पिछले लेख में हमने हिंदी और हिंदी की दुर्दशा को ले के लेखकों, लेखक गुटों और सरकारी रवैये की बात की थी. लेकिन हिंदी की दशा के लिए सिर्फ यही लोग जिम्मेवार नहीं हैं. सच तो ये है कि अख़बारों, प्रकाशकों और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के रवैये ने भी इसमें कम योगदान नहीं दिया है.
आप हिंदी के किसी भी मुख्य पत्र को उठा लीजिये. पहला तो आर्थिक, सामाजार्थिक, राजनैतिक और भू-सामरिक मुद्दों पे कोई ढंग का विश्लेषण नहीं मिलेगा और मिलेगा भी तो उस स्तर का नहीं जो मिंट, द हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस जैसे अंग्रेजी के अख़बारों में मिलता है. इसलिए मेरे जैसे द्विभाषी व्यक्ति स्वतः अंग्रेजी की और आकर्षित होते हैं.
दूसरा, उदाहरण के लिए दैनिक भास्कर जैसे अख़बार की कोई सी भी एक खबर उठा लीजिये. एक शीर्षक देखिये- ' बेस्ट रायटर नहीं बेस्ट सेलिंग रायटर हूँ लकली.' इसमें हिंदी को देखो, कितनी है?
असल में समाचारपत्र ही तो भाषा प्रसार का प्रमुख कारक होते हैं और देखा जाये तो उनसे ही भाषा में परिवर्तन आते हैं. लेकिन ऐसे परिवर्तन!! हिंदी में ऐसे परिवर्तनों से तो अच्छा है कि परिवर्तन ही न आएं.
[ हिंदी पत्रकारिता का एक अन्य नमूना दूसरी कतरन में. ]
प्रकाशकों ने लेखन को कभी फायदे का सौदा नहीं बनने दिया. मुनव्वर राणा ने एक बार कहा था कि हिंदी के सारे प्रकाशक बेईमान हैं. उनका कहा गलत भी मान लिया जाये तो भी अगर मुक्तिबोध की ही बात करें तो वो जीते जी कभी प्रकाशित लेखक नहीं हो पाए. पहली किताब मृत्यु के बाद आई. हमेशा दरिद्रता से घिरे रहे. वैसे पहली बार प्रकाशित होने के लिए लेखक को पैसे देने होते हैं, ये बात किसी से छिपी नहीं है. किताब से हुई आय का एक छोटा हिस्सा ही लेखक को मिलता है.
हिंदी की दशा का कारण उसे राष्ट्रीय भाषा बनाने की झक भी है. मुग़ल काल में फ़ारसी राज्य की भाषा थी. आज देखने को नहीं मिलती, क्यूंकि कोई भी भाषा थोप कर राष्ट्रीय भाषा का दर्ज़ा अभी प्राप्त नहीं करती. असल में न तो हम अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के शब्द लेना चाहते हैं. हमपे 'शुद्धिकरण' हावी है. न देशज शब्दों को हिंदी के अंतर्गत दर्ज़ा देना चाहते हैं. फिर उसके भी बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते हैं.
अगर हिंदी को अपने हाल पर छोड़ दें तो शायद वो ज्यादा पनपती, क्यूंकि उसका विरोध जिस तरह से अभी तमिलनाडु और कर्नाटक में हो रहा है वैसा नहीं होता. जबरन किया गया प्रसार विरोध ही ले के आता है.
भारत की कोई आधिकारिक राष्ट्रभाषा नहीं है और संविधान में उल्लिखित 'सरकार हिंदी का प्रचार-प्रसार करेगी' को भी हमें हटा देना चाहिए. ये न सिर्फ हिंदी बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिए भी अच्छा ही होगा.
'हिंदी दिवस' की शुभकामनाएं. वैसे ये औपचारिकता भी हिंदी की दुर्दशा स्वतः व्यक्त करती है.
[ फोटो आशीष चौधरी जी और बीएस पाब्ला जी की फेसबुक टाइमलाइन से ]
यह लेख इसलिए भी लिखा जा रहा है क्यूंकि मैं इन दिनों हिंदी का छात्र हूँ और इसलिए भी की हिंदी पे लिखना अब जरूरी सा हो गया है. उस दौर में जब 'राइट विंग' हिंदी के शुद्धिकरण की बात कर रही है, नए लेखकों की नई वाली जमात पैदा हो रही है और हिंदी को पढ़ना, हिंदी माध्यम में पढ़ना बस मजबूरी के सिवा कुछ भी नहीं बचा है.
सच तो ये है, भाषा के हाल बेहाल उसके बोलने वालों से नहीं होते; होते हैं तो उसको लिखने वालों से और उन सरकारों से जो इसे 'गवर्न' करती हैं, नियम कायदे और ये शब्द गढ़ती हैं. मैं पाब्लो नेरुदा को पढ़ने स्पेनिश सीखने तैयार हो सकता हूँ, इब्ने इंशा को पढ़ने शायद उर्दू पढ़ना सीख लूँ या टैगोर को पढ़ने बंगाली. लेकिन हिंदी को पढ़ने कौन हिंदी सीखने तैयार होगा? सच तो ये है प्रेमचंद के बाद कोई ऐसा लेखक शायद ही हुआ हो जिसे पढ़ने लोग हिंदी सीखना चाहें... और 'जीवित' प्रेमचंद तो खुद भी ऐसे लेखक नहीं थे, मरने के बाद बने. (क्यूंकि हम मृत्युपूजक, दरिद्रपूजक समाज हैं.)
नेट पे छानिये, सरकारी हिंदी के शब्दकोष की एक पीडीऍफ़ मिलेगी. कुल 660 पेजों वाली. अब मुझे बताओ इतने सारे शब्द कब और कैसे गढ़ लिए गए... और गढ़े भी गए तो प्रचारित क्यों नहीं किये गए, या हो पाए?
सच तो ये की सरकारी हिंदी आम आदमी से उतनी ही दूर है जितना की हमारे प्रधानमंत्री एक आम इंसान से होते हैं. फलत: अंग्रेजी के शब्द हिंदी से आसान लगने लगते हैं और लोग उन्हीं को पढ़ते और प्रचारित करते हैं.
एक प्रश्न लेखकों से किया जा सकता है (हालाँकि मैं खुद लिखने की कोशिश करता हूँ) . प्रश्न आसान सा है, कि भाइयो गुटों से कब बाहर आओगे और गलियां देना, खाना कब बंद करोगे? और ये दरिद्र-नारायण पूजन को भी ख़त्म होना जरूरी नहीं है?
कुमार विश्वास को गाली देते कई लोग उनसे उन्नीस ही लिखते हैं. जावेद साहेब, गुलज़ार साहब के फिल्मी गीत कभी साहित्य में शामिल ही नहीं किये गए और वहां बॉब डायलन नोबेल पा चुके हैं.
समस्या सिर्फ प्रगतिशील लेखक संघ की नहीं है, न उसके मुक्तिबोध का जन्मदिन मनाने का बहिष्कार करने की. असली समस्या तो ये है कि मुक्तिबोध का हिंदी बोलने वाली 95% जनता ने नाम ही नहीं सुना है और नई पीढ़ी में से तो 99% ने न सुना होगा. मैंने खुद 'अँधेरे में' उनकी सबसे प्रसिद्द कविता 24 की उम्र में प्रथम दफ़े पढ़ी थी. मुझे लगता है विश्व की अन्य जगहों पर भी 'प्रोग्रेसिव रायटर्स एसोसिएशन्स' धूल खाते हुए ही पड़ी होंगी. मुझे भी नहीं पता था कुछ दिन पहले तक की ये भारत में ज़िंदा बची है.
फ़िलहाल 500 पुस्तकें बिकने के बाद 'बेस्ट सेलर' होने वाले हिंदी लेखकों और 660 पन्नों का सरकारी हिंदी का शब्दकोष निकालने वाली सरकार को 'हिंदी' के बारे में सोचने की ज़रूरत है.... नहीं तो कुछ वर्षों में हम हिंदी में ही 'हिंदी' ढूंढ़ रहे होंगे.
बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि शिक्षक बहुत कम काम करते हैं. हफ्ते में दस या बारह कक्षा उनके हिसाब से मज़ाक हैं. जैसे वे वैसे ही सरकारें शिक्षकों के सिर्फ दस-बारह कक्षाओं के काम को देखते हुए उनकी तनख्वाह का कोई तर्क समझ नहीं पातीं. ऊपर से दो महीने की गर्मियों की छुट्टियां शिक्षकों से और भी जलन का कारण बन जाती हैं. वैसे, छुट्टियों के दौरान जब कक्षाएं बंद हो जाती हैं, अध्यापकों को आराम रहता हो, ऐसा नहीं. परीक्षा समाप्त होने के बाद उत्तर पुस्तिकाओं की जांच से लेकर नए सत्र के लिए दाखिलों में वे किसी न किसी में व्यस्त ही रहते हैं. इसलिए दो महीने का अवकाश एक मिथ है.
पढ़ाई या कक्षा को लेकर एक प्रकार की मूढ़ समझ नेताओं और नौकरशाहों में पाई जाती है. मसलन कई लोग कहते मिल जाएंगे कि एक विभाग में क्या ज़रूरी है कि दस बीस अध्यापक हों. क्यों नहीं एक ही अध्यापक दिन में चार कक्षाएं ले सकता. विशेषज्ञता का तर्क उन्हें नकली और बकवास लगता है.
विश्वविद्यालयों में इतने किस्म के दफ्तरी काम हैं जो अब शिक्षकों के हवाले कर दिए गए हैं. सचिव स्तर की सहायता कम से कम की जा रही है. इस वजह से आपको अध्यापक वे काम करते मिल जाएंगे जो पहले कार्यालय में सचिव किया करते थे.
भारत में अध्यापकों के काम को ठीक तरीके से समझा नहीं गया है. इसलिए केंद्रीय संस्थाओं को यदि छोड़ दें तो राज्यों में अवकाश में लगातार कटौती और तनख्वाह पर सरकारी निगाह की सख्ती बढ़ती चली जाती है. प्रायः राज्य सरकारें उन्हें सरकारी कर्मचारियों के बराबर वेतन के लायक नहीं मानतीं. बहुत रो-धोकर और हील-हुज्जत के बाद वे केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों को उनके लिए लागू करने पर तैयार हो पाती हैं.
शिक्षक को एक कक्षा के लिए चार से छ घंटे की तैयारी चाहिए और एक बार की तैयारी काफी नहीं, यह समझाना भी कठिन है. बाहर के अध्यापक यह सुनकर हैरान हो जाते हैं कि यहां एक अध्यापक के पास दस कक्षाएं हैं!
अध्यापन क्यों एक अलग किस्म का काम है? क्यों ज्ञान का स्थानांतरण मात्र पर्याप्त नहीं? ज्ञान सृजन उनका प्राथमिक दायित्व है. किसी भी क्षेत्र में ज्ञान की अब तक उपलब्ध सामग्री से छात्रों को परिचित कराना उनका काम ज़रूर है लेकिन उसके साथ अपना संबंध बनाना और उसके प्रति अपना नज़रिया विकसित करना एक ज़्यादा श्रम साध्य काम है और मौलिकता वहां पैदा होती है. इसलिए जो यह समझते हैं कि पीएचडी के बाद फिर पढ़ने की ज़रूरत नहीं, वे ज्ञान के व्यापार की समझ नहीं रखते. वैसे उनकी इस समझ के लिए हम अध्यापक भी जिम्मेदार हैं क्योंकि साल दर साल हममें से कई एक ही बात दुहराते चले जाते हैं.
नएपन और ताजगी के लिए शोध और निरंतर अध्ययन आवश्यक है और उसके लिए संसाधन चाहिए. क्यों हमारे प्रबंधन संस्थान या आईआईटी अपने शिक्षकों के लिए ये साधन मुहैया करा सकते है और क्यों विश्वविद्यालय नहीं? क्यों राज्यों के शिक्षकों के लिए इस प्रकार की बात सपना ही है?
अध्यापक नामक संस्था का निरंतर क्षरण आम चर्चा का विषय होना चाहिए लेकिन नहीं हो पाता. राज्यों में ढाई सौ रुपया प्रति कक्षा या पंद्रह से पच्चीस हजार रुपया प्रति माह पर सेवानिवृत्त अध्यापकों से अथवा रोजगार की तलाश में भटक रहे युवाओं से काम लेने में सरकारों को फायदा नज़र आता है और समाज को कोई उज्र (आपत्ति) नहीं.
दिल्ली विश्वविद्यालय में यह क्षरण एक दूसरे रूप में भी दिखलाई पड़ता है. हर सत्र की शुरुआत में अध्यापकों की एक बड़ी फौज सांस रोककर इंतजार करती है कि उसे फिर से बहाल किया जाएगा या नहीं. ये खुद को और बाकी सब भी इन्हें एढॉक (तदर्थ) कहते हैं. बरसों के रोजाना इस्तेमाल के चलते यह शब्द अब हिंदी का हो चुका है. ये वे हैं जिन्हें चार-चार महीने के लिए नियुक्त किया जाता है और जिन्हें यह नहीं मालूम होता कि नए सत्र में वे वापस लिए जाएंगे या नहीं. यह अनिश्चितता उनकी आत्म छवि के साथ क्या करती है, इसपर न तो कोई शोध हुआ है न अध्ययन. जब वे काम करते भी रहते हैं तो अलग से दिखलाई पड़ते हैं और प्रशासन से लेकर स्थायी शिक्षक तक इन्हें बंधुआ मानते हैं जिनसे हर तरह का काम लिया जा सकता है.
क्यों दिल्ली विश्वविद्यालय में यह तदर्थ व्यवस्था स्थायी हो चुकी है? क्या इसमें सिर्फ प्रशासन का दोष है या सभी शिक्षक संगठनों का स्वार्थ भी उन्हें अनिश्चय में रखने में ही है ताकि वे उनके स्थायी मुवक्किल बने रह सकें जिनके लिए वे संघर्ष करते हुए दिखाई पड़ते हैं. एक वक्त था जब किसी स्थायी पद पर अस्थायी बहाली अधिकतम छह महीने के लिए ही हो सकती थी, फिर उसे स्थायी तौर पर भरना होता था लेकिन धीरे धीरे अस्थायित्व ही नियम बन गया. जब इन तदर्थ अध्यापकों को जनतांत्रिक अधिकार के नाम पर डूटा के चुनाव में मतदान का अधिकार दे दिया गया तो फिर प्रतिद्वंद्वी संगठनों के लिए वे एक ऐसा वोट बैंक बन गए जिसे वे असुरक्षित रखकर ही लाभ ले सकते हैं.
इनमें से कई स्थायी हो पाते हैं और कई नहीं. लेकिन इस क्रम में जो संस्कृति विकसित होती है वह सिर्फ इन तदर्थ अध्यापकों पर ही असर डालती हो, ऐसा नहीं. उससे कॉलेज और विश्वविद्यालय का वातावरण प्रभावित होता है. इन अध्यापकों में से अधिकतर का पूरा ध्यान स्थायित्व हासिल करने पर रहे तो इसमें क्या इन्हें दोषी माना जाए? अगर यह समझ नौजवानों में बने कि पढ़ने-लिखने से अधिक समय सही किस्म का संपर्क बनाने में लगाना चाहिए तो यह कैसे गलत है?
यह समस्या लेकिन सिर्फ भारत की नहीं. यूरोप और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में कम से कम खर्चे पर अधिक से अधिक अध्यापन का काम लेने में सरकारों और प्रशासन के यकीन से अब कुली अध्यापकों की बड़ी फौज बन चुकी है.
अध्यापकों से छुटकारा पाने का एक तरीका ऑनलाइन अध्यापन के मूक्स नामक संस्करण से पैदा हुआ है. किसी विषय के एक माहिर अध्यापक से व्याख्यानों की श्रृंखला तैयार कर उसे ऑनलाइन उपलब्ध कराने पर न इमारत की दरकार रहती है न अध्यापकों की. मात्र कुछ सहायकों से काम चल सकता है. भारत की सरकारें इससे काफी प्रभावित हुई हैं और एक विकल्प के तौर पर इसे प्रोत्साहित करने में लगी हैं. यह वे श्रेष्ठता के नाम पर कर रही हैं.
हम श्रेष्ठता के इस तर्क की जांच इससे कर सकते हैं कि जो नेता या नीति निर्माता देश की जनता के के लिए इसे लाभकारी मानते हैं तो वे क्यों अपने बच्चों को आईवी लीग (अकादमिक श्रेष्ठता का प्रतीक) विश्वविद्यालयों में भेजना चाहते हैं?
शिक्षा में काफी कुछ चर्चा करने को है लकिन अध्यापक एक ऐसा विषय है जिसपर ठहर कर सोचने के लिए हमें समय निकालना ही चाहिए.
निजता प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है. राज्य उस पर दावा नहीं कर सकता. वह उसे यह नहीं बता सकता कि वह क्या खाए, क्या पहने, क्या पढ़े, कैसे रहे. वह उसकी ज़िंदगी में बेरोकटोक तांकझांक नहीं कर सकता, न उससे यह मांग कर सकता है कि वह खुद से जुड़ी हर जानकारी राज्य के हवाले कर दे. कुल मिलाकर व्यक्ति खुदमुख्तार है.
व्यक्ति अपना विचार बना सकता है और उसे व्यक्त भी कर सकता है. उसे ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता.
व्यक्ति के जीने का अधिकार तो मौलिक है लेकिन वह अर्थपूर्ण तभी है जब वह इज्जत के साथ जी सके. अगर मैं हमेशा दूसरे की निगरानी में रहने को मजबूर हूं तो जाहिर है मैं ससम्मान जीवन नहीं जी रहा.
24 अगस्त, 2017 को आज़ाद भारत के न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन की तरह याद किया जाएगा. इसलिए कि भारत की सबसे बड़ी अदालत ने एकमत से भारत के नागरिकों के सबसे पवित्र अधिकार को राज्य के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण बना दिया.
निजता को व्यक्ति का अधिकार घोषित करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले का जश्न ठीक ही मनाया जा रहा है. लेकिन उस उल्लास में हम भूल रहे हैं कि यह सब कुछ इसलिए है कि अब राज्य वह बन चुका है जो अपने नागरिकों को अपना मातहत मानता है और उनकी जिंदगियों पर कब्जा करने पर आमादा है. अभी तो उच्चतम न्यायालय ने उसकी इस सोच पर चोट कर दी है लेकिन यह मानना एक तरह की खुशफहमी होगी कि हर बार वह हमारी ढाल बन ही पाएगा.
उन तर्कों को देखें जो सरकार ने वैयक्तिक निजता को अधिकार माने जाने के खिलाफ दिए थे तो राज्य की मानसिकता का पता चलता है. उसने कहा कि निजता का तर्क आभिजात्यवादी है. यह तर्क अजीब है लेकिन ध्यान देने योग्य है. इन दिनों आभिजात्य होने को एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. प्रत्येक परिष्कृत विचार या आचरण को अभिजात या आभिजात्यवादी कहकर उसे तिरष्कृत कर दिया जाता है. या, अगर किसी विचार पर हमला करना हो तो पहले उसे अभिजात कह दिया जाता है.
सरकार ने अदालती फैसले के बाद यह कहना शुरू किया है कि यह दरअसल उसके ख्याल की ही तस्दीक है और अदालत में उसके वकील ने जो कुछ भी कहा था वह बस, कचहरी की बहस में हुई नोंकझोंक या बाता-बाती का हिस्सा है.
अदालत में सरकार के विचार या उसके रुख को उसका वकील ही सामने रखता है और अपनी दलील उसके निर्देश से पेश करता है. यह कहना कि वह तो यों ही बहस में मीर बनने को कह दिया गया था और उसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए, इसलिए चिंता का विषय है कि इसके मायने यह भी निकलते हैं कि हमारा सामना एक गैरजिम्मेदार सरकार से है.
अखबारों और कई लोगों ने ठीक ही पिछले तीन सालों में सरकार की दलीलों का रिकॉर्ड सामने रखकर सरकार के क़ानून मंत्री के इस दावे को मिथ्या बताया है कि सरकार तो शुरू से ही निजता को नागरिकों का मौलिक अधिकार मान रही थी. ठीक ही पूछा गया है कि अगर ऐसा था तो फिर छह लोगों को अदालत की गुहार ही क्यों लगानी पड़ी? यह मुक़दमा ही क्यों हुआ?
सरकारी वकील ने कहा कि भारत के नागरिक यह दावा नहीं कर सकते कि उनके शरीर पर उनका अधिकार पूर्ण है. मैं अपने शरीर, या उसके अंगों की जानकारी किसे दूं न दूं, यह मेरा निर्णय होगा. लेकिन सरकार का कहना यह था कि वह मेरे शरीर के बारे में निर्णय कर सकती है.
सरकारी तर्क यह था कि निजता वस्तुतः एक आभिजात्यवादी विचार है जो भारत के लिए अजनबी है. चूंकि भारत में रहने वाले अधिकतर गरीब हैं, इसलिए यह उन पर या उनके संदर्भ में लागू नहीं होता. यह तर्क अजीबोगरीब तो है ही, बहुत खतरनाक भी है. यह निजता या स्वतंत्रता के अधिकार के साथ-साथ एक तरह से समानता के अधिकार के साथ भी राज्य का खिलवाड़ है
यह याद रखने की ज़रूरत है कि किसी वक्त भारतीयों की गरीबी, उनकी अशिक्षा को कारण बताया गया था अंगरेज़ हुक्मरानों के द्वारा यह कहने के लिए कि वे आज़ादी जैसी चीज़ को बरतने के काबिल नहीं हैं. अशिक्षित व्यक्ति जनतंत्र जैसे विचार को भी नहीं समझ सकता. अब बताया जा रहा है कि गरीब लोगों के लिए निजता का कोई मतलब नहीं है.
मेरी गरीबी को मेरी संप्रभुता का हरण करने का तर्क कैसे बनाया जा सकता है! मेरी गरीबी कोई मेरा अस्तित्वगत गुण या अवगुण नहीं, वह नितांत ही सामाजिक है. जिसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं, उसे मेरे खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
गरीबी को एक तर्क की तरह इस्तेमाल किया जाता है अनेक प्रसंगों में व्यक्ति के जीवन में राजकीय हस्तक्षेप को जायज़ ठहराने के लिए. वह यह तय कर सकता है कि वह कितने बच्चे पैदा करे, यह कि वह कितनी कैलोरी ऊर्जा ले, यह कि किस तरह के घर में वह रहे. जब सरकार यह कहने लगती है कि स्कूल के दोपहर के खाने में बच्चे अंडे न खाएं, वह तय करेगी कि प्रोटीन का ज़रिया क्या होगा, तो वह उनकी निजता में ही दखल दे रही होती है.
समृद्ध या अमीर लोगों की तो कामनाएं होती हैं, गरीबों को वह अधिकार नहीं. यही बहस कार्ल मार्क्स आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों में कर रहे हैं कि मैं अपने श्रम का कैसे इस्तेमाल करूं और उसकी कीमत भी कितनी तय करूं, अगर यह मेरे बस में नहीं तो यह माना जाना चाहिए कि मुझसे मेरा आपा ही छीन लिया गया है.
निजता किसी दूसरे अधिकार के तहत नहीं है, वह अपने आप में वह संपूर्ण है, यह इस फैसले ने साफ़ किया. सरकार यह दलील दे रही थी कि अभी संविधान में इसे मौलिक अधिकार नहीं मना गया है. अदालत ने साफ़ कहा कि व्यक्ति राज्य की सृष्टि नहीं है और अगर कोई बात संविधान में अभी वर्णित नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसे लेकर दावा ही नहीं किया जा सकता.
निजता का यह अधिकार अब हमारा बुनियादी हक है. लेकिन यह कोई अदालत का प्रसाद भी नहीं है. ध्यान रहे कि अदालत को इस निर्णय के लिए प्रेरित करने के लिए छह लोग सरकार के खिलाफ अदालत में गए. उनके नाम जानना और उन्हें शुक्रिया अदा करना हर भारतीय का फ़र्ज़ है.
न्यायमूर्ति पुत्तुस्वामी के अलावा कल्याणी मेनन सेन, शांता सिन्हा, सुरेश वोमबातकेरे, डॉक्टर अनुपम सराफ, निखिल दे और बेजवाड़ा विल्सन ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और कहा कि निजता को एक हिंदुस्तानी से छीना नहीं जा सकता. इनमें से अधिकतर वे हैं जो गरीबों के साथ काम करते हैं. विल्सन तो उस तबके के लिए काम करते हैं जो भारत की गंदगी साफ़ करता रहा है. पिछले एक महीने में दिल्ली जैसे शहर में गटर साफ़ करते हुए इनमें से छह की मौत हो चुकी है.
याद रहे ये उन लोगों में हैं जिन्हें तिरस्कारपूर्वक मानवाधिकार कार्यकर्ता या झोलावाला गिरोह कहा जाता है. इन्हें और इनके संगठनों को अक्सर सबसे ज़्यादा सरकारी हमले का सामना करना पड़ता है. इनके चरित्र हनन का अभियान अक्सर चलाया जाता है.
यह भूलना मुश्किल है कि भारत के प्रधानमंत्री ने हमारे न्यायाधीशों को ही लज्जित करने की कोशिश की थी यह कहकर कि वे कभी-कभी फाइव स्टार एक्टिविस्टों के चक्कर में आ जाते हैं. इस मामले में कम से कम अदालत ने इन्हीं फाइव स्टार एक्टिविस्टों की दलीलों पर मुहर लगाई है.
मैं तुम्हें फिर मिलूंगा दंडकारण्य के उन जंगलों में (अगर इंसान ने अंतिम पेड़ भी न काट लिया तो.) जहाँ शेर और भालुओं के बीच हरी नदी का कंचन पानी पिया था हमने.
मैं तुम्हें फिर मिलूंगा अमल-धवल शिखरों के पार (अगर आखिरी पर्वत भी सपाट होने से बचा रहा.) जहाँ सुनहरी डूब पर लेते हमने प्रथम बार आलिंगन किया था.
मैं तुम्हें फिर मिलूंगा
तमिलनाडु के तटों पर
(अगर तेल रिसाव से बचे रह गए वे)
जहाँ की रेत पर बैठ हमने बुने थे
सपने हरी धरती के.
मैं तुम्हें फिर मिलूंगा
उत्तरी ध्रुव की सफ़ेद चादर पर बैठा
(अगर ग्लोबल वार्मिंग से बचा रह गया बर्फ का आखिरी टुकड़ा.)
जहाँ सफ़ेद भालुओं के झुण्ड
हमारे संग खेलते-मचलते थे.
मैं तुम्हें फिर मिलूंगा
किसी सागर में मछलियों संग तैरता
(अगर आखिरी मछली भी न निगल गया इंसान)
जहाँ के खारे जल में
तुमने प्रथम दफे चूमा था मुझे.
मैं मनु- 'मनुज जन्मदाता' वादा करता हूँ
मैं तुम्हें फिर मिलूंगा 'श्रद्धा'
इसी धरती पर
जहाँ बच्चे जने थे हमने
जहाँ सृष्टि रची थी अपनी हमने,
जब आकाश नीला हुआ करता था,
धरती हरी
और पानी कंचन.
अगर उन बच्चों ने बची रहने दी धरती.
कुकृत्यों से उनके
पूर्णत: तबाह न हुई तो,
मैं तुम्हें फिर मिलूंगा.
*मनु और श्रद्धा मानव के प्रथम पूर्वज हैं. 'जयशंकर प्रसाद' के महाकाव्य 'कामायनी' के प्रमुख चरित्र.
जब धर्म को राजनीति और राजनीति को धर्म की शह मिलती है, आम नागरिक ठगा जाता है.
हमारे दिल रेप पीड़िता के लिए नहीं चीत्कारते, न ही गोरखपुर 70 बच्चों की मौत पर लेकिन हम एक अपराधी के खातिर मरने- मारने पे उतारू हो जाते हैं.
दरअसल जनता जैसी होती है उसे वैसे ही राजनेता मिलते हैं और वैसे ही गुरु. इसलिए हमारे लोकतंत्र के मंदिर (संसद) में 33% जघन्य अपराधी हैं और लोकनिर्माता के घर (मंदिर) में ऎसे बाबा.
बाबा और ये 30 मौतें असल में हमारी सोच और समझ की प्रतिकृति हैं और हमारे समाज की नग्न तस्वीर.
कॉमन सेंस बड़ी रेयर (दुर्लभ) चीज है. शायद इसलिए तीन तलाक़ जैसे फैसले 2017 तक का इंतज़ार करते हैं और उसपर भी दो 'हाइली क्वालिफाइड' (अत्यधिक योग्य) जज अपने पूर्वाग्रह नहीं छोड़ पाते. सदियों से चली आ रही रीति-रिवाज-मान्यताएं-धारणाएं जरुरी नहीं सही ही हों. अगर होतीं तो हम दलित-उत्थान के लिए प्रयासरत नहीं होते, न ही सती प्रथा ख़त्म हुई होती. ये नहीं है कि बस यही एक कुरीति थी. अभी कई बाकि हैं. हर धर्म में ही. क्यूंकि कुरीतियां मज़हब देख के नहीं बनतीं. वे एक निश्चित वक़्त का समाज देख के बनती हैं, जिन्हें बाद में आने वाली पीढ़ियां फॉलो (पालन) करती रहती हैं... और वे कुरीतियां सदियों तक चलती रहती हैं. फिर हटाओ तो विरोध इसलिए होता है कि वो सदियों से चली आ रही थी. जरूरी नहीं हमारे बाप-दादाओं ने जो किया वो सही हो और जो हम आज करें वो कल के वक़्त के हिसाब से सही हो. क्यूंकि नैतिकता वक़्त और समाज दोनों के हिसाब से बदलती है... और इसलिए किसी भी रीति का बदलना भी जरूरी है... नहीं तो वो कुरीति में परिणित हो जाएगी. विरोध इस निर्णय का नहीं बल्कि इस बात का होना चाहिए कि ये निर्णय इतनी देरी से क्यों आया. इतिहास गवाह है जितना समाज और धर्म का बेड़ागर्क धर्मगुरुओं ने किया है उतना शायद ही किसी ने किया हो. भोपाल में होने वाली मौलवियों की मीटिंग कितना करेगी, देखने वाली बात होगी.