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Friday, April 20, 2018

आपको पता है, ‘हरिऔध’ का घर और स्मृतियां दोनों खंडहर हो गई हैं


कोई पूछे कि खड़ी बोली में रचा गया पहला महाकाव्य कौन-सा है तो हिंदी साहित्य के सामान्य जानकार को भी ‘प्रिय प्रवास’ का नाम लेते देर नहीं लगती.
माध्यमिक शिक्षा परिषदों के हाईस्कूल और इंटर के हिन्दी के प्रश्नपत्रों में यह या इससे संबंधित कोई और प्रश्न पूछा जाता है तो ज़्यादातर परीक्षार्थी फौरन अपना उत्तर लिख देते हैं, ‘सत्रह सर्गों में विभाजित ‘प्रिय प्रवास’ में इसके रचयिता द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने ‘कृष्ण के दिव्य चरित का मधुर, मृदुल व मंजुलगान’ किया है, जिसके लिए उन्हें अपने समय का प्रतिष्ठित मंगला प्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था.’
प्रसंगवश, हरिऔध ने इसकी सर्जना की तो, जैसा कि उन्होंने इसकी भूमिका में लिखा है, खड़ी बोली में कुछ छोटे-छोटे काव्य-ग्रंथ ही थे. उनमें से भी ज़्यादातर सौ-दो सौ पद्यों में ही समाप्त होने वाले या अनूदित. मौलिक तो एकदम से नहीं.
हरिऔध के ही शब्दों में, ‘मैथिलीशरण गुप्त का ‘जयद्रथ वध’ नि:संदेह मौलिक ग्रंथ है, परन्तु यह खंड-काव्य है. इसके अतिरिक्त यह समस्त ग्रंथ अन्त्यानुप्रासविभूषित है, इसलिए खड़ी बोलचाल में मुझको एक ऐसे ग्रंथ की आवश्यकता देख पड़ी, जो महाकाव्य हो और ऐसी कविता में लिखा गया हो, जिसे भिन्न तुकांत कहते हैं. अतएव मैं इस न्यूनता की पूर्ति के लिए कुछ साहस के साथ अग्रसर हुआ और अनवरत परिश्रम करके ‘प्रिय प्रवास’ नामक ग्रंथ की रचना की.’
पहले उन्होंने इसका नाम ‘ब्रजांगना-विलाप’ रखा था, किन्तु बाद में बदलकर ‘प्रिय प्रवास’ कर दिया और बेहद विनम्रभाव से ‘स्वीकार’ किया, ‘मुझमें महाकाव्यकार होने की योग्यता नहीं, मेरी प्रतिभा ऐसी सर्वतोमुखी नहीं जो महाकाव्य के लिए उपयुक्त उपस्कर संग्रह करने में कृतकार्य हो सके, अतएव मैं किस मुख से यह कह सकता हूं कि ‘प्रिय प्रवास’ के बन जाने से खड़ी बोली में एक महाकाव्य न होने की न्यूनता दूर हो गई. हां, विनीत भाव से केवल इतना ही निवेदन करूंगा कि… जब तक किसी बहुज्ञ मर्मस्पर्शिनी-सुलेखनी द्वारा लिपिबद्ध होकर खड़ी बोली में सर्वांग सुंदर कोई महाकाव्य आप लोगों को हस्तगत नहीं होता, तब तक यह अपने सहज रूप में आप लोगों के ज्योति-विकीर्णकारी उज्ज्वल चक्षुओं के सम्मुख है, और एक सहृदय कवि के कंठ से कंठ मिलाकर यह प्रार्थना करता है, ‘जबलौं फुलै न केतकी, तबलौं बिलम करील.’
हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ‘विद्यावाचस्पति’ उपाधि से सम्मानित और उसके सभापति रहे ‘हरिऔध’ शुरू में ब्रजभाषा में कविताएं करते थे.
बाद में महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से खड़ी बोली में सक्रिय हुए और वात्सल्य व करुण रसों के सिद्धकवि बनकर भाषा, भाव, छंद व अभिव्यंजना की पुरानी परंपराएं तोड़ डालीं.
‘प्रिय प्रवास’ के अतिरिक्त उन्होंने ‘पारिजात’ और ‘वैदेही वनवास’ शीर्षक से दो प्रबंध काव्य तो दिए ही, ‘प्रद्युम्न विजय’ व ‘रुक्मिणी परिणय’ जैसी नाट्यकृतियों में भी अपनी प्रतिभा प्रदर्शित की.
‘प्रेमकांता’, ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ और ‘अधखिला फूल’ नामक उपन्यास भी उनके खाते में हैं, जो कम से कम इस अर्थ में तो महत्वपूर्ण हैं ही कि वे हिंदी उपन्यासों की शुरुआत के दौर में लिखे गए.
‘हरिऔध सतसई’, ‘चोखे चौपदे’, ‘चुभते चौपदे’ और ‘बोलचाल’ समेत मुक्तकों के कई संग्रह भी हिन्दी साहित्य की उनकी ऐतिहासिक सेवा के गवाह हैं और इसीलिए कई लोग उन्हें ‘अपने समय का सूरदास’ भी कहते हैं. जैसे मुंशी प्रेमचंद उपन्यास सम्राट कहे जाते हैं, वैसे ही ‘हरिऔध’ अपने प्रशंसकों के लिए ‘कवि सम्राट’ हैं.
लेकिन विडंबना देखिए कि हिन्दी साहित्य की ऐसी अतुलनीय सेवा के बावजूद आज न हरिऔध की उपेक्षा की कोई हद रह गई है और न विस्मरण की.
उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के जिस निज़ामाबाद कस्बे में भोलानाथ उपाध्याय के पुत्र के रूप में 15 अप्रैल, 1865 को वे जन्मे, वहां भी उनकी जयंतियों व पुण्यतिथियों पर ‘कर्मकांडीय विलाप समारोहों’ के अलावा कुछ नहीं होता.
वहां उनका ऐसे बेगानेपन से सामना है कि जिस घर कच्चे में वे पैदा हुए थे, वह खंडहर में बदल गया है, लेकिन किसी की भी पेशानी पर बल नहीं पड़ रहे. उसकी सार-संभाल या पुनरुद्धार की बात तो जैसे किसी को सूझती ही नहीं.
यों, इसका एक बड़ा कारण यह है कि हरिऔध के पट्टीदारों ने उनकी विरासत को लंबे अरसे तक झगड़े में फंसाकर उन्हें जैसी ‘श्रद्धांजलि’ दी, वैसी किसी दुश्मन को भी न मिले तो ठीक.
हां, हिन्दी समाज ने पहले तो पट्टीदारी के इस विवाद के बहाने हरिऔध की स्मृति रक्षा के दायित्व से मुंह मोड़े रखा और अब उनकी बची-खुची यादें सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी भी नहीं निभाना चाहता.
आजमगढ़ निवासी वयोवृद्ध साहित्यकार जगदीशनारायण बरनवाल ‘कुंद’ इस पर गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए कहते हैं कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद और कवि सम्राट हरिऔध की जन्मस्थलियों में फ़र्क़ है तो सिर्फ़ यह कि प्रेमचंद की स्मृतियों के संरक्षण को लेकर तो शासन-सत्ता, हिंदी सेवी और परिजन यदा-कदा चिंतित हो लेते हैं, जिस कारण वे लावारिस होने से बच गई हैं, लेकिन हरिऔध की स्मृतियों की किसी को कतई फ़िक्र नहीं. सत्ताओं को ख़्याल ही नहीं आता तो हिंदीसेवियों को फ़ुरसत ही नहीं मिलती.
कुंद बताते हैं कि इसी कारण कभी चुभते और चोखे चौपदों की रचना करने वाले हरिऔध की स्मृतियां भी चुभने लगी हैं.
एक वक़्त इलाहाबाद से प्रकाशित प्रतिष्ठित दैनिक ‘भारत’ के संपादक मुकुंददेव शर्मा, जो हरिऔध के वंशजों में से एक थे, के प्रयासों से आज़मगढ़ शहर में पुरानी कोतवाली के पास भव्य ‘हरिऔध पुस्तकालय’ खुला था, जिसमें हरिऔध का संपूर्ण साहित्य तो उपलब्ध था ही, मुकुंददेव शर्मा के सौजन्य से प्राप्त हुई हरिऔध के निजी पुस्तकालय की अनेक दुर्लभ पुस्तकें भी थीं. लेकिन सामाजिक कृतघ्नता की हद कि अब इस पुस्तकालय को हमेशा के लिए बंद कर उसके भवन में एक विभाग का कार्यालय खोल दिया गया है और किसी को नहीं मालूम कि उसकी अनेक दुर्लभ पुस्तकें किस हाल में हैं.
दशकों पहले, कलाओं के उत्थान, संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए आज़मगढ़ में रैदोपुर और सिविल लाइंस के बीच विकास भवन क्षेत्र में ‘हरिऔध कला भवन’ बना था तो वह सारे आज़मगढ़वासियों के लिए गर्व का कारण था, लेकिन इस भवन की मार्फत हरिऔध की स्मृतियां अक्षुण्ण रखने की उनकी मनोकामना फिर भी पूरी नहीं हुई.
वे उसमें हरिऔध शोध पीठ की स्थापना की मांग ही करते रहे और नौबत यहां तक आ पहुंची कि जर्जर होने के बाद उसके भवन को ध्वस्त कर दिया गया.
प्रदेश की पिछली सरकार के दौरान 17 करोड़ रुपयों के बजट से उसका पुनर्निर्माण शुरू किया गया तो अभी तक दो मंजिलों का निर्माण ही हो पाया है और तीसरी मंजिल पर दीवाल बनाकर छोड़ दिया गया है.
कार्यदायी संस्था की मानें तो इसका कारण यह है कि निर्धारित बजट में से उसे अभी सिर्फ़ आठ करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं. अभी नौ करोड़ रुपयों की और आवश्यकता है जबकि सरकार ने सिर्फ एक करोड़ रुपये अवमुक्त किए हैं. देखना है कि इस कछुआ चाल से केंद्र का निर्माण कब तक पूरा हो पाता है.
दूसरी ओर निज़ामाबाद कस्बे में हरिऔध के घर के बगल में ही पक्के मकान में रह रहे उनके पट्टीदार पंडित गोपालशरण उपाध्याय कहते हैं कि हरिऔध के अपनों ने ही उनकी ओर से मुंह फेर लिया है और उनकी यादें संजोने के लिए उनकी ओर से कोई कोशिश नहीं हो रही, तो हम क्या करें?
लेकिन जिन्हें कुछ करना है, वे ऐसे सवाल नहीं पूछ रहे. एक हरिऔध प्रेमी ने उनकी जन्मस्थली पर उनके नाम से दो स्कूल स्थापित किए हैं. उसने इन स्कूलों में कवि सम्राट की प्रतिमा लगाने और वाचनालय खोलने के लिए प्रदेश सरकार से लंबी लिखा-पढ़ी भी की मगर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा. सरकारी फाइलें दौड़ीं, फिर जानें कहां समा गईं और अब बात आई गई होकर रह गई.
2002 में निज़ामाबाद के एक किनारे पर स्थित बाईपास तिराहे पर हरिऔध की एक प्रतिमा ज़रूर लगाई गई, लेकिन कुछ इस तरह कि उसका अनावरण करने वाले मंत्री जी उनसे बड़े दिखें.
शिलापट में हरिऔध का नाम छोटे अक्षरों में लिखा गया जबकि मंत्री का कई गुना बड़े अक्षरों में. कोढ़ में खाज यह कि इसके बावजूद इस प्रतिमा की रंगाई-पुताई व सफाई के लिए धन के लाले पड़े रहते हैं.
अलबत्ता आम निज़ामाबादवासियों ने हरिऔध की यादों को अभी भी दिल से लगा रखा है. इस कस्बे में आपको ऐसे कितने ही लोग मिल जाएंगे जो हरिऔध के अपने बीच का होने पर गर्व करते थकते नहीं और बताते हैं कि हरिऔध ने 6 मार्च, 1947 को इसी कस्बे में आख़िरी सांस भी ली थी.
लगभग 70 प्रतिशत साक्षरता वाले इस कस्बे में हरिऔध की याद में कोई आयोजन फिर भी अपवादस्वरूप ही होता है. कोई पूछे क्यों तो जवाब नहीं मिलता. गर्व करने वाले भी चुप रह जाते हैं.
निज़ामाबाद में निर्मित काली मिट्टी के बर्तन दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं और देश-विदेश के बाज़ारों में उनकी बिक्री से व्यवसायियों को अच्छी-ख़ासी आय होती है.
एक व्यवसायी ने मुझसे कहा कि हरिऔध की याद में कोई कार्यक्रम किया जाए तो बर्तन व्यवसायी उसके लिए धन का टोंटा नहीं होने देंगे. लेकिन कोई इसकी पहल तो करे.
अपने को पढ़ा-लिखा मानने वालों को उनकी विस्मृृति का अपराधबोध तो सताए. अभी तो उन्हें इस बात का अपराधबोध भी नहीं हैं कि कवि सम्राट के नाम पर एक महाविद्यालय की स्थापना का सपना भी सपना ही है.
इस ढेर सारी उपेक्षा के बावजूद हरिऔध अपने साहित्य सृजन के कारण अलग तरह से प्रासंगिक बने हुए हैं और उनकी कई रचनावलियां प्रकाशत हो चुकी हैं.
निज़ामाबाद में उनकी जन्मस्थली तक जाने के लिए पक्की सड़क भी बन गई है, लेकिन कई लोग व्यंग्य करते हैं कि यह सड़क इसलिए है कि सुविधापूर्वक वहां पहुंचकर भरपूर क्षुब्ध हुआ जा सके.
वैसे इस सड़क का श्रेय भी कवि की जन्मस्थली के बगल स्थित चरणपादुका गुरुद्वारे को जाता है जिसकी सिखों में बड़ी प्रतिष्ठा है. कहते हैं कि इस जगतप्रसिद्ध गुरुद्वारे में गुरु तेगबहादुर व गुरु गोविंद सिंह तपस्या कर चुके हैं.
इस गुरुद्वारे से हरिऔध का काफ़ी नज़दीकी रिश्ता रहा है. इसे यूं समझा जा सकता है कि उनके पिता भोलानाथ उपाध्याय ने सिख धर्म अपनाकर अपना नाम भोला सिंह रख लिया था. हरिऔध कई बार उक्त गुरुद्वारे में ही बैठकर सृजन या रचनाकर्म करते थे.
अफसोस कि इस गुरुद्वारे में भी उनकी स्मृति रक्षा के लिए कुछ भी नहीं हो रहा.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)
Source: http://thewirehindi.com/40080/remembering-ayodhya-singh-upadhyay-hari-oudh/

Friday, June 30, 2017

‘किसानों की क़र्ज़ माफ़ी से अर्थव्यवस्था बिगड़ती है, चंद घरानों का अरबों माफ़ करने से संवरती है’ - देविंदर शर्मा

हमारे यहां बहुत सारे लोग यह मानते हैं कि अभी कुछ महीने में कुछ हुआ है कि किसानों की समस्या बढ़ गई. मध्य प्रदेश में जो गोलीबारी हुई या महाराष्ट्र में जो किसान आंदोलन हुआ, ये सब 2-4 महीनों में अचानक से नहीं हुआ है. मेरे यह मानना है कि यह सब बहुत पहले से दबा हुआ था, जिसे हम देख नहीं पा रहे थे. कृषि में जो भी समस्या थी वो भयंकर रूप लेता जा रहा था और उसे कभी न कभी तो फटना था. ये जो गुस्सा इतने सालों से दबा हुआ था वो तो निकलना था और कैसे निकलेगा यह कोई बता नहीं सकता. हम कब तक किसी को दबा सकते हैं, एक न एक दिन उसे बाहर आना था.
किसानों के आंदोलन का मुख्य कारण आर्थिक स्थिति है. हमे नहीं पता चलता क्योंकि हम शहर में रहते हैं. किसान जब आलू उगा रहा होता है या टमाटर की, सब्ज़ियों की पैदावार कर रहा होता है और जब फसल अच्छी होती है, उसके बाद जब मंडियों में उचित दाम नहीं मिलते तो वो क्या करे? जब उसको टमाटर के 30 पैसे किलो मिले या फिर 2 रुपये किलो मिले और आलू अब तक सड़ रहा है, प्याज़ का भी बुरा हाल है. यह सब कुछ दिनों में नहीं हुआ बल्कि सालों से हो रहा था और इसे लेकर गुस्सा फूटना लाज़मी था.
यह सब एक साल की बात नहीं बल्कि पिछले 5 सालों में ऐसा हुआ है कि किसानों की जो लागत मूल्य है वो तक मिल नहीं पा रही है. 5 साल का वक़्त कम नहीं होता. पांच साल तक उसने बर्दाश्त किया और उसी के बीच नोटबंदी भी आ गई थी. जिससे कृषि संकट और भी बढ़ा. वैज्ञानिक और कुछ विशेषज्ञ ऐसा कह रहे थे कि नोटबंदी का असर बुआई पर पड़ेगा. लेकिन मैंने कहा था कि इसका बुआई पर असर नहीं पड़ेगा. मूल्य पर असर पड़ेगा, लेकिन बुआई पर असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि कोई भी किसान अपने खेत को खाली नहीं छोड़ सकता. उसका जो असर होना था वो उत्पादक की क़ीमत पर होना था.
हमारे देश में जो 2015-2016 का सूखा था मुझे लगता है उससे ज़्यादा मार नोटबंदी के कारण पड़ी है. नोटबंदी के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर हुई और उसे कम पैसे मिले. मैं जब किसानों से बात करता हूं, तो पता चलता है कि 30-40 प्रतिशत कृषि उत्पादकों की कीमतों में गिरावट आई है.
नोटबंदी के बाद कृषि क्षेत्र में भारी पैदावार हुई थी और किसानों को भी उम्मीद थी कि उन्होंने उचित मूल्य मिलेगा. उसे लगा था कि पैदावार के चलते उसकी आर्थिक हालत में सुधार होगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं बल्कि उत्पादकों की कीमतों में गिरावट आई, सिर्फ आलू और प्याज़ नहीं बल्कि दाल, चावल और यहां तक कि गेंहू की कीमतों में भी गिरावट देखी गई. किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी 300-400 रुपये कम मिलने लगा. बिहार में मैंने देखा कि लोग 600 रुपये में गेंहू बेचते हैं, वैसे 1500 रुपये में भी बेचते हैं. जब मामला ऐसे स्तर पर आ जाएगा तो जाहिर है कि प्रतिक्रिया भी होगी.
तुअर दाल हो या मूंग दाल हो, सभी दालों में, जहां न्यूनतम समर्थन मूल्य 5000 से 5500 तक था वहां किसानों को सिर्फ़ 3000 रुपये ही मिला और सरसों में जहां 3000 रुपये था, वहां लोगों को सिर्फ 500 या 600 रुपये मिला. तुअर दाल का समर्थन मूल्य जहां 5050 था वहां औसतन उन्हें 3200 से 3400 मिले है. किसानों की इस बार पैदावार 70 फ़ीसदी बढ़ी, उसके बावज़ूद अगर उनके साथ ऐसा होगा तो किसानों को दुःख तो होगा ही.
किसानों की आमदनी दोगुनी कैसी होगी यह किसी को नहीं पता, मुझे लगता है जो ऐसा बोल रहे हैं उन्हें भी नहीं पता है. जिस तरह आजकल जीडीपी डबल हो जाती है उसी प्रकार यह भी हो जाएगा. मुझे यह सब बातें हैरान नहीं करतीं. मुझे भी याद है कि जब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2016 में संसद में कहा था कि किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी. आज भी सरकार के आंकड़े कहते हैं कि हमारे देश में किसानों की सालाना औसतन आमदनी महज 20000 रुपये है यानी मासिक तौर पर 1700 रुपये से भी कम है.
कृषि क्षेत्र में हम जब आमदनी का आकलन करते हैं, तो हम देखते हैं कि कितना उत्पादक बाज़ार में आया है. लेकिन इस बार सरकार ने अलग तरीके से देखा है. सरकार ने उसने जो स्वयं के भोजन के लिए रखा है, उसे भी जोड़ कर दिखाया है. अगर किसानों की आमदनी दोनों को मिलकर 20000 रुपये सालाना है, तो मुझे लगता है इससे बड़ी क्या त्रासदी हो सकती है.
हरित क्रांति के इतने दिनों बाद भी अगर ऐसी हालत है, तो सोचना पड़ेगा. हमारे आधे देश में 1700 रुपये औसत से भी कम आमदनी है और यह सब सांकेतिक है कि उसकी हालत ख़राब है. आज उसकी आमदनी 20000 है और हम उसे 40000 हजार करना चाहते हैं, यह तो इन्फ्लेशन से अपने आप हो ही जाती है. क्या 40000 रुपये भी उसके लिए पर्याप्त आमदनी है? मुझे ऐसा लगता है कि हमने जान बूझकर किसानों को कमज़ोर अवस्था में रखा हुआ है. हम किसानों को भूखा रखते हैं. क्योंकि हमें इन्फ्लेशन को नियंत्रित करता है.
लंबे समय से किसान समस्या झेल रहा है, इसीलिए किसान प्रदर्शन करने उतरे. यह पहले की नीतियों का नतीजा है जिसमें किसान जो उगाता है, उसका उचित मूल्य भी उसे नहीं मिलता.
मुझे राजस्थान के पूर्व राज्यपाल मिले और उन्होंने कहा कि वो मेरी बात से सहमत नहीं हैं. उन्होंने कहा कि राजस्थान में एक बारिश होती है तो किसानों की आर्थिक हालत 2-3 साल के लिए सुधर जाती है. मैंने उनसे कहा कि सर आप नौकरशाही में क्यों गए, आपको तो किसान होना चाहिए था. लोग इस तरह की कथाओं का प्रचार करते हैं कि एक बारिश से किसान के पास 2-3 साल सुधर जाता है. कृषि क्षेत्र में जो 15 प्रतिशत फ़ूड इन्फ्लेशन था, वो सिर्फ बिचौलियों की वजह से था बल्कि किसान की हालत तो उसी तरह थी. उत्पादकों की अगर कीमत बढ़ भी जाती थी, तो उसका फ़ायदा कभी भी किसानों को नहीं मिलता है.
दो साल पहले प्याज के भाव बहुत बढ़ गए थे. हंगामा मच गया था. उस समय किसान को आठ रुपये मिला, लेकिन बाजार में बिका 80 रुपये, 100 रुपये. इसका फायदा किसान को नहीं हुआ, बिचौलिये को हुआ. बिचौलिया फायदा उठाते हैं लेकिन ऐसा संदेश जाता है कि किसान को बहुत फायदा हो रहा है. लेकिन वैसा नहीं होता.
हमारे देश में खरीद मंडियां सिर्फ 7000 है बल्कि जरूरत के हिसाब से देश में कम से कम 42000-45000 मंडियां होनी चाहिए. मंडियों की कमी के चलते समर्थन मूल्य का वितरण संभव नहीं हो पाता. हमारे देश में जब हरित क्रांति हुई थी, तब हमारे नीति निर्माताओं ने सबसे अच्छा काम किया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान लाया, जहां किसानों को उनके फसल के लिए एक न्यूनतम निर्धारित मूल्य मिलेगा.
समर्थन मूल्य का फ़ायदा यह था कि किसान जब अपनी फ़सल बाज़ार में लाता है, तो वो चाहे तो किसी भी क़ीमत पर उसे बेच सकता है, लेकिन अगर कोई ख़रीदार नहीं मिला तो सरकार एक न्यूनतम मूल्य पर उसे ख़रीद लेती थी. यह ख़रीद का न्यूनतम मूल्य है कि इससे नीचे फ़सल का दाम नहीं गिरना चाहिए.
दूसरा, सरकार ने एफसीआई का गठन किया जो ख़रीद और वितरण पर नज़र तो रखेगा. एफसीआई का दो काम था, पहला सारी परिस्थितियों को मैनेज करना और दूसरा, वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के ज़रिये जहां जहां कमी है, वहां पर वितरण का काम करना. मैं मानता हूं इसमें भ्रष्टाचार बहुत है लेकिन इसे ठीक करने की ज़रूरत है.’
जो समर्थन मूल्य प्रणाली है उसमें थोड़ी दिक़्क़त है. समर्थन मूल्य प्रणाली में सिर्फ़ फ़सल का लागत मूल्य सुरक्षित किया जाता है. उसके अलावा उसमें मुनाफ़ा नहीं मिलता. पूरे देश के लिए एक ही प्रकार का समर्थन मूल्य है, जबकि अलग अलग राज्यों में अलग अलग परिस्थिति है. पंजाब का किसान हर साल नुकसान में है. इससे भी समस्या आती है.
हमारा कृषि का जो केंद्र था वो पंजाब हरियाणा का बेल्ट होता था और हम सिर्फ़ उसी पर केंद्रित रहे. हमारे देश में जो 7700 मंडियां है उसमे से 70 फ़ीसदी मंडियां सिर्फ़ पंजाब और हरियाणा में है. उत्तर प्रदेश गेंहू का सबसे बड़ा उत्पादक है, उसके बावज़ूद सरकार सिर्फ़ 3 प्रतिशत गेंहू लेती है बाकी 97 फ़ीसदी खुले बाज़ार में बिकता है. अगर बाज़ार में दाम गिरता है तो किसानों को भारी नुकसान सहना पड़ता है.
अब यूपी के किसान अपना अनाज बेचने के लिए हरियाणा के मंडियों में आते हैं. क्योंकि वहां मंडियां नहीं हैं. यदि किसान हरियाणा आता है तो उसे सुरक्षित मूल्य मिल जाता है. सरकार को मंडियों की संख्या पर ध्यान देना होगा और उसको बढ़ाना होगा, ताकि किसानों को फ़ायदा पहुंच सके. ब्राज़ील में हर 20 किलोमीटर पर मंडी है और वहां की सरकार वचनबद्ध है कि किसान जो भी पैदा करेगा वो उसे ख़रीदेगी. इसी लिए ब्राज़ील ‘जीरो हंगर’ की स्थिति में पहुंच चुका है. उल्टा हमारे देश में जो भी मंडियां है उन्हें ख़त्म करने का काम किया जा रहा है.
पंजाब में ख़रीद मंडियां ज़्यादा हैं इसलिए किसानों को गेंहू का समर्थन मूल्य 1625 मिल जाता है, पर बिहार में मंडियां नहीं हैं जिसके चलते उन्हें अपना गेंहू 1000-1200 रुपये में बेचना पड़ता है. अगर हम पंजाब की मंडियां हटा देंगे, तो पंजाब का किसान भी बिहार का किसान बन जाएगा.
मैंने 1996 में चेन्नई में स्वामीनाथन फाउंडेशन के एक कार्यक्रम में गया था, जहां वर्ल्ड बैंक के एक अधिकारी आए थे, उन्होंने कहा था कि 2015 तक भारत में गांव से शहर की तरफ़ पलायन करने वालों की जनसंख्या इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी की जनसंख्या के मुक़ाबले दोगुनी होगी. वर्ल्ड बैंक ने यह आकलन किया था कि 40 करोड़ लोग शहर की तरफ़ चले जाएंगे.
कृषि की जो समस्या है वो सरकार की तरफ से नियोजित समस्या है. सरकार दरअसल चाहती है कि यह सब हो, सरकार बस यह नहीं चाहती थी कि कोई विरोध प्रदर्शन करे. सीआईआई की रिपोर्ट कहती हैं कि ज़मीन अधिग्रहण करके 2022 तक सरकार में बैठे लोग 30 करोड़ रोज़गार पैदा करना चाहते हैं, जो आज़ादी के 70 साल बाद भी नहीं हुआ. मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि यह कैसा दावा है कि आप 5 वर्ष के भीतर इतने बड़े पैमाने पर रोज़गार खड़ा कर देंगे.
मुझे लगता है कि इनका दावा कहता है कि जो किसान शहर की तरफ़ आएंगे, वे इनकी स्मार्ट सिटी में दिहाड़ी मज़दूर बन जाएंगे. क्या इनको दिहाड़ी मज़दूर बनाना ही देश में रोज़गार पैदा करने का तंत्र है? हमारे देश की जो स्किल डेवलपमेंट रिपोर्ट है उसमें लिखा है कि कृषि क्षेत्र में जो जनसंख्या 52 फ़ीसदी है, उसे 18 फ़ीसदी पर लाया जाएगा.
हमारे देश की अर्थव्यवस्था ऐसा लगता है सीआरआर रेटिंग एजेंसी चला रही है और हमारे अर्थशास्त्री भी इसी को मापदंड के रूप में देखने लगते हैं. सरकार भी कहती है कि अगर किसानों का कर्ज़ माफ़ किया तो इस एजेंसी से बुरी रेटिंग मिलेगी. उत्तर प्रदेश में किसानों का जो कर्ज़ था 36000 करोड़ माफ़ कर दिया है, उसकी बात हो रही है, पर डिस्कॉम का जो 72000 माफ़ कर दिया गया, उसकी तो कोई बात ही नहीं कर रहा है.
एसबीआई की चेयरमैन अरुंधति ने टेलीकॉम सेक्टर के 4 लाख करोड़ को रिस्ट्रक्चर करने को लेकर तो बयान दे दिया, लेकिन किसानों के लिए सभी राज्यों में क़र्ज़ माफ़ करने की मांग मान लेते हैं तो कुल 3.1 लाख करोड़ है. कृषि क्षेत्र में क़र्ज़ माफ कर देने से 32 करोड़ लोगों को फ़ायदा मिलेगा. 32 करोड़ के लिए आप कहते हैं कि आर्थिक हालत बिगड़ जाएगी, लेकिन 15 घरानों के लिए 4 लाख करोड़ माफ कर देने पर आर्थिक वृद्धि होती है. हमारी सारी नीतियां यही हैं कि हमें सिर्फ़ एक प्रतिशत की मदद करनी है. कुछ घरानों का 10 लाख करोड़ का क़र्ज़ आर्थिक बढ़ोतरी मानी जाती है और किसानों का 3.1 लाख करोड़ आर्थिक नुकसान मानते हैं.
सातवें वेतन आयोग के चलते सरकार पर 4.80 लाख करोड़ का भार होगा, जिसका फ़ायदा सिर्फ़ एक फ़ीसदी लोगों को ही मिलेगा. अगर सरकार यही काम 52 फ़ीसदी किसानों को लिए कर दे, तो देश में हंगामा मच जाएगा. सरकार इस बातों पर क्यों नहीं विचार करती? मैं मानता हूं कि कृषि क्षेत्र अकेले इतना सक्षम है कि वो आर्थिक हालत में सुधार ला सके.
आज हमारा किसान थोड़ा समझदार हो चुका है. सोशल मीडिया के माध्यम से उसे पता है कि उसके साथ किस तरह की नाइंसाफी हो रही है. अब जब उसे सब पता चल रहा है तो इसी के कारण उसमें ग़ुस्सा बहुत है. पहले नहीं पता होता था तो वो कुछ नहीं कहता था पर आज जो इतने वर्षों का ग़ुस्सा है, वो फूट रहा है. मुझे लगता है सरकार को इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि अगर हम अपना कृषि क्षेत्र नहीं बचा पाए तो अर्थव्यवस्था भी नहीं बचा पाएंगे.
Devinder Sharma, Source: TheWireHindi

Wednesday, May 17, 2017

हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच 1947 में हुआ बंटवारा आज भी जारी है

कई सालों से मैं बड़े फ़ख्र से ख़ुद को दक्षिण एशियाई मूल का बताती थी. लाखों लोगों की तरह मेरे मां-बाप भी उसी ज़मीन पर पैदा हुए थे, जिसे अब हिंदुस्तान के नाम से जाना जाता है.
बंटवारे के वक़्त मेरे अब्बा का परिवार पाकिस्तान चला आया था. मेरे दादा सिविल सर्विस में थे और अपने बाकी मुस्लिम साथियों की तरह उन्हें भी उम्मीद थी कि नई बन रही ब्यूरोक्रेसी में बेहतर पद मिलेंगे.
वहीं दूसरी तरफ मेरे नाना कांग्रेस के पक्के समर्थक थे, वे लखनऊ में एक प्रो-कांग्रेस अख़बार भी निकाला करते थे. वे हिंदुस्तान न छोड़ने की अपनी बात पर अड़े रहे जबकि उन्हें ये अंदाज़ा था कि आने वाले दशकों में अपने लिए बेहतर ज़िंदगी बनाने की उम्मीद में उनके बच्चे हिंदुस्तान छोड़ देंगे.
इसके तकरीबन 25 साल बाद जब मेरे मां-पापा की शादी हुई, तब तक मेरे अब्बा पाकिस्तान से निकलकर अमेरिका पहुंच गए थे और वहां एक इंजीनियर के बतौर काम कर रहे थे.
उनका निकाह फोन पर हुआ, जिसके बाद मेरी मां भी अमेरिका पहुंचीं. मैं और मेरी बहन की पैदाइश और परवरिश भी वहीं हुई.
जब भी लंबे सफ़र पर जाने लायक पैसे इकट्ठे होते, तब हम सालों में कभी पाकिस्तान तो कभी हिंदुस्तान जाया करते. मेरी बहन और मेरी हमारे दोनों तरफ के भाई-बहनों से ही खूब पटती थी.
इतनी कि हमें कभी दोनों देशों के बीच चल रही परेशानियों का हमारी पहचान से जुड़े होने का कोई एहसास ही नहीं हुआ. यह तो बहुत बाद में पता चला कि ये मासूमियत भी बमुश्किल ही मिल पाती है.
अमेरिका से ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों ही जगह इंटर्नशिप के लिए अप्लाई किया. मैं चाहती थी कि ‘मैं कहां जाऊंगी’ सवाल का जवाब मेरी क़िस्मत तय करे.
और फिर मुझे नई दिल्ली की एक मानवाधिकार संस्था के साथ काम करने का मौका मिला. इस एनजीओ ने ही मुझे सलाह दी कि अपनी मां की भारतीय नागरिकता के आधार पर मैं पर्सन ऑफ इंडिया ओरिजिन (पीआईओ) कार्ड बनवाने के लिए अप्लाई करूं.
इससे मुझे हिंदुस्तान में काम करने का मौका तो मिलेगा ही, साथ ही मैं बिना वीज़ा के सफ़र भी कर सकूंगी. मेरी एप्लीकेशन स्वीकार होने में कोई अड़चन नहीं आई और कुछ ही दिनों में मुझे ये स्लेटी बुकलेट मिली, जिसके सहारे में आगे के 17 सालों तक हिंदुस्तान आती-जाती रही.
इस कार्ड के मिलने के बाद मेरा यहां आना-जाना तो बढ़ा ही, मैं यहां लंबे वक़्त के लिए रुकने भी लगी. मैंने दिल्ली में रहकर ही अपनी पीएचडी पूरी की और इस शहर में मुस्लिम औरतों के अनुभवों पर एक क़िताब भी लिखी.
इस बीच हिंदुस्तान के साथ बढ़ते इस रिश्ते के साथ मेरा पाकिस्तान से रिश्ता भी बढ़ता रहा. मेरी बहन की शादी पाकिस्तान में हुई और वो वहीं बस गई.
कुछ समय बाद मेरे मां-पापा भी अमेरिका से आकर वहीं रहने लगे. कुछ सालों बाद मुझे भी लाहौर के कॉलेज में नौकरी का ऑफर मिला, जिसे मैंने खुशी-खुशी स्वीकार भी कर लिया.
इसकी पहली वजह तो ये थी कि मैं कराची में रहने वाले अपने परिवार के करीब हो जाऊंगी, दूसरा बॉर्डर से नज़दीक होने के कारण मैं अपने काम के सिलसिले और दोस्तों से मिलने आसानी से हिंदुस्तान आ-जा सकती थी.
तब मैंने नेशनल आइडेंटिटी कार्ड ऑफ पाकिस्तान के लिए अप्लाई किया, इससे मुझे वही सारी सुविधाएं मिलतीं, जो हिंदुस्तान में पीआईओ कार्ड से मिलती हैं.
मेरे पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी दोस्त और रिश्तेदार इस बात पर बड़ा आश्चर्य व्यक्त करते पर मैं जानती थी कि मैं ख़ुशकिस्मत थी, लेकिन मुझे इसमें कुछ ग़लत भी नहीं लगता था. मैं मूल रूप से पाकिस्तानी भी हूं, हिंदुस्तानी भी. तो मुझे क्यों सिर्फ एक को चुनना चाहिए?
पिछले हफ़्ते इस बार के सेमेस्टर ख़त्म होने के बाद मैं ख़ुद को अपने जन्मदिन पर तोहफा देना चाहती थी, और ये तोहफा था धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) घूमना.
कुछ रोज़ पहले मैं जब लौट रही थी तब बॉर्डर पर मुझसे इमीग्रेशन के कर्मचारियों ने पूछा कि मेरे पास पीआईओ कार्ड और नेशनल आइडेंटिटी कार्ड ऑफ पाकिस्तान दोनों कैसे हैं. मैंने उन्हें ईमानदारी से जवाब दिया कि मेरे अब्बा पाकिस्तानी हैं मां हिंदुस्तानी, और इस लिहाज़ से मैं दोनों हूं.
आम तौर पर जब मैं ये जवाब देती थी तब अमूमन सरहद के दोनों तरफ ही इमिग्रेशन से मुझे सुनने को मिलता था, वाह, आप तो बड़ी लकी हैं मैडम! इसके बाद वो मेरे पासपोर्ट पर स्टाम्प लगा देते थे.
इस बात से मैं हमेशा एक उम्मीद से भर उठती थी कि दोनों देशों के बीच भले ही कितने उतार-चढ़ाव रहे हों, पर दोनों ही ओर के अधिकतर लोग इस बंटवारे के बेतुकेपन को समझते हैं.
पर उस रोज़ ऐसा नहीं हुआ. इमीग्रेशन का वो कर्मचारी मेरे पीआईओ कार्ड के साथ गायब हुआ और कोई घंटे भर बाद लौटा. उसके पास एक पत्र भी था, जिस पर मुझे दस्तख़त करने के लिए मजबूर किया गया.
इसमें लिखा था कि मेरा पीआईओ कार्ड ज़ब्त किया जा रहा क्योंकि मैं पाकिस्तानी मूल की हूं, जिस वजह से मैं हिंदुस्तानी मूल की नहीं हो सकती.
तो वो खौफ़नाक दिन आ चुका था. इतने सालों तक अपनी जिस दक्षिण एशियाई पहचान पर मुझे फ़ख्र था, उसमें से आज मैं एक को चुनने के लिए मजबूर थी.
जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें यह करने का हक़ है क्या, तब मुझे जवाब मिला, ‘भारत सरकार के जो चाहे वो करने का अधिकार है.’ बस! इतना ही.
मैं जानती हूं कि मेरी ये कहानी 70 साल पहले हुए बंटवारे के फैसले से हुई लाखों मौतों और बिखरे हज़ारों परिवारों के सामने कुछ भी नहीं है.
वज़ीरा ज़मींदार ने बंटवारे पर लिखा है, ‘1947 का ये बंटवारा आने वाले कितने दशकों तक चलता रहा था, ये बंटवारा आज भी जारी है, एक सरहद जहां कभी आने-जाने का रास्ता बन सकता था, वहां कभी न टूटने वाली एक दीवार खड़ी हो चुकी है.’
जैसे-जैसे हमारे देशों के बीच रिश्ते ख़राब हो रहे हैं, मुझे अपना ये छोटा-सा नुकसान उन अनगिनत लोगों के दुख के मुक़ाबले बहुत छोटा लगने लगा है, जिन्हें सरहदों के इस बंटवारे से मिला दर्द हर रोज़ झेलना पड़ता है…
अपने बच्चों से बिछड़े मां-बाप, भाई-बहनों से बिछड़े भाई-बहन, वे मछुआरे जो पानी के बीच खिंची अनदेखी सरहद को अनजाने में पार करने के जुर्म में सालों जेल में रहे, सीमा के पास रहने वाले वे परिवार, जो अगली फायरिंग के डर के साये में रोज़ जीते हैं.
कई बार दोनों देशों के रिश्ते सामान्य करने की कोशिशें भी की गई हैं पर अब वे भी ख़त्म हो रही हैं. मिसाल के तौर पर बीते दिनों ‘पीस विज़िट’ (शांति यात्रा) पर आए पाकिस्तानी स्कूली छात्रों के एक डेलीगेशन को सरहद पर बढ़े तनाव के चलते वापस भेज दिया गया.
वहीं पिछले हफ़्ते एक और आदेश आया जिसके मुताबिक इलाज के लिए हिंदुस्तान आने वाले पाकिस्तानियों को वीज़ा मिलना और मुश्किल होगा. ये एक तरह से आम लोगों को उनकी ज़िंदगी बचा सकने वाले इलाज से महरूम करने जैसा है.
और ज़ाहिर है, जैसा हमेशा से होता आया है पाकिस्तान सरकार की तरफ से इन नियमों का जवाब ऐसे ही और कोई नियम बनाकर दिया जाएगा.
यानी इशारा साफ है: दोनों देशों के लोगों के बीच में कोई भी सकारात्मक रिश्ता- चाहे वो विचार, जानकारी, कोई कौशल साझा करना हो या प्यार-मुहब्बत- फ़ौरन हमेशा के लिए तोड़ दिया जाएगा.
आने वाले दिनों में कई और पीआईओ कार्ड ज़ब्त किए जाएंगे, कई वीसा रिजेक्ट किए जाएंगे; दीवारें और ऊंची और मज़बूत कर दी जाएंगी, पर इस परेशानी का फिर भी कोई हल नहीं निकलेगा.
सदियों से साथ-साथ रहने, एक जैसी रवायतें और विरासत साझा करने और प्यार की नींव पर बने रिश्ते को इतनी आसानी से नहीं तोड़ा जा सकता.
वे हमें भटकाने-बहलाने की कोशिश करेंगे, हमें यकीन दिलाया जाएगा कि हम मौलिक रूप से ही अलग हैं. हमें एक-दूसरे से नफ़रत करने को मजबूर किया जाएगा पर हमें ऐसी हर कोशिश के ख़िलाफ़ खड़े होना होगा.
हमें बताना होगा कि हमारी जड़ों का, हमारे मूल का फैसला कागज़ के चंद टुकड़ों, प्लास्टिक के कार्डों या इन चमकीली बुकलेट से नहीं होगा, जिसे आसानी से हमसे छीना जा सकता है.
हमारी जड़ें, हमारा प्यार हमारे शरीरों पर लिखा है, हमारी रूह में है, हमारी ज़बान, संस्कृति, इतिहास में है, और वे जितना भी चाहे, राजनीति के दांव-पेंचों से इसे मिटाया नहीं जा सकता.
निदा लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज, लाहौर में पढ़ाती हैं.
Source: http://thewirehindi.com/8895/the-ongoing-partition-what-happens-when-you-are-both-indian-and-pakistani/

Wednesday, March 8, 2017

देश में एचआईवी प्रभावित बच्चों की जीवन-रक्षक दवा का टोटा

देश में एचआईवी पीड़ित बच्चों की जीवनरक्षक दवा लोपैनेविर सिरप के इकलौते निर्माता सिप्ला ने इसका उत्पादन बंद कर दिया है. द हिंदू की ख़बर के अनुसार सरकार द्वारा बकाया न चुकाए जाने के कारण सिप्ला ने ये कदम उठाया है.
एचआईवी दवाओं के उत्पादन में सिप्ला एक बड़ा नाम है. 2015 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एड्स, टीबी जैसी कई बीमारियों के लिए काम करने वाली संस्था ग्लोबल फंड ने सिप्ला को एचआईवी/एड्स के इलाज में काम आने वाली एंटी रेट्रो वायरल (एआरवी) दवाओं के लिए 18.9 करोड़ डॉलर (करीब 1,170 करोड़ रुपये) से अधिक का आॅर्डर दिया था.
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 2014 में भेजे गए माल के एवज में भुगतान न मिलने के बाद भी सिप्ला ने सरकारी टेंडरों में भाग लेना बंद नहीं किया था. अब इस स्थिति में स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी को स्थानीय बाज़ार से दवा खरीदने के निर्देश दिए हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय के अपर सचिव अरुण पांडा बताते हैं, ‘हमने एक इमरजेंसी टेंडर निकाला है, साथ ही स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटियों और राज्य सरकारों से स्थानीय बाज़ार से दवा खरीदने को भी कहा है.’ हालांकि सिरप का निर्माण न होने की स्थिति में खुदरा विक्रेताओं के पास भी दवा उपलब्ध नहीं है.
एड्स के इलाज के लिए काम कर रही संस्था डीएनपी प्लस के पॉल का कहना है, ‘पूरे देश के किसी भी राज्य में ऐसा कोई नहीं जो यह दवा बनाता हो. जब इसका इकलौता निर्माता ही इसे नहीं बना रहा है तो फिर कैसे यह दवा स्थानीय बाज़ार में मिल सकती है?
सिप्ला ने द हिंदू को कोई बयान देने से मना कर दिया पर उन्होंने सिप्ला के सीईओ उमंग वोहरा और एड्स के इलाज के लिए काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता लून गंगते के बीच हुए ईमेल को सार्वजनिक किया है, जिसमें सिप्ला ने साफ किया है कि वो हमेशा न सिर्फ देश के बल्कि दुनिया भर के मरीज़ों के साथ है, पर भुगतान से संबंधी मसलों को भी अविलंब सुलझाया जाना ज़रूरी है. गंगते द्वारा इसके जवाब में यह स्पष्ट कर दिया गया कि वो भुगतान की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते, न वे सरकार पर दबाव बना सकते हैं न ग्लोबल फंड जैसे दानदाताओं पर. पर इस स्थिति की सबसे ज़्यादा मार उन्हीं पर पड़ रही है.
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सिप्ला द्वारा उनके सीईओ उमंग वोहरा और एड्स के इलाज के लिए काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता लून गंगते के बीच हुए ईमेल को सार्वजनिक किया गया है, जिसमें सिप्ला ने कहा है कि वे न सिर्फ देश के बल्कि दुनिया भर के मरीज़ों के साथ है, पर भुगतान से संबंधी मसलों को भी अविलंब सुलझाया जाना ज़रूरी है. (साभार : द हिंदू)
जानकारों का भी कहना है कि देश में इस तरह दवाओं की कमी होना दुखद तो है ही साथ ही शर्मिंदगी भरा भी है. लायर्स कलेक्टिव की एचआईवी यूनिट के वरिष्ठ सलाहकार आनंद ग्रोवर के अनुसार सरकार एचआईवी पीड़ितों के इलाज की अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रही है. एचआईवी मरीजों को जीवनरक्षक दवाइयां मुहैया करवाना उनकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी है. वहीं दुनिया भर में दवाइयां मुहैया करवाने के लिए मशहूर सिप्ला भी सबको दवा पहुंचाने के अपने वादे से हट रहा है.
वहीं दूसरी ओर 4 मार्च को 3 से 19 साल की उम्र तक के 637 बच्चों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री अरुण जेटली और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को एक पत्र लिखकर अपनी इस परेशानी से अवगत करवाया है. उन्होंने लिखा है कि दवा कंपनी सिप्ला द्वारा कई जगह यह बात दोहराई गई है कि सरकार के एचआईवी कार्यक्रम को दवा पहुंचाने के कई मामलों में भुगतान में देरी हुई, साथ ही कई जगह तो अब तक भुगतान नहीं किया गया. बच्चों के लिए आने वाली एचआईवी दवाओं में बहुत कम लाभ होता है और भुगतान में इस तरह की देरी से नेशनल एड्स कंट्रोल आॅर्गनाइजेशन (नाको) के कार्यक्रम बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं.
बच्चों ने पत्र में लिखा है, ‘हम आपसे निवेदन करते हैं कि एचआईवी दवाइयों के स्टॉक की इस कमी के मामले पर संज्ञान लें, खासकर इस बात पर भी ध्यान दिया जाए कि एचआईवी पीड़ित बच्चों की यह दवाएं न केवल आयात हों, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाए कि हर ज़रूरतमंद बच्चे तक इन्हें पहुंचाया जा सके.’
source: http://thewirehindi.com/3015/india-runs-out-of-hiv-medicine-for-kids/

Saturday, March 4, 2017

‘ऐ बाबू! लिख देना कि बुनकर बर्बाद हो चुके हैं’



अब्दुल रहमान अपना फलों का ठेला खड़ा करके छांव में बैठे दम ले रहे थे. कुर्ते की जेब से कुछ सिक्के निकाले और उन्हें गिनने लगे. दस से पंद्रह रुपये रहे होंगे. यह शायद फल बिक्री के दौरान मिले हुए फुटकर पैसे होंगे. यह पैसे जितने कम थे, ठेले पर फल भी उतने ही कम थे. करीब दो तीन किलो अनार और इतने ही सेब. उन्होंने पैसा गिनकर कुर्ते की जेब में फिर से डाल दिया और सामने की तरफ़ देखा. मैं सामने खड़ा था लेकिन उन्होंने नज़रअंदाज़ किया और दूर पता नहीं क्या देखने लगे.
उनके चेहरे पर कुछ उदासी और गुस्से का मिलाजुला भाव था. मैं कुछ देर तक तय नहीं कर पाया कि उनसे बात करनी चाहिए या नहीं. अंतत: हिम्मत करके मैं और नज़दीक गया और उनसे पूछा- दादा, यहां पर बुनकरों की बस्ती कहां है? उन्होंने जिज्ञासा भरी निगाहों से मुझे देखा और बोले- क्या जानना है. सामने देखो, वो ठेला खड़ा है. हम यहां बैठे हैं. फल बेच रहे हैं. यही हाल है बुनकरों का. क्या करोगे बुनकरों के बारे में जानकर? मैंने कहा- उनके बारे में लिखना चाहता हूं. वे बोले- ‘ऐ बाबू! लिख देना कि बुनकर बर्बाद हो चुके हैं.’
यह गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ मंदिर के मुख्य द्वार के सामने से लगा हुआ पुराना गोरखपुर मोहल्ला है. इस विशाल मंदिर परिसर के गेट के दोनों तरफ क़रीब दो तीन किलोमीटर के इलाक़े में बुनकरों की बस्ती है. अब्दुल रहमान के मुताबिक, किसी ज़माने में इस मोहल्ले में करीब छह हज़ार कारखाने थे. अब 25-30 बचे हैं. अब्दुल रहमान के पास पांच करघा मशीनें थीं. वे काफ़ी पैसे कमा लेते थे. उनके मुताबिक, ‘फल बेचकर बस बच्चों का पेट पालते हैं. वह अपना काम था. चार-छह लोगों को रोज़गार भी दे रहे थे. फल बेचना तो मज़बूरी है. ज़िंदा रहना है तो कुछ तो करना पड़ेगा.’ इतना कहकर वे उठे और अपना ठेला खींचते हुए बस्ती की तरफ चल पड़े.
हम आगे बढ़े तो एक मदरसा था जिससे लगा हुआ एक छोटा क़ब्रिस्तान था. उसकी दीवारें काफ़ी ऊंची थीं. उनमें प्लास्टर भी करवाया गया था और दीवार पर एक बड़े आकार का बोर्ड टंगा था. एक उजड़ते हुए समाज की ज़िंदगी को सुरक्षित करने की जगह उसे पक्की दीवारों वाले क़ब्रिस्तान देने में किसकी दिलचस्पी है?
सालों पहले हथकरघा बंद करके फल ठेला लगा रहे हैं अब्दुल
सालों पहले हथकरघा बंद करके फल ठेला लगा रहे हैं अब्दुल रहमान.
इसी मोहल्ले के रहने वाले मन्नान को इंजीनियर की नौकरी मिली थी. नौकरी करके उन्हें महसूस हुआ कि इस नौकरी से ज़्यादा पैसा उनके पुश्तैनी धंधे में है. वे इंजीनियरिंग छोड़कर वापस आ गए. दस पावरलूम लगाया और परिवार समेत कपड़े के काम में लग गए. यह 80 का दशक था. क़रीब 15 साल बाद बुनकरों पर खुले बाज़ार और उदारीकरण की सुनामी आई तो उसमें मन्नान को पांव टिकाने के लिए ज़मीन नहीं मिली. उनके दसों करघे अंतरराष्ट्रीय समुद्र में बह कर कहां गए, कोई नहीं जानता. मन्नान संपन्न परिवार से थे. उनके पास क़रीब 50 बीघे ज़मीन थी. अब सब बिक चुकी है. मन्नान ने बच्चों को कमाने के लिए शहर भेज दिया है और ख़ुद घर पर रहते हैं. वे पछताते हुए कहते हैं, ‘इंजीनियरिंग नहीं छोड़ा होता तो कम से कम ज़िदगी मुहाल नहीं होती. बुढ़ापे में पेंशन तो मिलती!’
मदरसे के बगल से होते हुए हम आगे बड़े तो पावरलूम की आवाज़ सुनाई पड़ी. एक छप्परनुमा मकान में एक पावरलूम पर एक युवक चादर बुन रहा था. उसने बताया कि ‘हम लोगों ने नेपाल से जुगाड़ कर लिया है. नेपाल में टोपी और गमछे आदि में इस्तेमाल होने वाला कपड़ा बुनते हैं और फिर ले जाकर नेपाल में ही बेच देते हैं. कुछ लोग सूत भी वहीं से ले आते हैं. हमारी अच्छी कमाई हो जाती है.’
घर-घर में चलने वाला बुनकर उद्योग बंद क्यों हो गया, इसके जवाब में पावरलूम और हथकरघा दोनों चलाने वाले शमशाद कहते हैं, ‘सूत हमारी औकात से ज़्यादा महंगा हो गया. सरकार का सूत की महंगाई पर कोई नियंत्रण नहीं रहा. यहां की स्थानीय सूती मिलें खड़ी-खड़ी सड़ गईं. अब दक्षिण भारत से सूत आता है, वह काफ़ी महंगा पड़ता है. सूत का जो बंडल हमें पांच सौ में मिलता था, नई सरकार आने के बाद अब सात सौ का मिलने लगा. सूत महंगा है लेकिन तैयार कपड़ा महंगे दाम में कोई ख़रीदने को तैयार नहीं है. महंगाई के हिसाब से ख़रीद नहीं हो पाती. लिहाजा हम घाटे में चले जाते हैं.’
हथकरघा और पावरलूम उद्योग को क़रीब से जानने वाले वसीम अकरम ने बताया, ‘तीन तरह के बुनकर हैं. एक खादी बुनकर हैं जो हथकरघे से बुनाई करते हैं. दूसरे बनारसी साड़ी बुनकर हैं, वे हथकरघे से बुनाई करते हैं. तीसरे टेक्सराइज मसराइज की साड़ी और दूसरे कपड़ों के बुनकर हैं, जो बिजली से चलने वाले पावरलूम से बुनाई करते हैं.’ शमशाद के मुताबिक, ‘पुराना गोरखपुर में करीब चार लाख बुनकर हुआ करते थे. 1995 के बाद संकट शुरू हुआ. चीन के लिए बाज़ार खोल दिया गया और उसने हमारे बाज़ार में घुसकर होजरी के सस्ते सामान ठूंस दिए. अब जो कपड़ा हम सौ रुपये की लागत से तैयार करते हैं, वही कपड़ा चीन 80 रुपये में बेच रहा है. हमारी लागत ज़्यादा है. सरकार ने हमें मरने के लिए छोड़ दिया.’
पुराना गोरखपुर के एक घर में बंद पड़े पावरलूम और हथकरघे.
पुराना गोरखपुर के एक घर में बंद पड़े पावरलूम और हथकरघे.
बीती 25 फरवरी को बसपा प्रमुख मायावती ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो वे पूर्वांचल को अलग राज्य बनाएंगी और बुनकरों की समस्या का समाधान करेंगी. लेकिन बुनकरों की समस्या के समाधान का वादा करने वाली मायावती अकेली नहीं हैं. प्रधानमंत्री बनने के पहले नरेंद्र मोदी भारतीय बुनकरों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार उपलब्ध करने का वादा कर चुके हैं, लेकिन तीन साल की सरकार में ऐसा कुछ नहीं हुआ है. उनके कार्यकाल में ही सूत महंगा हो गया है.’
पुराना गोरखपुर में ही पावरलूम चलाने वाले यूसुफ़ ने कहा, ‘जो कुछ लोग अब भी पावरलूम या बुनकरी के काम से जुड़े हैं, वे अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए इससे चिपके हैं. हमारे लिए यह सम्मान की बात थी कि घर में कारखाना होता था. दो, चार, छह, दस मशीनें लगाकर काम करते थे और दूसरे लोगों को भी रोज़गार देते थे. अब ख़ुद ही मालिक हैं, ख़ुद ही मज़दूर हैं. जो पैसा मज़दूर को देना है, वह बच जाता है. वही अपनी कमाई है.’
शमशाद मुझे एक बीस पावरलूम मशीनों वाले बड़े से हॉल में ले गए. सब मशीनों में जंग लग गई थीं. वे सालों से चली नहीं थीं. उन मशीनों को देखकर लाखों की संख्या में बेरोज़गार हुए लोगों की हालत का अंदाज़ा लग रहा था. मोहल्ले में कुछ-कुछ दूर चलने पर पावरलूम की आवाज़ सुनाई पड़ जाती थी. कुछ घरों में अब भी बुनाई हो रही है. बुनकरों की बस्ती के युवा और जवान रिक्शा चलाने, ठेला लगाने, या मज़दूरी करने के लिए शहर जा चुके हैं.
बुनकर उद्योग क्यों बर्बाद हुआ? इसके जवाब में वसीम अकरम ने बताया, ‘तमाम वजहे हैं, जैसे-बिजली कटौती, नेत‍ृत्वविहीन बुनकर समाज को कोई सरकारी मदद न मिलना, समय-समय पर सांप्रदायिक दंगों की वजह से व्यापारियों द्वारा माल न ख़रीदना, कम मज़दूरी और हाड़तोड़ मेहनत, आर्थिक नीतियों में बुनकरों के लिए कोई जगह न होना, बुनी हुई साड़ियों के निर्यात में तमाम अड़चनों के चलते गोदामों में कपड़ों का बर्बाद हो जाना. ऐसे अनेक मसले हैं, जिनसे पूरा बुनाई उद्योग जूझता चला आ रहा है. अगर इन सबसे जूझकर भी बुनकर कपड़ा बुनने में कामयाब हो भी जाते हैं, तो भी उन्हें उनकी क़ीमती साड़ियों के मुक़ाबले अहमदाबाद की सस्ती साड़ियां मार देती हैं.’
पुराना गोरखपुर में रहने वाले अध्यापक रामसेवक ने बताया, ‘आम तौर पर इस पेशे में हिंदू नहीं होते, लेकिन मैं अध्यापन के साथ बुनकरी से जुड़ा हुआ था. क्योंकि यह फ़ायदे का कारोबार था. लेकिन अब सब ख़तम हो चुका है. अब बुनकरों की गुलज़ार दुनिया उजड़ चुकी है.’
from THE WIRE HINDI