Friday, August 11, 2023

शौर्य गाथा 66.

 भाईसाहब के पास सब है जिसकी जिद करते हैं... पापा उन्हें दिलाते रहते हैं, मम्मा डांटती रहती है कि "आप सारी जिद मान लेते हैं... ऐसे सारी जिद थोड़ी न पूरी की जाती हैं... उसे 'न' सुनना भी सीखना होगा ना!"

पापा को भी इस बात का एहसास है लेकिन उनका मन नहीं मानता है। बचपन में बहुत कुछ था जो उन्हें जिद करने के बाद भी नहीं मिल पाया... छोटे से गांव उनके पिताजी के लिए संभव नहीं था... बाद में कम उम्र में बोर्डिंग स्कूल चले गए। इसलिए पापा के लिए जो संभव होता है दिलाने की कोशिश करते हैं।
हालांकि पापा धीरे-धीरे न कहना सीख रहे हैं... मम्मा की डांट का असर भी हो रहा है और पापा भी धीमे-धीमे 'पापा' बन रहे हैं।

Thursday, August 10, 2023

विभीषण की कहानी : घर का भेदी...



विभीषण का नाम सुनते ही हिंदी की एक युक्ति दिमाग में आना शुरू हो जाती है - 'घर का भेदी लंका ढाये.' बचपन से ही हम यही सुनते आ रहे हैं. कुछ लोग कहते हैं कि ये सच नहीं है. जो भी हो विभीषण का चरित्र रामायण में बिलकुल अनोखा चरित्र है. वो राक्षस कुल में जन्म लिया है किन्तु कर्मों से, कथनों से राक्षस नहीं है. रामानंद सागर जी की रामायण में भी विभीषण का ऐसे चित्रांकन (अभिनेता: मुकेश रावल जी) किया गया था जिसमें वे शरीर से सख्त दिखते थे किन्तु बातों से कोमल ह्रदय थे.

जैसा कि रावण के जन्म की कहानी^ कहते वक़्त लिखा था कि महर्षि विश्रवा और राक्षसकुल की कैकसी को तीन पुत्र रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और एक कन्या प्राप्त सूर्पनखा प्राप्त हुए थे और कहते हैं इन तीनों पुत्रों में से प्रथम पुत्र रावण में अनुवांशिक रूप से अपने पिता और अपनी माता दोनों के कुलों के बराबर गुण आये. दूसरे पुत्र कुम्भकर्ण में माता के कुल के गुण थे. अंतिम पुत्र विभीषण में पूर्णत: पिता के कुल के गुण थे. ये भी एक कारण है कि विभीषण कार्य और कथन से पिता की तरह ही ऋषि प्रतीत होते हैं. 

लेकिन इसके पीछे एक और कारण भी है. जब अपने नाना सुमाली की इच्छा से तीनों भाइयों रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण से भगवान् ब्रह्मा की आराधना की तो बाकि भाइयों ने बल, शक्ति मांगी किन्तु विभीषण उनमें से अकेले थे जिन्होंने माँगा कि 'प्रभु, मैं हमेशा सच के साथ चलूँ, सत-धर्म का साथ दूँ.'

कहानी अनुसार विभीषण मंत्री थे लंका के और सही-गलत का ज्ञान राजा को देना उनका कर्त्तव्य था किन्तु जब उन्होंने पर-स्त्री सीता के हरण के प्रति अपने महाराज रावण से आपत्ति प्रकट की, उनको समझाना चाहा तो उनका अपमान किया गया. उनके सर पर लात से प्रहार किया गया. विभीषण उसी पल सत्य का साथ देने अपने कुछ साथियों सहित श्रीराम के पास पहुँच गए. लेकिन सच तो ये है कि इसके पूर्व से ही विभीषण भगवान् विष्णु के अनन्य भक्त थे. उन्होंने ब्रह्मा से सत-धर्म परायणता के अलावा भागवत-भक्ति का भी वरदान माँगा था. दक्षिण भारत की एक मान्यता अनुसार वे भगवान विष्णु के रूप रंगनाथ-स्वामी के भक्त थे. उनकी पूजा करते हुए ही हनुमान ने उन्हें लंका दहन के पहले देखा था और उनका ही महल जल जाने से बच गया था.

विभीषण ने जब लंका को छोड़ा तो वे भगवान् राम के शरणागत होने के बाद युद्ध में उनकी मदद करते रहे. कहते हैं उन्होंने लंका के बहुत सारे राज़ राम को बताये थे इसलिए भी भगवान यह युद्ध मानवीय रूप में जीतने में सफल रहे. युद्ध के समय असली और मायावी विरुपाक्ष को पहचानने का रहस्य राम को विभीषण ने बताया था. अतिकाय को मारने के लिए ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करने का परामर्श लक्ष्मण को विभीषण ने ही दिया था. सुषेण वैद्य का पता भी विभीषण ने बताया था. निकुंबला मंदिर तक जाने का गुप्त रास्ता भी विभीषण द्वारा ही बताया गया था, जहाँ जाकर लक्ष्मण मेघनाथ को मार सके थे. रावण की मृत्यु का ज्ञान भी विभीषण ने ही राम को दिया था और उनके बताये अनुसार ही नाभि में वाण मार रावण को मृत्यु सैय्या पर सुलाने में राम सफल हुए थे. (मानस में: 'नाभि कुंड पियूष बस याके, नाथ जिअत रावण बल ताके।')

लंका को जलाने को श्रेय भले ही हनुमान जी को दिया जाता हो किन्तु लंका की महत्वपूर्ण गुप्त जानकारियां विभीषण ने ही भगवान राम को प्रकट की थीं जिससे ही राक्षसराज रावण की बलशाली सोने की लंका एक मानवीय शत्रु के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हुई थी. शायद इसलिए भी विभीषण को 'घर का भेदी लंका ढाये' जैसी नकारात्मक कहावत में शामिल किया गया है. 

विभीषण के अनुसार उन्होंने ये सत्य धर्म के लिए किया था किन्तु एक अन्य चरित्र कुम्भकर्ण का भी है जो अपने सत-धर्म पर अडिग रहे थे. जो रावण से कहते हैं कि "आपने सीता का हरण कर गलती की है और सीता को आपको वापिस राम के पास छोड़ कर आना चाहिए" और जब रावण इंकार कर देते हैं तो वे कहते हैं " मैं जानता हूँ कि आपने गलत किया है और आपकी तरफ से लड़ते हुए मैं सत्य की तरफ नहीं खड़ा हूँ. फिर भी मैं अपने धर्म का पालन करूँगा, और मेरा धर्म है अग्रज की बात को मानना, अपने राजा के कहे का पालन करना. मैं धर्म का अनुसरण करते हुए लडूंगा और राम के हाथों मृत्यु को प्राप्त होऊंगा."

विभीषण के अनुसार वे धर्म का पालन करते हुए राम के साथ मिल गए और और कुम्भकर्ण के अनुसार वे धर्म का पालन करने रावण की और से लड़ते हुए श्रीराम के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए. लेकिन सत्य और धर्म तो एक ही हो सकता है तो सच्चा धर्म कौन सा था? 

वो आपको सोचना है. मेरे अनुसार तो पर-स्त्रीहरण उस समय की मोरालिटी अनुसार महापाप था और उसकी रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म. रामायण की अन्य कथाओं में जैसे सति अहिल्या की कथा में भी कुछ-कुछ ऐसा ही लिखा मिलता है. शायद विभीषण के लिए इसलिए भाई का साथ देने से बड़ा धर्म-मार्ग राम की पत्नी को न्याय दिलाना था. इसलिए ही विभीषण का चरित्र विश्वास, धर्म, मित्रता और न्याय का प्रतीक माना जाता है.

लेकिन फिर कुम्भकर्ण के लिए ऐसा क्यों नहीं था? जबकि वे भी धर्मपालन की बात करते हैं. मैं जो समझा हूँ उसके अनुसार एक तो कुम्भकर्ण जन्म से ही माता के कुल के राक्षसी-गुण सर्वाधिक थे इसलिए वे नैतिकता को पूर्णत: समझने में असमर्थ रहे और साथ ही दूसरा ये कि पूरा वर्ष ही निद्रा में रहने के कारण वे परिस्थिति को ही अच्छे से नहीं समझ पाए थे और शायद तीसरा ये कि अधिकतर निद्रालीन रहने के कारण वे सत्य-असत्य की समझ ही गूढ़ रूप से नहीं रखते थे. इसलिए ही जहाँ विभीषण का चरित्र विश्वास, धर्म, मित्रता और न्याय का प्रतीक माना जाता है, वही रावण का साथ देने के लिए, दुराचार के साथ रहने के लिए कुंभकर्ण को बुराई के रूप में जलाया जाता है.

ऊपर मैंने सति अहिल्या की कथा की बात की है जिसमें रामायण से पूर्व में इंद्र द्वारा उनके सतीत्व हरण पर उनके पति महर्षि गौतम ने सजा देते हुए उन्हें पत्थर की मूरत बना दिया था. रामायण में राम द्वारा उनको पुनः मानवरूप देना एक तरीके से 'स्त्री का सतीत्व छल से हरा भी जाये तब भी स्त्री को ही सजा मिलेगी!' वाली पूर्व की मोरालिटी का विरोध भी है. जैसे राम माता अहिल्या को मानव रूप देते हुए कह रहे हों "माता, जब दोष आपका नहीं तो सजा आपको क्यों?" हालाँकि समाज आज भी बहुत आगे नहीं बड़ा है वह बलात्कारी से ज्यादा बलात्कार की शिकार महिला को अधिक सजा देता है, दोषी मानता है. शायद तब भी बहुत आगे नहीं बढ़ पाया था तभी तो वही राम अग्निपरीक्षा लेते वक़्त समाज से हारे से प्रतीत होते हैं. यह अनावश्यक कार्य भी उन्हें करना पड़ता है. 

लेकिन विभीषण इस सत-धर्म को समझते थे. इसीलिए पूरा युद्ध होने बाद वे अपने प्रियजनों के लिए रोते हैं तो एक कथा अनुसार रावण उनसे कहता है कि "तुमने अपने धर्म का पालन किया है अनुज!" और एक अन्य कथा में जब वे लंका का राज लेने से इंकार करते हैं तो भगवान् राम अपना विराट भागवत-स्वरुप दिखा आदेश देते हैं, जिसे विभीषण को स्वीकारना पड़ता है और वे भाभी मंदोदरी का आशीष ले सिंहासन पर बैठते है. 

विभीषण को अन्य कथाओं में देखें तो वे लंका के राज्याभिषेक उपरांत मंदोदरी से शादी करते हैं और एक कथा अनुसार अशोक वाटिका में सीता की प्रधान सेविका त्रिजटा उनकी पुत्री थीं. किन्तु दोनों कथाएं बाद में डाली गई प्रतीत होती हैं. 

चित्र : राम के शरणागत होते विभीषण.

Wednesday, August 9, 2023

शौर्य गाथा 65 : First Click by Him!

हम सेलिब्रेट कर रहे थे और मोबाइल से फ़ोटो खींच रहे थे, कि सहसा भाईसाहब मेरे हाथ से "पापा मैं भी, मैं भी..." कहकर मोबाइल ले लेते हैं। अगले दस मिनट तक भाईसाहब उनके वजन के हिसाब से भारी मोबाइल सम्हालते हुए, फोकस कर फोटो क्लिक करने की कोशिश में बिताते हैं। जबतक उनका हाथ बटन तक जाता है, तब तक मोबाइल झुक जाता है, बेचारे फिर सम्हालते हैं... और फिर वही कोशिश दुहराते हैं।
दस मिनट बाद मोबाइल पापा के हाथ में होता है और जो रिजल्ट आता है वो दो साल के भाईसाहब के हिसाब से शानदार है! मम्मा पापा की एक प्यारी सी ब्लर्ड फ़ोटो!!
मुझे अप्रत्याशित रूप से बड़ी क्रिएटिव लगती है और मैं उन्हें गले लगा लेता हूं।
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Sunday, August 6, 2023

शौर्य गाथा 64 : प्रेम

भाईसाहब को सुलाने की कोशिश हो रही है। तरकरीबान एक घंटा हो गया है और भाईसाहब सो ही नहीं रहे हैं। मम्मा बोलती है- "शायद ज्यादा थका हुआ है आप पैर दबा दीजिए।" पापा दबाना शुरू करते हैं और भाईसाहब अगले दस पंद्रह मिनट में सो जाते हैं। पापा को याद आता है कि दादू भी उनके ऐसे ही पैर दबाना शुरू कर देते थे और पापा मना करते करते ऐसे ही सो जाते थे। पापा की उम्र तब करीब दस बारह वर्ष रही होगी।
जीवन में प्रेम का कितना दुहराव है न!
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Friday, August 4, 2023

शौर्य गाथा 63 : Days of Innocence #p3

पापा भाईसाहब से बोलते हैं: "आप बहुत बदमाश बच्चे होते जा रहे हो शौर्य."
भाईसाहब : "आप बहुत बदमाश पापा होते जा लहे हो पापा."
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पापा भाईसाहब को गले लगकर प्यार करते हुए : " मेरा प्यारा सा नन्हा मुन्ना बच्चा."
भाईसाहब पापा के गाल पर प्यार से हाथ फेरते हुए अपनी टूटी फूटी भाषा में : "मेले प्याले से मुन्ने मुन्ने पापा."
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Tuesday, August 1, 2023

शौर्य गाथा 62: पापा ती येलो वाली धड़ी

 पापा की भाईसाहब को सुलाने की कोशिश हो रही हैं, उनके चेहरे से नींद नदारद है। भाईसाहब चिल्लाना शुरू करते हैं "पापा ती येलो वाली धड़ी ताहिए। येलो धड़ी..." और रोना चिल्लाना शुरू हो जाता है। पापा बेचारे अपनी सभी घड़ियां उनके पास रख देते हैं, लेकिन उनमें कोई से भी "येलो धड़ी" नहीं है। भाईसाहब अपना शोर जारी रखते हैं। मम्मा लेटी हुई है, बेचारी आधी नींद में से उठ जाती है।

पापा पूछते हैं "मैं अब येलो घड़ी कहां से लाऊं?"
मम्मा झल्लाकर बोलती है "उसे पापा की येलो गाड़ी चाहिए, घड़ी नहीं।"
पापा बेचारे इनका एक हरे पीले रंग की जिप्सी कार वाला खिलौना ढूंढ कर लाते हैं, भाईसाहब देखते ही खुश होकर बोलते हैं "हाहाहा.... मिल दई पापा ती येलो धडी।"
पापा राहत की सांस लेते हैं, भाईसाहब कार हाथ में लिए लिए दस मिनट में सो जाते हैं!
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Tuesday, July 18, 2023

शौर्य गाथा : Metal Cars

 


भाईसाहब खिलौनों की दुकान पर हैं, अपने फेवरेट खिलौने कार और अन्य गाड़ियां देख रहे हैं। भाईसाहब के हाथ हॉट व्हील्स की छोटी मेटल कार लगती हैं। "पापा ये ताहिये..." भाईसाहब जिद करने लगते हैं। पापा दिला देते हैं। 

घर आकर पापा पैकिंग खोलते हैं और सफेद, काली कारें फर्श पर दौड़ा देते हैं। पापा फिर उठाते हैं और फिर दौड़ा देते हैं, जैसे पापा खुद ही खेलने लगे हों। भाईसाहब पापा को टोकते हैं "पापा, मुझे भी... मुझे भी।" पापा मुस्कुराकर उन्हें कारें पकड़ा देते हैं और विचारों में खो जाते हैं। 

पापा के पास बचपन में ऐसी कारें कभी नहीं थीं। उनकी इच्छाएं जरूर थीं लेने की... लेकिन कभी मिली नहीं। पहली बार उन्होंने ऐसी कारें शहर में रहने वाले अपने कजिन के पास देखी थीं। जिद थी लेनी हैं... गांव में मिली नहीं... शहर से उनके पिताजी कभी लाए नहीं। 

'कितनी इच्छाएं थीं न इससे खेलने की... कितने लालायत थे हम...' पापा सोच रहे हैं और भाईसाहब के हाथ से कार ले फर्श पर फिर दौड़ा देते हैं... 

पीछे से भाईसाहब चिल्ला रहे हैं "पापा, मुझे भी... मुझे भी..."

#Shaurya_Gatha #शौर्य_गाथा @shaurya_gathaa

Thursday, July 13, 2023

Days of Innocence #p2



भाईसाहब बड़े हो रहे हैं और धीमे धीमे बातें भी ज्यादा करने लगे हैं और आपके वाक्यों में से Phrases (वाक्यांश) भी पकड़ने करने लगे हैं. धीमे-धीमे अक्ल भी आ रही है और जिस मासूमियत से आ रही है उसपर आपको इनपर बहुत सारा प्यार आता है साथ ही बहुत सारी हंसी. 

मम्मा को '...क्यों शौर्य' वाक्यों के अंत में बोलने की आदत है. जैसे बोलेगी "आम खा लिया जाए, क्यों शौर्य?" या "आपको बाहर जाने के लिए तैयार कर दें क्यों शौर्य?" 

हम फर्स्ट फ्लोर पे रहते हैं, एक दिन भाईसाहब को नीचे खेलने जाना है. भाईसाहब मम्मा का हाथ पकड़े हैं और कहते हैं "मम्मा, नीचे चलो... क्यों मम्मा... क्यों मम्मा!" 

ऐसे ही पापा बातों बातों में कह देते हैं '...और बताओ शौर्य' ऐसे ही इनके नानाजी बातों-बातों में कभी-कभी कहते हैं 'क्या हालचाल... सब ठीक शौर्य?' 

पापा ऑफिस के लिए जूते पहन रहे हैं, भाईसाहब सामने खड़े हैं, पापा कहते हैं "...और बताओ शौर्य." भाईसाहब पहले हाथ मटकाते है फिर नानाजी के जैसे हाथ पीठ के पीछे फोल्ड करते हैं और पापा को दुहराते हुए कहते हैं "औल बताओ पापा... ता हालचाल... छब ठीक है..." 

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Wednesday, July 12, 2023

शौर्य गाथा : Bhaisahab's First Day of School 🏫🎒🥰

 


भाईसाहब सोमवार को स्कूल जायेंगे ये सुनकर वे शनिवार से ही "पापा स्कूल चलो... स्कूल चलो..." की रट लगाए हैं, अलग ही लेवल का एक्साइटमेंट है। 

भाईसाहब का स्कूल का पहला दिन है. नानाजी विशेष रूप से आए हैं. वे इनको शिक्षा संस्कार दे रहे हैं, नानी टिफिन तैयार कर रही हैं. मम्मा ने बैग तैयार किया है. भाईसाहब मम्मा पापा की गोद में बैठकर स्कूल जाते हैं। क्लासरूम के अंदर जाते ही रोना शुरू कर देते हैं! सारा एक्साइटमेंट फुस्स्स...! 

स्कूल टाइम खत्म होने को और भाईसाहब बहुत खेल रहे हैं, बहुत खुश है, अब इन्होंने वापस घर आने से इंकार कर दिया है!! इन्हें समझा बुझा कर घर लाया जा रहा है और भाईसाहब अब स्कूल छोड़ने के नाम पे रोने लगे हैं. 

पापा को अपने बोर्डिंग स्कूल (Jawahar navodaya vidyalaya) के दिन याद आ जाते हैं, पापा छठवीं में जाकर वहां बहुत रोये थे... और बारहवीं वहां निकलते हुए भी! 

भाईसाहब का पहला दिन भी ऐसा ही था, जाते हुए रोना, और आते हुए स्कूल छोड़ने के गम में रोना!!

#शौर्य_गाथा #Shaurya_Gatha

Tuesday, July 4, 2023

शौर्य गाथा : Days of Innocence #part1

 


भाईसाहब बहुत तेज भागते हैं। वो भागते भागते एक रूम से दूसरे रूम में जा रहे थे कि उनका पैर का अंगूठा फाटक में टकरा गया। ऐसा मुझे बहुत बार हुआ है, शायद आपको भी हुआ हो, पैर की सबसे छोटी उंगली जबतब किसी भी चीज में टकराकर घायल हो जाती है और जो दर्द होता है न मां कसम! असहनीय होता है।


भाईसाहब के छोटे से पांव का छोटा सा अंगूठा! भाईसाहब बिलखने लगे हैं। पापा उन्हें झट से उठा लेते हैं और सहलाते हैं, लेकिन वे रोये जा रहे हैं। रोते रोते बोलते हैं "पापा... डॉक्टर... डॉक्टर..."


पापा: " हां बेटा आप डॉक्टर बन जाना और फिर खुद से चोट ठीक कर लेना।"

भाईसाहब रोते हुए: "पापा आप डॉक्टर बन जाओ ना... आप बन जाओ."

पापा मम्मा को हंसी आ जाती है। 


पापा: "बेटा, दादू हैं न, उनसे दवा पूछ लेते हैं।"

भाईसाहब: "नहीं, आप डॉक्टर बन जाओ।"


बेचारे पापा अब इस उम्र में नीट (NEET) की तैयारी करें! पापा आयोडेक्स लाते हैं, इनके नन्हे पांव पर कुछ देर तक मलते हैं... और भाईसाहब पापा की मेहनत देख कह देते हैं, "पापा तीक हो गया... तीक।"

पापा मुस्कुराते हैं और भाईसाहब साथ में मुस्कुरा देते हैं। बाप जैसे नन्हे बेटे की नज़र में डॉक्टर बन गया हो!!

#शौर्य_गाथा #Shaurya_Gatha