Sunday, April 14, 2013

..... बात एक सुदीप्ता की नहीं है.




             सुदीप्ता गुप्ता की हत्या मुझे एक बहुत पुराना जुमला याद दिला रही है- गाँधी के रामराज्य के सपने, गाँधी के साथ ही ख़त्म हो गये थे. ....एक लड़की जो कोलकाता की गन्दी सी गली में निचले मध्यम वर्ग में जन्मी और स्टूडेंट पॉलिटिक्स से सीड़ियाँ चढ़ती हुई प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी (ममता बनर्जी). वही लड़की (अब औरत) अब  स्टूडेंट पॉलिटिक्स से इतना डरी हुई है कि 21  साल के एक लड़के की हत्या पुलिस कस्टडी में की जाती है....जो न तो कोई क्रिमनल है और देखा जाये तो राजनीतिक बंदी भी नहीं है. उसकी हत्या पुलिस कस्टडी में!!! लीगली पुलिस हाथ भी नहीं उठा सकती थी....और पुलिस की कोई व्यक्तिगत दुश्मनी तो है नहीं ( सॉरी 'है' नहीं 'थी', अब वो मर चुका है!) कि वो उसे मौत के घाट उतारे.....अब बचता सिर्फ एक ही रीज़न है....वो क्या है आप समझ सकते हैं.
 
             शायद ममता बनर्जी ने खुद भी नहीं सोचा होगा की इतनी बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा होंगे.....शायद खुद भी नहीं सोचा होगा की एक 21  साल के लड़के की हत्या करना (हाँ, शायद जिससे वो डरती थी!) एक आन्दोलन का रूप ले लेगा.

              सच तो ये है, यहाँ बात सिर्फ सुदीप्ता की नहीं हैं, बात देश के युवाओ की है जो देश की जनसँख्या का आधे से भी बड़ा (60 %) हिस्सा हैं.

                 देश के सिर्फ 30% छात्र ही कॉलेज पहुँच पाते हैं.....जहां हर उर्जावान को गरीबी, शिक्षको और बुद्धिजीवियों की कमी, संसाधनों की कमी से लड़ते हुए सपने पूरे करने हैं....जहां हर एक के मन में हमारे देश को बदलने का जज्बा है और कई सारे सवाल भी....गरीबी, कुपोषण, समाज और राजनीति से उठते सवाल......भविष्य को ले कर उठाते सवाल और आने बाले कल की बेरोजगारी की वजहों को लेकर सवाल.

                इन सवालों के जवाब न तो पहले थे और शायद अब तो और भी नहीं होंगे, क्यूंकि डर है उठती आवाज़ इसी तरह (सुदीप्ता गुप्ता की तरह) गिरा दी जाएगी.

              देश के युवाओं की उर्जा का सही दोहन कर देश उन्नत भी हो सकता है और विकसित भी लेकिन आज के मौजूदा राजनैतिक हालात (और ये सिर्फ एक प्रदेश या एक पार्टी तक सीमित नहीं हैं.) फ्रस्टरेटेड  युवाओं की फौज कड़ी करने में लगा है जो की देश और समाज के लिए घातक है. हमारा तंत्र हमें तरक्की नहीं पतन की और ले कर जा रहा है.....और इनमे वो लोग शामिल हैं जिनके रिज्यूमे 13 -13  पन्नों के हैं, वो लोग भी शामिल हैं जो होवार्ड, कैम्ब्रिज जैसे उच्च संस्थानों से शिक्षित हैं और वो छोटी सोच के लोग भी शामिल हैं जो चाहते हैं की देश की आवादी एक रूपये गेंहू दो रूपये के चावल खा के हमें वोट देती रहे...... या की चाहती है की बस ६००० रूपये साल के गारंटी रुपयों में अपना खर्च निकले और हमें वोट दे. (शायद एसे घटिया लोग 'स्किल्ड लेबर' के फेवर में नहीं या या शायद स्किल डेवलपमेंट के पक्ष में भी नहीं!)

                 यहाँ बात एक सुदीप्ता की नहीं है, यहाँ बात हजारों सुदीप्ताओं के कल की है, यहाँ बात 60 % युवाओं की है, यहाँ बात लोगों के जज्बे को क़त्ल करने को की गयी कोशिशों की है.....और बात बुद्धिमानों के द्वारा बुद्धि के दुरूपयोग की है (या यों कहें तो बुद्धि का उपयोग जनता के खिलाफ करने की है.)

शायद आज का युवा वो भैंसे बन के रह जायेगा (या गया है) जिसे लाठी के बल पे कुछ गधे हांक रहे हैं!

Friday, April 12, 2013

मैं आज भी सिगरेट नहीं पीता.




मैं सिगरेट नहीं पीता आज भी,
शायद तेरी यादें
अभी इतनी कमजोर नही पड़ी,
कि कुछ और पीना शुरू कर दूँ!

अभी तो वो
झील किनारे रखी बेंत
अक्सर मखौल उड़ाने आ जाती है.
कहती है-
'एक बार फिर नहीं आये.
इस दफा अकेले ही आ जाते!'

वो नमीं का चाँद
अक्सर बड़बडाता है,
'एकछत के नीचे
चुने सपने कहाँ हैं तुम्हारे?'

मैं आज भी सिगरेट नहीं पीता.
 ...क्यूंकि यादें अभी बची हैं.
कुछ और दिन काट सकता हूँ
इन्हीं के भरोसे!

                      ~V!Vs

Thursday, April 4, 2013

कभी कभी.....




             कभी कभी बन के बूँदेंसुनाई देती होगी तुम्हें आवाज़ मेरी खनकते बर्तनों मेंआहटें दरवाजे पे ज़िक्र करती होगीं मेरा या लफ्ज़ नज़्म के रूप में पढ़ते होगे किसी मैगज़ीन में कभी तो ख्याल मेरे आते ही होंगेपलटती होगीं मोबाइल कई दफा, 'व्हाट्स एपमें कभी कोई शायद मैसेज छोडूं मैं..... जिक्र तुम्हें अक्सर आता ही होगा मेरा...... दुहराते ज़िन्दगी अपनी!

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आदमी बनना-
इश्क करना-
जीते जी मरना.

सच कहता हूँ खुदा,
इत्ता आसान भी नहीं!
तू भी एक बार बन देख ले.

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ये नादां दिल,
ख्याली पुलाव तेरे!

उफ़चुभते बहुत हैं,
जब भी मिलते हैंहकीक़त से.

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दफ़्न,हर नज़्म
करता रहा मैं.

हर सुबह तू,लिखती रही नज़्म.

ज़िन्दगी,तू बड़ी अजीब चीज़ है.

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तुम मेरे जिस्म में
रख अपने अल्स...

भूल गये हो सब.
ज़रा आओदुहराओ!

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sketch: by K. Mediani

Saturday, March 30, 2013

एक शायर जो इंसान था : अदम गोंडवी





                       शायर इंसान नहीं होते....या होते हैं तो बस आदमी, इंसान नहीं. साहब, इनके पास मत तो होता है पर मति नहीं होती. लिखता तो है, लेकिन परझने नहीं जाता की उसका कोई सरोकार है भी या नहीं...या जो लिखा है, लितना कहने में कामयाब हुआ है....या कहने में कामयाब हुआ है तो उसका लिखा, कितना बदलाव लाया है.
           
                   अब तो मान गये होंगे कि शायर के पास बस मत होता है, मति नहीं. वैसे भी, मति होती तो वो शायर क्यों होता.

                   एक नाम है, जो शायर नहीं था, इंसान था....क्योंकि उसके पास मत भी था और मति भी- अदम गोंडवी. अदम गोंडवी जैसे लोग लिखते नहीं हैं.....उनका लिखा या तो उनका खून होता है या उनकी भूख. खून में कलम नहीं डुबोते एसे लोग....उनका खून आप ही अक्षर गढ़ देता है........

                  तुमने भूख देखी है? एक बार चार दिन देखिये, यकीन मानिये चांदनी और चाँद-तारे सारे भूल जायेंगे.

              'रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
             जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है.'

                ऎसा लिखना आसान नहीं होता....महसूस करना पाहता है एसा लिखने......जीना पड़ता है ऎसे.

               शायर बनना आसान है, अदम गोंडवी नहीं.


Saturday, February 23, 2013

सिवाए इन नासमझ नज्मों के!




 
          खिड़की पे बैठे चाँद देखता हूँ....अधूरा चाँद कुछ कहता ज़रूर है, जैसे उसे फलक से उतर सड़क दर सड़क आवारागर्दी के मज़े लेने की इच्छा हो....घटता-बढ़ता चाँद रिश्तों के घटने-बढ़ने के एहसास भी तो लिए है....फिर कैसे अधूरे चाँद में लोगो को अपना प्यार नज़र आता है? बेवजह ही सही, ख्याल मुक़र्रर तो है!

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चल चाँद,
साथ फिरते हैं
इन आवारा सड़कों पे.

मैं भी तन्हा हूँ आज.
....और फ़िक्र भी नही किसी को,
सिवाए इन नासमझ नज्मों के!

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क्यूँ ये नज़्म
घुल जाती है तुममें.

बिखर-बिखर
लाख कोशिशें करता हूँ मैं.

....और हमेशा तुम तक
ख़त्म होते हैं लफ्ज़.


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तुम्हें,
जितनी बार पढता हूँ...
नया पाता हूँ.

....और हर बार
फिर पढने की इच्छा तीव्रित होती है.

तुम मेरा सबसे प्यारा नोवेल हो.


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तुम्हारी नर्म उंगली पकड़
कई बसंत गुजार देता.

बसंत के ख्वाब,
छिटके न होते तो!

Thursday, February 21, 2013

पैकिंग करते-करते



                   पैकिंग करना आसान नहीं! हर चीज़ से जुड़े रहते हैं ख्याल, यादें और लोग, जो बरबस ही याद आते हैं. महीनों से सम्हाल रखा गया वो दस रूपये का सिक्का, जो तुमने दिया था.....देखो, वैसा ही तुम्हारे पास भी है. सोचता हूँ, तुमने अब तक सम्हाला होगा उसे? उम्मीद कम है मुझे! 'की रिंग', महीनों से सोच रहा हूँ की निकाल दूँ...हिम्मत ही नहीं हुई. अक्सर उसपे लिखे 'you' में तुम दिख जाते हो मुझे. क्या तुमने भी अज़ीज़ बना सम्हाला है उसका आधा हिस्सा? 

                   ये 'टेडी' वो 'पिंक स्टोल' अक्सर छू लिया करता था मैं. आज पैक किया तो बड़ी हिम्मत लगी उठाने में. 'टेडी' आज भी बड़ा नर्म लगता है मुझे. 'हग' किया तो तुम्हारी याद आ गयी! 'पिंक स्टोल' तो तुम्हें याद भी नहीं होगा....याद है बस से उतर रहे थे तुम और मैंने छीन लिया था.....अब वो मेरे 'कपबोर्ड' में सामने टंगा रहता है. 

                तुम्हारे 'ग्रीटिंग्स', 'डायरी' खोले नहीं मैंने, जैसे थे, वैसे 'पैक' कर दिए. हिम्मत नहीं थी. एक बार लगा, सब बेमतलब है अब, उठा के फेंक दूँ कचरे में....लेकिन, तुम्हें पता है मैं फालतू का सेंटी इन्सान हूँ!    
               'विंड चाइम' जिसपर मेरी 'पिक' भी है.....'कपबोर्ड' से छांकता था, जब भी खोलो....बड़ी शिद्दत से पैक करना पड़ा....रिश्ते कि तरह उसके भी टूटने का डर था! 

               'डार्क शर्ट्स', बहुत सी गिफ्ट की हैं तुमने...और अब तो 'डार्क' ही खरीदता हूँ....तुमने कहा था, अच्छा लगता हूँ. अब तो मुझे भी यकीं होने लगा है. अम्बार था, सारे 'शर्ट्स' समेटते-समेटते दिन लग गया!

              'शिर्डी' से 'साईं बाबा' की एक मूर्ति तुम्हारे लिए भी लाया था, सोचा, कहीं मिले तो दे दूंगा, यहीं छोड़ के जा रहा हूँ....शायद मिलना नहीं मुझे, या शायद यकीं है की तुम्हारी ही हिम्मत न होगी मिलने की.

              ये 'वाच', सच तो ये है मुझे अभी पता चला कि घड़ी गिफ्ट करने से रिश्तों के अच्छे दिन ख़त्म हो जाते हैं...पता होता तो कभी गिफ्ट न करता....ना ही तुमसे लेता. 'मिनट' की सुई खराब है इसकी, लेकिन नई लेने के बावजूद पहनता इसे ही हूँ.... पता नहीं क्यूँ, मन नहीं है की किसी और का हाथ लगे, तो सुधरवाया भी नहीं और कभी उतारा भी नहीं.

             सोचता हूँ, तुमने कैसे सम्हाली होंगी मेरा दिया सामान? यहाँ मुझे किसी को जवाब नहीं देना, लेकिन तुम्हें? इत्तेफाकन देख लिया किसी ने तो? कभी तो तुम छूते होगे उसे....शयद बहुत कुछ तो कचरे में फेंक दिया होगा तुमने. कहाँ-कहाँ ले के जाओगे तुम? 'हॉस्टल' से घर फिर किसी और के घर.............

            तुमने कहा था, अब नहीं पढ़ते तुम मुझे....URL नहीं बदला 'ब्लॉग' का, क्यूंकि मुझे तुम पे यकीं है....कि तुम ये भी नहीं पढ़ोगे.

Tuesday, February 19, 2013

इश्क का डिपार्टमेंट


               
           
                 कच्ची पक्की सड़कों पे पत्थर बहुत हैं....और उनपे चलने की अब आदत सी हो गयी है. उम्र ढलान पे बहुत रफ़्तार से गुजरती है और हमें पता भी नहीं चलता कि हम जा कहाँ रहे हैं....लेकिन जब रुकते हैं तो क्या खोया, क्या पाया का हिसाब बड़ा तीखा लगता है. अपनों को खोना, खुद को खोने से ज्यादा तकलीफदेह है....और उनसे जब आप नज़रें न मिला पायें तो और भी तकलीफदेह.
                 इश्क से निकला आदमी थोडा पुरातन हो जाता है, थोडा कम अक्लमंद, थोडा कम समझदार और हर एक शख्स को एक ही चश्मे से देखना शुरू कर देता है....इश्क का डिपार्टमेंट शायद है ही कुछ ऎसा!


मैं नहीं जानता
कितना प्यार किया मैंने.

मगर इश्क का
गुलाबी खुमार 
बाकी है अब तक आँखों में.



ये नज़्म,
ज़रा रुक
मेरी नज़रों पे अभी
चश्मे हैं सारे.

जब नितांत अकेला रहूँ,
तो आना जेहन में



कॉफ़ी टेबल पे पड़े तुम्हारे ख़त,
पढ़-पढ़ के फाड़ रहा हूँ ये ज़िन्दगी.

तूने इश्क भी बहुत किया
तूने सदमे भी बहुत दिए.

धड़कन के सहारे तू
आज भी चलती है तो
अच्छा लगता है!



मेरे महबूब,
गुस्ताखी माफ़ करना
पर तेरी बेवफाई से
ये बादल बहुत रोये हैं.

अगली दफ़ा,
किसी बंजर से इश्क करना.
जिससे रो न सके वो!

Monday, February 18, 2013

Politics on Justice Katju Remark

         

              काटजू साहब, मैं आपका कोई बहुत बड़ा फैन नहीं हूँ न ही आपका क्रिटिक, बस रेगुलर रीडर हूँ, जिसे आदत है कुछ लोगों को पढने की. मैं आपके ब्यान से इत्तेफाक रखता हूँ या नहीं, ये दूसरी बात है लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ आपको कहने का हक है. प्रेस कौंसिल के चेयरमैन को  क्या बोलना चाहिए या क्या नहीं ये रूल न तो IBN के आशुतोष बना सकते हैं न बीजेपी या कांग्रेस। आपका बयाँ हिस्ट्री प्रेरित था राजनीति नहीं. देश में घटी बड़ी घटनाएँ बिना राजनैतिक सपोर्ट के नहीं हो सकती ये अप भी जानते हैं, जनता भी, कांग्रेस भी, बीजेपी भी.
   
           सबको पता है 1984 के बाद के दंगों में अनौपचारिक रूप से सरकार ने सपोर्ट किया, 1992 बाबरी ढही, अब तो कल्याण सिंह भी मान चुके हैं की उन्होंने ये सब होने दिया.

          सर, गलती आपकी नहीं है, देश के उन 60% गधों की है, जो छोटे-मोटे बयानों से परेशां हो जाते हैं लेकिन देश की 50% भूखी जनता के बारे में सोचने का ख्याल उन्हें नहीं आता. गलती उन पढ़े लिखे मूर्खों की है जिनमे समझने की अक्ल नहीं है.
         आपके एजुकेशन सिस्टम, ज्यूडिसरी सिस्टम, देश की गंभीर समस्यायों पे किये गये कमेंट्स की बजाये आज जिन मुद्दों पे आपको घेर गया वो गलत है.

         देश का नागरिक कोई सा वस्त्र पहिन ले रहेगा देश का ही....और देश का नागरिक होने के नाते आपकी टिपण्णी जायज है.

        मैं नरेन्द्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व से प्रभावित हूँ, लेकिन ये मुद्दा न मोदी का न बीजेपी का न कांग्रेस का. ये सीधी-सीधी एक नागरिक होने के नाते कही गयी बात है, जिसे रखने का हक हम सबको है. आपको भी, मुझे भी.

        सॉरी आशुतोष, जिस 'अग्रेस्सिव वे' में आपने बोला, वो आपकी 'आप बेवकूफ हैं' ज़रूर कहता है.

Saturday, February 16, 2013

फांसी का राजनीतिकरण




                 बलवंत सिंह, मैं तुम्हें कोई हीरो नहीं बनाना चाहता...तुम गुनाहगार थे और हो. तुम सजा के हक़दार हो बस, लेकिन मुझे डर है ये सियासत तुम्हें भी कहीं उसी तरह ही न लटका दे जिस तरह अफज़ल को लटका दिया गया. मुझे डर है की जिंदगियों से खेलने बाले लोग अब सज़याफ्ताओं से खेलना शुरू कर दिए हैं और उन्हें सजा में भी सियासत नज़र आती है. एक गहमागहमी और एक शोर खड़ा करने और लोगों के इमोशंस से खेलने के चक्कर में दंगे कराने बाले लोग कहीं तुम्हें ही न चारा बना दें.
                तुम हत्यारे हो और तुम्हें सजा मिलनी चाहिए लेकिन अनैतिक और अमानवीय तरीके से नहीं. सुना है तुम्हारी कौम की भी एक अपनी पार्टी है जो धार्मिक तख़्त भी है....भरोसा उसपे भी मत करना. अगले इलेक्शंस के लिए तुम्हारी मौत प्रदेश की 35% नंगी और 40%  अनपढ़ जनता के इमोशंस से खलने उनके काम आयेगी. तुम्हारे लोग भी तुम्हारी मौत चाहेंगे.

Pic: from OneIndia.in

Thursday, February 14, 2013

मुफ्त की सांसें....


         
       
             एक चाँद हर वक़्त उगा रहता था, पूरी की पूरी चांदनी लिए, खिलने की आदत सी हो गयी थी उसे....दिन में भी आसमां के किसी कोने में नज़र आ ही जाता था......और अब, खुद को धोखा देने की आदत सी हो गयी है....चाँद दिखता तो नहीं है फिर भी एक फरेब अपने से कर होने का एहसास ज़रूर जगा लेता हूँ. मैं नहीं पूछुंगा चाँद तुम क्यूँ गये....हक है तुम्हारा जाना....लेकिन तुम्हारा आना?  ये सवाल आखिर तक सताएगा मुझे.

            उम्र के इस बसंती पड़ाव में इस तरह शोकगीत लिखना अच्छा तो नहीं है....लोग अक्सर हँस कर निकल जाते हैं.....गति से भागते लोग और ठहरा सा मैं....अजीब तो है कुछ...लेकिन ठहराव बाजिव है....वादा था तुमसे की इंतज़ार करूँगा ज़िन्दगी के इस कोने में बैठा......आज तुम्हारी आने की 'हाँ' को टटोलता हूँ तो निरुत्तर पता हूँ....फिर भी बैठा अकेले वादा निभा रहा हूँ.

            क्या तुम्हें पता है 'तीन सेकंड में एक' की गति से चलती मुफ्त की सांस को मैं तुमपर खर्च कर रहा हूँ. जिंदगी का मोल नहीं पहचानते शायद मेरे जैसे लोग...कभी-कभी सोचता हूँ अगर जीने के भी पैसे लगते तो? ....क्या फिर खर्चता अपनी सांसें तुमपर?....पता नहीं मुझे...जवाब तो नहीं है क्यूंकि खुदा अब भी तन्हाई, ज़िन्दगी और साँस मुफ्त में बाँट रहा है!

           कभी-कभी दाईं हथेली में दर्द बहुत होता है....तुम्हारे छूने का असर है या तुम्हारी तड़प का...इस मूक से पूछ भी नहीं सकता. देखो, क्या तुम्हारी बाईं कलाई का हाल भी वही है क्या? कलाई थाम ज़िन्दगी के सपने क्यूँ देखे थे?

           देखो, तुमने चाहा था, मैंने चाहा था, तो हम साथ थे...अब जबरन हाथ पकड़ खींचते नहीं ले जाऊंगा तुम्हें उस मकां तक जिसे हमने साथ मिल घर बनाने का वादा किया था....मैं अपने सपनों में वो मकां खंडहर होने दे सकता हूँ तुमसे जबरदस्ती नहीं!

         यह आखिरी बार है जब मैं तुमपर लिख रहा हूँ....मेरी बातों में ये रहा तुम्हारा आखिरी जिक्र...

                                       

                         सोचता हूँ 'शोना'
                         बुझा दू चाँद भी.

                        डरता हूँ,
                        कहीं ये मेरा जिक्र न कर दे तुमसे!