Thursday, August 11, 2022

भोपालनामा 6

 लफ़्ज़ों को आग में पका कुंदन नहीं बनाया जा सकता न शहर के बीचों-बीच खड़े हो चिल्ला-चिल्लाकर इश्तेहार किया जा सकता है. लफ़्ज़ों में तुम हो और तुम खुद को पढ़ के भी नहीं समझ पाओगे. उम्र में दो साल बड़े तुम ज़िन्दगी में पूरे बीस साल....अपना काम कर खुश होते हो और अक्सर फ़ोटो अपने कर्म के इश्तेहार के रूप में डाल देते हो तो लगता है तुम सुकूं की आखिरी सीढ़ी पे बैठे मुस्कुरा रहे हो. हर 'पिक' में तुम मुझे 'क्यूट' लगते हो..ऊपर से हमारे बीच का कॉमन भोपाल. जितना इश्क़ मुझे उससे... उतना तुम्हें. सोचता हूँ किसी दिन बोल दूँ, फिर खुद को बच्चा समझने लगता हूँ. घर में उम्र में सबसे बड़ा पर थोड़ा कम मेच्युर मैं... तो ये होना ही है.

तुम्हारी यात्रायें, मतलब लिए हैं...ढेर सारे, ढेरों के ढेरों पन्नों में तुम उकेर देते हो जिन्हें. मेरे लफ्ज़ सिर्फ दो लोग लिए हैं... ढेर सारे 'तुम' और थोड़ा सा 'मैं', जिन्हें मैं थोड़ी स्याही ही दे सकता हूँ तुम्हें समझाने.
तुमने पढ़ा क्या? छोड़ो, पढ़ के भी तुम नहीं समझोगे कि यहां 'तुम' तुम हो.

Wednesday, August 10, 2022

भोपालनामा 5

 हम कितना ही क्या सीख रहे हैं अपनी गलतियों से? कब-कब तो हमने क्या-क्या नहीं झेला है? 2 3 दिसंबर 1984 की काली रात ठीक 37 साल पहले 3000 से अधिक जिंदगियां लील गई. 10,000 से अधिक लोगों को प्रभावित किया और हमें एक ऐसा दर्द दे गई जिसे हम हर साल याद कर आंसू बहाते हैं.

भोपाल के यूनियन कार्बाइड प्लांट में हुए इस हादसे में मीथिल आइसोसाइनाइड ( methyl isocyanate (MIC)) गैस का रिसाव हुआ था. उस रिसाव की वजह से कई बच्चे यतीम हो गए, कई लोगों ने अपने घर के चिराग को दिए, कई लोगों ने अपनी आंखें खो दी, अपंग हो गए और इसका असर आज भी भोपाल के उन प्रभावित लोगों में देखा जा सकता है.
हादसे के बाद दोषी देश से भाग गए. सरकार ने अपनी 'सरकारी' कोशिशें की. यूनियन कार्बाइड ने केंद्र सरकार को 470 मिलियन डॉलर देने का वादा किया किंतु उसका एक बहुत छोटा हिस्सा ही उन पीड़ितों के पास पहुंच पाया. अफसोस! वह भी स्व. अब्दुल जब्बार जैसे लोगों द्वारा ताउम्र त्रासदी प्रभावितों के लिए लड़ाई लड़ने के बाद!
2 दिसंबर को हम #NationalPollutionControlDay भोपाल गैस त्रासदी की दुखद याद में ही मनाते हैं कि हम समझदार हों, सतर्क हों, कि अगली दफे ऐसी कोई घटना हमारे साथ घटित ना हो. लेकिन क्या वाकई हम सारी घटनाओं से सीखते हैं? चेतते हैं? क्या वाकई हम अभी चेते हुए हैं? यह सोचना होगा.
डच आर्टिस्ट Ruth Kupferschmidt द्वारा भोपाल में बनाए गैस त्रासदी मेमोरियल के नीचे लिखा हुआ है:-
"No Hiroshima, No Bhopal.
We Want to Live"
लेकिन अफ़सोस हर वर्ष ही ऐसा कोई हादसा हो ही जाता है.

Monday, August 8, 2022

भोपालनामा 4

 कॉमन सेंस बड़ी रेयर (दुर्लभ) चीज है. शायद इसलिए तीन तलाक़ जैसे फैसले 2017 तक का इंतज़ार करते हैं और उसपर भी दो 'हाइली क्वालिफाइड' (अत्यधिक योग्य) जज अपने पूर्वाग्रह नहीं छोड़ पाते. सदियों से चली आ रही रीति-रिवाज-मान्यताएं-धारणाएं जरुरी नहीं सही ही हों. अगर होतीं तो हम दलित-उत्थान के लिए प्रयासरत नहीं होते, न ही सती प्रथा ख़त्म हुई होती.

ये नहीं है कि बस यही एक कुरीति थी. अभी कई बाकि हैं. हर धर्म में ही. क्यूंकि कुरीतियां मज़हब देख के नहीं बनतीं. वे एक निश्चित वक़्त का समाज देख के बनती हैं, जिन्हें बाद में आने वाली पीढ़ियां फॉलो (पालन) करती रहती हैं... और वे कुरीतियां सदियों तक चलती रहती हैं. फिर हटाओ तो विरोध इसलिए होता है कि वो सदियों से चली आ रही थी.
जरूरी नहीं हमारे बाप-दादाओं ने जो किया वो सही हो और जो हम आज करें वो कल के वक़्त के हिसाब से सही हो. क्यूंकि नैतिकता वक़्त और समाज दोनों के हिसाब से बदलती है... और इसलिए किसी भी रीति का बदलना भी जरूरी है... नहीं तो वो कुरीति में परिणित हो जाएगी.
विरोध इस निर्णय का नहीं बल्कि इस बात का होना चाहिए कि ये निर्णय इतनी देरी से क्यों आया.
इतिहास गवाह है जितना समाज और धर्म का बेड़ागर्क धर्मगुरुओं ने किया है उतना शायद ही किसी ने किया हो. भोपाल में होने वाली मौलवियों की मीटिंग कितना करेगी, देखने वाली बात होगी.
Vivek | 2017

Saturday, August 6, 2022

भोपालनामा 3

 शाम-ए-शहर-ए-दिल्ली तुम्हारे संग खूबसूरत हो जाती है. संग तुम्हारे मैं भोपाल से इश्क़ में पड़ जाता हूं. जैसे शहर से इश्क़ होने के लिए उस शहर तुम्हारा होना जरूरी हो.

Thursday, August 4, 2022

भोपालनामा 2

 एक लड़का जिसके ज़िस्म में भोपाल बसा हुआ है। वो वीआईपी रोड पर दौड़ना चाहता है, लेक पे घंटों बैठना। उसे वन विहार में साइक्लिंग करनी है और महावीर टेकरी पर चढ़ लिखना होता है।

वो भोजपुर में कई दिन अधूरा शिवमन्दिर देख बिता सकता है। जैसे उसका ज़िस्म कोलार से लेक तक फैला हुआ हो।
'तुम्हें पता है, मुझे अब भोपाल पसंद नहीं।' वो एक दिन कहता है। 'पता है, मैं यहां बसना चाहता था, ज़िंदगी बिताना चाहता था... लेकिन अब नहीं।'
मैं कारण नहीं पूछता। मैं जानता हूं। 'तुम्हें अब भी उसकी याद आती है? लेकिन वो अब भोपाल में तो नहीं है।'
'वो नहीं यार वक्त याद आता है। सुकूं याद आता है। वो नहीं है वहां, उसके साथ का वक्त अब भी वहीं है। वो हर जगह छितर गई है यार।'
तुम राइटर्स ज्यादा ही फिलोसॉफिकल होते हो।
वो इस सड़क की ओर देख रहा है, जो भोपाल की तरफ जाती है।

Tuesday, August 2, 2022

भोपालनामा

 'मैं अपने हिस्से की ज़िन्दगी तुम्हारे पास छोड़ के जा रहा हूं' लड़का जाते जाते बोलता है. लड़की को कुछ समझ नहीं आता.

लड़का अजीब है उसे दुनिया के सारे इल्म चाहिए. पढ़ता है तो पागलों की तरह पढ़ता है, लिखता है तो पागलों सा. कई कई घंटे तेज आवाज़ में गाने सुनता है. वो भी 60s के गाने, क्लासिकल या इंस्ट्रुमेंटल. लड़का घूमता है, उस फोटोग्राफी का शौक है. जैसे उसे सबकुछ सबकुछ ही भरना है अपने अंदर!
लड़की अलग है, लड़के से बिल्कुल अलग. ज़िन्दगी के कैलकुलेशन में उलझी है. एक ओर ज़िन्दगी उसके मज़े लेने पे तुली है दूसरी ओर वो लड़के का हाथ थाम सुकून पाती है. लड़के को हग करते वो सबकुछ सबकुछ भूल जाती है. लड़की के ज्यादा शौक नहीं. ना ज्यादा पढ़ती है ना सोलो ट्रिप से कोई प्लान हैं. लेकिन जब लिखती है... लड़के पे लिखती है तो अमृता प्रीतम हो जाती है.
लड़का लड़की एक दूसरे के साथ होते हैं तो दिन भर लड़ते हैं. लड़के का खाना लड़की से लड़े बिना नहीं पचता. लड़की कहती है कि उम्र भर साथ रहे तो एक दूसरे की जान ले लेंगे, अच्छा हुआ उम्र भर के वादे नहीं हैं.
लड़का जा रहा है शहर छोड़ के हमेशा हमेशा के लिए. लड़की आखिरी दफे गले लगती है. लड़के की आँखों में आंसू हैं... 'अबे ऐसे रो रहे हो जैसे उम्र भर न मिलना हो. मैं आ रही हूँ कुछ दिन में... तुम्हारे शहर.'
लड़का हाँ में जवाब देता है. लड़के के अंदर अजीब सा भय है. उसे अजीब सा शक है कि ये आखिरी हग है. वो लड़की को चूमता है... आखिरी दफे!
लड़का जाता है सोलो ट्रिप पर.... नार्थ-ईस्ट. लड़की जाने के बाद एकटक घूरती रहती है दरवाजा. जैसे दरवाजे उसकी जान ले के कोई जा रहा हो.
लड़की तीन दिन से सोई नहीं है. होंठो पे आखिरी बोसे के निशान अभी तक ज़िंदा करके रखे हैं. पता नहीं कहाँ कहाँ से लड़के के क्या क्या ख्याल ले के आती है... कि नींद में भी बड़बड़ाती है.
ट्वेंटी सेवन किल्ड इन आ ट्रैन एक्सीडेंट' अख़बार के फ्रंट पेज की खबर है.
दरवाजे से सच में लड़की की जान गई थी! अख़बार मौत की खबर लाने बने हैं!
लड़की लड़के के शहर जाती है.... भोपाल. लेक के किनारे, सड़कों पर, भारत भवन और लड़की के होंठों पर आखिरी बोसे में... बस यादें बची हैं.
'मैं अपने हिस्से की ज़िन्दगी तुम्हारे पास छोड़ के जा रहा हूं... लेकिन लड़की ने खुद के हिस्से का ही जीना छोड़ दिया है... लड़की अब किसी से भी नहीं झगड़ती...

Thursday, May 5, 2022

India As I Know: Story of The #SaveBuxwahaForest Movement.



#SaveBuxwahaForest Movement को सोशल मीडिया पर मैं करीब से शुरू से ही देख रहा था. यह पर्यावरण से जुड़ा Movement था इसलिए इसमें मेरी उत्सुकता कुछ ज्यादा थी। लेकिन अब तक मुझे वही पता था जो मैंने सोशल मीडिया पर पढ़ा था इसलिए मैंने और कुछ जानने के लिए संकल्प से संपर्क किया। संकल्प उसी क्षेत्र से हैं और आंदोलन की शुरुआत संकल्प और उनके कुछ साथियों ने ही मिलकर की थी।


संकल्प से मैं मुख्यतः था 2-3 प्रश्न करता हूं कि आंदोलन शुरू कैसे हुआ? इस आंदोलन से अब तक क्या-क्या फायदे हुए हैं? और इस आंदोलन से आप और आपके मित्रों ने क्या सीखा? अंतिम प्रश्न इन युवाओं की सोच जानने के लिए किया गया था।


मात्र 24 वर्षीय संकल्प बताना शुरू करते हैं। ' भैया अप्रैल 2021 की बात है, मैं और मेरे साथी को कोविड में काम कर रहे थे उसी दौरान अखबार में एक खबर आई कि बक्सवाहा के आसपास के जंगल का क्षेत्र आदित्य बिरला ग्रुप की एक कंपनी के लिए लीज पर दिया जा रहा है जिससे वहां हीरे का उत्खनन किया जा सके। क्योंकि बक्सवाहा क्षेत्र और पूरा संपूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र ही गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा और रोजगार की कमी से प्रभावित रहा है इसलिए मेरे लिए खुश कर देने वाली खबर थी। लेकिन मैंने अखबार की हेडलाइंस को फॉलो करना शुरू कर दिया तो पता चला इसके लिए तकरीबन 2,15,875 (दो लाख पंद्रह हजार आठ सौ पचहत्तर) पेड़ काटे जाने हैं जिससे उस क्षेत्र के तकरीबन 10 हजार लोग प्रभावित होने वाले थे। अधिकतर लोग लघु वनोपज- महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी गुठली, जलाऊ लकड़ी और चारे के लिए जंगल पर निर्भर हैं। इसलिए उन पर प्रभाव ज्यादा पडने वाला था। साथ ही मैंने पड़ा कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मात्र 400 लोगों को वहां पर रोजगार मिलने वाला था जिसमें से अधिकतर कुशल (skilled) और अर्ध कुशल (Semi-Skilled) लेबर का उपयोग होना था मतलब की स्थानीय लोगों को बहुत ज्यादा फायदे वहां पर नहीं थे किंतु उनकी आय जरूर खतरे में थी। 


मैंने और मेरी अन्य साथियों ने मिलकर रिसर्च की तो पता चला कि यह क्षेत्र केन्‍द्रीय भूमि जल बोर्ड ( Central Ground Water Authority (CGWD))  द्वारा 2017 में सूखा प्रभावित क्षेत्रों (Semi Critical Condition) में घोषित है किंतु यहां पर 160 लाख लीटर पानी प्रतिदिन उपयोग किया जाना था मतलब साफ था पानी का अत्यधिक उपभोग उस जगह होना था जहां पर पानी की पहले से ही कमी है। इसके लिए वहां पर वन में उत्सर्जित होने वाली धाराओं पर बांध बनाए जाने थे मतलब साफ था कि छोटे-छोटे नाले सूख जाने थे। छोटे नालों से पानी नदी में बहकर जाता है। इसलिए बेतवा, शासन नदियां भी प्रभावित होने वाली थीं। साथ ही यह ओपन कास्ट माइनिंग का प्रोजेक्ट था अतः भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge System) भी खत्म होने वाला था और भौम जलस्तर (Water Table) भी तीव्रता से नीचे जाने वाली थी। मतलब साफ था कि  स्थानीय लोगों को ना तो रोजगार था वहां पर ना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा फायदा होने वाला था, जबकि ढेर सारे घाटे सामने आने वाले थे। जिसमें सबसे बड़ी समस्या पानी की होने वाली थी।


हमने संपूर्ण रिसर्च की थी और उसका डाटा सोशल मीडिया पर पोस्ट और वीडियो के माध्यम से डालना शुरू किया। धीमे धीमे अन्य डॉक्यूमेंट पढ़े

तो पता चला 2014 में जो फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट दी गई थी उसमें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wild Life (Protection) Act, 1972) के Schedule-I की 7 प्रजातियां वहां पर दिखाई गई थी साथ में बहुत सारे जानवर (तेंदुआ, भालू, काला हिरण, चीतल, मोर, लकड़बग्घा, फॉक्स इत्यादि)  वहां पर प्रदर्शित किए गए थे लेकिन नई फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट में ये सब प्रदर्शित ही नहीं किए गए थे। प्रदर्शित किया गया था कि एक भी जानवर 382 हेक्टेयर के जंगल में नहीं है! जबकि सच ये नहीं था।


 इंटरेस्टिंग बात तो यह है भैया कि मात्र 19 किलोमीटर पर पन्ना टाइगर रिजर्व की बफर जोन है। साथ ही यही क्षेत्र पन्ना टाइगर रिजर्व और नौरादेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी के बीच में एक कॉरिडोर का भी काम करता है, इसलिए वाइल्डलाइफ के हिसाब से भी यह बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।


हमने सारी डिटेल को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना शुरू कर दिया और देखते ही देखते न्यूज़ वालों ने हमारी खबरों को सोशल मीडिया से उठा उठा कर के अपने न्यूज़पेपर में और न्यूज़ चैनल में डालना शुरू कर दिया। मजेदार था कि उनकी खुद की रिसर्च कुछ भी नहीं थी, वह हमारी सोशल मीडिया अकाउंट से उठा उठा कर के ही फैक्ट डाल रहे थे।


धीमे धीमे यह हुआ कि देश की सबसे बड़ी पर्यावरण (Environment) से संबंधित मैगजीन डाउन टू अर्थ (Down To Earth) में भी इसके बारे में छपा, ज़ी न्यूज टीवी चैनल ने भी उसके बारे में डाला और झारखंड के, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र संघ, छोटे-बड़े एनजीओ भी हमारे साथ आना शुरू कर दिया।


हम सब ने मिलकर के छोटे बड़े एनजीओ के साथ विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2021 को #SaveBuxwahaForest मूवमेंट  ट्विटर पर चलाया और उस दिन वह टॉप 3 ट्रेंडिंग हैशटैग में से एक था।


हम युवा अपना हर कदम फूंक-फूंक कर के रख रहे थे. क्योंकि हमें रिसर्च भी करनी थी, हमें यह भी ध्यान देना था कि यह आंदोलन गलत हाथों में ना चला जाए, हमें यह भी ध्यान रखना था कि हम कानून का किस तरीके से उपयोग कर पाएंगे और किस तरीके से समाज के हर तबके को शामिल कर (सोशल मोबिलाइजेशन) के लोगों को अपने साथ शामिल करवाएं.


इसके लिए हमने अलग अलग टीम बनाई। दृगपाल सिंह, अभिषेक जैन ने बहुत अच्छी तरीके से सोशल मोबिलाइजेशन किया। विवेक दांगी, अनुज पाटनी ने बहुत अच्छी तरीके से सर्च की। आशिक मंसूरी ने इमली घाट, कसेरा, बक्सवाहा में नुक्कड़ सभाएं की। हमारी मेहनत देख ग्राउंड पर और सोशल मीडिया पर लोगों ने जुड़ना शुरू कर दिया।


इसका फायदा यह हुआ कि मूवमेंट के सपोर्ट में देश भर से लोग आ गए सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट में कई लोगों ने याचियाएं लगाईं। डॉ धरनेंद्र द्वारा एनजीटी में केस दर्ज किया गया और उनकी याचिका पर एनजीटी ने बुक्सवाहा में माइनिंग के खिलाफ अगस्त में स्टे लगा दिया। उस पर मुहर लगाते हुए हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2021 में स्टे ऑर्डर दे दिया।


संकल्प इतनी सारी बातें इतनी आराम से मुझे बता रहे थे कि मैं उनके ज्ञान, उनकी कोशिशों को देखकर हतप्रभ था। इसलिए मैंने उनसे पूछ ही लिया कि "आपका क्या पॉलिटिक्स में आने का इरादा है?" 

वे बोलते हैं "नहीं भैया, मेरा कोई इरादा राजनीति करने का नहीं था। इनफैक्ट हम में से किसी का भी इरादा राजनीति करने का नहीं था। हम लोग अपने क्षेत्र के लोगों का सोच कर के यह कार्य कर रहे थे। अभी भी मैं समाज के अंदर जाकर के कुछ बदलाव लाने के लिए सिविल सर्विसेस की तैयारी कर रहा हूं।"


मैंने उनसे पूछा "आप और आपके दोस्तों पर इस आंदोलन का क्या प्रभाव पड़ा?"


  वह बोलना शुरू करते हैं "भैया सबसे बड़ी बात तो हम सब का ज्ञानवर्धन हुआ। हमें पहली बार पता चला कि क्या-क्या क्लीयरेंस देश में माइनिंग के लिए ली जाती है। इसके अलावा हम लोगों को जोड़ पाए थे, हमारी सभा में लोगों ने हमें सुना था। पहली बार हम लगा था कि हम सब मिलकर काम करें तो वह बेहतरीन काम कर सकते हैं। पहली बार हम एक टीम के रूप में आए थे जिनमें से अधिकतर लोगों को तो मैं पहले से जानता भी नहीं था और कुछ से तो अभी तक नहीं मिला हूं।


हमने सीखा कि First Study, Learn then Act (पहले पढ़ो, सीखो, फिर काम करो) हमने सीखा कि किस तरीके से सरकार के द्वारा बनाए गए चैनल/कानून का जैसे एनजीटी, आरटीआई, हाईकोर्ट का सही तरीके से प्रयोग किया जाता है। लोगों का साथ कैसे मिलता है, मैनेजमेंट कैसे किया जाता है और नकारात्मक लोगों से कैसे दूर रहा जा सकता है।


मजेदार तो ये था कि हमें कुछ लोगों ने देशद्रोही तक घोषित करने की कोशिश की। फेसबुक पर कुछ ग्रुप के द्वारा हमारे खिलाफ वीडियो डाले गए, स्थानीय विधायक ने हम लोगों के लिए "भटके हुए युवा जो विकास के खिलाफ हैं" तक कहा।


तब भी हम सब  उन सब के खिलाफ डटे हुए थे। हमारी अच्छी कोशिशें देख वाटरमैन ऑफ इंडिया श्री राजेंद्र सिंह, मेधा पाटेकर,आशीष गौतम, एक्टर अखलेंद्र मिश्र, आशुतोष राणा,  जी पाटन ऑफ इंडिया मेघा पाटेकर राम आशीष गौतम, धरनेंद्र जी, अंकिता जैन, निखिल दवे साथ आए, डाउन टू अर्थ, द वायर, क्विंट हिंदी, भास्कर आदि ने इस आंदोलन के बारे में लिखा।'


अंत में संकल्प मेरे से एक बात कहते हैं, " भैया कैंपा एक्ट (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority (CAMPA) Act) अंतर्गत हुए compensatory Afforestation (प्रतिपूरक वृक्षारोपण) से उसी गुणवत्ता का जंगल खड़ा नहीं सकता है। बिना वाइल्डलाइफ के यह चंद पेड़ों का समूह बस होगा।"


बक्सवाहा के जंगलों की स्थिति अभी ये है कि उत्खनन पर हाई कोर्ट के आदेशानुसार फिलहाल रोक लगी हुई है। सागर विश्वविद्यालय ने उसी क्षेत्र में 9000 साल पुराने भृत्तिचित्रों की ख़ोज की है,  इसलिए इस क्षेत्र को सुरक्षित रखने का एक और कारण हमारे पास पास है।


#indiaasiknow #youthiconofindia


(तस्वीरें: संकल्प और बक्सवाहा के जंगल)

Wednesday, January 12, 2022

India As I Know: The Super Teacher #youthiconofindia

 


मैं सुबह से भ्रमण पर हूं। 'सर, यह निगहरी गांव है।' साथ में बैठा साथी बोलता है.


मैं गाड़ी की खिड़की से देखता हूं। बहुत छोटा सा गांव है 60 70 घरों का। इस जगह पर ऐसा भी नहीं है कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की इमारत या साक्ष्य हो। इसलिए उनसे पूछता हूं , 'ऐसा क्या खास है इसमें?'

'सर यहां के प्राइमरी शाला के मास्टर राजेश सोनी से मिलवाता हूं, 2019 में कलेक्टर साहिबा भी मिलने को आ चुकी हैं'

'सिर्फ सोनी जी से मिलने के लिए आई थीं?'

'जी सर'


हम निगहरी के प्राथमिक स्कूल के सामने खड़े हैं। सरकारी स्कूल ही है, मध्य प्रदेश के अन्य स्कूलों की तरह।


हम अंदर जाते हैं, 20-30 बच्चे बाहर ही चबूतरे पर सर्दी की धूप का आनंद लेते हुए बैठे हुए हैं। साथी मेरा परिचय देते हैं। सोनी जी एवं एक अन्य शिक्षक राजपूत जी आगे आते हैं।

'सर बड़े दिन से मैं आपसे मिलना चाहता था।' वह हाथ मिलाते हुए बोलते हैं।


फिर वह वह के स्कूल के कक्ष के अंदर लेकर जाते हैं। सामने दो चित्र हैं- पहला, सागर के तत्कालीन कलेक्टर Preeti Maithil Nayak IAS के आगमन का। दूसरा, नीति आयोग के लिए काम कर रहीं श्रीमती सचिता गुरुंग का।


' सर इन लोगों ने स्कूल आकर मेरे काम की सराहना की थी।' दोनों चित्रों के आगंतुक बड़े प्यार से जमीन पर बैठकर बच्चों के साथ किसी TLM (Teaching Learning Module/Material) को देख रहे हैं।


हम कक्ष के अंदर जाते हैं और मुझे समझ में आते हैं कि राजेश सोनी जी कोई साधारण प्राइमरी स्कूल टीचर नहीं हैं। अंदर दीवारों पर, फर्श पर टेबल बहुत सारे उनके स्वयं के बनाएं इंस्ट्रूमेंट रखे हुए हैं।


वे उत्साह से बताना शुरू करते हैं 'सर, इस कच्ची उम्र में बहुत आसानी से बच्चों को विषय समझ नहीं आते हैं इसलिए मैंने पढ़ाने के लिए नए-नए इंस्ट्रूमेंट बनाएं जिससे बच्चा आसानी से समझ लेते हैं। सारे इंस्ट्रूमेंट कबाड़ को रिसाइकल करके बनाए हैं। कुछ में थर्माकोल की सीट का उपयोग है।'


वे एक TLM इंस्ट्रूमेंट के पास लेकर जाते हैं। सर अगर में बच्चों से पूछता हूं कि 3+ 5 कितना होगा तो वह पहले इंस्ट्रूमेंट की 3 लिखी जगह की चाबी खींचेगा, फिर 5 की। दोनों बारे में उसे अंक अनुसार कंचे नीचे मिल जाएंगे। फिर बस वो उनको गिनकर उत्तर दे देगा।


दीवार पर चार पांच सर्किल के बने हुए हैं। पता चलता है कि एक भाग, एक तिहाई भाग, एक चौथाई भाग क्या होते हैं।


एक प्यारा सा खिलौना शब्द चक्र है जिसमें घुमाने पर दो या तीन अक्षर के शब्द बन जाते हैं। मैं घुमाकर 'बस' और 'पल' बनाता हूं। बहुत ही मजेदार और इंटरेस्टिंग था। शुरू करता हूं तो घुमाता ही रहता हूं।


कबाड़ से एक बहुत प्यारा गुलदस्ता बनाया है। उसके फूलों पर कार्डबोर्ड की तितलियां हैं जिन पर बहुत खूबसूरतीसे अंग्रेजी व हिंदी में दिन लिखे हुए- Sunday रविवार Wednesday बुधवार।


'सर 5 लीटर की खाली कुप्पी से पॉट बनाया है और रंगीन पॉलिथीन से फूल। इससे बच्चे रंग भी पहचानते हैं और दिन भी समझते हैं।'


 छोटे-छोटे पॉकेट वाला एक बोर्ड है जिसकी हर पॉकेट में एक शब्द रखा हुआ है, जमीन पर सांप सीढ़ी बनी हुई है। वजन मापन समझाने खुद से बनाई तराजू है, खुद के बनाए वजन हैं। ऐसी अनेक छोटे छोटे इंटरेस्टिंग खिलौने हैं।


बच्चों को पढ़ाने का एक यूनिट तरीका है बहुत ही मजेदार इतना कि किसी खिलौने को आप हाथ में ले ले तो खुद ही बहुत देर खेलते रहें।


सागर जिले की देवरी तहसील के छोटे से गांव जनजाति बहुत निगाहरी गांव के प्राथमिक शाला के शिक्षक के पास इतनी क्रिएटिविटी होगी, इतने नए तरीके होंगे, मैंने सोचा नहीं था।


 मैं उनसे एक दो सवाल करता हूं। वह बताना शुरू करते हैं-


'सर ये बहुत छोटा सा गांव है, पूरे जनजातीय लोग हैं। लगभग सभी गरीब हैं। मैं जब गांव आया तो लगा कि कुछ किया जाना चाहिए। मुझे पढ़ाने में इंटरेस्ट था, मेरी पेंटिंग भी अच्छी है, इसलिए मैंने कुछ अलग तरीके से समझाते हुए पढ़ाने का सोचा।'


'बच्चे जब बहुत अच्छे से पढ़ते हैं, सवाल हल करते हैं या शब्द पहचानना शुरू करते हैं तो बड़ी खुशी होती है। इस उम्र में बच्चे खेल खेल में ही सीखते हैं।'


मैं उनसे विदा लेकर गाड़ी में बैठता हूं। मेरे साथी बताना शुरू करते हैं। 'सर सच तो ये है कि सोनी जी ने बच्चों को लगभग गोद लिया हुआ है। बच्चों के हांथ मुंह धुलने से लेकर नाक पोंछने तक, जरूरत की दवाई देने तक का काम सोनी जी करते हैं। जरूरत पड़ने पर बच्चों के परिवार की आर्थिक मदद भी करते हैं। बहुत मेहनत करते हैं।'


अपने काम से इतना प्यार करने वाले इतनी शिद्दत से अपना काम करने वाले बहुत ही कम लोग होते हैं।


बहुत छोटी उम्र छोटी जगह पर बहुत सारे Unsung Heroes बहुत बड़ा difference create कर रहे हैं। राजेश सोनी जी और Abhishek जैसे लोग से उनमें से एक है।


अक्सर बच्चे और PSC की तैयारी कर रहे युवा मेरे से मुझसे पूछते हैं कि 'मैं कुछ बड़ा करना चाहता हूं, मुझे आगे क्या करना चाहिए?'

अपने छोटे छोटे काम को सही ढंग से किया जाए तो वह भी बड़ा काम हो होगा। कोई भी काम बड़ा नहीं होता है बल्कि अपने काम को ईमानदारी और मेहनत से करना ही एक बड़ा काम है। 


#indiaasiknow 


[फोटो: श्री राजेश सोनी जी ]

Thursday, January 6, 2022

India As I Know: COVID19 Response team TKG

 


बात अप्रैल-मई 2021 की है कोविड-19 की दूसरी लहर से ग्रसित देश के अधिकतर लोग अपनी, परिवार, रिश्तेदारों की मदद के लिए इधर-उधर भटक रहे थे.

कुछ लोग कोविड-19 के कारण दवाई, प्लाज्मा ऑक्सीजन या हॉस्पिटल बेड के लिए संघर्षरत थे. कुछ लोगों को कोविड से इतर बीमारियों की बेसिक ट्रीटमेंट के लिए भी मदद की जरूरत थी. कुछ लोग विदेश में थे और अपने मां-बाप के लिए चिंतित थे. कुछ लोग लॉकडाउन में भूख से बेहाल थे.

ऐसे में कुछ युवा लगातार जरूरतमंदों की मदद के लिए काम कर रहे थे. देश के हर हिस्से में ऐसे युवा थे जो निस्वार्थभाव से मदद करने में जुटे हुए थे.

टीकमगढ़ जिला (मध्य प्रदेश) एवं आसपास के जिलों में ऐसे ही @अभिषेक और उनके मित्र काम कर रहे हैं।

मैं मई में खुद कॉविड से ग्रषित था और होम कोरेंटिन था. मेरे दोस्त को मदद चाहिए थी, मैंने अभिषेक को कॉल किया और मदद उपलब्ध हो गई. मैं हतप्रभ था. सोच रहा था कि उन्होंने किया कैसे...? उनके पास उस वक्त यह बताने का भी समय नहीं था.

2021 के ढलते दिसंबर में जब मैंने उनसे पूछा कि कैसे कर पा रहे थे तो उन्होंने बताना शुरू किया-

"भैया मैं फ्रीक्वेंट ब्लड डोनर हूं. उस वक्त फेसबुक पर प्लाज्मा डोनर्स के साथ काम कर रहा था, साथ ही भोपाल इंदौर के मित्रों के साथ जरूरतमंदों की मदद कर रहा था. मैं तब टीकमगढ़ में था, मैंने देखा कि लोकल के लोग मिलकर जल्दी मदद कर पा रहे इसलिए टीकमगढ़ के लिए मैंने संसाधन जुटाना शुरू किए. इसके लिए मुझे डॉक्टर, मेडिकल स्टोर, एंबुलेंस संचालक, प्लाज्मा डोनर्स को एक ही प्लेटफार्म पर लाना था. इसलिए अपने मित्रों अभय प्रताप सिंह, प्रिया के साथ मिलकर एक व्हाट्सएप ग्रुप कोविड-19 रिस्पांस टीम टीकमगढ़ ( COVID19 Response team TKG) बनाया। टीकमगढ़ के डॉक्टर डॉ अनुज रावत, डॉ भदौरिया, डॉ सौरभ जैन एवं पहचान के अन्य जगह काम करें डॉक्टर डॉ महेंद्र यादव, डॉ अनिरुद्ध नायक को भी जोड़ा.

मेरे मित्र ममतेश एवं उसके भाई की प्राइवेट टैक्सी एजेंसी थी, इस वजह से एंबुलेंस संचालक और टैक्सी वाले भी उनकी सहायता से जुड़ गए. दवाई विक्रेता मित्रों के सहयोग से ग्रुप का हो गए.

मीडिया को खबर लगी, वे ग्रुप में जुड़े. उन्होंने भी सहायता की. हमारे बारे में अखबार में निकाला. हमारी प्रशंसा की और 4 दिन में 100 से अधिक लोग ग्रुप का हिस्सा थे. अब सारे लोग जो इस आपदा में सहायक हो सकते थे, एक ही प्लेटफार्म पर आ गए थे. जरूरत पड़ने पर न सिर्फ जिले के अंदर बल्कि जिले के बाहर भी सहायता कर पा रहे थे.

मुझे 2020 में खुद कॉविड हो चुका था. चिरायु अस्पताल भोपाल में एडमिट भी रहा था. इसलिए मैंने खुद के अनुभव ग्रुप पर शेयर करना शुरू किए. क्या करना चाहिए, क्या नहीं. कौन से प्रिकॉशन लिए जाने चाहिए इत्यादि।

धीमे धीमे हमारे पास ग्रुप पर लोग कैसे डालने लगे. हम उन्हें जिले के बाहर जाने के लिए एंबुलेंस, दवाई या कॉविड से इतर बीमारी से बीमार पेशेंट को बेसिक ट्रीटमेंट उपलब्ध कराने लगे. लोगों को प्लाज्मा की जरूरत थी उसके लिए भी हमारे पास प्लाज्मा डोनर्स की टीम खड़ी हो गई थी, जो प्लाज्मा देने के लिए तत्पर रहती थी. धीमे धीमे लोगों को, मीडिया को ,प्रशासन को हम पर भरोसा होने लगा और जिले के ज्यादातर केस इस ग्रुप पर शेयर होने लगे. जिनकी मदद के लिए हम तैयार थे. हमने हमें पता चलने वाले हर केस में हर व्यक्ति की हर संभव मदद की.

सरकार ने जब कॉविड से मृत व्यक्ति के परिवार के लिए आर्थिक मदद के लिए योजना चलाई तो हम भी एक माध्यम बने. हम प्रशासन तक उनकी जानकारी पहुंचाई. एनजीओ से मिलकर के आर्थिक मदद पहुंचाएं।


Project Basant

भैया, जब जिले के गांव गांव से लोग जुड़ गए तो हमारा ध्यान गांव की ओर भी अधिक गया. हमें काम करता देख हमारे मित्र प्रेरित हुए,उन्हें भी ऐसा कुछ करना था जो बढ़ते अंधेरे में दीपक का काम करे. मेरे मित्र मयंक जैन ग्राम लार (जिला टीकमगढ़) ने अपने घर वालों से पूछकर गांव का भ्रमण किया और जो स्थिति देखी वो डरावनी थी. कुछ लोग जो बूढ़े थे, और अक्षम थे घर में और कोई नहीं था, उनके पास न खाने को था, न बनाने को. कुछ लोग जिनके पास पहले भी सुबह के बाद शाम की रोटी का इंतजाम नहीं होता था, वह बेरोजगार हो गए थे. हमने उन तक खाना पहुंचाना शुरू किया. दोस्तों के साथ मिलकर एक जूम मीटिंग की. हमने मिलकर कुछ पैसा इकट्ठा किया. लोगों ने 500 से लेकर के 5000 रुपए तक दान दिए. गांव-गांव में हमने ऐसे घरों को खाने के पैकेट बांटना शुरू किया. इसे हमने 'प्रोजेक्ट बसंत' का नाम दिया


गांव गांव से अन्य युवाओं ने भी हमारे साथ आना शुरू कर दिया. उन्होंने खुद बोला कि "भाई, आप लोग जब ऐसा कर सकते हैं तो हम उसमें मदद क्यों नहीं कर सकते हैं. इसलिए कई युवा तैयार हो गए और उन्होंने खाने के पैकेट बांटने से लेकर  राशन उपलब्ध कराने में हमारी मदद की.


प्रोजेक्ट बसंत का एक और फायदा हुआ कि ग्राम सचिव को ऐसे लोगों की लिस्ट बना कर हमने दी. ग्राम सचिव और प्रशासन हमारी मदद कर रहा था और ऐसे लोगों के बारे में हमसे पूछा भी.

हमें सुनिश्चित किया कि आखिरी व्यक्ति तक सरकारी योजना का लाभ पहुंचे.

मुझे पहली बार लगा कि 

1. सोशल मीडिया का हम इस तरह भी उपयोग कर सकते हैं.

2. हम युवा मिलकर इतना कुछ कर सकते हैं.

3. पहली बार मैं और मेरे मित्र जॉय ऑफ गिविंग क्या होता है, महसूस कर पा रहे थे.

जो काम हम लोग गांव में कर रहे थे हमारे कुछ मित्र शहरों में भी ऐसे ही काम कर रहे थे. इंदौर में कुछ लोग कोचिंग चला रहे थे, कुछ लोग कोचिंग में पढ़ रहे थे. उनके पास कांटेक्ट थे वहां

मित्रों ने वन रुपी फाउंडेशन (One Rupee Foundation)  शुरू किया मतलब ₹1 प्रतिदिन देना था और उस पैसे से खाने के पैकेट जरूरतमंदों को हमने बांटना शुरू किया. दिहाड़ी काम करने वालों को, फुटपाथ पर मांगने वालों को, अस्पताल में भर्ती लोगों के परिजनों को खाने के पैकेट बांटना शुरू किया. रोमेश मूलचंदानी, समन्वय रिछारिया ने सजगता से काम किया.

हमें पहली बार लगाकर सीमित संसाधनों में सीमित लोग भी बड़ा काम भी कर सकते हैं.


Before the Third Wave

चूंकि यह कॉविड की तीसरी लहर की शुरुआत का दौर था इसलिए मैं उनसे "तीसरी लहर के पहले क्या काम करना चाहिए" पूछता हूं

"भैया मैं बिंदुबार बताता हूं" वह बोलते हैं.

1. इंफ्रास्ट्रक्चर न चार छः महीने में खड़ा हो सकता था, न ही पूर्णतः बना है. इसलिए इस बात को ध्यान में रखते हुए सारी सावधानियां बरतनी चाहिए. डॉक्टर और सरकारी गाइडलाइन को पूर्णतः फॉलो करना चाहिए.

2. मेरा अनुभव कहता है कि अगर युवा ऑर्गेनाइज हों तो पैरलल सपोर्ट सिस्टम खड़ा कर सकते हैं. ऐसा पैरलल सपोर्ट सिस्टम हर गांव शहर में खड़ा करना होगा, जो आपदा में विपदा में फंसे लोगों की हर संभव मदद कर पाए.  प्रशासन व प्रशासनिक अधिकारियों कर्मचारियों के साथ मिलकर काम करना होगा, उनकी हर संभव मदद करनी होगी. कुछ लोग हो सकता है पूरा काम न संभाल पाए लेकिन युवा मिलकर, प्रशासन के साथ आकर के सिस्टम का हिस्सा बन कर अच्छे से काम संभाल सकता हैं.

3. पौराणिक कथाओं में हमें कम्युनिटी सपोर्ट सिस्टम के बारे में बहुत सारी कहानियां मिलती हैं. मतलब समाज के लोग आपस में मिलकर के सपोर्ट सिस्टम खड़ा करते हैं, दूसरों की मदद करते हैं. गांव में थोड़ा बहुत अभी भी है, लेकिन शहरों में ऐसा कम है. पूर्वजों से सीखते हुए इस सिस्टम विकसित कर के हम एक दूसरे की मदद बेहतर तरीके से कर पाएंगे.


भैया हम लोगों के अंदर हमारे काम ने मानवता को जगाया ही नहीं था, बल्कि जरूरत पड़ने पर मानवता एक दूसरे का हाथ थाने साथ खड़ी हुई थी. हमारे काम ने हमें अधिक संवेदनशील, अधिक मानवीय और सामाजिक रुप से अधिक समृद्ध बनाया है.

उनकी बातें सुनकर युवाशक्ति के बारे में पहली बार इतना सकारात्मक और उत्तरदायित्व युक्त अनुभव मेरे सामने आता है। युवा और समाज का हर व्यक्ति व्यक्तिगत हित छोड़ कर, मिलकर काम करे तो समाज की स्थिति दूसरी होगी.

मैं उनसे कुछ एक्सपीरियंस सुनाने को कहता हूं. वो बताते हैं की उन्होंने #रोजकाकिस्सा नाम से फेसबुक पर कुछ अनुभव शेयर किए हैं.

आप भी एक अनुभव पढ़िए-

रात का एक बज रहा होगा भोपाल वाले ग्रुप में किसी नें मैसेज किया कुछ डिटेल्स के साथ (एक लड़का है उसकी मम्मी को वेंटीलेटर चाहिए अर्जेंट है) वेंटिलेटर सोने की सिल्ली से कम कीमती नहीं इस समय।

हम कुछ लोग जो जाग रहे थे ढूंढनें में लग गये, लगभग तीन बजे मैंने छत्रपाल भाई से कहा मेरी आँखें बंद होनें लगीं है उसका जबाब आया शिवि खुद पॉजिटिव है और सो नहीं रही,लगी है तुझे नींद आने लगी और अस्पताल अस्पताल फ़ोन करने में व्यस्त हो गया।

तारिक भाई नें तो ढाई बजे अपनी बाइक उठाई और आस पास के अस्पताल छान मारे। 

उसकी मम्मी को वेंटिलेटर मिल जाये इसके लिए लोगों की मेहनत देख मेरी आँखों के कोने से आंसू निकल कान में जा बैठे।कुछ देर और लगे रहनें के बाद मेरी नींद कब लगी पता नहीं,सुबह लेट उठा और छटपटाते हुए जल्दी से फ़ोन उठाया व्हाटसएप्प खोला देखा तो उन्हें वेंटिलेटर मिल गया था।

बेड से उठा सीधे रसोई में गया और मम्मी को गले से लगा लिया।

#रोजकाकिस्सा #रोजकाकिस्सा3

अगली पोस्ट में उनके और अनुभव आपसे शेयर करूंगा.

[फोटो: मीडिया में कॉविड 19 रिस्पांस टीम और अभिषेक]

Saturday, December 18, 2021

India As I Know: Socio-Economic Changes A Cooperative Society May Bring

 


इंटरनेशनल कोआपरेटिव अलायन्स (ICA) कॉपरेटिव (सहकारी) को "संयुक्त रूप से स्वामित्व वाले और लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रित उद्यम के माध्यम से अपनी आम आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए स्वेच्छा से एकजुट व्यक्तियों का एक स्वायत्त संघ." के रूप में परिभाषित करता है. पिछली बार हमने देखा था कि किस तरह से जैतपुर कछया समिति और आईएफएफडीसी ने पर्यावरण और वनीकरण पर काम किया है. अब देखते हैं कि एक समिति क्या क्या सामाजिक आर्थिक बदलाव ला सकती है.

जब भी मैं सामाजिक बदलाव की बात करता हूँ मुख्यत: कुछ पैमानों पर तौलता हूँ- महिल सशक्तिकरण, शिक्षा का प्रसार व विकास, वैचारिक परिवर्तन, सरकारी योजनाओं तक लोगों की पहुँच और स्वास्थ्य.

जैतपुर कछया में 1997 के बाद से क्या क्या बदलाव आये इसके लिए मेरे पास कुछ लोग थे जिनसे बातें करके पता किया जा सकता था.

मैं समिति सचिव अनिल मिश्रा जी से बदलाव के बारे में पूछता हूँ. वो कहते हैं, " सर, ज्यादा तो नहीं कहा जा सकता लेकिन हमारे गाँव की महिलाएं अब पति से पीटे जाने पर विरोध करने लगी हैं. समिति की मीटिंग में हिस्सा लेने के लिए आती भी हैं और बोलती भी हैं. पहले चुप रह जाती थीं, बड़ों का लिहाज करती थीं. सच को भी सच नहीं कहती थीं. अब सर ऐसा नहीं है."

मेरे लिए ये छोटा बदलाव भी बहुत बड़ा बदलाव था. जो लोग ग्रामीण परिवेश के हैं वो इस बदलाव का बड़ा महत्त्व समझ सकते हैं.

समिति में कुल 140 सदस्य हैं, जिनमें से 60 महिलाएं हैं. जिन्होंने हरी साड़ी पहन कर 5-5 के ग्रुप बनाकर वन सुरक्षा की है. आईएफएफडीसी ने इस क्षेत्र में सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाये जिन्होंने अपने लघु उद्योग शुरू किये, जैसे आटा चक्की लगाई, दुकानें खोलीं, और उनमें से आधे से अधिक सफल भी रहे हैं.

मैं आगे और बदलावों की बात करता हूँ तो सोलंकी जी तपाक से बोल पड़ते हैं 'सर, समिति का एक असर तो इस तरीके से भी देख सकते हैं कि मेरा खुद का बेटा ही मेडिकल की पढाई कर रहा है. सर, लोगों ने बाहर से आने वाले साइंटिस्ट को देखा, अधिकारियों को देखा और अपने बच्चों को भी वैसा ही कुछ अच्छा बनाने का सोचा. आज हमारे गांव में पड़ोस के अन्य गांवों की अपेक्षा ज्यादा लोग ग्रेजुएट हैं और सरकारी नौकरी में हैं.' 

मैं धीमे-धीमे कुरेदना शुरू करता हूँ तो वे बताते हैं कि सामूहिक निर्णयन ने बहुत कुछ छोटे छोटे परिवर्तन लाये हैं- महज जैसे बेटी कि शादी के लिए कुछ धनराशि सामूहिक रूप से इकठ्ठा कर के जरूरतमंद को दी जाती है. एक साथ उठने बैठने से सामाजिक- जातिगत अंतर भी कम हुआ है.

'सर, इसके अलावा इस क्षेत्र में जहाँ आधे लोग लकड़ी कि चोरी से जुड़े धंधों से जुड़े हुए हैं. हमारे यहाँ के लोगों को समझ आया है कि वनों को बचाना सिर्फ वन विभाग का काम नहीं है, सामूहिक जिम्मेदारी है. आपको शायद ही हमारे यहाँ से कोई लकड़ी चोर व्यक्ति मिलेगा.'

मैं सब सुन रहा हूँ. 'और आर्थिक पक्ष?' मैं पूछता हूँ.

'सर हमारी समिति सच कहें तो हर सदस्य के परिवार के लिए साल भर का राशन तो नहीं जुटा पा रही है लेकिन साल में एक बार हम उन्हें गिफ्ट में कुछ जरूर देते हैं.' 3 चौकीदार हैं, जो अपने खेतों के साथ वन सुरक्षा भी करते हैं. शुरुआत में जब हम वृक्षारोपण कर रहे थे तो रोजगार उपलब्ध हुआ था. नर्सरी से कुछ लोगों को रोजगार मिल जाता है साथ ही गरीब लोगों को प्रूनिंग (टहनियों की आवश्यक काट छांट) के बाद की जलाओ लकड़ी फ्री में मिल जाती है.'

समिति के आय के स्त्रोतों में जलाऊ लकड़ी का बिकना, आईएफएफडीसी द्वारा नर्सरी के पौधों को खरीदना, जंगल में उगे फलों- आंवला और सीताफल का बिकना शामिल है. जिससे तरकरीबन वार्षिक 3-3.5 लाख कि कमाई समिति की हो रही है. एक 265 हेक्टेयर भूमि स्वामित्व वाली किसी भी समिति के लिए ज्यादा नहीं है किन्तु पर्यावरण पर काम करने वाली और वन-निधि संरक्षित करने वाली संस्था के लिए काफी है.

मैं आय के साधन बढ़ाने के उपाय जानने के लिए हरीश गेना जी से बात करता हूँ. वो अपने फ्यूचर प्लान के बारे में बताते हैं- 

1. सर, हमने टीएफआरआई (TFRI:Tropical Forest Research Institute) से लाख कल्टीवेशन के लिए एमओयू साइन किया है. 

2. एफआरआई देहरादून से एमओयू साइन है. हमें उच्च गुणवत्ता के पौधों का निर्माण नर्सरी से करना है.

3. समिति और आस पास कि समिति के पास सीताफल बहुत उगता है. इसलिए हम सीताफल से पल्प की प्रोसेसिंग मशीन लगाने वाले हैं.

4. स्थानीय देशज उत्पाद बिक्री के लिए ट्राइफेड से एमओयू साइन किया है जिसका विस्तार हम इस समिति तक भी कर रहे हैं.

5. वर्मीकम्पोस्ट पर भी हम काम करेंगे

6. पहले भी हमने सफ़ेद मूसली, अश्वगंधा जैसी औषधियां लगाई थीं, एक वर्ष यकायक से मार्केट बैठ गया तो यह फायदे का सौदा नहीं रहा किन्तु औषधि उत्पादन भी हम इस समिति में पुनः शुरू करेंगे.

वो आगे बताते हैं कि उत्तराखंड में आईएफएफडीसी ने तेजपत्ता से कई समितियों कि आय अच्छी की है, आसाम में समिति को टूरिज्म एक्टिविटी से जोड़ा है और सर्टिफाइड सीड्स के लिए भी प्राइवेट कंपनियों से एमओयू साइन किये हैं. समितियों की आय कैसे बढ़ाई जाए, इसके लिए आईएफएफडीसी के पास कोई एक्सपर्ट ग्रुप नहीं है. एक डेडिकेटेड ग्रुप बनाने का आगे प्लान जरूर है.

97वे में संविधान संसोधन द्वारा क्यों कोआपरेटिव शब्द अनुच्छेद 19(1)(स) में जोड़ा गया था. (जुलाई 2021 में उच्चतम न्यायलय के आदेशानुसार निरश्त किया गया) तब मुझे इसका महत्त्व समझ नहीं आया था. सहकारी समिति के सामाजिक आर्थिक उद्देश्यों को देख कर और एक समिति को बड़े पास से देखकर समझ आया.

किसी भी सहकारी समिति के सफल होने में 

1. लचीले एवं आवश्यकता, सुविधा अनुरूप सहकारी नियम

2. जिम्मेदारी व् जवाबदेही

3. पूँजी निर्माण में समर्थता 

का बड़ा योगदान होता है.

किन्तु सहकारी समितियों को नीति निर्माताओं और जनता दोनों के बीच आर्थिक संस्थानों के रूप में मान्यता कम ही दी जाती है और उनका आर्थिक- आत्मनिर्भरता में महत्त्व भी कम ही समझा जाता है. इसलिए अक्सर वे आर्थिक बदलाव में अधिक सफल नहीं हुई हैं.

जुलाई 2021 में सरकार ने सहकारिता मंत्रालय नाम से अलग मंत्रालय का निर्माण किया है. यह अलग मंत्रालय एक सराहनीय प्रयास है. देखते हैं हम सहकारिता के बाकि उद्देश्यों में आगे चलकर कितना सफल हो पाते हैं.

 जैतपुर कछया में सामाजिक बदलाव के दूसरे पैमानों के अलावा दो बड़े मानक: सरकारी योजनाओं तक लोगों कि पहुँच और स्वास्थ्य पर भी अच्छा काम हुआ है लेकिन समिति के अलावा इसमें अन्य सरकारी संस्थाओं ग्राम पंचायत और आंगनवाड़ी की भी महती भूमिका रही है.

जैतपुर कछया अपने उद्देश्यों में काफी हद तक सफल रही है और आगे बढ़ रही है. 

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क्या आपको देश की सबसे सफल कॉपरेटिव का नाम पता है?

नहीं पता?

उत्तर है-- गुजरात मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (GCMMF)

क्या? नाम नहीं सुना? अमूल सुना है??

देश का सबसे बड़ा डेयरी प्रोडक्ट ब्रांड अमूल इसी का एक ब्रांड है. 1946 में जन्मे, आजाद देश से एक साल पुराने, 13 ज़िलों, 13000 गांवों में फैले इस कॉपरेटिव सोसाइटी के तकरीबन 36 लाख लोग सदस्य हैं.

अमूल को जिसने अमूल बनाया वो थे 30 साल इसके चेयरमैन रहे, मिल्कमैन ऑफ इंडिया श्री वर्गीज कुरियन जी. उनके बारे में और देश की सबसे सफलतम कॉपरेटिव ने लोगों में क्या सामाजिक आर्थिक बदलाव लाए इसके बारे में फिर कभी.

[आर्टिकल के तथ्य एक सैंपल डाटा और लोगों के साथ किये गए विमर्श पर आधारित हैं.

फोटो: समिति द्वारा संचालित नर्सरी ]

2017 में पहली बार #indiaasiknow टाइटल से लिखा था. बाकी सब यहां पढ़ा जा सकता है-

http://sadaknama.blogspot.com/search/label/India%20As%20I%20Know?m=0