Monday, January 2, 2017

पढना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो

साल का पहला दिन होने के अलावा 1 जनवरी नुक्कड़ नाटक आंदोलन के प्रतिनिधि चेहरे - सफदर हाशमी - का शहादत दिवस भी है. दिल्ली के पास साहिबाबाद मे नुक्कड़ नाटक-हल्ला बोल- करते हुए कांग्रेसी गुंडों ने उन पर हमला किया और 1 जनवरी 1989 को उनकी शहादत हो गयी. नुक्कड़ नाटक करते हुए शहीद होने से पहले भी उन पर और उनकी नाट्य टीम-जन नाट्य मंच पर कई बार पुलिस और गुंडों ने हमला किया था. आज जब अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर नए सिरे से हमले तेज हो रहे हैं तो सफदर हाशमी की शहादत को याद करना समीचीन होगा. सफदर हाशमी से उत्तराखंड का एक संबंध यह भी रहा है कि 1976 मे गढ़वाल विश्वविद्यालय मे अँग्रेजी के प्राध्यापक रहे थे. उस दौर पर डा.प्रभात उप्रेती ने एक बेहतरीन पुस्तक - सफदर : एक आदमक़द इंसान- लिखी है. सफदर को उनके शहादत दिवस पर याद करते हुए उनकी यह बहुचर्चित कविता प्रस्तुत है -

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
ओ सड़क बनाने वालो, ओ भवन उठाने वालो
खुद अपनी किस्मत का फैसला अगर तुम्हें करना है
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलने वालो
अगर देश की बागडोर को कब्ज़े में करना है
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
पूछो, मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं?
पूछो, माँ-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं?
पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा
पढ़ो, किताबें कहती हैं – सारा संसार तुम्हारा
पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है
पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो

( कबाड़ख़ाना ब्लॉग से )

Friday, December 30, 2016

यह एक निःशक्त कविता है

यह एक निःशक्त कविता है
जो युद्ध की बात नहीं कर सकती
स्वतंत्रता की अलख नहीं जगा सकती
क्योंकि स्वतंत्रता तो
सत्तर साल पहले दिल्ली की गलियों में
घोषित हो चुकी है.
यह एक निःशक्त कविता है
क्योंकि ये
जनता का, जनता को, जनता द्वारा
हो रहे इस शासन में
गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा
से स्वतंत्रता की बात नहीं कर सकती,
सब जगह लोग देशद्रोही का ठप्पा लगाने घूम रहे हैं.
लोकतंत्र में अपनी सरकार के खिलाफ बोलना वर्जित है,
लोकतंत्र एक सबसे बड़ी दुविधा है,
यह एक निःशक्त कविता है.

मैं प्रेरणाओं की बातें नहीं कर सकता
जूनून और बदलावों की बातें नहीं कर सकता
ये कपडा इतना फट गया है की
थिंगरे लगाने से ये सुधर नहीं पायेगा,
देश सिर्फ बातों से असर नहीं पायेगा.
शोषण, पतन, गरीबी पर लिखना
और थप्पड़ खाने से परे,
प्रेमिका के केशों पर लिखना सुविधा है,
यह एक निःशक्त कविता है.

दुनिया तवायफों की नींदों जैसी है
पूँजीवाद कस्टमर सा है
उम्मीद बूचड़खाने में अपना इंतज़ार कर रही है
सीरिया आँखें नुचने तक रो रहा है.
जो जल रही है, वो आग सीने की नहीं है
किसी क्रन्तिकारी कवि की चिता है,
यह एक निःशक्त कविता है.

हर निराश में उजास भरना जरूरी है
'अंत भला, सब भला' करना जरूरी है,
इसलिए 'प्रेमिका की सांसे सागर की लहरें हैं,
प्रेमिका के गाल अमेरिका की चिकनी सड़कें हैं,
प्रेमिका की आँखों में थेम्स का साफ़ जल है,
प्रेमिका के दिल में मिसिसिपी की कलकल है,
प्रेमिका का यौवन लोकतंत्र सा नया है,
प्रेमिका का ज्ञान डिजिटल रेवोलुशन सा खरा है.
प्रेमिका का चेहरा चाँद सा है.'

रुको! चाँद तो आर्मस्ट्रॉन्ग के पैरों तले कुचला गया है!
इसीतरह प्रकृति पैरों तले कुचली गई
मानवता तकनीक तले कुचली गई है
सीरिया, लीबिया के मुंह जुबानी नहीं है,
जैसे शादी के बाद रेप की मनाही नहीं है!
सॉरी! अंत तक उजास, उम्मीद न भर सका
कवि बेचारगी लिए दुल्हन का पिता है
ये वर्ष की की आखिरी कविता है
वर्ष की तरह, यह भी एक निःशक्त कविता है.

Tuesday, December 27, 2016

गरीबी

गरीबी भूख है
गरीबी बीमार होना और
डॉक्टर को न दिखा पाने की विवशता है,
गरीबी स्कूल न जा पाना और
निरक्षर रह जाना है.
या पढ़-लिख जाना
पर नैतिक मूल्यों का न आ पाना है.
गरीबी सड़क पे लड़की छेड़ना है
डॉक्टर का बेईमान हो जाना है.

गरीबी नैतिकता का पतन है.
गरीबी भूख है,
गरीबी सिर्फ भूख ही नहीं है.

गरीबी बेरोज़गारी है
भविष्य के प्रति भय है,
दिन में बस एक बार भोजन पाना है
या दूसरी बार पाने बेईमान हो जाना है.
गरीबी मजबूर हो जाना है,
गरीबी रोज़गार में स्वाभिमान खोना है.

गरीबी बेरोज़गारी है,
गरीबी तिल-तिल मारती रोज़गारी है.

गरीबी अपने बच्चे को
उस बीमारी से मरते देखना है,
जो अस्वच्छ पानी पीने से हुई है.

गरीबी खुद के सरकारी-शौचालय को
गोदाम बनाना,
और शौच बाहर को जाना है.
गरीबी ट्रैन के टॉयलेट में बैठ
सफर करके आना है.

गरीबी अस्वच्छ में रहना है
गरीबी अस्वच्छता फैलाना है
गरीबी अस्वछता से अस्वस्थ होना है.

गरीबी
शक्ति, प्रतिनिधित्वहीनता,
स्वतंत्रता की हीनता का नाम है.
और गरीबी पैसे के बदले वोट डालने जैसे काम है.

गरीबी डरना है
गरीबी मरना है
गरीबी स्वतंत्रता की हीनता है
विकल्पों की दीनता है
गरीबी पराधीनता है.

गरीबी स्वाभिमान का पतन है
कहीं मजबूरी,
तो कहीं स्वजनित है, स्व-जतन है.
गरीबी खोखला होना है,
गरीबी अंदर के आदमी का पतन है.

Inspired from the writings of Shaheen Rafi Khan, Damian Killeen and Amartya Sen

Monday, December 26, 2016

भाषा और पर्यावरण / अनुपम मिश्र

किसी समाज का पर्यावरण पहले बिगड़ना शुरू होता है या उसकी भाषाहम इसे समझ कर संभल सकने के दौर से तो अभी आगे बढ़ गए हैं. हम विकसित हो गए हैं.

भाषा यानी केवल जीभ नहीं. भाषा यानी मन और माथा भी. एक का नहींएक बड़े समुदाय का मन और माथाजो अपने आसपास के और दूर के भी संसार को देखनेपरखनेबरतने का संस्कार अपने में सहज संजो लेता है. ये संस्कार बहुत कुछ उस समाज के मिट्टी,पानीहवा में अंकुरित होते हैंपलतेबढ़ते हैं और यदि उन में से कुछ मुरझाते भी हैं तो उनकी सूखी पत्तियां वहीं गिरती हैंउसी मिट्टी में खाद बनाती हैं. इस खाद यानी असफलता की ठोकरों के अनुभव से भी समाज नया कुछ सीखता है.

लेकिन कभीकभी समाज के कुछ लोगों का माथा थोड़ा बदलने लगता है. यह माथा फिर अपनी भाषा भी बदलता है. यह सब इतने चुपचाप होता है कि समाज के सजग माने गए लोगों के भी कान खड़े नहीं हो पाते. इसका विश्लेषणइसकी आलोचना तो दूरइसे कोई क्लर्क या मुंशी की तरह भी दर्ज नहीं कर पाता.

इस बदले हुए माथे के कारण हिंदी भाषा में ५०६० बरस में नए शब्दों की एक पूरी बारात आई है. बरातिये एक से एक हैं पर पहले तो दूल्हे राजा को ही देखें. दूल्हा है विकास नामक शब्द. ठीक इतिहास तो नहीं मालूम है कि यह शब्द हिंदी में कब पहली बार आज के अर्थ में शामिल हुआ होगा. पर जितना अनर्थ इस शब्द ने पर्यावरण के साथ किया हैउतना शायद ही किसी और शब्द ने पर्यावरण के साथ किया हो.

विकास शब्द ने माथा बदला और फिर उसने समाज के अनगिनत अंगो की थिरकन को थामा. अंग्रेजों के आने से ठीक पहले तक समाज के जिन अंगों के बाकायदा राज थेवे लोग इस भिन्न विकास की अवधारणा के कारण आदिवासी कहलाने लगे. नए माथे ने देश के विकास का जो नया नक्शा बनायाउसमें ऐसे ज्यादतर इलाके पिछड़े शब्द के रंग से ऐसे रंगे गएजो कई पंचवर्षिय योजनाओं के झाड़ूपोंछे से भी हल्के नहीं पड़ पा रहे. अब यह हम भूल भी चुके हैं कि ऐसे ही पिछड़े इलाकों की संपन्नता सेवनों सेखनिजोंलौहअयस्क से देश के अगुआ मान लिए गए हिस्से कुछ टिके से दिखते हैं.

कुछ मुट्ठी भर लोग पूरे देश की देह काउसके हर अंग का विकास करने में जुट गए हैं. ग्राम विकास तो ठीकबाल विकासमहिला विकास सब कुछ लाईन में है.

अपने कोअपने समाज को समझे बिना उसके विकास की इस विचित्र उतावली में गजब की सर्वसम्मति है. सभी राजनैतिक दलसभी सरकारें फिर चाहे वे मिशन वाली हो या वर्ग संघर्ष वालीगर्व से विकास के काम में लगी हैं. विकास की इस नई अमीर भाषा ने एक नई रेखा भी खींची है – गरीबी की रेखा. लेकिन इस रेखा को खींचने वाले संम्पन्न लोगों की गरीबी तो देखिए कि उनकी तमाम कोशिशें रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या में कमी लाने के बदले उसे लगातार बढ़ाती जा रही हैं.

पर्यावरण की भाषा इस सामाजिकराजनीतिक भाषा से रत्तीभर अलग नहीं है. वह हिंदी भी है यह कहते हुए डर लगता है. बहुत हुआ तो आज के पर्यावरण की ज्यादातर भाषा देवनागरी कही जा सकती है. लिपि के कारण राजधानी में पर्यावरण मंत्रालय से लेकर हिंदी राज्यों के कस्बोंगांवों तक के लिए बनी पर्यावरण संस्थाओं की भाषा कभी पढ़ कर तो देखें. ऐसा पूरा साहित्यलेखनरिपोर्ट सबकुछ एक अटपटी हिंदी से पटा पड़ा है.

कचरा शब्दों का और उन से बनी विचित्र योजनाओं का ढेर लगा है. इस ढेर को पुनर्चक्रित भी नहीं किया जा सकता. दोचार नमूने देखें. सन् १९८० से आठदस बरस तक पूरे देश में सामाजिक वानिकी नामक योजना चली. किसी ने भी नहीं पूछा कि पहले यह तो बता दो कि असामाजिक वानिकी क्या हैयदि इस शब्द कायोजना का संबंध समाज के वन से है,गांव के वन से हैतो हर राज्य के गांवों में ऐसे विशिष्ट ग्रामवनपंचायती वनों के लिए एक भरा पूरा शब्द भंडारविचार और व्यवहार का संगठन काफी समय तक रहा है.

कहीं उस पर थोड़ी धूल चढ़ गई थी तो कहीं वह मुरझा गया थापर वह मरा तो नहीं था. उस दौर में कोई संस्था आगे नहीं आई इन बातों को लेकर. मरु प्रदेश में आज भी मौजूद हैं ओरणएक शब्द जो अरण्य‘ से बना है. ये गांवों के वनमंदिरदेवी के नाम पर छोड़े जाते हैं. कहीं कहीं तो मीलों फैले हैं ऐसे जंगल. इनके विस्तार कीसंख्या की कोई व्यवस्थित जानकारी नहीं है. वन विभाग कल्पना भी नहीं कर सकता कि लोग ओरणों से एक तिनका भी नहीं उठाते.

अकाल के समय में ही इनको खोला जाता है. वैसे ये खुले ही रहते हैंन कटीले तारों का घेरा हैन दीवारबंदी ही. श्रद्धाविश्वास का घेरा इन वनों की रखवाली करता रहा है. हजारबारह सौ बरस पुराने ओरण भी यहां मिल जाएंगे. जिसे कहते हैं बच्चेबच्चे की जबान पर ओरण शब्द रहा है. पर राजस्थान में अभी कुछ ही बरस पहले तक सामाजिक संस्थाएं ही नहींश्रेष्ठ वन विशेषज्ञ भी या तो इस परंपरा से अपरिचित थे या अगर जानते थे तो कुछ कुतुहल भरेशोध वाले अंदाज में. ममत्व नहीं थायह हमारी परंपरा है ऐसा भाव नहीं था उस जानकारी में.

ऐसी हिंदी की सूची लंबी हैशर्मनाक है. एक योजना देश की बंजर भूमि के विकास की आई थी. उसकी सारी भाषा बंजर ही थी. सरकार ने कोई ३०० करोड़ रुपया लगाया होगा पर यह भूमि बंजर की बंजर ही रही. फिर योजना ही समेट ली गई. और अब सबसे ताजी योजना है जलागम क्षेत्र विकास की. यह अंग्रेजी के वॉटरशेड डेवलपमेंट का हिन्दी अनुवाद है. इससे जिनको लाभ मिलेगावे लाभार्थि कहलाते हैंकहीं हितग्राही भी हैं.

यूजर्स ग्रुप‘ का सीधा अनुवाद उपयोगकर्ता समूह भी यहां है. तो एक तरफ साधन संम्पन्न योजनाएं हैंलेकिन समाज से कटी हुई. जन भागीदारी का दावा करती हैं पर जन इससे भागते नजर आते हैंतो दूसरी तरफ मिट्टी और पानी के खेल को कुछ हजार बरस से समझने वाला समाज है. उसने इस खेल में शामिल होने के लिए कुछ आनंददायी नियम,परंपराएं और संस्थाएं बनाई थीं. किसी अपरिचित शब्दावली के बदले एक बिल्कुल आत्मीय ढांचा खड़ा किया था. चेरापूंजीजहां पानी कुछ गज भर गिरता हैवहां से लेकर जैसलमेर तक जहां कुल पांचआठ इंच वर्षा हो जाए तो भी आनंद बरस गया– ऐसा वातावरण बनाया.

हिमपात से लेकर रेतीली आंधी में पानी का कामतालाब में काम करने वाले गजधरों का कितना बड़ा संगठन खड़ा किया गया होगा. कोई चारपाँच लाख गांवों में काम करने वाले उस संगठन का आकार इतना बड़ा था कि वह सचमुच निराकार हो गया. आज पानी का,पर्यावरण का काम करने वाली बड़ी से बड़ी संस्थाएं उस संगठन की कल्पना तो करके देखें. लेकिन वॉटरशेडजलागम क्षेत्र विकास का काम कर रही संस्थाएंसरकारेंउस निराकार संगठन को देख ही नहीं पातीं. उस संगठन के लिए तालाब एक वॉटर बॉडी नहीं था. वह उसकी रतन तलाई थी. झुमरी तलैया थीजिसकी लहरों में वह अपने पुरखों की छवि देखता था. लेकिन आज की भाषा जलागम क्षेत्र को मत्स्य पालन से होने वाली आमदनी में बदलती है.

इसी तरह अब नदियां यदि घर में बिजली का बल्ब न जला पाएं तो माना जाता है कि वेव्यर्थ में पानी समुद्र में बहा रही हैं. बिजली जरूर बनेपर समुद्र में पानी बहाना भी नदी का एक बड़ा काम है. इसे हमारी नई भाषा भूल रही है. जब समुद्रतटीय क्षेत्रों में भूजल बड़े पैमाने पर खारा होने लगेगा तब हमें नदी की इस भूमिका का पता चलेगा.


लेकिन आज तो हमारी भाषा ही खारी हो चली है. जिन सरलसजल शब्दों की धाराओं से वह मीठी बनती थी उन धाराओं को बिल्कुल नीरसबनावटीपर्यावरणीयपरिस्थितिक जैसे शब्दों से बाँधा जा रहा है. अपनी भाषाअपने ही आंगन में विस्थापित हो रही है. वह अपने ही आंगन में पराई बन रही है.

Thursday, December 22, 2016

स्त्री के सपने


मेरे साथ जो स्त्री रहती है
वो सोती है, उसके सपने जागते हैं.
वो रोती है,
उसके सपने झरते हैं.
वो सीने से लगती है,
हिदायत देती सी लगती है,
कि उसके सपने न मरोड़ूँ.

मैं आदमी हूँ,
मेरा दम्भ
उसके सपनों पे धाड़ से पड़ता है
छनाक! उसके सारे सपने टूट जाते हैं.

वो एक आस लिए
फिर रोटी संग सपने बेलती है
चूल्हे पे आंच देती है,
कि मैं कायर किसी दिन
मर्द बनूँगा
और उसके सपने नहीं तोड़ूंगा.

मैं आदमी हूँ,
सभ्यता के आदि से कायर ही हूँ!

WW-I के घोड़े


तुम्हें चाहिए थी ज़मीनें
तुम्हें चाहिए थे राजपाट
तुम्हारी कलहें, तुम्हारी बंदूकें,
फिर हम क्यों मरे?
विश्वयुद्ध-एक के
मरे अस्सी लाख घोड़ों-खच्चरों का हिसाब दो मानव.
बताओ, तुम्हारी लड़ाई में हम क्यों मरे?
एक दिन
प्रार्थनाएं, तप, तमाम भागीरथी प्रयास कर
हम पाएंगे बुद्धि,
लेकिन तब भी
तुम्हारी नथों में न डालेंगे रस्सी.
न पीठ पे चढ़ दौड़ाएंगे तुम्हें,
अस्सी लाख क्या,
एक भी नहीं मरोगे तुम.
क्योंकि हम नहीं करेंगे कोई विश्वयुद्ध.
हम खुद में भी देंगे बराबरी का दर्ज़ा,
बाकि की तमाम नस्लों को भी.
उपनिवेशन, गुलामी और नस्लें पालतू बनाने से परे,
हम ऐसी बुद्धि चाहेंगे
जो समता, समरसता, समानता लाये-
नस्लों के परे, क्लासों के परे,
मुल्कों के परे, रंगों के परे.
हम तुम्हें जानवर नहीं कहेंगे मानव.

Wednesday, December 21, 2016

प्रलय का शिलालेख /अनुपम मिश्र


                        उत्तराखंड में हिमालय और उसकी नदियों के तांडव का
                        आकार प्रकार अब धीरेधीरे दिखने लगा है.
                        लेकिन मौसमी बाढ़ इस इलाके में नई नहीं है.
                        अनुपम मिश्र का सन 1977 में लिखा एक यात्रा वृतांत


सन् 1977 की जुलाई का तीसरा हफ्ता. उत्तरप्रदेश के चमोली जिले की बिरही घाटी में आज एक अजीबसी खामोशी है. यों तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा है और इस कारण अलकनंदा की सहायक नदी बिरही का जल स्तर बढ़ता जा रहा है. उफनती पहाड़ी नदी की तेज आवाज पूरी घाटी में टकरा कर गूंज भी रही है. फिर भी चमोलीबदरीनाथ मोटर सड़क से बाईं तरफ लगभग 22 किलोमीटर दूर 6,500 फुट की ऊंचाई पर बनी इस घाटी के 13 गांवों के लोगों को आज सब कुछ शांतसा लग रहा है.

आज से सिर्फ सात बरस पहले ये लोग प्रलय की गर्जना सुन चुके थेदेख चुके थे. इनके घरखेत व ढोर उस प्रलय में बह चुके थे. उस प्रलय की तुलना में आज बिरही नदी का शोर इन्हें डरा नहीं रहा था. कोई एक मील चौड़ी और पांच मील लंबी इस घाटी में चारों तरफ बड़ीबड़ी शिलाएंपत्थररेत और मलबा भरा हुआ हैइस सब के बीच से किसी तरह रास्ता बना कर बह रही बिरही नदी सचमुच बड़ी गहरी लगती है.

लेकिन सन् 1970 की जुलाई का तीसरा हफ्ता ऐसा नहीं था. तब यहां यह घाटी नहीं थी,इसी जगह पर पांच मील लंबाएक मील चौड़ा और कोई तीन सौ फुट गहरा एक विशाल ताल थाः गौना ताल. ताल के एक कोने पर गौना था और दूसरे कोने पर दुरमी गांवइसलिए कुछ लोग इसे दुरमी ताल भी कहते थे. पर बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए यह बिरही ताल थाक्योंकि चमोलीबदरीनाथ मोटर मार्ग पर बने बिरही गांव से ही इस ताल तक आने का पैदल रास्ता शुरू होता था.

ताल के ऊपरी हिस्से में त्रिशूल पर्वत की शाखा कुंवारी पर्वत से निकलने वाली बिरही समेत अन्य छोटीबड़ी चार नदियों के पानी से ताल में पानी भरता रहता था. ताल के मुंह से निकलने वाले अतिरिक्त पानी की धारा फिर से बिरही नदी कहलाती थी. जो लगभग 18 किलोमीटर के बाद अलकनंदा में मिल जाती थी. सन् 1970 की जुलाई के तीसरे हफ्ते ने इस सारे दृश्य को एक ही क्षण में बदल कर रख दिया.

दुरमी गांव के प्रधानजी उस दिन को याद करते हैं – “तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा था. पानी तो इन दिनों हमेशा गिरता हैपर उस दिन की हवा कुछ और थी. ताल के पिछले हिस्से से बड़ेबड़े पेड़ बहबह कर ताल के चारों ओर चक्कर काटने लगे थे. ताल में उठ रही लहरें उन्हें तिनकों की तरह यहां से वहांवहां से यहां फेंक रही थीं. देखतेदेखते सारा ताल पेड़ों से ढंक गया. अंधेरा हो चुका थाहम लोग अपनेअपने घरों में बंद हो गए. घबरा रहे थे कि आज कुछ अनहोनी हो कर रहेगी.” खबर भी करते तो किसे करतेजिला प्रशासन उनसे 22 किलोमीटर दूर था. घने अंधेरे ने इन गांव वाले को उस अनहोनी का चश्मदीद गवाह न बनने दिया. पर इनके कान तो सब सुन रहे थे.

प्रधानजी बताते हैं – “रात भर भयानक आवाजें आती रहीं फिर एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई और फिर सब कुछ ठंढ़ा पड़ गया.” ताल के किनार की ऊंची चोटियों पर बसने वाले इन लोगों ने सुबह के उजाले में पाया कि गौना ताल फूट चुका हैचारों तरफ बड़ीबड़ी चट्टानों और हजारों पेड़ों का मलबाऔर रेतहीरेत पड़ी है.

ताल की पिछली तरफ से आने वाली नदियों के ऊपरी हिस्सों में जगहजगह भूस्खलन हुआ थाउसके साथ सैकड़ो पेड़ उखड़उखड़ कर नीचे चले आए थे. इस सारे मलबे को,टूट कर आने वाली बड़ीबड़ी चट्टानों को गौना ताल अपनी 300 फुट की गहराई में समाता गयासतह ऊंची होती गईऔर फिर लगातार ऊपर उठ रहे पानी ने ताल के मुंह पर रखी एक विशाल चट्टान को उखाड़ फेंका और देखते ही देखते सारा ताल खाली हो गया. घटना स्थल से केवल तीन सौ किलोमीटर नीचे हरिद्वार तक इसका असर पड़ा था.

गौना ताल ने एक बहुत बड़े प्रलय को अपनी गहराई में समो कर उसका छोटा सा अंश ही बाहर फेंका था. उसने सन् 1970 में अपने आप को मिटा कर उत्तराखंडतराई और दूर मैदान तक एक बड़े हिस्से को बचा लिया था. वह सारा मलबा उसके विशाल विस्तार और गहराई में न समाया होता तो सन् 70 की बाढ़ की तबाही के आकड़े कुछ और ही होते. लगता है गौना ताल का जन्म बीसवीं सदी के सभ्यों की मूर्खताओं से आने वाले विनाश को थाम लेने के लिए ही हुआ था.

ठीक आज की तरह ही सन् 1893 तक यहां गौना ताल नहीं था. उन दिनों भी यहां एक विशाल घाटी ही थी . सन् 1893 में घाटी के संकरे मुंह पर ऊपर से एक विशाल चट्टान गिर कर अड़ गई थी. घाटी की पिछली तरफ से आने वाली बिरही और उसकी सहायक नदियों का पानी मुंह पर अड़ी चट्टान के कारण धीरेधीरे गहरी घाटी में फैलने लगा. अंग्रेजों का जमाना थाप्रशासनिक क्षमता में वे सन् 1970 के प्रशासन से ज्यादा कुशल साबित हुए. उस समय जन्म से रहे गौना ताल के ऊपर बसे एक गांव में तारघर स्थापित किया और उसके माध्यम से ताल के जल स्तर की प्रगति पर नजर रखे रहे.

एक साल तक वे नदियां ताल में भरती रहीं. जलस्तर लगभग 100 गज ऊंचा उठ गया. तारघर ने खतरे का तार नीचे भेज दिया. बिरही और अलकनंदा के किनारे नीचे दूर तक खतरे की घंटी बज गई. ताल सन् 1894 में फूट पड़ापर सन् 1970 की तरह एकाएक नहीं. किनारे के गांव खाली करवा लिए गए थेप्रलय को झेलने की तैयारी थी. फूटने के बाद 400 गज का जल स्तर 300 फुट मात्र रह गया था. ताल सिर्फ फूटा थापर मिटा नहीं था. गोरे साहबों का संपर्क न सिर्फ ताल से बल्कि उसके आसपास की चोटियों पर बसे गांवों से भी बना रहा. उन दिनों एक अंग्रेज अधिकारी महीने में एक बार इस दुर्गम इलाके में आकर स्थानीय समस्याओं और झगड़ों को निपटाने के लिए एक कोर्ट लगाता था. विशाल ताल साहसी पर्यचकों को भी न्यौता देता था. ताल में नावें चलती थीं.

आजादी के बाद भी नावें चलती रहीं. सन् 1960 के बाद ताल से 22 किलोमीटर की दूरी में गुजरने वाली हरिद्वार बदरीनाथ मोटरसड़क बन जाने से पर्यटकों की संख्या भी बढ़ गई. ताल में नाव की जगह मोटर बोट ने ले ली. ताल में पानी भरने वाली नदियों के जलागम क्षेत्र कुंआरी पर्वत के जंगल भी सन् 1960 से 1970 के बीच में कटते रहे. ताल से प्रशासन का संपर्क सिर्फ पर्यटन के विकास के नाम पर कायम रहा. वह ताल के ईर्दगिर्द बसे 13 गांवों को धीरधीरे भूलता गया.

मुख्य मोटर सड़क से ताल तक पहुंचने के लिए (गांवों तक नहीं) 22 किलोमीटर लम्बी एक सड़क भी बनाई जाने लगी. सड़क अभी 12 किलोमीटर ही बन पाई थी कि सन् 1970 की जुलाई का वह तीसरा हफ्ता आ गया. ताल फूट जाने के बाद सड़क पूरी करने की जरूरत ही नहीं समझी गई. सन् 1894 में गौना ताल के फटने की चेतावनी तार से भेजी थीपर सन् 1970 में ताल फटने की ही खबर लग गई.

बहरहालअब यहां गौनाताल नहीं है. पर उसमें पड़ी बड़ीबड़ी चट्टानों पर पर्यावरण का एक स्थायी लेकिन अदृश्य शिलालेख खुदा हुआ है. इस क्षेत्र में चारों तरफ बिखरी ये चट्टानें हमें बताना चाहती हैं कि हिमालय मेंखासकर नदियों के पनढ़ालों में खड़े जंगलों का हमारे पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है. ऐसे हिमालय मेंदेवभूमि में हम कितना धर्म करें,कितना अधर्म होने देंकितना विकास करेंकितनी बिजली बनाएं– यह सब इन बड़ीबड़ी चट्टानोंशिलाओं पर लिखा हुआ हैखुदा हुआ है.


क्या हम इस शिलालेख को पढ़ने के लिए तैयार हैं ?

माँ / गुलज़ार

तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
ढूँढा करता हूं तुम्हें
अपने चेहरे में ही कहीं
लोग कहते हैं
मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं
यूं तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर प्यासी हैं
कान में छेद है
पैदायशी आया होगा
तूने मन्नत के लिये
कान छिदाया होगा
सामने दाँतों का वक़्फा है
तेरे भी होगा
एक चक्कर
तेरे पाँव के तले भी होगा
जाने किस जल्दी में थी
जन्म दिया, दौड़ गयी
क्या खुदा देख लिया था
कि मुझे छोड़ गयी
मेल के देखता हूं
मिल ही जाए तुझसी कहीं
तेरे बिन ओपरी लगती है
मुझे सारी जमीं
तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं

Sunday, December 18, 2016

उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती

उन लोगों को कवितायेँ समझ नहीं आती
जिन्होंने जीने से पहले
जीने की तैयारियां की.
जिन्होंने पांव रखने से पहले
नापे अपने पांव
नापी ज़मीन पे पड़ी धूल.
जिन्होंने बच्चे किये पैदा
और होते ही तय कर दिए उनके भविष्य.
जिन्होंने पहली बार ही चूमी अपनी प्रेमिका
और देख लिए ज़िन्दगी भर के सपने.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती
जिनकी रातों में चैन की नींद है
जिनके घर के गुसलखाने में
पानी दिनभर आता है
जिनको बचपन से सभ्यता के
भारीभरकम पाठ पढाये गए.
जिनकी बीवियां घर में घुसे घुसे
रोटियां बना ही मनोरंजित हो जाती हैं.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती
जो करियर के नाम बन गए पंसारी
जिन्हें जीवन ने बना दिया व्यापारी
जो ऑफिस जा रहे हैं, आ रहे हैं
खुश हैं कि खा रहे हैं.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती

उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती
जिनकी कॉफीटेबल पे ही
हो जाती हैं सरकारी योजनाएं अच्छी-बुरी.
जिनके घर में चलती हैं बासी ख़बरें
या जोर-शोर बहसों वाले टीवी चैनल
जिनको नहीं शालीनता की आदत.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

जिन्हें फिल्मों का मतलब है
एक लड़का-एक लड़की, दो घूंसे और विलन।
किताबें जिन्होंने रद्दी में बेचीं
अख़बार के नाम 'डेल्ही टाइम्स' ही पढ़ा
उरेजों-उभारों से बाहर नहीं निकली स्त्री जिनके अंत:करण से.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

जिनकी बेटियां
पिता से नहीं मिला पाईं अपने प्रेमी
जिनके बेटे
छुपा गए सारे सच.
जिन्होनें बेटों को
कभी नहीं सिखाये इश्क़ के गुर
और जिनके पिता मरे वृद्धाश्रम में.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

जिन्हें नशा नहीं हुआ कभी
इश्क़-मुश्क़, आशिक़ी-मौसिक़ी का.
जिनके टूटे नहीं दिल,
घर थे जिनके बिल.
जो कभी न अनिद्रा के शिकार हुए.
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती

जो सामाजिक संरचना में व्यवस्थित हैं
और छटपटाहट अंदर नहीं हुई जिनके
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती,
जिनके अनुसार पटरी पर है ज़िन्दगी उनकी
उन्हें कवितायेँ समझ नहीं आती.

Thursday, December 15, 2016

नौजवान ख़ातून से / मजाज़ लखनवी

हिजाब ऐ फ़ितनापरवर अब उठा लेती तो अच्छा था
खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था

तेरी नीची नज़र खुद तेरी अस्मत की मुहाफ़िज़ है
तू इस नश्तर की तेज़ी आजमा लेती तो अच्छा था

तेरी चीने ज़बी ख़ुद इक सज़ा कानूने-फ़ितरत में
इसी शमशीर से कारे-सज़ा लेती तो अच्छा था

ये तेरा जर्द रुख, ये खुश्क लब, ये वहम, ये वहशत
तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था

दिले मजरूह को मजरूहतर करने से क्या हासिल
तू आँसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था

तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मोत का तारा है
अगर तू साजे बेदारी उठा लेती तो अच्छा था

तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।