Sunday, August 14, 2022

हम | भोपालनामा 8

 वो लड़की

पीला पहन लेती है
तो बसंत हो जाती है,
गुलाबी पहने तो जयपुर.
वो इतनी हरी है जैसे भोपाल हो.
उसकी आँखों में बड़ी झील तैरती है.
मैं प्रेम हूं,
वो ममत्व.
मैं नदी भर के उसपे लुटाता हूं,
वो सागर है.
मैं गीत हूं,
वो धुन.
और जो जो मैं नहीं हो पाता
वो सबकुछ हो जाती है.
लम्हा तक हो जाती है सिमटकर.
मैं उसके साथ ख्वाबों का शहर
भोपाल होना चाहता हूं
वो मेरे साथ
आसमान हो जाना चाहती है.
हम हर दिन साथ होना चाहते हैं.
मैं उसका पिता होते होते रह गया
वो सच में मेरी माँ हो गई.

Friday, August 12, 2022

भोपालनामा 7

 वो शहर जिसमें तुम उम्र गुजारने की सोचते हो, बस जाने की सोचते हो, इतना बदल गया है कि राज्य के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में दूसरे स्थान पर है. जिन रास्तों पर तुम बेटोक गए हो वहा एक-एक मिनट के ट्रैफिक जाम है.

कुछ चौराहे पुराने से लगते ही नहीं, कई लोग अपने से भी नहीं. जैसे कि शहर बदलते-बदलते रंग भी बदलने लगे हों.
अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि कुछ लोग अभी भी पहचान लेते हैं, दस साल बाद भी!
वे जगहें जहां पेड़- खेत थे, वहां अब माल और मीनारें हैं. आश्चर्य होता है कि रंग रूप बदलता यह शहर पचास साल पहले किसी जिले की तहसील हुआ करता था. हां, जिजीविषा अब भी ज्यूं की त्यूं है. स्व. अब्दुल जब्बार के गैस त्रासदी विक्टिम्स के लिए किए काम को कुछ लोग याद करते आंखें छलका देते हैं.
कोलार डैम वही है, झील वही है, वन विहार भी... कुछ कैफे भी वैसे के वैसे ही हैं. भारत भवन की शाम उतनी ही सुन्दर है... बस तुम्हें ही सबकुछ अधूरा अधूरा सा लगता है. दिल में भी और शहर में भी. जैसे कुछ था जो अब यहां नहीं है. कुछ खो गया है.
जैसे ये शहर, शहर तो वही है बस तुम उस शहर के बाशिंदे नहीं रहे!
तुम वहीं खड़े हो... शहर आगे बढ़ चुका है... लोग आगे बढ़ चुके हैं. शहर ने तरक्की कर ली है… लोगों ने भी ? शहरी आवश्यकताओं जैसे कपट और कटुता को अपना लिया है.

Thursday, August 11, 2022

भोपालनामा 6

 लफ़्ज़ों को आग में पका कुंदन नहीं बनाया जा सकता न शहर के बीचों-बीच खड़े हो चिल्ला-चिल्लाकर इश्तेहार किया जा सकता है. लफ़्ज़ों में तुम हो और तुम खुद को पढ़ के भी नहीं समझ पाओगे. उम्र में दो साल बड़े तुम ज़िन्दगी में पूरे बीस साल....अपना काम कर खुश होते हो और अक्सर फ़ोटो अपने कर्म के इश्तेहार के रूप में डाल देते हो तो लगता है तुम सुकूं की आखिरी सीढ़ी पे बैठे मुस्कुरा रहे हो. हर 'पिक' में तुम मुझे 'क्यूट' लगते हो..ऊपर से हमारे बीच का कॉमन भोपाल. जितना इश्क़ मुझे उससे... उतना तुम्हें. सोचता हूँ किसी दिन बोल दूँ, फिर खुद को बच्चा समझने लगता हूँ. घर में उम्र में सबसे बड़ा पर थोड़ा कम मेच्युर मैं... तो ये होना ही है.

तुम्हारी यात्रायें, मतलब लिए हैं...ढेर सारे, ढेरों के ढेरों पन्नों में तुम उकेर देते हो जिन्हें. मेरे लफ्ज़ सिर्फ दो लोग लिए हैं... ढेर सारे 'तुम' और थोड़ा सा 'मैं', जिन्हें मैं थोड़ी स्याही ही दे सकता हूँ तुम्हें समझाने.
तुमने पढ़ा क्या? छोड़ो, पढ़ के भी तुम नहीं समझोगे कि यहां 'तुम' तुम हो.

Wednesday, August 10, 2022

भोपालनामा 5

 हम कितना ही क्या सीख रहे हैं अपनी गलतियों से? कब-कब तो हमने क्या-क्या नहीं झेला है? 2 3 दिसंबर 1984 की काली रात ठीक 37 साल पहले 3000 से अधिक जिंदगियां लील गई. 10,000 से अधिक लोगों को प्रभावित किया और हमें एक ऐसा दर्द दे गई जिसे हम हर साल याद कर आंसू बहाते हैं.

भोपाल के यूनियन कार्बाइड प्लांट में हुए इस हादसे में मीथिल आइसोसाइनाइड ( methyl isocyanate (MIC)) गैस का रिसाव हुआ था. उस रिसाव की वजह से कई बच्चे यतीम हो गए, कई लोगों ने अपने घर के चिराग को दिए, कई लोगों ने अपनी आंखें खो दी, अपंग हो गए और इसका असर आज भी भोपाल के उन प्रभावित लोगों में देखा जा सकता है.
हादसे के बाद दोषी देश से भाग गए. सरकार ने अपनी 'सरकारी' कोशिशें की. यूनियन कार्बाइड ने केंद्र सरकार को 470 मिलियन डॉलर देने का वादा किया किंतु उसका एक बहुत छोटा हिस्सा ही उन पीड़ितों के पास पहुंच पाया. अफसोस! वह भी स्व. अब्दुल जब्बार जैसे लोगों द्वारा ताउम्र त्रासदी प्रभावितों के लिए लड़ाई लड़ने के बाद!
2 दिसंबर को हम #NationalPollutionControlDay भोपाल गैस त्रासदी की दुखद याद में ही मनाते हैं कि हम समझदार हों, सतर्क हों, कि अगली दफे ऐसी कोई घटना हमारे साथ घटित ना हो. लेकिन क्या वाकई हम सारी घटनाओं से सीखते हैं? चेतते हैं? क्या वाकई हम अभी चेते हुए हैं? यह सोचना होगा.
डच आर्टिस्ट Ruth Kupferschmidt द्वारा भोपाल में बनाए गैस त्रासदी मेमोरियल के नीचे लिखा हुआ है:-
"No Hiroshima, No Bhopal.
We Want to Live"
लेकिन अफ़सोस हर वर्ष ही ऐसा कोई हादसा हो ही जाता है.

Monday, August 8, 2022

भोपालनामा 4

 कॉमन सेंस बड़ी रेयर (दुर्लभ) चीज है. शायद इसलिए तीन तलाक़ जैसे फैसले 2017 तक का इंतज़ार करते हैं और उसपर भी दो 'हाइली क्वालिफाइड' (अत्यधिक योग्य) जज अपने पूर्वाग्रह नहीं छोड़ पाते. सदियों से चली आ रही रीति-रिवाज-मान्यताएं-धारणाएं जरुरी नहीं सही ही हों. अगर होतीं तो हम दलित-उत्थान के लिए प्रयासरत नहीं होते, न ही सती प्रथा ख़त्म हुई होती.

ये नहीं है कि बस यही एक कुरीति थी. अभी कई बाकि हैं. हर धर्म में ही. क्यूंकि कुरीतियां मज़हब देख के नहीं बनतीं. वे एक निश्चित वक़्त का समाज देख के बनती हैं, जिन्हें बाद में आने वाली पीढ़ियां फॉलो (पालन) करती रहती हैं... और वे कुरीतियां सदियों तक चलती रहती हैं. फिर हटाओ तो विरोध इसलिए होता है कि वो सदियों से चली आ रही थी.
जरूरी नहीं हमारे बाप-दादाओं ने जो किया वो सही हो और जो हम आज करें वो कल के वक़्त के हिसाब से सही हो. क्यूंकि नैतिकता वक़्त और समाज दोनों के हिसाब से बदलती है... और इसलिए किसी भी रीति का बदलना भी जरूरी है... नहीं तो वो कुरीति में परिणित हो जाएगी.
विरोध इस निर्णय का नहीं बल्कि इस बात का होना चाहिए कि ये निर्णय इतनी देरी से क्यों आया.
इतिहास गवाह है जितना समाज और धर्म का बेड़ागर्क धर्मगुरुओं ने किया है उतना शायद ही किसी ने किया हो. भोपाल में होने वाली मौलवियों की मीटिंग कितना करेगी, देखने वाली बात होगी.
Vivek | 2017

Saturday, August 6, 2022

भोपालनामा 3

 शाम-ए-शहर-ए-दिल्ली तुम्हारे संग खूबसूरत हो जाती है. संग तुम्हारे मैं भोपाल से इश्क़ में पड़ जाता हूं. जैसे शहर से इश्क़ होने के लिए उस शहर तुम्हारा होना जरूरी हो.

Thursday, August 4, 2022

भोपालनामा 2

 एक लड़का जिसके ज़िस्म में भोपाल बसा हुआ है। वो वीआईपी रोड पर दौड़ना चाहता है, लेक पे घंटों बैठना। उसे वन विहार में साइक्लिंग करनी है और महावीर टेकरी पर चढ़ लिखना होता है।

वो भोजपुर में कई दिन अधूरा शिवमन्दिर देख बिता सकता है। जैसे उसका ज़िस्म कोलार से लेक तक फैला हुआ हो।
'तुम्हें पता है, मुझे अब भोपाल पसंद नहीं।' वो एक दिन कहता है। 'पता है, मैं यहां बसना चाहता था, ज़िंदगी बिताना चाहता था... लेकिन अब नहीं।'
मैं कारण नहीं पूछता। मैं जानता हूं। 'तुम्हें अब भी उसकी याद आती है? लेकिन वो अब भोपाल में तो नहीं है।'
'वो नहीं यार वक्त याद आता है। सुकूं याद आता है। वो नहीं है वहां, उसके साथ का वक्त अब भी वहीं है। वो हर जगह छितर गई है यार।'
तुम राइटर्स ज्यादा ही फिलोसॉफिकल होते हो।
वो इस सड़क की ओर देख रहा है, जो भोपाल की तरफ जाती है।

Tuesday, August 2, 2022

भोपालनामा

 'मैं अपने हिस्से की ज़िन्दगी तुम्हारे पास छोड़ के जा रहा हूं' लड़का जाते जाते बोलता है. लड़की को कुछ समझ नहीं आता.

लड़का अजीब है उसे दुनिया के सारे इल्म चाहिए. पढ़ता है तो पागलों की तरह पढ़ता है, लिखता है तो पागलों सा. कई कई घंटे तेज आवाज़ में गाने सुनता है. वो भी 60s के गाने, क्लासिकल या इंस्ट्रुमेंटल. लड़का घूमता है, उस फोटोग्राफी का शौक है. जैसे उसे सबकुछ सबकुछ ही भरना है अपने अंदर!
लड़की अलग है, लड़के से बिल्कुल अलग. ज़िन्दगी के कैलकुलेशन में उलझी है. एक ओर ज़िन्दगी उसके मज़े लेने पे तुली है दूसरी ओर वो लड़के का हाथ थाम सुकून पाती है. लड़के को हग करते वो सबकुछ सबकुछ भूल जाती है. लड़की के ज्यादा शौक नहीं. ना ज्यादा पढ़ती है ना सोलो ट्रिप से कोई प्लान हैं. लेकिन जब लिखती है... लड़के पे लिखती है तो अमृता प्रीतम हो जाती है.
लड़का लड़की एक दूसरे के साथ होते हैं तो दिन भर लड़ते हैं. लड़के का खाना लड़की से लड़े बिना नहीं पचता. लड़की कहती है कि उम्र भर साथ रहे तो एक दूसरे की जान ले लेंगे, अच्छा हुआ उम्र भर के वादे नहीं हैं.
लड़का जा रहा है शहर छोड़ के हमेशा हमेशा के लिए. लड़की आखिरी दफे गले लगती है. लड़के की आँखों में आंसू हैं... 'अबे ऐसे रो रहे हो जैसे उम्र भर न मिलना हो. मैं आ रही हूँ कुछ दिन में... तुम्हारे शहर.'
लड़का हाँ में जवाब देता है. लड़के के अंदर अजीब सा भय है. उसे अजीब सा शक है कि ये आखिरी हग है. वो लड़की को चूमता है... आखिरी दफे!
लड़का जाता है सोलो ट्रिप पर.... नार्थ-ईस्ट. लड़की जाने के बाद एकटक घूरती रहती है दरवाजा. जैसे दरवाजे उसकी जान ले के कोई जा रहा हो.
लड़की तीन दिन से सोई नहीं है. होंठो पे आखिरी बोसे के निशान अभी तक ज़िंदा करके रखे हैं. पता नहीं कहाँ कहाँ से लड़के के क्या क्या ख्याल ले के आती है... कि नींद में भी बड़बड़ाती है.
ट्वेंटी सेवन किल्ड इन आ ट्रैन एक्सीडेंट' अख़बार के फ्रंट पेज की खबर है.
दरवाजे से सच में लड़की की जान गई थी! अख़बार मौत की खबर लाने बने हैं!
लड़की लड़के के शहर जाती है.... भोपाल. लेक के किनारे, सड़कों पर, भारत भवन और लड़की के होंठों पर आखिरी बोसे में... बस यादें बची हैं.
'मैं अपने हिस्से की ज़िन्दगी तुम्हारे पास छोड़ के जा रहा हूं... लेकिन लड़की ने खुद के हिस्से का ही जीना छोड़ दिया है... लड़की अब किसी से भी नहीं झगड़ती...

Thursday, May 5, 2022

India As I Know: Story of The #SaveBuxwahaForest Movement.



#SaveBuxwahaForest Movement को सोशल मीडिया पर मैं करीब से शुरू से ही देख रहा था. यह पर्यावरण से जुड़ा Movement था इसलिए इसमें मेरी उत्सुकता कुछ ज्यादा थी। लेकिन अब तक मुझे वही पता था जो मैंने सोशल मीडिया पर पढ़ा था इसलिए मैंने और कुछ जानने के लिए संकल्प से संपर्क किया। संकल्प उसी क्षेत्र से हैं और आंदोलन की शुरुआत संकल्प और उनके कुछ साथियों ने ही मिलकर की थी।


संकल्प से मैं मुख्यतः था 2-3 प्रश्न करता हूं कि आंदोलन शुरू कैसे हुआ? इस आंदोलन से अब तक क्या-क्या फायदे हुए हैं? और इस आंदोलन से आप और आपके मित्रों ने क्या सीखा? अंतिम प्रश्न इन युवाओं की सोच जानने के लिए किया गया था।


मात्र 24 वर्षीय संकल्प बताना शुरू करते हैं। ' भैया अप्रैल 2021 की बात है, मैं और मेरे साथी को कोविड में काम कर रहे थे उसी दौरान अखबार में एक खबर आई कि बक्सवाहा के आसपास के जंगल का क्षेत्र आदित्य बिरला ग्रुप की एक कंपनी के लिए लीज पर दिया जा रहा है जिससे वहां हीरे का उत्खनन किया जा सके। क्योंकि बक्सवाहा क्षेत्र और पूरा संपूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र ही गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा और रोजगार की कमी से प्रभावित रहा है इसलिए मेरे लिए खुश कर देने वाली खबर थी। लेकिन मैंने अखबार की हेडलाइंस को फॉलो करना शुरू कर दिया तो पता चला इसके लिए तकरीबन 2,15,875 (दो लाख पंद्रह हजार आठ सौ पचहत्तर) पेड़ काटे जाने हैं जिससे उस क्षेत्र के तकरीबन 10 हजार लोग प्रभावित होने वाले थे। अधिकतर लोग लघु वनोपज- महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी गुठली, जलाऊ लकड़ी और चारे के लिए जंगल पर निर्भर हैं। इसलिए उन पर प्रभाव ज्यादा पडने वाला था। साथ ही मैंने पड़ा कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मात्र 400 लोगों को वहां पर रोजगार मिलने वाला था जिसमें से अधिकतर कुशल (skilled) और अर्ध कुशल (Semi-Skilled) लेबर का उपयोग होना था मतलब की स्थानीय लोगों को बहुत ज्यादा फायदे वहां पर नहीं थे किंतु उनकी आय जरूर खतरे में थी। 


मैंने और मेरी अन्य साथियों ने मिलकर रिसर्च की तो पता चला कि यह क्षेत्र केन्‍द्रीय भूमि जल बोर्ड ( Central Ground Water Authority (CGWD))  द्वारा 2017 में सूखा प्रभावित क्षेत्रों (Semi Critical Condition) में घोषित है किंतु यहां पर 160 लाख लीटर पानी प्रतिदिन उपयोग किया जाना था मतलब साफ था पानी का अत्यधिक उपभोग उस जगह होना था जहां पर पानी की पहले से ही कमी है। इसके लिए वहां पर वन में उत्सर्जित होने वाली धाराओं पर बांध बनाए जाने थे मतलब साफ था कि छोटे-छोटे नाले सूख जाने थे। छोटे नालों से पानी नदी में बहकर जाता है। इसलिए बेतवा, शासन नदियां भी प्रभावित होने वाली थीं। साथ ही यह ओपन कास्ट माइनिंग का प्रोजेक्ट था अतः भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge System) भी खत्म होने वाला था और भौम जलस्तर (Water Table) भी तीव्रता से नीचे जाने वाली थी। मतलब साफ था कि  स्थानीय लोगों को ना तो रोजगार था वहां पर ना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा फायदा होने वाला था, जबकि ढेर सारे घाटे सामने आने वाले थे। जिसमें सबसे बड़ी समस्या पानी की होने वाली थी।


हमने संपूर्ण रिसर्च की थी और उसका डाटा सोशल मीडिया पर पोस्ट और वीडियो के माध्यम से डालना शुरू किया। धीमे धीमे अन्य डॉक्यूमेंट पढ़े

तो पता चला 2014 में जो फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट दी गई थी उसमें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wild Life (Protection) Act, 1972) के Schedule-I की 7 प्रजातियां वहां पर दिखाई गई थी साथ में बहुत सारे जानवर (तेंदुआ, भालू, काला हिरण, चीतल, मोर, लकड़बग्घा, फॉक्स इत्यादि)  वहां पर प्रदर्शित किए गए थे लेकिन नई फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट में ये सब प्रदर्शित ही नहीं किए गए थे। प्रदर्शित किया गया था कि एक भी जानवर 382 हेक्टेयर के जंगल में नहीं है! जबकि सच ये नहीं था।


 इंटरेस्टिंग बात तो यह है भैया कि मात्र 19 किलोमीटर पर पन्ना टाइगर रिजर्व की बफर जोन है। साथ ही यही क्षेत्र पन्ना टाइगर रिजर्व और नौरादेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी के बीच में एक कॉरिडोर का भी काम करता है, इसलिए वाइल्डलाइफ के हिसाब से भी यह बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।


हमने सारी डिटेल को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना शुरू कर दिया और देखते ही देखते न्यूज़ वालों ने हमारी खबरों को सोशल मीडिया से उठा उठा कर के अपने न्यूज़पेपर में और न्यूज़ चैनल में डालना शुरू कर दिया। मजेदार था कि उनकी खुद की रिसर्च कुछ भी नहीं थी, वह हमारी सोशल मीडिया अकाउंट से उठा उठा कर के ही फैक्ट डाल रहे थे।


धीमे धीमे यह हुआ कि देश की सबसे बड़ी पर्यावरण (Environment) से संबंधित मैगजीन डाउन टू अर्थ (Down To Earth) में भी इसके बारे में छपा, ज़ी न्यूज टीवी चैनल ने भी उसके बारे में डाला और झारखंड के, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र संघ, छोटे-बड़े एनजीओ भी हमारे साथ आना शुरू कर दिया।


हम सब ने मिलकर के छोटे बड़े एनजीओ के साथ विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2021 को #SaveBuxwahaForest मूवमेंट  ट्विटर पर चलाया और उस दिन वह टॉप 3 ट्रेंडिंग हैशटैग में से एक था।


हम युवा अपना हर कदम फूंक-फूंक कर के रख रहे थे. क्योंकि हमें रिसर्च भी करनी थी, हमें यह भी ध्यान देना था कि यह आंदोलन गलत हाथों में ना चला जाए, हमें यह भी ध्यान रखना था कि हम कानून का किस तरीके से उपयोग कर पाएंगे और किस तरीके से समाज के हर तबके को शामिल कर (सोशल मोबिलाइजेशन) के लोगों को अपने साथ शामिल करवाएं.


इसके लिए हमने अलग अलग टीम बनाई। दृगपाल सिंह, अभिषेक जैन ने बहुत अच्छी तरीके से सोशल मोबिलाइजेशन किया। विवेक दांगी, अनुज पाटनी ने बहुत अच्छी तरीके से सर्च की। आशिक मंसूरी ने इमली घाट, कसेरा, बक्सवाहा में नुक्कड़ सभाएं की। हमारी मेहनत देख ग्राउंड पर और सोशल मीडिया पर लोगों ने जुड़ना शुरू कर दिया।


इसका फायदा यह हुआ कि मूवमेंट के सपोर्ट में देश भर से लोग आ गए सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट में कई लोगों ने याचियाएं लगाईं। डॉ धरनेंद्र द्वारा एनजीटी में केस दर्ज किया गया और उनकी याचिका पर एनजीटी ने बुक्सवाहा में माइनिंग के खिलाफ अगस्त में स्टे लगा दिया। उस पर मुहर लगाते हुए हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2021 में स्टे ऑर्डर दे दिया।


संकल्प इतनी सारी बातें इतनी आराम से मुझे बता रहे थे कि मैं उनके ज्ञान, उनकी कोशिशों को देखकर हतप्रभ था। इसलिए मैंने उनसे पूछ ही लिया कि "आपका क्या पॉलिटिक्स में आने का इरादा है?" 

वे बोलते हैं "नहीं भैया, मेरा कोई इरादा राजनीति करने का नहीं था। इनफैक्ट हम में से किसी का भी इरादा राजनीति करने का नहीं था। हम लोग अपने क्षेत्र के लोगों का सोच कर के यह कार्य कर रहे थे। अभी भी मैं समाज के अंदर जाकर के कुछ बदलाव लाने के लिए सिविल सर्विसेस की तैयारी कर रहा हूं।"


मैंने उनसे पूछा "आप और आपके दोस्तों पर इस आंदोलन का क्या प्रभाव पड़ा?"


  वह बोलना शुरू करते हैं "भैया सबसे बड़ी बात तो हम सब का ज्ञानवर्धन हुआ। हमें पहली बार पता चला कि क्या-क्या क्लीयरेंस देश में माइनिंग के लिए ली जाती है। इसके अलावा हम लोगों को जोड़ पाए थे, हमारी सभा में लोगों ने हमें सुना था। पहली बार हम लगा था कि हम सब मिलकर काम करें तो वह बेहतरीन काम कर सकते हैं। पहली बार हम एक टीम के रूप में आए थे जिनमें से अधिकतर लोगों को तो मैं पहले से जानता भी नहीं था और कुछ से तो अभी तक नहीं मिला हूं।


हमने सीखा कि First Study, Learn then Act (पहले पढ़ो, सीखो, फिर काम करो) हमने सीखा कि किस तरीके से सरकार के द्वारा बनाए गए चैनल/कानून का जैसे एनजीटी, आरटीआई, हाईकोर्ट का सही तरीके से प्रयोग किया जाता है। लोगों का साथ कैसे मिलता है, मैनेजमेंट कैसे किया जाता है और नकारात्मक लोगों से कैसे दूर रहा जा सकता है।


मजेदार तो ये था कि हमें कुछ लोगों ने देशद्रोही तक घोषित करने की कोशिश की। फेसबुक पर कुछ ग्रुप के द्वारा हमारे खिलाफ वीडियो डाले गए, स्थानीय विधायक ने हम लोगों के लिए "भटके हुए युवा जो विकास के खिलाफ हैं" तक कहा।


तब भी हम सब  उन सब के खिलाफ डटे हुए थे। हमारी अच्छी कोशिशें देख वाटरमैन ऑफ इंडिया श्री राजेंद्र सिंह, मेधा पाटेकर,आशीष गौतम, एक्टर अखलेंद्र मिश्र, आशुतोष राणा,  जी पाटन ऑफ इंडिया मेघा पाटेकर राम आशीष गौतम, धरनेंद्र जी, अंकिता जैन, निखिल दवे साथ आए, डाउन टू अर्थ, द वायर, क्विंट हिंदी, भास्कर आदि ने इस आंदोलन के बारे में लिखा।'


अंत में संकल्प मेरे से एक बात कहते हैं, " भैया कैंपा एक्ट (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority (CAMPA) Act) अंतर्गत हुए compensatory Afforestation (प्रतिपूरक वृक्षारोपण) से उसी गुणवत्ता का जंगल खड़ा नहीं सकता है। बिना वाइल्डलाइफ के यह चंद पेड़ों का समूह बस होगा।"


बक्सवाहा के जंगलों की स्थिति अभी ये है कि उत्खनन पर हाई कोर्ट के आदेशानुसार फिलहाल रोक लगी हुई है। सागर विश्वविद्यालय ने उसी क्षेत्र में 9000 साल पुराने भृत्तिचित्रों की ख़ोज की है,  इसलिए इस क्षेत्र को सुरक्षित रखने का एक और कारण हमारे पास पास है।


#indiaasiknow #youthiconofindia


(तस्वीरें: संकल्प और बक्सवाहा के जंगल)

Wednesday, January 12, 2022

India As I Know: The Super Teacher #youthiconofindia

 


मैं सुबह से भ्रमण पर हूं। 'सर, यह निगहरी गांव है।' साथ में बैठा साथी बोलता है.


मैं गाड़ी की खिड़की से देखता हूं। बहुत छोटा सा गांव है 60 70 घरों का। इस जगह पर ऐसा भी नहीं है कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की इमारत या साक्ष्य हो। इसलिए उनसे पूछता हूं , 'ऐसा क्या खास है इसमें?'

'सर यहां के प्राइमरी शाला के मास्टर राजेश सोनी से मिलवाता हूं, 2019 में कलेक्टर साहिबा भी मिलने को आ चुकी हैं'

'सिर्फ सोनी जी से मिलने के लिए आई थीं?'

'जी सर'


हम निगहरी के प्राथमिक स्कूल के सामने खड़े हैं। सरकारी स्कूल ही है, मध्य प्रदेश के अन्य स्कूलों की तरह।


हम अंदर जाते हैं, 20-30 बच्चे बाहर ही चबूतरे पर सर्दी की धूप का आनंद लेते हुए बैठे हुए हैं। साथी मेरा परिचय देते हैं। सोनी जी एवं एक अन्य शिक्षक राजपूत जी आगे आते हैं।

'सर बड़े दिन से मैं आपसे मिलना चाहता था।' वह हाथ मिलाते हुए बोलते हैं।


फिर वह वह के स्कूल के कक्ष के अंदर लेकर जाते हैं। सामने दो चित्र हैं- पहला, सागर के तत्कालीन कलेक्टर Preeti Maithil Nayak IAS के आगमन का। दूसरा, नीति आयोग के लिए काम कर रहीं श्रीमती सचिता गुरुंग का।


' सर इन लोगों ने स्कूल आकर मेरे काम की सराहना की थी।' दोनों चित्रों के आगंतुक बड़े प्यार से जमीन पर बैठकर बच्चों के साथ किसी TLM (Teaching Learning Module/Material) को देख रहे हैं।


हम कक्ष के अंदर जाते हैं और मुझे समझ में आते हैं कि राजेश सोनी जी कोई साधारण प्राइमरी स्कूल टीचर नहीं हैं। अंदर दीवारों पर, फर्श पर टेबल बहुत सारे उनके स्वयं के बनाएं इंस्ट्रूमेंट रखे हुए हैं।


वे उत्साह से बताना शुरू करते हैं 'सर, इस कच्ची उम्र में बहुत आसानी से बच्चों को विषय समझ नहीं आते हैं इसलिए मैंने पढ़ाने के लिए नए-नए इंस्ट्रूमेंट बनाएं जिससे बच्चा आसानी से समझ लेते हैं। सारे इंस्ट्रूमेंट कबाड़ को रिसाइकल करके बनाए हैं। कुछ में थर्माकोल की सीट का उपयोग है।'


वे एक TLM इंस्ट्रूमेंट के पास लेकर जाते हैं। सर अगर में बच्चों से पूछता हूं कि 3+ 5 कितना होगा तो वह पहले इंस्ट्रूमेंट की 3 लिखी जगह की चाबी खींचेगा, फिर 5 की। दोनों बारे में उसे अंक अनुसार कंचे नीचे मिल जाएंगे। फिर बस वो उनको गिनकर उत्तर दे देगा।


दीवार पर चार पांच सर्किल के बने हुए हैं। पता चलता है कि एक भाग, एक तिहाई भाग, एक चौथाई भाग क्या होते हैं।


एक प्यारा सा खिलौना शब्द चक्र है जिसमें घुमाने पर दो या तीन अक्षर के शब्द बन जाते हैं। मैं घुमाकर 'बस' और 'पल' बनाता हूं। बहुत ही मजेदार और इंटरेस्टिंग था। शुरू करता हूं तो घुमाता ही रहता हूं।


कबाड़ से एक बहुत प्यारा गुलदस्ता बनाया है। उसके फूलों पर कार्डबोर्ड की तितलियां हैं जिन पर बहुत खूबसूरतीसे अंग्रेजी व हिंदी में दिन लिखे हुए- Sunday रविवार Wednesday बुधवार।


'सर 5 लीटर की खाली कुप्पी से पॉट बनाया है और रंगीन पॉलिथीन से फूल। इससे बच्चे रंग भी पहचानते हैं और दिन भी समझते हैं।'


 छोटे-छोटे पॉकेट वाला एक बोर्ड है जिसकी हर पॉकेट में एक शब्द रखा हुआ है, जमीन पर सांप सीढ़ी बनी हुई है। वजन मापन समझाने खुद से बनाई तराजू है, खुद के बनाए वजन हैं। ऐसी अनेक छोटे छोटे इंटरेस्टिंग खिलौने हैं।


बच्चों को पढ़ाने का एक यूनिट तरीका है बहुत ही मजेदार इतना कि किसी खिलौने को आप हाथ में ले ले तो खुद ही बहुत देर खेलते रहें।


सागर जिले की देवरी तहसील के छोटे से गांव जनजाति बहुत निगाहरी गांव के प्राथमिक शाला के शिक्षक के पास इतनी क्रिएटिविटी होगी, इतने नए तरीके होंगे, मैंने सोचा नहीं था।


 मैं उनसे एक दो सवाल करता हूं। वह बताना शुरू करते हैं-


'सर ये बहुत छोटा सा गांव है, पूरे जनजातीय लोग हैं। लगभग सभी गरीब हैं। मैं जब गांव आया तो लगा कि कुछ किया जाना चाहिए। मुझे पढ़ाने में इंटरेस्ट था, मेरी पेंटिंग भी अच्छी है, इसलिए मैंने कुछ अलग तरीके से समझाते हुए पढ़ाने का सोचा।'


'बच्चे जब बहुत अच्छे से पढ़ते हैं, सवाल हल करते हैं या शब्द पहचानना शुरू करते हैं तो बड़ी खुशी होती है। इस उम्र में बच्चे खेल खेल में ही सीखते हैं।'


मैं उनसे विदा लेकर गाड़ी में बैठता हूं। मेरे साथी बताना शुरू करते हैं। 'सर सच तो ये है कि सोनी जी ने बच्चों को लगभग गोद लिया हुआ है। बच्चों के हांथ मुंह धुलने से लेकर नाक पोंछने तक, जरूरत की दवाई देने तक का काम सोनी जी करते हैं। जरूरत पड़ने पर बच्चों के परिवार की आर्थिक मदद भी करते हैं। बहुत मेहनत करते हैं।'


अपने काम से इतना प्यार करने वाले इतनी शिद्दत से अपना काम करने वाले बहुत ही कम लोग होते हैं।


बहुत छोटी उम्र छोटी जगह पर बहुत सारे Unsung Heroes बहुत बड़ा difference create कर रहे हैं। राजेश सोनी जी और Abhishek जैसे लोग से उनमें से एक है।


अक्सर बच्चे और PSC की तैयारी कर रहे युवा मेरे से मुझसे पूछते हैं कि 'मैं कुछ बड़ा करना चाहता हूं, मुझे आगे क्या करना चाहिए?'

अपने छोटे छोटे काम को सही ढंग से किया जाए तो वह भी बड़ा काम हो होगा। कोई भी काम बड़ा नहीं होता है बल्कि अपने काम को ईमानदारी और मेहनत से करना ही एक बड़ा काम है। 


#indiaasiknow 


[फोटो: श्री राजेश सोनी जी ]