पे सोने से मना करता है जो इंसान ने बनाई है.

एक रात, तेज हवाओं ने पवन चक्की को नष्ट कर दिया. नेपोलियन स्नोबॉल को दोष देता है.
 
ये बात साफ हो चुकी थी कि बाहर से अनाज की व्यवस्था करनी होगी.नेपोलियन अब शायद ही कभी बाहर आता था.वह फ़ार्म हॉउस में रहता था जिसके बाहर एक कुत्ता हमेशा तैनात रहता था.उसका बाहर निकलना भी एक समारोह की तरह होता.उसे छह कुत्ते घेरे रहते.वह अपना आदेश किसी और सूअर खासकर स्कवीलर के जरिये जारी करता.नेपोलियन ने विम्पर के माध्यम से एक समझौता किया.जिसके अनुसार हर हफ्ते फ़ार्म से ४०० अण्डों की आपूर्ति की जायेगी.


चार दिन बाद, नेपोलियन एक विधानसभा बुलायी जिसमें उसने कई कपट स्वीकार करने के लिए पशुओं को इकट्ठा किया.चार सूअरों को कुत्तों ने स्नोबॉल के संपर्क में रहने के दोष में मार दिया.तीन मुर्गियों को अंडें न देने की बगावत में मार दिया.मृत्युदंड का सिलसिला देर तक चला.कुछ जानवरों को छठा नियम याद आया.मुरियल ने नियम पढ़ा-एक जानवर दूसरे जानवर को अकारण नहीं मारेगा.यह "अकारण"शब्द जानवरों की स्मृति से निकल गया था.अब उन्हें अहसास हुआ कि नियम टूटा नहीं है.

नेपोलियन की  किसानों के साथ बातचीत जारी रही और अंत में मिस्टर पिल्क्ग्टन को लकड़ी बेचने का फैसला किया.गर्मी खत्म होने तक पवन चक्की भी तैयार होने को थी.पवन चक्की की ख़ुशी में जानवर अपनी सारी थकान भूल गये पर वह ये सुन कर हैरान रह गये कि नेपोलियन ने लकड़ी 
पिल्क्ग्टन को नही  फ्रेडरिक को बेच दी.नेपोलियन ने पिल्क्ग्टन से उपरी दोस्ती के साथ फ्रेडरिक से भी गुप्त समझोता कर रखा था पर फ्रेडरिक ने लकड़ी के बदले में नकली नकदी नेपोलियन को दी .नेपोलियन ने तत्काल बैठक बुलाई और फ्रेडरिक को मृत्युदंड देने की घोषणा की.अगली सुबह फ्रेडरिक ने लोगो साथ मिल के फ़ार्म पे हमला कर दिया.युद्ध में जानवर जीत तो गये पर बुरी तरह थके और घायल.पवनचक्की भी टूट चुकी थी.जानवरों की मेहनत की आखरी निशानी अब नहीं बची थी.

युद्ध के बाद, सूअरों को फार्म हाउस के तहखाने में व्हिस्की की पेटी मिली.उस रात फ़ार्म हॉउस से जोर-जोर से गाने की आवाज़ आयी.सुबह कोई भी सूअर बाहर नहीं निकला.दूसरे दिन नेपोलियन ने विम्पर को शराब बनाने कि विधि की पुस्तकें खरीद लाने को कहा.कुछ दिनों बाद मुरियल ने महसूस किया कि जानवरों ने एक और नियम सही से याद नहीं रखा.उनके अनुसार पांचवा नियम है-कोई भी जानवर शराब नहीं पिएगा.पर इसमें एक और शब्द वो भूल चुके है.असल में नियम है-कोई भी जानवर ज्यादा शराब नहीं पिएगा.

अप्रैल में,  फ़ार्म हॉउस  एक गणतंत्र घोषित किया गया  और 
नेपोलियन राष्ट्रपति के रूप में सर्वसम्मति से चुना गया.एक दिन बॉक्सर पवन चक्की का काम करते हुए गिर गया.नेपोलियन ने उसे विलिंग्डन में पशुचिकित्सा करने के लिए भेजने का वादा किया. कुछ दिनों बाद, एक घोड़े की हत्या करनेवाला अपनी वैन में बॉक्सर को ले जाने लगता है.जानवर वैन के पीछे दौड़ते हैं.कलेवर बॉक्सर को बाहर निकलने के लिए कहती  है.वैन तेज़ हो जाती है पता नहीं बॉक्सर कलेवर की बात सुन भी पाया था कि नहीं.तीन दिन बाद ये घोषणा कि गयी कि बॉक्सर का सर्वोत्तम संभव देखभाल करने के बावजूद अस्पताल में निधन हो गया.
सूअरों के पास अचानक से बहुत सा पैसा कहीं से आ गया था.

वर्षों बीत गये.कुछ ही जानवर ऐसे बचे थे जिन्हें विद्रोह के पुराने दिन याद थे.मुरियल की मौत हो चुकी थी,स्नोबॉल भुला दिया गया था.मिस्टर जोन्स भी मर चुके थे.बॉक्सर को कुछ ही जानवर याद करते हैं.कलेवर बूढी हो गयी है.फ्राम में ढेर से जानवर हैं.फ़ार्म पहले से अधिक व्यवस्थित हो गया है.पवन चक्की आखिरकार बन चुकी है.नयी बिल्डिंगे बन गयी हैं.फ़ार्म समृद्ध हो गया है पर जानवरों के जीवन में कोई तब्दीली नहीं आई सिवाय कुत्तों और सूअरों को छोड़ कर.सूअर अपने पिछले पैरों पर चलने लगे थे.भेड़ों ने गाना शुरू किया-चार पैर अच्छा,दो पैर ज्यादा अच्छा.विरोध करने की गुंजाईश खत्म हो चुकी थी.बेंजामिन ने दीवार पर अब सिर्फ एक ही लिखा हुआ नियम पढ़ के सुनाया-सारे जानवर बराबर हैं पर कुछ जानवर औरो से ज्यादा बराबर हैं.
सूअर काम कराने के लिए चाबुक ले आये.
सूअरों द्वारा स्वयं को अधिक से अधिक विशेषाधिकार देने का पुराना पैटर्न जारी रहा. वे एक टेलीफोन खरीदने वाले थे और पत्रिकाओं की सदस्यता ले रहे थे.वे जोन्स के कपड़े भी पहनने लगे थे.एक रात, नेपोलियन किसानों के लिए एक समझौता भोज आयोजित करता है और ये घोषणा करता है कि फ़ार्म हॉउस को  फिर से"मैनर फार्म" कहा जाएगा .बाहर खड़े जानवर सब देख रहे थे.पहले सुअरों को देखा,फिर इंसानों को,फिर सुअरों को देखा और उसके बाद इंसानों को.

....सूअर और इंसानों में अब कोई फरक नहीं रह गया था....

Source: http://bairang.blogspot.in/2011/03/blog-post.html

सुधा मूर्ति का एक संस्मरण


“आप वहां जाकर ईकोनॉमी क्लास की लाइन में खड़े होइए. यह लाइन बिजनेस क्लास ट्रेवलर्स की है,” हाई-हील की सैंडल पहनी एक युवती ने सुधा मूर्ति से लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर कहा.
सुधा मूर्ति के बारे में आपको पता ही होगा. वे इन्फोसिस फाउंडेशन की चेयरमेन और प्रसिद्ध लेखिका हैं.इस घटना का वृत्तांत उन्होंने अपनी पुस्तक “Three Thousand Stitches” में किया है.
प्रस्तुत है उनकी पुस्तक से यह अंशः
पिछले साल मैं लंदन के हीथ्रो इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर अपनी फ्लाइट में चढ़ने का इंतजार कर रही थी. आमतौर से मैं विदेश यात्रा में साड़ी पहनती हूं लेकिन सफर के दौरान मैं सलवार-कुर्ता पहनना पसंद करती हूं. तो उस दिन भी एक सीनियर सिटीज़न सी दिखती मैं टिपिकल भारतीय परिधान सलवार-कुर्ता में टर्मिनल के गेट पर खड़ी थी.
बोर्डिंग शुरु नहीं हुई थी इसलिए मैं कहीं बैठकर आसपास का परिदृश्य देख रही थी. यह फ्लाइट बैंगलोर जा रही थी इसलिए आसपास बहुत से लोग कन्नड़ में बात कर रहे थे. मेरी उम्र के बहुत से बुजुर्ग लोग वहां थे जो शायद अमेरिका या ब्रिटेन में अपने बच्चों के नया घर खरीदने या बच्चों का जन्म होने से जुड़ी सहायता करने के बाद भारत लौट रहे थे. कुछ बिजनेस एक्ज़ीक्यूटिव भी थे जो भारत में हो रही प्रगति के बारे में बात कर रहे थे. टीनेजर्स अपने फैंसी गेजेट्स के साथ व्यस्त थे और छोटे बच्चे या तो यहां-वहां भाग-दौड़ कर रहे थे या रो रहे थे.
कुछ मिनटों के बाद बोर्डिंग की घोषणा हुई और मैं अपनी लाइन में खड़ी हो गई. मेरे सामने एक बहुत स्टाइलिश महिला खड़ी थी जिसने सिल्क का इंडो-वेस्टर्न आउटफ़िट पहना था, हाथ में गुच्ची का बैग था और हाई हील्स. उसके बालों का एक-एक रेशा बिल्कुल सधा हुआ था और उसके साथ एक मित्र भी खड़ी थी जिसने सिल्क की महंगी साड़ी पहनी थी, मोतियों का नेकलेस, मैचिंग इयररिंग और हीरे जड़े कंगन हाथों में थे.
मैंने पास लगी वेंडिंग मशीन को देखा और सोचा कि मुझे लाइन से निकलकर पानी ले लेना चाहिए.
अचानक से ही मेरे सामने वाली महिला ने कुछ किनारे होकर मुझे इस तरह से देखा जैसे उसे मुझपर तरस आ रहा हो. अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए उसने मुझसे पूछा, ‘क्या मैं आपका बोर्डिंग पास देख सकती हूं?’ मैं अपना बोर्डिंग पास दिखाने ही वाली थी लेकिन मुझे लगा कि वह एयरलाइन की इंप्लॉई नहीं है, इसलिए मैंने पूछा, ‘क्यों?’
‘वेल… यह लाइन सिर्फ बिजनेस क्लास ट्रैवलर्स के लिए है,’ उसने बहुत रौब से कहा और उंगली के इशारे से इकोनॉमी क्लास की लाइन दिखाते हुए बोली, ‘आप वहां उस लाइन में जाकर खड़े होइए’.
मैं उसे बताने वाली ही थी कि मेरे पास भी बिजनेस क्लास का टिकट है लेकिन कुछ सोचकर मैं रूक गई. मैं यह जानना चाहती थी कि उसे यह क्यों लगा कि मैं बिजनेस क्लास में सफर करने के लायक नहीं थी. मैंने उससे पूछा, ‘मुझे इस लाइन में क्यों नहीं लगना चाहिए?’
उसने गहरी सांस भरते हुए कहा, ‘देखिए… ईकोनॉमी क्लास और बिजनेस क्लास की टिकटों की कीमत में बहुत अंतर होता है. बिजनेस क्लास की टिकटें लगभग दो-तीन गुना महंगी होती हैं… ’
‘सही कहा,’ दूसरी महिला ने कहा, ‘बिजनेस क्लास की टिकटों के साथ ट्रेवलर को कुछ खास सहूलियतें या प्रिविलेज मिलती हैं.’
‘अच्छा?’ मैंने मन-ही-मन शरारती इरादे से कहा जैसे मैं कुछ जानती ही नहीं. ‘आप किस तरह की प्रिविलेज की बात कर रही हैं?’
उसे कुछ चिढ़ सी आने लगी. ‘हम अपने साथ दो बैग लेकर चल सकते हैं जबकि आपको एक बैग की ही परमीशन है. हम फ्लाइट में कम भीड़ वाली लाइन और आगे के दरवाजे से एंट्री कर सकते हैं. हमारी सीट्स आगे और बड़ी होती हैं और हमें शानदार फ़ूड सर्व किया जाता है. हम अपनी सीटों को बहुत पीछे झुकाकर लेट भी सकते हैं. हमारे सामने एक टीवी स्क्रीन होती है और थोड़े से बिजनेस क्लास वालों के लिए चार वॉशरूम्स होते हैं.’
उसकी मित्र ने जोड़ते हुए कहा, ‘हमारे लगेज के लिए प्रॉयोरिटी चैक-इन फैसिलिटी मिलती है और वे फ्लाइट लैंट होने पर सबसे पहले बाहन निकाले जाते हैं. हमें सेम फ्लाइट से ट्रेवल करते रहने पर ज्यादा पॉइंट भी मिलते हैं.’
‘अब जबकि आपको ईकोनॉमी क्लास और बिजनेस क्लास का अंतर पता चल गया है तो आप वहां जाकर अपनी लाइन में लगिए’ उसने बहुत आग्रहपूर्वक कहा.
‘लेकिन मुझे वहां नहीं जाना.’ मैं वहां से हिलने को तैयार नहीं थी.
वह महिला अपनी मित्र की ओर मुड़ी. ‘इन कैटल-क्लास (cattle class) लोगों के साथ बात करना बहुत मुश्किल है. अब कोई स्टाफ़ वाला ही आकर इन्हें इनकी जगह बताएगा. इन्हें हमारी बातें समझ में नहीं आ रहीं.’
मैं नाराज़ नहीं थी. कैटल-क्लास शब्द से जुड़ी अतीत की एक घटना मुझे याद आ गई.
एक दिन मैं बैंगलोर में एक हाइ-सोसायटी डिनर पार्टी में गई थी. बहुत से लोकल सेलेब्रिटी और सोशलाइट्स भी वहां मौजूद थे. मैं किसी गेस्ट से कन्नड़ में बातें कर रही थी तभी एक आदमी हमारे पास आया और बहुत धीरे से अंग्रेजी में बोला, ‘May I introduce myself ? I am… ’
यह साफ दिख रहा था कि उसे यह लग रहा था कि मुझे धाराप्रवाह अंग्रेजी समझने में दिक्कत होगी.
मैंने मुस्कुराते हुए अंग्रेजी में कहा, ‘आप मुझसे अंग्रेजी में बात कर सकते हैं.’
‘ओह,’ उसने थोड़ी हैरत से कहा, ‘माफ़ कीजिए. मुझे लगा कि आपको अंग्रेजी में बात करने में असुविधा होगी क्योंकि मैंने आपको कन्नड़ में बातें करते सुना.’
‘अपनी मातृभाषा में बात करने में शर्म कैसी? यह तो मेरा अधिकार और प्रिविलेज है. मैं अंग्रेजी में तभी बात करती हूं जब किसी को कन्नड़ समझ नहीं आती हो.’
एयरपोर्ट पर मेरी लाइन आगे बढ़ने लगी और मैं अपने स्मृतिलोक से बाहर आ गई. मेरे सामनेवाली वे दोनों महिलाएं आपस में मंद स्वर में बातें कर रही थीं, ‘अब वे इसे दूसरी लाइन में भेज देंगे. कुछ लोग समझने को तैयार ही नहीं होते. हमने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश करके देख ली.’
जब अटेंडेंट को मेरा बोर्डिंग पास दिखाने का वक्त तो मैंने देखा कि वे दोनों महिलाएं रुककर यह देख रही थीं कि मेरे साथ क्या होगा. अटेंडेंट ने मेरा बोर्डिंग पास लिया और प्रफुल्लित होते हुए कहा, ‘आपका स्वागत है, मैडम! हम पिछले हफ्ते भी मिले थे न?’
‘हां,’ मैंने कहा.
अटेंडेंट मुस्कुराई और दूसरे यात्री को अटेंड करने लगी.
मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं करने का विचार करके उन दोनों महिलाओं के करीब से गुजरते हुए आगे बढ़ गई थी लेकिन मेरा मन बदल गया और मैं पीछे पलटी.
‘प्लीज़ मुझे बताइए –  आपको यह क्यों लगा कि मैं बिजनेस क्लास का टिकट अफ़ोर्ड नहीं कर सकती? यदि वाकई ऐसा ही होता तो भी आपका यह अधिकार नहीं बनता कि आप मुझे यह बताएं कि मेरा स्थान कहां होना चाहिए? क्या मैंने आपसे कुछ पूछा था?’
वे दोनों स्तब्ध होकर मुझे देखती रहीं.
‘आपने मुझे कैटल-क्लास का व्यक्ति कहा. क्लास इससे नहीं बनती कि आपके पास कितनी संपत्ति है,’ मैंने कहा. मेरे भीतर इतना कुछ चल रहा था कि मैं खुद को कुछ कहने से रोक नहीं पा रही थी.
‘इस दुनिया में पैसा बहुत से गलत तरीकों से कमाया जा सकता है. हो सकता है कि आपके पास बहुत सी सुख-सुविधाएं जुटाने के लिए पर्याप्त पैसा हो लेकिन आपका पैसा आपको यह हक नहीं देता कि आप दूसरों की हैसियत या उनकी क्रयशक्ति का निर्णय करती फिरें. मदर टेरेसा बहुत क्लासी महिला थीं. भारतीय मूल की गणितज्ञ मंजुल भार्गव भी बहुत क्लासी महिला हैं. यह विचार बहुत ही बेबुनियाद है कि बहुत सा पैसा आपको किसी क्लास तक पहुंच दे सकता है.’
मैं किसी उत्तर का इंतज़ार किए बिना आगे बढ़ गई.
“बहुत सारे धन का होना आपकी क्लास का परिचायक नहीं है.”
‘अपनी मातृभाषा का उपयोग करना शर्मिंदगी का सबब नहीं है. यह मेरा अधिकार है. मैं अंग्रेजी में तभी बात करती हूं जब किसी को मेरी भाषा नहीं आती.’

Sunday, January 14, 2018

गांधी का यह अद्भुत भाषण बताता है कि टॉल्स्टॉय के प्रति उनकी श्रद्धा कितनी थी और क्यों थी

'मैं इतना तो कह ही सकता हूं कि तीन पुरुषों ने मेरे जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव डाला है. उनमें पहला स्थान मैं राजचन्द्र कवि को देता हूं, दूसरा टॉल्सटॉय को और तीसरा रस्किन को. किन्तु यदि टॉल्सटॉय और रस्किन के बीच चुनाव की बात हो, और दोनों के जीवन के विषय में मैं और अधिक बातें जान लूं, तो नहीं जानता कि उस हालत में प्रथम स्थान किसे दूंगा.
टॉल्सटॉय के जीवन में मेरे लेखे दो बातें महत्वपूर्ण थीं. वे जैसा कहते थे वैसा ही करते थे. उनकी सादगी अद्भुत थी, बाह्य सादगी तो उनमें थी ही. वे अमीर वर्ग के व्यक्ति थे, इस जगत के सभी भोग उन्होंने भोगे थे. धन-दौलत के विषय में मनुष्य जितने की इच्छा रख सकता है, वह सब उन्हें मिला था. फिर भी उन्होंने भरी जवानी में अपना ध्येय बदल डाला. दुनिया के विविध रंग देखने और उनके स्वाद चखने पर भी, जब उन्हें प्रतीत हुआ कि इसमें कुछ नहीं है तो उनसे उन्होंने मुंह मोड़ लिया, और अंत तक अपने विचारों पर डटे रहे. इसी से मैंने एक जगह लिखा है कि टॉल्स्टॉय इस युग की सत्य की मूर्ति थे. उन्होंने सत्य को जैसा माना तद्नुसार चलने का उत्कट प्रयत्न किया; सत्य को छिपाने या कमजोर करने का प्रयत्न नहीं किया. लोगों को दुःख होगा या अच्छा लगेगा, शक्तिशाली सम्राट को पसन्द आएगा या नहीं, इसका विचार किए बिना ही उन्हें जो वस्तु जैसी दिखाई दी, उन्होंने कहा वैसा ही.
टॉल्सटॉय अपने युग के अहिंसा के बड़े भारी समर्थक थे. जहां तक मैं जानता हूं, अहिंसा के विषय में पश्चिम के लिए जितना टॉल्स्टॉय ने लिखा है उतना मार्मिक साहित्य दूसरे किसी ने नहीं लिखा. उससे भी आगे जाकर कहता हूं कि अहिंसा का जितना सूक्ष्म दर्शन और उसका पालन करने का जितना प्रयत्न टॉल्स्टॉय ने किया था उतना प्रयत्न करनेवाला आज हिन्दुस्तान में कोई नहीं है और न मैं ऐसी किसी आदमी को जानता हूं.यह स्थिति मेरे लिए दुःखदायक है; यह मुझे नहीं भाती. हिन्दुस्तान कर्मभूमि है. हिन्दुस्तान में ऋषि-मुनियों ने अहिंसा के क्षेत्र में बड़ी-बड़ी खोजें की हैं. परंतु पूर्वजों की उपार्जित पूंजी पर हमारा निर्वाह नहीं हो सकता. उसमें यदि वृद्धि न की जाए तो वह समाप्त हो जाती है.
वेदादि साहित्य या जैन साहित्य में से हम चाहें जितनी बड़ी-बड़ी बातें करते रहें या सिद्धांतों के विषय में चाहे जितने प्रमाण देकर दुनिया को आश्चर्यचकित करते रहें, फिर भी दुनिया हमें सच्चा नहीं मान सकती. इसलिए रानडे (समाज सुधारक और न्यायविद महादेव गोविंद रानडे ) ने हमारा धर्म यह बताया है कि हम अपनी इस पूंजी में वृद्धि करते जाएं. अन्य धर्मों के विचारकों ने जो लिखा हो, उससे उसकी तुलना करें, और ऐसा करते हुए यदि कोई नई चीज मिल जाए या उसपर नया प्रकाश पड़ता हो तो हम उसकी उपेक्षा न करें. किन्तु हमने ऐसा नहीं किया.हमारे धर्माध्यक्षों ने एक पक्ष का ही विचार किया है. उनके अध्ययन में, कहने और करने में समानता भी नहीं है.
जन-साधारण को यह अच्छा लगेगा या नहीं, जिस समाज में वे स्वयं काम करते थे, उस समाज को भला लगेगा या नहीं, इस बात का विचार न करते हुए टॉल्स्टॉय की तरह खरी-खरी सुना देनेवाले हमारे यहां नहीं मिलते. हमारे इस अहिंसा-प्रधान देश की ऐसी दयनीय दशा है. हमारी अहिंसा निंदा के ही योग्य है. खटमल, मच्छर, पिस्सू, पक्षी और पशुओं की किसी न किसी तरह रक्षा करने में ही मानो हमारी अहिंसा की इति हो जाती है. यदि वे प्राणी कष्ट में तड़पते हों तो भी हमें उसकी चिन्ता नहीं होती. परंतु दुःखी प्राणी को यदि कोई प्राणमुक्त करना चाहे अथवा हमें उसमें शरीक होना पड़े तो हम उसे घोर पाप मानते हैं. मैं लिख चुका हूं कि यह अहिंसा नहीं है.
टॉल्स्टॉय का स्मरण कराते हुए मैं फिर कहता हूं कि अहिंसा का यह अर्थ नहीं है. अहिंसा के मानी हैं प्रेम का समुद्र; अहिंसा के मानी हैं वैरभाव का सर्वथा त्याग. अहिंसा में दीनता, भीरुता नहीं होती, डर-डरकर भागना भी नहीं होता. अहिंसा में तो दृढ़ता, वीरता, अडिगता होनी चाहिए.यह अहिंसा हिन्दुस्तान के समाज में दिखाई नहीं देती. उनके लिए टॉल्सटॉय का जीवन प्रेरक है. उन्होंने जिस चीज पर विश्वास किया. उसका पालन करने का जबरदस्त प्रयत्न किया, और उससे कभी पीछे नहीं हटे.
इस जगत में ऐसा पुरुष कौन है जो जीते जी अपने सिद्धांतों पर पूरी तरह अमल कर सका हो? मेरी मान्यता है कि देहधारी के लिए संपूर्ण अहिंसा का पालन असंभव है. जब तक शरीर है तब तक कुछ-न-कुछ अहंभाव तो रहता ही है. इसलिए शरीर के साथ हिंसा भी रहती ही है. टॉल्स्टॉय ने स्वयं कहा है कि जो अपने को आदर्श तक पहुंचा हुआ समझता है उसे नष्टप्राय ही समझना चाहिए. बस यहीं से उसकी अधोगति शुरू हो जाती है. ज्यों-ज्यों हम उस आदर्श के नजदीक पहुंचते हैं, आदर्श दूर भागता जाता है. जैसे-जैसे हम उसकी खोज में अग्रसर होते हैं यह मालूम होता है कि अभी तो एक मंजिल और बाकी है. कोई भी एक छलांग में कई मंजिलें तय नहीं कर सकता. ऐसा मानने में न हीनता है, न निराशा; नम्रता अवश्य है. इसी से हमारे ऋषियों ने कहा है कि मोक्ष तो शून्यता है.
जिस क्षण इस बात को टॉल्स्टॉय ने साफ देख लिया, उसे अपने दिमाग में बैठा लिया और उसकी ओर दो डग आगे बढ़े, उसी वक्त उन्हें वह हरी छड़ी मिल गई. (गांधीजी से पूर्व इस सभा में किसी वक्ता ने कहा था कि टॉल्स्टॉय के भाई ने उन्हें अनेक सद्गुणों वाली हरी छड़ी खोजने को कहा था जिसे वे आजीवन खोजते ही रहे) उस छड़ी का वह वर्णन नहीं कर सकते थे. सिर्फ इतना ही कह सकते थे कि वह उन्हें मिली. फिर भी अगर उन्होंने सचमुच यह कहा होता कि मिल गई तो उनका जीवन वहीं समाप्त हो जाता.
टॉल्स्टॉय के जीवन में जो अंतर्विरोध दिखता है वह टॉल्स्टॉय का कलंक या कमजोरी नहीं, बल्कि देखनेवालों की त्रुटि है. एमर्सन ने कहा है कि अविरोध का भूत तो छोटे आदमियों को दबोचता है. अगर हम यह दिखलाना चाहें कि हमारे जीवन में कभी विरोध आनेवाला ही नहीं है तो यों समझिए कि हम मरे हुए ही हैं. अविरोध साधने में अगर कल के कार्य को याद रखकर उसके साथ आज के कार्य का मेल बिठाना पड़े, तो उस कृत्रिम मेल में असत्याचरण की संभावना हो सकती है. सीधा मार्ग यही है कि जिस वक्त जो सत्य प्रतीत हो उसपर आचरण करना चाहिए. यदि हमारी उत्तरोत्तर उन्नति हो रही हो और हमारे कार्यों में दूसरों को अंतर्विरोध दिखे तो इससे हमें क्या? सच तो यह है कि यह अंतर्विरोध नहीं उन्नति है. इसी तरह टॉल्स्टॉय के जीवन में जो अंतर्विरोध दिखता है वह अंतर्विरोध नहीं; हमारे मन का भ्रम है.
एक दूसरे अद्भुत विषय पर लिखकर और उसे अपने जीवन में उतारकर टॉल्स्टॉय ने उसकी ओर हमारा ध्यान दिलाया है. वह है ब्रेड लेबर (खुद शरीर श्रम करके अपना गुजारा करना). यह उनकी अपनी खोज नहीं थी. किसी दूसरे लेखक ने यह बात रूस के सर्वसंग्रह (रशियन मिसलेनी) में लिखी थी. इस लेखक को टॉल्स्टॉय ने जगत के सामने ला रखा और उसकी बात को भी प्रकाश में लाया. जगत में जो असमानता दिखाई पड़ती है, एक तरफ दौलत और दूसरी तरफ कंगाली नजर आती है, उसका कारण यह है कि हम अपने जीवन का कानून भूल गए हैं. यह कानून ब्रेड-लेबर है. गीता के तीसरे अध्याय के आधार पर मैं इसे यज्ञ कहता हूं. गीता ने कहा है कि जो बिना यज्ञ किए खाता है वह चोर है, पापी है. वही चीज टॉल्स्टॉय ने बतलाई है.
ब्रेड-लेबर का उल्टा-सीधा भावार्थ करके हमें उसे उड़ा नहीं देना चाहिए. उसका सीधा अर्थ यह है कि जो शारीरिक श्रम नहीं करता उसे खाने का अधिकार नहीं है.यदि हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने भोजन के लिए आवश्यक मेहनत कर डाले, तो जो गरीबी दुनिया में दिखती है वह दूर हो जाए. एक आलसी दो व्यक्तियों को भूखों मारता है, क्योंकि उसका काम दूसरे को करना पड़ता है. टॉल्स्टॉय ने कहा है कि लोग परोपकार करने निकलते हैं, उसके लिए पैसे खर्च करते हैं और उसके बदले में खिताब आदि लेते हैं; यदि वे ये सब न करके केवल इतना ही करें कि दूसरों के कंधों ने नीचे उतर जाएं तो यही काफी है. यह सच बात है. यह नम्रतापूर्ण वचन है. करने जाएं परोपकार और अपना ऐशो-आराम लेशमात्र भी न छोड़ें, तो यह वैसी ही हुआ जैसे अखा भगत ने कहा है- निहाई की चोरी, सुई का दान. क्या ऐसे में स्वर्ग से विमान आ सकता है?
ऐसा नहीं है कि टॉल्सटॉय ने जो कहा वह दूसरों ने न कहा हो, लेकिन उनकी भाषा में चमत्कार था और इसका कारण यह है कि उन्होंने जो कहा उसका पालन किया. गद्दी-तकियों पर बैठने वाले टॉल्स्टॉय मजदूरी में जुट गए. आठ घंटे खेती का या मजदूरी का दूसरा काम उन्होंने किया. शरीर-श्रम को अपनाने के बाद से उनका साहित्य और भी अधिक शोभित हुआ. उन्होंने अपनी पुस्तकों में से जिसे सर्वोत्तम कहा है वह है- कला क्या है?. यह किताब उन्होंने मजदूरी में से बचे समय में लिखी थी. मजदूरी से उनका शरीर क्षीण नहीं हुआ. उन्होंने स्वयं यह माना था कि इससे उनकी बुद्धि और अधिक तेजस्वी हुई और उनके ग्रंथों को पढ़नेवाले भी कह सकते हैं कि यह बात सच है.’
Source: Satyagrah website

Tuesday, January 9, 2018

तुम्हें पता है लोग मोहब्बत क्यों करते हैं?


लड़का: तुम्हें पता है अगर ये दुनिया का आखिरी दिन हो तो मैं इसे कैसे गुजरना चाहूंगा?
लड़की: बताओ कैसे?
लड़का: ऐसे ही तुम्हारे कंधे पे सर टिका सारे दिन तुम्हें चूमते हुए, तुम्हारे साथ. शायद ये ऐसी मौत होगी जिसका मुझे कोई गम न होगा.
लड़की: तुम्हारा क्या होगा शर्माजी
लड़का: मुझे नहीं पता लेकिन मैं हर दिन ज़िन्दगी का आखिरी दिन मान जीना चाहता हूँ... तुम्हारे साथ. ऐसे ही. यहां से निकलता हूँ तो नहीं पता की मेरी कैब को क्या हो या आखिरी दिन ज़िन्दगी का कौन सा हो. लेकिन तुम्हारे साथ बिताया दिन 'नो रिग्रेट्स' वाला होगा.
लड़की: तुम्हें पता है लोग मोहब्बत क्यों करते हैं?
लड़का: हाँ क्यूंकि ज़िंदा रहने का और मरने का... दोनों का बेहतरीन सबब यही है.
लड़की: नहीं. मोहब्बत के को कारण नहीं होते. लेकिन मेरे पास है. तुम बहुत प्योर हो शर्माजी. ऐसे ही रहोगे उम्रभर?
लड़का: मैं तुम्हारा रहूँगा उम्रभर ये पता है... और तुम मुझे ऐसे ही पसंद करते रहोगे.

लड़की को जवाब मिल गया था.

पैतीस साल बाद पोपली लड़की का लड़का दुनिया में नहीं था लेकिन वो प्योर लड़का लड़की की आँखों में अभी भी ज़िंदा था, बातों में शामिल था और आहों में सो रहा था.

लोग कहते हैं लड़का 'नो रिग्रेट्स' कंडीशन के साथ मरा था. 

Friday, December 8, 2017

इश्क़ डरता बहुत है


इश्क़ डरता बहुत है
छुपा छुपा रहता बहुत है
भीड़ में निकले तो हाथ थाम लेता है
किसी और से मिल लो तो
सवाल करता बहुत है
इश्क़ डरता बहुत है.

कभी कभी खुद से अजनबी सा लगता हूं
तुम्हारे आभास को धकेलता हूं.
अंगड़ाई लूं, हाथ-पैर पसारूं,
जगह तो दो.
यहां दम घुटता बहुत है
इश्क़ डरता बहुत है.

बातों पे पहरे
सांसों पे पहरे
सपनों में उम्मीदें
उम्मीदों में भी तुम ठहरे.

ज़रा ठहराव तो दो
सम भाव तो दो
माना इश्क़ गहरा बहुत है
पर ये चुभता बहुत है,
इश्क़ डरता बहुत है.

ये सारा Secret है
इसमें ढेर सारे Phone Calls हैं
ढेर सारी Video Chats हैं
पर कितना बिखराव है!

ये मचलता बहुत है
छूता कम, मसलता बहुत है
चलता कम, सम्हलता बहुत है
विश्वास है, पर डिगता बहुत है,
डरता बहुत है.

यहां इश्क़ रहता बहुत है???

घुटता है, चुभता है, बिखरता है, डिगता है,
इश्क़ डरता बहुत है.

इश्क़ इश्क़ कम,
पहरेदार अधिक है.
क्योंकि
इश्क़ डरता बहुत है
 डरता बहुत है.

Wednesday, December 6, 2017

India As I Know: Media In India

यह 16 दिसम्बर 2013 की शाम थी. निर्भया केस को एक वर्ष ही हुआ था और सुबह से News Papers से लेकर Facebook, Twitter पर इसी से सम्बंधित ख़बरें थीं.

यहाँ तक की मेरे ऑफिस में भी इसी से सम्बंधित चर्चाएँ हुई थीं. करीब शाम आठ बजे मैंने ऑफिस से आकर टीवी चालू किया. एक प्रसिद्ध न्यूज़ चैनल पर ‘एक और निर्भया’ नाम से स्पेशल रिपोर्ट आ रही थी.

रिपोर्ट देख मैं चौंक गया. यह उर्शिद अनवर (बदला हुआ नाम) और उनके NGO में काम करने वाली एक लड़की की खबर थी. मैं इस मामले के बारे में पहले से वाकिफ था. उर्शिद मेरे फेसबुक मित्र थे और केदारनाथ हादसे के बाद Rescue and Reconstruction Mission में काम कर रहे थे इसलिए मैं उनसे प्रभावित था. लड़की ने रेप की शिकायत उनके खिलाफ पुलिस में डाली थी और उर्शिद ने भी झूठी शिकायत दर्ज करने के खिलाफ पुलिस में शिकायत की थी. मैं सच्चा कौन है नहीं जानता किन्तु ये देश का दूसरा सबसे बड़ा न्यूज़ चैनल उर्शिद को गुनाहगार बना पेश कर रहा था, जबकि इस केस में कोई पुलिस इन्वेस्टीगेशन भी नहीं हुई थी. पूरे एक घंटे की खबर में कोई ‘खोजी पत्रकारिता’ जैसे कोई गंभीर सबूत भी पेश नहीं किये गये और उर्शिद को गुनाहगार ठहरा दिया गया.

मैं इस प्रोग्राम के बारे में उर्शिद को बताना चाहता था किन्तु फेसबुक खोलने पर पता चला कि उन्हें यह कई लोग बता चुके हैं. कई उनपर आक्षेप लगा रहे हैं तो कुछ एक को उनसे हमदर्दी भी थी.

अगली सुबह ऑफिस जाते वक़्त बस में मैंने फेसबुक खोला. किन्तु जो देखा वो भयानक था. उर्शिद ने छठवे माले से कूदकर आत्महत्या कर ली थी.

ये भयानक इसलिए था क्यूंकि न कोई इन्वेस्टीगेशन हुई थी न पुलिस ने उर्शिद के खिलाफ कोई चार्जशीट फाइल की थी.  एक न्यूज़ चैनल द्वारा TRP और Viewers की लालसा में प्रोग्राम किया, जिससे एक व्यक्ति ने बदनामी के कारण आत्महत्या कर ली थी.

यह हमारा दसवां भारत है- गैर ज़िम्मेदार, TRP Hungry मीडिया का भारत!

सच तो ये है, यह आत्महत्या से ज्यादा हत्या थी, क्यूंकि ये गैर ज़िम्मेदारी से की गई रिपोर्ट के कारण आहत व्यक्ति द्वारा की गई आत्महत्या थी किन्तु इसमें गुनाहगार कोई नहीं माना गया! ना हत्या के लिए न आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए. यहाँ तक की 2017 में जब मैंने उस पत्रकार को फेसबुक पर कहा तो He was proud of that report!

मीडिया ट्रायल्स और गैर ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग भारत में कोई नई घटना नहीं है. लेकिन ऐसा पहली बार हुआ था की मैं परोक्ष रूप से इससे प्रभावित हुआ था.

इससे पहले 2008 का मुंबई अटैक देखिये- वहां टीवी लाइव रिपोर्टिंग के कारण आतंकवादियों को फायदा और मदद मिली थी! उनके आका उनके लिए इंस्ट्रक्शन लाइव कवरेज देखकर ही दे रहे थे!

सच तो ये है, प्रिंट मीडिया के लिए भारत में प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के रूप में एक संस्था तो है तो रिपोर्टिंग को Review करती है और गलती पर Fine चार्ज करती है किन्तु टीवी मीडिया के लिए सरकार ने ऐसी कोई संस्था नही बनाई है. नेशनल ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन की एक संस्था है जो सेल्फ रेगुलेटरी है और अधिकतम मात्र 1 लाख का Fine लगाती है. और सेल्फ रेगुलेटरी होने के कारण  Passive भी है.

मीडिया ट्रायल्स की हद तो तब हो गई जब 2015 के JNU केस में बिना सबूत तथा Doctored Videos द्वारा कन्हैया कुमार, उमर खालिद को तथाकाहित ‘राष्ट्रद्रोही’ बताया गया और उमर खालिद के सम्बन्ध तो टेररिस्ट से बता दिए गये! देश की सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी को राष्ट्रद्रोहियों का अड्डा कह दिया गया. लगभग तीन साल बाद भी बिना किसी सबूत के लोग कन्हैया और उमर को फेसबुक, ट्विटर पर गालियां देते मिल जाते हैं.

ये तमाम सबूत हैं की कैसे बेलगाम और गैर-जिम्मेदार मीडिया लोगों की जिंदगियां तबाह कर सकता है और देश में ओपिनियन (Opinion) गढ़ सकता है.

उद्योगपतियों द्वारा चैनल्स खरीदने और उनके राजनेतिक संबंधों के कारण ये संकट और भी गहराया है. उत्तर प्रदेश चुनाव दौरान दैनिक जागरण द्वारा (जिसका मालिक एक राज्यसभा सदस्य है) बीजेपी के सपोर्ट में आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए ओपिनियन पोल प्रकाशित करना इसका ताज़ा उदाहरण है.

रवीश कुमार अपने ब्लॉग पर लिखते हैं की मीडिया को अधिक जिम्मेदार बनाने एक केंद्रीय संस्था होनी चाहिए जो झूठी रिपोर्टिंग पर कड़ी सजा दे सके. साथ ही मीडिया में विभिन्न क्षेत्रों से- जैसे Doctors, Educationalists, Engineers को आना चाहिए जिससे बेहतर कवरेज हो सके और अधिक रेस्पोंसीबल ख़बरें आ सकें. मैं उनकी बात से काफी हद तक सहमत हूँ.

फ़िलहाल हमारा भारतीय मीडिया निम्न समस्याओं से गुजर रहा है-

१.      Media Education के लिए  IIMC के अलावा अन्य कोई ढंग का संस्थान नहीं है.  भारतीय मीडिया एजुकेशन और एथिकल एजुकेशन दोनों की कमी से गुजर रहा है.
२.      सरकारी रेगुलेटरी संस्था का अभाव.
३.      इन-हाउस प्रशिक्षण का अभाव. ज्यादातर मीडिया हाउस अपने कर्मचारियों को समयबद्ध ट्रेनिंग उपलब्ध नहीं कराते हैं.
४.      भारतीय मीडिया में कोड ऑफ़ एथिक्स का अभाव.
      
   एक Comparison लें तो पेरिस के Charlie Hebdo Attack के बाद मैं फ्रांस के न्यूज़ चैनल्स देख रहा था. उनके प्रोग्राम में न कोई ओपिनियन थी, न Haters Generate करने की कोशिशें थीं, न चिल्ला चिल्लाकर दीपक चौरसिया की तरह राष्ट्रद्रोह के तमगे बांटे जा रहे थे. खालिश न्यूज़ वो भी शांत तरीके से चल रही थी. माहौल में भय को कण्ट्रोल करने की कोशिशें मीडिया द्वारा हो रही थीं, न की भारतीय मीडिया की तरह भय को क्रिएट करने की!


हमे ऐसे ही जिम्मेदार, ईमानदार, प्रभावी तथा निष्पक्ष मीडिया की दरकार है.

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References:
Indian Express and Dainik Bhaskar coverage of JNU Case
Indian Express coverage of Mumbai Attack
nytimes coverage of Charlie Hebdo Attack
Ravish's blog- naisadak.org
TV news programmes
Press Council of India website
Wikipedia pages of Charlie Hebdo Attack, Mumbai Attack, Nirbhaya Case
nbanewdelhi.com

Sunday, November 19, 2017

India As I Know: आप कौन से भारत से हैं?

कहते हैं स्वयं के अधिकारों के लिए खड़ी हुई स्त्री सबसे खूबसूरत स्त्री होती है. किताबें थाम समाज से लड़ती सावित्रीबाई फुले, रमाबाई सरस्वती और तलवार थाम अंग्रेजों से लड़ती कित्तूर रानी चेन्नम्मा, झाँसी रानी लक्ष्मीबाई बेहद खूबसूरत रही होंगी.

मैंने पूर्व में जो उदाहरण दिए हैं उनमें अधिकतर स्त्रियों के हैं. दरअसल यही हमारा आठवां इंडिया है. देश की आधी आबादी का भारत.

निर्भया केस के बाद पुलिस से भिड़ती, कैंडल मार्च करती स्त्रियाँ बेहद खूबसूरत स्त्रियाँ थीं. संसद में 33% रिजर्वेशन के लिए संसद में बहस करती लड़कियां देखिए, हक की लड़ाई उनके चेहरे पर अप्रतिम सौंदर्य लेकर आता है.

मेरी शिक्षिका माँ जब सुबह स्कूल के लिए निकलती है तो बेहद ताकतवर और खूबसूरत नज़र आती है.

उन्नीसवीं सदी में Public Places (सार्वजानिक स्थलों) पर स्त्रियाँ कहीं नहीं थीं, बीसवीं सदी की शुरुआत में उन्होंने अपने डैनों को पसारना शुरू किया.

कल्पना दत्त, एनी बेसेंट, सरोजनी नायडू, अम्बिका साराभाई जैसे कई नामों ने घर से निकलकर स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी. इसके लिए महात्मा गाँधी के प्रोत्साहन और अहिंसक आन्दोलन का अभूतपूर्व योगदान रहा. जिसने इन्हें घर से निकलकर संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया.

1970 तक स्त्रियाँ मुख्यत: खेतों में काम करती नज़र आती थी.
1980 तक आप स्त्री को मुख्यत: शिक्षक या डॉक्टर के रूम में देख पाते थे.
लेकिन इक्कीसवीं सदी देखिए, यहाँ लडकियां पॉलिटिक्स ज्वाइन करने में सबसे आगे नज़र आती हैं, मल्टीनेशनल कंपनियों में ऑफिस जाती हैं, वीकेंड्स सेलिब्रेट करती हैं. हर क्षेत्र में परचम लहराए हुए हैं. सिविल सर्विसेज एग्जाम के पिछले तीन सालों के टोपर्स के नाम देखिये, तीनों लड़कियां ही हैं.

यह आठवां भारत जिसे पितृसत्ता ने हमेशा द्वितीय स्तर का नागरिक समझा है उसने बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से स्वयं की स्वतंत्रता के साथ-साथ राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि आठवें भारत के सामने चुनौतियाँ नहीं हैं. इस भारत से लोग डरे हुए नहीं हैं या पितृसत्ता ने बाधाएं पैदा नहीं की हैं.

जो डरा हुआ भारत है वही नौवां इंडिया है.

इस नौवें शम्भू प्रताप सिंह राठौर जैसे यौन शोषक अधिकारी भी शामिल हैं, निर्भया केस के छः क्रूर अपराधी भी शामिल हैं. साथ ही रेप पर बेहद अशोभनीय और बेहूदा बयान- ‘लड़कों से गलतियाँ हो जाती हैं.’ देने वाले मुलायम सिंह जैसे कई राजनेता भी शामिल हैं.

दहेज़ हत्याएं करने वाले लोग भी शामिल हैं. पत्नियों को पीटने वाले पति भी शामिल हैं. बेटियों को कोख मारने वाले, अशिक्षित रखने वाले माँ-बाप भी शामिल हैं. धर्म-संस्कृति के नाम पर औरतों की स्वतंत्रता छीनने वाले लोग, धर्म-गुरु भी शामिल हैं और ऐसे धार्मिक कानून भी.

सड़क पर बेहूदा फब्तियां कसने वाले लोग भी और लड़कियां छेड़ने वाले लोग भी.

कित्नु आठवां भारत- स्त्रियों का भारत इनसे डरने वाला नहीं है.

जब श्रीराम सेने बैंगलोर में पबों में महिलाओं को संस्कृति के नाम पर पीटती हैं वो स्त्रियाँ भी पिंक-चड्डी कैम्पेन चलाकर मुंहतोड़ जवाब देती हैं.

जब तीन-तलाक़ जैसी व्यवस्था क्रूरता की हदें पार कर देती है तो अधिकार पाने ‘ऑल इंडिया मुस्लिम महिला आन्दोलन’ न्यायपालिका का सहारा लेकर सारी व्यवस्था को ही गैर-कानूनी साबित कर देता है.

जब शनि शिगनापुर या हाजी अली में पूजा/प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है तो तृप्ति देसाई और भूमाता ब्रिगेड आन्दोलन खड़ा कर अपना हक वापिस प्राप्त करते हैं.

आठवां इंडिया नौवें इंडिया से डरा हुआ नहीं है. वह इसकी जड़े हिलाने में समर्थ है, और उसने  हिला के भी रख दिया है.

मैं सफल स्त्रियों में कई बड़े नाम- इंदिरा गाँधी, किरण मजूमदार शॉ, इला भट्ट, चंदा कोचर इत्यादि उदाहरण स्वरुप ले सकता हूँ किन्तु मैं यहाँ अपने मित्रों- रीना, शुचि, प्रतीक्षा, याशिका, निशा, रोशनी आदि के नाम लेना चाहूँगा जिनकी स्वतंत्रता, समर्थता, कार्यकुशलता, निर्णय लेने की क्षमता, सोच और सफलता खुद में एक मिसाल है.

इनकी सफलता मैं इनके अलावा इनके माता-पिता का भी अपूर्व योगदान है. मेरी मित्र निवेदिता जब अपनी फोटो के साथ कैप्शन में यह लिखती है- ‘The portrait of amazing parents of a girl child.’ तो उनके संघर्ष और मेहनत सर्व-दृश्य होते है.

हालाँकि मैं यह दावा नहीं कर सकता कि कार्यस्थल तक का सफ़र और कार्यस्थल पर उन्हें पूर्णतः सुरक्षा मुहैया हुई है.

विशाखा गाइडलाइन्स ही 1997 में आई थीं. उसके पहले तक कार्यस्थल पर सुरक्षा के नाम पर गाइडलाइन्स तक नहीं थीं.

कार्यस्थल पर असुरक्षा और कार्यस्थल तक पहुँचाने में असुरक्षा को लेकर मुझे दो बड़े केस क्रमश: - रसिका राजू केस (जनवरी २०१७, इनफ़ोसिस पुणे) और प्रतिभा श्रीकाँटा मूर्ति केस (दिसम्बर 2005, बैंगलोर) याद हैं. लेकिन इनके बारे में किसी अन्य आर्टिकल में बात करेंगे.

विश्व बैंक अनुसार अगर Women Workforce Participation अभी के लगभग इक-चौथाई से 100% हो गया तो देश की जीडीपी 60% तक बढ़ जाएगी!

मुझे उम्मीद ही नहीं यकीन है कि ऐसा होगा क्यूंकि आठवाँ भारत नौवें भारत से न तो डरा हुआ है न डरने वाला है.

अंत में, मुझे यह लेख लिखने की आवश्यकता हुई मतलब अभी भी बहुत कुछ किया जाना जरूरी है और इसके लिए तमाम निजी-सरकारी प्रयास और सुरक्षा के कई उपाय आवश्यक होंगे तथा समाज और पुलिस का नजरिया बदलने की भी आवश्यकता होगी.

साथ ही, यह आपको तय करना है कि आप कौन से भारत से हैं- आठवें या नौवें? 

कमला भसीन अनुसार पितृसत्ता का मतलब पुरुषों द्वारा स्त्रियों से दोयम दर्ज़े का व्यवहार करना नहीं है बल्कि इसका मतलब है लिंग से परे किसी भी के द्वारा स्त्री को दूसरे दर्ज़े के नागरिक की तरह व्यवहार करना, उनके विकास में रुकावटें डालना. इसलिए महिलायें भी पितृसत्तात्मक हो सकती हैं.


Saturday, November 18, 2017

India As I Know: The Story of Seventh India

छठवें इंडिया में हमने बसंती बाई की बात की थी. सातवें भारत के लिए मैं कुछ अन्य प्रत्यक्ष उदाहरण लेना चाहूँगा.

ये उदाहरण मेरे मित्र दीप्ति, अमन, महिमा और एक युवा सरपंच छवि राजावत के हैं.

दीप्ति मल्टीनेशनल कंपनी इनफ़ोसिस में इंजिनियर हैं और मैसूर में कार्यरत हैं. लेकिन वे इसके अलावा कुछ और भी हैं. वह Office Hours के बाद और वीकेंड्स में सरकारी स्कूल में पढ़ाने जाती हैं. जैसा कि आपको पूर्व-विदित है सरकारी स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं और सरकारी स्कूलों की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है.
उनका यह प्रयास बेहद सराहनीय कदम हैं और सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी से निपटने में सहायक है.
हालाँकि मैं यह दावा नहीं कर रहा कि उनके प्रयासों से पलक झपकते ही शिक्षा की तस्वीर उस स्कूल में बदल गई है किन्तु उन्होंने जो प्रयास किये ऐसे प्रयास सराहनीय हैं और सिर्फ वह ही नहीं अन्य युवा भी ऐसे प्रयास कर रहे हैं.

ये प्रयास स्वयं के स्तर पर हैं और वीकेंड पर मस्ती में, घूमने-फिरने में या आराम करने में समय व्यतीत करने की बजाये राष्ट्रहित में काम करने में मुफ्त में लगाया जा रहा स्वयं की ऊर्जा और वक़्त है.  

दूसरा उदहारण डॉ अमन का है. वे एक मानसिक चिकित्सा अधिकारी हैं और मेरे बेहतरीन मित्र हैं.

मानसिक चिकित्सा की स्थिति भारत में अत्यधिक ख़राब है और मध्यप्रदेश में मात्र दो मानसिक चिकित्सालय है- एक इंदौर में, दूसरा ग्वालियर में.

डॉ अमन ने ग्रामीण इलाकों में विभिन्न कैंप लगाकर ग्वालियर के ग्रामीण क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सन्देश पहुँचाया है. न सिर्फ इंदौर के चिकित्सालय में चाइल्ड साइकाइट्री वार्ड शुरू करने में मदद की बल्कि ग्वालियर में स्कूलों में कैंप लगाकर जागरूकता बढ़ाई है. जहाँ चाइल्ड साइकोलोजिस्ट और साइकेट्रिस्ट की भारत में अत्यधिक कमी है वहां अमन अकेले ही जागरूकता फैलाने में जुटे हुए हैं.

यह एक बेहतरीन उदहारण है एक युवा का जॉब में रहते हुए लीग से हटकर बेहतरीन काम करने का.
तीसरा उदाहरण महिमा का है. ये पुणे में एक सॉफ्टवेयर प्रोफेसनल हैं. इन्होने कैंसर से पीड़ित व्यक्तियों के लिए विग (Wig) बनाने के लिए अपने बाल दान किये हैं.

यह आपको एक मामूली सा प्रयास लग सकता है किन्तु सही मायने में यह इतना भी मामूली नहीं है.ये उन प्रयासों में से एक है जो स्वयं के सस्तर पर स्वयं की प्रेरणा से किया गया है.

ये इन युवाओं की सामाजिक चेतना और समाज और राष्ट्र के लिए किये गये प्रयासों को प्रदर्शित करता है.

अंतिम उदाहरण बेहद ताकतवर उदाहरण है. यह छवि राजावत का उदाहरण है, जिनके बारे में शायद आपने भी सुना होगा. मायो गर्ल्स कॉलेज से स्कूली शिक्षा, दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और बाद में पुणे यूनिवर्सिटी से एमबीए करने वाली इस उच्च शिक्षित युवती ने कार्लसन ग्रुप, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, एयरटेल इत्यादि में जॉब करने के बाद अपने पैतृक गाँव का विकास करने की ठानी. अपने पैतृक ग्राम सोदा (जयपुर, राजस्थान) में उन्होंने सरपंच का चुनाव लड़ा और चयनित हुईं.

कॉर्पोरेट जॉब और सिटी लाइफ जिनके पीछे आजकल युवा तेज़ी से भागते हैं, उन्हें छोड़ गाँव में आकर विकास करने का निर्णय आसान नहीं रहा होगा.

छवि ने रेन वाटर हार्वेस्टिंग, हर घर में शौचालय, पीने योग्य पानी की व्यवस्था जैसे प्रोजेक्ट बड़ी कुशलता और सफलता से संचालित किये.

छवि ने न सिर्फ ग्रामीण राजस्थान की छवि बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की बल्कि आज युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत का काम भी वे कर रही हैं.

ये चारों उदहारण बिलकुल अलग-अलग हैं, अलग-अलग फील्ड से हैं, अलग-अलग जगह के हैं किन्तु इनमें एक समानता है- चारों युवा हैं.

ये युवा स्व-निर्मित युवा हैं जो अपने अपने स्तर पर राष्ट्र निर्माण में संलग्न हैं. दीप्ति के पिता रिटायर्ड PSU कर्मचारी हैं, अमन के पिता एयरफोर्स में रहे हैं, महिमा बुंदेलखंड से आती है और उनके पिता व्यापार करते हैं एवं छवि के पिता जयपुर में कार्यरत हैं.

ये युवा न तो किसी अम्बानी, गाँधी या यादव परिवार से ताल्लुक रखते हैं कि सीधे किसी कंपनी के सीईओ बनकर या किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री/उप-मुख्यमंत्री बनकर देश-निर्माण/राष्ट्र-विकास के दावे ठोकें; और न ही बृहद स्तर पर कोई आन्दोलन चला रहे हैं किन्तु स्वयं के स्तर पर जो बन पड़े वह करने का प्रयास कर रहे हैं.

यह सातवाँ इंडिया है. युवाओं का भारत.

65% से ज्यादा जनसँख्या भारत में 35 से कम उम्र के युवाओं की है और वे विभिन्न समस्याओं से गुजर रहे हैं-

1.       शिक्षा एवं उच्च शिक्षा सम्बन्धी समस्याएं. ( रवीश की यूनिवर्सिटी सीरीज इसके लिए आप NDTV पर देख सकते हैं.)
2.       स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं
3.       कौशल विकास और कौशल निर्माण का अभाव
4.       यौन जागरूकता और यौन शिक्षा का अभाव
5.       पथ प्रदर्शको और नव-उद्योग शुरू करने में फण्ड का अभाव

भारत इस जनसांख्यिकी लाभांश से आर्थिक उन्नति हासिल कर सकता है अगर इन युवाओं में सपने भरे, इनके लिए नई दिशा प्रदान करने में सक्षम हो.

भारतीय युवा इतने ऊर्जावान और सोचपरक हैं कि स्वयं के अलावा वंचितों के लिए भी प्रयास कर सकते हैं. दीप्ति, अमन, महिमा, छवि तो हमारे सामने उदहारण स्वरुप हैं ही.

शिक्षित युवाओं का यह देश एक अद्भुत भारत है जो अपनी सीमायें, अपने परिवेश से निकल न सिर्फ स्वयं का विकास बल्कि देश बदलने की चाह भी रखता है.

इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण हमने अन्ना आन्दोलन और निर्भया केस के बाद के आन्दोलनों में देखा था.
जहाँ लाखों की संख्या में युवा सड़कों पर आकर देश की सरकार से उसके कामों का हिसाब मांग रहे थे. सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए थे. भारतीय पुलिस तंत्र से निर्भया केस जैसे कृत्यों के कारणों का हिसाब ले रहे थे.

स्वयं की सुरक्षा और देश का प्रश्न लिए जमा हुए ये युवक-युवतियां युवा-शक्ति के तो परिचायक थे ही साथ ही 1991 के बाद उपजे नव-मध्यमवर्ग के विकास और उसकी सामाजिक चेतना के विकास की भी कहानी कह रहे थे.


सातवाँ भारत इन्हीं ऊर्जावान, राष्ट्रहित में संलग्न, कुछ कर गुजरने का जज़्बा लिए हुए युवाओं का भारत है.

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References:
 villagesoda.org
 Chhavi's interviews on youtube
 Anna Andolan and Nirbhaya case coverage by indianexpress.com
 2011 census data from censusindia.gov.in