Saturday, January 4, 2014

Social discrimination




बीच का अंतर ढहा क्या?
दिल में जमा था, बहा क्या?

एक आईने में मैं,
एक आईने में तुम
एक जैसे अक्स पर
जो मैंने सहा,
तुमने सहा क्या?

हर रोज सुबह मद्धम है,
हर रात ज़रा ज्यादा काली.
मिट्टी के तुम
मिट्टी के हम
फूट तो बस पैसे ने डाली.
बीच का अंतर ढहा क्या?
जो मैंने सहा, तुमने सहा क्या?

मानव तुम, मानव हम,
खाते रोटी तुम, तो हम,
दो कपडे तुम्हें ज़रूरी,
बस दो ही पहने हम.
फिर भी, मन जैसा मेरा
तेरा वैसा रहा क्या?
पैसा-औकात के आगे
सोचने कुछ बचा क्या?
बीच का अंतर ढहा क्या?
जो मैंने सहा, तुमने सहा क्या?

Thursday, December 26, 2013

धम्मा...

1.


लोगों ने महावीर, बुद्ध के कहे को
सत्य माना,
उन्हें इंसान नहीं भगवान कहा.
उनके पत्थर के प्रतिमान बनाये,
फिर उनका कहा, उन्हीं पत्थरों में तज दिया.

मूर्तियां भगवान् बन गई,
...और महावीर, बुद्ध का कहा कहीं खो गया.

हम सिर्फ मूर्तिपूजक थे, मूर्तिपूजक ही रहे.



---

2.


धर्म बदले, भगवान बदले,
मूर्तियां बदलीं, पूजा के तरीके बदले,
बस हम नहीं बदले.

न महावीर का कहा माना,
न बुद्ध का कहा माना.
हमने बस धर्म बदले, हम नहीं बदले.

हम सिर्फ मूर्तिपूजक थे, मूर्तिपूजक ही रहे. 



Wednesday, December 25, 2013

क्यूंकि मरे हुए लोग फिर से नहीं मर सकते.




मैं चाहता हूँ
दफ़न कर दी जाएँ
चाँद की कसम ले के
कही गयीं तमाम बातें,
बेदखल कर दिए जाएँ
ईमानदारी से रिश्ते निभाते लोग.

हर रात कर  दी जाये अमावस और बुझा दिए जाएँ सारे तारे.
किसी करवट पे पड़े ख्वाब तोड़ दिए जाएँ,
निर्वासित कर दी जाएँ वो ऑंखें
जिन्हें देख,
ख़ुदा यहीं-कहीं नज़र आता था.

कठघरे में खड़ा कर देता हूँ,
कभी खुद को, कभी तुमको.
हर दफे तुम्हें देता हूँ सज़ा-ए-मौत.
फिर ज़िंदा ही दफ़न करता हूँ खुद को,
क्यूंकि मरे हुए लोग फिर से नहीं मर सकते.

Sunday, December 15, 2013

एक गांव, एक शहर

तुम्हारे शहर के किसी कोने में पड़ा है
मेरा गांव,
तुम्हारा शहर बढ़ता जा रहा है,
मेरा गांव खाता जा रहा है.

यकीनन जब गांव शहर बनते हैं,
अच्छा लगता है.
लेकिन गांव-सा अपनापन मरता है,
अंदर से आदमी कुछ-कुछ मर जाता है.

तुम्हारे इस शहर के कोने में,
मेरा गांव हुआ करता था कभी.
अब इसे भी
शहर कहते हैं....तुम्हारा शहर.

एक मरे गांव कि अस्थियां भी
विसर्जित करने नहीं मिली!
गांव मर गया....
शहर दो फलांग और बढ़ गया.

Monday, December 9, 2013

हम लड़ेंगे साथी / पाश




हम लड़ेंगे साथी,उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी,गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी,जिन्दगी के टुकड़े

हथौड़ा अब भी चलता है,उदास निहाई पर
हल अब भी बहते हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता,प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी

कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हम लड़ेगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले खुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखो वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने ही भाइयों का गला घोंटने को मजबूर हैं
कि दफ्तर के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर....
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है....
जब बन्दुक न हुई,तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई,लड़ने की लगन होगी
कहने का ढंग न हुआ,लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी....

हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी.....

- पाश (
Avtar Singh Sandhu)

Wednesday, December 4, 2013

स्ट्रोंग कॉफी



तुम्हें भुलाने हर दिन
बस एक 'स्ट्रोंग कॉफी' काफी होगी...

ऐसा सोचता था मैं.

तुम गये,
कॉफ़ी हर शाम पीता हूँ
...और पीते-पीते तुम्हें याद करता हूँ.


तुम ठोकर हो, पर शबनमी हो.
दिल को लगती हो, दिल गीला करती हो.
हर दिन... हर दिन.
हर शाम... हर कॉफ़ी पे. 


Friday, November 22, 2013

Chashme Wali Ladki Ke Liye... :)



            अजीब लगता है जब एक चलताऊ कविता पे तालियां पड़ती है तो.... शायद लोगों को अर्थपूर्ण कविताओं से ज्यादा संता-बनता जोक्स कहना-सुनना ज्यादा अच्छे लगते हैं. लेकिन गलती इनकी भी नहीं, क्यूंकि आधा देश भरपेट रोटी कि जद्दोजहद में डूबा तो आधा देश को रोटी कि कीमत क्षोभ और तनाव से चुकानी पड़ती है. लोग घर आ दुनियादारी के बारे में सोचना नहीं, बस दो पल मुस्कुराना चाहते है. फ़िलहाल, एक चलताऊ कविता-

मेरी आँखों को उसकी आँखों से
मिलने के अरमान बहुत है, मगर...
कमबख्त कभी मेरा चश्मा बीच आ जाता है,
कभी उसका चश्मा बीच आ जाता है.

हमने सोचा,
ऑंखें चार करते हैं,
अपने-अपने चश्मे उतार देते हैं.

लेकिन फिर,
न उसे कुछ नज़र आता है,
न मुझे कुछ नज़र आता है. ~V!Vs 

Thursday, November 14, 2013

तीन रातों का लेखा-जोखा


इतिहास


एक पत्थर पे रख परीकथाएं
लगा दूंगा आग,
तबाह कर दूंगा इतिहास को ताकती
तमाम किताबें,
तमाम किवदंतियां
और हौसले पस्त करने वाली सारी बातें.

मैं रचूंगा इतिहास, 
मैं रचूंगा इतिहास
जो मुझसे शुरू होता हो,
जो मेरी कहानी हो.
आम-आदमी की कहानी
जिसका शाहों के रचे इतिहास में
कोई जिक्र नहीं मिलता. 


---**---

इश्क़ की शुरुआत अधिकार से नहीं होती


गीता की कसम
मैंने 'सीता' को नहीं चाहा
तुम्हारे शहर में.
जहां 'सीता' को चाहा
वो शहर कोई और था.
मैं था, तन्हाई थी,
कुछ शहर ही आवारा था, यौवना छाई थी.

हाँ, 'गीता' को ज़रूर चाहा
हमारे शहर में.
क्यूंकि 'गीता' में 'सीता' दिखी थी
और ये शहर भी आवारा लगने लगा था.

...क्यूंकि तुममें मुझे
चाहत से ज्यादा अधिकार दिखा था.
इश्क़ की शुरुआत अधिकार से नहीं होती,
अंत होता है.


---***--

मैं लम्बी कवितायेँ नहीं लिखता, क्यूंकि मैं खुद ही लम्बी कवितायेँ पढ़-पढ़ते ऊब जाता हूँ.#Confession फ़िलहाल लिखते-लिखते लम्बी हो गई एक कविता आप तक पहुंचा रहा हूँ...

मोहब्बत


एक पत्थर पे 
स्वप्नदर्शी चाँद रख गया 
अपनी ख़ामोशी.

नदी का बहाओ बहुत तेज था
फिर भी 
नदी के किनारे से 
तुम तक पहुचने का रास्ता ढूंढ़ ही लिया मैंने.

लोग कहते हैं
वो नदी वक़्त थी.
खामोश चाँद तुम
और पत्थर मैं.

कलह करते लोग
ढूंढते रहे कलह,
उन्हें मिलती रही कलह.
फिर मुझसे कहा
उन्हें मोहब्बत नहीं दिखी कहीं.

तुमने मुझमे सम्भावनाएं देखीं,
खुद में ज़रूरतें.
फिर की मोहब्बत.
ढूंढा मुझे,
काश! ढूंढते मुझमें मोहब्बत.
एक बार भी तुमने ने मोहब्बत नहीं ढूंढी.

वक़्त न बहता नदी कि तरह
न इस तरफ तुम रह जाते
दूसरे किनारे मैं,
और बीच नदी में
न बह जाती ये सम्भावनाएं ढूंढती मोहब्बत. 



Pic: A Chinese Art Exhibition 

Wednesday, November 13, 2013

रूह का क़त्ल

तुम्हारे घर में रखे है
मेरे दिन के क़त्ल के सामान
तुम खुद हो
रात के क़त्ल की वजह.

यादों की मरहम
अतीत के घाव उघाड़ती है
दिन पसीने में तर
जिस्म में बुनता हूँ
रूह की तृप्ति का सामान.
उखड़-उखड़ पत्थर होते दिनों में
पथराती आँखें,
तुम्हारी हक़ीक़त झुठलाते-झुठलाते
खुद ही झूठा हो गया.

एक दिन तुम मिलो तो
घर का सारा सामान ले
मेरा क़त्ल कर देना,
फिर रात भर रोना
मेरे ख्वाब बुनकर.

कहते हैं रूह अमर है.
लेकिन तुम क़त्ल करना मेरी रूह भी,
अगले जन्मों के
बेनाम रिश्ते भी
यहीं दफ़न हों, जायज़ है.

एक दिन

घडी वक़्त बताती है,
तुम्हारे लौट आने का वक़्त नहीं.
डार्क कॉफी
नींद मारती है
तुम्हारे ख्वाब नहीं!

तुमको तो पता होगा
जाते-जाते तुम
मुझे भी उठा ले गये थे.
मुझे लौटाने ही सही
आ जाओ एक दिन!