Sunday, January 15, 2017

तीनों बन्दर बापू के / नागार्जुन

मूंड रहे दुनिया-जहान को तीनों बन्दर बापू के!
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बन्दर बापू के!
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बन्दर बापू के!
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बन्दर बापू के!
गाँधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बन्दर बापू के!
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बन्दर बापू के!
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
- नागार्जुन

Wednesday, January 11, 2017

बासवन्ना (बारहवीं सदी, कन्नड़ में) लिखित

जब वे एक पत्थर से बने सर्प को देखते हैं
तो उसपर दूध चढ़ाते हैं.
यदि असली सांप आ जाए तो
कहते हैं- "मारो, मारो."
देवता के उस सेवक को
जो भोजन परसने पर
खा सकता है,
वे कहते हैं-
"चल हट, दूर जा, दूर रह."
लेकिन ईश्वर की पाषाण प्रतिमा को
जो खा नहीं सकती,
वे छप्पन भोग व्यंजन परोसते हैं.
--बासवन्ना (बारहवीं सदी, कन्नड़ में)

क्या हिन्दी अख़बार भी कूड़ा परोस रहे हैं? | रवीश कुमार

मेरे ब्लॉग की क्षमता दस बीस हज़ार लोगों तक पहुंचने से ज़्यादा की नहीं होगी फिर भी मैं हिन्दी के करोड़ों पाठकों से यह सवाल करना चाहता हूं कि क्या आपको पता है कि हिन्दी चैनलों की तरह हिन्दी के अख़बार आपको कूड़ा परोस रहे हैं। पिछले दस सालों में चैनलों की खूब आलोचना हुई है। इसका असर ये हुआ है कि चैनल और भी कूड़ा परोसने लगे हैं। रिपोर्टर ग़ायब कर दिये गए हैं। उनकी जगह स्ट्रिंगर लाए गए, अब उन्हें भी ग़ायब कर दिया गया है। लेकिन हिन्दी के अख़बार सख़्त समीक्षा से बच जाते हैं। आज भी इन अख़बारों के पास ज़िले तक में पांच दस पूर्णकालिक संवाददाता तो मिल जायेंगे। तमाम संस्करणों में इनके सैंकड़ों पत्रकार हैं। फिर भी ख़बर की धार ऐसी कर दी जाती है कि सरकार बहादुर या कलेक्टर तक नाराज़ न हों। ख़बर हिन्दी अख़बारों में होती है मगर सरकार के दावों की जांच करने वाली ख़बरें नहीं होती हैं। होती भी हैं तो अपवाद स्वरूप। हिन्दी के पत्रकारों को बांध दिया गया है और वे भी ये गाना खुशी खुशी गा रहे हैं। कि पग घुंघरू बांध मीरा नाची थी…मीरा नाची थी…और हम नाचे बिन घुंघरू के।
11 जनवरी का इंडियन एक्सप्रेस देखिये। पहले पन्ने पर ख़बरहै कि दिसंबर महीने में ऑटोमोबिल की बिक्री में जितनी गिरावट देखी गई है, उतनी सोलह साल में नहीं देखी गई। इंडियन आटोमोबिल मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ने ये आंकड़े जारी किये हैं। दुपहिया वाहनों की बिक्री 22 प्रतिशत कम हुई है। दिसंबर 2015 की बिक्री की तुलना में। 1997 के बाद किसी एक महीने में यह अधिकतम गिरावट है। 75 फीसदी बाज़ार स्कूटर और मोटरसाइकिल का है। आपने पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर में ही देखा होगा कि सूक्ष्म, लघु उद्योग में 35 प्रतिशत रोज़गार कम हुआ है। उत्पादन में गिरावट आई है।
कहीं 35 फीसदी रोज़गार कम होने का असर दुपहिया वाहनों की बिक्री पर तो नहीं पड़ा। या नोटबंदी के कारण सारा पैसा बैंक में बंद हो गया इस वजह से। क्या स्कूटर मोटरसाइकिल के ख़रीदार भी काला धन रखने वाले हैं? एक्सप्रेस लिखता है कि दिसंबर 2015 की तुलना में दिसंबर 2016 के दौरान वाहनों के उत्पादन में 21.8 प्रतिशत की कटौती की गई है। दुपहिया वाहनों के उत्पादन में 25.2 प्रतिशत की कटौती की गई है। अब आप सोचिये कि इसका रोज़गार पर क्या असर पड़ा होगा। नौकरियां कितनी गई होंगी। इसी तरह रियालिटी सेक्टर भी पूरी तरह धंस गया है। जहां रोज़ाना अस्थायी रोज़गार पैदा होते हैं। क्या सरकार के किसी बयान या दावे में इन आंकड़ों या इसके असर की कोई चिन्ता है। उम्मीद है ये ख़बर हिन्दी अख़बारों और चैनलों पर प्रमुखता से चल रही होगी।
एक्सप्रेस में एक और ख़बर है। इस ख़बर के आधार पर आप हिन्दी अख़बारों के वर्षों से मंत्रालय और पार्टी मुख्यालय की बीट पर बुढ़ा रहे पत्रकारों की धार का अंदाज़ा कर सकते हैं। उनके पास भी ये ख़बर होगी मगर लिखने का साहस नहीं जुटा सके होंगे। 31 सितंबर 2016 को एक्सप्रेस ने एक ख़बर छापी कि जनधन खातों में बैंक दूसरी तरीके से हेराफेरी कर रहे हैं। शून्य जमा खातों से सरकार की बदनामी हो रही है क्योंकि वो एक तरह से ग़रीबी का भी मानक बन जाता है। इसलिए बैंकों ने अपने कर्मचारियों से कहा कि एक एक रुपया डाले। क्या ये काला धन बनाने की प्रक्रिया नहीं है। सिर्फ धन ही नहीं, आंकड़े भी काले होते हैं। तब बैंकों और सरकार ने इस ख़बर से किनारा कर लिया था। किसी चैनल या अखबार ने इसका फोलो अप नहीं किया क्योंकि सरकार के दावे की जांच करने का जोखिम है।
इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार श्यामलाल यादव ने कई महीने बाद इस स्टोरी का फोलो अप किया है। आर टी आई से सूचना हासिल कर लिखा है कि बैंक आफ बड़ौदा और बैंक आफ इंडिया ने माना है कि उनके ब्रांच स्टाफ ने अपनी जेब से एक एक रुपया डाल कर शून्य जमा वाले जनधन खातों को समृद्ध किया है। कई और बैंकों में इसी तरीके की बात मानी है। एक ब्रांच में दस बीस कर्मचारी होते हैं लेकिन खातों की संख्या सैंकड़ों और हज़ारों में हो सकती है। इसलिए इसके लिए ब्रांच के पास अन्य मदों के लिए उपलब्ध पैसों से भी शून्य जमा जनधन खातों को भरा गया। इससे क्या हुआ? सितंबर 2014 में 76 फीसदी जनधन खातों में कोई पैसा नहीं था। ऐसे खातों का प्रतिशत अगस्त 2015 तक घटकर 46 फीसदी रह गया। अगस्त 2016 में 24.35 फीसदी पर आ गया।
सरकार इन्हीं आंकड़ों को लेकर खेल करती है। सरकार अक्सर जनधन खातों में जमा राशि को कामयाबी की तरह बताती है। आम पाठक के पास इन दावों की जांच का कोई आधार नहीं होता। अब आप इसे दूसरी तरीके से देखिये। कैसे सूचना और आंकड़ों के खेल से लोकतंत्र की हत्या हो रही है। लाखों बैंक कर्मचारियों को मजबूर किया गया। उन्होंने उफ्फ तक नहीं किया और अपनी जेब से पैसे जमा किये। उनका पैसा जमा हुआ और पब्लिक तक यह सूचना पहुंची कि ग़रीब लोगों ने जमा किया और यह सरकार की बड़ी कामयाबी है। श्यामलाल यादव की यह ख़बर पढ़ते हुए आप यह भी सीखेंगे कि पत्रकारिता कैसे की जाती है। क्या इस तरह की श्रमसाध्य पत्रकारिता आपको हिन्दी के उन अख़बारों में देखने को मिल रही है। इसलिए नहीं मिलती क्योंकि उनका संपादक पब्लिक की निगाह की जांच से बचा रहता है। सौ फीसदी चांस है कि यह ख़बर किसी हिन्दी के पत्रकार के पास भी हो।
एक्सप्रेस ने ही 10 जनवरी को एक और खबर छापी। इस खबर को पढ़ने के बाद मैंने हिन्दी के दस पाठकों से पूछा कि क्या आपको पता है कि सरकार ने रिज़र्व बैंक से कहा था कि वो नोटबंदी करना चाहती है। किसी को पता नहीं था। सबने कहा कि मेरे अख़बार में तो ऐसा कुछ नहीं आया है। इसीलिए मैं कई बार कह रहा हूं कि अंग्रेज़ी अख़बारों या thewire.in , epw.org जैसी वेबसाइट पर जो समीक्षाएं छप रही हैं उन्हें जानबूझ कर देसी भाषा के पाठकों तक पहुंचने नहीं दिया जा रहा है।भारतीय रिज़र्व बैंक ने यह सब संसदीय समिति को अपने लिखित जवाब में कहा है। इसलिए मान लेना चाहिए कि इनकी विश्वसनीयता किसी भी मंत्री के दावे से ज़्यादा है।
10 जनवरी की एक्सप्रेस की पहली ख़बर कहती है कि 7 नवंबर को सरकार ने रिज़र्व बैंक को नोटबंदी की सलाह दी और विचार करने के लिए कहा। आठ नवंबर की सुबह रिज़र्व बैंक ने अपनी सहमति दे दी। इतने बड़े मसले पर 24 घंटे के भीतर रिज़र्व बैंक ने विचार कर सहमति भी दे दी। प्रधानमंत्री कहते हैं कि राजनीतिक दलों के चंदों के बारे में चर्चा होनी चाहिए। ग़ज़ब। जाली नोटों के बारे में तो समझ सकते हैं लेकिन आतंकवाद और नक्सलवाद में काले धन या इन नोटों का इस्तमाल हो रहा है, इसकी जानकारी और विशेषज्ञता भारतीय रिज़र्व बैंक को भी होती है, यह मुझे नहीं मालूम था। हो सकता है भारतीय रिज़र्व बैंक अपनी स्वायत्तता गिरवी रखने के बाद अब गृह मंत्रालय के अधीन भी काम करने लगा हो। आतंकवाद और नक्सवाल में 500 और 1000 रुपये के नोटों का हाथ है, इस नतीजे पर रिजर्व बैंक चौबीस घंटे के भीतर किनकी मदद से पहुंच गया। इस संस्था की साख चौपट होती जा रही है।
एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है कि 7 अक्तबूर 2014 को भारतीय रिज़र्व बैंक ने पांच हज़ार और दस हज़ार के नोट जारी करने का सुझाव दिया था। मई 18 2016 में सरकार ने सुझाव दिया कि 2000 के नोट छापे गए। अब यहां देखिये। 2014 के सुझाव पर 2016 में जवाब आता है। मौद्रिक नीतियों और फैसलों के मामले में रिज़र्व बैंक से ज़्यादा सरकार सोचने का काम करने लगी है। जब भारतीय रिज़र्व बैंक अक्तूबर में पांच हज़ार और दस हज़ार के नोट जारी करने का सुझाव दे रहा था तब उसने गृहमंत्रालय और खुफिया विभाग से पूछ लिया था कि कहीं पांच सौ और हज़ार के नोट से आतंकवाद और नक्सलवाद तो नहीं फैल रहा है। दस हज़ार के नोट से कहीं आतंकवाद दस गुना तो नहीं बढ़ जाएगा। सरकार ने रिज़र्व बैंक को क्या जवाब दिया होगा। यही कि भाई दस गुना बड़ा नोट छापोगे तो आतंकवाद दस गुना बढ़ जाएगा। एक्सप्रेस ने कुछ दिन पहले ही ख़बर छाप दी थी कि संसदीय समिति ने रिज़र्व बैंक से जवाब मांगा है। इसके बाद भी हिन्दी चैनलों और अख़बारों ने कोई सक्रियता नहीं दिखाई। क्योंकि कोई भी अब ऐसी ख़बरों का पीछा नहीं करना चाहता जिसके कारण सरकार की पोल खुले।
एक दो ख़बरों के आधार पर हिन्दी के अख़बारों का मूल्याकंन करने पर भी सवाल हो सकता है लेकिन आप परिपाटी देखिये तो पता चलेगा। इसीलिए फिर से कहता हूं कि दो लाख चार लाख रुपये देकर घटिया प्राइवेट संस्थानों और उनके घटिया शिक्षकों से पत्रकारिता के छात्रों और छात्राओं का जीवन बर्बाद किया जा रहा है। इस उम्र में तेज़ दौड़ने वाले घोड़े को खच्चर बनाया जा रहा है। बेहतर है आप अपनी जवानी में ही संभल जाएं। जबकि बैंकों में हिन्दी के पत्रकारों के ज़्यादा बेहतर संबंध होते हैं। वो अंग्रेज़ी के पत्रकारों से ज़्यादा सक्षम हैं लेकिन हिन्दी के अखबारों में पत्रकारिता बंद है। इनके अनाम और अनजान संपादकों की हरकतों पर आपकी कम नज़र होती है। ये लोग ज़्यादा बेहतर तरीके से सेटिंग कर लेते हैं और आम पाठक को पता तक नहीं चलता। क्या ये अच्छा नहीं होगा कि संपादक मंडली का नाम पिछले पन्ने के सबसे नीचे की जगह पहले पन्ने पर फोटो के साथ छपे और अब मृत प्राय हिन्दी चैनलों को छोड़ कर इन अख़बारों का भी विश्लेषण करें। मेरी राय में किसी भी राजनीतिक बीट पर दो साल से ज्यादा कोई पत्रकार नहीं होना चाहिए। तमाम रिपोर्टरों में पोलिटिकल बीट के रिपोर्टर का पदनाम बड़ा होता है, सैलरी ज़्यादा होती है। जबकि अखबार या चैनल को नज़र नहीं आ रहा है कि इनकी ज़रूरत रही नहीं। इन्हें वहां से हटा कर कहीं और लगा देना चाहिए। क्योंकि राजनीतिक दल तो अपनी ख़बर ख़ुद ही ट्वीट कर देते हैं। जब वे बीस साल वाले अनुभवी पत्रकार से ख़बरें प्लांट करवा सकते हैं तो दो साल से भी करा लें। ज़रूरी है कि राजनीतिक बीट को लेकर बहस हो और नई प्रणाली बने। आमीन।
नोट- अब आप यह मत कहियेगा कि इस पर लिखा तो उस पर क्यों नहीं लिखा। भाई साहब, आपको लगता है कि मैंने किसी पर नहीं लिखा तो आप लिख दीजिए। जय हिन्द।

संस्कृत में रचने के कारण विद्यापति को इतिहासकारों ने भुला दिया | रवीश कुमार


बिहार की राजधानी पटना में एक म्यूज़ियम है। ठीक उसके पहले विद्यापति भवन है। जब भी विद्यापति जयंती का टाइम आता था, यह सड़क ओहदेदार फलां झा जी, फलां मिश्रा जी की गाड़ियों से भर जाती थी। दसवीं के क्लास में विद्यापति की एक कविता पढ़ी थी, आएल ऋतुपति राज बसंत। जानना एक भ्रम है। इसी भ्रम के तहत वर्षों तक लगता रहा कि हम भी विद्यापति को जानते हैं। क्या लिखा है, क्या गाया है, और क्या क्या किया है, इन सब बातों को जाने बग़ैर भी लगता रहा कि विद्यापति को जानते हैं। आज पता चला कि कुछ नहीं जानते हैं।
वाणी प्रकाशन से छपने वाले 350 रुपये के प्रतिमान का यह अंक लाजवाब है। विद्यापति पर पीएचडी करने वाले पंकज कुमार झा ने करीब 52 किताबों और संदर्भ ग्रंथों का हवाला देते हुए 18 पन्नों के लेख में विद्यापति और मिथिला जगत की मज़ेदार सैर कराई है। ऐसा लग रहा था कि आप स्कूटर से विद्यापति के विशाल रचना संसार और ऐतिहासिक संदर्भों का एक चक्कर लगा आए हैं। कार से चक्कर लगाने के लिए आपको पंकज की किताब का इंतज़ार करना पड़ेगा। पहला झटका यही लगता है कि विद्यापति संस्कृत के कवि ज़्यादा थे। उनकी आधी से अधिक रचना संस्कृत में है। इस लेख में इतिहास के विद्यार्थी की नज़र से काफी कुछ जानने को मिलेगा। आज के इंटरनेटीय पाठकों के लिए भी इस लेख से विद्यापति के बारे में दस महत्वपूर्ण बातें टाइप की गुज़ाइश बनती है। जिसे दो मिनट में स्क्रोल करते हुए काफी कुछ जाना जा सकता है। आज कल तमाम वेबसाइट इसी तरह की सुर्ख़िया लगाते हैं। जानिये इस भाषा में क्यों रचते थे विद्यापति। पूरा का पूरा लेख चित्रशैली में लिखा हुआ है।
“यानी हिंदी जगत में स्थापित प्रचलन के विपरीत विद्वानों को समय व विद्वतपरंपरा की वह कौन सी परिस्थितियां थीं, जिसने विद्यापति जैसे बहुभाषी कवि के पनपने की संभावनाएं पैदा कीं।” मध्यकाल के आधुनिक इतिहासकारों और हिन्दी साहित्य जगत के निर्माताओं ने विद्यापति को फुटनोट में डालकर क्यों छोड़ दिया। इन दो सवालों के जवाब में पंकज कई तरह की दिलचस्प जानकारियों से हमारा परिचय कराते हैं। “ साथ ही यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि आधुनिक काल में,ख़ासकर आज़ादी के बाद, विद्यापति जिस ‘गौरवशाली मैथिल संस्कृति’ के प्रतीक चिन्ह बनकर उभरे हैं, उसमें ग़ैर द्विज एवं ग्रामीणों की भागीदारी लगभग नगण्य है।” पंकज इस सवाल का जवाब भी खोज रहे हैं।
वैसे विद्यापति का असर इतना गहरा था कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपनी किशोरावस्था में भानु सिंह के नाम से विद्यापति की नकल की कोशिश की थी। 1097-1320 के बीच कर्नाटक से आया योद्धा कुल के नान्यदेव ने मिथिला में कणार्ट वंश की स्थापना की थी। कुछ समय बाद मोहम्मद तुग़लक ने आइनी गांव के एक ब्राह्मण कामेश्वर ठाकुर को,जो आख़िरी कर्णाट शासक हरिसिंहदेव के राजपुरोहित थे, तिरहुत के सिंहासन पर बिठाया। आगे जो वंश चला उसे ओइनिवार वंश के नाम से जाना गया। रानी लखिमा देवी और रानी विश्वास देवी के भी राजसिंहासन पर बैठने का उल्लेख मिलता है।जयपुर लिट मेले में मुझे एक बार मैथिली गीतों की जानकार विभा रानी ने बताया था कि ज़माने तक कर्णाटक की नाटक और संगीत मंडली मिथिला आया करती थी और मिथिला वाली मंडली कर्णाटक जाती थी। विभा जी बताती हैं कि मैथिली शब्द और वाक्य संरचना तुरु भाषा में बहुत अधिक है। शेट्टी लोग तुरु बोलते थे। वैसे मैथिली का पहला अख़बार जयपुर से निकला था। मैथिली भी कम नैशनल नहीं है।
पंकज ने उन जड़ों की भी पड़ताल की है,जहां से विद्यापति को रचना संसार की विरासत मिलती है। मिथिला क्षेत्र में ग्यारहवीं सदी से लेकर सोलहवीं सदी के बीच संस्कृति ग्रंथों का भरमार मिलता है। पंकज अब यहीं से मध्यकाल के इतिहासलेखन की कान पकड़ते हुए पड़ताल करते हैं कि विद्यापति की अवहेलना क्यों हुई। कारण मध्यकाल के इतिहासकारों को फ़ारसी क़िताबों का ख़ज़ाना मिल गया। वे उस ख़ज़ाने में ही खोए रहे और ज़माने से बेख़बर हो गए। फ़ारसी और संस्कृत की दूरी बनी रही। संस्कृत में रचने के कारण आधुनिक इतिहासकार विद्यापति को समझने में सक्षम नहीं थे। विद्यापति एक ऐसे क्षेत्र से भी आते थे जिसका दिल्ली सल्तनत या किसी और बड़े राज्य के बनने-बिगड़ने में कोई विशेष भूमिका भी नहीं थी। हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा गया तो वीरगाथा काल, भक्तिकाल और रीतिकाल के खांचे से भी रामचंद्र शुक्ल ने विद्यापति को बाहर कर दिया। उनके साथ साथ फ़ारसी के विद्वान अमीर ख़ुसरो भी बाहर हो गए।
यह लेख विद्यापति पर है मगर मध्यकालीन इतिहास लेखन की जड़ता को भी तोड़ता। दिल्ली सल्तनत और मुग़लों का इतिहास आज की शब्दावली में कहें तो एनसीआर का इतिहास है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का। यही कारण है कि इस इलाके की तमाम विविधताएं अब जड़ लगने लगी हैं क्योंकि उनसे जितना राजनीतिक सांस्कृतिक रस निचोड़ा जाना था, निचोड़ लिया गया है। पंकज पंद्रहवीं सदी में फ़ारसी और संस्कृत का बड़ा ही दिलचस्प खाका खींचते हैं।
कीर्तिलता ग्रंथ में विद्यापति कहते हैं कि संस्कृत सिर्फ बुद्धीजीवियों को भाती है। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ शाही कामकाज़ फ़ारसी में होने लगता है। पंकज ने शाही कामकाज़ की जगह सरकारी कामकाज़ लिखा है! “ लेकिन हम अक्सर भूल जाते हैं कि वो अफ़ग़ान, तुर्की, हब्शी, ताजिक व मध्य एशियाई लोग, जिनकी भागीदारी से सल्तनत की स्थापना हुई और जिनके हाथ में शासन की बागडोर थी, उनमें विविध भाषा-भाषी समूह मौजूद थे। इनमें से बहुत कम लोग फ़ारसी लिख-पढ़ या बोल सकते थे। तात्पर्य यह है कि अगर नये शासकीय लोगों के संस्कृतपरायी थी तो फ़ारसी से भी उन्हें कोई व्यक्तिगत लगाव नहीं था।“ अब समझ आ गया कि सत्ता को हमेशा लोक-भाषा के ख़िलाफ़ जाकर एक दूसरी भाषा की ज़रूरत क्यों पड़ती है। फ़ारसी, संस्कृत के बाद अंग्रेज़ी आ गई। अगर यह बात समझ नहीं आई तो सलमान की फिल्म का वो गाना सुनिये। बेबी को बेस पसंद है।
प्रतिमान का यह अंक मज़ेदार है। आम पाठकों को महिषासुर से परिचय कराता है जिस संजय जोठे ने लिखा है और इसके बाद भी अभी तक प्रतिमान प्रतिबंधित नहीं हुआ है और न ही संसद में बहस हुई है। स्मृति ईरानी का पढ़ने-लिखने वाला मंत्रालय भी बदल गया है। वैसे जूट उद्योग के समाप्त होने पर भी बेहतरीन लेख है। पंकज के लेख के बाद शिवानी कपूर का इत्र बनाम चमड़ा पढ़ने लायक है। गंध दुर्गंध की राजनीति को शिवानी ने आम पाठकों के लिए आसान शब्दों में उकेरा है। गंध एक राजनीतिक अवधारणा है। दूसरे विश्व युद्ध में फ़ासीवादी जर्मनी के यातना शिविरों की पहली ख़बर वहां निकल रही जलते शवों की बदबू ने ही दी थी। वक्त मिलता तो शिवानी कपूर के लेख की अलग से समीक्षा पेश करता। चमड़े और इत्र के कारोबार से जुड़े गंध को लेकर ज़बरदस्त काम है। हम सब जो रोज़ डियो मारकर दफ्तर चल देते हैं,उनकी नाक इस लेख के बाद कुछ और सूंघने लगेगी। हिलाल अहमद ने प्रोफेसर रंधीर को ख़ूब याद किया है।
“तब शायद वे सोचेंगे कि ज्ञान की समकालीन राजनीति द्वारा आरोपित सीमाओं ने हमारा क्या हश्र किया है,और आधुनिक विचार को अपनी ज़मीन पर संसाधित करते हुए हम भारतीय बुद्धि की कैसी-कैसी अहम उपलब्धियों का लाभ उठाने से वंचित रह गए हैं।“
ओह नो!मौलिक होने की तड़प ग़ैर संघी खेमे में भी है। लगता था कि भारतीय चिंतन के सवाल पर संघ का ही एकाधिकार है। वैसे demonetization भी भारतीय सोच है। गुप्त काल में जब सिक्कों की कमी हुई तो राज्य सत्ता के अधिकारियों को नगदी वेतन की जगह ज़मीन के टुकड़े दिये जाने लगे और भारत में सामंतवाद आया। ज़मीन के टुकड़े में वेतन तो कैशलेस के समान था मगर सामंतों ने ग़रीबों से जो वसूला उससे उबरने में अभी तक बजट का इंतज़ार हो रहा है। सामंतवाद के पहिये के नीचे वही ग़रीब कुचला गया जिसे आज मुक्त कराने की बात हो रही है।मार्कसवादी इतिहासकार रामशरण शर्मा की इस थ्योरी को कभी नहीं मानना चाहिए वो भी इस सरकार में तो हर्गिज़ नहीं। थोड़ा प्रो गर्वमेंट होना चाहिए! कालक्रम में कई राजाओं ने,जिनमें से कई सनकी भी थे,अपने सिक्के चलवाये।नए सिक्के आए होंगे तो पुराने वाले बंद ही हुए होंगे।
अब उपनिवेशवादी सोच का क्या होगा,इतना लोड नहीं लेता।नवउदारवादी विचारधारा को राष्ट्रवादी बताने वाले केमिस्ट्री में प्रथम श्रेणी से पास आज के नेता भी इस सोच पर हमला कर रहे हैं और दूसरी तरफ से ‘ग़ैर संघी भारतीय इतिहासकार’ भी। आपने देखा सरकारों के साथ ‘नोमिनक्लेचर’यानी नामावली कैसे बदलती है। ग़ैर संघी भारतीय इतिहासकार! वैसे प्रतिमान के इस अंक में भारत और भारतीयता पर भी एक गंभीर लेख है। कैशलेस होकर हम राष्ट्रवादी बनेंगे और अमरीकी वीज़ा और मास्टर कार्ड को सर्विस चार्ज देंगे। हम किसी का अहसान नहीं रखते। हम प्रतिमान पढ़ते हैं। जिस टिप्पणी पर हमने टिप्पणी की वो प्रतिमान के संपादक अभय कुमार दुबे की प्रतीत होती है। दुबे, तिवारी, चौबे, मिश्र, झा, कपूर से भरपूर यह अंक आगे चलकर ख़ास किस्म के पाठ की सामग्री बनेगा। यह मेरा विश्वास है!
हिन्दी के पाठकों को प्रतिमान का अंक गर्व के साथ अपने पास रखना चाहिए। कभी कभी शो ऑफ भी करना चाहिए। थैले से बाहर हाथ में लेकर चल सकते हैं। सिर्फ पढ़ना ज़रूरी नहीं है,आप पढ़ते हैं इसका भाव बाहर भी झलकना चाहिए। टी शर्ट के साथ इस आदत को डिस्प्ले कीजिए। हिन्दी वाला डूड बनिये लेकिन पहले प्रतिमान पढ़कर कूल तो बनिये। विश्व पुस्तक मेले में हॉल नंबर 12 में वाणी का स्टॉल है। वहां से ले लीजिएगा।

Friday, January 6, 2017

त्रि-भाषा फॉर्मूला


हिंदुस्तान की अनेकता में एकता की जिस खुशबू व रंगारंग विरासत पर दुनिया नाज करती है, उसमें यहां बोली जाने वाली भाषाओं की भी बहुत बड़ी भूमिका है। हर चंद मील के फासले पर जबान और बोलियां बदल जाती हैं। इनको सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए जरूरी है कि उनका उचित प्रचार-प्रसार हो। ऐसे में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा दसवीं कक्षा तक त्रिभाषा फामरूला लागू किए जाने का फैसला नि:संदेह स्वागतयोग्य है। इससे हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का शिक्षा के रूप में अवसर मिलेगा।इससे बोर्ड से सम्बद्ध 18 हजार स्कूलों में अब दसवीं क्लास तक हिंदी और अंग्रेजी के अलावा एक अन्य भारतीय भाषा को पढ़ाया जा सकेगा। छात्रों के पास इस तीसरी भाषा के तौर पर भारतीय संविधान की आठवीं सूची में सूचीबद्ध भाषाओं में से किसी एक को चुनने का विकल्प होगा। काबिलेगौर है कि इसमें फिलहाल असमिया, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, उड़िया, कश्मीरी, संस्कृत, तेलुगू, मैथिली और उर्दू समेत 22 ऐसी भारतीय भाषाओं को सूचीबद्ध किया गया है, जो विभिन्न राज्यों के लोगों द्वारा बोली जाती हैं। इसके दो फायदे हैं। अव्वल तो हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों को अपने ही देश की एक अन्य भाषा का ज्ञान होगा।
दूसरे, उन राज्यों में जहां हिंदी नहीं बोली जाती है, उन्हें अंग्रेजी और अपनी इलाकाई जबान के इलावा हिंदी को सीखने का मौका मिलेगा। इसे हम महज भाषाई नहीं बल्कि संस्कृतियों के आदान-प्रदान के रूप में देख सकते हैं; क्योंकि भाषा से सिर्फ उसकी लिपि या फिर बोली ही नहीं, बल्कि उसमें मौजूद साहित्यक, सांस्कृतिक और सामाजिक खजाने का भी बोध होता है। सीबीएसई से सम्बद्ध हजारों स्कूलों में लगभग ढाई करोड़ छात्र पढ़ते हैं। ऐसे में इन छात्रों को अपनी धनवान भारतीय भाषाई विरासत का ज्ञान होगा। वैसे भी भाषा, साहित्य और सांस्कृतियों को लोगों को जोड़ने और करीब लाने में मददगार होता है। ऐसे में ये कहना बेजा नहीं होगा कि इससे हमारी एकता को एक धागे में पिरोने और साम्प्रदायिक सौहार्द की डोर को मजबूत करने में मदद मिलेगी। हालांकि सीबीएसई के इस फैसले से अधिकतर निजी स्कूल खुश नहीं है। दरअसल, इन स्कूलों में तीसरी भाषा के तौर पर विदेशी भाषा को पढ़ाया जाता है। दो साल पूर्व इसी तरह का विवाद तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के जरिए केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली जर्मन भाषा को खत्म किए जाने को लेकर उठा था।
उस समय केंद्रीय विद्यालयों को जर्मन की जगह संस्कृत अथवा कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा को पढ़ाने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि उनका फैसला अमल में नहीं आ सका। त्रिभाषा फामरूले पर निजी स्कूलों के विरोध के पीछे ये दलील दी जा रही है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में अंग्रेजी और हिंदी के अतिरिक्त तीसरी आधुनिक भारतीय भाषा को पढ़ाए जाने का फैसला उचित नहीं है। उनका कहना है कि अगर कोई छात्र विदेशी भाषा सीखना चाहता है और उसमें आगे अपना भविष्य बनाने का इच्छुक है, तो उसे इससे वंचित नहीं किया जाना चाहिए। देखा जाए तो निजी स्कूलों के इस विरोध में दम नहीं है; क्योंकि सीबीएसई ने विदेशी भाषा के विकल्प को पूरी तरह से खत्म नहीं किया है और इसे चौथी भाषा के रूप में चुनने की छूट दी है। वैसे भी हमारी नई पौध को भारत की मालामाल विरासत में विशेष महत्व रखने वालींिहंदुस्तानी भाषाओं का ज्ञानबोध कराना ज्यादा आवश्यक है।
गौरतलब है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति और एनसीआरटी के राष्ट्रीय पाठक्रम फ्रेमवर्क में त्रिभाषा फामरूले को माध्यमिक शिक्षा के स्तर तक क्रियान्वित किए जाने का स्पष्ट उल्लेख है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के द्वारा दसवीं तक तीन भाषाओं को पढ़ाए जाने का फैसला इस फ्रेमवर्क के अनुकूल है। ऐसे में निजी स्कूलों को भी अब इस त्रिभाषा फामरूले का अनुपालन करना अनिवार्य होगा। हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि दसवीं के बोर्ड इम्तेहान में इस तीसरी भाषा के अंक जुड़ेंगे या नहीं, फिर भी इसके दूरगामी परिणामों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। इससे सीबीएसई से सम्बद्ध हजारों स्कूलों में ऐसे अध्यापकों की आवयकता होगी, जो इन आधुनिक भारतीय भाषाओं का ज्ञान रखते हों। यही नहीं इन क्षेत्रीय भाषाओं के ज्ञान से छात्रों को भी अनुवादक जैसे पदों पर नियुक्तियों के अवसर प्रदान होंगे। इस तरह सीबीएसई के इस फैसले से बहुत सी नौकरियों के सृजन होने की भी उम्मीद है।

women security issue

उन परिवारों में भी, जहां औरतों के लिए तमाम पाबंदियां हैं, पुरु षों की उद्दंडता पर कोई लगाम नहीं है। लड़कियां बाहर निकल रही हैं। उच्च शिक्षा लेकर, बेहतर जीवन चुन रही हैं। बावजूद इसके खांटी रूढ़िवादी सोच वाले पुरु षों का समूह हमेशा इस ताक में फिरता है, कि वह स्त्री की देह को अपना शिकार बना ले। इस तरह के सोच वाले पुरु षों को स्त्री की यह तरक्की आंख की किरकिरी लगती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह जश्न नव वर्ष का न होकर होली या किसी आम मेले का होता तो भी स्त्री के साथ हील-हुज्जत करने वालों का हुजूम मौजूद रहता। औरतों के साथ सलीके से पेश आने का शऊर अभी भी पुरु षों में कम ही दिखता है। जो पुरु ष इस तरह की अभद्रता नहीं कर पाते हैं, उनकी भाषा और बोल-चाल में स्त्री के प्रति अश्लीलता व निर्लज्जता साफ देखी जा सकती है।
माननीय तो हमेशा की तरह, रटी-रटाई दुहाई देकर चलते बने। अपनी दिमागी क्षमता भर का गहन विश्लेषण करने के बाद उन्होंने दोहराया, यह सब पश्चिमी पोशाकें पहनने के कारण हुआ। यह जो भीतर से निकला हुआ, शुद्ध पुरु षवादी विचार है; इस पर रोक कैसे संभव है? शायद ही कोई औरत भूली होगी, उप्र के बुजुर्ग नेता का बलात्कार पर दिया गया उदगार-कि लड़कों से ऐसी गलतियां हो जाती हैं। कुछेक साल पहले, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री ने तुनक कर मीडिया से कहा था, इतनी रात में निकलेंगी बाहर (लड़कियां) तो यही होगा। सत्ता के शीर्ष पर बैठे नुमाइंदों की बयानबाजी बताती है, स्त्री को लेकर इनकी सोच कितनी निचले पायदान पर ठहरी हुई है। छेड़छाड़, छींटाकशी, अश्लील इशारेबाजी के खिलाफ तमाम नियम/कानून बन जाने के बावजूद पुरु षों में सलीका नहीं आया है।
शहरों को स्मार्ट बनाने भर से या हर हाथ में मोबाइल सेट पहुंच जाने से दिमागी संकीर्णताएं व रूढ़िवादी संस्कारों को नहीं बदला जा सकता। उत्सव-आनन्द पुरु षों के लिए आरक्षित नहीं किए जा सकते। इस तरह की कोई भी घटना लड़कियों को मानसिक तनाव देती है और उनके स्वाभिमान को चोटिल भी करती है। आप उन्हें कुछ दें भले ही ना, पर जो उनके पास है, जो उनका अधिकार है, उस पर अपनी गंदी नजर न डालें।

अध्यादेशों की भूमिका


हमारे संविधान में ऐसी आपातकालीन व्यवस्थाएं की गई हैं कि कभी बेहद जरूरी कदमों को उठाने के लिए संसदीय संस्थाओं की मंजूरी का इंतजार न पड़े। सरकार को कभी जनहित में फौरी कदम उठाने में रुकावट न आए। लेकिन सरकारें अपने राजनैतिक और अन्य न्यस्त हितों के लिए इन आपात व्यवस्थाओं का दुरुपयोग करने का लोभ नहीं छोड़ पातीं। जाहिर है, अधिकांश मामलों में राजनैतिक बढ़त ले लेने या संसदीय समीक्षा से बचने के तरीकों के रूप में संविधान में प्रदत्त इन आपात प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाता है। अध्यादेश जारी करना भी ऐसी ही एक व्यवस्था है।
लेकिन मौजूदा एनडीए सरकार ने तो अध्यादेश जारी करने का ही रिकॉर्ड कायम नहीं किया, बल्कि कई एक अध्यादेश को चार-चार, पांच-पांच बार जारी करवाने का अनोखा रिकॉर्ड कायम किया है। आश्र्चय तब होता है, जब ऐसी सरकार को अध्यादेशों का यह रिकॉर्ड बनाना पड़ रहा है, जिसे तीस साल बाद पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने वाजिब ही यह निर्देश सुनाया है कि इस पर शर्तिया रोक लगनी चाहिए और एक बार के बाद दोबारा अध्यादेश जारी नहीं किया जाना चाहिए।
आखिर अध्यादेशों की उम्र छह महीने शायद इसीलिए रखी गई है कि इस बीच कोई-न-कोई संसदीय सत्र जरूर बुलाया जा सकेगा और उसे संसदीय समीक्षा से गुजरना होगा। लेकिन अगर अध्यादेश बार-बार जारी करना पड़े तो समझना चाहिए कि सरकार संसदीय व्यवस्था के पालन में गंभीर नहीं है। या सरकार संसदीय व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए अपने दायित्व का पालन नहीं कर पा रही है। आखिर हमारी संसदीय पण्राली का एक पहलू यह भी है कि किसी पार्टी को चाहे कितना ही बड़ा बहुमत क्यों न हासिल हो, उसे विपक्षी दलीलों पर गौर करना होगा। इस पण्राली में विपक्ष को अनदेखा करने से ही सत्ताधारी दल द्वारा तमाम संस्थाओं के दुरु़पयोग की मिसालें कई बार मिल चुकी हैं।
इस सरकार में सीबीआई, सीवीसी प्रमुख वगैरह की नियुक्तियों में मर्यादाओं का पालन न करने की मिसालें मिल चुकी हैं। ऐसी संवैधानिक व्यवस्थाओं और कानूनी रियायतों का लाभ उठाने से रोकने के लिए उचित प्रावधान और अदालती आदेश स्वागतयोग्य है। हालांकि आपात स्थिति में अध्यादेश जारी करने से शायद सरकारों को रोकना सही नहीं होगा। इसके लिए शत्रे जरूर कड़ी की जा सकती हैं, ताकि कोई सरकार मनमानी न कर सके।

Thursday, January 5, 2017

दीपक सूरज बनने वाला है.

मैं नहीं कहता तुम
रात के मलबे से उठ
दिन के गीत गाओ,
सोते से जागो
दिन का बोझ ठोओ.
चलना सीखो,
खुद की किस्मत बदलना सीखो.
सवाल करो,
बवाल करो,
अपने भविष्य का ख़्याल करो.
 मैं नहीं कहता.

मैं बस कहना चाहता हूँ
सोने की सुविधा
जिससे बेहतर कुछ भी नहीं है,
ढलने वाली है
सुबह होने वाली है,
तुम चाहो या नहीं.

मैंने एक दीपक जलाया था
वो सूरज बनने वाला है
सबकुछ बदलने वाला है
आकाश खिलने वाला है
अँधेरा ढलने वाला है.

तुम चाहो तो मुझे मार दो,
ज़हर पिला- सुकरात सा
सलीब चढ़ा- ईशा सा
कैद और प्रताड़ना दे- गैलेलिओ
नाटक देखते- लिंकन सा
प्रार्थना सभा में गोलियों से भून- गाँधी सा
नुक्कड़ नाटक करते बीच सड़क पे -सफ़दर
या किसी चौक पे- राबिन सा.

मार दो, लेकिन सुनो!
सुबह होने वाली है
ओस और रौशनी के बीच
न चाहते हुए भी तुम्हें जागना होगा.
मैंने एक दीपक जलाया था
वो सूरज बनने वाला है
अँधेरा ढलने वाला है
आकाश खिलने वाला है
दीपक सूरज बनने वाला है.

Monday, January 2, 2017

पढना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो

साल का पहला दिन होने के अलावा 1 जनवरी नुक्कड़ नाटक आंदोलन के प्रतिनिधि चेहरे - सफदर हाशमी - का शहादत दिवस भी है. दिल्ली के पास साहिबाबाद मे नुक्कड़ नाटक-हल्ला बोल- करते हुए कांग्रेसी गुंडों ने उन पर हमला किया और 1 जनवरी 1989 को उनकी शहादत हो गयी. नुक्कड़ नाटक करते हुए शहीद होने से पहले भी उन पर और उनकी नाट्य टीम-जन नाट्य मंच पर कई बार पुलिस और गुंडों ने हमला किया था. आज जब अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर नए सिरे से हमले तेज हो रहे हैं तो सफदर हाशमी की शहादत को याद करना समीचीन होगा. सफदर हाशमी से उत्तराखंड का एक संबंध यह भी रहा है कि 1976 मे गढ़वाल विश्वविद्यालय मे अँग्रेजी के प्राध्यापक रहे थे. उस दौर पर डा.प्रभात उप्रेती ने एक बेहतरीन पुस्तक - सफदर : एक आदमक़द इंसान- लिखी है. सफदर को उनके शहादत दिवस पर याद करते हुए उनकी यह बहुचर्चित कविता प्रस्तुत है -

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
ओ सड़क बनाने वालो, ओ भवन उठाने वालो
खुद अपनी किस्मत का फैसला अगर तुम्हें करना है
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलने वालो
अगर देश की बागडोर को कब्ज़े में करना है
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
पूछो, मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं?
पूछो, माँ-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं?
पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा
पढ़ो, किताबें कहती हैं – सारा संसार तुम्हारा
पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है
पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो

( कबाड़ख़ाना ब्लॉग से )

Friday, December 30, 2016

यह एक निःशक्त कविता है

यह एक निःशक्त कविता है
जो युद्ध की बात नहीं कर सकती
स्वतंत्रता की अलख नहीं जगा सकती
क्योंकि स्वतंत्रता तो
सत्तर साल पहले दिल्ली की गलियों में
घोषित हो चुकी है.
यह एक निःशक्त कविता है
क्योंकि ये
जनता का, जनता को, जनता द्वारा
हो रहे इस शासन में
गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा
से स्वतंत्रता की बात नहीं कर सकती,
सब जगह लोग देशद्रोही का ठप्पा लगाने घूम रहे हैं.
लोकतंत्र में अपनी सरकार के खिलाफ बोलना वर्जित है,
लोकतंत्र एक सबसे बड़ी दुविधा है,
यह एक निःशक्त कविता है.

मैं प्रेरणाओं की बातें नहीं कर सकता
जूनून और बदलावों की बातें नहीं कर सकता
ये कपडा इतना फट गया है की
थिंगरे लगाने से ये सुधर नहीं पायेगा,
देश सिर्फ बातों से असर नहीं पायेगा.
शोषण, पतन, गरीबी पर लिखना
और थप्पड़ खाने से परे,
प्रेमिका के केशों पर लिखना सुविधा है,
यह एक निःशक्त कविता है.

दुनिया तवायफों की नींदों जैसी है
पूँजीवाद कस्टमर सा है
उम्मीद बूचड़खाने में अपना इंतज़ार कर रही है
सीरिया आँखें नुचने तक रो रहा है.
जो जल रही है, वो आग सीने की नहीं है
किसी क्रन्तिकारी कवि की चिता है,
यह एक निःशक्त कविता है.

हर निराश में उजास भरना जरूरी है
'अंत भला, सब भला' करना जरूरी है,
इसलिए 'प्रेमिका की सांसे सागर की लहरें हैं,
प्रेमिका के गाल अमेरिका की चिकनी सड़कें हैं,
प्रेमिका की आँखों में थेम्स का साफ़ जल है,
प्रेमिका के दिल में मिसिसिपी की कलकल है,
प्रेमिका का यौवन लोकतंत्र सा नया है,
प्रेमिका का ज्ञान डिजिटल रेवोलुशन सा खरा है.
प्रेमिका का चेहरा चाँद सा है.'

रुको! चाँद तो आर्मस्ट्रॉन्ग के पैरों तले कुचला गया है!
इसीतरह प्रकृति पैरों तले कुचली गई
मानवता तकनीक तले कुचली गई है
सीरिया, लीबिया के मुंह जुबानी नहीं है,
जैसे शादी के बाद रेप की मनाही नहीं है!
सॉरी! अंत तक उजास, उम्मीद न भर सका
कवि बेचारगी लिए दुल्हन का पिता है
ये वर्ष की की आखिरी कविता है
वर्ष की तरह, यह भी एक निःशक्त कविता है.