Tuesday, August 12, 2014

घास का स्केच


तुम हरी घास हो
जिसपे बैठ दो सुकून के पल बिताना चाहता हूँ.
शबनम की महक महसूस करता हूँ.
एक दौर से मैंने कोई पेंटिंग नहीं की
तुम्हें ही रंगता रहा मैं.
मैं भिखारी नहीं जो रिश्ते मांगता,
आज नया स्केच बनाया है
जला के तुम्हें.
'भारत भवन' में लोगो ने कहा
'अब तक का सबसे खूबसूरत काम.'
तुम्हारे खून के धब्बे किसी को नहीं दिखे
न मेरा ताप!

खीझ जाता हूँ कि
इस दौर के लोगों को कविता समझ नहीं आती.
मेरी तो बिलकुल न आएगी.

पोपले मुंह मैं बैठना चाहता हूँ,
शबनम कि महक लेना चाहता हूँ.
ये घास तू भी तो पीली पड़ गई है.


Tuesday, July 15, 2014

लप्रेक (लघु प्रेमकथायें)



         कभी कभी ख़ुदा के कान में बड़ी जोर से चिल्लाने का मन करता है.... लगता है उठा दूँ सोते से. ज़िंदगियाँ लेने से पहले के हिसाब ठीक करे.

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       'उस रात तुम चाँद लग रहे थे...सच कह रहा हूँ... बस मेरे आसमान पे नहीं छाये थे.'  किसी ज़माने में किसी ने लिखा था, महबूब के निकाह को लेकर....सोचता हूँ, उस वक़्त उसके दिल में क्या चल रहा होगा?

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      'तुम नहीं समझोगे, तुमने मोहब्बत नहीं की कभी.' जॉब छोड़ के जाते-जाते वो मुझसे बोलती है..... दो साल बाद- 'इश्क़ करोगे हमसे?' वही है. 'तुम्हें बड़े दिन बाद पता चला कि मैंने भी इश्क़ किया था.' मैं धीरे से उसके कान में फुसफुसाता हूँ.

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    'लड़कियों का संघर्ष तो जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है.' वो टूटी-फूटी हिंदी में बोलती है. बड़ा दीर्घ बोल के भी खिलखिला रही है. शायद अबतक कुर्बानियों की आदत हो गयी है.

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    'पता है,अगर मेरी कुछ प्रायोरिटी नहीं होती तो तुमसे मैं शादी कर लेती....यू आर जैम'  वो कहती है.
'मेरी वाली ने भी यही कहा था.' मैं कहता हूँ.
    एक सन्नाटा सा पसर गया है, जिसे कोई तोड़ने की कोशिश नहीं करता.

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    'तुम अपने पहले प्यार से शादी नहीं कर पाते..... गर कर भी लेते हो तो फिर उतना खूबसूरत नहीं बचता.' वो धीरे से कान में कहता है.
   उसकी पत्नी मुस्कुरा रही है. धीरे-धीरे वो मुस्कान मुझे फेक लगने लगती है.
   उसने अपने स्कूल टाइम प्यार से शादी की थी.

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   'सबके अपने-अपने ग़म हैं, तुम भी अपने के साथ जी लो.' आज के दिन की एक और फ़क़त फिलॉसोफी मिलती है.


Tuesday, July 8, 2014

डेमोक्रेसी




मैं कहता हूँ
डेमोक्रेसी किसी मचान पे बैठ मुर्गे खाना
फिर नशे में दो चार इंसानों के शिकार करना है.

चुपचाप से चले जाओ बारिश में
भीगकर कौन सा पिघलने वाले हो,
कौन सा पत्थरों पे चल एड़ियां घिस जाएँगी.
अस्तित्व के इशारे पे बकलोली मत करो अब,
कौन सा तुम मरे तो धरती कांपने लगेगी.

चार किताबों के पांच सिद्धांत और
नर्मदा बचाओ चिल्लाने से भी कहीं कुछ बचता है?
तुम्हारे शरीर से बस
आग जला रोटियां सेंकी जा सकती हैं.
तुम्हारी जमीन पे फैक्ट्रियां धुआं उगल सकती हैं,
उस धुएं में तुम्हारी लाशें भी न दिखेंगी किसी को.
तुम्हारी बेटियां बस मरने के लिए बनी हैं,
जिस्म लूट लेंगे, दहेज़ को जला देंगे,
बचीं तो गांव में नंगा घुमा देंगे.

पूजते रहो अनाप-शनाप 'ब्लडी गॉड्स',
इन्ही के नामों पे चढ़ तुम्हारे जिस्म नौंचे जायेंगे.
तुम नहीं समझोगे कि तुम्हारे आराध्य तुम्हें ही मारेंगे.
तुम्हारी शिक्षा को नशे में दे देंगे-
राष्ट्रहित, वक़्त और बदलाव, या थोड़ी अक्ल बची रही तो
अबकी बार, तबकी बार के चार नारे.
डेढ़-लाख करोड़ के ज़ीरो गिने हैं?
इतने में हमारे कुत्ते का पेट भी नही भरता!

'उन्हें डेमोक्रेसी किसी मचान पे बैठ मुर्गे खाना
फिर नशे में दो चार इंसानों के शिकार करना है.'
लपक के मेरे सीने से बारूद पार हो जाता है.
अगली आवाजें 'डेमोक्रेसी...', 'डेमोक्रेसी...' चिल्लाती हैं,
खद्दर को साफ़ कर वो कहते हैं...' ब्लडी फूल्स'.

Sunday, July 6, 2014

‘मैंने आखिरी बार चे ग्वेरा को सिसकते हुए बरतन मांजते देखा’ : संदीप कुमार


           वह अन्ना आंदोलन का दौर था. ‘मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना’ का बोलबाला था. दिल्ली पूरी तरह अन्नामय हो चुकी थी. जंतर मंतर देश का सबसे नया पिकनिक स्पॉट था जहां वीकेंड पर मध्यवर्गी युवा सपरिवार क्रांति करने जाते थे और पिकनिक के साथ अपने व्यक्तिवादी जीवन के तमाम अपराधबोध भी कम कर आते थे. यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे हमारे गांव का साहूकार हर साल बिना नागा गंगा नहाने जाता है और इस तरह साल-भर डंडी मारने के पाप का भी प्रायश्चित कर आता है.
मैं भी उन दिनों क्रांति मोड में था और तमाम दोस्तों को अन्ना आंदोलन के संचालकों की ओर से मिलने वाले एसएमएस फॉरवर्ड करता रहता था जिनमें लिखा होता था कि एक बूढ़ा आदमी चिलचिलाती धूप में देश के लिए लड़ रहा है और आप अपने घर में आराम से बैठे हैं, आप अब नहीं तो कब निकलेंगे, आदि-आदि. उस दिन मैं आंदोलन स्थल पर पहुंचा तो धूप बहुत तेज थी और मुझे थोड़ी भूख भी लगी थी. मैं थोड़ा टहलता हुआ आगे डोसे की एक दुकान तक पहुंचा. वहां 15 साल का चे ग्वेरा (एक बच्चा जिसने चे ग्वेरा की तस्वीर छपी टी-शर्ट पहन रखी थी) अपने मालिक की मार खा रहा था. पता चला कि मेज साफ करते समय उसका पोंछा झक्क सफेद कपड़े वाले कुछ क्रांतिकारियों से जा टकराया था.
फिर भी, मैंने उसके मालिक से पूछा, ‘क्यों मार रहे हो इसे’
‘**मी है जी साला! एक नंबर का कामचोर.’ वह बोला.
‘पता है न बाल श्रम कानूनन अपराध है. नाप दिए जाओगे.’ मुझे थोड़ा गुस्सा आया.
‘नहीं जी लेबर कहां है. ये तो घर का लड़का है. भतीजा है मेरा.’ दुकान वाला सकपकाया.
‘कहां घर है बेटा?’ मैंने उस लड़के को पुचकार पूछा
‘कठपुतली कॉलोनी.’ वह बोला.
दुकानवाला अब नजरें चुराने लगा था.
लेकिन इस बीच वहां डोसा खाने आए युवा क्रांतिकारियों की सहनशक्ति समाप्त हो चली थी. वे दुकानवाले पर चिल्ला रहे थे. दुकानवाला लड़के का हाथ पकड़कर दुकान के अंदर चला गया था.
अब मैं युवाओं के उस समूह की ओर मुखातिब हुआ. शायद मेरे हावभाव देखकर उनको लगा होगा कि अब मैं कुछ ज्ञान बांटने की कोशिश करूंगा. मुझे दिखाते हुए उनमें से एक-दो जानबूझकर उबासियां लेने लगे. तीसरे ने अपना मोबाइल निकालकर इयर फोन कान में लगा लिया. चौथी जो एक लड़की थी वह अपने बाजू वाले को बताने लगी कि स्नैपडील पर जींस और कुरतों में भारी डिस्काउंट है.
उनके लिए मैं वहां अनुपस्थित था. मेरी भूख मर चुकी थी और मैं तेजी से अप्रासांगिक महसूस कर रहा था, लेकिन मुझे बार-बार उस बच्चे का निरीह चेहरा याद आ रहा था. मुझे लगा कि मुझे पुलिस को फोन करके बता देना चाहिए कि जंतर मंतर पर यानी देश के प्रमुख आंदोलन स्थल पर प्रशासन की नाक के नीचे बाल श्रम और मारपीट के रूप में दो-दो अपराध हो रहे हैं. लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका.
मुझे अचानक याद आया कि मुझे तो अभी आधे घंटे में ऑफिस के लिए निकलना है वरना लेट हो जाऊंगा. मुझे यह भी लगा कि पुलिस कंप्लेंट के बाद अगर किसी तरह का मुकदमा दर्ज हो गया तो मुझे शायद मुफ्त में अदालती चक्कर भी लगाने होंगे. मैं आंदोलन स्थल की ओर जा रहा था और लगातार यह सोच रहा था कि यह एक फोन कॉल मेरी व्यवस्थित
‘मेरी भूख मर चुकी थी और मैं तेजी से अप्रासांगिक महसूस कर रहा था, लेकिन मुझे बार-बार उस बच्चे का निरीह चेहरा याद आ रहा था’
जिंदगी में कितनी अव्यवस्था पैदा कर सकती थी? मैंने राहत की सांस ली और वहां से चल दिया.
उस दिन वहां से निकलते-निकलते मैंने यह भी सोचा कि अब ऐसी जगहों पर बगैर ऑफिशियल असाइनमेंट के नहीं जाऊंगा. रही बात ‘क्रांति’ में योगदान की तो मैं अपने एसएमएस पैक का पूरा लाभ उठाऊंगा. मैंने आखिरी बार चे ग्वेरा को उस दुकान के पीछे सिसकते हुए बरतन मांजते देखा था. बैकग्राउंड में पुरानी वाली शहीद फिल्म का गाना बज रहा था, ‘वतन की राह पर वतन के नौजवां शहीद हों’.
(  An Article by संदीप कुमार  in Tehalka Hindi Magazine http://tehelkahindi.com )

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 12, Dated 30 June 2014)

Wednesday, June 25, 2014

इश्क़ किनारे ताकें चाँद




यूँ रातभर क्यों जलता चाँद?
किस बेवफा को तड़पता चाँद?

फलक किनारे झुका हुआ
कितना बेनूर बेवस चाँद.
दिनभर ज्वर में तपता रहा
रातभर छत पे जलता चाँद.

महबूब निकाही धरती पे,
रात फलक पे ताके चाँद.
टुकुर -टुकुर टूटे दिल
रात फलक से ताके चाँद.

अजनबी  से कुछ हम,
अजनबी से कुछ तुम,
बीती यादें कुतरें बैठे
इश्क़ किनारे ताकें चाँद.

Tuesday, June 10, 2014

हम मुसाफिर ऐसे...




थका हूँ, गिरा हूँ
लेकिन आशान्वित तो पड़ा हूँ.
उठूंगा, लड़ूंगा, चलूँगा,
उम्मीद है,
उम्मीद से अधिक दौडूंगा.

ठहरा नहीं, रुक नहीं,
धीमा, मगर चल रहा हूँ.
जो सोचा,
कर रहा हूँ.

मैं बस चलना चाहता हूँ
नए-नए रास्तों से,
जिसका पता सफर में निकलने से पहले
मालूम ना हो.

'हमको तो बस तलाश नए रास्तों की है,
हम हैं मुसाफिर ऐसे जो मंज़िल से आये हैं.'*



*जावेद अख्तर साहब से उधार ली गईं दो लाइनें, जिनके बिना शायद ये कविता अधूरी लगती.

Pic : लोनावला का कहीं, कोई रास्ता.

Saturday, June 7, 2014

दो किलो की रद्दी के कागज़




मेरे पिता को मारा था दो किलो प्याज ने.
माँ कहती है-
गए थे बाज़ार लेने दो किलो प्याज़
और वही मर गए.
सुना है प्याज़ शरीर पे चिपकी मिली थी
तो माँ को लगता है
उन्हें मारा है दो किलो प्याज़ ने.

उनकी दाढ़ी बड़ी थी
पहली भीड़ ने त्रिशूल घोंपे.
फिर दूसरी भीड़ ने पूछा नाम,
और कर दिए गए हलाल.
अख़बार ने छापा है
दंगों में मरने वालों में मेरे बाप का नाम.

मुझे लगता है,
मेरे पिता को मारा धर्मग्रंथों ने.
क्यूंकि भड़क के भीड़ में शामिल
कभी मैं भी हो सकता हूँ,
या मेरे पिता हो सकते थे;
और मरने वाले आपके पिता.

मुझे नहीं लगता दंगों ने मारा,
मुझे बस लगता है-
मेरे पिता को मारा धर्मग्रंथों ने.
जिनमें भरी पड़ी है तमाम दकियानूसी,
कपडे-लत्तों के कायदे,
जीने-मरने के कायदे,
मरने-मारने के कायदे,
लड़ने-भिड़ने के कायदे.

कल धर्म-संसद में भी
दोहराया मैंने कि,
मेरे बाप को मारा धर्मग्रंथों ने.
कल क़त्ल किया मेरा, सारे धर्मों ने एक साथ.

मेरे पिता को मारा था दो किलो प्याज ने.
नहीं, दो किलो की रद्दी के कागज़ ने,
जो तुम्हारे लिए पवित्र हैं.


Tuesday, May 20, 2014

खुद पानी बन जाना




तुम मेरे रास्ते नदी बहा देना,
पानी बन जाना
और डुबा देना नियति को.
ख़ुदा के बनाये तमाम नियमों को धता बता कर
चले आना,
खुद पानी बन जाना,
मेरे रास्ते नदी बहा देना.

लाख टके के कायदे
दो टके में बेच के,
चल देना अपने रस्ते.

लोग पूछें
तो कह देना-
'खुद का काम देखें,
आधी आबादी भूखी है,
खाने का सामान देखें.'

ख़ुदा आये तो पूछ लेना-
'हेडमास्टर था क्या कहीं?'
तमाम नियम बना डाले,
जीने-मरने के.'

खुद का ख़याल रखना,
सवाल तमाम रखना,
रौशनी चुरा लेना,
डर को डरा देना.
फिर पानी बन जाना,
भागीरथी सा बह जाना,
मेरे रास्ते भी नदी बहा देना.


Pic: from explore.org

Saturday, May 17, 2014

सुगना की बेटियां





सुगना ने बेटियां की पैदा चार,
एक मरी डेंगू से हो बीमार.
लाला से उधारी थी अनेक
तो दूसरी चढ़ी लाला की भेंट.
तीसरी जन्मते ही दफना दी गई,
लड़की होने की सज़ा जन्मते पा गई.

सुखना की पांचवी संतान बेटा है
इसलिए चौथी बेटी कुपोषित है,
मावा-मच्छी बेटे को समर्पित है
इसलिए चौथी की मौत नियोजित है.

आप पूछते हैं- 'सुगना का घर कहाँ है?'
बुंदेलखंड के हर दूसरे घर में सुगना है. 



Wednesday, May 7, 2014

Chain Smoking


तुमने सिगरेट पी है?
कश लवों पे रखे हैं सिलसिलेवार?

हाँ मैंने इश्क़ किया है.
इसकी फिदरत भी स्मोकिंग से कम नहीं-
आता है,
सांसे भर देता है,
फिर दर्द का कैंसर छोड़ चला जाता है.
 ...बाकि उम्र हम मौत का इंतज़ार करते
दर्द में जीते हैं.

क्या तुमने कभी सिगरेट पी है?
हाँ मैंने इश्क़ किया है.