Wednesday, June 9, 2021

जंगल की कहानियां : जादव मोलई पेईंग

 #jungle #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

माजुली द्वीप के नदी द्वीप है. देश का सबसे बड़ा. जो ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में स्थित है. ब्रह्मपुत्र की बाढ़ हर साल इस पर कहर बरपाती है. 20वीं सदी की शुरुआत में यह 880 वर्ग किलोमीटर बड़ा हुआ करता था, 2014 में सिमट कर मात्र 352 वर्ग किलोमीटर का ही रहा गया है. बात 1979 की है, यहां के नदी के रेतीले किनारे (Sandbars) पर वृक्षारोपण का प्रोजेक्ट वन विभाग के द्वारा शुरू किया गया. कारण- बाढ़ के प्रभाव को कम करना. एक शख्स इस प्रोजेक्ट में मजदूर के रूप में काम कर रहा था. 1983 में, पांच साल बाद 200 हेक्टेयर वृक्षारोपण का काम पूरा हो गया. मजदूर वापिस जा चुके थे, रोपित पौधे भी काफी उम्र के थे, लिहाज वन विभाग ने भी बहुताधिक सुरक्षा की जरूरत नहीं समझी. परन्तु यह शख्स वहां रुक गया. उनने 1983 से 2013 तक लगातार 30 वर्ष काम कर 550 हेक्टेयर का एक विशाल जंगल खड़ा कर दिया. 550 हेक्टेयर अकेले ही!
इस शख्स ने सारी उम्र दे दी इतना बढ़िया, उच्च गुणवत्ता का जंगल खड़ा करने में. जिसमें बाघ, हाथी और गैंडे भी विचरण कर रहे हैं!
उस शख्स का नाम था जादव मोलई पेईंग (Jadav Molai Payeng). आप में से अधिकतर ने उनकी कहानी पढ़ी होगी या उनका नाम सुना होगा. फिर भी मैं फिर से बताना चाहता था. बताना चाहता था कि जंगल ऐसे ही निर्मित नहीं हो जाते, उच्च गुणवत्त्ता वन तो बिल्कुल भी नहीं. एक जुनून, सारी उम्र और निःस्वार्थ भाव लगता है.
जब भी बक्सवाहा या कहीं और के जंगल के उजड़ने की बात होती है मेरे आंखों के सामने जादव पेईंग का चेहरा घूम जाता है. लगता है जैसे जादव पेईंग की निःस्वार्थ सेवा, लगन, मेहनत, कोशिश और उम्र उजड़ने जा रही हो.
सबकुछ इतना आसान नहीं होता दोस्त. नए जंगल खड़े करना तो बिल्कुल भी नहीं.
[ तस्वीर: बक्सवाहा के जंगल की, जादव पेइंग 2015 में पद्मश्री पुरस्कार लेते हुए. ]



Saturday, June 5, 2021

जंगल की कहानियां : #buxwahaforestmovement

 #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

1974 से हम विश्व पर्यावरण दिवस मना रहे हैं, to raise awareness on environmental issues such as marine pollution, human overpopulation, global warming, sustainable consumption and wildlife crime और बाकि हर दिन हम धरती का क्षरण करते हैं।
अगर एक व्यक्ति शतायु होता है और जिंदगी के पहले दिन से एक पौधा रोज लगाता है तो पूरे जीवन में वो 36525 (365x100 और लीप वर्ष मिला कर) पौधे ही लगा पाएगा।
मुझे पता है हम में से कोई भी ये नहीं कर पाएगा लेकिन वन संपदा जो आपको विरासत में मिली है उसे हम खत्म किए जा रहे हैं। लगभग 215000 (2.15 लाख) पेड़ बक्सवाहा में ही एक झटके में खत्म कर देंगे।
अगर कोई बोले कि मैं पर्यावरण हितैषी हूं, एक पौधा रोज लगाता हूं और आप #savebuxwahaforests या अन्य किसी जंगल/पर्यावरण क्षरण के खिलाफ़ आवाज में साथ नहीं देते हैं, उसे रोकने की कोशिश नहीं करते हैं तो ये आपकी हिपाक्रेसी (Hypocrisy) है!
आज 5 जून को हम पौधा लगाएंगे, सेल्फी लेंगे और सोशल मीडिया पर पोस्ट करेंगे। वन बचाएं, बन बनाएं का नारा लगाएंगे। लेकिन छत्तीसगढ़ की 850 हेक्टेयर की जनजातीय बसाहट की जंगल की जमीन कोयला खान के लिए आवंटित की जाएगी तो चुप रह जायेंगे। 364 हेक्टेयर का बक्सवाहा का जंगल जाएगा तो उसके लिए चुप रहेंगे, नियमगिरि (उड़ीसा) के पवित्र पहाड़ बरबाद होंगे, वहां की नदियां प्रदूषित होंगी तो कोई कुछ नहीं बोलेगा। हिपाक्रेसी की भी एक सीमा होती है!
हममें से हजारों हैं जिन्होंने Covid-19 से परिवार का कोई सदस्य या रिश्तेदार खोया है। हममें से कितने ही ऑक्सीजन सिलेंडर की लाइन में लगे हैं। कितने ही एक समय खुद की सांसे गिने हैं, कोविड पॉजिटिव हुए तो प्रार्थना किए हैं कि ईश्वर हमारी सांसे बचा ले! क्या सांसे ऐसे ही बचती हैं?
तुम्हारी सांसों के लिए ऑक्सीजन लगती है और ऑक्सीजन पैदा करने पेड़, और पेड़ कभी अकेला पेड़ नहीं होता है, जंगल के इकोसिस्टम का हमेशा एक हिस्सा होता है। पेड़ बचाने हैं तो पूरा जंगल, पूरा इकोसिस्टम बचाना होगा। Compensatory Afforestation सिर्फ पेड़ लगा सकता है, patches में लगे ये पेड़ सदियों से बना एक जंगल कभी नहीं बन सकते, ये याद रखना।
कई जगह बीच का रास्ता नहीं होता बाबू। जैसे तुम्हारी जिंदाही और मौत के बीच का कोई रास्ता नहीं है। है भी तो उसे कोमा कहते हैं उस हालत में तुम जाना नहीं चाहोगे। याद रखना जंगल बचाने और न बचाने के बीच का भी कोई रास्ता नहीं है। Compensatory Forestation look good on paper but not a substitute for a 1000 years old forest.
और हां, अंत में यदि आप किसी natural place पर, किसी जंगल, वन अभ्यारण में घूमने जाते हैं और प्लास्टिक, पॉलिथीन या रैपर या अन्य कोई कचरा छोड़ के आते हैं और सोशल मीडिया पर #SaveEnvironment या #SaveForest की बात करते हैं तो याद रखना ये आपकी हिपाक्रेसी हैं।
#WorldEnvironmentDay मनाइए #SaveForests #SaveBuxwahaForests कैंपेन का हिस्सा बनिए किंतु साथ ही खुद को भी बेहतर बनाइए।

Monday, May 24, 2021

जंगल की कहानियां : #buxwahaforestmovement

 #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

बुंदेलखंड क्षेत्र जो मध्य प्रदेश के 7 और उत्तर प्रदेश के 7 जिलों में फैला हुआ है. एक पठारी क्षेत्र है. पठारी क्षेत्रों की अपनी अलग अलग समस्याएं होती हैं, किन्तु इस क्षेत्र की मुख्या समस्या ये है कि यहां पर मृदा कि बहुत गहरी परत नहीं है. कहीं तो 50cm से भी कम है. ऐसे क्षेत्र कि समस्या ये होती है कि यहाँ की मिट्टी वर्षाजल बहुताधिक नहीं सोख पाती है और वर्षाजल का Runoff बहुत अधिक होता है. जिससे मृदा का ऊपरी उपजाऊ परत का बहाव भी बहुताधिक होता है. चूँकि वर्षा का जल धरती में नहीं समाता है इसलिए वर्षाकाल में बाढ़ की आशंका और बाकि समय में सूखे की आशंका अत्यधिक होती है. अत: ऐसा क्षेत्र Flood Prone and Draught Prone दोनों होता है.
इसके अलावा बुंदेलखंड कम वर्षा (Low Rainfall), गर्म जलवायु (Hot Climate), Grid and Ravine Lands, अल्प सिंचाई (Low Quality of Irrigation) की समस्या से गुजर रहा है. जिसक जिक्र सरकार ने 2009 में बुंदेलखंड पैकेज देते वक़्त किया था और नीति आयोग अपनी रिपोर्ट 'Study of Bundelkhand' (2016) में कर चुका है.
तुम्हें पता है इतनी सारी समस्याओं के लिए हमें कई अलग अलग उपाय की जरुरत नहीं है. इन सब समस्याओं का हल एक ही उपाय से हो सकता है, और वो उपाय है- Forestation (वनोपरोपण या वनों का निर्माण), #part1 में 'वनों का महत्त्व' पढ़ेंगे तो आपको समझ आएगा.
अब हम बक्सवाहा पर आते हैं, जहां बुंदेलखंड की ऊपर लिखित अधिकतर समस्याएं तो मौजूद हैं किन्तु वहां Forestation (वनोपरोपण) नहीं, उल्टा Deforestation (वनोन्मूलन) होने वाला है.
बक्सवाहा छतरपुर जिले का हिस्सा है, जहाँ के वन क्षेत्र पन्ना टाइगर रिज़र्व के बफर क्षेत्र से मात्र 20km दूर है. मतलब वनस्पति और जीव (Flora and fauna) में यह क्षेत्र पन्ना नेशनल पार्क वनक्षेत्र जैसा ही है. मजेदार बात तो ये है कि यह क्षेत्र बुंदेलखंड की गंगा बेतवा नदी का कैचमेंट एरिया है, और यहाँ पर हीरे की खदानें आने पर सारी सरिताओं का पानी और भूमिगत जल खनन कार्य में उपयोग होने वाला है.
आप अगर गूगल पर बुंदेर डायमंड ब्लॉक (Bunder Diamond Block) डालेंगे तो यहाँ पर सर्वे करने वाली रिओ टिंटो कंपनी के प्रपोजल की एक रिपोर्ट पीडीऍफ़ फॉर्मेट में मिलेगी जिसमें उसने खनन के लिए 971.515 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्सन की बात कही है. इसमें आसपास के 12 गावों का विस्थापन भी शामिल है. पढ़ेंगे तो उसमें वन विभाग की टिपण्णी भी है जिसमे कहा गया है की ये क्षेत्र वाइल्डलाइफ कॉरिडोर है और इसमें चौसिंघा, तेंदुआ, चीतल, चिंकारा, मोर आदि जानवरों का निवास है और टाइगर के लिए भी माइग्रेटरी कॉरिडोर है.
2019 में आदित्य बिरला ग्रुप की Essel Mining कंपनी को यहां पर हीरे के उत्खनन का प्रोजेक्ट 364 हेक्टेयर भूमि के लिए मिला है. हमें सोचना होगा कि पूरे वनक्षेत्र के इस हिस्से में क्या जानवर विचरण नहीं करते होंगे? यहाँ पर खनन क्या बाकि के वनक्षेत्र को प्रभावित नहीं करेगी? 2015 में टाइगर मूवमेंट रहा है. क्या खनन इसे प्रभावित नहीं करेगा?
कुछ और प्रश्न भी हैं जो ऑफिसियल वेबसाइट पर खंगाल कर पढ़ने के बाद समझ आती है:-
1. जिन 6 गांवों के आसपास प्रस्तावित खनन क्षेत्र (proposed mining area) है उनमें से 2 गाँव खनन एरिया के बहुत पास हैं, 1km से कम दूरी पर हैं.
2. क्षेत्र का सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) नहीं हुआ है. अगर हुआ भी है तो Detail Data Analysis पब्लिक में नहीं है.
ध्यान रखें, सोशल Social Impact Assessment के 6 उपभाग होते हैं-
a. Hazard Assessment
b. Risk Assessment
c. Economic assessment
d. Project program and policy evaluation
e. Cultural Impact
f. Environmental Impact Assessment
3. जो भी आकलन (Assessment) पब्लिक में है वो एकतरफा (Onesided) है, प्रोजेक्ट पाने वाली कंपनी द्वारा बनाया गया है.
4. चौथा प्रश्न मेरा Environmental Impact Assessment ( पर्यावरण प्रभाव आकलन), Economic Value of Forests (वनों का आर्थिक मूल्य) और Cost Benefit Analysis (लागत लाभ विश्लेषण) पर है.
हालाँकि इसमें राष्ट्र स्तर के नियम होते हैं. अत: इसपर अगली कड़ी में विस्तार से बात करनी होगी.

Tuesday, May 18, 2021

जंगल की कहानियां : #buxwahaforestmovement

 #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

"क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।"
यही वो पंक्तियां हैं जो 1973 के चिपको आंदोलन में व्यापक रूप से बोली जाती हैं, आंदोलन की घोष वाक्य थीं।
लेकिन 1972-73 में जंगल बचाने और भी नई बातें हुईं प्रोजेक्ट टाइगर और वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम।
ये अधिनियम कैसे बने इसकी भी एक कहानी है, वो कभी बाद में। लेकिन कठोर कानूनों ने राष्ट्रीय उद्यानों और वन्य प्राणी अभ्यारणों को लगभग अनटचेबल बना दिया। मतलब ये जंगल लगभग पूर्णत: सुरक्षित हो गए। लेकिन ये प्रोटेक्टेड एरिया कुल वन क्षेत्र का मात्र 5% ही हैं। उसपर भी इनकी भूमि ग्रेटर नेशनल इंटरेस्ट में अन्य कामों के उपयोग में लाई जा सकती है। जैसे कि पन्ना टाइगर रिजर्व की 10% भूमि केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के लिए लिया गया है, जिसमें 46 लाख पेड़ों की आहुति चढ़ेगी।^
दो गर्मियों में सूखने वाली नदियों (Non perennial rivers) का लिंक होना बुंदेलखंड का हित कितना कर पाएगा और लिंक प्रोजेक्ट का जलीय जीवों (Aquatic Life) और पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) पर क्या असर पड़ेगा ये तो बाद में पता चलेगा किंतु अभी ये तय है कि लाखों पेड़ों की लाशें तो गिरेगी हीं।
वनों के पेड़ों को काटना/जलाना वनोन्मूलन कहलाता है और वनोन्मूलन के क्या नुकसान हैं ये एक 7वीं का बच्चा भी बता सकता है। यहां नोट करूं तो:
1. विलोपन (extinction of species)
2. जलवायु में परिवर्तन
3. मरुस्थलीकरण (desertification)
4. स्वदेशी लोगों के विस्थापन
5. वनोन्मूलन जलवायु (climate) और भूगोलमें परिवर्तन ला रहा है।
6. वनोन्मूलन ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देती है और हरित गृह प्रभाव Green House Effect को बढ़ावा देने के लिए एक मुख्य कारक है।
7. वनोन्मूलन कुल एंथ्रोतपोजेनिक (anthropogenic)कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के एक तिहाई के लिए उत्तरदायी है।
8. जल चक्र भी वनोन्मूलन से प्रभावित होता है। पेड़ अपनी जड़ों के माध्यम से भूजल अवशोषित करते हैं और वातावरण में मुक्त कर देते हैं। जब जंगल का एक हिस्सा निकाल दिया जाता है तो पेड़ इस पानी को वाष्पीकृत नहीं करते और इसके परिणाम स्वरुप वातावरण शुष्क हो जाता है।
9. वनोन्मूलन आमतौर पर मृदा अपरदन (erosion) की दर को बढा देती है, क्योंकि प्रवाह (runoff) की मात्रा बढ़ जाती है और पेडों के व्यर्थ पदार्थों से मृदा का संरक्षण कम हो जाता है।
10. वनोन्मूलन अनुत्क्रमणीय रूप से आनुवंशिक भिन्नताओं (जैसे फसल की प्रतिरोधी क्षमता) को नष्ट कर देती है।
वनोन्मूलन 1972 के कठोर कानूनों के बाद भी रुका नहीं है यह हम पन्ना टाइगर रिजर्व और बक्सवाहा फॉरेस्ट की स्थिति से देख सकते हैं।
लेकिन क्या इसके खिलाफ़ 1973 के बाद आवाजें नहीं उठीं? बिलकुल उठीं। जैसे, देश के सबसे सुंदर जंगल को बचाने वाला 1973 का साइलेंट वैली मूवमेंट, कर्नाटक का एप्पिको मूवमेंट 1983, जंगल बचाओ आंदोलन 1983, नियमगिरि मूवमेंट 2013 और इनमें सबसे सफलतम साइलेंट वैली प्रोजेक्ट की कहानी:
"साइलेंट घाटी केरला में स्थित है। यह एक विशाल जंगल है जो केरला के पालघाट जिले में स्थित है। इस जंगल में कुंथीपुज्हा नदी मुख्य रूप से बहती है।
1970 में केरला राज्य विद्युत बोर्ड ने इस स्थान पर जल विद्युत् बांध (हाइड्रो इलेक्ट्रिक डैम) बनाने का प्रस्ताव रखा जिससे 8.9 किलोमीटर का क्षेत्र पानी में डूब जाता। योजना आयोग ने इस बांध को बनाने के लिए 25 करोड़ की धनराशि स्वीकृत कर दी।
साइलेंटघाटी आंदोलन की शुरूआत:
जैसे ही बांध बनने की घोषणा हुई लोगों ने उसका विरोध शुरू कर दिया। शांति घाटी (साइलेंट वैली) अपने हरियाली पेड़ पौधों और जंगल के लिए जानी जाती है। यह क्षेत्र जैव विविधता से संपन्न है, इसलिए लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। शांति घाटी में लंबी पूंछ वाले मकाक बंदर भी पाए जाते हैं जिनको दुर्लभ प्रजाति समझा जाता है।
रोमुलस वीटाकर जिन्होंने मद्रास सर्प उद्यान की स्थापना की थी, उन्होंने सबसे पहले बांध योजना का विरोध करना शुरू किया। 1977 में केरला वन रिसर्च संस्थान ने सर्वे करना शुरु किया कि बांध बनने के बाद पर्यावरण को कितना नुकसान होगा।
शांति घाटी को बचाने के लिए “केरला शस्त्र साहित्य परिषद” ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई पब्लिक मीटिंग की, इसमें लोगों को बांध बनने के बाद पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में विस्तार से जानकारी दी। सुगाथाकुमारी जो केरला की विख्यात कवित्री थी, वह भी इस आंदोलन में जुड़ गई। उन्होंने “शांति घाटी बचाओ” (सेव साइलेंट वैली Save Silent Valley) का नारा दिया। शांति घाटी को बचाने के लिए उन्होंने कई कविताएं भी लिखी जिन्होंने जिन्होंने आंदोलन में लोगो को जागरूक बनाया।
डॉक्टर सलीम अली जो एक प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी थे और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सदस्य थे उन्होंने इस जलविद्युत बांध परियोजना को बंद करने की अपील की।
डॉ एम एस स्वामीनाथन जो एक जाने-माने कृषि वैज्ञानिक हैं और कृषि विभाग के सचिव थे उन्होंने शांति घाटी को एक आरक्षित पर्यावरण पार्क बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि शांति घाटी के 8.9 किलोमीटर वर्ग क्षेत्र और इससे लगे हुए अमाराबालम (80 वर्ग किमी), अट्टापड्डी (120 वर्ग किमी), जैसे क्षेत्रों को मिलाकर एक प्राकृतिक पार्क बनाने की बात कही।
1982 में एक कमेटी बनाई गई जिसका चेयरमैन एन जी के मेनन को बनाया गया। 1983 में मेनन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट को अच्छी तरह पढ़ने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने शांति घाटी में बनने वाले जल विद्युत बांध परियोजना को बंद करने का आदेश दे दिया। 15 नवंबर 1984 को इसे एक राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दे दिया गया और इसे संरक्षित पार्क बना दिया गया।"*
तो साइलेंट वैली मूवमेंट जीता क्योंकि:
स्थानीय लोगों की जागरूकता, आंदोलन को राष्ट्रीय मंच का मिलना, लोकतांत्रिक सरकार, सतत संघर्ष, आंदोलनकारियों और सरकार के मध्य सफल संवाद, सरकार की अच्छी मंशा
ये सब वहां मौजूद था।
मतलब अगर चिपको आंदोलन और साइलेंट वैली मूवमेंट से समझें तो वन और पर्यावरण बचाने को जो सफल आंदोलन रहे हैं उनमें निम्न मुख्य प्रभावी बातें रही हैं:
1. स्थानीय लोगों की इच्छा.
2. स्थानीय लोगों की जागरूकता.
3. आंदोलन को राष्ट्रीय मंच का मिलना
4. लोकतांत्रिक सरकार.
5. कुशल नेतृत्व.
6. सतत अहिंसक संघर्ष.
7. आंदोलनकारियों और सरकार के मध्य सफल संवाद.
8. सरकार की अच्छी मंशा.
9. जनसंवाद
और to #save_buxwaha_forest हमें इन्हीं चीजों की जरूरत होगी।
(तस्वीरें: बक्सवाहा के हरे-भरे जंगल की, जिसे उजाड़ हीरे निकाले जाएंगे.)

Wednesday, May 12, 2021

जंगल की कहानियां : #buxwahaforestmovement

 #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

कहानी ऐतिहासिक है. अंग्रेज़ों ने दो सौ साल हमपर राज़ किया. हमारे सारे संसाधन लूटे. हमारे जंगलों से 1000 -1000 साल पुराने पेड़ काट के ले गए. उनको ढोने के लिए हाथियों को पीट-पीट कर पालतू बनाया गया. अगर वहां आदिवासी या जनजातियां थीं तो उन्हें बन्दूक की दम पर, उलटे सीधे नए कानून बनाकर खदेड़ा गया. फिर साफ़ हुए जंगल से खनिज सम्पदा (mineral wealth) का दोहन किया गया, और ऐसी कंपनी चलाने की परमिशन सिर्फ अंग्रेज़ों को हुआ करती थी. हुआ ये कि कई आदिवासी आंदोलन उठ खड़े हुए- भील विद्रोह, संथाल विद्रोह, कोल विद्रोह, मुंडा विद्रोह, छोटा नागपुर विद्रोह जैसे विद्रोह (Revolts) हुए. हालाँकि अंग्रेजी राज़ था, राजतंत्र था. मामला सिफर रहा. लोग मरते रहे, दोहन होता रहा. जंगल कटते रहे. ज़मीन बंजर होती रही. अकाल पड़ते रहे. भारतीय सेकंड क्लास सिटीजन (दोयम दर्जे के नागरिक) और यूँ कहें तो लगभग गुलामों की तरह जीते रहे. मनमाने, अपने तरीके की रिपोर्ट्स, अपने तरीके के लॉ आते रहे.
बात 1947 के बाद की है हम स्वतंत्र हो चुके थे. इतना सबकुछ उजड़ जाने के बाद भी वन सम्पदा में हम समृद्ध थे. 1970 के दशक शुरुआत में उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के एक हिस्से में जंगलों की कटाई व्यापक रूप से हो रही थी. वहां के किसानों ने इसका विरोध किया....जमकर विरोध किया. रेणी में वन विभाग और ठेकेदारों को 2400 पेड़ काटने थे तो गौरादेवी जी के नेतृत्व में 27 महिलाओं ने मात्र वहां खड़े होकर, प्राणों की बाजी लगाकर पेड़ो का कटना रुकवा दिया. आज़ादी मिले मात्र पच्चीस साल हुए थे. गांधी जी के मूल्य और उनके कुछ शिष्य अभी भी ज़िंदा थे. देखते देखते एक आंदोलन खड़ा हो गया, जिसने पेड़ और हिमालय दोनों बचा लिए. आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा, गोविन्द सिंह रावत, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरादेवी जी ने जिस अहिंसक आंदोलन को खड़ा किया था उसे हम 'चिपको आंदोलन' कहते हैं.
आज़ादी के पहले और बाद के दोनों सन्दर्भों को देखें तो आपको समझ आएगा कि क्यों आज़ादी के पहले विद्रोहों बाद भी जंगल बचा पाना संभव नहीं हुआ और क्यों बाद में चिपको आंदोलन का इतना व्यापक असर रहा.
लोकतंत्र. अहिंसा. आज़ादी. गांधीजी के मूल्य. कुशल नेतृत्व. इन सबसे ऊपर स्थानीय लोगों की इच्छा. इतना कुछ था जिसने जंगल बचाया.
लेकिन सोचने वाली बात ये है कि ब्रिटिश राज़ हो या लोकतान्त्रिक सरकार. दोनों के लिए जंगल बस राजस्व (revenue generation) का जरिया थे. जंगल, जैव विविधता और भूमिगत जल संरक्षण (ground water conservation) पर किसी को कुछ सोचना ही नहीं था.
तब भी नहीं था, अब भी नहीं है. तात्कालिक उदाहरण बक्सवाहा फारेस्ट है ही. परतंत्र भारत के नागरिकों की तरह ही जंगल भी सरकारों के लिए दोयम दर्ज़े पर ही रहे हैं. अगर राजस्व मिल रहा है तो जंगल को काटो, उजाड़ो, खोदो और मिनरल्स निकालो, पेड़ बेचो, कंपनियों को टेंडर दो और जरुरत पड़े तो वहां के स्थानीय निवासियों, आदिवासियों को धकेलो, खदेड़ो, बाहर फेंक दो. बिना चिंता किये कि जंगल क्यों आवश्यक है. और क्यों आवश्यक हैं, ये तो 7वीं का बच्चा भी एक अच्छे निबंध से बता सकता है. और क्यों न बता पाए! इसपर सरकारें 22 मई को जैव विविधता दिवस पर या 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर बच्चों से ही तो निबंध लेखन कराती हैं, अच्छा लिखने वालों को इनाम भी देती हैं.
'वनों का महत्व' विषय पर लिखे एक बच्चे निबंध को टीप कर लिखूं तो. वन आवश्यक हैं:-
1. वायुमंडल की शुद्धि के लिए
2. जैव विविधता के लिए
3. जीवों के आवास के लिए
4. प्राकृतिक वाटरशेड हैं
5. आजीविका का साधन हैं
6. मिट्टी के निर्माण के लिए
7.भूमि कटाओ, बाढ़ को रोकने के लिए
8. मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए
9. मिट्टी की उर्वरकता के लिए, ह्यूमस के लिए
10. ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए
11. वर्षा के लिए
12. प्राणवायु ऑक्सीजन के लिए
13. जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए
13 बिंदु सातवीं का बच्चा लिख सकता है वनों के महत्त्व पर.* फिर भी सरकारें चाहती हैं कि धन और राजस्व के लिए जंगल उजाड़े जाएँ. शायद पास के फायदे के लिए भविष्य तबाह करते जा रहे हैं.
(तस्वीरें: बक्सवाहा के हरे-भरे जंगल की, जिसे उजाड़ हीरे निकाले जाएंगे.)

Sunday, April 26, 2020

एक था कुम्भकर्ण

KRIYA GURUPRANAM: The story of Kumbhakarna

कुम्भकर्ण की कहानी जाननी हो तो हमें जय-विजय की कहानी जाननी होगी. जय-विजय वैकुण्ड के द्वारपाल थे. ब्राह्मण पुराणानुसार वे वरुण देव और उनकी पत्नी स्तुता के पौत्र और कलि के पुत्र थे. अनन्य विष्णु भक्त दोनों भाइयों को विष्णु ने वैकुण्ड का द्वारपाल नियुक्त किया.

भागवत पुराण अनुसार एक बार ब्रह्मा के मानस पुत्र चार कुमारों ने वैकुण्ड का भ्रमण किया तो द्वार पर ही उन्हें जय विजय मिल गए. चारों कुमार तपस्या के बल पर बाल रूप में दिखते थे. जय-विजय ने उन्हें देखा और बाल रूप के कारण बच्चे समझ कर यह कह जाने से रोक दिया कि 'भगवन अभी विश्राम में हैं. बाद में दर्शन कीजिये.' कुमार कुपित हो गए. 'विष्णु अपने भक्तों के लिए हमेशा उपस्थित रहते हैं.' यह कह कर उन्होंने जय-विजय को पृथ्वीलोक पर हमेशा के लिए जीवन-मृत्यु चक्र में फंसे रहने का श्राप दे दिया.

जय विजय घबराकर भगवन की शरण में पहुंचे. विष्णुजी ने कहा कि कुमारों का दिया हुआ श्राप तो बदला नहीं जा सकता है लेकिन मुक्ति के दो उपाय हैं. एक ये कि तुम दोनों सात जन्मों तक मेरे अनन्य भक्त बनकर के धरती पर जन्म लो और इसके पश्चात् वापस वैकुण्ड लौट आओगे. दूसरा ये कि सिर्फ तीन जन्मों तक मेरे परम-शत्रु बनकर जन्म लो और फिर वापस वैकुण्ड लौट जाओगे. जय-विजय प्रभु के अनन्य भक्त थे उन्हें बहुत दिनों तक विष्णुजी से अलग रह पाना संभव नहीं था. इसलिए उन्होंने शत्रु बनकर जन्म लेना स्वीकार किया. लेकिन इसके लिए उन्हें कुल तीन युगों कि यात्रा करनी पड़ी!

सतयुग में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में जन्में. विष्णु ने उनका उद्धार करने हिरण्याक्ष के लिए वराह अवतार और हिरण्यकश्यप के लिए नरसिंह अवतार लिया. त्रेता युग में वे रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्में और रामावतार से उदधृत हुए. द्वापर युग में वे शिशुपाल और दन्तावक्र के रूप में जन्में और कृष्णावतार से उद्धृत हुए.

अत: मृत्यु उपरांत रावण और कुंभकर्ण को वैकुण्ठ प्राप्त हुआ था.

कुम्भकर्ण का मतलब होता है कुम्भ (यानि मटका) के जैसे कानों वाला. नाम भी इसलिए पड़ा था कि वो दैत्याकार पैदा हुआ था. कुम्भकर्ण ऋषि विश्रवा के पुत्र के रूप में जन्मा था जिसमे जन्म से राक्षसी प्रवित्तियाँ हावी थी. इसलिए वह दैत्याकार था. लेकिन ऋषि संरक्षण में उसमें रीति-नीति, प्रेम जैसे मानवीय गुणों का वास भी हुआ. विश्रवा ये जानते थे कि अर्ध-राक्षस, अर्ध-मानवीय उनके पुत्रों का जीवन कठिनतम हो सकता है इसलिए उन्होंने ब्रह्मा जी कि तपस्या के लिए अपने तीनों पुत्रों को प्रेरित किया. अति कठोर तपस्या करने के पश्चात् रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण पर ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा.

कुंभकर्ण को दो वर मांगने थे- इन्द्रासनम और निर्देवतम. अर्थात 'इन्द्र का आसन' और 'देवताओं का अंत'. लेकिन इन्द्र को इस बात का भान था. इसलिए उन्होंने देवी सरस्वती की आराधना की. फल स्वरुप देवी कुम्भकरण कि जिह्वा में आकर बैठ गई और कुंभकर्ण के मुंह जो निकला वो था- निद्रासनम और निद्रावतनम अर्थात 'निद्रा के लिए आसन' हो और 'निद्रा का आगमन' हो. सीधे सीधे उसने सोने के लिए वरदान मांग लिए. ब्रह्मा से तथास्तु कहा और रावण के लाख मनाने पर भी वरदान बदले बिना अंतर्ध्यान हो गए. इस तरह धरती पर एक राक्षस चैन की नींद सोने लगा.

कालांतर में कुम्भकर्ण के कुम्भ, निकुम्भ और भीमासुर नाम से पुत्र भी हुए.

मानस में कुम्भकर्ण की राम के प्रति अनन्यता जाहिर की गई है. तुलसीदास जी ने लिखा हुआ है:

राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक
रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक

( रामचंद्रजी के रूप और गुणों को स्मरण करके वह एक क्षण के लिए प्रेम में मग्न हो गया। फिर रावण से करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाए.)

 महिषखाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समान
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा.

(भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह बिजली गिरने के समान गरजा। मद से चूर रण के उत्साह से पूर्ण कुंभकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली.)

कुंभकर्ण को जब जगाया गया तो उसने रावण से अकस्मात् जगाने का कारण पूछा और कारण जानने के बाद उसने जो कहा वो मानस में इस तरह लिखा हुआ है:

 भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥
अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना॥

( हे राक्षसराज! तूने अच्छा नहीं किया। अब आकर मुझे क्यों जगाया? हे तात! अब भी अभिमान छोड़कर श्री रामजी को भजो तो कल्याण होगा.)

हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥
अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥
( हे रावण! जिनके हनुमान्‌ सरीखे सेवक हैं, वे श्री रघुनाथजी क्या मनुष्य हैं? हाय भाई! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया॥)

 कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥
नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबाहा॥3॥
( हे स्वामी! तुमने उस परम देवता का विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनि ने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता, पर अब तो समय जाता रहा॥)

अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सुफल करौं मैं जाई॥
स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥4॥
(हे भाई! अब तो अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापों को छुड़ाने वाले श्याम शरीर, कमल नेत्र श्री रामजी के जाकर दर्शन करूँ॥)

मतलब कुम्भकर्ण को पता था कि रावण ने क्या किया है और राम कौन हैं. किन्तु वह भ्रातृ-आज्ञा का पालन करने और रामचंद्र जी से मिलने के लिए युद्ध में शामिल हुआ.

विभीषण को देख कुम्भकर्ण ने उसे समझाया और उसे खरी-खोटी सुनाने के बाद उसकी प्रशंसा भी की. तुलसीदास अनुसार:

 देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥2॥
(उसे देखकर विभीषण आगे आए और उसके चरणों पर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाई को उठाकर उसने हृदय से लगा लिया और श्री रघुनाथजी का भक्त जानकर वे उसके मन को प्रिय लगे॥)

 तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥
(विभीषण ने कहा- हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार करने पर रावण ने मुझे लात मारी। उसी ग्लानि के मारे मैं श्री रघुनाथजी के पास चला आया। दीन देखकर प्रभु के मन को मैं बहुत प्रिय लगा॥)

सुनु भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥
धन्य धन्य तैं धन्य विभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥
कुम्भकर्ण ने कहा- हे पुत्र! सुन, रावण तो काल के वश हो गया है (उसके सिर पर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षस कुल का भूषण हो गया॥

 बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर॥

(हे भाई! तूने अपने कुल को दैदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुख के समुद्र श्री रामजी को भजा॥)

 बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥
 मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर रणधीर श्री रामजी का भजन करना। हे भाई! मैं काल के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता, इसलिए अब तुम जाओ॥

इस तरह कुम्भकर्ण ने राक्षस प्रवृत्ति का होते हुए भी धर्म और नीति का पालन किया और मृत्यु को वरण  किया.



Saturday, November 30, 2019

रावण के जन्म की कहानी



रावण नाम सुनते ही हमारे अंदर एक दैत्याकार , दस सिर  बीस हाथ वाले आदमी का चेहरा उभर आता है. कुछ के सामने शायद रामानंद सागर के रामायण के अरविंद त्रिवेदी जी द्वारा निभाए चरित्र का चेहरा उभर आता हो. लेकिन जो भी है आता चेहरा एक राक्षस का ही सामने है. लेकिन क्या रावण वाकई राक्षस था? इसे जानने के लिए हमें रावण के जन्म की कथा पर जाना होगा.

हुआ यूँ की राक्षस राज सुमाली ने सब दैत्यों को हरा दिया था. वो और उसके भाई माली और माल्यवान मिलकर बहुत ताकतवर थे. उसकी स्वयं की पत्नी केतुमति एक गन्धर्व कन्या थी. सुमाली स्वयं एक बेहद शक्तिशाली राजा था. उसने सारे दैत्यों और देवों को जीत कर अपना राज्य लंका में स्थापित किया था. किन्तु कालांतर में उसका शक्तिशाली भाई माली विष्णु के हाथों मारा गया और बाद में देवों के हाथों हार कर उसे रसताल में शरणागत होना पड़ा. विक्षुप्त सुमाली अब खुद से भी ज्यादा शक्तिशाली, समझदार, ज्ञानी पुरुष को अपने उत्तराधिकारी के रूप में चाहता था. वह चाहता था कि न सिर्फ देवगण उसके उत्तराधिकारी से डरें बल्कि  वो इतना तपी, हठी, योगी हो कि त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) को भी उसके ज्ञान, तप और योग का भय हो.

उसी समय स्वयं ब्रह्मा के पौत्र और महर्षि पुलत्स्य के पुत्र विश्रवा के तप के चर्चे सारे ब्रह्माण्ड में गूंज रहे थे. इनके तप, ऋषिव्रत से प्रसन्न हो महर्षि भारद्वाज ने अपनी कन्या इलाविडा का विवाह इनसे किया था. सुमाली और केतुमति को ये पुरुष युगपुरुष सा प्रतीत हुआ. विश्रवा के बारे में विस्तार से पता किया गया और सुमाली और केतुमति ने अपनी सबसे सुन्दर कन्या कैकसी जो खुद गन्धर्व कन्या कि तरह ही बेहद सुन्दर थी, का विवाह विश्रवा से करने का निश्चय किया. लेकिन परेशानी ये थी कि इतना बड़ा योगी किस तरह कैकसी से विवाह हेतु तैयार हो? इसके लिए कैकसी ने ऋषि आश्रम एक समक्ष अपने सौंदर्य का प्रदर्शन किया, ना-ना प्रकार से रिझाया, स्वयं सुमाली ने इस तरह का प्रेमाच्छिद वातावरण बनाया कि विश्रवा कैकसी के प्रेमपाश में बांध जाएँ. और हुआ भी यही. विश्रवा ऋषि कैकसी के प्रेम में बंधे अपना घर, अपने पुत्र कुबेर और पहली पत्नी इलाविडा को छोड़ कर कैकसी के साथ रहने के लिए आ गए. उन्होंने नया आश्रम बनाया और वहीँ कैकसी के साथ निवासरत हुए.

कालांतर में महर्षि विश्रवा और कैकसी को तीन पुत्र रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और एक कन्या प्राप्त सूर्पनखा प्राप्त हुए.

कहते हैं इन तीनों पुत्रों में से प्रथम पुत्र रावण में अनुवांशिक रूप से अपने पिता और अपनी माता दोनों के कुलों के बराबर गुण आये. दूसरे पुत्र कुम्भकर्ण में माता के कुल के गुण थे. अंतिम पुत्र विभीषण में पूर्णत: पिता के कुल के गुण थे.

रावण में माता के कुल और पिता के कुल दोनों के गुण अनुवांशिक रूप से समाये हुए थे. इसलिए वो पिता के कुल की ओर से जहाँ स्वयं भगवान ब्रह्मा का प्रपोत्र था तो योगी श्रेष्ठ विश्रवा का पुत्र था. मतलब उसमे देवीय अंश, श्रेष्ठ ऋषि के श्रेष्ठ मानवीय अंश एक साथ विद्यमान थे. वहीँ माँ के कुल की तरफ से नानी के गन्धर्व अंश तथा पिता के बलशाली राक्षस कुल के अंश थे. मतलब रावण में बुद्धि, तप-तपस्या-त्याग, योग, ज्ञान जैसे दैवीय गुण एवं संयम, अभय, विवेक, न्याय जैसे मानवीय गुण अनुवांशिक रूप से से ही विद्यमान थे तो साथ में बल, शक्ति, युद्ध निपुणता तथा कपट,  क्रूरता, हिंसा जैसे राक्षसी गुण-अवगुण भी थे तो गांधर्वीय सौंदर्य, संगीत-ज्ञान एवं सांस्कृतिक निपुणता भी जन्म से मौजूद थी. इसलिए रावण सर्वोत्तम योगी व शिव भक्त था, एक बेहतरीन वीणा वादक, एक बेहतरीन योद्धा हुआ. इसलिए वह एक योगी का पुत्र होते हुए भी लंका को जीत पाने में समर्थ हुआ बल्कि वहां का बेहतरीन और जन-मान्य राजा भी साबित हुआ. रावण को चारों वेदों का ज्ञान था और सारे छह: शास्त्र भी ज्ञात थे. कहते हैं उसके दसों सिरों का मतलब भी यही है कि उसे चार वेद और छह शास्त्र ज्ञात थे. जैन धर्म में उसके दस सिरों का मतलब उसको दस दर्शनों का ज्ञान होना बताते हैं.

लेकिन इतना ज्ञान, प्रतापी, शिव-भक्त, आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ रावण के साथ ऐसा क्या हुआ था कि उसको मरने के लिए स्वयं भगवान को अवतार लेना पड़ा?
कारण ये था कि रावण का जन्म एक साजिश के माध्यम से हुआ था. इसलिए उसका लालन-पालन भी नाना-कुल के सानिध्य में हुआ. इसलिए भले ही उसमें अनुवांशिक रूप से राक्षस कुल के बस कुछ अंश थे किन्तु पालन-पोषण और संपर्क में मिले संस्कारों के कारण उसमें राक्षसी प्रवित्तियाँ ज्यादा हावी हुईं और अंतत: अंत का कारण भी बनी.

Sunday, June 30, 2019

Article 15


Gaurav Solanki की पहली कहानी मैंने 'चालीस' पढ़ी थी.  फिर 'हिसार में हाहाकार' पढ़ी,  लगा कि ये लड़का सच लिख देता है,  जैसा होता है वैसे ही.
सच मतलब कुछ की भाषा में डार्क ट्रुथ ऑफ द सोसायटी.  उससे conversations हुए तो ये लगा भी. 
Article 15 उसकी लिखी एक बेहतरीन फिल्म है.  सच जो कि लेयर्स में है,  नग्न है और एक युवा अधिकारी जिसकी खोज में है.

सच जो उसके बिल्कुल करीब है, साथ में जीप में चलता है,  लेकिन उसे ढूंढना और खोजना बेहद मुश्किल है.

हर सच को छुपाने एक पूरी जमात खड़ी होती है,  यहाँ भी है.

एक दलित क्रान्तिकारी भी है,  एक बेहद intelligent स्टूडेंट रहा है लेकिन कास्ट सिस्टम में कई प्रतिभाओं की तरह ही पिस गया आदमी.

हालांकि फिल्म में ये किरदार बहुत नहीं उभर पाया है.  उसके आने से अंत तक बहुत ज्यादा पता नहीं चलता.  हम उसकी हत्या से पहले उसके dialogues तक ज्यादा जुड़े महसूस नहीं कर पाते.

ऑफिसर और उसकी गर्लफ्रेन्ड के बीच के conversations फिल्म का बेहतरीन पार्ट हैं और अखबार के पेज-3 और पेज-7 के बीच के पेज लगते हैं. समझने लायक,  सुनने लायक,  गुढने लायक.
 ये 'गांवो में क्या हो रहा है और शहर तक क्या सच पहुँच रहा है' वाला अंतर है.

ये पुलिस अधिकारी कोई सिम्बा या सिंघम नहीं है.  एक साधारण युवा जो ट्रेनिंग के बाद अपनी पहली पोस्टिंग पे आया है.  किर दार सच के इतने करीब है कि Vipin की पहली पोस्टिंग की कहानियों की याद दिलाता है.

कई जगह पर किताबी हो जाने के बाद भी ये फिल्म एक बेहतरीन सिनेमा है.

Caste के अंदर caste,  category के अंदर sub-category की बात करते,  उनके अंतर  उजागर करते हमें फ्रेम दर फ्रेम में सोचते रहने को मजबूर करती है.

ये फिल्म Reservation के खिलाफ आंदोलित युवाओं को धैर्य रखने को कह सकती है.  उन्हें अपने दूषण की और झांकने का मौका देती है.
ये फिल्म 'Elite' दलित तबके को भी ये अधिकार खुद छोड़ निचले तबके को पहुंचाने की सलाह हो सकती है. निचले स्तर पे काम करने की सलाह हो सकती है. (हालांकि फिल्म खुद ये कह देती है कि जो दलित व्यक्ति ऊपर उठ के जाता है वो नीचे हेय दृष्टि से देखना शुरू कर देता है.)

फिल्म अन्य कारणों के अलावा इस दशक की सबसे अच्छी सिनेमाटोग्राफी के लिए भी याद की जाएगी.

हम सबका हमारे नग्न सच को एक बार देखने जाना तो बनता है.

-Vivek Vk Jain

#Article15 #RightToEquality #Constitution

For Reference:

Article 15 in The Constitution Of India 1949

15. Prohibition of discrimination on grounds of religion, race, caste, sex or place of birth
(1) The State shall not discriminate against any citizen on grounds only of religion, race, caste, sex, place of birth or any of them
(2) No citizen shall, on grounds only of religion, race, caste, sex, place of birth or any of them, be subject to any disability, liability, restriction or condition with regard to
(a) access to shops, public restaurants, hotels and palaces of public entertainment; or
(b) the use of wells, tanks, bathing ghats, roads and places of public resort maintained wholly or partly out of State funds or dedicated to the use of the general public
(3) Nothing in this article shall prevent the State from making any special provision for women and children
(4) Nothing in this article or in clause ( 2 ) of Article 29 shall prevent the State from making any special provision for the advancement of any socially and educationally backward classes of citizens or for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes