Thursday, April 18, 2019

मैंने मंटो से क्या सीखा | तसनीफ़ हैदर

रूसी कहानीकार चेखव के बारे में ये बात उर्दू के एक राइटर मुहम्मद मुजीब ने कही थी कि उसका दिल बहुत बड़ा था, वो इंसानियत के तमाम गुनाहों को माफ़ कर सकता था। मंटो के बारे में भी ठीक यही बात कही जा सकती है। आप कहेंगे कि राइटर गुनाहों को माफ़ करने का ठेकेदार है क्या?

मेरे ख़याल में मंटो से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है—बल्कि हर उस बात का ठेका लेने की भी, जिसके लिए यार-दोस्त मना करते हैं, हिकमत से काम लेने का मश्वरा देते हैं, ख़ुश-ओ-ख़ुर्रम रहने, चुप रहने और हँसने-बोलने की एक्टिंग करने का लेक्चर देते हैं—उन संवेदनशील लोगों को भी, जिनके लिए ये काम ज़रा मुश्किल है।

मुझे मंटो ने सिखाया कि संवेदनशील होने के लिए राइटर होना शर्त नहीं, मगर राइटर होने के लिए संवेदनशील होना बहुत ज़रूरी है। कहानी लिखना और कहानी जीना दोनों अलग बातें नहीं हैं, कहानी उसी दिमाग़ से निकलती है, जो पल-पल यहाँ समाज के ग़ैरज़रूरी स्पीड ब्रेकरों से ठोकर खाता रहता है। इसलिए उस दिमाग़ का इस्तेमाल न करना, सवाल न पूछना और कहानी के ज़रिये अपनी कमीनगियों या अपनों की बदमाशियों को दरयाफ़्त न करना, एक खोट है। इन सब बातों के लिए ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है, जिसे व्यंग्य की ज़बान में ठेका लेना भी कहा जा सकता है, मंटो इस व्यंग्य को सहने के लिए तैयार था, उसने नासूरों से रिसते हुए पीप को दिखाते हुए किसी क़िस्म की शरम का इज़हार नहीं किया, बल्कि बेझिझक अपना कुरता उठा दिया और साथ-साथ समाज की सलवार भी खोल दी।
मंटो रूसी कथाकारों में जिस शख़्स से सबसे ज़्यादा प्रभावित था, वह गोर्की था, गोर्की के बारे में मशहूर है कि वह घर में बैठ कर कहानी लिखने का आदी नहीं था, लोगों से मिलना, ख़ास तौर पर उस तबक़े से जिसे कीचड़ में पैर डुबो कर जीने पर मजबूर किया जाता है, उसकी आदतों, लोभ की ऊँचाइयाँ और जिद्द-ओ-जहद को देखना उसने अपने ऊपर फ़र्ज़ कर लिया था। मंटो ने गोर्की से यह फ़न हासिल किया और वह भी अलग-अलग शहरों के अलग-अलग किरदारों से ठीक उसी अंदाज़ में मिला। उसने ऐसे लोगों पर कहानियाँ लिखीं, जिनको आम तौर पर हमारे यहाँ का राइटर दरयाफ़्त नहीं कर पाता और करता है तो उन पर अपनी तहरीर का इतना लाली-पाउडर पोत देता है कि वो नक़ली, बे-जान और धुँधले नज़र आते हैं। मंटो ऐसा नहीं करता, वो कहानी में उस किरदार के साथ अपने तजरबों को बयान करता है।
ज़िंदगी की कच्ची-पक्की नालियों में तैर रहे ऐसे किरदारों को हाथ डाल-डाल कर बाहर निकालना या फिर ख़ुद उनके साथ इस बदबूदार माहौल में उतर कर वहाँ की ज़िंदगी को बरत कर देखना मंटो का ख़ास और न भुला सकने वाला काम है। फ़्योदोर दोस्तोयेवस्की के नॉविल Insulted & Humiliated में एक ऐसे बूढ़े का ज़िक्र है, जिसको कहानीकार ख़ुद एक उदास और ज़लील मौत मरते हुए देखता है। मंटो ने रूसी नॉविल-निगारों से सिर्फ़ ऐसी हक़ीक़तपसंदी नहीं सीखी, उसने उन हक़ीक़त-निगारों का वह सूक्ष्म विश्लेषण भी हासिल किया, जो मुल्की हालात और सियासत, मज़हब और उसके पाखंड का पर्दा चाक करता है, लेकिन चूँकि मंटो अफ़साना लिखता था, नॉविल नहीं, इसलिए उसे इस विश्लेषण को, जिसे विस्तार की बहुत ज़रूरत थी, दूध पर से मलाई की तरह फूँक-फूँक कर हटाना भी पड़ता होगा, उसकी ऐसी कहानियाँ जो सोसाइटी में उबलते हुए दुख के फोड़ों को नुमायाँ करती हैं, विस्तार से तो ख़ाली हैं, मगर तजरबों से नहीं, जिनमें ‘हतक’, ‘नया क़ानून’, ‘सहाय’, ‘नंगी आवाज़ें’, ‘मेरा नाम राधा है’ वग़ैरा कई कहानियाँ शामिल हैं।
पुरानी कहानियों में सुनते थे कि नवाब साहब को किसी वेश्या पर प्यार आ गया तो उन्होंने उसे घर डाल लिया, शादी करली, फ़लाँ-फ़लाँ। मगर ऐसी हिम्मत और कौन-से राइटर में थी जो किसी वेश्या को बहन बनाता। इस नुक्ते की जानिब मेरा ध्यान कुछ साल पहले मेरे एक दोस्त ने दिलवाया। मंटो वेश्या या तवाइफ़ को बहन बना कर देखता था, मगर उसका ऐसा भाई न था, जो उसकी दलाली करता फिरे, बल्कि वह उसके ज़ख़्मों को ज़बान देने वाला भाई था। उसने औरतों के जितने किरदार अपनी कहानियों में तराशे हैं, वे ज़्यादातर असली हैं, बल्कि अगर सभी को असल ही समझा जाए तो कुछ ग़लत न होगा।
हो सकता है कि वह किसी किरदार को मुकम्मल तौर पर बयान करता हो, किसी को आधा और किसी के सिर्फ़ चंद पहलू, मगर औरत के साथ उसका रिश्ता एक आइडियल रिश्ता है, जिसमें उसने नसीहतों के तम्बू नहीं ताने हैं। उसके यहाँ औरत मर्द की ही तरह मज़लूम भी है, ज़ालिम भी, मक़्तूल भी है, क़ातिल भी। ‘हतक’ में सौगंधी का किरदार पढ़ते हुए अगर आपके ज़हन में दोस्तोयेवस्की के नॉविल ‘इडियट’ की नस्तास्या फ़्लीपोवना आ जाए तो उसे मंटो पर रूसी कथाकारों का एक तरह का प्रभाव समझा जा सकता है। नस्तास्या का किरदार सौगंधी की ही तरह मुँहफट, ख़तरनाक और झुँझलाने वाला है, जो मर्द को अंदर तक झिंझोड़ कर रख दे। हमारे समाज में ज़्यादातर पत्नियाँ इन्हीं किरदारों की एक सूरत होती हैं, इन्हीं का रंग-रूप और तेवर लिए, मैंने ख़ुद ऐसी बहुत-सी औरतें देखी हैं, बस उनके पास समाज को दिखाने के लिए एक सनद होती है, मगर यह बात उनके हक़ में सम-ए-क़ातिल (ज़हर) भी है, क्योंकि न तो वे सौगंधी की तरह अपने यार पर रिवॉल्वर तान सकती हैं और न ही नस्तास्या की तरह उन्हें भरी महफ़िल में बदनाम कर सकती हैं। मंटो औरत के बारे में कोई नतीजा निकालने के हक़ में नहीं है, ऐसी ग़लतियाँ आपको रूसी नॉविल-निगारों के यहाँ मिल जाएँगी, मगर मंटो जजमेनटल नहीं होता, हरगिज़ नहीं।
‘मेरा नाम राधा है’ में हालाँकि उसने मर्द और औरत के रिश्ते में भाई-बहन के रेशमी फ़ीते को उस बोर्ड की ही तरह क़रार दिया है, जिस पर लिखा होता है यहाँ पेशाब करना मना है। मगर मंटो जब ख़ुद एक भाई के ढाँचे में तब्दील होता है तो उसे बहन की छातियों से परेशानी नहीं होती, वह उन्हें दुपट्टे के नीचे ढाँक कर ज़मीन पर सीना तान कर चलने का धोखा ख़ुद को नहीं देता, बल्कि वह बहन के सीने की डोर को साँसों के उतार-चढ़ाव के साथ बहुत ऐतमाद के साथ देखता है और उसकी मनोवैज्ञानिक समस्याओं को इन्हीं डोरों की मदद से बयान करता है।
मंटो सज़ा के ख़िलाफ़ है, उसकी ज़्यादातर कहानियों में किरदार ऐसी अजीब समाजी चक्की में पिसते हुए नज़र आते हैं, जिनमें मुजरिम ख़ुद ही एक घिनौने और बेहूदा जुर्म का शिकार दिखाई देता है। किसी का पेट चाक करने वाला, झूठ बोलने वाला, दलाली करने वाला, औरत को पीटने वाला या फिर शराब और बीड़ी के धुएँ में ग़म ग़लत करने वाला, गालियाँ बकने वाला और झूठी क़समें खाने वाला। दरअसल, ये सब इस बे-ग़ैरत और सोए हुए समाज के ऐसे ढके हुए पत्ते हैं, जिन्हें मंटो उलटने का हुनर जानता है। जो लोग समझते हैं कि वह सिर्फ़ अख़बारों की सुर्ख़ियों की मदद से कहानी गढ़ता है, वे ग़लत हैं, क्योंकि अख़बार की सुर्ख़ी के नीचे मौजूद कहानी का पूरा ब्यौरा, वह मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में घूम कर, आँखें छील कर तैयार कर चुका होता है। ख़बर कोई भी हो, कैसी भी हो, वह अकेली नहीं होती, बल्कि वह एक इशारा होती है, समाज में पनपने वाले रुझानों को नुमायाँ करने वाला इशारा। अब तो ख़ैर हम इन इशारों को मंडी में ले आए हैं और ऐसे पतले मोटे, लंबे-चौड़े इशारों की तलाश में रहते हैं, जिनसे कुछ कमाई हो सके। मगर मंटो कमाई के लिए ख़बरों को तलाश नहीं करता था, बल्कि वह अपने तजरबों की कॉपियों को ख़बरों के अक्स से मिला कर देखता और उन्हें रक़म करता था। उसने जिन अदीबों या लेखकों को पसंद किया, वे फाँसी के ख़िलाफ़ थे, ख़ुद वह भी रहा होगा, फाँसी इस समाज की घुटन का इलाज नहीं, बल्कि फंदे खोल देना ज़्यादा ज़रूरी है।
मैंने मंटो से सीखा है कि ख़ुद को घोल कर कहानी को कैसे जिया जाता है। वह कौन-सा बोझ है जो एक शाइर और लेखक को पत्रकार और पुलिस अहलकार से ज़्यादा हलकान कर देता है, जबकि पत्रकार और पुलिस का वास्ता तो आए दिन ऐसी ख़बरों से पड़ता है, बल्कि उनका काम ही अजीब हरकतों के ग़लीज़ नतीजों को देखना और बयान करना है, मुजरिमों की फ़िराक़ में फिरना है, उनकी ताक में रहना है, लोगों की अनोखी ख़ूनी ख़्वाहिशों का सामना करना है। बल्कि किसी मनोवैज्ञानिक को भी जो ऐसे मरीज़ों को, जो नित-नए दिमाग़ी रोगों में मुब्तिला होते हैं, देखते रहने की आदत होती है, फिर भी ऐसा किया है कि इन तीनों के मुक़ाबले में लेखक इन सोचों के पैदा होने और पनपने के ग़म में घुलता रहता है, मंटो सिखाता है कि बे-हिसी और अनदेखी मुमकिन नहीं। ख़ास तौर पर उस शख़्स के लिए जो फ़िक्शन-निगार हो या फ़िक्शन को पढ़ना ही क्यों न पसंद करता हो। हर हाल में उसे अपने ज़हन-ओ-दिल को इंसानियत के लिए कुशादा रखना होगा और टूटते हुए तअल्लुक़ात, बिगड़ते हुए हालात और ग़ैरज़रूरी विरोध के बावजूद अपने अंदर के क़लमकार को ज़िंदा रखना होगा जो हर हालत में सच लिखने से बाज़ न रहे। ऐसा सच जिसकी कोई तकनीक नहीं, बस वह खरा हो।
-तसनीफ़ हैदर

Saturday, April 6, 2019

लव/अरेंज मैरिज (Stories From South India Tour)



सर मेरे दादा ने प्रेम विवाह किया था. अलग जाति में. सर लड़ाई हुई, तलवारें चल गईं. दादा के पिता (परदादा) मारे गए.

दादा यहाँ आ गए. वो नेशनल पार्क के कॉर्नर में बसी अपनी 15 - 20 घरों की बस्ती की ओर इशारा करता है.
अब हम सब यहाँ जंगल बचा रहे हैं. सबको रोजगार मिला है यहाँ. वो हिंदी- अंग्रेजी मिक्स कर के बोल रहा है.

'सर आपकी शादी हो गई?'

'हाँ'

'सर अब तो इंटर-कास्ट मैरिज में कोई प्रॉब्लम नहीं है. वो आज़ादी के पहले की बात थी. आपका इंटरकास्ट है?'

'न' मैं कहीं और ही खोया हूँ.

मुझे एक दोस्त की बहन याद आ रही है जिसे प्रेम विवाह करना था, लेकिन दोस्त के अलावा कोई और तैयार न था. बहन की शादी कहीं और की गई. दो साल बाद illicit  abortion के complications  की वजह से उसकी मृत्यु हो गई!

मैं उस बस्ती की ओर देखता हूँ और सोचता हूँ कि काश! दोस्त के पिता भी मान गए होते.

 मैं हरे भरे जंगल के पास हरी भरी बस्ती देख रहा था लेकिन दोस्त की आँखों में बसी बहन की राख सोच रहा था!


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Monday, February 4, 2019

निज़ार क़ब्बानी की कविताएँ (अनुवाद : पूजा प्रियंवदा)


Nizar Qabbani 5 poems
निज़ार क़ब्बानी

प्यार की तुलना

मेरी प्रिय, मैं तुम्हारे दूसरे प्रेमियों जैसा नहीं हूँ
यदि दूसरा दे तुम्हें एक बादल
मैं तुम्हें देता हूँ बारिश
यदि वह दे तुम्हें एक लालटेन, मैं
दूँगा तुम्हें चाँद
यदि वह देगा तुम्हें एक डाली
मैं दूँगा तुम्हें पेड़
और अगर दूसरा तुम्हें देता है एक जहाज़
मैं दूँगा तुम्हें सफ़र

मैं दुनिया जीतता हूँ शब्दों से

मैं दुनिया जीतता हूँ शब्दों से
मैं मातृभाषा को जीतता हूँ
क्रियाएँ, संज्ञाएँ, वाक्य-विन्यास…
मैं चीज़ों के आरंभ को बुहार देता हूँ
और एक नई भाषा के साथ
जिसमें है पानी का संगीत, आग के संदेश
मैं आने वाली सदी को जलाता हूँ
और तुम्हारी आँखों में रोक लेता हूँ समय
और मिटा देता हूँ वह रेखा
जो अलग करती है
वक़्त को इस एक लम्हे से

जब मैं करता हूँ मोहब्बत

जब मैं करता हूँ मोहब्बत
मुझे महसूस होता है—
मैं वक़्त का शहंशाह हूँ
मेरा अधिकार है धरती और इसकी समस्त वस्तुओं पर
मैं अपने घोड़े पर जाता हूँ,
सूरज की ओर
जब मैं करता हूँ मोहब्बत
मैं बन जाता हूँ एक तरल रोशनी
जो आँख को नहीं दिखती
और मेरी कॉपियों में लिखी कविताएँ
बन जाती हैं छुईमुई और खसखस के खेत
जब मैं करता हूँ मोहब्बत
पानी मेरी उँगलियों से यकायक बह निकलता है
मेरी जीभ पर घास उग आती है
जब मैं करता हूँ मोहब्बत
मैं हो जाता हूँ सारे वक़्त के बाहर का वक़्त
जब मैं करता हूँ एक औरत से मोहब्बत
सारे पेड़,
मेरी और दौड़ पड़ते हैं नंगे पाँव

भाषा

जब एक आदमी होता है इश्क़ में
वह कैसे इस्तेमाल कर सकता है पुराने शब्द?
क्या एक औरत
अपने प्रेमी को चाहती हुई
सो जाए—
व्याकरणविदों और भाषाविदों के साथ?
मैंने कुछ नहीं कहा
उस औरत से जिससे प्रेम करता था
पर इकट्ठे किए एक सूटकेस में
प्रेम के सभी विशेषण
और सभी भाषाओं से भाग गया

रोशनी क़ंदील से ज़्यादा ज़रूरी है

रोशनी क़ंदील से ज़्यादा ज़रूरी है
कविता नोटबुक से ज़्यादा ज़रूरी है
और चुंबन होंठों से अधिक सार्थक
मेरे तुमको लिखे ख़त
हम दोनों से अधिक महान और महत्वपूर्ण हैं
वही अकेले दस्तावेज़ हैं जहाँ
लोग खोज निकालेंगे
तुम्हारा हुस्न
और मेरी दीवानगी
***
निज़ार क़ब्बानी (21 मार्च 1923–30 अप्रैल 1998) अरबी भाषा के सुप्रसिद्ध कवि हैं। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ sadaneey.com से ली गई हैं।

Thursday, September 27, 2018

[The Blue Canvas] ९

सारी शोधयात्राएँ खुद की खोज से शुरू हो खुद में अंत होती हैं. मैं खुद की तलाश में खुद से निकल तुम तक पहुँच जाता हूँ. तुम्हारी आँखों में जो मैं हूँ वो मेरे 'मैं' से बिलकुल अलग हूँ. मेरी आँखों में जो तुम हो वो तुम्हारे अंदर समाई 'तुम' से बिलकुल अलग हो. हम तीन भाई हैं जिनके एक पिता हैं लेकिन हम तीनों के लिए 'पिता' मायने में अलग-अलग हैं. एक आदमी दूसरे के अंदर अलग तरीके से और तीसरे के अंदर बिलकुल अलग तरीके से रम जाता है.  निंदा फ़ाज़ली को सही से अभी पढ़ना शुरू किया है उनके 'हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी/ जिसको भी देखना हो कई बार देखना' का मतलब धीरे धीरे समझ आ रहा है... शायद तुम्हारी आँखों में खुद को देख समझना शुरू कर रहा हूँ.

क्या खो रहा हूँ, क्या पा रहा हूँ, ये वक़्त पे छोड़ के जा रहा हूँ. लेकिन आशा, उम्मीद और सफर ये ज़िंदा रहने वाले हैं. हर दिन बिखर कर मेरे हिस्से में थोड़ा सा तुम रह जाते हो जैसे हाथों में फूलों कि खुशबू रह जाती है. तुम्हें याद... तुम्हें याद करना हर दिन का शगल है और उगे सूरज अबतक रोशन हैं.

मेरी सारी यात्रा जैसे एक शोधयात्रा हो गई है. जो मुझे तुम्हारी आँखों से खोजेगी. मेरे यार! तुम सनातन सहयात्री हो... मेरी मासूम हथेली थामे चल रही हो.

#TheBlueCanvas




Sunday, June 17, 2018

रात

एक खूबसूरत नींद कभी कविता नहीं कहती
एक बदसूरत रात कभी बच्चे नहीं जनती.

उसने कहा मेरा पोट्रैट बनाओ
मैंने कैनवास काला कर दिया
वो चकित थी
कि मैं उसे इतना अच्छे से कैसे जानने लगा हूँ.

मैंने नींद कि गोलियां लेना शुरू की
उसने प्रेम में कवितायेँ लिखीं
उसने धीमे से मेरा माथा चूमा
वहां का खून जम काला पड़ गया.
उसने कहा 'उसे मेरे जैसा प्रेमी ही चाहिए था'
और मेरा दम घुटने लगा.

वो लबालब हो गई मेरे प्रेम में
ऐसा उसने कविता में लिखा
फिर बोली 'अच्छा तुम भी कुछ सुनाओ.'

मैं हौले से बुदबुदाया
'मैं उबर चुका हूँ तुम्हारी छुअन से
तुम्हारे छूने से अब आत्मा नहीं धधकती.'

वो बदसूरत रात कट-फट चुकी थी
लेकिन ये बेहद खूबसूरत अंत था.

Sunday, June 3, 2018

स्थापित सत्य


मुझे ईश्वर नहीं चाहिए
तुम्हारी आस्थाएं और नियम भी नहीं
मैं आदिमानुष हूँ
जो अभी भी उन कंदराओं में जी रहा हैं
जिनमें बस उसके नियम चलते हैं
उन कायदों में बंधा है
जिनसे उसे सुख मिलता है
और उन आँखों से दुनिया देखता है
जो उसे जन्म से मिली थीं.
मुल्कों को नकार
धर्मों को नकार
जातियां नकार
मिले लिंग को नकार
युद्धों को नकार
दंगों को नकार
हत्याएं नकार
अभिमान और ज्ञान नकार
जो बचता है
वो थोथला नंगा इंसान है
जिसके कपड़ों से बू नहीं आती
हत्याओं को,
धरती हड़पने की,
प्रदूषण की,
जन-जंगल-जमीन हरने की
न किसी स्त्री के खून की.
वो मैं हूँ.
और अगर तुम भी वो बन सकते हो मेरे दोस्त
तो आओ
मेरे साथ चलो
नंग-धडंग
अपने समाज, परिवार और आस्थाओं से परे.
यदि नहीं कर सकते ऐसा
तो कितना भी लिख लो तुम 'आज़ादी'
कितना भी कह लो 'फेमिनिज्म'
कितना भी चिल्ला लो तुम 'प्रेम'
तुम्हारा कहा सब मृगमरीचिका है
तुम्हारा ज्ञान सब थोथा विज्ञान है
और रही बात तुम्हारी कविता की
वो सब बारहखड़ी के अलावा कुछ भी नहीं
जो कागज़ रंग रही है
और पेड़ गिरा रही है.
मेरे दोस्त
कोई भी इंसान आदिमानुष
हुए बगैर
कवि नहीं हो सकता
न ही मेरा मित्र.
ये भी एक प्रथम और अंतिम स्थापित सत्य है
जिसे जनजातियों की तरह विस्थापित नहीं किया जा सकता.

Thursday, May 31, 2018

[ The Obtuse Angle ] 4

हम सोशल मीडिया पे लिख लिख कर गुस्से का इज़हार करते हैं, वक़्त हुआ तो किसी चौराहे पे मार्च या इंडिया गेट पे कैंडल जलाने में हिस्सा बनते हैं... और लेकिन वोट अपने जाति वाले को ही देते हैं.
हम इतने सभ्य हैं कि जब तक हादसे घर पे दस्तक नहीं देते खुद की सोच तक हम नहीं बदलते. हमने अपनी जातियों/धर्मों को वोट दिए हैं. हमने अपने फ्रैंकेंस्टीन खुद पैदा किये हैं.
कितना सुख है शाम को कुर्सी पर बैठ ये सोचने में कि आज हमारे साथ कोई हादसा नहीं हुआ है... और कितना सुकूं है फोन पे ये पता चलने में कि चाहने वाले भी ठीक हैं.
सच तो ये है, सुख के साथ मैं ये लिख रहा हूँ, सुकूं के साथ आप इसे पढ़ने वाले हैं. कल नए फ्रैंकेंस्टीन फिर पैदा करने वाले हैं. कल फिर सोशल मीडिया पे कवितायेँ, चौराहे पे मार्च और कैंडल जलाने वाले हैं और उसके फोटो चस्पाने वाले हैं.
वैसे पिछली बार की कविता उतनी अच्छी नहीं थी, शायद इमोशंस कम रह गए थे. इस बार तो क्या लिखा है आपने!
इस बार की फोटो ठीक ही है. अगली बार कैंडल सामने और बैनर बगल में रख के फोटो खिचाईयेगा... बेहतरीन आएगी. पूरा एक्टिविस्ट लगेंगे.
दुआ करता हूँ ये आपके लिए 'अगली बार' जल्दी ही आएगा.

#TheObtuseAngle, 

Wednesday, May 30, 2018

ईश्वर


मैं वो कविता संग्रह हूँ
जिसे तुम पूरा पढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा सकते
आँख के नीचे के काले पड़े सच दीखते हैं उसमें.
मैं वो सांत्वनाएं हूँ
जो सदा अधूरी रहनी हैं,
कोई भी आशायें अविचलित हो सच नहीं होनीं न कोई अरमान,
बस भ्रम हैं सच होने को, उनके लिए शुभेच्छाएं.
मैं वो लाश हूँ
जिसे तुम्हें खुद अकेले कंधे पर ढोनी है,
न कोई राम आना है, न कोई श्याम.
तुम्हारे शोर में लिपटी अंतिम दारुण आदमी की चीख का
परिणाम हूँ मैं
जिसे निस्तर अकेले छोड़ा गया है.
अनसुलझे रहस्यों का अंतिम उत्तर हूँ.
अधूरी उम्मीदों के लिए हरी-पट्टी.
गढ़ा गया हूँ जैसे आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस गढ़ी जा रही है
जैसे तुम्हारे अंदर कालापन बढ़ रहा है
जैसे सारी सांत्वनाएं ख़त्म हो रही हैं
जैसे प्रेम धूमिल हो रहा है
जैसे आकांक्षाएं आदमी को जीने नहीं दे रही हैं
जैसे खुद के क़त्ल के लिए पारिस्थितिकी को ख़त्म तुमने किया है
जैसे प्रेम के बदले संभावनाएं, स्वार्थ और समाज चुना जाता है
(फिर घड़ियाली आसुंओं में रोया जाता है)
वैसे ही अशरीर, अश्लील ईश्वर गढ़ा जाता है.
गांजा पिये भ्रम में रहो की मैं हूँ,
क्यूंकि हर अच्छे-बुरे का उत्तर तुम्हारा बाप हमेशा नहीं दे सकता.

Monday, May 28, 2018

प्यार के अलावा


मैंने देह और प्रेम में खालिश प्रेम चुना
उसने समाज और मुझमें समाज
मैंने गीत और जुगनू में से कुछ न चुना
दोनों को आग लगा दी.
उसने आखिरी बार लिखा
‘प्यार के अलावा भी बहुत कुछ है दुनिया में’
बहुत कुछ प्यार से बड़ा था
प्यार बहुत कुछ न था.
उसने नीली आँखों में जीभर मुझे भरा
उजली हंसी से चूमा
दांतों में मेरे जिस्म छोड़ा, अटकाई यादें
फिर मुस्कुराने की दवा बताई
जैसे वो कोई हुनरमंद डेंटिस्ट हो.
फिर बहुत कुछ के पास चली गई
प्यार यहीं रह गया
जिसे मैंने बेटी की तरह पाला
और सिखाया कि प्यार बहुत कुछ से बहुत बड़ा है, सभी कुछ है.
---
प्यार के अलावा दुनिया में बस प्यार है.
अगर नहीं है
तो तुमने अपने आसपास एक झूठी दुनिया बनाई है
जो दवाओं के असर में मुस्कुरा रही है.

तुम्हारे लिए कविता


मैं तुम्हारे लिए कविता लिखता हूँ
उसमे डालता हूँ प्रेम की तमाम उपमाएं
कई सारे कठिन शब्द और कई मायने.
एक मुट्ठी चाँद को ले घोंटता हूँ,
गार्निशिंग के लिए तारे तोड़ रखे हैं.
नींद, देह, ऑंखें, होंठ, हथेली और लम्स
सबके लिए नयी नयी उपमाएं हैं.
जैसे- नींद विधवा की पथराई ऑंखें हैं
जो दीर्घ तक तुम्हारे स्वप्न देखती हैं.
देह आसमान है तुम्हारी,
जिसे मैं ओढ़ता, बिछाता हूँ.
होंठ नदी के गोल गीले पत्थर हैं
जिन्हें अपने होंठों पे बिठा मैं ईश्वर बना देता हूँ
(जैसे ऐसे पत्थर तुलसी पौधे संग ईश्वर हो जाते हैं.)
हथेलियां तुम्हारी गुजरात और पूर्वोत्तर भारत हैं,
एक में कच्छ के फ्लेमिंगोज़ घूमते हैं
दूसरे में हरियाती ब्रह्मपुत्र नदी है
और दोनों को छू कर चूमने की इच्छाएं हैं.
(बस यही दो जगह देश में अब मैंने नहीं खंगाली हैं.)
लम्स! उफ़्फ़!! हर एक छुअन वो कतरा है
जो खून में दौड़ रही है किसी इम्युनिटी की तरह...
ज़िंदा रहने का कारण बनी हुई है.
लेकिन गार्निशिंग तक ये कविता और तमाम उपमाएं
निरर्थक लगने लगती हैं.
हर कविता में मैं तुम्हारा हो जाना चाहता हूँ,
हर एक दिन पिछली दफे से ज्यादा और बेहतर प्रेम करना चाहता हूँ,
हर नई बार एक नए एहसास से छूना चाहता हूँ,
हर एक बार एक नई प्रेममई नज़र से देखना चाहता हूँ.
मेरा प्रेम किसी कविता में पूरा नहीं समा पाता
मेरे एहसास तमाम उपमाओं में भी अधूरे रह जाते हैं
इसलिए तुमपर लिखी मेरी सारी कवितायेँ अपूर्ण होती हैं.
मैं थककर इस कविता को
अधूरा ही तुम्हें सौंपता देता हूँ
और उस दिन का इंतज़ार करता हूँ
जब मैं अपनी तमाम भावनाये,
एहसास, प्रेम और हृदयेच्छाएं किसी कविता में समा पाऊं,
उसे सार्थक और पूर्ण बना पाऊं.