Sunday, October 29, 2023

एक बौद्ध भिक्षु की कथा



एक बौद्ध भिक्षु की कथा है कि वह एक ब्राह्मण के द्वार पर भिक्षा मांगने गया। ब्राह्मण का घर था, बुद्ध से ब्राह्मण नाराज था। 

उसने अपने घर के लोगों को कह रखा था कि और कुछ भी हो, बौद्ध भिक्षु भर को एक दाना भी मत देना कभी इस घर से। ब्राम्हण घर पर नहीं था, पत्नी घर पर थी; भिक्षु को देखकर उसका मन तो हुआ कि कुछ दे दे। इतना शान्त, चुपचाप, मौन भिक्षा-पात्र फैलाये खड़ा था, और ऐसा पवित्र, फूल-जैसा। लेकिन पति की याद आयी कि वह पति पण्डित है और पण्डित भयंकर होते हैं, वह लौटकर टूट पड़ेगा। सिद्धान्त का सवाल है उसके लिए। कौन निर्दोष है बच्चे की तरह, यह सवाल नहीं है, सिद्धान्त का सवाल है--भिक्षु को, बौद्ध भिक्षु को देना अपने धर्म पर कुल्हाड़ी मारना है। वहां शास्त्र मूल्यवान है, जीवित सत्यों का कोई मूल्य नहीं है। तो भी उसने सोचा कि इस भिक्षु को ऐसे ही चले जाने देना अच्छा नहीं होगा। वह बाहर आयी और उसने कहाः क्षमा करें, यहां भिक्षा न मिल सकेगी।

भिक्षु चला गया। पर बड़ी हैरानी हुई कि दूसरे दिन फिर भिक्षु द्वार पर खड़ा है। वह पत्नी भी थोड़ी चिन्तित हुई कि कल मना भी कर दिया। फिर उसने मना किया।

कहानी बड़ी अनूठी है; शायद न भी घटी हो, घटी हो। कहते हैं, ग्यारह साल तक वह भिक्षु उस द्वार पर भिक्षा मांगने आता ही रहा। और रोज जब पत्नी कह देती कि क्षमा करें, यहां भिक्षा न मिल सकेगी, वह चला जाता। ग्यारह साल में पण्डित भी परेशान हो गया। पत्नी भी बार-बार कहती कि क्या अदभुत आदमी है! दिखता है कि बिना भिक्षा लिये जायेगा ही नहीं। ग्यारह साल काफी लम्बा वक्त है। आखिर एक दिन पण्डित ने उसे रास्ते में पकड़ लिया और कहा कि सुनो, तुम किस आशा से आये चले जा रहे हो, जब तुम्हें कह दिया निरन्तर हजारों बार?

उस भिक्षु ने कहा, “अनुगृहीत हूं। क्योंकि इतने प्रेम से कोई कहता भी कहां है कि जाओ, भिक्षा न मिलेगी! इतना भी क्या कम है? भिखारी के लिए द्वार तक आना और कहना कि क्षमा करो, भिक्षा न मिलेगी, क्या कम है? मेरी पात्रता क्या है! अनुगृहीत हूं! और तुम्हारे द्वार पर मेरे लिए साधना का जो अवसर मिला है, वह किसी दूसरे द्वार पर नहीं मिला है। इसलिए नाराज मत होओ, मुझे आने दो। तुम भिक्षा दो या न दो, यह सवाल नहीं है।’

ओशो

महावीर वाणी, भाग-2, प्रवचन-49

#ओशो #Osho #दर्शन 

Saturday, October 28, 2023

शौर्य गाथा 84.


 

भाईसाहब क्लिप लेकर आए हैं "पापा मैं आपकी टी शर्ट सुखा दूं?" भाईसाहब ने पापा की टी शर्ट पर क्लिप लगा दी है। 

पापा लेटे हुए हैं। भाईसाहब अपनी तोतली आवाज में कुछ बोलते हैं, जिसका सार है "पापा मैं आपके ऊपर सो जाऊंगा" भाईसाहब ने पूरी मेहनत कर उल्टा लिटा दिया है। अब वो पीठ पर लेट गए हैं। फिर खिलखिलाना शुरू कर देते हैं " पापा मैं आपके जैसे लेट गया... मैं आपके जैसे लेट गया।"

फिर बैठकर पीठ बजाना शुरू कर दिया है। गा रहे हैं "व्हील्स ऑन द बस गो..."

पापा को हंसी आ रही है। पापा की पीठ पर जोर से धोल पड़ता है "पापा हंसते नहीं... नहीं हंसते।"

भाईसाहब फिर से एक और धोल जमाएं उसके पहले ही पापा पलटी लेकर भाईसाहब को बेड पर गिरा देते हैं। 🤣

#शौर्य_गाथा 85. #Shaurya_Gatha


Thursday, October 26, 2023

जंगल की कहानियां 4.


14 जनवरी... मकर संक्रांति... आप सभी फेस्टिवल एन्जॉय कर रहे होंगे... तिल के लड्डू खा रहे होंगे. मेरा स्टाफ मेरे साथ ऑफिस में बैठा है. मैं पिछले दो घंटे से मीटिंग ले रहा हूँ, हम विभिन्न मुद्दों पर बात कर रहे हैं. वैसे भी फील्ड स्टाफ की छुट्टी कहाँ होती है.

दोपहर के लगभग दो बज रहे हैं. फोन बज उठता है. किसी गांव के सरपंच का फोन है. वे थोड़ी घबराई सी आवाज़ में बात कर रहे हैं. "सर, यहाँ एक व्यक्ति के खेत में कुआं है, उसमें एक साथ आठ जंगली सुअर गिर गए हैं. उनमें कुछ सुअर के बच्चे भी हैं साब" आठ सूअर एक साथ! दोपहर है लेकिन ठण्ड बहुत है, पानी भी अभी ठंडा होगा.  मैं मीटिंग तुरंत ख़त्म करता हूँ, स्टाफ को आवश्यक रेस्क्यू सामन रखने को बोलता हूँ और अगले पांच मिनट में निकल जाता हूँ. 

पच्चीस किलोमीटर दूर पहुँचने में हमें गांव के घुमावदार पहुंचमार्ग से भी पहुँचने में मात्र बीस मिनट लगते हैं. पंद्रह बीस लोग कुएं पास जमा हैं. हमारी गाड़ी आती देख और भी लोग आना शुरू हो गए हैं. शुक्र है खेत की झाड़ियों से बागड़ (फेंसिंग) है और बस एक ही अंदर जाने का रास्ता है. मैं खेत की बागड़ के पास दो स्टाफ नियुक्त कर देता हूँ जिससे बाकि गांव वाले अंदर ना आ पाएं. खेत मालिक मुझे देखकर बताना शुरू करते हैं "साब, ये सूअर अपना कुनबा ले के जा रे था. साब, अपना खेत सड़क से लगा हुआ है. कुनबा सड़क पे पहुंचा कि एक बस हॉर्न देती आई. पूरा का पूरा सूअर उल्टा दौड़ गया और कुएं में आकर गिर गया." 

कुआं का मुआयना किया जाता है. कुआँ में करीब पंद्रह फ़ीट नीचे पानी है. कुएं में पांच सूअर के बच्चे और तीन एडल्ट हैं. शायद पूरा का पूरा परिवार है. हम अपना काम शुरू करते हैं. इतने में गाँव के सरपंच आ गए हैं. वो मुझे धन्यवाद प्रेषित करते हुए जाल की रस्सी का एक सिरा खुद थाम लेते हैं. कुएं के बीच वाले हिस्से (Diameter)  होकर रस्सी की मदद से जाल अंदर डाला जाता है, इतना कि तैर रहे सूअरों के पैरों के भी नीचे पहुँच जाए. फिर रस्सी के चारों सिरे चार लोग चारों कोनों की और जाते हैं. अब उनके नीचे जाल फ़ैल गया है. दो तीन स्टाफ बांस लिए है और सूअरों को कुएं के मध्य की और हरका रहा है. जिससे वे जाल के अंदर आ जाएँ.

पहली बार में हम जाल ऊपर की और खींचते हैं और तीन बच्चे जाल के ऊपर हैं. हम रस्सी के एक सिरे को दुसरे की और लेकर आते हैं. कुएं की एक दिशा रोड की और है और वहां लोग भी काफी जमा हो गए हैं. वहां हम सुअरों को छोड़ नहीं सकते. दूसरी और ऊंचाई है, शायद कुएं बनाने के बाद निकली मिटटी वहां जमा की है. इसलिए वहां भी नहीं छोड़ सकते, एक ओर कुएं की बंधान कुछ ज्यादा ऊपर इसलिए वहां भी नहीं. बची हुई एक ही दिशा है जिस ओर निकालने के बाद छोड़ा जा सकता है.  

उन्हें उपर्युक्त दिशा की ओर छोड़ देते हैं. वे छूटते ही दौड़ लगा गए हैं.

अगली बार फिर प्रयास किया जाता है और दो सूअर ऊपर आ गए हैं. एक बच्चा पानी और ठण्ड की वजह से दौड़ने की बजाये वहीँ बैठ गया है. मेरा एक स्टाफ उसे सहलाने जा रहा है. ये खतरनाक हो सकता है. कहते हैं जंगली सुअर जब दौड़ता है और आदमी सामने खड़ा हो तो उसकी जांघ फाड़ के निकल जाता है! मैं मना करता हूँ, तबतक उसने उसके पीठ पर हाथ फेर पुचकार ही दिया है. वो बच्चा भी भागने लगा है.

अगली बार में दो और निकाल लिए हैं और अंत में सबसे शक्तिशाली जंगली सूअर बचा हुआ है. बड़ी मेहनत से उसे आखिर में निकाला जाता है. वो उल्टा कुएं की ओर ही दौड़ लगाने लगा है. उपस्थित लोगों में भगदड़ सी होने लगी है कि मेरे स्टाफ ने डंडों से उसे हरका दिया है. वो भी तेजी से दौड़ता खेतों में गुम हो गया है. लोगों में ख़ुशी का माहौल है. उन्होंने चिलाना और ताली पीटना शुरू कर दिया है.

हमने पहुँचने के लगभग अगले पंद्रह मिट में ही ये सब कर लिया है. हमने राहत कि साँस ली है. ठण्ड और पानी से मरने से हमने उन्हें बचा लिया है... हमारे लिए यही त्यौहार है.

 फोटो/वीडियो: टीम.

#wildstories #जंगल_की_कहानियां #ForestLife #Rescue 4.

Tuesday, October 17, 2023

जंगल की कहानियां 3.


 मैंने यहाँ नया नया ज्वाइन किया है. कुल जमा एक हफ्ता ही हुआ है. बिलकुल नयी जगह पर फील्ड को समझना, स्टाफ को जानना इसी में ही कई दिन लग जाते हैं. इन्हीं सब के शुरूआती दौर में हूँ और आज शाम होते ही लगातार फ़ोन बजने लगा है. एक गांव में, एक खेत में मगर घुस आया है. कुछ दूर पर नदी है, धान का खेत है, जिसमे डेढ़ दो फुट पानी भरा हुआ है, शायद इसलिए ही नदी से होकर खेत तक पहुँच गया है. अगस्त का महीना है, अँधेरा लगभग हो गया है, गांव से खेत लगभग एक किलोमीटर है. शाम को कुछ भी कार्यवाही संभव नहीं है लेकिन सुबह से जल्दी कार्यवाही करनी होगी. मगर अगर गांव तक पहुँच गया तो मानव और मगर दोनों कि जान को खतरा है.

मैं स्टाफ से बात करता हूँ. दो स्टाफ कि ड्यूटी रातभर के लिए लगा देता हूँ. वे खेत में जाते हैं, हरकारे को समझाते हैं, लेकिन हरकारा वहां से जाने से मना कर देता है. वे अब रातभर वहीँ हरकारे के साथ बैठकर जागेंगे.

मैं वरिष्ठ को फ़ोन करता हूँ. मैंने अभी तक स्पॉटेड डियर, बार्किंग डियर के रेस्क्यू किये थे लेकिन मगर जैसे किसी हिंसक, फुर्तीले जानवर का रेस्क्यू पहली बार करना था. रेस्क्यू के लिए संसाधन आवश्यक थे, वे भी जुटाने थे. वरिष्ठ जवाब देते है "विवेक तुम कर लोगे, मुझे भरोषा है. बाकि जो भी आवश्यक है, मुझे फ़ोन करना." उनका मुझपर भरोषा देख मुझे तसल्ली मिलती है.

रात में मैं अगले दिन कि तैयारी करता हूँ. एक टीम बनाता हूँ. कुछ वरिष्ठों को फ़ोन कर 'रेस्क्यू कैसे कर सकते हैं' पूछता हूँ. विवेक शर्माजी, एक स्नेककैचर हैं, उनके बारे में पता चलता है. उन्हें फ़ोन करके पूछता हूँ "आप इसमें मदद करेंगे?" वे सहर्ष तैयार हैं. उन्होंने मगर का रेस्क्यू कभी नहीं किया है. उनके लिए भी ये अडवेंचरस होने वाला है. 

सुबह पांच बजे स्टाफ का फ़ोन आता है. "सर यहाँ भीड़ जमा होने लगी है. करीब दो सौ तीन सौ आदमी आ गए हैं." यहाँ के लोगों को वाइल्डलाइफ को लेकर अलग क्रेज है! मैं थाने में कॉल करता हूँ. पुलिस स्टाफ को घटना स्थल पर क्राउड मैनेजमेंट के लिए बुलाता हूँ. अपने बाकि स्टाफ को भी बुला लेता हूँ. सुबह पांच बजे इतने लोग तो एक दो घंटे बाद में कितने होंगे! सोशल मीडिया, व्हाट्सप्प के जमाने में खबर आग से भी तेजी से फ़ैल रही है.

अच्छा उजाला होते ही करीब सात बजे से हम 'मिशन मगर रेस्क्यू' चालू कर देते हैं. तब तक तरकरीबन डेढ़ दो हज़ार लोग, जिसमे महिला और बच्चे भी शामिल हैं, खेतों के आसपास आ गए हैं. अब मुझे मगर का भी रेस्क्यू करना है और इन लोगों को भी मगर से बचाना है. मैं माइक लेकर अपील करता हूँ, लेकिन लोग कहाँ मानने वाले हैं! स्टाफ और पुलिस स्टाफ डंडे हाथ में लिए है लेकिन इनपे असर नहीं है. खैर मगर की लोकेशन से डेढ़ सौ मीटर दूर लोगों को करने में सफल हैं. वहां लोग डर कर वैसे भी नहीं जा रहे हैं और मैंने बोल दिया है कि जो बॉडीबिल्डर मदद करने तैयार हैं आ जाएँ. हमें रस्सी खींचने में मदद चाहिए. बस, फिर क्या था कुल जमा चार पांच लोगों के अलावा सब तमाशबीन पीछे हट गए हैं.

नर मगर है. लम्बाई दस से बारह फुट. हमारे पास आवश्यक उपकरण हैं. हम कोशिश करते हैं, रस्सी के फंदे डालते हैं और मगर फंसते ही लोटने लगता है. अधिक रस्सियां लायी जाती हैं, एक समुचित दूरी बनाये रखने का ध्यान रखा गया है, एक तरफ से आवाज़ कि जा रही है कि वो उस ओर ना जा पाए. लम्बे बांस भी हैं कि एक ओर आये तो बांस कि मदद से उसे हरकाया जा सके. करीब दो घंटे लगातार मेहनत की गई है. हम सभी लोग और शर्माजी मुस्तैदी से डटे हुए हैं, बाकि स्टाफ क्राउड मैनेजमेंट का अपना अपना कार्य कर रहा है. करीब दो घंटे लगातार मेहनत कि गई है. मगर को रस्से से जकड लिया गया है. अब हम आश्वस्त हो गए हैं कि अब उससे खतरा नहीं तो कुछ लोग उसे डंडों कि मदद से टांगकर खेत के बाहर लेकर आ रहे हैं. खेत के बाद खेत हैं तारकरीबन तीन सौ मीटर तक. दुर्गम पगडंडी पर मगर को कंधे पर डाले लेकर आने में हालत खराब हो गई. लेकिन किया भी क्या जा सकता है, न कोई वाहन और पिंजरा वहां तक जा सकता है.  

शर्मा जी का इसमें सर्वाधिक योगदान रहा है. वे लगातार हमारे साथ सिपाही कि तरह डटे रहे हैं. हम आगे की कार्यवाही करते हैं. पास ही करीब तीस किलोमीटर दूर एक बड़े बांध का बैकवाटर क्षेत्र है जहाँ पर मगर प्राकृतिक रूप से रहते हैं, वहां उसे विधिवत कार्यवाही करने के बाद छोड़ा जाता है. 

हमने शर्मा जी का नाम पंद्रह अगस्त पर कलेक्टर महोदय द्वारा सम्मान के लियर प्रस्तावित किया है. अवार्ड लेने के बाद वे अभिवादन करने आते हैं. उनके चेहरे पर गर्वयुक्त ख़ुशी देखक्रर अच्छा लगता है.

Saturday, October 14, 2023

जंगल की कहानियां 2.


खबर मिलती है की किसी खेत में टाइगर बैठा है. गुलजार पढ़ रहा हूं और मुझे एहसास होता है जैसे कि 'ओस की रात में ओट में बैठा है चाँद!' राजा के अपने नखरे हैं. वो बैठा होता है अपनी मर्ज़ी से, आता है अपनी मर्ज़ी से, जाता है अपनी मर्ज़ी से! हम बस इंतज़ार कर सकते हैं उसके उठने का!

पहुंचकर खेत मालिक से पूछा जाता है 'खेत में पानी देना होगा शायद?'
'नहीं साब, कछु दिक्कत न है. ई तो बैठत रहे यहाँ पे.'

वाह! कितना आम है इन्हें. एक कहानी तो जंगल के किनारे रहने वालों पर भी कोई फिल्मा सकता है! उनका रहना, बसर करना, ज़िन्दगी में टाइगर का साथ होना! यहाँ के हर गांव में एक चबूतरा है बाहर और वहां पर ईश रूप में टाइगर की मूर्ति बैठी है! मुझे लगने लगा है इन्हीं लोगों ने बचाई है प्रकृति, इन्हीं लोगों ने बचाया, बनाया है जंगल! अब कुछ 'पढ़े लिखे' जरूर इन्हें बरगलाने लगे हैं. कुछ के लिए ये वोट हैं, कुछ के लिए इनकी ज़मीन पर खड़ा हो सकता है जंगल रिसोर्ट! लेकिन इनके अंदर जो बसा है वो है प्रेम... अथाह प्रेम! आप इनके घर चले जाइये कुछ सरकारी नोटिस लेकर! नोटिस तो बाद में लेंगे, पानी पहले पिलायेंगे, पहले ढंग से बिठाएंगे.

एक जगह जाता हूँ, कच्चे तीन किलोमीटर रस्ते के बाद गांव. उस रस्ते में हमें टाइगर के पगमार्क भी मिलते हैं! एक दादा अपनी समस्या सुना रहे हैं. ' बरसात में कट जाता है गांव मुख्य रोड से... गाभिन भी न जा पाती हैं अस्पताल... तनक रोड बनवा देऊ.' इनके घरों के सामने से टाइगर निकलता है रात में और ये चैन से सोते रहते हैं. कभी कभी मवेशी ले जाता है और ये गुस्सा नहीं करते.

' प्रकृति के आप कितना करीब हैं?' टीवी पर कोई सुंदर बाला एडवरटाइजमेंट में पूछती होगी और जवाब देती होगी कि 'ये फलां प्रोडक्ट उपयोग कीजिये, बहुत पास महसूस करेंगे, खुद से प्यार करने लगेंगे!'

भाईसाहब यहां आइये, इनसे मिलिए, इन्हें जानिए. इनका प्रेम देखिये. इनसे मोहब्बत सीखिए. ज़रा सी देर इनके साथ रहिये आप खुद के भी करीब होंगे और प्रकृति के भी. खुद से भी मोहब्बत करने लगेंगे, इनसे भी और प्रकृति से भी!

...तो राजा किसी ओस भरी गीली रात में ओट में छुपे चाँद से बैठे हुए हैं. हम इंतज़ार कर रहे हैं की वे उठें तो लोगों की दैनिक ज़िन्दगी चले!

थोड़ी सी धूप बड़ी है और राजा अपने राजसी ठाठ के साथ खड़े होकर पास लगे जंगल की ओर चल दिए हैं...

मुझे 'कुंवर नारायण' याद आ रहे हैं :

"मैं ज़रा देर से इस दुनिया में पहुंचा
तब तक दुनिया
सभ्य हो चुकी थी
जंगल काटे जा चुके थे
जानवर मारे जा चुके थे
वर्षा थम चुकी थी
और तप रही थी पृथ्वी
चारों तरफ कंक्रीट के
बड़े-बड़े घने जंगल उग आए थे
जिनमें दिखायी दे रहे थे
आदमी का ही शिकार करते कुछ आदमी."

Photo: for reference. Majestic Bengal Tiger tiger captured by my dear friend Sumit Shrivastava

Thursday, October 12, 2023

शौर्य गाथा 83


भाईसाहब ने टीवी में देख-देख करके बोलना शुरू कर दिया है कि "पापा मैं पुलिस अंकल हूं." पापा-मम्मा इसे अपॉर्चुनिटी की तरह लेते हैं. भाई साहब से कहते हैं "बेटा पुलिस अंकल सु-सु वॉशरूम में जाकर करते हैं आप भी जाया करना." "ओते पापा" भाईसाहब कहते हैं और अब से हुकेशा ट्राई करते हैं कि पुलिस ऑफिसर के जैसे वॉशरूम में ही सु-सु जाएं.

एक दिन भाईसाहब सामने वाले घर में हैं. उन्हें वहां पर टीवी देखने की छूट है इसलिए उन्हें वहां मजा आता है. भाईसाहब टीवी देखते देखते बोलते हैं "मासी मुझे सु-सु आई." मासी उन्हें वॉशरूम की ओर ले जा रही हैं लेकिन भाईसाहब उंगली से इशारा कर कहते हैं "मैं वहां अपने घल में जाऊंगा." भाईसाहब को अब उनके घर में दौड़ के लाया जा रहा है लेकिन पहुंचते-पहुंचते ही वॉशरूम के गेट पर ही...

पापा भाईसाहब को फ्रेश पैंट पहना रहे हैं. भाईसाहब कहते हैं "पापा अब मैं ऑफिसल नहीं लहा."

पापा उन्हें मुस्कुराते हुए गले लगा लेते हैं. "बेटा जो अच्छा करने का ट्राई करते हैं न, वे सब ऑफिसर होते हैं."

अब भाईसाहब हंसने लगते हैं. पापा मम्मा भी खुश हैं. "मम्मा-मम्मा मैं पुलिस ऑफिसल बन दया... मैंने ट्रालाई तिया ना." भाईसाहब चहकते हुए बोलते हैं. पापा-मम्मा उन्हें प्यार कर रहे हैं.

#शौर्य_गाथा #Shaurya_Gatha 83.

Tuesday, October 10, 2023

पापा के नोट्स 5


 तुमसे जब भी बात करता हूँ कुछ नया सीखता हूँ. जैसे मैं महज अबोध बालक हूँ और तुम ग्यानी. जैसे सारा का सारा ज्ञान उड़ेल ईश्वर ने बच्चौं को भेजा हो. 'पापा, नहीं उसे जेल में बंद नहीं कलेंगे. वो सो लहा है न.' 

'पापा चलो हम पुलिस अंकल बनेंगे...चोल पकलेंगे.' फिर झूठमूठ का पकड़ कर चहक जाना 'पकल लिया!' कितना कुछ है जो तुम सिखा जाते हो. खुद से खुश होना. 'खुद से चहक जाना. न फ़िक्र, न सोचना. बस हँसते जाना.' 


तुम्हारी बातें तुमसे दूर रह भी याद करता हूँ न तो खुश हो जाता हूँ. तुम जब सुबह 'पापा... पापा...' कह उठते हो और चिपक जाते हो, सबसे सुहानी सुबह होती है. इन सुबहों को ज़िन्दगी भर के लिए सम्हाल के रखना चाहता हूँ. निधि कहती है 'ढाई साल पहले हम जी कैसे रहे थे इसके बिना?' मुझे भी एहसास होता है. पहले नहीं पता था लेकिन अब महसूस होता है कि क्यों लोगों को संतान कि इतनी चाहता होती है. मैं बस इसे पहले सोशल प्रेशर मानता था, लेकिन तुमने मुझे वो सिखाया जो शायद कोई और नहीं सिखा सकता था. तुमने मुझे वो महसूस कराया जो कोई और नहीं करा सकता था. वो ख़ुशी, वो एहसास जो और कहीं नहीं मिल सकता.


तुम्हारी माँ से मोहब्बत और तुम! दोनों ही कायनात के दिए सबसे हसीं तोहफे हैं. तुम्हारी तरह अगर इसका शुक्रिया अदा करूँ तो चहककर कहूंगा 'पापा चलो हम थैंकू बोलते हैं.' और हाथ जोड़ के ही चहक जाऊंगा 'बोल दिया.' ईश्वर इससे सुन्दर कौन सी ही प्रार्थनाएं प्राप्त करता होगा! और इनके अलावा किनका ही जवाब देता होगा!


तुम्हारा होना बस कितना सुन्दर है!

#शौर्य_गाथा 82

Saturday, October 7, 2023

शौर्य गाथा 81

 भाईसाहब ने सारे कपडे बेड पर फैला दिए हैं. मम्मा परेशान हो गई है. वे लेकिन समझ नहीं रहे हैं. पापा के आते ही उनसे शिकायत करती हैं: 'ये आजकल कुछ भी ऊधम कर रहे हैं और मम्मा की बात भी नहीं सुन रहे हैं.'

पापा भाईसाहब को गोद में लेते हैं. सोफे पर बैठते हैं और उनको समझाना शुरू करते हैं. 'बेटा, अच्छे बच्चे मम्मा का काम नहीं बढ़ाते हैं, उनकी मदद करते हैं. कपडे फैलाना नहीं है, जमाना होता है...'

यकायक से अपनी गर्दन मटकाकर भाईसाहब बोलते हैं 'बिलटुल (बिल्कुल)... बिलटुल पापा.'

अब पापा समझाने के लिए आगे कुछ बोल रहे हैं और भाईसाहब सिर हाँ में मटकाते हुए, पापा का चेहरा हाथों में लेकर 'बिलटुल... पापा बिलटुल...' बोल रहे हैं.

'बेटा ऐसे बच्चे... बिलटुल पापा...बिलटुल... अच्छे बच्चे... बिलटुल पापा... नहीं होते... होते हैं पापा, बुलटुल...'

यह दृश्य देख मम्मा की हंसी छूट जाती है. पापा भी हंसने लगते है. 

उफ़! इस ढाई साल के बच्चे को कैसे समझाया जाए.


Friday, October 6, 2023

शौर्य गाथा 80

 भाईसाहब अपने ननिहाल गए हैं. उनकी यशी दीदी उन्हें बहुत प्यार करती है. वो अभी मात्र साढ़े चार साल की है लेकिन समझदारी और बातों में दादी हो चुकी है. दीदी और ढाई साल के भाईसाहब दोनों दिनभर खेलते रहते हैं.

भाईसाहब ने खेल खेल में दीदी को मार दिया है. वो रोने लगी है. भाईसाहब को मम्मा की डांट पड़ती है, लेकिन उनपर कोई असर नहीं है.

दीदी को रोता देख उसके दादू कहते हैं: 'यशी आप भी शौर्य को डांट दो.'

भोली सी दीदी जवाब देती है: 'दादू, बेचारा बच्चा है, अभी अक्ल नहीं है. रहने देते हैं. अकल आ जाएगी तो नहीं करेगा ऐसा.' साढ़े चार साल की यशी की बात सुनकर सबको हंसी आ जाती है. 

इतनी सी यशो और इतना बड़ा दिल! दादू अब उसे गोद में ले प्यार कर रहे हैं. भाईसाहब को देखकर शायद जलन हो रही है. वो भी दौड़ आकर पहुँच गए हैं. 'नानू..नानू ... मुझे भी.... दोदी (गोदी)... दोदी.'

Wednesday, September 27, 2023

Papa's Letters to Shaurya #SixthLetter


मैं अपने एक मित्र से पूछता हूं "क्या बड़ा होकर शौर्य इन पत्रों को पढ़ेगा? पढेगा तो क्या रिएक्ट करेगा?"


"अरे! वह बड़ा खुश होगा। तुमने बहुत सारी अच्छी बातें उसे समझाने की कोशिश की है।"

मैं मुस्कुराता हूं। उन्हें कितनी भारी पड़ी है ज्ञान से, ढेर सारी किताबों से, शक्यमुनि से लेकर मंडेला तक के उदाहरण से। नोबेल शांति पुरस्कार सम्मानित हर व्यक्ति एक नया उदाहरण रख देता है। फिर भी क्या बदल गए लोग?
अहिंसा! अहिंसा! अहिंसा! समझाते समझाते 1915 से 1947 तक गांधी बत्तीस साल निकल देते हैं और अंत में हिंसा के शिकार होते हैं!

सोचते सोचते मैं अखबार पढ़ने लगता हूं और अखबार में नकारात्मक खबरें पढ़ते-पढ़ते मुझे लगने लगा है कि मनुष्य हिंसा के लिए ही बना है, हिंसा उसका मूल स्वभाव है! जो सीख वो तो महज किताबी ज्ञान है।

लेकिन मेरे कहे को खारिज करने जेहन में कई हजार उदाहरण खड़े हो जाते हैं! मानवता के उदाहरण, उम्मीद के उदाहरण... महज मंडेला ही प्रताड़ित करने वालों को माफ करते दिखते हैं और मानवता की उम्मीद में आंखों में आंसू ले आते हैं।

महज बुद्ध, महावीर ही खड़े होकर 2600 साल पहले Indian Plains (गंगा का मैदानी क्षेत्र) की तस्वीर बदल देते हैं। गांधी सही कहते थे हिंसा कायर है, अहिंसा के लिए मुझे एक व्यक्ति काफी है। लौ की तरह!

सती प्रथा खत्म करते राजा राममोहन राय है, लॉर्ड बेंटिक, दास प्रथा खत्म करते अब्राहम लिंकन, बराबरी का हक दिलाती संविधान सभा, छुआछूत मिटाते अंबेडकर, रंगभेद से लड़ते मार्टिन लूथर किंग जूनियर किसी लौ की तरह दिखते हैं।

पी. साईंनाथ को सुन रहा हूं। वह कहते हैं "I get very offended when people make list of freedom fighters and do not include Baba Saheb Ambedkar. As a freedom fighter he launched the greatest battle on the face of the Earth for human dignity (fight against untouchability). That's freedom (struggle). Justice for all, social, political, economic. That's freedom (struggle). Directive principles of State policy talk about education, nutrition to children. That's freedom (struggle)." [मुझे बहुत दुख होता है जब लोग स्वतंत्रता सेनानियों की सूची बनाते हैं और उसमें बाबा साहब अंबेडकर को शामिल नहीं करते। एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्होंने मानवीय गरिमा (छुआछूत के खिलाफ लड़ाई) के लिए पृथ्वी पर सबसे बड़ी लड़ाई शुरू की। यही आज़ादी (के लिए संघर्ष) है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक सभी के लिए न्याय। यही आज़ादी (के लिए संघर्ष) है. राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत बच्चों को शिक्षा, पोषण की बात करते हैं। यही (आज़ादी के लिए संघर्ष) है।]

बाबा अंबेडकर के सारे संघर्ष अहिंसक थे। नीतिगत, कानूनी और नैतिक... और साथ ही 2000 साल के भारतीय इतिहास में में सबसे असरदार और प्रभावी भी!

मानव सभ्यता में वे आंदोलन ही तो महान है जो Human Dignity (मानवीय गरिमा) और Equality (समानता) के लिए लड़े गए हों। इसलिए भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भी, क्योंकि वह एक सामाजिक सुधार आंदोलन भी था।

हजारों उदाहरणों को पढ़ने के बाद तुम भी इस नतीजे पर पहुंचोगे की मनुष्य प्रेम और समरूपता के लिए बना है। प्रेम और महज प्रेम! अहिंसा का मौलिक भाव प्रेम है। मैं भी इसी नए नतीजे पर पहुंचा हूं। बस हिंसा के उदाहरण हमेशा हमें ज्यादा दिखलाए जाते हैं, अखबारों में ज्यादा आते हैं।

यह 2023 है भारतीय पत्रिका के प्रथम पुरुष राजा राममोहन राय ने 200 वर्ष पहले 1822 में मिलात-उल-अखबार निकाल भारतीय पत्रिका को सही अर्थों में प्रारंभ किया था। किसी अन्य पत्र में उनके बारे में भी...

तुम्हारे पापा