Tuesday, April 17, 2018

[ The Obtuse Angle ] 3

हम सोशल मीडिया पे लिख लिख कर गुस्से का इज़हार करते हैं, वक़्त हुआ तो किसी चौराहे पे मार्च या इंडिया गेट पे कैंडल जलाने में हिस्सा बनते हैं... और लेकिन वोट अपने जाति वाले को ही देते हैं.

हम  इतने सभ्य हैं कि जब तक हादसे घर पे दस्तक नहीं देते खुद की सोच तक हम नहीं बदलते. हमने अपनी जातियों/धर्मों को वोट दिए हैं. हमने अपने फ्रैंकेंस्टीन खुद पैदा किये हैं. 

कितना सुख है शाम को कुर्सी पर बैठ ये सोचने में कि आज हमारे साथ कोई हादसा नहीं हुआ है... और कितना सुकूं है फोन पे ये पता चलने में कि चाहने वाले भी ठीक हैं.

सच तो ये है, सुख के साथ मैं ये लिख रहा हूँ, सुकूं के साथ आप इसे पढ़ने वाले हैं. कल नए फ्रैंकेंस्टीन  फिर पैदा करने वाले हैं. कल फिर सोशल मीडिया पे कवितायेँ, चौराहे पे मार्च और कैंडल जलाने वाले हैं और उसके फोटो चस्पाने वाले हैं.

वैसे पिछली बार की कविता उतनी अच्छी नहीं थी, शायद इमोशंस कम रह गए थे. इस बार तो क्या लिखा है आपने!
इस बार की फोटो ठीक ही है. अगली बार कैंडल सामने और बैनर बगल में रख के फोटो खिचाईयेगा... बेहतरीन आएगी. पूरा एक्टिविस्ट लगेंगे. 

दुआ करता हूँ ये आपके लिए 'अगली बार' जल्दी ही आएगा.

Outrage alone is not going to show us the way forward. The way forward lies in painstaking investment in police resources. We have an abysmal police-population ratio. It needs to improve in quantity and quality. We need better trained investigators with vastly improved forensic facilities. We need programmes to protect crucial witnesses. We need a plea bargaining system so that minor cases don’t clog up our courts. We need a much healthier judge-to-population ratio. We need tougher laws against perjury, false complaints before the police, and for obstruction of justice. We need tough action against police personnel who fail to act without fear or favour. And this action cannot be confined to the junior ranks. Their supervisory officers, including IPS officers, must be held accountable when they fail to act.
The outrage brigade needs to gets its act together and start venting on these issues. Come election time, let every citizen ask their candidates about their proposals for improving the quality of policing. And in between elections, they must hold their elected representatives and the police leadership accountable for delivering on these proposals. It’s a lot harder to do than instant outrage. But there is no other way. If tears, candlelight marches and rants on social media were sufficient to ensure justice for December 16, baby Masoom would be alive and scampering around in some meadow today. 

Wednesday, April 11, 2018

[The Blue Canvas] ८

मेरा लिखा सबकुछ यूं ही छितर जाता है. कई पंक्तियां लिख के दे दी किसी को  तो वापस ना लीं. कई कविताएं पिछले पन्नों में कॉपी के साथ रद्दी में चली गईं. फेसबुक/ब्लॉग पर आधे से कम आता है और फेसबुक पर तो बस वो 'ओनली मी' नहीं होता जो लगता है कि समझ पाएंगे लोग थोड़ा सा... फिर भी तुम पे लिखा सबकुछ जाने क्यूं समेटने की कोशिश कर रहा हूं... शायद कल के लिए यादों के सहारे ढूंढ रहा हूं...

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वो साथ के बहुत दूर चल के ले कर जाने को कहती है लेकिन हकीकत में साथ आना नहीं चाहती.
उसकी कविताएं मेरे बारे में बहुत कुछ बोलती हैं लेकिन जब वो मुंह से वही बोलती है तो इतनी दृढ़ नहीं दिखती. जैसे आंखे बोलते बोलते कुछ और सोचने लगी हों और दिल और कुछ रहा हो.

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मेरे पास वजहें नहीं है प्यार की... शायद कल बस तुम कम अच्छी लगना लग जाओ तो भी वजहें ना हों. लेकिन तुम्हारे पास हैं... कई वजहें इनकार की... कई इकरार की... कई ख़फ़ा करने की... कई बस ना मुस्कुराने की... मैं बस इन्हीं वजहों से डरता हूं... जो सामने आ के खड़ी हो जाती हैं...

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ये बहुत अजीब सा इत्तेफ़ाक़ है कि मेरे सबसे बुरे दिनों में वो लड़की खड़ी रही जिसको मैंने सिर्फ कुछ ही दिन जाना था... और वो लड़कियां सबसे पहले दफा हुईं जिन्हें मैंने चाहा...

अक्सर जब तुम लोगों के लिए उनके हर दौर में खड़े होते हो डिसएपॉइंट होने के पूरे चांस होते हैं क्यूंकि ये सब कर पाना सबके बस की बात नहीं होती.

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ये अजीब दौर है... जहां लोगों से लॉयाल्टी की उम्मीद करना ही बेमानी है... लोग दिल में कुछ अरमान छुपाए, सांसों में कुछ लिए, होंठो पे मुस्कान लिए कुछ ओर जीने की कोशिश कर रहे हैं.

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इस दौर की अजीब सी बेमानी ये भी है कि लोग उन लोगों के साथ अच्छे से पेश आते है जो उनके साथ बत्तमीज़ होते हैं... मतलब अगर मैं फ़िक्र करना छोड़ दूं तो लोग अधिक फ़िक्र करेंगे... और अगर बत्तमीजी से पेश आऊं तो लोग अधिक नरम हो के पेश होंगे!

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वो बोलती है कि ये वाली कविता बहुत अच्छी है और वो वाली जो तुमने मुझे लिखी इतनी अच्छी नहीं है... मैं हंस देता हूं... मुझे ताज्जुब है कि उसे आज भी मेरा लिखा सिर्फ कविता ही लगता है.


यही अंत है...

जल्दी से कुछ लिख लें। जल्दी से कुछ कह दें। जल्दी से किसी को देख लें। जल्दी से कहीं छुप जाएं। जल्दी से कहीं भाग जाएं। जल्दी से कहीं चढ़ जाएं। जल्दी से कहीं उतर जाएं। जल्दी-जल्दी-जल्दी।
यहां से जाना, वहां से आना, वहां बैठना, कहीं और जाकर ठहर जाना, फूल देखना, पत्ती चुनना, हवा रोकना, पानी भरना। सब जल्दी-जल्दी-जल्दी-जल्दी।
ये खा लो, वो पहन लो, उससे मिल लो, वहां बात कर लो, वहां बोल दो, वहां चुप रहो, यहां से दूर रहो, वहां के पास रहो, उससे बोलो, उससे न बोलो, बैठे रहो, खड़े रहो, लेटे रहो। रहो-रहो-रहो। जल्दी में रहो।
धीमे-धीमे आती है बेचैनी। धीमे-धीमे चढ़ता है पारा। धीमे-धीमे उतरता है पानी। धीमे-धीमे चलती हैं आंखें। धीमे-धीमे आती है आवाज। धीमे-धीमे निकलती है बात। धीमे-धीमे पकता है सपना उधार का।
धीमी सी एक बात है- रह कर करेंगे क्या? कर के भी करेंगे क्या? करना क्यों है? क्यों ही क्यों है? जीवन ने मेरे से कभी न पूछा, मैं पूछने वाला कौन हूं?
चुप की बारात है, रोज घोड़े लेकर घेरती है। लकड़ी की मेज है, रोज सामने खड़ी रहती है। खूंटी पर टंगी शर्ट है, हवा चलने पर हिलती है। फिर मन का क्या करूं बुच्चन? सड़ रहे मन का क्या करूं बुच्चन?
एक बच्चा है, जो दूर है। एक दूर है, जो अभी बच्चा है। रुका हुआ पानी है। रुकी हुई कहानी है। लात मार-मारकर जिसे बढ़ाते हैं और पाते हैं कि वो तो हमसे भी पीछे चली गई है।
एक देह है, जो हद के पार कहीं दिखती है। एक आंख है, जिसके हाथ नहीं हैं। एक कमरा है, दीवारों से भरा हुआ। एक रसोई है, जिसमें न आटा है न आलू।
मन चंट है, फिर भी दीवार नहीं तोड़ पाता। पांव में चक्कर है जो पैताने पर मसल देता हूं। दांतों से आज मैं धुंआ पीसता हूं बुच्चन। यही अंत है। है न?


-Rahul (Source: Bazaar)

Sunday, April 8, 2018

लकड़ी


वो लकड़ी है, लड़की नहीं
बड़ी होते ही चूल्हे में जला दी जाएगी.

ये मेरी दोस्त
तुम लकड़ी बन ही रही हो
तो मेरी दादी की लकड़ी बनना
जिससे उन्होंने समाज के ठाकुरों को पीटा
और जरूरत पड़ने पे दादा को भी.
उनकी लकड़ी इतनी ताकतवर थी कि
सारा गांव उनसे डरता था
उन्होंने सपने में तो औरंगज़ेब को भी उसी लकड़ी से मारा होगा
और अंग्रेज़ तो उनकी लकड़ी के सामने ही भागे.

इसलिए मेरी दोस्त
लड़कियां लकड़ियां पैदा होती हैं
जिन्हें बड़े हो के चूल्हे में जलना है
लेकिन तुम इतना तेज़ जलना कि
आग से समाज जला सको
दो चार को धुंएँ से मार सको
और इतना धधकना कि
ये जो आग है
वो बुराई को, बुरा करने वाले को
दशहरे के रावण सा जला दे.

हालाँकि रावण हर वर्ष जलने के लिए नहीं पैदा हुआ था
हर लड़की लकड़ी बनने नहीं पैदा हुई है
हर आदमी जलाने पैदा नहीं हुआ है
और हर एक कि नियति में कांटे नहीं उगे हैं.

लेकिन मुझे भरोसा है
जब अंतिम लड़की लकड़ी बनने से मना कर देगी
उस दिन सब तुम्हें याद करेंगे.
जैसे मैं मंडेला को याद करता हूँ
निडर गाँधी को याद करता हूँ
और लक्ष्मीबाई की आग को याद करता हूँ.

लकड़ी बनना मेरी दोस्त
तो बरसना भी सीखना
गरजना भी सीखना
जलना पर जलाना भी सीखना
गलना पर गलाना भी सीखना.

देखना तुम्हारे आंसू जाया न जाएँ
वो मोती हैं मेरी लिए
और तुम्हारी आँखें सीपी,
जिनमे पड़े सपने
तुम्हें मेरी याद दिलाते रहेंगे.

Saturday, April 7, 2018

मेरे दोस्त

स्थापित सत्यों को नकार कर
रेत बाजुओं में भर 
चाँद तारों को सूली पे चढ़ा देता हूँ.
तुम्हें भय है कि ईश्वर आ जायेगा एक दिन
और मेरे कर्मो का हिसाब लेगा
लेकिन यह स्थापित तथ्य है
और मैं इसे नकारता हूँ.

मुझे ईश्वर नहीं चाहिए
तुम्हारी आस्थाएं और नियम भी नहीं
मैं आदिमानुष हूँ
जो अभी भी उन कंदराओं में जी रहा हैं
जिनमें बस उसके नियम चलते हैं
उन कायदों में बंधा है
जिनसे उसे सुख मिलता है
और उन आँखों से दुनिया देखता है
जो उसे जन्म से मिली थीं.

मुल्कों को नकार 
धर्मों को नकार
जातियां नकार
मिले लिंग को नकार 
युद्धों को नकार
दंगों को नकार
हत्याएं नकार
अभिमान और ज्ञान नकार

जो बचता है
वो थोथला नंगा इंसान है
जिसके कपड़ों से बू नहीं आती 
हत्याओं को,
धरती हड़पने की,
प्रदूषण की,
जन-जंगल-जमीन हरने की 
न किसी स्त्री के खून की.

वो मैं हूँ.
और अगर तुम भी वो बन सकते हो मेरे दोस्त
तो आओ 
मेरे साथ चलो
नंग-धडंग 
अपने समाज, परिवार और आस्थाओं से परे.
यदि नहीं कर सकते ऐसा
तो कितना भी लिख लो तुम 'आज़ादी'
कितना भी कह लो 'फेमिनिज्म'
कितना भी चिल्ला लो तुम 'प्रेम'
तुम्हारा कहा सब मृगमरीचिका है
तुम्हारा ज्ञान सब थोथा विज्ञान है
और रही बात तुम्हारी कविता की
वो सब बारहखड़ी के अलावा कुछ भी नहीं
जो कागज़ रंग रही है
और पेड़ गिरा रही है.

मेरे दोस्त 
कोई भी इंसान आदिमानुष
 हुए बगैर 
कवि नहीं हो सकता
न ही मेरा मित्र.
ये भी एक प्रथम और अंतिम स्थापित सत्य है.

Friday, April 6, 2018

[The Blue Canvas] ७

कभी कभी तुम इतने छोटे हो जाते हो कि एक छोटी कविता में भी समा जाते हो और कभी कभी इतने बृहद की प्रोज भी कम पड़ते हैं.
जब कभी सिकुड़ के मुझमें समाते हो तुम तो इतने छोटे लगते हो की किस नवजात को हाथों में उठाया हो.
और जब कभी तुम्हारे सीने पे सिर टिका मैं ढूंढ़ता हूं सुकून तो लगता है जैसे तुम यकायक से किसी बड़ी सी बिल्डिंग से विशाल हो गए हो कि खुद में समा लोगे मेरे आंसू और खुद मुझे ही!
तुम्हें मेरी हथेलियों बेहद कोमल लगती हैं और मुझे पूरे तुम.
तुम्हारे हाथों को थाम सड़क पार करता हूं तो उतना ही सेफ महसूस करता हूं जितना अपनी मां के हाथ थामे.
और जब तुम दोनों हाथ थाम एकटक देखती रहती हो मुझे तो लगता है कुछ कुछ थम सा गया है वक़्त.
ये अजीब है कि तुम सपनों में नहीं आते... शायद वहां भी हकीकत बन जाते हो.
तुम्हारी फैंटेसी के जैसे तुम्हें कान और गर्दन के बीच चूमते आंखों उग आई महक देखना चाहता हूं जो कभी देख ही नहीं पाया.
तुम्हारी पीठ पर पता नहीं क्या क्या लिख देता हूं मैं जो समझ नहीं आता तुम्हें.
इस बार तुम्हारी पीठ पर अपनी सबसे अच्छी पेंटिंग बनाना चाहता हूं जिसमें उगा देना चाहता हूं पंख और फिर आसमानों में तुम्हें उड़ते देखना चाहता हूं.
तुम ना कहते हो मुझपर लिखो सिर्फ मेरा हो... सच कहूं तो जो भी लिखता हूं सब तुम्हारा हो जाता है.
तुम ना कहते हो कि जाना बस इतने दूर की आखिरी ख़त लिख मिलना चाहूं तो आ पाओ... सच तो ये है वो आखिरी ख़त मैं कभी नहीं देखना चाहता... और ना ही दूर जाना चाहता हूं...

Wednesday, April 4, 2018

तेरे-मेरे

गम के हिस्से कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे हैं
कुछ आंसू तेरे हिस्से हैं, कुछ मेरे हैं
किरचनें ख्वाबों की चुभती हैं
ख्वाब टूटे कुछ तेरे हैं, कुछ मेरे हैं.
बंद पड़ी ढेरों बातें हैं, 
कुछ बेरंग खत तेरे हैं, कुछ मेरे हैं.
एक बाढ़ छुपी तेरे सीने में हैं
एक मचली नदी मेरे सीने में है.
कुछ नकली रेखाएं तेरी हथेली पर
एक टूटी नियति मेरे जीने में है.
दर्द तेरी बातों में कुछ है
कुछ पिघले लफ्ज़ मेरे हैं
तुझे खुशियां सीने से लगानी मेरे है
मुझे माथे पे सूरज उगाना तेरे है.
लेकिन ज़ख्म नए-पुराने तेरे-मेरे हैं
सारे अरमान अधूरे तेरे-मेरे हैं
सबको हाथ छुड़ाने तेरे-मेरे हैं
क्यूंकि दिल दीवाने तेरे-मेरे हैं
क्यूंकि दिल दीवाने तेरे-मेरे हैं.

Monday, April 2, 2018

[The Blue Canvas] ६

नज़्म तुम्हारे होंठों के नीचे तिल का उगना है... जो अनायास ही उग आया है लेकिन खूबसूरती में चार चाँद लगा देता है.
तुम्हारे होंठों की वो प्यारी सी मुस्कान है जो मुझे बेहद पसंद है... जिसे बनाये रखने मैं अपने को तक जाया कर सकता हूँ.
नज़्म तुम्हारा सीने से चिपकना है और फिर लेटे लेटे आसमान ताकना है... तब ऐसा लगता है जैसे जहां में सिर्फ दो ही लोग हों... शायद एक छोटी सी दुनिया बन जाती है जिसमे हम बस दो लोग रह रहे होते हैं.
नज़्म तुमसे झगड़ना है... सच कहो तो उसके बिना दिन पूरा नहीं होता.
ुम्हारी आँखें... जिनमें कई ख्वाब पले हैं, उन्हें चूमना है. चूमने से लगता है जैसे तुम्हारे ख्वाबों को अपना बना रहा हूँ.
नज़्म वो वक़्त है जो तुम्हारे साथ बीतता है... और वो वक़्त भी जो तुम्हारे साथ नहीं बीतता... क्यूंकि वो तुम्हारी याद में बीतता है.
कुछ किताबें हैं... जो मैंने गिफ्ट की थीं... फैज़ की 'सारे सुखन हमारे' है जो तुमने गिफ्ट की थी.
मेरी नज़्में वो सारी नज़्में हैं जो तुमने मुझपर लिखीं... और तुम्हारी नज़्में वो सारी नज़्में हैं जो मैंने तुमपर लिखीं.
तुम्हारा हाथों का छूना और फिर कंधे पर सर टिकाना. आँखों का मलना फिर मेरी आँखों में डूब जाना.
हांथों का चूमना और खो जाना. इन सबसे बेहतर नज़्में नहीं हैं.
नज़्म तुम्हारा मेरे एहसास में जीना है और मेरा सिर्फ तुम्हारे बारे में सोचना है.
नज़्में लफ्ज़- लफ्ज़ नहीं हैं... नज़्में हमारी साथ बीतती ज़िन्दगी है. जिसका अंत पहले ही लिख दिया गया है.... किसी ना-मुकम्मल नज़्म सा.

Saturday, March 31, 2018

राशिदी और सक्सेना को सुनने के लिए कलेजा चाहिए | रवीश कुमार

“मैं शांति चाहता हूं। मेरा बेटा चला गया है। मैं नहीं चाहता कि कोई दूसरा परिवार अपना बेटा खोए। मैं नहीं चाहता कि अब और किसी का घर का जले। मैंने लोगों से कहा है कि अगर मेरे बेटे की मौत का बदला लेने के लिए कोई कार्रवाई की गई तो मैं आसनसोल छोड़ कर चला जाऊंगा। मैंने लोगों से कहा है कि अगर आप मुझे प्यार करते हैं तो उंगली भी नहीं उठाएंगे। मैं पिछले तीस साल से इमाम हूं, मेरे लिए ज़रूरी है कि मैं लोगों को सही संदेश दूं और वो संदेश है शांति का। मुझे व्यक्तिगत नुकसान से उबरना होगा।”

अपने 16 साल के बेटे सिब्तुल्ला राशिदी की हत्या के बाद एक इमाम का यह बयान दिल्ली के अंकित सक्सेना के पिता यशपाल सक्सेना की याद दिलाता है। हिंसा और क्रूरता के ऐसे क्षणों में कुछ लोग हज़ारों की हत्यारी भीड़ को भी छोटा कर देते हैं। 16 साल के सिब्तुल्ला को भीड़ उठाकर ले गई और उसके बाद लाश ही मिली। बंगाल की हिंसा में बंगाल की हिंसा में चार लोगों की मौत हुई है। छोटे यादव, एस के शाहजहां, और मक़सूद ख़ान। इस हिंसा
“मैं भड़काऊ बयान नहीं चाहता हूं। जो हुआ है उसका मुझे गहरा दुख है लेकिन मैं मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का माहौल नहीं चाहता। मेरी किसी धर्म से कोई शिकायत नहीं है। हां, जिन्होंने मेरे बेटे की हत्या की, वो मुसलमान थे लेकिन सभी मुसलमान को हत्यारा नहीं कहा जा सकता है। आप मेरा इस्तमाल सांप्रदायिक तनाव फैलाने में न करें। मुझे इसमें न घसीटें। मैं सभी से अपील करता हूं कि इसे माहौल ख़राब करने के लिए धर्म से न जोड़ें।“
यह बयान दिल्ली के यशपाल सक्सेना का है जिनके बेटे अंकित सक्सेना की इसी फरवरी में एक मुस्लिम परिवार ने हत्या कर दी। अंकित को जिस लड़की से प्यार था,उसने अपने मां बाप के ख़िलाफ़ गवाही दी है। यशपाल जी ने उस वक्त कहा था जब नेता उनके बेटे की हत्या को लेकर सांप्रदायिक माहौल बनाना चाहते थे ताकि वोट बैंक बन सके। आसनसोल के सिब्तुल्ला को जो भीड़ उठा कर ले गई वो किसकी भीड़ रही होगी, बताने की ज़रूरत नहीं है। मगर आप सारे तर्कों के धूल में मिला दिए जाने के इस माहौल में यशपाल सक्सेना और इमाम राशिदी की बातों को सुनिए। समझने का प्रयास कीजिए। दोनों पिताओं के बेटे की हत्या हुई है मगर वे किसी और के बेटे की जान न जाए इसकी चिन्ता कर रहे हैं।
सांप्रदायिक तनाव कब किस मोड़ पर ले जाएगा, हम नहीं जानते। दोनों समुदायों की भीड़ को हत्यारी बताने के लिए कुछ न कुछ सही कारण मिल जाते हैं। किसने पहले पत्थर फेंका, किसने पहले बम फेंका। मगर एक बार राशिदी और सक्सेना की तरह सोच कर देखिए। जिनके बेटों की हत्याओ को लेकर नेता शहर को भड़काते हैं, उनके परिवार वाले शहर को बचाने की चिन्ता करते हैं। हमारी राजनीति फेल हो गई है। उसके पास धार्मिक उन्माद ही आखिरी हथियार बचा है। जिसकी कीमत जनता को जान देकर, अपना घर फुंकवा कर चुकानी होगी ताकि नेता गद्दी पर बैठा रह सके।
आपको समझ जाना चाहिए कि आपकी लड़ाई किससे है। आपकी लड़ाई हिन्दू या मुसलमान से नहीं है, उस नेता और राजनीति से है जो आपको भेड़ बकरियों की तरह हिन्दू मुसलमान के फ़साद में इस्तमाल करना चाहता है। आपकी जवानी को दंगों में झोंक देना चाहता है ताकि कोई चपेट में आकर मारा जाए और वो फिर उस लाश पर हिन्दू और मुसलमान की तरफ से राजनीति कर सके। क्या इस तरह की ईमानदार अपील आप किसी नेता के मुंह सुनते हैं? 2019 के संदर्भ में कई शहरों को इस आक्रामकता में झोंक देने की तैयारी है। इसकी चपेट में कौन आएगा हम नहीं जानते हैं। मुझे दुख होता है कि आज का युवा ऐसी हिंसा के ख़िलाफ़ खुलकर नहीं बोलता है। अपने घरों में बहस नहीं करता है। जबकि इस राजनीति का सबसे ज़्यादा नुकसान युवा ही उठा रहा है। बेहतर है आप ऐसे लोगों से सतर्क हो जाएं और उनसे दूर रहें जो इस तरह कि हिंसा और हत्या या उसके बदले की जा सकने वाली हिंसा और हत्या को सही ठहराने के लिए तथ्य और तर्क खोजते रहते हैं। नेताओं को आपकी लाश चाहिए ताकि वे आपको दफ़नाने और जलाने के बाद राज कर सकें। फैसला आपको करना है कि करना क्या है।
Publishedd on Nai Sadak

Monday, March 26, 2018

[ The Obtuse Angle ] 2

मैं सोचता हूँ अगर स्टीफन हाकिंग भारत में होते तो कैसे रहे होते? क्या हमारे देश में उनकी अपंगता ने उन्हें जीने दिया होता? क्या हमारी 'महान' परिवार व्यवस्था, जिसकी हम मिसालें देते हैं ने उनके टैलेंट को ध्यान रख जरूरतें मुहैया कराई होतीं? क्या ख्याल रखा होता? और क्या हमारी 'महान' गुरु-शिष्य परंपरा में शिष्यों ने उसी तरह उनका ख्याल रखा होता जिस तरह उनके छात्रों ने उनका रखा था?

आपको भी जवाब पता हैं और मुझे भी. सच तो ये है कि हमारी 'महान' व्यवस्थाएं अंदर से सड़ चुकी हैं. इतनी अधिक कि उनकी 'महानता' पर गर्व कर लीपा-पोती करने कि बजाय हमें शर्म करते/रखते हुए उन्हें सुधारने की आवश्यकता है.

लेकिन बजट भी हमारे बजट भाषण में शिक्षा और स्वास्थ्य पर किये वादे में से भी कुछ प्रतिशत की कमी करने के बाद बिना की बहस के आधे घंटे में पास हो जाता है और इसका विरोध करना न हमारी प्रायोरिटी बनता है न मीडिया की.

सच तो ये है कि सिर्फ मीडिया नहीं हम सब ही बाथटब में डूबे हुए हैं और श्रीदेवी के बहुत पहले से ही.

#TheObtuseAngle