Friday, April 20, 2018

आपको पता है, ‘हरिऔध’ का घर और स्मृतियां दोनों खंडहर हो गई हैं


कोई पूछे कि खड़ी बोली में रचा गया पहला महाकाव्य कौन-सा है तो हिंदी साहित्य के सामान्य जानकार को भी ‘प्रिय प्रवास’ का नाम लेते देर नहीं लगती.
माध्यमिक शिक्षा परिषदों के हाईस्कूल और इंटर के हिन्दी के प्रश्नपत्रों में यह या इससे संबंधित कोई और प्रश्न पूछा जाता है तो ज़्यादातर परीक्षार्थी फौरन अपना उत्तर लिख देते हैं, ‘सत्रह सर्गों में विभाजित ‘प्रिय प्रवास’ में इसके रचयिता द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने ‘कृष्ण के दिव्य चरित का मधुर, मृदुल व मंजुलगान’ किया है, जिसके लिए उन्हें अपने समय का प्रतिष्ठित मंगला प्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था.’
प्रसंगवश, हरिऔध ने इसकी सर्जना की तो, जैसा कि उन्होंने इसकी भूमिका में लिखा है, खड़ी बोली में कुछ छोटे-छोटे काव्य-ग्रंथ ही थे. उनमें से भी ज़्यादातर सौ-दो सौ पद्यों में ही समाप्त होने वाले या अनूदित. मौलिक तो एकदम से नहीं.
हरिऔध के ही शब्दों में, ‘मैथिलीशरण गुप्त का ‘जयद्रथ वध’ नि:संदेह मौलिक ग्रंथ है, परन्तु यह खंड-काव्य है. इसके अतिरिक्त यह समस्त ग्रंथ अन्त्यानुप्रासविभूषित है, इसलिए खड़ी बोलचाल में मुझको एक ऐसे ग्रंथ की आवश्यकता देख पड़ी, जो महाकाव्य हो और ऐसी कविता में लिखा गया हो, जिसे भिन्न तुकांत कहते हैं. अतएव मैं इस न्यूनता की पूर्ति के लिए कुछ साहस के साथ अग्रसर हुआ और अनवरत परिश्रम करके ‘प्रिय प्रवास’ नामक ग्रंथ की रचना की.’
पहले उन्होंने इसका नाम ‘ब्रजांगना-विलाप’ रखा था, किन्तु बाद में बदलकर ‘प्रिय प्रवास’ कर दिया और बेहद विनम्रभाव से ‘स्वीकार’ किया, ‘मुझमें महाकाव्यकार होने की योग्यता नहीं, मेरी प्रतिभा ऐसी सर्वतोमुखी नहीं जो महाकाव्य के लिए उपयुक्त उपस्कर संग्रह करने में कृतकार्य हो सके, अतएव मैं किस मुख से यह कह सकता हूं कि ‘प्रिय प्रवास’ के बन जाने से खड़ी बोली में एक महाकाव्य न होने की न्यूनता दूर हो गई. हां, विनीत भाव से केवल इतना ही निवेदन करूंगा कि… जब तक किसी बहुज्ञ मर्मस्पर्शिनी-सुलेखनी द्वारा लिपिबद्ध होकर खड़ी बोली में सर्वांग सुंदर कोई महाकाव्य आप लोगों को हस्तगत नहीं होता, तब तक यह अपने सहज रूप में आप लोगों के ज्योति-विकीर्णकारी उज्ज्वल चक्षुओं के सम्मुख है, और एक सहृदय कवि के कंठ से कंठ मिलाकर यह प्रार्थना करता है, ‘जबलौं फुलै न केतकी, तबलौं बिलम करील.’
हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ‘विद्यावाचस्पति’ उपाधि से सम्मानित और उसके सभापति रहे ‘हरिऔध’ शुरू में ब्रजभाषा में कविताएं करते थे.
बाद में महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से खड़ी बोली में सक्रिय हुए और वात्सल्य व करुण रसों के सिद्धकवि बनकर भाषा, भाव, छंद व अभिव्यंजना की पुरानी परंपराएं तोड़ डालीं.
‘प्रिय प्रवास’ के अतिरिक्त उन्होंने ‘पारिजात’ और ‘वैदेही वनवास’ शीर्षक से दो प्रबंध काव्य तो दिए ही, ‘प्रद्युम्न विजय’ व ‘रुक्मिणी परिणय’ जैसी नाट्यकृतियों में भी अपनी प्रतिभा प्रदर्शित की.
‘प्रेमकांता’, ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ और ‘अधखिला फूल’ नामक उपन्यास भी उनके खाते में हैं, जो कम से कम इस अर्थ में तो महत्वपूर्ण हैं ही कि वे हिंदी उपन्यासों की शुरुआत के दौर में लिखे गए.
‘हरिऔध सतसई’, ‘चोखे चौपदे’, ‘चुभते चौपदे’ और ‘बोलचाल’ समेत मुक्तकों के कई संग्रह भी हिन्दी साहित्य की उनकी ऐतिहासिक सेवा के गवाह हैं और इसीलिए कई लोग उन्हें ‘अपने समय का सूरदास’ भी कहते हैं. जैसे मुंशी प्रेमचंद उपन्यास सम्राट कहे जाते हैं, वैसे ही ‘हरिऔध’ अपने प्रशंसकों के लिए ‘कवि सम्राट’ हैं.
लेकिन विडंबना देखिए कि हिन्दी साहित्य की ऐसी अतुलनीय सेवा के बावजूद आज न हरिऔध की उपेक्षा की कोई हद रह गई है और न विस्मरण की.
उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के जिस निज़ामाबाद कस्बे में भोलानाथ उपाध्याय के पुत्र के रूप में 15 अप्रैल, 1865 को वे जन्मे, वहां भी उनकी जयंतियों व पुण्यतिथियों पर ‘कर्मकांडीय विलाप समारोहों’ के अलावा कुछ नहीं होता.
वहां उनका ऐसे बेगानेपन से सामना है कि जिस घर कच्चे में वे पैदा हुए थे, वह खंडहर में बदल गया है, लेकिन किसी की भी पेशानी पर बल नहीं पड़ रहे. उसकी सार-संभाल या पुनरुद्धार की बात तो जैसे किसी को सूझती ही नहीं.
यों, इसका एक बड़ा कारण यह है कि हरिऔध के पट्टीदारों ने उनकी विरासत को लंबे अरसे तक झगड़े में फंसाकर उन्हें जैसी ‘श्रद्धांजलि’ दी, वैसी किसी दुश्मन को भी न मिले तो ठीक.
हां, हिन्दी समाज ने पहले तो पट्टीदारी के इस विवाद के बहाने हरिऔध की स्मृति रक्षा के दायित्व से मुंह मोड़े रखा और अब उनकी बची-खुची यादें सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी भी नहीं निभाना चाहता.
आजमगढ़ निवासी वयोवृद्ध साहित्यकार जगदीशनारायण बरनवाल ‘कुंद’ इस पर गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए कहते हैं कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद और कवि सम्राट हरिऔध की जन्मस्थलियों में फ़र्क़ है तो सिर्फ़ यह कि प्रेमचंद की स्मृतियों के संरक्षण को लेकर तो शासन-सत्ता, हिंदी सेवी और परिजन यदा-कदा चिंतित हो लेते हैं, जिस कारण वे लावारिस होने से बच गई हैं, लेकिन हरिऔध की स्मृतियों की किसी को कतई फ़िक्र नहीं. सत्ताओं को ख़्याल ही नहीं आता तो हिंदीसेवियों को फ़ुरसत ही नहीं मिलती.
कुंद बताते हैं कि इसी कारण कभी चुभते और चोखे चौपदों की रचना करने वाले हरिऔध की स्मृतियां भी चुभने लगी हैं.
एक वक़्त इलाहाबाद से प्रकाशित प्रतिष्ठित दैनिक ‘भारत’ के संपादक मुकुंददेव शर्मा, जो हरिऔध के वंशजों में से एक थे, के प्रयासों से आज़मगढ़ शहर में पुरानी कोतवाली के पास भव्य ‘हरिऔध पुस्तकालय’ खुला था, जिसमें हरिऔध का संपूर्ण साहित्य तो उपलब्ध था ही, मुकुंददेव शर्मा के सौजन्य से प्राप्त हुई हरिऔध के निजी पुस्तकालय की अनेक दुर्लभ पुस्तकें भी थीं. लेकिन सामाजिक कृतघ्नता की हद कि अब इस पुस्तकालय को हमेशा के लिए बंद कर उसके भवन में एक विभाग का कार्यालय खोल दिया गया है और किसी को नहीं मालूम कि उसकी अनेक दुर्लभ पुस्तकें किस हाल में हैं.
दशकों पहले, कलाओं के उत्थान, संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए आज़मगढ़ में रैदोपुर और सिविल लाइंस के बीच विकास भवन क्षेत्र में ‘हरिऔध कला भवन’ बना था तो वह सारे आज़मगढ़वासियों के लिए गर्व का कारण था, लेकिन इस भवन की मार्फत हरिऔध की स्मृतियां अक्षुण्ण रखने की उनकी मनोकामना फिर भी पूरी नहीं हुई.
वे उसमें हरिऔध शोध पीठ की स्थापना की मांग ही करते रहे और नौबत यहां तक आ पहुंची कि जर्जर होने के बाद उसके भवन को ध्वस्त कर दिया गया.
प्रदेश की पिछली सरकार के दौरान 17 करोड़ रुपयों के बजट से उसका पुनर्निर्माण शुरू किया गया तो अभी तक दो मंजिलों का निर्माण ही हो पाया है और तीसरी मंजिल पर दीवाल बनाकर छोड़ दिया गया है.
कार्यदायी संस्था की मानें तो इसका कारण यह है कि निर्धारित बजट में से उसे अभी सिर्फ़ आठ करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं. अभी नौ करोड़ रुपयों की और आवश्यकता है जबकि सरकार ने सिर्फ एक करोड़ रुपये अवमुक्त किए हैं. देखना है कि इस कछुआ चाल से केंद्र का निर्माण कब तक पूरा हो पाता है.
दूसरी ओर निज़ामाबाद कस्बे में हरिऔध के घर के बगल में ही पक्के मकान में रह रहे उनके पट्टीदार पंडित गोपालशरण उपाध्याय कहते हैं कि हरिऔध के अपनों ने ही उनकी ओर से मुंह फेर लिया है और उनकी यादें संजोने के लिए उनकी ओर से कोई कोशिश नहीं हो रही, तो हम क्या करें?
लेकिन जिन्हें कुछ करना है, वे ऐसे सवाल नहीं पूछ रहे. एक हरिऔध प्रेमी ने उनकी जन्मस्थली पर उनके नाम से दो स्कूल स्थापित किए हैं. उसने इन स्कूलों में कवि सम्राट की प्रतिमा लगाने और वाचनालय खोलने के लिए प्रदेश सरकार से लंबी लिखा-पढ़ी भी की मगर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा. सरकारी फाइलें दौड़ीं, फिर जानें कहां समा गईं और अब बात आई गई होकर रह गई.
2002 में निज़ामाबाद के एक किनारे पर स्थित बाईपास तिराहे पर हरिऔध की एक प्रतिमा ज़रूर लगाई गई, लेकिन कुछ इस तरह कि उसका अनावरण करने वाले मंत्री जी उनसे बड़े दिखें.
शिलापट में हरिऔध का नाम छोटे अक्षरों में लिखा गया जबकि मंत्री का कई गुना बड़े अक्षरों में. कोढ़ में खाज यह कि इसके बावजूद इस प्रतिमा की रंगाई-पुताई व सफाई के लिए धन के लाले पड़े रहते हैं.
अलबत्ता आम निज़ामाबादवासियों ने हरिऔध की यादों को अभी भी दिल से लगा रखा है. इस कस्बे में आपको ऐसे कितने ही लोग मिल जाएंगे जो हरिऔध के अपने बीच का होने पर गर्व करते थकते नहीं और बताते हैं कि हरिऔध ने 6 मार्च, 1947 को इसी कस्बे में आख़िरी सांस भी ली थी.
लगभग 70 प्रतिशत साक्षरता वाले इस कस्बे में हरिऔध की याद में कोई आयोजन फिर भी अपवादस्वरूप ही होता है. कोई पूछे क्यों तो जवाब नहीं मिलता. गर्व करने वाले भी चुप रह जाते हैं.
निज़ामाबाद में निर्मित काली मिट्टी के बर्तन दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं और देश-विदेश के बाज़ारों में उनकी बिक्री से व्यवसायियों को अच्छी-ख़ासी आय होती है.
एक व्यवसायी ने मुझसे कहा कि हरिऔध की याद में कोई कार्यक्रम किया जाए तो बर्तन व्यवसायी उसके लिए धन का टोंटा नहीं होने देंगे. लेकिन कोई इसकी पहल तो करे.
अपने को पढ़ा-लिखा मानने वालों को उनकी विस्मृृति का अपराधबोध तो सताए. अभी तो उन्हें इस बात का अपराधबोध भी नहीं हैं कि कवि सम्राट के नाम पर एक महाविद्यालय की स्थापना का सपना भी सपना ही है.
इस ढेर सारी उपेक्षा के बावजूद हरिऔध अपने साहित्य सृजन के कारण अलग तरह से प्रासंगिक बने हुए हैं और उनकी कई रचनावलियां प्रकाशत हो चुकी हैं.
निज़ामाबाद में उनकी जन्मस्थली तक जाने के लिए पक्की सड़क भी बन गई है, लेकिन कई लोग व्यंग्य करते हैं कि यह सड़क इसलिए है कि सुविधापूर्वक वहां पहुंचकर भरपूर क्षुब्ध हुआ जा सके.
वैसे इस सड़क का श्रेय भी कवि की जन्मस्थली के बगल स्थित चरणपादुका गुरुद्वारे को जाता है जिसकी सिखों में बड़ी प्रतिष्ठा है. कहते हैं कि इस जगतप्रसिद्ध गुरुद्वारे में गुरु तेगबहादुर व गुरु गोविंद सिंह तपस्या कर चुके हैं.
इस गुरुद्वारे से हरिऔध का काफ़ी नज़दीकी रिश्ता रहा है. इसे यूं समझा जा सकता है कि उनके पिता भोलानाथ उपाध्याय ने सिख धर्म अपनाकर अपना नाम भोला सिंह रख लिया था. हरिऔध कई बार उक्त गुरुद्वारे में ही बैठकर सृजन या रचनाकर्म करते थे.
अफसोस कि इस गुरुद्वारे में भी उनकी स्मृति रक्षा के लिए कुछ भी नहीं हो रहा.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)
Source: http://thewirehindi.com/40080/remembering-ayodhya-singh-upadhyay-hari-oudh/

Tuesday, April 17, 2018

[ The Obtuse Angle ] 3

हम सोशल मीडिया पे लिख लिख कर गुस्से का इज़हार करते हैं, वक़्त हुआ तो किसी चौराहे पे मार्च या इंडिया गेट पे कैंडल जलाने में हिस्सा बनते हैं... और लेकिन वोट अपने जाति वाले को ही देते हैं.

हम  इतने सभ्य हैं कि जब तक हादसे घर पे दस्तक नहीं देते खुद की सोच तक हम नहीं बदलते. हमने अपनी जातियों/धर्मों को वोट दिए हैं. हमने अपने फ्रैंकेंस्टीन खुद पैदा किये हैं. 

कितना सुख है शाम को कुर्सी पर बैठ ये सोचने में कि आज हमारे साथ कोई हादसा नहीं हुआ है... और कितना सुकूं है फोन पे ये पता चलने में कि चाहने वाले भी ठीक हैं.

सच तो ये है, सुख के साथ मैं ये लिख रहा हूँ, सुकूं के साथ आप इसे पढ़ने वाले हैं. कल नए फ्रैंकेंस्टीन  फिर पैदा करने वाले हैं. कल फिर सोशल मीडिया पे कवितायेँ, चौराहे पे मार्च और कैंडल जलाने वाले हैं और उसके फोटो चस्पाने वाले हैं.

वैसे पिछली बार की कविता उतनी अच्छी नहीं थी, शायद इमोशंस कम रह गए थे. इस बार तो क्या लिखा है आपने!
इस बार की फोटो ठीक ही है. अगली बार कैंडल सामने और बैनर बगल में रख के फोटो खिचाईयेगा... बेहतरीन आएगी. पूरा एक्टिविस्ट लगेंगे. 

दुआ करता हूँ ये आपके लिए 'अगली बार' जल्दी ही आएगा.

Outrage alone is not going to show us the way forward. The way forward lies in painstaking investment in police resources. We have an abysmal police-population ratio. It needs to improve in quantity and quality. We need better trained investigators with vastly improved forensic facilities. We need programmes to protect crucial witnesses. We need a plea bargaining system so that minor cases don’t clog up our courts. We need a much healthier judge-to-population ratio. We need tougher laws against perjury, false complaints before the police, and for obstruction of justice. We need tough action against police personnel who fail to act without fear or favour. And this action cannot be confined to the junior ranks. Their supervisory officers, including IPS officers, must be held accountable when they fail to act.
The outrage brigade needs to gets its act together and start venting on these issues. Come election time, let every citizen ask their candidates about their proposals for improving the quality of policing. And in between elections, they must hold their elected representatives and the police leadership accountable for delivering on these proposals. It’s a lot harder to do than instant outrage. But there is no other way. If tears, candlelight marches and rants on social media were sufficient to ensure justice for December 16, baby Masoom would be alive and scampering around in some meadow today. 

Wednesday, April 11, 2018

[The Blue Canvas] ८

मेरा लिखा सबकुछ यूं ही छितर जाता है. कई पंक्तियां लिख के दे दी किसी को  तो वापस ना लीं. कई कविताएं पिछले पन्नों में कॉपी के साथ रद्दी में चली गईं. फेसबुक/ब्लॉग पर आधे से कम आता है और फेसबुक पर तो बस वो 'ओनली मी' नहीं होता जो लगता है कि समझ पाएंगे लोग थोड़ा सा... फिर भी तुम पे लिखा सबकुछ जाने क्यूं समेटने की कोशिश कर रहा हूं... शायद कल के लिए यादों के सहारे ढूंढ रहा हूं...

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वो साथ के बहुत दूर चल के ले कर जाने को कहती है लेकिन हकीकत में साथ आना नहीं चाहती.
उसकी कविताएं मेरे बारे में बहुत कुछ बोलती हैं लेकिन जब वो मुंह से वही बोलती है तो इतनी दृढ़ नहीं दिखती. जैसे आंखे बोलते बोलते कुछ और सोचने लगी हों और दिल और कुछ रहा हो.

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मेरे पास वजहें नहीं है प्यार की... शायद कल बस तुम कम अच्छी लगना लग जाओ तो भी वजहें ना हों. लेकिन तुम्हारे पास हैं... कई वजहें इनकार की... कई इकरार की... कई ख़फ़ा करने की... कई बस ना मुस्कुराने की... मैं बस इन्हीं वजहों से डरता हूं... जो सामने आ के खड़ी हो जाती हैं...

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ये बहुत अजीब सा इत्तेफ़ाक़ है कि मेरे सबसे बुरे दिनों में वो लड़की खड़ी रही जिसको मैंने सिर्फ कुछ ही दिन जाना था... और वो लड़कियां सबसे पहले दफा हुईं जिन्हें मैंने चाहा...

अक्सर जब तुम लोगों के लिए उनके हर दौर में खड़े होते हो डिसएपॉइंट होने के पूरे चांस होते हैं क्यूंकि ये सब कर पाना सबके बस की बात नहीं होती.

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ये अजीब दौर है... जहां लोगों से लॉयाल्टी की उम्मीद करना ही बेमानी है... लोग दिल में कुछ अरमान छुपाए, सांसों में कुछ लिए, होंठो पे मुस्कान लिए कुछ ओर जीने की कोशिश कर रहे हैं.

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इस दौर की अजीब सी बेमानी ये भी है कि लोग उन लोगों के साथ अच्छे से पेश आते है जो उनके साथ बत्तमीज़ होते हैं... मतलब अगर मैं फ़िक्र करना छोड़ दूं तो लोग अधिक फ़िक्र करेंगे... और अगर बत्तमीजी से पेश आऊं तो लोग अधिक नरम हो के पेश होंगे!

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वो बोलती है कि ये वाली कविता बहुत अच्छी है और वो वाली जो तुमने मुझे लिखी इतनी अच्छी नहीं है... मैं हंस देता हूं... मुझे ताज्जुब है कि उसे आज भी मेरा लिखा सिर्फ कविता ही लगता है.


यही अंत है...

जल्दी से कुछ लिख लें। जल्दी से कुछ कह दें। जल्दी से किसी को देख लें। जल्दी से कहीं छुप जाएं। जल्दी से कहीं भाग जाएं। जल्दी से कहीं चढ़ जाएं। जल्दी से कहीं उतर जाएं। जल्दी-जल्दी-जल्दी।
यहां से जाना, वहां से आना, वहां बैठना, कहीं और जाकर ठहर जाना, फूल देखना, पत्ती चुनना, हवा रोकना, पानी भरना। सब जल्दी-जल्दी-जल्दी-जल्दी।
ये खा लो, वो पहन लो, उससे मिल लो, वहां बात कर लो, वहां बोल दो, वहां चुप रहो, यहां से दूर रहो, वहां के पास रहो, उससे बोलो, उससे न बोलो, बैठे रहो, खड़े रहो, लेटे रहो। रहो-रहो-रहो। जल्दी में रहो।
धीमे-धीमे आती है बेचैनी। धीमे-धीमे चढ़ता है पारा। धीमे-धीमे उतरता है पानी। धीमे-धीमे चलती हैं आंखें। धीमे-धीमे आती है आवाज। धीमे-धीमे निकलती है बात। धीमे-धीमे पकता है सपना उधार का।
धीमी सी एक बात है- रह कर करेंगे क्या? कर के भी करेंगे क्या? करना क्यों है? क्यों ही क्यों है? जीवन ने मेरे से कभी न पूछा, मैं पूछने वाला कौन हूं?
चुप की बारात है, रोज घोड़े लेकर घेरती है। लकड़ी की मेज है, रोज सामने खड़ी रहती है। खूंटी पर टंगी शर्ट है, हवा चलने पर हिलती है। फिर मन का क्या करूं बुच्चन? सड़ रहे मन का क्या करूं बुच्चन?
एक बच्चा है, जो दूर है। एक दूर है, जो अभी बच्चा है। रुका हुआ पानी है। रुकी हुई कहानी है। लात मार-मारकर जिसे बढ़ाते हैं और पाते हैं कि वो तो हमसे भी पीछे चली गई है।
एक देह है, जो हद के पार कहीं दिखती है। एक आंख है, जिसके हाथ नहीं हैं। एक कमरा है, दीवारों से भरा हुआ। एक रसोई है, जिसमें न आटा है न आलू।
मन चंट है, फिर भी दीवार नहीं तोड़ पाता। पांव में चक्कर है जो पैताने पर मसल देता हूं। दांतों से आज मैं धुंआ पीसता हूं बुच्चन। यही अंत है। है न?


-Rahul (Source: Bazaar)

Sunday, April 8, 2018

लकड़ी


वो लकड़ी है, लड़की नहीं
बड़ी होते ही चूल्हे में जला दी जाएगी.

ये मेरी दोस्त
तुम लकड़ी बन ही रही हो
तो मेरी दादी की लकड़ी बनना
जिससे उन्होंने समाज के ठाकुरों को पीटा
और जरूरत पड़ने पे दादा को भी.
उनकी लकड़ी इतनी ताकतवर थी कि
सारा गांव उनसे डरता था
उन्होंने सपने में तो औरंगज़ेब को भी उसी लकड़ी से मारा होगा
और अंग्रेज़ तो उनकी लकड़ी के सामने ही भागे.

इसलिए मेरी दोस्त
लड़कियां लकड़ियां पैदा होती हैं
जिन्हें बड़े हो के चूल्हे में जलना है
लेकिन तुम इतना तेज़ जलना कि
आग से समाज जला सको
दो चार को धुंएँ से मार सको
और इतना धधकना कि
ये जो आग है
वो बुराई को, बुरा करने वाले को
दशहरे के रावण सा जला दे.

हालाँकि रावण हर वर्ष जलने के लिए नहीं पैदा हुआ था
हर लड़की लकड़ी बनने नहीं पैदा हुई है
हर आदमी जलाने पैदा नहीं हुआ है
और हर एक कि नियति में कांटे नहीं उगे हैं.

लेकिन मुझे भरोसा है
जब अंतिम लड़की लकड़ी बनने से मना कर देगी
उस दिन सब तुम्हें याद करेंगे.
जैसे मैं मंडेला को याद करता हूँ
निडर गाँधी को याद करता हूँ
और लक्ष्मीबाई की आग को याद करता हूँ.

लकड़ी बनना मेरी दोस्त
तो बरसना भी सीखना
गरजना भी सीखना
जलना पर जलाना भी सीखना
गलना पर गलाना भी सीखना.

देखना तुम्हारे आंसू जाया न जाएँ
वो मोती हैं मेरी लिए
और तुम्हारी आँखें सीपी,
जिनमे पड़े सपने
तुम्हें मेरी याद दिलाते रहेंगे.

Saturday, April 7, 2018

मेरे दोस्त

स्थापित सत्यों को नकार कर
रेत बाजुओं में भर 
चाँद तारों को सूली पे चढ़ा देता हूँ.
तुम्हें भय है कि ईश्वर आ जायेगा एक दिन
और मेरे कर्मो का हिसाब लेगा
लेकिन यह स्थापित तथ्य है
और मैं इसे नकारता हूँ.

मुझे ईश्वर नहीं चाहिए
तुम्हारी आस्थाएं और नियम भी नहीं
मैं आदिमानुष हूँ
जो अभी भी उन कंदराओं में जी रहा हैं
जिनमें बस उसके नियम चलते हैं
उन कायदों में बंधा है
जिनसे उसे सुख मिलता है
और उन आँखों से दुनिया देखता है
जो उसे जन्म से मिली थीं.

मुल्कों को नकार 
धर्मों को नकार
जातियां नकार
मिले लिंग को नकार 
युद्धों को नकार
दंगों को नकार
हत्याएं नकार
अभिमान और ज्ञान नकार

जो बचता है
वो थोथला नंगा इंसान है
जिसके कपड़ों से बू नहीं आती 
हत्याओं को,
धरती हड़पने की,
प्रदूषण की,
जन-जंगल-जमीन हरने की 
न किसी स्त्री के खून की.

वो मैं हूँ.
और अगर तुम भी वो बन सकते हो मेरे दोस्त
तो आओ 
मेरे साथ चलो
नंग-धडंग 
अपने समाज, परिवार और आस्थाओं से परे.
यदि नहीं कर सकते ऐसा
तो कितना भी लिख लो तुम 'आज़ादी'
कितना भी कह लो 'फेमिनिज्म'
कितना भी चिल्ला लो तुम 'प्रेम'
तुम्हारा कहा सब मृगमरीचिका है
तुम्हारा ज्ञान सब थोथा विज्ञान है
और रही बात तुम्हारी कविता की
वो सब बारहखड़ी के अलावा कुछ भी नहीं
जो कागज़ रंग रही है
और पेड़ गिरा रही है.

मेरे दोस्त 
कोई भी इंसान आदिमानुष
 हुए बगैर 
कवि नहीं हो सकता
न ही मेरा मित्र.
ये भी एक प्रथम और अंतिम स्थापित सत्य है.

Friday, April 6, 2018

[The Blue Canvas] ७

कभी कभी तुम इतने छोटे हो जाते हो कि एक छोटी कविता में भी समा जाते हो और कभी कभी इतने बृहद की प्रोज भी कम पड़ते हैं.
जब कभी सिकुड़ के मुझमें समाते हो तुम तो इतने छोटे लगते हो की किस नवजात को हाथों में उठाया हो.
और जब कभी तुम्हारे सीने पे सिर टिका मैं ढूंढ़ता हूं सुकून तो लगता है जैसे तुम यकायक से किसी बड़ी सी बिल्डिंग से विशाल हो गए हो कि खुद में समा लोगे मेरे आंसू और खुद मुझे ही!
तुम्हें मेरी हथेलियों बेहद कोमल लगती हैं और मुझे पूरे तुम.
तुम्हारे हाथों को थाम सड़क पार करता हूं तो उतना ही सेफ महसूस करता हूं जितना अपनी मां के हाथ थामे.
और जब तुम दोनों हाथ थाम एकटक देखती रहती हो मुझे तो लगता है कुछ कुछ थम सा गया है वक़्त.
ये अजीब है कि तुम सपनों में नहीं आते... शायद वहां भी हकीकत बन जाते हो.
तुम्हारी फैंटेसी के जैसे तुम्हें कान और गर्दन के बीच चूमते आंखों उग आई महक देखना चाहता हूं जो कभी देख ही नहीं पाया.
तुम्हारी पीठ पर पता नहीं क्या क्या लिख देता हूं मैं जो समझ नहीं आता तुम्हें.
इस बार तुम्हारी पीठ पर अपनी सबसे अच्छी पेंटिंग बनाना चाहता हूं जिसमें उगा देना चाहता हूं पंख और फिर आसमानों में तुम्हें उड़ते देखना चाहता हूं.
तुम ना कहते हो मुझपर लिखो सिर्फ मेरा हो... सच कहूं तो जो भी लिखता हूं सब तुम्हारा हो जाता है.
तुम ना कहते हो कि जाना बस इतने दूर की आखिरी ख़त लिख मिलना चाहूं तो आ पाओ... सच तो ये है वो आखिरी ख़त मैं कभी नहीं देखना चाहता... और ना ही दूर जाना चाहता हूं...

Wednesday, April 4, 2018

तेरे-मेरे

गम के हिस्से कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे हैं
कुछ आंसू तेरे हिस्से हैं, कुछ मेरे हैं
किरचनें ख्वाबों की चुभती हैं
ख्वाब टूटे कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे हैं.
बंद पड़ी ढेरों बातें हैं, 
कुछ बेरंग खत तेरे हैं, कुछ मेरे हैं.
एक बाढ़ छुपी तेरे सीने में हैं
एक मचली नदी मेरे सीने में है.
कुछ नकली रेखाएं तेरी हथेली पर
एक टूटी नियति मेरे जीने में है.
दर्द तेरी बातों में कुछ है
कुछ पिघले लफ्ज़ मेरे हैं
तुझे खुशियां सीने से लगानी मेरे है
मुझे माथे पे सूरज उगाना तेरे है.
लेकिन ज़ख्म नए-पुराने तेरे-मेरे हैं
सारे अरमान अधूरे तेरे-मेरे हैं
सबको हाथ छुड़ाने तेरे-मेरे हैं
क्यूंकि दिल दीवाने तेरे-मेरे हैं
क्यूंकि दिल दीवाने तेरे-मेरे हैं.

Monday, April 2, 2018

[The Blue Canvas] ६

नज़्म तुम्हारे होंठों के नीचे तिल का उगना है... जो अनायास ही उग आया है लेकिन खूबसूरती में चार चाँद लगा देता है.
तुम्हारे होंठों की वो प्यारी सी मुस्कान है जो मुझे बेहद पसंद है... जिसे बनाये रखने मैं अपने को तक जाया कर सकता हूँ.
नज़्म तुम्हारा सीने से चिपकना है और फिर लेटे लेटे आसमान ताकना है... तब ऐसा लगता है जैसे जहां में सिर्फ दो ही लोग हों... शायद एक छोटी सी दुनिया बन जाती है जिसमे हम बस दो लोग रह रहे होते हैं.
नज़्म तुमसे झगड़ना है... सच कहो तो उसके बिना दिन पूरा नहीं होता.
ुम्हारी आँखें... जिनमें कई ख्वाब पले हैं, उन्हें चूमना है. चूमने से लगता है जैसे तुम्हारे ख्वाबों को अपना बना रहा हूँ.
नज़्म वो वक़्त है जो तुम्हारे साथ बीतता है... और वो वक़्त भी जो तुम्हारे साथ नहीं बीतता... क्यूंकि वो तुम्हारी याद में बीतता है.
कुछ किताबें हैं... जो मैंने गिफ्ट की थीं... फैज़ की 'सारे सुखन हमारे' है जो तुमने गिफ्ट की थी.
मेरी नज़्में वो सारी नज़्में हैं जो तुमने मुझपर लिखीं... और तुम्हारी नज़्में वो सारी नज़्में हैं जो मैंने तुमपर लिखीं.
तुम्हारा हाथों का छूना और फिर कंधे पर सर टिकाना. आँखों का मलना फिर मेरी आँखों में डूब जाना.
हांथों का चूमना और खो जाना. इन सबसे बेहतर नज़्में नहीं हैं.
नज़्म तुम्हारा मेरे एहसास में जीना है और मेरा सिर्फ तुम्हारे बारे में सोचना है.
नज़्में लफ्ज़- लफ्ज़ नहीं हैं... नज़्में हमारी साथ बीतती ज़िन्दगी है. जिसका अंत पहले ही लिख दिया गया है.... किसी ना-मुकम्मल नज़्म सा.

Saturday, March 31, 2018

राशिदी और सक्सेना को सुनने के लिए कलेजा चाहिए | रवीश कुमार

“मैं शांति चाहता हूं। मेरा बेटा चला गया है। मैं नहीं चाहता कि कोई दूसरा परिवार अपना बेटा खोए। मैं नहीं चाहता कि अब और किसी का घर का जले। मैंने लोगों से कहा है कि अगर मेरे बेटे की मौत का बदला लेने के लिए कोई कार्रवाई की गई तो मैं आसनसोल छोड़ कर चला जाऊंगा। मैंने लोगों से कहा है कि अगर आप मुझे प्यार करते हैं तो उंगली भी नहीं उठाएंगे। मैं पिछले तीस साल से इमाम हूं, मेरे लिए ज़रूरी है कि मैं लोगों को सही संदेश दूं और वो संदेश है शांति का। मुझे व्यक्तिगत नुकसान से उबरना होगा।”

अपने 16 साल के बेटे सिब्तुल्ला राशिदी की हत्या के बाद एक इमाम का यह बयान दिल्ली के अंकित सक्सेना के पिता यशपाल सक्सेना की याद दिलाता है। हिंसा और क्रूरता के ऐसे क्षणों में कुछ लोग हज़ारों की हत्यारी भीड़ को भी छोटा कर देते हैं। 16 साल के सिब्तुल्ला को भीड़ उठाकर ले गई और उसके बाद लाश ही मिली। बंगाल की हिंसा में बंगाल की हिंसा में चार लोगों की मौत हुई है। छोटे यादव, एस के शाहजहां, और मक़सूद ख़ान। इस हिंसा
“मैं भड़काऊ बयान नहीं चाहता हूं। जो हुआ है उसका मुझे गहरा दुख है लेकिन मैं मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का माहौल नहीं चाहता। मेरी किसी धर्म से कोई शिकायत नहीं है। हां, जिन्होंने मेरे बेटे की हत्या की, वो मुसलमान थे लेकिन सभी मुसलमान को हत्यारा नहीं कहा जा सकता है। आप मेरा इस्तमाल सांप्रदायिक तनाव फैलाने में न करें। मुझे इसमें न घसीटें। मैं सभी से अपील करता हूं कि इसे माहौल ख़राब करने के लिए धर्म से न जोड़ें।“
यह बयान दिल्ली के यशपाल सक्सेना का है जिनके बेटे अंकित सक्सेना की इसी फरवरी में एक मुस्लिम परिवार ने हत्या कर दी। अंकित को जिस लड़की से प्यार था,उसने अपने मां बाप के ख़िलाफ़ गवाही दी है। यशपाल जी ने उस वक्त कहा था जब नेता उनके बेटे की हत्या को लेकर सांप्रदायिक माहौल बनाना चाहते थे ताकि वोट बैंक बन सके। आसनसोल के सिब्तुल्ला को जो भीड़ उठा कर ले गई वो किसकी भीड़ रही होगी, बताने की ज़रूरत नहीं है। मगर आप सारे तर्कों के धूल में मिला दिए जाने के इस माहौल में यशपाल सक्सेना और इमाम राशिदी की बातों को सुनिए। समझने का प्रयास कीजिए। दोनों पिताओं के बेटे की हत्या हुई है मगर वे किसी और के बेटे की जान न जाए इसकी चिन्ता कर रहे हैं।
सांप्रदायिक तनाव कब किस मोड़ पर ले जाएगा, हम नहीं जानते। दोनों समुदायों की भीड़ को हत्यारी बताने के लिए कुछ न कुछ सही कारण मिल जाते हैं। किसने पहले पत्थर फेंका, किसने पहले बम फेंका। मगर एक बार राशिदी और सक्सेना की तरह सोच कर देखिए। जिनके बेटों की हत्याओ को लेकर नेता शहर को भड़काते हैं, उनके परिवार वाले शहर को बचाने की चिन्ता करते हैं। हमारी राजनीति फेल हो गई है। उसके पास धार्मिक उन्माद ही आखिरी हथियार बचा है। जिसकी कीमत जनता को जान देकर, अपना घर फुंकवा कर चुकानी होगी ताकि नेता गद्दी पर बैठा रह सके।
आपको समझ जाना चाहिए कि आपकी लड़ाई किससे है। आपकी लड़ाई हिन्दू या मुसलमान से नहीं है, उस नेता और राजनीति से है जो आपको भेड़ बकरियों की तरह हिन्दू मुसलमान के फ़साद में इस्तमाल करना चाहता है। आपकी जवानी को दंगों में झोंक देना चाहता है ताकि कोई चपेट में आकर मारा जाए और वो फिर उस लाश पर हिन्दू और मुसलमान की तरफ से राजनीति कर सके। क्या इस तरह की ईमानदार अपील आप किसी नेता के मुंह सुनते हैं? 2019 के संदर्भ में कई शहरों को इस आक्रामकता में झोंक देने की तैयारी है। इसकी चपेट में कौन आएगा हम नहीं जानते हैं। मुझे दुख होता है कि आज का युवा ऐसी हिंसा के ख़िलाफ़ खुलकर नहीं बोलता है। अपने घरों में बहस नहीं करता है। जबकि इस राजनीति का सबसे ज़्यादा नुकसान युवा ही उठा रहा है। बेहतर है आप ऐसे लोगों से सतर्क हो जाएं और उनसे दूर रहें जो इस तरह कि हिंसा और हत्या या उसके बदले की जा सकने वाली हिंसा और हत्या को सही ठहराने के लिए तथ्य और तर्क खोजते रहते हैं। नेताओं को आपकी लाश चाहिए ताकि वे आपको दफ़नाने और जलाने के बाद राज कर सकें। फैसला आपको करना है कि करना क्या है।
Publishedd on Nai Sadak