Friday, December 10, 2010

a Story, my Story.

Place : Room 207 of my college.
Time: 230pm
Situation: External faculty taking viva.
Batch: Mera batch Bhai!
External: wts ur name?
me: sir 118..
External: name! name, name.
me: Oh! sorry sir Vivek.
External: Sorry Sir ya Vivek??
me: Vivek
External: kya pada?
me: Antenna.
External: I know, abe mei isi subject ka viva le raha hu.........isme se kya pada? ....... Achha define Slotted antenna.
me: Sir, ummmmmmmmmm.....................mmmmmmmm........mm. .......
.............. ................ .........       ..........
External: dont know!!!.....Beta Aish kar.


~
So, its the story of today's viva....... Lagi padi hai. Not a single unit prepared........even not a single topic. I dont know the first topic of first unit-slotted antenna.


Lag gai Bhai  lag gai, vaat lag gai. and Sone Pe Suhaga is what im doing.........just blogging, chatting, reading magazines, sleeping.
                        And offcource, my EQ (Emotional quotient) is more than  IQ........so, kaha kaha ke emotions aa-aa kar mujh pe Emotional Atyachaar karte hai, pata hi nhi chalta.

Saturday, December 4, 2010

wtf, i dnt wanna use my blog like a diary, but wt im doing is jst a shit! exams r on head (sir pe bansi baja rahe hai) nd im reading blogs, chatting and sleeping.......god will really punish me!

Monday, November 29, 2010

रंग- तुलिका भर के!

ख़ुशी

वो मिले मुझे
तो गिरेबाँ पकड़ मांग लूं गम,
अब ये ख़ुशी बर्दाश्त नहीं होती!


लिखते-लिखते सुफियानापन आ गया है!!


धूप

धुल-धुल के चमका दिया रौशनी ने,
पड़ोस से एक सितार और मांग ला.
गुनगुनाती सुबह मैं तुझे
इश्कियाना गीत की ज़रुरत है!

अवसाद

मुंडेरें बची होती तो
कह पाता कभी,
'मैं पंछी हूँ मुंडेरों का'.

चमकती इमारतों के बीच,
टूटी झुग्गी सा लगता हूँ मैं,
जैसे कोई सारे रंग चुरा ले गया हो!


आदमियत

गणेशजी पूज लिए सोते वक़्त,
अब भरोसा नहीं रहा आदमियत पे,
क्या पाता कौन बारूद
सांस खींच ले नींद में ही!

इश्क

तेरे इनकार को कैसे मैं मान लूं!
आँखें तो इरादे और कह रही हैं,
जैसे नींद के आगोश में भी,
सपने मेरे देखे हों.
चांदनी से बनाई हो,
मेरी उजली तस्वीर.
....और आखिर में
पन्ने के पन्ने काले कर दिए हों,
मजबूरी की स्याह से!


फिर भी मंजूर है मुझे तेरे हर फैसले!
......क्यूंकि तेरे इरादे तो सही हैं.

Sunday, November 21, 2010

आदतें...


 1.
दूर जाना चाहूँ तो,
आफतों की तरह
इठलाती आती है तू!
जैसे मुझपर सिर्फ तेरा हक है!

मुस्कुराता हूँ मैं,
आफतें भी अच्छी लगती हैं फिर!

 2.
भूलना चाहूँ तो,
धुंए की तरह
छा जाती है तू!

तेरी यादों के धुंध से,
भर जाता हूँ मैं!

 3.
रुलाना चाहूँ तो,
खिलखिलाती है तू!
जैसे रातरानी झड़ रही हो चाँदनी मैं!

बचपन की बिसरी सी,
परीकथाएँ सच लगने लगती है फिर!

 4.
छूना जो चाहूं तो,
छुईमुई की तरह
शर्माती है तू!

अचंभित मैं!
बस देखता रह जाता हूँ तुझे.

 5.
पाना चाहूँ तो,
बादल की तरह
भिखर जाती है तू!

बूंदों से सरोबार,
पुलकित हो उठता हूँ मैं!

 6.
हँसाना चाहूँ तो,
ढले सूरजमुखी की तरह
मुरझाती है तू!

मैं घबराता हूँ तो,
मेरी हालत पे खिलखिलाती है.
ज्यों सूरज फिर उग आया हो!

 7.
सरबती पलों में कभी,
लहरों की तरह बह जाती है तू!

तट पर ठिठुरता मैं,
बस राह तकता रह जाता हूँ !!

                                 ~V!Vs**

Thursday, October 14, 2010

मौत

सुबह बार-बार आती है!!!
तारे टूटे और बिखर गये,
बर्फ पिघली और मिट गई.
शबनम सोख ली किरणों ने,
बूंदे गिरी और बह गई.


खुश हैं,
बिखराव है,
किन्तु अंतिम सत्य के रूप में.
यहाँ तो मौत भी
सुबह की तरह बार-बार आती है.
                        ~V!Vs***

तो जानते मैं क्या सोचता हूँ

मेरी आँखों से कुछ रंग जो चुराते,
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


किनारे से आगे कभी सोचा ही नहीं,
लहरों संग बह,
आसमां छूने का एहसास जगाते,
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


क्या पता क्यूँ,
दरख्तों से झाँका
और लौट गये तुम.
जरा दो पल बिताते
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


किसी ने कुछ कहा,
तुमने बिन जाने ही सच मान लिया.
ये आवरण हटाते,
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


कह दिया दोस्त,
मुश्किलों में मैं हूँ तुम्हारा.
जरा दोस्ती निभाते,
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


                  ~V!Vs***      

Thursday, September 16, 2010

आज !

वक़्त से निकल कुछ लम्हे
यादों में खोये हुए 
कहते कुछ बातें प्यारी-
जैसे सपने जागे-जागे,
जैसे अरमान गूंजे-गूंजे 
जैसी खुशियाँ बिखरी-बिखरी 
जैसे जीवन संवरा-संवरा.
जैसे डाली डोली डोली,
फूलों पे मंडरे भँवरा.

उन्नीदी सी रात ये
जैसे गाती गीत मल्हार,
जैसे चाँद प्रेयसी बन,
छू जाता, करता प्यार.
आँखों में, हंसी में आज
एक अजीब नयापन है.
बूंदे हैं बिखरी-बिखरी,
मौसम में अपनापन है.

इतारये इस दिल ने,
एक घरोंदा पाया है.
छोटे से घरोंदे का,
हर तिनका अपना पाया है.

आज कुछ सजीव लम्हे,
बरसों बाद जिए हैं फिर.
खुशियाँ बटोरकर सारी,
लम्बी प्यास कर लूँ तर!

                           ~V!Vs ***

Wednesday, August 25, 2010

उन्मुक्त क्षणिकाएं : palaayan

नींद 
नींद में सिर्फ ख्वाव नहीं,
उदासी भी है,
कुछ अधूरे सपने और तन्हाई भी है.
तो कुछ पाने की उन्मुक्तता,
कुछ सुकून और चैन भी है.


तन्हाई 
तन्हाई
बस टैरेस पर अकेला होना नहीं,
भीड़ में खोना भी है.
भरी सड़क अकेला होना भी है.
सफ़ेद लबादे में लिपटी लाश तन्हा नहीं,
तन्हा तुम हो,
क्यूंकि तमाशे में भी अकेले हो.


सड़क/शहर 
सड़क का रास्ता,
सिर्फ शहर को नहीं जाता है.
उम्मीद को भी जाता है,
नए अवसर की ओर भी जाता है.
रेल की पटरी किनारे
झुग्गियां बनेगी ज़रूर,
चंद रोटियां तो नसीब होगीं.
भले सुकून मिले ना मिले,
गाँव से शहर थोड़ा अच्छा है......!!!


गाँव का रास्ता तो लम्बा है....
गाँव में,
सुकून है तो क्या,
माँ है तो क्या,
गाँव का रास्ता तो लम्बा है.....
फिर गाँव से शहर लौटना भी है मुश्किल!


तुम्हारी आस में...
कहते हैं,
लौट आते हैं लोग
शाम ढले,
सुबह के भूले भी.
तुम्हारी आस में तो रात गुजर गई.


....
* टैरेस-terrace
लबादा- चादर, कफ़न(here)
                                                    ~V!Vs***

Wednesday, August 18, 2010

मेरे तो कई ख्वाव अधूरे हैं...... जैसे तुम!!

सावन
सावन क्या है?
बूँदें बरसें तो
लहराते पेड़, उमड़ती खुशियाँ.
ना बरसें तो
ठूंठ और शोक की कविता.

कविता
कविता क्या है?
बस वो शब्द नहीं,
जो कह दिए गये.
कविता है,
शब्दों से निकले कुछ मौन अर्थ भी.
...और कुछ अनकहे शब्द भी.

अनकहे शब्द
अनकहे शब्द,
अभिव्यक्त से अधिक कठोर हैं.
एक मौन में कथनों से ज्यादा शोर है!

शोर 
शोर क्या है?
किसी सत्य पर हा-हाकार
या मौन सत्य की चीत्कार?
सड़कों पर चक्केजाम, नारेबाजी शोर है
तो अस्मिता लुटने के बाद की चुप्पी क्या है?

सत्य/ख्वाव 
सत्य क्या है?
सपनों का धरातल पर उतरना
या कुछ ख्वावों का कभी पूरा ना होना?
ख्वाब सभी को प्यारे हैं,
पूरे कितने ख्वाब तुम्हारे हैं....?
मेरे तो कई अधूरे हैं......
जैसे तुम!!

                                                  
                                                          ~V!Vs ***

Saturday, August 14, 2010




बुढ़ापा

ऐसा भी कोई घर आपने देखा है?

जहाँ 
अतीत के ख्वावों में डूबा 
बाप हो,
सदा से ममतामयी
माँ हो,
बहू का प्यार हो,
बेटे द्वारा सत्कार हो.

आज सब बूढ़े क्यों वृद्धाश्रम में ठूँसे गये हैं?
यों जाने कितने पेड़ यूँ ही सूख गये हैं.

                  
                                               ~V!Vs ***