Monday, December 26, 2016

भाषा और पर्यावरण / अनुपम मिश्र

किसी समाज का पर्यावरण पहले बिगड़ना शुरू होता है या उसकी भाषाहम इसे समझ कर संभल सकने के दौर से तो अभी आगे बढ़ गए हैं. हम विकसित हो गए हैं.

भाषा यानी केवल जीभ नहीं. भाषा यानी मन और माथा भी. एक का नहींएक बड़े समुदाय का मन और माथाजो अपने आसपास के और दूर के भी संसार को देखनेपरखनेबरतने का संस्कार अपने में सहज संजो लेता है. ये संस्कार बहुत कुछ उस समाज के मिट्टी,पानीहवा में अंकुरित होते हैंपलतेबढ़ते हैं और यदि उन में से कुछ मुरझाते भी हैं तो उनकी सूखी पत्तियां वहीं गिरती हैंउसी मिट्टी में खाद बनाती हैं. इस खाद यानी असफलता की ठोकरों के अनुभव से भी समाज नया कुछ सीखता है.

लेकिन कभीकभी समाज के कुछ लोगों का माथा थोड़ा बदलने लगता है. यह माथा फिर अपनी भाषा भी बदलता है. यह सब इतने चुपचाप होता है कि समाज के सजग माने गए लोगों के भी कान खड़े नहीं हो पाते. इसका विश्लेषणइसकी आलोचना तो दूरइसे कोई क्लर्क या मुंशी की तरह भी दर्ज नहीं कर पाता.

इस बदले हुए माथे के कारण हिंदी भाषा में ५०६० बरस में नए शब्दों की एक पूरी बारात आई है. बरातिये एक से एक हैं पर पहले तो दूल्हे राजा को ही देखें. दूल्हा है विकास नामक शब्द. ठीक इतिहास तो नहीं मालूम है कि यह शब्द हिंदी में कब पहली बार आज के अर्थ में शामिल हुआ होगा. पर जितना अनर्थ इस शब्द ने पर्यावरण के साथ किया हैउतना शायद ही किसी और शब्द ने पर्यावरण के साथ किया हो.

विकास शब्द ने माथा बदला और फिर उसने समाज के अनगिनत अंगो की थिरकन को थामा. अंग्रेजों के आने से ठीक पहले तक समाज के जिन अंगों के बाकायदा राज थेवे लोग इस भिन्न विकास की अवधारणा के कारण आदिवासी कहलाने लगे. नए माथे ने देश के विकास का जो नया नक्शा बनायाउसमें ऐसे ज्यादतर इलाके पिछड़े शब्द के रंग से ऐसे रंगे गएजो कई पंचवर्षिय योजनाओं के झाड़ूपोंछे से भी हल्के नहीं पड़ पा रहे. अब यह हम भूल भी चुके हैं कि ऐसे ही पिछड़े इलाकों की संपन्नता सेवनों सेखनिजोंलौहअयस्क से देश के अगुआ मान लिए गए हिस्से कुछ टिके से दिखते हैं.

कुछ मुट्ठी भर लोग पूरे देश की देह काउसके हर अंग का विकास करने में जुट गए हैं. ग्राम विकास तो ठीकबाल विकासमहिला विकास सब कुछ लाईन में है.

अपने कोअपने समाज को समझे बिना उसके विकास की इस विचित्र उतावली में गजब की सर्वसम्मति है. सभी राजनैतिक दलसभी सरकारें फिर चाहे वे मिशन वाली हो या वर्ग संघर्ष वालीगर्व से विकास के काम में लगी हैं. विकास की इस नई अमीर भाषा ने एक नई रेखा भी खींची है – गरीबी की रेखा. लेकिन इस रेखा को खींचने वाले संम्पन्न लोगों की गरीबी तो देखिए कि उनकी तमाम कोशिशें रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या में कमी लाने के बदले उसे लगातार बढ़ाती जा रही हैं.

पर्यावरण की भाषा इस सामाजिकराजनीतिक भाषा से रत्तीभर अलग नहीं है. वह हिंदी भी है यह कहते हुए डर लगता है. बहुत हुआ तो आज के पर्यावरण की ज्यादातर भाषा देवनागरी कही जा सकती है. लिपि के कारण राजधानी में पर्यावरण मंत्रालय से लेकर हिंदी राज्यों के कस्बोंगांवों तक के लिए बनी पर्यावरण संस्थाओं की भाषा कभी पढ़ कर तो देखें. ऐसा पूरा साहित्यलेखनरिपोर्ट सबकुछ एक अटपटी हिंदी से पटा पड़ा है.

कचरा शब्दों का और उन से बनी विचित्र योजनाओं का ढेर लगा है. इस ढेर को पुनर्चक्रित भी नहीं किया जा सकता. दोचार नमूने देखें. सन् १९८० से आठदस बरस तक पूरे देश में सामाजिक वानिकी नामक योजना चली. किसी ने भी नहीं पूछा कि पहले यह तो बता दो कि असामाजिक वानिकी क्या हैयदि इस शब्द कायोजना का संबंध समाज के वन से है,गांव के वन से हैतो हर राज्य के गांवों में ऐसे विशिष्ट ग्रामवनपंचायती वनों के लिए एक भरा पूरा शब्द भंडारविचार और व्यवहार का संगठन काफी समय तक रहा है.

कहीं उस पर थोड़ी धूल चढ़ गई थी तो कहीं वह मुरझा गया थापर वह मरा तो नहीं था. उस दौर में कोई संस्था आगे नहीं आई इन बातों को लेकर. मरु प्रदेश में आज भी मौजूद हैं ओरणएक शब्द जो अरण्य‘ से बना है. ये गांवों के वनमंदिरदेवी के नाम पर छोड़े जाते हैं. कहीं कहीं तो मीलों फैले हैं ऐसे जंगल. इनके विस्तार कीसंख्या की कोई व्यवस्थित जानकारी नहीं है. वन विभाग कल्पना भी नहीं कर सकता कि लोग ओरणों से एक तिनका भी नहीं उठाते.

अकाल के समय में ही इनको खोला जाता है. वैसे ये खुले ही रहते हैंन कटीले तारों का घेरा हैन दीवारबंदी ही. श्रद्धाविश्वास का घेरा इन वनों की रखवाली करता रहा है. हजारबारह सौ बरस पुराने ओरण भी यहां मिल जाएंगे. जिसे कहते हैं बच्चेबच्चे की जबान पर ओरण शब्द रहा है. पर राजस्थान में अभी कुछ ही बरस पहले तक सामाजिक संस्थाएं ही नहींश्रेष्ठ वन विशेषज्ञ भी या तो इस परंपरा से अपरिचित थे या अगर जानते थे तो कुछ कुतुहल भरेशोध वाले अंदाज में. ममत्व नहीं थायह हमारी परंपरा है ऐसा भाव नहीं था उस जानकारी में.

ऐसी हिंदी की सूची लंबी हैशर्मनाक है. एक योजना देश की बंजर भूमि के विकास की आई थी. उसकी सारी भाषा बंजर ही थी. सरकार ने कोई ३०० करोड़ रुपया लगाया होगा पर यह भूमि बंजर की बंजर ही रही. फिर योजना ही समेट ली गई. और अब सबसे ताजी योजना है जलागम क्षेत्र विकास की. यह अंग्रेजी के वॉटरशेड डेवलपमेंट का हिन्दी अनुवाद है. इससे जिनको लाभ मिलेगावे लाभार्थि कहलाते हैंकहीं हितग्राही भी हैं.

यूजर्स ग्रुप‘ का सीधा अनुवाद उपयोगकर्ता समूह भी यहां है. तो एक तरफ साधन संम्पन्न योजनाएं हैंलेकिन समाज से कटी हुई. जन भागीदारी का दावा करती हैं पर जन इससे भागते नजर आते हैंतो दूसरी तरफ मिट्टी और पानी के खेल को कुछ हजार बरस से समझने वाला समाज है. उसने इस खेल में शामिल होने के लिए कुछ आनंददायी नियम,परंपराएं और संस्थाएं बनाई थीं. किसी अपरिचित शब्दावली के बदले एक बिल्कुल आत्मीय ढांचा खड़ा किया था. चेरापूंजीजहां पानी कुछ गज भर गिरता हैवहां से लेकर जैसलमेर तक जहां कुल पांचआठ इंच वर्षा हो जाए तो भी आनंद बरस गया– ऐसा वातावरण बनाया.

हिमपात से लेकर रेतीली आंधी में पानी का कामतालाब में काम करने वाले गजधरों का कितना बड़ा संगठन खड़ा किया गया होगा. कोई चारपाँच लाख गांवों में काम करने वाले उस संगठन का आकार इतना बड़ा था कि वह सचमुच निराकार हो गया. आज पानी का,पर्यावरण का काम करने वाली बड़ी से बड़ी संस्थाएं उस संगठन की कल्पना तो करके देखें. लेकिन वॉटरशेडजलागम क्षेत्र विकास का काम कर रही संस्थाएंसरकारेंउस निराकार संगठन को देख ही नहीं पातीं. उस संगठन के लिए तालाब एक वॉटर बॉडी नहीं था. वह उसकी रतन तलाई थी. झुमरी तलैया थीजिसकी लहरों में वह अपने पुरखों की छवि देखता था. लेकिन आज की भाषा जलागम क्षेत्र को मत्स्य पालन से होने वाली आमदनी में बदलती है.

इसी तरह अब नदियां यदि घर में बिजली का बल्ब न जला पाएं तो माना जाता है कि वेव्यर्थ में पानी समुद्र में बहा रही हैं. बिजली जरूर बनेपर समुद्र में पानी बहाना भी नदी का एक बड़ा काम है. इसे हमारी नई भाषा भूल रही है. जब समुद्रतटीय क्षेत्रों में भूजल बड़े पैमाने पर खारा होने लगेगा तब हमें नदी की इस भूमिका का पता चलेगा.


लेकिन आज तो हमारी भाषा ही खारी हो चली है. जिन सरलसजल शब्दों की धाराओं से वह मीठी बनती थी उन धाराओं को बिल्कुल नीरसबनावटीपर्यावरणीयपरिस्थितिक जैसे शब्दों से बाँधा जा रहा है. अपनी भाषाअपने ही आंगन में विस्थापित हो रही है. वह अपने ही आंगन में पराई बन रही है.

Thursday, December 22, 2016

स्त्री के सपने


मेरे साथ जो स्त्री रहती है
वो सोती है, उसके सपने जागते हैं.
वो रोती है,
उसके सपने झरते हैं.
वो सीने से लगती है,
हिदायत देती सी लगती है,
कि उसके सपने न मरोड़ूँ.

मैं आदमी हूँ,
मेरा दम्भ
उसके सपनों पे धाड़ से पड़ता है
छनाक! उसके सारे सपने टूट जाते हैं.

वो एक आस लिए
फिर रोटी संग सपने बेलती है
चूल्हे पे आंच देती है,
कि मैं कायर किसी दिन
मर्द बनूँगा
और उसके सपने नहीं तोड़ूंगा.

मैं आदमी हूँ,
सभ्यता के आदि से कायर ही हूँ!

WW-I के घोड़े


तुम्हें चाहिए थी ज़मीनें
तुम्हें चाहिए थे राजपाट
तुम्हारी कलहें, तुम्हारी बंदूकें,
फिर हम क्यों मरे?
विश्वयुद्ध-एक के
मरे अस्सी लाख घोड़ों-खच्चरों का हिसाब दो मानव.
बताओ, तुम्हारी लड़ाई में हम क्यों मरे?
एक दिन
प्रार्थनाएं, तप, तमाम भागीरथी प्रयास कर
हम पाएंगे बुद्धि,
लेकिन तब भी
तुम्हारी नथों में न डालेंगे रस्सी.
न पीठ पे चढ़ दौड़ाएंगे तुम्हें,
अस्सी लाख क्या,
एक भी नहीं मरोगे तुम.
क्योंकि हम नहीं करेंगे कोई विश्वयुद्ध.
हम खुद में भी देंगे बराबरी का दर्ज़ा,
बाकि की तमाम नस्लों को भी.
उपनिवेशन, गुलामी और नस्लें पालतू बनाने से परे,
हम ऐसी बुद्धि चाहेंगे
जो समता, समरसता, समानता लाये-
नस्लों के परे, क्लासों के परे,
मुल्कों के परे, रंगों के परे.
हम तुम्हें जानवर नहीं कहेंगे मानव.

Wednesday, December 21, 2016

प्रलय का शिलालेख /अनुपम मिश्र


                        उत्तराखंड में हिमालय और उसकी नदियों के तांडव का
                        आकार प्रकार अब धीरेधीरे दिखने लगा है.
                        लेकिन मौसमी बाढ़ इस इलाके में नई नहीं है.
                        अनुपम मिश्र का सन 1977 में लिखा एक यात्रा वृतांत


सन् 1977 की जुलाई का तीसरा हफ्ता. उत्तरप्रदेश के चमोली जिले की बिरही घाटी में आज एक अजीबसी खामोशी है. यों तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा है और इस कारण अलकनंदा की सहायक नदी बिरही का जल स्तर बढ़ता जा रहा है. उफनती पहाड़ी नदी की तेज आवाज पूरी घाटी में टकरा कर गूंज भी रही है. फिर भी चमोलीबदरीनाथ मोटर सड़क से बाईं तरफ लगभग 22 किलोमीटर दूर 6,500 फुट की ऊंचाई पर बनी इस घाटी के 13 गांवों के लोगों को आज सब कुछ शांतसा लग रहा है.

आज से सिर्फ सात बरस पहले ये लोग प्रलय की गर्जना सुन चुके थेदेख चुके थे. इनके घरखेत व ढोर उस प्रलय में बह चुके थे. उस प्रलय की तुलना में आज बिरही नदी का शोर इन्हें डरा नहीं रहा था. कोई एक मील चौड़ी और पांच मील लंबी इस घाटी में चारों तरफ बड़ीबड़ी शिलाएंपत्थररेत और मलबा भरा हुआ हैइस सब के बीच से किसी तरह रास्ता बना कर बह रही बिरही नदी सचमुच बड़ी गहरी लगती है.

लेकिन सन् 1970 की जुलाई का तीसरा हफ्ता ऐसा नहीं था. तब यहां यह घाटी नहीं थी,इसी जगह पर पांच मील लंबाएक मील चौड़ा और कोई तीन सौ फुट गहरा एक विशाल ताल थाः गौना ताल. ताल के एक कोने पर गौना था और दूसरे कोने पर दुरमी गांवइसलिए कुछ लोग इसे दुरमी ताल भी कहते थे. पर बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए यह बिरही ताल थाक्योंकि चमोलीबदरीनाथ मोटर मार्ग पर बने बिरही गांव से ही इस ताल तक आने का पैदल रास्ता शुरू होता था.

ताल के ऊपरी हिस्से में त्रिशूल पर्वत की शाखा कुंवारी पर्वत से निकलने वाली बिरही समेत अन्य छोटीबड़ी चार नदियों के पानी से ताल में पानी भरता रहता था. ताल के मुंह से निकलने वाले अतिरिक्त पानी की धारा फिर से बिरही नदी कहलाती थी. जो लगभग 18 किलोमीटर के बाद अलकनंदा में मिल जाती थी. सन् 1970 की जुलाई के तीसरे हफ्ते ने इस सारे दृश्य को एक ही क्षण में बदल कर रख दिया.

दुरमी गांव के प्रधानजी उस दिन को याद करते हैं – “तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा था. पानी तो इन दिनों हमेशा गिरता हैपर उस दिन की हवा कुछ और थी. ताल के पिछले हिस्से से बड़ेबड़े पेड़ बहबह कर ताल के चारों ओर चक्कर काटने लगे थे. ताल में उठ रही लहरें उन्हें तिनकों की तरह यहां से वहांवहां से यहां फेंक रही थीं. देखतेदेखते सारा ताल पेड़ों से ढंक गया. अंधेरा हो चुका थाहम लोग अपनेअपने घरों में बंद हो गए. घबरा रहे थे कि आज कुछ अनहोनी हो कर रहेगी.” खबर भी करते तो किसे करतेजिला प्रशासन उनसे 22 किलोमीटर दूर था. घने अंधेरे ने इन गांव वाले को उस अनहोनी का चश्मदीद गवाह न बनने दिया. पर इनके कान तो सब सुन रहे थे.

प्रधानजी बताते हैं – “रात भर भयानक आवाजें आती रहीं फिर एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई और फिर सब कुछ ठंढ़ा पड़ गया.” ताल के किनार की ऊंची चोटियों पर बसने वाले इन लोगों ने सुबह के उजाले में पाया कि गौना ताल फूट चुका हैचारों तरफ बड़ीबड़ी चट्टानों और हजारों पेड़ों का मलबाऔर रेतहीरेत पड़ी है.

ताल की पिछली तरफ से आने वाली नदियों के ऊपरी हिस्सों में जगहजगह भूस्खलन हुआ थाउसके साथ सैकड़ो पेड़ उखड़उखड़ कर नीचे चले आए थे. इस सारे मलबे को,टूट कर आने वाली बड़ीबड़ी चट्टानों को गौना ताल अपनी 300 फुट की गहराई में समाता गयासतह ऊंची होती गईऔर फिर लगातार ऊपर उठ रहे पानी ने ताल के मुंह पर रखी एक विशाल चट्टान को उखाड़ फेंका और देखते ही देखते सारा ताल खाली हो गया. घटना स्थल से केवल तीन सौ किलोमीटर नीचे हरिद्वार तक इसका असर पड़ा था.

गौना ताल ने एक बहुत बड़े प्रलय को अपनी गहराई में समो कर उसका छोटा सा अंश ही बाहर फेंका था. उसने सन् 1970 में अपने आप को मिटा कर उत्तराखंडतराई और दूर मैदान तक एक बड़े हिस्से को बचा लिया था. वह सारा मलबा उसके विशाल विस्तार और गहराई में न समाया होता तो सन् 70 की बाढ़ की तबाही के आकड़े कुछ और ही होते. लगता है गौना ताल का जन्म बीसवीं सदी के सभ्यों की मूर्खताओं से आने वाले विनाश को थाम लेने के लिए ही हुआ था.

ठीक आज की तरह ही सन् 1893 तक यहां गौना ताल नहीं था. उन दिनों भी यहां एक विशाल घाटी ही थी . सन् 1893 में घाटी के संकरे मुंह पर ऊपर से एक विशाल चट्टान गिर कर अड़ गई थी. घाटी की पिछली तरफ से आने वाली बिरही और उसकी सहायक नदियों का पानी मुंह पर अड़ी चट्टान के कारण धीरेधीरे गहरी घाटी में फैलने लगा. अंग्रेजों का जमाना थाप्रशासनिक क्षमता में वे सन् 1970 के प्रशासन से ज्यादा कुशल साबित हुए. उस समय जन्म से रहे गौना ताल के ऊपर बसे एक गांव में तारघर स्थापित किया और उसके माध्यम से ताल के जल स्तर की प्रगति पर नजर रखे रहे.

एक साल तक वे नदियां ताल में भरती रहीं. जलस्तर लगभग 100 गज ऊंचा उठ गया. तारघर ने खतरे का तार नीचे भेज दिया. बिरही और अलकनंदा के किनारे नीचे दूर तक खतरे की घंटी बज गई. ताल सन् 1894 में फूट पड़ापर सन् 1970 की तरह एकाएक नहीं. किनारे के गांव खाली करवा लिए गए थेप्रलय को झेलने की तैयारी थी. फूटने के बाद 400 गज का जल स्तर 300 फुट मात्र रह गया था. ताल सिर्फ फूटा थापर मिटा नहीं था. गोरे साहबों का संपर्क न सिर्फ ताल से बल्कि उसके आसपास की चोटियों पर बसे गांवों से भी बना रहा. उन दिनों एक अंग्रेज अधिकारी महीने में एक बार इस दुर्गम इलाके में आकर स्थानीय समस्याओं और झगड़ों को निपटाने के लिए एक कोर्ट लगाता था. विशाल ताल साहसी पर्यचकों को भी न्यौता देता था. ताल में नावें चलती थीं.

आजादी के बाद भी नावें चलती रहीं. सन् 1960 के बाद ताल से 22 किलोमीटर की दूरी में गुजरने वाली हरिद्वार बदरीनाथ मोटरसड़क बन जाने से पर्यटकों की संख्या भी बढ़ गई. ताल में नाव की जगह मोटर बोट ने ले ली. ताल में पानी भरने वाली नदियों के जलागम क्षेत्र कुंआरी पर्वत के जंगल भी सन् 1960 से 1970 के बीच में कटते रहे. ताल से प्रशासन का संपर्क सिर्फ पर्यटन के विकास के नाम पर कायम रहा. वह ताल के ईर्दगिर्द बसे 13 गांवों को धीरधीरे भूलता गया.

मुख्य मोटर सड़क से ताल तक पहुंचने के लिए (गांवों तक नहीं) 22 किलोमीटर लम्बी एक सड़क भी बनाई जाने लगी. सड़क अभी 12 किलोमीटर ही बन पाई थी कि सन् 1970 की जुलाई का वह तीसरा हफ्ता आ गया. ताल फूट जाने के बाद सड़क पूरी करने की जरूरत ही नहीं समझी गई. सन् 1894 में गौना ताल के फटने की चेतावनी तार से भेजी थीपर सन् 1970 में ताल फटने की ही खबर लग गई.

बहरहालअब यहां गौनाताल नहीं है. पर उसमें पड़ी बड़ीबड़ी चट्टानों पर पर्यावरण का एक स्थायी लेकिन अदृश्य शिलालेख खुदा हुआ है. इस क्षेत्र में चारों तरफ बिखरी ये चट्टानें हमें बताना चाहती हैं कि हिमालय मेंखासकर नदियों के पनढ़ालों में खड़े जंगलों का हमारे पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है. ऐसे हिमालय मेंदेवभूमि में हम कितना धर्म करें,कितना अधर्म होने देंकितना विकास करेंकितनी बिजली बनाएं– यह सब इन बड़ीबड़ी चट्टानोंशिलाओं पर लिखा हुआ हैखुदा हुआ है.


क्या हम इस शिलालेख को पढ़ने के लिए तैयार हैं ?

माँ / गुलज़ार

तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
ढूँढा करता हूं तुम्हें
अपने चेहरे में ही कहीं
लोग कहते हैं
मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं
यूं तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर प्यासी हैं
कान में छेद है
पैदायशी आया होगा
तूने मन्नत के लिये
कान छिदाया होगा
सामने दाँतों का वक़्फा है
तेरे भी होगा
एक चक्कर
तेरे पाँव के तले भी होगा
जाने किस जल्दी में थी
जन्म दिया, दौड़ गयी
क्या खुदा देख लिया था
कि मुझे छोड़ गयी
मेल के देखता हूं
मिल ही जाए तुझसी कहीं
तेरे बिन ओपरी लगती है
मुझे सारी जमीं
तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं

Sunday, December 18, 2016

उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती

उन लोगों को कवितायेँ समझ नहीं आती
जिन्होंने जीने से पहले
जीने की तैयारियां की.
जिन्होंने पांव रखने से पहले
नापे अपने पांव
नापी ज़मीन पे पड़ी धूल.
जिन्होंने बच्चे किये पैदा
और होते ही तय कर दिए उनके भविष्य.
जिन्होंने पहली बार ही चूमी अपनी प्रेमिका
और देख लिए ज़िन्दगी भर के सपने.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती
जिनकी रातों में चैन की नींद है
जिनके घर के गुसलखाने में
पानी दिनभर आता है
जिनको बचपन से सभ्यता के
भारीभरकम पाठ पढाये गए.
जिनकी बीवियां घर में घुसे घुसे
रोटियां बना ही मनोरंजित हो जाती हैं.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती
जो करियर के नाम बन गए पंसारी
जिन्हें जीवन ने बना दिया व्यापारी
जो ऑफिस जा रहे हैं, आ रहे हैं
खुश हैं कि खा रहे हैं.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती

उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती
जिनकी कॉफीटेबल पे ही
हो जाती हैं सरकारी योजनाएं अच्छी-बुरी.
जिनके घर में चलती हैं बासी ख़बरें
या जोर-शोर बहसों वाले टीवी चैनल
जिनको नहीं शालीनता की आदत.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

जिन्हें फिल्मों का मतलब है
एक लड़का-एक लड़की, दो घूंसे और विलन।
किताबें जिन्होंने रद्दी में बेचीं
अख़बार के नाम 'डेल्ही टाइम्स' ही पढ़ा
उरेजों-उभारों से बाहर नहीं निकली स्त्री जिनके अंत:करण से.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

जिनकी बेटियां
पिता से नहीं मिला पाईं अपने प्रेमी
जिनके बेटे
छुपा गए सारे सच.
जिन्होनें बेटों को
कभी नहीं सिखाये इश्क़ के गुर
और जिनके पिता मरे वृद्धाश्रम में.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

जिन्हें नशा नहीं हुआ कभी
इश्क़-मुश्क़, आशिक़ी-मौसिक़ी का.
जिनके टूटे नहीं दिल,
घर थे जिनके बिल.
जो कभी न अनिद्रा के शिकार हुए.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती

जो सामाजिक संरचना में व्यवस्थित हैं
और छटपटाहट अंदर नहीं हुई जिनके
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती,
जिनके अनुसार पटरी पर है ज़िन्दगी उनकी
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

Thursday, December 15, 2016

नौजवान ख़ातून से / मजाज़ लखनवी

हिजाब ऐ फ़ितनापरवर अब उठा लेती तो अच्छा था
खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था

तेरी नीची नज़र खुद तेरी अस्मत की मुहाफ़िज़ है
तू इस नश्तर की तेज़ी आजमा लेती तो अच्छा था

तेरी चीने ज़बी ख़ुद इक सज़ा कानूने-फ़ितरत में
इसी शमशीर से कारे-सज़ा लेती तो अच्छा था

ये तेरा जर्द रुख, ये खुश्क लब, ये वहम, ये वहशत
तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था

दिले मजरूह को मजरूहतर करने से क्या हासिल
तू आँसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था

तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मोत का तारा है
अगर तू साजे बेदारी उठा लेती तो अच्छा था

तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

Tuesday, December 13, 2016

कैसे पूरा होगा सबको घर का सपना

मानव सभ्यता की विकास यात्रा में जब लोगों ने एक जगह बसना शुरू किया तो घर एक अहम बुनियादी जरूरत के रूप में सामने आया। समय के प्रवाह में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन एक अदद मकान आज भी लोगों के पहले सपने में शामिल है। आजादी के बाद से ही रोटी, कपड़ा और मकान हमारी प्राथमिकता में सबसे ऊपर रहे हैं। यह बात और है कि ये प्राथमिकताएं कभी पूरी नहीं हो पार्इं। कभी धन की कमी, कभी राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, कभी योजनाओं का ठीक से क्रियान्वयन न हो पाना तो कभी लाभार्थियों की पहचान में गड़बड़ियां। सिर पर छत का सपना विशाल आबादी खासकर निचले तबके के लिए सपना ही बना रहा।
अब नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘सबके लिए आवास’ योजना की घोषणा की है। तय किया गया है कि 2022 तक सभी भारतीयों को घर मुहैया करा दिया जाएगा। सरकार का कहना है कि उसने पहले की सरकार की इंदिरा आवास योजना की विफलता से सबक सीखा है और नई योजना में पुरानी खामियों को दूर कर दिया गया है। नई योजना शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में एक साथ काम करेगी। सरकार ने आगामी तीन साल में तकरीबन एक करोड़ घर बनाने का लक्ष्य रखा है। क्या इस रफ्तार से लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है? देश भर में घरों की मांग और आपूर्ति का अंदाजा लगाने के लिए सरकार ने एक समिति का गठन किया था। समिति के मुताबिक शहरों में लगभग दो करोड़ घरों की कमी है और ग्रामीण इलाकों में इसके दोगुने से थोड़ा ज्यादा यानी पांच करोड़ के आसपास घरों की कमी है। सरकार की योजना है कि नरम शुरुआत करके बाद के सालों में तेजी से घरों का निर्माण किया जाए। हालांकि इस राह में कई मुश्किलें भी हैं। पहला, बहुत-से जानकारों ने सरकार के आंकड़े पर सवाल उठाया है। 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर किए गए नमूना सर्वेक्षणों से भारतीय सांख्यिकीय संस्थान के शोधकर्ताओं का कहना है कि देश में घरों की वास्तविक मांग सरकारी आंकड़े से तिगुनी यानी इक्कीस करोड़ से ज्यादा है।
केपीएमजी जैसी परामर्शदाता संस्थाओं ने भी देश में घरों की मांग सरकारी आंकड़े से ज्यादा बताई है। ऐसे में सरकार के अभियान से जरूरतमंद लोगों के छूट जाने का खतरा बना हुआ है। दूसरा सवाल योजना के वित्तपोषण से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने तीन साल के लिए तकरीबन अस्सी हजार करोड़ रुपए की राशि मंजूर की है। इसमें से लगभग बीस हजार करोड़ रुपए नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक) से कर्ज लेकर जुटाए जाएंगे। किसी घर की निर्माण लागत में केंद्र सरकार का हिस्सा साठ फीसद होगा और बाकी चालीस फीसद योगदान राज्य सरकारों को करना होगा। पहले केंद्र और राज्य सरकारों के बीच यह अनुपात अस्सी और बीस फीसद का था। सही बात है कि राज्यों को चौदहवेंं वित्त आयोग से ज्यादा रकम मिलेगी, फिर भी राज्यों की माली हालत को देखते हुए कहा जा सकता है कि चालीस फीसद का बोझ कुछ ज्यादा ही होगा।
खासकर गरीब राज्यों में वित्तीय मोर्चे पर लेटलतीफ हो सकती है। बहुधा देखा गया कि लाभार्थियों को पहली किस्त मिल जाती है लेकिन समय पर दूसरी किस्त नहीं मिल पाती है। जब तक दूसरी किस्त मिलती है तब तक पहले चरण में किए गए निर्माण-कार्य की हालत खस्ता हो जाती है। मकान की निर्माण-लागत में इजाफा हो जाता है और लाभार्थी तय मानक का घर नहीं बनवा पाता है। यह भी सच है कि घरविहीन लोगों की सबसे बड़ी तादाद भी गरीब राज्यों में है। बेहतर होता कि केंद्र और राज्य सरकारें पहले इस योजना की प्रस्तावित रकम को किसी कोष में इकट्ठा कर लेतीं और वहां से सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में हस्तांतरित किया जाता।
तीसरी अहम बात। आवास संबंधी पुरानी योजनाओं की असफलता का एक बड़ा कारण था कि लाभार्थियों की पहचान पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से नहीं की गई थी। जरूरतमंदों के नाम छूट गए, वहीं दबंग लोग योजना का नाजायज फायदा उठाने में कामयाब रहे। सरकार का कहना है कि इस बार 2011 की आर्थिक-सामाजिक जनगणना के आंकड़ों से लाभार्थियों की पहचान की जाएगी। लेकिन इस काम को अंजाम देने वाला सरकारी अमला वही है और उसकी कार्यशैली भी वैसी ही है। ऐसे में दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि इस दफा लाभार्थियों की पहचान निष्पक्ष तरीके से ही होगी और वास्तविक हकदार अपने हक से वंचित नहीं होंगे।
चौथी बात है, घर की समस्या के प्रति समग्र सोच का अभाव। नई योजना (और पुरानी योजनाएं भी) केवल एक चीज पर जोर देती है और वह है चयनित लाभार्थियों के लिए घरों का निर्माण। सरकारी विभागों को लक्ष्य सौंप दिया जाता है और अधिकारी येन-केन-प्रकारेण उसे पूरा करने में जुट जाते हैं। अगर हमें वाकई हर भारतीय के सिर पर छत मुहैया करवानी है तो इस समस्या के सभी पहलुओं पर विचार करते हुए योजना बनानी होगी। मसलन, ग्रामीण और शहरी इलाकों में घरविहीन लोगों में बड़ी तादाद उन लोगों की है जिनके पास घर बनाने के लिए जमीन ही नहीं है। यह योजना घर बनाने के लिए आर्थिक मदद उपलब्ध कराती है, जमीन का इसमें कोई प्रावधान नहीं है। जाहिर है, भूमिहीन लोग इसका फायदा नहीं उठा पाएंगे।
ऐसे में सबको घर मुहैया कराने का सपना कैसे पूरा होगा? देश में बड़ी तादाद में ऐसे लोग भी हैं जो सरकारी तौर पर घरविहीन की श्रेणी में नहीं आते हैं, पर उन्हें घर की जरूरत है। उदाहरण के तौर पर, बीपीएल रेखा के थोड़ा ऊपर झूल रहे निम्न मध्यवर्गीय श्रेणी के लोग या पुराने एक कमरे के दड़बेनुमा घर में बड़े परिवार/संयुक्त परिवार के साथ घिसट रहे लोग। ऐसे लोगों को अगर सरकार सीधे मदद नहीं भी देना चाहे तो राष्ट्रीय आवास बैंक या नाबार्ड की सहायता से इनको रियायती दरों पर आवास ऋण उपलब्ध कराने की कोशिश होनी चाहिए। तब ये लोग भी अपनी न्यूनतम जरूरतों के पूरा करने लायक सुरक्षित घर बना सकेंगे और सम्मानजनक जीवनयापन कर सकेंगे।
शहरी गरीबों के लिए घर और रोजी-रोटी का सवाल आपस में नाभिनाल की तरह गुंथा हुआ है। कम आमदनी के कारण ये लोग यातायात का खर्च उठा पाने में सक्षम नहीं होते हैं, लिहाजा अक्सर कार्यस्थल के पास ही टिन-टप्पर में गुजारा करते हैं। इन लोगों के लिए घर की समस्या सुलझाते समय इस बात का खयाल रखा जाना चाहिए कि कार्यस्थलों के पास घर बनाए जाएं या घरों के पास आजीविका के अवसर उपलब्ध कराए जाएं। पढ़ने-तैयारी करने वाले विद्यार्थियों, नौकरीपेशा और अकेले रहने वाले लोगों के हितों को ध्यान में रख कर पारदर्शी किराया योजना बनाई जाए, जिसका विनियमन सरकारी एजेंसियां सुनिश्चित करें। यह जगजाहिर है कि रीयल एस्टेट के कारोबार में बड़े पैमाने पर काला धन लगा है, जिसके चलते घरों के दामों में गैरजरूरी उछाल रहता है। ऊंची कीमतों के कारण कम आमदनी वाले लोग घर नहीं खरीद पाते हैं, हालांकि जाहिर तौर पर ऐसे लोग घरविहीन नहीं हैं। ऐसे लोग किफायती दामों पर घर खरीद सकें, इसके लिए रीयल एस्टेट में काले धन के प्रवाह पर भी अंकुश लगाना होगा। अगर सरकार हर भारतीय को घर मुहैया कराने के अपने वादे को लेकर गंभीर है तो केवल घर-निर्माण पर जोर देने के बजाय एक व्यापक आवास नीति बनाए जाए जिसमें आवास ऋण, किराया, किफायती घर डिजाइन जैसे तमाम पहलू शामिल हों। एक समग्र दृष्टि अपनाकर ही इस सपने को पूरा किया जा सकता है।
http://www.jansatta.com/politics/how-will-fulfil-everyones-dream-house/192536/

ये नज़्म


उन सारी प्रेमिकाओं के नाम
जो आईं कोई करार ले,
गईं कोई दरार दे.
जो थीं तो
वादे थे, सपने थे, इरादे थे.
दिन थे, रात थी, नींद थी.
मोबाइल में सस्ते कॉल रेट के
प्लान हुआ करते थे,
घर में महक वाले
डेयोडेरेन्ट रहते थे.

अपनी कमाई से गिफ्ट देने
जिनके लिए ट्यूशन लिए मैंने.
दूसरे शहर रही जो
तो चाँद साथ तका करते थे
उस दौर में जिनके लिए हम
पैसों की किल्लत में रहा करते थे,
शहर शहर फिरा करते थे.

जो गईं तो इस तरह कुछ-
'वालिद नहीं माने कभी
हमारे सपने अलग अलग के बहाने कहीं,
साथ एक छत के नीचे रहे
फिर भी हमको वो जाने नहीं.'

दो तालियां,
तीन गलियां,
तमाम बहानों के नाम.
ये नज़्म उन सारी प्रेमिकाओं के नाम.

कर मशक्कत
हमने-तुमने सपने हज़ार बुने,
घर बनाया, सज़्ज़ा की
फिर इश्क़ में तन्हा तार चुने!

चिर यौवन न ठहरा है, न ठहरेगा
दिल जैसे धड़का है, न धड़केगा
तुम जाती थी, भले चली जाती
बस चिर-मुस्कान दिखलाती जाती
शादी में बुलाती जाती.

तेरे दूल्हे से मैं दो बातें कर लेता
गुस्सा, प्यार, ऑन-ऑफ मूड,
कब तू काइंड, कब तू रूड,
ये सब तो बतलाता जाता,
तेरा आने वाला कल
थोड़ा इजी बना जाता.

जो गईं छोड़ कर
नहीं बुलाईं ब्याह पर
घर- बाहर जिनके लिए हुए बदनाम
ये नज़्म,
उन सारी प्रेमिकाओं के नाम.

जो गईं तो गईं
कितनी रातें छोड़ गईं,
कितनी यादें छोड़ गईं

जिनके होंठों का स्वाद जुबां पर
अब भी कभी कभी आ जाता है
जिनकी सिसकी का अहसास
कभी कभी बहका जाता है.
जिनकी ऑंखें चूमे बगैर
रात न कभी बिताई थी
जिनकी शॉपिंग फ़िज़ूल की खर्चाई थी.

होंठों के नाम, आँखों के नाम
बदन पे चिपके बोसों के नाम.
ये नज़्म,
ये आखिरी नज़्म
उन सारी प्रेमिकाओं के नाम.

Sunday, December 11, 2016

जलवायु परिवर्तन पर जुबानी जमाखर्च

संयुक्त राष्ट्र की बैठक में करीब दो सौ देशों ने एक स्वर में मराकेश कार्य-घोषणा पर अपनी मुहर लगाई है और यह संकल्प भी पारित किया कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए युद्धस्तर पर काम करना होगा। सम्मेलन ने पेरिस समझौते, इसके तेजी से क्रियान्वयन, महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों, समावेशी प्रकृति और समान व साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों और अपनी-अपनी क्षमताओं के साथ जलवायु परिवर्तन से होने वाले जोखिम से निपटने के लिए कार्रवाई करने की रणनीति को अंतिम रूप दिया है। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर हुए सम्मेलन ने वर्ष 2018 तक पेरिस जलवायु करार को लागू करने की कार्ययोजना को पारित कर एकजुटता दिखाने की कोशिश की है। गौरतलब है कि यह ऐतिहासिक पहल उस वक्त की गई है जब अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस करार से अमेरिका के अलग हो जाने का इरादा जताया है।  जलवायु शिखर सम्मेलन में इस जोर दिया गया कि विकसित देश क्योटो प्रोटोकाल में तय अपनी-अपनी प्रतिबद्धताओं के अनुरूप उत्सर्जन कम करने के लिए जल्द और जरूरी कदम उठाएं। क्योटो प्रोटोकाल वर्ष 2020 में समाप्त होगा। मराकेश सम्मेलन का इरादा तो निश्चित रूप से नेक है लेकिन कई अहम मुद््दों पर कामयाबी न मिलना दुखद है। मराकेश सम्मेलन में कृषि, वित्त अनुकूलन व वर्ष 2020 से पहले के सुझावों सहित कई महत्त्वपूर्ण मुद््दों पर ज्यादा चर्चा नहीं हो पाई। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तीय मदद तक पहुंच- वर्ष 2020 से पहले और वर्ष 2020 के बाद- दोनों अवधियों में विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गई है। यह बात भारत को भी कुरेद रही है।
दरअसल, नई वैश्विक ऊर्जा रणनीति के बगैर, जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन उत्सर्जन बढ़ता ही रहेगा और वैज्ञानिकों की मानें तो इसका प्रभाव दस हजार वर्षों तक रहेगा। मराकेश जलवायु सम्मेलन में शोधकर्ताओं की इस नई चेतावनी पर जरूर चर्चा हुई जिसमें कहा गया है कि बढ़ते वैश्विक ताप, बर्फ की चादरों और ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्री जलस्तर का बढ़ना, जलवायु परिवर्तन के उन परिणामों में शामिल है जिससे कि आखिरकार समुद्रतटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाएंगे। समुद्रतटीय क्षेत्रों में एक करोड़ तीन लाख लोग रह रहे हैं। मराकेश जलवायु सम्मेलन में ‘सोलर अलायंस’ पर हस्ताक्षर हो गए। लेकिन बड़े देशों की उदासीनता से कई सवाल भी अब खड़े हो गए हैं। सोलर अलायंस का मकसद सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना और इसका उत्पादन बढ़ा कर इसकी कीमत कम करना है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को देखते हुए इस गठजोड़ या करार की उपयोगिता जाहिर है। लेकिन विशेषज्ञों की बातों पर गौर किया जाए तो इस अलायंस को लेकर सबसे बड़ी चिंता धन और तकनीक को लेकर बनी हुई है। असल में सोलर अलायंस को लेकर अब तक फंड की कोई रूपरेखा भी तैयार नहीं हुई है। भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक बड़े विकासशील देश इसका हिस्सा नहीं बनेंगे तब तक फंड की दिक्कत बनी रहेगी। यहां यह बताना भी जरूरी है कि बहुत-से गरीब देश इस अलायंस में केवल मदद की उम्मीद से शामिल हुए हैं। भारत का भी इस बारे में स्पष्ट पक्ष है कि नई तकनीक और नए अनुसंधान की जरूरत पड़ेगी और इसके लिए पर्याप्त पैसा चाहिए। यह काम अकेले भारत के लिए कतई संभव नहीं है; वह तो अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा है। धन के अभाव में कई बड़े-बड़े संस्थान रोजाना ही अपना रोना रोते रहते हैं।
लिहाजा, धरती को गर्म होने से रोकने की मुहिम में धन की कमी आड़े आ सकती है। पेरिस समझौते के तहत एक हरित जलवायु कोष बनना है, जिससे हर साल गरीब और विकासशील देशों को करीब सौ अरब डॉलर देने का प्रस्ताव है। सबसे बड़ी दिक्कत यह आ सकती है कि कहीं अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी तरह का अंशदान करने से इनकार न कर दें। अमेरिका को वर्ष 2020 तक इस महत्त्वपूर्ण फंड में तीन अरब डॉलर देना है। अगर वह नहीं देता है तो इस बड़ी पहल को जोरदार झटका लग सकता है।
दो सबसे महत्त्वपूर्ण बातों पर पूरे विश्व को ध्यान देना होगा। एक तो यानों के उड़ान द्वारा होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना, और दूसरा, मांट्रियल प्रोटोकॉल में संशोधन, जिसमें शक्तिशली ग्रीनहाउस को हटाना विशेष रूप से शामिल है। अहम बात यह है कि पेरिस समझौते के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य- 1.5 डिग्री तापमान की सीमा- को दरकिनार कर दिया गया है। इसके संपूर्ण क्रियान्वयन को 2.7 डिग्री तापमान की वृद्धि से जोड़ा गया है। सवाल यह है कि अब कोई भी देश 1.5 डिग्री तापमान की सीमा के लक्ष्य से कैसे आगे बढ़ सकता है। वर्ष 2018 में जब इसकी समीक्षा होगी तब वास्तविक स्थिति का आकलन संभव है। वर्ष 2018 में ही पेरिस समझौते की भी समीक्षा होनी है। लेकिन पेरिस समझौते के क्रियान्वयन की जानकारी के लिए अब तक कोई एकल व्यवस्था नहीं बन पाई है। जबकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को पूरी दुनिया लगातार बढ़ते तापमान, समुद्र जलस्तर में होती वृद्धि, सूखा, बाढ़, ग्लेशियरों के दूर जाने, हिमखंडों के पिघलने के रूप में देख रही है।
विकासशील देशों को उत्सर्जन कम करने व जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को क्षीण करने के प्रयासों के लिए आवश्यक धन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। वर्ष 2009 में कोपेनहेगन सम्मेलन में कहा गया था कि अमीर देश प्रत्येक वर्ष 2020 तक दस करोड़ डॉलर इस मकसद के लिए देंगे। इसे पूरे दशक भर आर्थिक सहायता के लिए उपयोग किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।मराकेश सम्मलेन में भी यही बात कही गई कि अमीर देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए और उन्हें गरीब देशों की मदद करनी चाहिए, क्योंकि सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन वे ही करते आए हैं। मराकेश जलवायु सम्मेलन के दौरान ही विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट भी आई, जिसमें कहा गया है कि रूस और भारत में रिकार्ड गर्मी का उदाहरण दिया गया है। राजस्थान में इस साल 19 मई को 52 डिग्री तापमान दर्ज किया गया। विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट में यह दर्ज भी है। बढ़ते तापमान के कई नए रिकार्ड बने हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती का तापमान 1.2 डिग्री बढ़ चुका है। उनके मुताबिक 2 डिग्री तापमान से अधिक बढ़ना विनाशकारी हो सकता है। मराकेश में चर्चा के दौरान कहा गया कि भारत में प्रतिव्यक्ति बिजली उपभोग एक हजार किलोवाट हावर वार्षिक से बहुत कम है, जबकि अमेरिका व यूरोप में विद्युत उपयोग बारह हजार-तेरह हजार किलोवाट हावर है। सबसे खास बात जलवायु सम्मेलन में इस बार यह रही कि ‘कांन्फें्रस आॅफ पार्टीज’ (सीओपी-22) में भारत की ओर से जेबी पंत इंस्टीट्यूट आॅफ हिमालयन एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट की ओर से पर्वतीय देशों के समक्ष हिमालय की अहमियत और जलवायु परिवर्तन का ब्योरा पेश किया गया। इस तरह पर्वतीय देशों के वैश्विक एजेंडे में पहली बार हिमालय को शामिल किया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय के अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में शामिल हो जाने से जलवायु परिवर्तन को समझने व खास नीति बनाने में काफी मदद पहुंचेगी। जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर पहाड़ों पर पड़ रहा है। कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए पूरी दुनिया एक मंच पर आ गई है, लेकिन वायुमंडल में पहले से मौजूद कार्बन को कैसे कम किया जाए, इस समस्या का सटीक उपाय न ही पेरिस और न ही मराकेश सम्मेलन में देखने को मिला।