Saturday, December 15, 2012

इस बार लिफ़ाफ़े में..........



हर शब जब कोई करीब नहीं रहता तो कुछ सबब रहते हैं पास....कुछ ख्याल और इक मिरी परछाई....खोजते खोजते उससे ही बतिया लेता हूँ....कितने लोग शैतान से लड़े और याद बन गये....कभी खुद से भी लड़े होते तो शायद शैतान से न लड़ना पड़ता. अपने से बतियाना बड़ा मुश्किल है....अपने से लड़ना उससे भी ज्यादा.

--***--


ज़िन्दगी 'इकॉनोमी' है तो

कुल सत्तर लोग कमाए हैं
मैंने कब्र तक चलने बाले.

देखो, कुछ कम तो नहीं!


--***--


देखो हर दरख़्त के 
पीछे 
एक नज़्म टिका के
रखी है मैंने.
रास्ता भूल जाओ तो
थाम के आ जाना.

--***--


इस बार लिफ़ाफ़े में

रूह ही रख भेजी है.
अब मत कहना
मैं 'लेटर' नहीं लिखता.

पढ़ लो, जितना पढ़ पाओ.


--***--


रात बड़ी काली सी है,

मेरा चाँद मुआं जाने कहाँ छुपा है.

तू आ जा,

बड़े दिन हुए यहाँ चांदनी नही खिली.

--***--


अलमारी पे चिपका रखी थी

तेरी 'फोटू',
आज लौटा तो फर्श पे मिली पड़ी.

कुछ हुआ क्या?

तेरे अरमां भी जमीदोंज हुए क्या?

--***--


ये नज़्म, ये शायरी, तेरा क्या?

लहू बहा मेरा, तेरा क्या?

अपने से मत पूछना ये सब.

तेरी नम आँखें अच्छी नहीं लगती.

--***--


अक्सर ये हो जाता है,

तू साथ नहीं होती तो
मेरा वजूद,
मुझसे अपनी पहचान पूछ जाता है.

--***--


शैतानियत बनाई थी ख़ुदा ने,

अब उलझा है
शैतान नर्क में धकेलने.

कुछ तो अपने कामों में

'परफेक्शन' ला खुदा!

--***--


देश मुझे लगे अबला,

जिसपर
रातभर मनमानी किया,
सुबह नेता चिल्लाता उठा-
जम्हूरियत है, जम्हूरियत है, जम्हूरियत है!!

Friday, December 7, 2012

रूह को किनारे रख....




बड़ी बड़ी साफ़ चौड़ी सड़के, गार्डन्स, हर कोने पे डस्टबिन, टेनिस कोर्ट, क्रिकेट ग्राउंड ....यहाँ* आकर लगता है जैसे किसी नई सी दुनिया में अ गये हों, जो शायद 'भारत' नहीं 'इंडिया' है.....लेकिन एक उदासी खाकसार सी फिर भी चिपक जाती है......कभी कभी ही सही. लेकिन ये कभी-कभी भी महीने में दो-चार रोज़ ज़रूर होता है. शायद इस जानिब आकर भी उस जानिब की किस्सागोई याद रह ही जाती है.

--***--

हर शब
ख्याल जब
दिन का सफ़र कर,
कागज पे उतरने बैचैनी से
छटपटाते हैं.
नंगे बदन कोई
रोटी जुगाड़ता है कहीं.

रूह को किनारे रख,
इस हालत से इश्क
ज्यादा नहीं होगा.....
उस जानिब से जब
'रिफ्लेक्ट' कर आएगा सच
तुम भी देखना
इस उदासी को कितना धकेलते हैं हम.

तुमही तो कहते थे खुदा
'बड़ी खूबसूरत बना दी दुनिया मैंने.'
'रेड लाइट' पे भीख मांगते
मासूम देख लगता है
अभी कुछ बाकी रह गया.

हर शब
कागज़ पे उतरता हूँ ख्याल
तो लगता है-
मैं 'परफेक्ट' नहीं.
खुदा तू भी तो 'परफेक्ट' नहीं!!


चल इस आड़ी-टेड़ी दुनिया को
मिलकर ठीक  करते हैं.


                                     ~V!Vs
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Pic- Painting by  Francoise Nielly
Infosys Campus, Pune

Saturday, December 1, 2012

उन्नीदे तरकश से




नींद का हल्का सुरूर, 'द नोटबुक' मूवी और 'तेरा' नशा...बंद कमरे की ख़ामोशी रूमानियत लगती है. इश्क में पड़ा पड़ा जब ये दिल पिघलता है तो एहसास की बारिश करता है....जैसे वीरान सड़क पे पड़े सूखे पते मंजिलों पर उड़ रहे हों. हर पत्ता एक-एक याद है, जो खफा है सड़क से कि मंजिल तक क्यूँ नहीं जाती.
रात ढाई बजे ख़ामोशी से 'तेरा' आना वाजिब है...इन बिखरे पत्तों का भी, जिन्हें समेटने की अब शायद ज़रूरत नहीं.

ये कवितायेँ नहीं है...बस रूह से खरोंचे कुछ टुकड़े हैं. थोड़ी रूमानियत से भरे हैं, थोड़ी रूहानियत से.

--****--

अकेले कमरे में
बैठे बैठे भी याद नहीं आती.
जैसे कनस्तर को
ठक-ठकाने पर भी
कुछ नहीं निकलता हो.

कनस्तर खाली है.
रसोई में कुछ पकाने नहीं है.
तेरी याद भी नहीं!
तेरी भूख भी नहीं!


--***--

आज रिश्तों की
मरम्मत का मन नहीं है.
टूटे शीशे से अक्स बहुत दिखते हैं.
टूटे रिश्ते से अक्स बहुत दिखे,
तेरे भी,
मेरे भी.

इस दफा आत्म सम्मान बचा के रखूँगा.
इस दफा रिश्तों की
मरम्मत का मन नहीं है.

--***--


तू खफा होती रही
मैं रिश्ता रफू करता रहा.

अब वह चींदे बचे हैं,
रिश्ता नहीं.
हर चींदा गवाह है
हमारे उजड़ने का,
रिश्ता मरने का.

सोचता हूँ
रिश्ते उतार दूं.
मखौल उड़ाते हैं लोग
चिथड़े पहने देखकर.

--***--

खिड़कियाँ शोर करती हैं,
तेरी यादें अब अभी
वहीं से आती हैं.

सही से झांको कमरे में,
किसी को ओढ़े हूँ मैं.
यादों का अलाव की ज़रूरत नहीं है.

Sunday, November 25, 2012

अमृता प्रीतम पर



तुम्हारी तरह शब्द नहीं बुन पाता,
कुछ ख्याल बे-ख्याल ही रह जाते हैं.
थक-हार
तुम्हें उठा लेता हूँ.
तुम्हारे शब्द
अपने से लगते हैं.

जब कभी पैरहन पे
शुन्य दीखता है,
आगोश में भरता हूँ
तुम्हारे ख़त,
तुम्हारा 'रसीदी टिकट'.

मेरा हरा रंग,
तुम्हारे बसंती ख्याल.
कितने आस-पास हैं हम!

Tuesday, October 16, 2012

ये नज़्म समर्पित है 'बीबीसी ब्लॉगर' मलाला यौसुफ्जई के लिए, जिसे पिछले हफ्ते तालिबान ने गोली मार दी. 'गर्ल् एजुकेशन' पर काम करने बाली इस 14 वर्षीय लड़की से खुदा शायद डर गया था. मलाला के साहस को सलाम!
ये नज़्म, शायद Comparison भी है, एक ख्याल जिसे हम खुदा कहते हैं और एक सच जिसे हम डॉक्टर कहते हैं, दोनों के बीच.
शायद लिखने का तरीका आम नज़्म से ज़रा हटके है, लेकिन मुकम्मल कोशिशें बहुत की हैं, कि आपको पसंद आये.


***
खुदा से ***


देखो, दो अल्फ़ ही तो
पढ़ना चाहे थे उसने.
शायद पढ़ के
तेरी ही इबादत करती
या खैरियत तेरे बन्दों की.
सुधरती भी, तेरी ही बनायी
केसरी कायनात.

हैवान बन
तान दी बंदूकें!
तू कभी नहीं सुधरेगा.

अच्छा है,
कुछ बन्दे तुझसे दगा कर,
जमीं पे परीज़ंदा बन गये हैं.
भई, हम तो उन्हें 'डॉक्टर' कहते हैं,
तू शैतान कह ले!
घंटों की मशक्कत से,
तुझसे छीन लाये ज़िन्दगी.

ये खुदा,
मलाल तो होगा तुझे
कि 'मलाला' बच गयी है.


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अल्फ़- First Alphabet of Urdu
केसरी कायनात-Beautiful World
परीज़ंदा- Like Angels

Read about Malala Yousuzai on NYT (http://www.nytimes.com/2012/10/16/world/asia/malala-yousafzai-taliban-shooting-victim.html

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Vivek  VK Jain    

Saturday, October 6, 2012

सरहदें (टोबा टेक सिंह पर )



















देखो ये सरहदें,
अरे! हवाएं गुजर गयीं इनसे.
.....और ये पंछी,
इन्हें भी नहीं रोक पायीं ये.
लेकिन हमारा 'प्लेन' कभी
लाहौर नहीं उतर पाया.

बोतल में बंद कर कभी
पैगाम-ए-मोहब्बत फेंका था समंदर में,
सुना है रहीम मियां को
मिला है करांची में.
लेकिन मेरी नावें
कभी लंगर न डाल पायीं वहां!

कुछ पानी के कतरे
करांची से चलकर
मेरी सरजमीं पर नमक बन गये हैं!
हमारी नर्मदा भी
अरब में गिरती है.
करांची ने भी उसका पानी कभी
चखा ही होगा.

ना तुमने कभी चाहीं,
ना हमने कभी चाहीं,
फिर सरहदें क्यूँ बना दी?

अरे! ये बाघा बोर्डर तो हटाओ
वहां मेरा 'टोबा' मरा पड़ा है.
लगता है,
पागलों में वाइज़ से ज्यादा अक्ल है!
सब पागल ही हो जाएँ,
तो शायद सरहदें ना रहें.

                                   ~V!Vs

टोबा= टोबा टेक सिंह, सआदत हसन मिन्टो की बंटवारे पर लिखी बड़ी प्रसिद्द कहानी है, जिसका किरदार टोबाटेक सिंह (बिशन सिंह) पागल रहता है, और बाघा बोर्डर पर मर जाता है (उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तानथा, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान ; दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबाटेक सिंह पड़ा था.)
(read story here-
http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2005/05/050510_manto_tobateksingh.shtml (hindi)

http://www.sacw.net/partition/tobateksingh.html (english))

वाईज- उपदेशक
अरब- Arabian Sea

Sunday, September 9, 2012

प्रधानमंत्री से....




















मैं पूंछना चाहता हूँ कुछ,
कुल जमा तेईस कि उम्र में
ज्यादा समझ नहीं मुझे
लेकिन बचपन में
मैंने पडोसी के घर के
दो कांच फोड़े थे
तो माफ़ी मेरे पापा ने मांगी थी.

मुझे याद है...हाँ, याद है
जब मैंने पड़ोस के
छोटे से बिट्टू को
सड़क पे गिराया था तो
माँ ने खींच के मारा था मुझे.
गुस्से से बड़बड़ाई थी-
'शायद मेरी परवरिश में ही कहीं
खोट रह गई.'

मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ,
आप बस घर के नहीं
सारे वतन के मुखिया हैं,
फिर क्यूँ नहीं कभी
जिम्मेदारी से स्वीकारी
सदस्यों कि गल्तियाँ
या क्यूँ नहीं कहा कभी
'शायद खोट हममें है,
हमारे नेतृत्व में है.'

Tuesday, September 4, 2012

....लड़ेंगे फिर कभी

चलो मैं तुम्हारे अल्लाह को
एक चवन्नी में खरीद लेता हूँ.
तुम मेरे ईश्वर को,
चार आने में खरीद लो.

हर उपवास को रोज़े से बदल देता हूँ,
तुम चाँद को उठा
उस कोने में रख दो,
जिससे दिखता रहे हमेशा.
हर रोज़े में
देखना पड़ता है इसे.
और ये करवाचौथ......उफ़! बेचारी सुहागिनें.
रख दो, इसे उस कोने में रख दो!

देखो दिए तो छुओ,
तुम्हारे छूने से बुझते नहीं ये.
मेरे छूने से,
तुम्हारी कोई ईदी बासी भी नहीं हुई.
जमाराह उठा के पटक देते हैं,
रावन इस बार नहीं बनाते.
पापों को लताड़ना क्या
जब वो हममें-तुममें
सामान हज़ार बरस से बैठा है!

चलो इस बार
तुम अपनी दाढ़ी काट लो,
मैं अपनी चोटी काटता हूँ.
मैं जनेऊ फेंकता हूँ,
तुम टोपी फेंक दो.
आदमी को आदम सा दिखने तो दो ज़रा,
क्या-क्या नकाब पहनेंगे.....?

चलो मेरी आँखों की
नफरत मोहब्बत से रंग दो तुम.
मैं तेरी आँखों का तीखापन
प्यार से धकेलता हूँ.

इस बार गले मिलते हैं,
....लड़ेंगे फिर कभी.
       या कभी नहीं.

Tuesday, August 28, 2012

देखो.....प्रकृति हैं हम!


सुबह सी तुम
खिली-खिली......बिलकुल मासूम.
मोटे चश्मे से
नीली आँखे लिए
झांकती हो तो.....
लगता है,
दिन निकाल आया हो,
सूरज उग आया हो.

दोपहर सा मैं,

थोड़ा सा तीखा.....थोडा सा तेज.
झांक के देखता हूँ
रंग छितराती,
बूझ बुझाती,
पनीली आँखों में
कुछ बात लिए तुम.

शाम सी तुम

रात के इंतज़ार  में
यों किसी चोटी पर
अकेले ही
कर रहे हो इंतज़ार,
रात आने का!

रात सा मैं

आता हूँ,
तेरे साथ बैठने
उसी चोटी पर
अकेले.
अकेला मैं, अकेले तुम......साथ हम.

तुम्हारी आँखों में

झांक के देखता हूँ.
बीते पहर में
तुम्हारी आँखों में,
रात सा आलस है!
रात तो मैं हूँ......तुम तो 'मैं' हो गये!

इक भोर

फिर से तुम 'तुम' हो,
मैं  'मैं'
एक भोर, एक दोपहर,
एक शाम. एक रात.
देखो.....प्रकृति हैं हम!

गुजारिश है,

हमें कोई नाम ना देना.
दोस्ती सा पावन रिश्ता देखा नहीं हमने!

Saturday, August 18, 2012

तुम कभी आओ तो......


तुम कभी आओ तो
चिराग बन मत आना
मुझे तीरगी पसंद है अब.

तुम कभी आओ

तो हवाएं बन मत आना
अब घर में झरोखे नहीं हैं.
बादल भी मत बनना, बारिश भी नहीं,
माना सहरा बहुत है यहाँ,
लेकिन प्यास वो नहीं रही.
उलझन मत बनना, आशा मत बनना,
बेईमानी का सबब है सब.
पहले भी आ चुके तो तुम येसे.

तुम कभी आओ तो

खुदा भी मत बनना.
खुदा के पास
देने रंज-ओ-गम बहुत है,
ख़ुशी कम!

तुम कभी आओ तो......

अच्छा आना ही मत!
अब टुकडो में रहने कि
आदत पड़ गई है.
 संवारना मत,
सम्हालना मत,
अकेलापन हटाना मत.
तुम कभी आना मत
.



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तीरगी -अँधेरा 
सहरा -रेगिस्तान