प्यार करना बहुत ही सहज है, जैसे कि ज़ुल्म को झेलते हुए ख़ुद को लड़ाई के लिए तैयार करना. -पाश
Monday, May 6, 2013
Saturday, May 4, 2013
Three Noticed Days.
जनवरी 20, 2013, Pune Maharashtra ____
'प्रदेश को विकास की ज़रूरत है, लेकिन ये तब तक नहीं होगा जब तक बिहार, उ.प्र. के लोग यहाँ आते रहेंगे.' मेरे सीनियर हैं, पढ़े-लिखे इंजिनियर और कुल नौ साल के करियर में छ: साल यू. एस. ए. में रहे हैं.
मैं उनके कॉलेज का नाम पूछ लेता हूँ. वो बड़े गर्व से एक बड़े से इंस्टिट्यूट का नाम बताते हैं. मुझे उनके इस गर्व पे तरस आता है. शायद पढ़ा-लिखा होना और अच्छे कॉलेज से पढना आपके अक्लमंद होने की निशानी नहीं है. मुझे एसे पढ़े-लिखों से अच्छे अपने गाँव के अनपढ़ पर सीधे-सच्चे लोग ज्यादा अच्छे लगते हैं!
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अप्रैल 21, 2013, Mysore Karnataka ____
मैं उसके साथ मंदिर गया था, ये मंदिर हमारे यहाँ के मंदिरों से अलग है. देश में हर दो सौ गज़ पे बोली बदलती है तो आस्था भी और पूजा के तरीके भी. फिर देश अपना है, तभी तो घर से 2000 KM दूर भी अपनापन लगता है. मैं आदतन 'मंगलाष्टक' पढने लगता हूँ........ "देखो ये दो-दो लोग किस तरह से भगवान की मूर्ति साफ़ कर रहे हैं. बाहर कोई गिरा पड़ा होता तो उठाते भी नहीं!" वो मूर्ति साफ़ करते पुजारियों को देख बोलती है.
मैं उसकी तरफ देखता हूँ, उसके चेहरे पर उन पुजारियों से ज्यादा तेज़ था.
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Today, Mysore Karnataka ____
कुछ लिखना तो चाहता हूँ तुमपर भी, लेकिन मेरी सबसे अच्छी दोस्त ने कहा है कि उसे नहीं लगता की कभी तुमने मुझसे प्यार किया था..... मुझे भी लगने लगा है की शायद वो सही है.
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Saturday, April 27, 2013
दरकार खुद बदलने की है
देश को लोग कितना बांटना चाहते हैं इसका जवाब तो उनके पास भी नहीं है, जब तक उनका उल्लू सीधा होता रहेगा तब तक लोग बांटते रहेंगे. कल 'आज तक' ने कहा की देश की कुल 78 लोकसभा सीटों पर बीजेपी को उम्मीदवार के बारे में सोचना पड़ेगा क्यूंकि यहाँ 20% से ज्यादा मुस्लिम वोट हैं.....शायद एसे सर्वे ३० साल पहले तक नहीं होते होंगे, कोई भी अखबार नहीं कराता होगा (प्राइवेट न्यूज़ चैनल तो थे नहीं उस वक़्त.) मतलब कायदे से ये देश अघोषित ही सही मुस्लिम-इंडिया और हिन्दू-इंडिया में बांटा जा चुका है.
एक और बयान आया है, अप्रत्याशित और थोडा सा अजीब. मुलायम सिंह यादव ने कहा है की 'मंगल पाण्डेय' ब्राह्मण थे. ये ब्राह्मण वोटों की ओर उनका एक और कदम है, लेकिन मंगल पाण्डेय ने मरने से पहले जाति नहीं सोची होगी, न ही अशफाक उल्ला खां ने अपना धर्म और न ही किसी और क्रन्तिकारी ने...लेकिन आजादी के 66 साल बाद सबकी जाति चुन चुन कर निकली जा रही है. जैसे उनका सरोकार देश के लिए जान देने से ज्यादा जाति से था. पहले ही राजनीति देश को धर्म के नाम पे बाँट चुकी है और जाती के नाम बाँटने की कोशिशे पिछले 20 सालों से जोर-शोर पर हैं और आश्चर्य नहीं कि शायद कोशिशें कामयाब हो जाएँ, अगर हम सम्हले नहीं तो.
हमारा सम्हलना इतना आसान नहीं है, क्यूंकि मैं जहां जॉब करता हूँ वहां ''सो काल्ड'' देश के बेहद पढ़े लिखे युवा इंजीनियर्स काम करते हैं.... लेकिन सच तो ये है, उनकी सोच भी धर्म, जाति और 'क्षेत्र' से आगे नहीं जाती....और जब देश का पढ़ा-लिखा युवा एसा हो सकता है तो देश की अनपढ़ या अर्ध-पढ़ी-लिखी जनता के ख्यालों का अंदाजा हम लगा सकते हैं.... और लोगों की सोच अगर एसी है भी नहीं तो मनिपुलेट करना आसान होगा.... क्यूंकि पढ़े-लिखे लोगों की सोच में भूसा भरा जा सकता है तो अनपढ़ों में तो और भी जल्दी.
दरकार हमें खुद बदलने की है, पढ़े-लिखे युवाओं को खुद की सोच बदलने की है और बाकि की आबादी की भी, दरकार राजनीति से दूर भागने की नहीं राजनीति में प्रवेश कर राजनीति बदलने की है और जैसा की इतिहास कहता है क्रांति हमेशा चेतनशील युवा मध्यम वर्ग लाता है तो हमें चेतने की ज़रूरत है.
-- VIVEK VK JAIN
(Note: लेखक एक MNC में इंजिनियर है. प्रस्तुत विचार लेखक के व्यक्तिगत लेकिन परिवेश से प्रेरित हैं. )
Tuesday, April 23, 2013
Sunday, April 21, 2013
ईश्वर, तुम्हें अपने किये पर शर्म तो आती होगी.
हर बार जब तुम्हें नहलाया जाता है, घुटन तो होती होगी तुम्हें...डालते हैं सर के ऊपर से लगातार पानी तो कभी दूध....सांस न लेते बनती होगी.कभी कभी तो ये खेल एक से ज्यादा बार दुहराया जाता है, कमाने पुण्य. कभी तो लगता होगा तुम्हें, कि बस बहुत हुआ अब....कभी तो मन करता होगा की निकल आओ मूर्ति से चल दो इन स्वार्थियों से कहीं दूर....ये लोग जो तुम्हारी पूजा करते हैं, मांगते रहते हैं पूजा के हर अंश में तुमसे कुछ न कुछ....जैसे उन्हें तुमने धरती पर भिखारी बना कर ही भेजा है.....कभी-कभी तो तुम्हें लगता होगा कि इन्हें नहीं भरोसा तुमपर, शायद इसीलिए पूजा कर-कर बार बार याद दिलाते हैं, की दे दो तुम सुख, शांति, मोक्ष!
मोक्ष! मतलब उन्हें नहीं चाहिए जीवन-मृत्यु, क्यूंकि जीवन दुःख है उनके लिए.... इससे परे होना चाहते हैं लोग! हद हैं इनकी इच्छाएं....हद है इनकी सोच! जीवन से भय, मृत्यु से भय....और अब पुनर्जन्म से भय! ईश्वर तुमनें कितने भयभीत इंसान पैदा किये हैं! जिन्हें बिना भय के जीना नहीं आता. डर लगता है एसे डरपोक लोग कहीं गलत मार्ग पर न चले जाएँ! कुछ चले भी गये हैं, जिन्हें डर ने इतना डरा दिया की उनका डर 'आतंक' कर के दूर हुआ!
तुमने सिर्फ इन्सान को या तो असह्याय बनाया है....या अपना आसक्त.....और कहीं कहीं तो जेहादी भी! ईश्वर, तुम्हें अपने किये पर शर्म तो आती होगी.
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Sunday, April 14, 2013
..... बात एक सुदीप्ता की नहीं है.
सुदीप्ता गुप्ता की हत्या मुझे एक बहुत पुराना जुमला याद दिला रही है- गाँधी के रामराज्य के सपने, गाँधी के साथ ही ख़त्म हो गये थे. ....एक लड़की जो कोलकाता की गन्दी सी गली में निचले मध्यम वर्ग में जन्मी और स्टूडेंट पॉलिटिक्स से सीड़ियाँ चढ़ती हुई प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी (ममता बनर्जी). वही लड़की (अब औरत) अब स्टूडेंट पॉलिटिक्स से इतना डरी हुई है कि 21 साल के एक लड़के की हत्या पुलिस कस्टडी में की जाती है....जो न तो कोई क्रिमनल है और देखा जाये तो राजनीतिक बंदी भी नहीं है. उसकी हत्या पुलिस कस्टडी में!!! लीगली पुलिस हाथ भी नहीं उठा सकती थी....और पुलिस की कोई व्यक्तिगत दुश्मनी तो है नहीं ( सॉरी 'है' नहीं 'थी', अब वो मर चुका है!) कि वो उसे मौत के घाट उतारे.....अब बचता सिर्फ एक ही रीज़न है....वो क्या है आप समझ सकते हैं.
शायद ममता बनर्जी ने खुद भी नहीं सोचा होगा की इतनी बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा होंगे.....शायद खुद भी नहीं सोचा होगा की एक 21 साल के लड़के की हत्या करना (हाँ, शायद जिससे वो डरती थी!) एक आन्दोलन का रूप ले लेगा.
सच तो ये है, यहाँ बात सिर्फ सुदीप्ता की नहीं हैं, बात देश के युवाओ की है जो देश की जनसँख्या का आधे से भी बड़ा (60 %) हिस्सा हैं.
देश के सिर्फ 30% छात्र ही कॉलेज पहुँच पाते हैं.....जहां हर उर्जावान को गरीबी, शिक्षको और बुद्धिजीवियों की कमी, संसाधनों की कमी से लड़ते हुए सपने पूरे करने हैं....जहां हर एक के मन में हमारे देश को बदलने का जज्बा है और कई सारे सवाल भी....गरीबी, कुपोषण, समाज और राजनीति से उठते सवाल......भविष्य को ले कर उठाते सवाल और आने बाले कल की बेरोजगारी की वजहों को लेकर सवाल.
इन सवालों के जवाब न तो पहले थे और शायद अब तो और भी नहीं होंगे, क्यूंकि डर है उठती आवाज़ इसी तरह (सुदीप्ता गुप्ता की तरह) गिरा दी जाएगी.
देश के युवाओं की उर्जा का सही दोहन कर देश उन्नत भी हो सकता है और विकसित भी लेकिन आज के मौजूदा राजनैतिक हालात (और ये सिर्फ एक प्रदेश या एक पार्टी तक सीमित नहीं हैं.) फ्रस्टरेटेड युवाओं की फौज कड़ी करने में लगा है जो की देश और समाज के लिए घातक है. हमारा तंत्र हमें तरक्की नहीं पतन की और ले कर जा रहा है.....और इनमे वो लोग शामिल हैं जिनके रिज्यूमे 13 -13 पन्नों के हैं, वो लोग भी शामिल हैं जो होवार्ड, कैम्ब्रिज जैसे उच्च संस्थानों से शिक्षित हैं और वो छोटी सोच के लोग भी शामिल हैं जो चाहते हैं की देश की आवादी एक रूपये गेंहू दो रूपये के चावल खा के हमें वोट देती रहे...... या की चाहती है की बस ६००० रूपये साल के गारंटी रुपयों में अपना खर्च निकले और हमें वोट दे. (शायद एसे घटिया लोग 'स्किल्ड लेबर' के फेवर में नहीं या या शायद स्किल डेवलपमेंट के पक्ष में भी नहीं!)
यहाँ बात एक सुदीप्ता की नहीं है, यहाँ बात हजारों सुदीप्ताओं के कल की है, यहाँ बात 60 % युवाओं की है, यहाँ बात लोगों के जज्बे को क़त्ल करने को की गयी कोशिशों की है.....और बात बुद्धिमानों के द्वारा बुद्धि के दुरूपयोग की है (या यों कहें तो बुद्धि का उपयोग जनता के खिलाफ करने की है.)
शायद आज का युवा वो भैंसे बन के रह जायेगा (या गया है) जिसे लाठी के बल पे कुछ गधे हांक रहे हैं!
Friday, April 12, 2013
मैं आज भी सिगरेट नहीं पीता.
मैं सिगरेट नहीं पीता आज भी,
शायद तेरी यादें
अभी इतनी कमजोर नही पड़ी,
कि कुछ और पीना शुरू कर दूँ!
अभी तो वो
झील किनारे रखी बेंत
अक्सर मखौल उड़ाने आ जाती है.
कहती है-
'एक बार फिर नहीं आये.
इस दफा अकेले ही आ जाते!'
वो नमीं का चाँद
अक्सर बड़बडाता है,
'एकछत के नीचे
चुने सपने कहाँ हैं तुम्हारे?'
मैं आज भी सिगरेट नहीं पीता.
...क्यूंकि यादें अभी बची हैं.
कुछ और दिन काट सकता हूँ
इन्हीं के भरोसे!
~V!Vs
Thursday, April 4, 2013
कभी कभी.....
कभी कभी बन के बूँदें. सुनाई देती होगी तुम्हें आवाज़ मेरी खनकते बर्तनों में. आहटें दरवाजे पे ज़िक्र करती होगीं मेरा या लफ्ज़ नज़्म के रूप में पढ़ते होगे किसी मैगज़ीन में कभी तो ख्याल मेरे आते ही होंगे. पलटती होगीं मोबाइल कई दफा, 'व्हाट्स एप' में कभी कोई शायद मैसेज छोडूं मैं..... जिक्र तुम्हें अक्सर आता ही होगा मेरा...... दुहराते ज़िन्दगी अपनी!
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आदमी बनना-
इश्क करना-
जीते जी मरना.
इश्क करना-
जीते जी मरना.
सच कहता हूँ खुदा,
इत्ता आसान भी नहीं!
तू भी एक बार बन देख ले.
इत्ता आसान भी नहीं!
तू भी एक बार बन देख ले.
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ये नादां दिल,
ख्याली पुलाव तेरे!
ख्याली पुलाव तेरे!
उफ़! चुभते बहुत हैं,
जब भी मिलते हैं, हकीक़त से.
जब भी मिलते हैं, हकीक़त से.
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दफ़्न,हर नज़्म
करता रहा मैं.
करता रहा मैं.
हर सुबह तू,लिखती रही नज़्म.
ज़िन्दगी,तू बड़ी अजीब चीज़ है.
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तुम मेरे जिस्म में
रख अपने अल्स...
रख अपने अल्स...
भूल गये हो सब.
ज़रा आओ, दुहराओ!
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sketch: by K. Mediani
Saturday, March 30, 2013
एक शायर जो इंसान था : अदम गोंडवी
शायर इंसान नहीं होते....या होते हैं तो बस आदमी, इंसान नहीं. साहब, इनके पास मत तो होता है पर मति नहीं होती. लिखता तो है, लेकिन परझने नहीं जाता की उसका कोई सरोकार है भी या नहीं...या जो लिखा है, लितना कहने में कामयाब हुआ है....या कहने में कामयाब हुआ है तो उसका लिखा, कितना बदलाव लाया है.
अब तो मान गये होंगे कि शायर के पास बस मत होता है, मति नहीं. वैसे भी, मति होती तो वो शायर क्यों होता.
एक नाम है, जो शायर नहीं था, इंसान था....क्योंकि उसके पास मत भी था और मति भी- अदम गोंडवी. अदम गोंडवी जैसे लोग लिखते नहीं हैं.....उनका लिखा या तो उनका खून होता है या उनकी भूख. खून में कलम नहीं डुबोते एसे लोग....उनका खून आप ही अक्षर गढ़ देता है........
तुमने भूख देखी है? एक बार चार दिन देखिये, यकीन मानिये चांदनी और चाँद-तारे सारे भूल जायेंगे.
'रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है.'
ऎसा लिखना आसान नहीं होता....महसूस करना पाहता है एसा लिखने......जीना पड़ता है ऎसे.
शायर बनना आसान है, अदम गोंडवी नहीं.
Saturday, February 23, 2013
सिवाए इन नासमझ नज्मों के!
खिड़की पे बैठे चाँद देखता हूँ....अधूरा चाँद कुछ कहता ज़रूर है, जैसे उसे फलक से उतर सड़क दर सड़क आवारागर्दी के मज़े लेने की इच्छा हो....घटता-बढ़ता चाँद रिश्तों के घटने-बढ़ने के एहसास भी तो लिए है....फिर कैसे अधूरे चाँद में लोगो को अपना प्यार नज़र आता है? बेवजह ही सही, ख्याल मुक़र्रर तो है!
---
चल चाँद,
साथ फिरते हैं
इन आवारा सड़कों पे.
मैं भी तन्हा हूँ आज.
....और फ़िक्र भी नही किसी को,
सिवाए इन नासमझ नज्मों के!
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क्यूँ ये नज़्म
घुल जाती है तुममें.
बिखर-बिखर
लाख कोशिशें करता हूँ मैं.
....और हमेशा तुम तक
ख़त्म होते हैं लफ्ज़.
---
तुम्हें,
जितनी बार पढता हूँ...
नया पाता हूँ.
....और हर बार
फिर पढने की इच्छा तीव्रित होती है.
तुम मेरा सबसे प्यारा नोवेल हो.
---
तुम्हारी नर्म उंगली पकड़
कई बसंत गुजार देता.
बसंत के ख्वाब,
छिटके न होते तो!
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खामखाँ ख्याल
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