Saturday, May 27, 2017

नेहरू अगर बड़े हो सके तो इसलिए भी कि वे अपने गुरु से अपनी असहमति बेझिझक और निरंतर व्यक्त कर सके | Apoorvanand

‘भारत वही होगा जो हम हैं. हमारे विचार और कार्य ही उसे आकार देंगे...हम उसके बच्चे हैं, आज के भारत के नन्हें टुकड़े, लेकिन हम कल के भारत के जनक भी हैं. अगर हम बड़े हैं तो भारत भी बड़ा होगा, अगर हम क्षुद्र मस्तिष्क और संकीर्ण नज़रिए वाले हुए तो भारत भी वैसा ही होगा. अतीत में हमारी परेशानियों की वजह यही संकरी निगाह और तुच्छ कार्य रहे, जो भारत की महान सांस्कृतिक विरासत से इतना बेमेल था.’
जवाहरलाल नेहरू आज़ादी मिलने के साल भर बाद स्वतंत्रता दिवस पर भारत के अपने लोगों को याद दिला रहे थे कि भारतीय होने का अर्थ अगर कुछ हो सकता है तो वह है क्षुद्रता, संकीर्णता और फूहड़पन से संघर्ष. इसी के आस पास भारत की औद्योगिक नीति के बारे में बात करते हुए उन्होंने समाज में बढ़ती आर्थिक असमानता की ओर इशारा किया और कहा कि अब यह फूहड़पन की हद तक बढ़ गई है.
आर्थिक या सामाजिक गैर बराबरी इसलिए बुरी है कि वह फूहड़ है, यह अब हम शायद ही किसी को कहते हुए सुनें. लेकिन नेहरू के लिए किसी भी नीति या क्रिया की कसौटी यही थी कि क्या वह हमारे अपने संकीर्ण स्वार्थ से प्रेरित है या वह किसी अधिक बड़े उद्देश्य को हासिल करने में कारगर है. क्या वह हमें जाती ज़िंदगी में और सामाजिक रूप से भी उदात्त के निकट ले जाती है या अपने ही छोटे दायरे में और भी अधिक कैद कर देती है?
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने, जो गांधी के निकटस्थ मित्रों में थे और एक समय उनके उत्तराधिकारी माने जाते थे और अपने समय के सबसे कुशाग्र मेधा के धनी भी, नेहरू की मृत्यु के बाद कहा कि हमारे बीच का आख़िरी सभ्य व्यक्ति नहीं रहा.
सभ्य और सुसंस्कृत बनना हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए, कि आर्थिक सम्पन्नता और शक्ति और उसके लिए दो शर्तें हैं: निर्भय होना और साधन और साध्य में एकता रखना. गांधी की याद अगर नेहरू अपने देशवासियों को बार-बार दिलाते थे तो मुख्यतः इसीलिए कि उन्होंने निर्भयता और साधन और साध्य की एकता की अनिवार्यता का मंत्र अपने देशवासियों, बल्कि पूरे विश्व को दिया था.
निर्भयता के बिना महानता संभव नहीं. इस निर्भयता का अर्थ यह है कि हम अपने निर्णयों और कार्यों की जिम्मेदारी लेने से न कतराएं. स्वाधीनता आन्दोलन की विशेषता यही थी और गांधी ने यही सिखाया था कि तुम्हारे किसी भी कार्य में गोपनीयता और षड्यंत्र की बू नहीं आनी चाहिए. इसीलिए वे अपने हर अभियान का नोटिस उसे भी देते थे जिसके विरुद्ध वह शुरू किया जाने वाला था. चंपारण में निलहे साहबों को, अंग्रेज़ सरकार के हर महकमे को उन्होंने बताया कि वे क्या करने जा रहे हैं. सशस्त्र क्रांतिकारियों की वीरता में कोई संदेह न था, लेकिन वह गोपनीयता और षड्यंत्र के बिना संभव न थी.
नेहरू गांधी के शिष्य की तरह ही निष्कवच और उत्तरदायित्वपूर्ण निर्भयता के हामी थे. इसलिए उनमें से किसी ने वे जो कर रहे थे, उसके परिणाम से, जो कि प्रायः दीर्घ कारावास था और वह भी उसका सिलसिला, बचने की कोई कोशिश न की.
नेहरू जैसा व्यक्तित्व अकेलेपन में भी समझा जा सकता है, लेकिन ऐसी शख्सियत शायद अपने जैसी ही और शख्सियतों के संसर्ग के बिना बन नहीं सकती
नेहरू जैसा व्यक्तित्व अकेलेपन में भी समझा जा सकता है, लेकिन ऐसी शख्सियत शायद अपने जैसी ही और शख्सियतों के संसर्ग के बिना बन नहीं सकती. और नेहरू का वक्त कितना निराला और भव्य है: तिलक और गोखले से लेकर, जिन्हें गांधी ने हिमालय और प्रशांत सागर की उपमा दी, गांधी, वल्लभ भाई पटेल, सरोजिनी नायडू, मौलाना आज़ाद, अली बंधु, सुभाषचंद्र बोस, अम्बेडकर या राजगोपालाचारी इनमें से कुछ नाम हैं. आप रवीन्द्रनाथ टैगोर और इकबाल को न भूलें या प्रेमचंद, भारती, निराला और प्रसाद जैसे नामों को भी. यह महानता का युग था और इनमें से हर कोई एक दूसरे से रौशन भी हो रहा था. हर कोई दूसरे की कीमत जानता था और इस तरह उसकी अपरिहार्यता भी.
नेहरू अगर बड़े हो सके तो इसका कारण यह भी है कि वे अपने गुरु से अपनी असहमति बिना झिझक और भय के निरंतर व्यक्त कर सके. उन्होंने स्पष्ट ढंग से गांधी को एकाधिक बार कहा कि वे ज़मींदारों के प्रति उनकी सहानुभूति को नहीं समझ पाते और भारतीय गांवों के प्रति उनके अतिरिक्त मोह को भी नहीं.
उसी तरह धर्म के मामलों में गांधी से नाइत्तफाकी नेहरू ने कई बार जाहिर की. इनमें से एक प्रसंग दिलचस्प है. गांधी हिंदू धर्मावलंबियों को उदारता और सहिष्णुता की याद दिला रहे थे, जो उनके मुताबिक़ हिंदू धर्म की आतंरिक विशेषता थी. इनमें सबसे कठिन जीव वे थे जो खुद को सनातनी मानते थे. 1933 के एक ख़त में गांधी ने लिखा कि सनातनियों से उनका संघर्ष अधिक से अधिक दिलचस्प और कठिन होता जाता है. गांधी की समझ थी कि उनकी सफलता यह है कि ये सनातनी अपनी दीर्घ निद्रा और आलस्य से जाग रहे हैं. उनका विश्वास था कि अभी भले ही वे गांधी को गालियां दे रहे हों, लेकिन उनके अहिंसा के लेप से यह तूफ़ान शांत हो जाएगा...लेकिन ‘मैं जितना ही गालियों को नज़रअंदाज करता जाता हूं, वे उग्र होती जाती हैं. लेकिन यह शमा के इर्ग गिर्द नाचने वाले फतिंगों का मृत्यु नृत्य ही है.’
नेहरू गांधी के सनातनियों से इस संघर्ष में उनके इस विश्वास से सहमत न थे. उन्होंने ‘हरिजन’ का अंक मिलने के बाद एक पत्र में उन्हें लिखा, ‘मुझे बेचारे सनातनियों पर दया आती है. उनके क्रोध, गालियों और उग्र शाप को देखते हुए मुझे लगता है कि वे इस सूक्ष्म आक्रमण के योग्य नहीं. मूर्खता, कट्टरता और विशेषाधिकार की ताकत हैरतअंगेज़ है. इस मेल को महात्मा और संत भी नहीं उलट सकते जब तक कि हालात इसके लिए ज़मीन तैयार न कर दें.’
नेहरू की ज़िंदगी घाटियों के फूलों की खुशबू और हिमाच्छादित ऊंचाइयों की पुकार का जवाब थी. अपने मित्र गुरु की तरह ही, अधूरी, लेकिन ईमानदार
नेहरू ने लिखा कि ‘हरिजन’ एक भी कट्टर सनातनी का हृदय परिवर्तन न कर पाएगा लेकिन जिन अनेकानेक लोगों ने सामाजिक बुराइयों की ओर से आंखें मूंद रखी हैं, उनपर यह ज़रूर कुछ असर डाल सकेगा.
नेहरू का यह पत्र उस दौर के नेताओं में परस्पर आलोचना की संस्कृति का अच्छा उदाहरण है. इसका कि आपको विश्वास है कि आपकी आलोचना सुनी जाएगी, इसलिए इसमें कटुता नहीं, सद्भाव की सुगंध है. इस पत्र में आखिर में वे उस लिफ़ाफ़े पर टिप्पणी करते हैं जिसमें पत्र भेजा गया था: ‘आपका पत्र लिफ़ाफ़े के नाम पर जिस चीज़ में लपेट कर भेजा गया, उसपर मुझे ऐतराज करना ही होगा. अगर वल्लभभाई इसके लिए जिम्मेदार हैं, तो उनके प्रति अपनी सारी मुहब्बत के बावजूद मुझे कहना होगा कि लिफाफा बनाना उनके बस का नहीं.’
आगे वे लिखते हैं और यह दिलचस्प है, ‘मेरे इस सतहीपन के लिए माफ़ करेंगे. लेकिन मुझे अपने हीरे तराशे हुए और चिकने अच्छे लगते हैं. आपने हमें जिंदगी को शानदार तरीके से जीने की कला और शैली सिखाई है. वही असल बात है, लेकिन हम जीवन की छोटी छोटी चीज़ों में अंदाज और कलात्मकता को क्यों नज़रअंदाज करें? हममें से ज़्यादातर लोग हिममंडित ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच सकते. क्या आप हमें घाटियों के फूलों से भी वंचित रखेंगे?’
नेहरू की ज़िंदगी घाटियों के फूलों की खुशबू और हिमाच्छादित ऊंचाइयों की पुकार का जवाब थी. अपने मित्र गुरु की तरह ही, अधूरी, लेकिन ईमानदार.


Wednesday, May 17, 2017

हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच 1947 में हुआ बंटवारा आज भी जारी है

कई सालों से मैं बड़े फ़ख्र से ख़ुद को दक्षिण एशियाई मूल का बताती थी. लाखों लोगों की तरह मेरे मां-बाप भी उसी ज़मीन पर पैदा हुए थे, जिसे अब हिंदुस्तान के नाम से जाना जाता है.
बंटवारे के वक़्त मेरे अब्बा का परिवार पाकिस्तान चला आया था. मेरे दादा सिविल सर्विस में थे और अपने बाकी मुस्लिम साथियों की तरह उन्हें भी उम्मीद थी कि नई बन रही ब्यूरोक्रेसी में बेहतर पद मिलेंगे.
वहीं दूसरी तरफ मेरे नाना कांग्रेस के पक्के समर्थक थे, वे लखनऊ में एक प्रो-कांग्रेस अख़बार भी निकाला करते थे. वे हिंदुस्तान न छोड़ने की अपनी बात पर अड़े रहे जबकि उन्हें ये अंदाज़ा था कि आने वाले दशकों में अपने लिए बेहतर ज़िंदगी बनाने की उम्मीद में उनके बच्चे हिंदुस्तान छोड़ देंगे.
इसके तकरीबन 25 साल बाद जब मेरे मां-पापा की शादी हुई, तब तक मेरे अब्बा पाकिस्तान से निकलकर अमेरिका पहुंच गए थे और वहां एक इंजीनियर के बतौर काम कर रहे थे.
उनका निकाह फोन पर हुआ, जिसके बाद मेरी मां भी अमेरिका पहुंचीं. मैं और मेरी बहन की पैदाइश और परवरिश भी वहीं हुई.
जब भी लंबे सफ़र पर जाने लायक पैसे इकट्ठे होते, तब हम सालों में कभी पाकिस्तान तो कभी हिंदुस्तान जाया करते. मेरी बहन और मेरी हमारे दोनों तरफ के भाई-बहनों से ही खूब पटती थी.
इतनी कि हमें कभी दोनों देशों के बीच चल रही परेशानियों का हमारी पहचान से जुड़े होने का कोई एहसास ही नहीं हुआ. यह तो बहुत बाद में पता चला कि ये मासूमियत भी बमुश्किल ही मिल पाती है.
अमेरिका से ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों ही जगह इंटर्नशिप के लिए अप्लाई किया. मैं चाहती थी कि ‘मैं कहां जाऊंगी’ सवाल का जवाब मेरी क़िस्मत तय करे.
और फिर मुझे नई दिल्ली की एक मानवाधिकार संस्था के साथ काम करने का मौका मिला. इस एनजीओ ने ही मुझे सलाह दी कि अपनी मां की भारतीय नागरिकता के आधार पर मैं पर्सन ऑफ इंडिया ओरिजिन (पीआईओ) कार्ड बनवाने के लिए अप्लाई करूं.
इससे मुझे हिंदुस्तान में काम करने का मौका तो मिलेगा ही, साथ ही मैं बिना वीज़ा के सफ़र भी कर सकूंगी. मेरी एप्लीकेशन स्वीकार होने में कोई अड़चन नहीं आई और कुछ ही दिनों में मुझे ये स्लेटी बुकलेट मिली, जिसके सहारे में आगे के 17 सालों तक हिंदुस्तान आती-जाती रही.
इस कार्ड के मिलने के बाद मेरा यहां आना-जाना तो बढ़ा ही, मैं यहां लंबे वक़्त के लिए रुकने भी लगी. मैंने दिल्ली में रहकर ही अपनी पीएचडी पूरी की और इस शहर में मुस्लिम औरतों के अनुभवों पर एक क़िताब भी लिखी.
इस बीच हिंदुस्तान के साथ बढ़ते इस रिश्ते के साथ मेरा पाकिस्तान से रिश्ता भी बढ़ता रहा. मेरी बहन की शादी पाकिस्तान में हुई और वो वहीं बस गई.
कुछ समय बाद मेरे मां-पापा भी अमेरिका से आकर वहीं रहने लगे. कुछ सालों बाद मुझे भी लाहौर के कॉलेज में नौकरी का ऑफर मिला, जिसे मैंने खुशी-खुशी स्वीकार भी कर लिया.
इसकी पहली वजह तो ये थी कि मैं कराची में रहने वाले अपने परिवार के करीब हो जाऊंगी, दूसरा बॉर्डर से नज़दीक होने के कारण मैं अपने काम के सिलसिले और दोस्तों से मिलने आसानी से हिंदुस्तान आ-जा सकती थी.
तब मैंने नेशनल आइडेंटिटी कार्ड ऑफ पाकिस्तान के लिए अप्लाई किया, इससे मुझे वही सारी सुविधाएं मिलतीं, जो हिंदुस्तान में पीआईओ कार्ड से मिलती हैं.
मेरे पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी दोस्त और रिश्तेदार इस बात पर बड़ा आश्चर्य व्यक्त करते पर मैं जानती थी कि मैं ख़ुशकिस्मत थी, लेकिन मुझे इसमें कुछ ग़लत भी नहीं लगता था. मैं मूल रूप से पाकिस्तानी भी हूं, हिंदुस्तानी भी. तो मुझे क्यों सिर्फ एक को चुनना चाहिए?
पिछले हफ़्ते इस बार के सेमेस्टर ख़त्म होने के बाद मैं ख़ुद को अपने जन्मदिन पर तोहफा देना चाहती थी, और ये तोहफा था धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) घूमना.
कुछ रोज़ पहले मैं जब लौट रही थी तब बॉर्डर पर मुझसे इमीग्रेशन के कर्मचारियों ने पूछा कि मेरे पास पीआईओ कार्ड और नेशनल आइडेंटिटी कार्ड ऑफ पाकिस्तान दोनों कैसे हैं. मैंने उन्हें ईमानदारी से जवाब दिया कि मेरे अब्बा पाकिस्तानी हैं मां हिंदुस्तानी, और इस लिहाज़ से मैं दोनों हूं.
आम तौर पर जब मैं ये जवाब देती थी तब अमूमन सरहद के दोनों तरफ ही इमिग्रेशन से मुझे सुनने को मिलता था, वाह, आप तो बड़ी लकी हैं मैडम! इसके बाद वो मेरे पासपोर्ट पर स्टाम्प लगा देते थे.
इस बात से मैं हमेशा एक उम्मीद से भर उठती थी कि दोनों देशों के बीच भले ही कितने उतार-चढ़ाव रहे हों, पर दोनों ही ओर के अधिकतर लोग इस बंटवारे के बेतुकेपन को समझते हैं.
पर उस रोज़ ऐसा नहीं हुआ. इमीग्रेशन का वो कर्मचारी मेरे पीआईओ कार्ड के साथ गायब हुआ और कोई घंटे भर बाद लौटा. उसके पास एक पत्र भी था, जिस पर मुझे दस्तख़त करने के लिए मजबूर किया गया.
इसमें लिखा था कि मेरा पीआईओ कार्ड ज़ब्त किया जा रहा क्योंकि मैं पाकिस्तानी मूल की हूं, जिस वजह से मैं हिंदुस्तानी मूल की नहीं हो सकती.
तो वो खौफ़नाक दिन आ चुका था. इतने सालों तक अपनी जिस दक्षिण एशियाई पहचान पर मुझे फ़ख्र था, उसमें से आज मैं एक को चुनने के लिए मजबूर थी.
जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें यह करने का हक़ है क्या, तब मुझे जवाब मिला, ‘भारत सरकार के जो चाहे वो करने का अधिकार है.’ बस! इतना ही.
मैं जानती हूं कि मेरी ये कहानी 70 साल पहले हुए बंटवारे के फैसले से हुई लाखों मौतों और बिखरे हज़ारों परिवारों के सामने कुछ भी नहीं है.
वज़ीरा ज़मींदार ने बंटवारे पर लिखा है, ‘1947 का ये बंटवारा आने वाले कितने दशकों तक चलता रहा था, ये बंटवारा आज भी जारी है, एक सरहद जहां कभी आने-जाने का रास्ता बन सकता था, वहां कभी न टूटने वाली एक दीवार खड़ी हो चुकी है.’
जैसे-जैसे हमारे देशों के बीच रिश्ते ख़राब हो रहे हैं, मुझे अपना ये छोटा-सा नुकसान उन अनगिनत लोगों के दुख के मुक़ाबले बहुत छोटा लगने लगा है, जिन्हें सरहदों के इस बंटवारे से मिला दर्द हर रोज़ झेलना पड़ता है…
अपने बच्चों से बिछड़े मां-बाप, भाई-बहनों से बिछड़े भाई-बहन, वे मछुआरे जो पानी के बीच खिंची अनदेखी सरहद को अनजाने में पार करने के जुर्म में सालों जेल में रहे, सीमा के पास रहने वाले वे परिवार, जो अगली फायरिंग के डर के साये में रोज़ जीते हैं.
कई बार दोनों देशों के रिश्ते सामान्य करने की कोशिशें भी की गई हैं पर अब वे भी ख़त्म हो रही हैं. मिसाल के तौर पर बीते दिनों ‘पीस विज़िट’ (शांति यात्रा) पर आए पाकिस्तानी स्कूली छात्रों के एक डेलीगेशन को सरहद पर बढ़े तनाव के चलते वापस भेज दिया गया.
वहीं पिछले हफ़्ते एक और आदेश आया जिसके मुताबिक इलाज के लिए हिंदुस्तान आने वाले पाकिस्तानियों को वीज़ा मिलना और मुश्किल होगा. ये एक तरह से आम लोगों को उनकी ज़िंदगी बचा सकने वाले इलाज से महरूम करने जैसा है.
और ज़ाहिर है, जैसा हमेशा से होता आया है पाकिस्तान सरकार की तरफ से इन नियमों का जवाब ऐसे ही और कोई नियम बनाकर दिया जाएगा.
यानी इशारा साफ है: दोनों देशों के लोगों के बीच में कोई भी सकारात्मक रिश्ता- चाहे वो विचार, जानकारी, कोई कौशल साझा करना हो या प्यार-मुहब्बत- फ़ौरन हमेशा के लिए तोड़ दिया जाएगा.
आने वाले दिनों में कई और पीआईओ कार्ड ज़ब्त किए जाएंगे, कई वीसा रिजेक्ट किए जाएंगे; दीवारें और ऊंची और मज़बूत कर दी जाएंगी, पर इस परेशानी का फिर भी कोई हल नहीं निकलेगा.
सदियों से साथ-साथ रहने, एक जैसी रवायतें और विरासत साझा करने और प्यार की नींव पर बने रिश्ते को इतनी आसानी से नहीं तोड़ा जा सकता.
वे हमें भटकाने-बहलाने की कोशिश करेंगे, हमें यकीन दिलाया जाएगा कि हम मौलिक रूप से ही अलग हैं. हमें एक-दूसरे से नफ़रत करने को मजबूर किया जाएगा पर हमें ऐसी हर कोशिश के ख़िलाफ़ खड़े होना होगा.
हमें बताना होगा कि हमारी जड़ों का, हमारे मूल का फैसला कागज़ के चंद टुकड़ों, प्लास्टिक के कार्डों या इन चमकीली बुकलेट से नहीं होगा, जिसे आसानी से हमसे छीना जा सकता है.
हमारी जड़ें, हमारा प्यार हमारे शरीरों पर लिखा है, हमारी रूह में है, हमारी ज़बान, संस्कृति, इतिहास में है, और वे जितना भी चाहे, राजनीति के दांव-पेंचों से इसे मिटाया नहीं जा सकता.
निदा लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज, लाहौर में पढ़ाती हैं.
Source: http://thewirehindi.com/8895/the-ongoing-partition-what-happens-when-you-are-both-indian-and-pakistani/

Monday, May 15, 2017

मातृभाषा

विनोदकुमार शुक्ल की फटी कमीज़
जिससे बेतरतीब से निकले धागे झाँक रहे हैं
जिसे कवितायेँ सिल नहीं पाई,
वो मैं हूँ.
प्रेमचंद के चेहरे का पोपलापन
उनकी बीमारी की नुमाइश
कहानियां जिसे कह नहीं पाई
जो अस्सी बरस बाद भी
गूगल-डूडल हो जाता है
लेकिन रहता पोपला ही है,
वो मैं हूँ.
पड़ोस की बच्ची आ के पूछती है मुझसे-
'अंकल हू वाज़ प्रेमचंद?'
'बेटा प्रेमचंद बहुत बड़े हिंदी साहित्यकार थे.'
'अंकल प्लीज स्पीक इंग्लिश न. माय प्रोजेक्ट इज़ इन इंग्लिश ओनली.'
ये जो संवाद हैं न
मैं वो हूँ.
मैं भाषा हूँ
या तमाशा हूँ
मैं तुम्हारी मिटती हुई मातृभाषा हूँ.
सरकारी प्रपत्रों में
मैं तुम्हें ही समझ न आती हूँ
गानों में गालियां हो जाती हूँ.
'लड़की "चुल" कर जाती है,
इश्क "कमीना" होता है'
तो मैं खुद पे सवालिया हो जाती हूँ
मैं अंग्रेजी में उठी
हिंदी के प्रति जिज्ञासा हूँ
मैं मातृभाषा हूँ.

Friday, April 28, 2017

This Is Why Our Generation Doesn’t Believe In Settling Down



We are a crazy generation. We self-acknowledge that fact, the older generations call us crazy, and the younger generations might be trying to be an inch crazier. And maybe each new up and coming generation will think the same thing about themselves or even be called crazy by us one day but I don’t want to focus on that right now. What I want to talk about is the fact that we are one of the first generations to realize that “settling down” like you are supposed to, isn’t the only thing you can do with your life or even the best thing to do with your life.
You see, we were told to never settle. We were told to reach for the stars and then build a rocket to get there. We were told that the weak settle for content lives instead of striving for happy ones. We were told to look for the best and only accept the answer once we know it is the best. We were taught these things by the older generations who now call us crazy for believing those things.
We explore. We travel. We grow. We meet new people. We are creating families out of connections that have nothing to do with blood. We look at the white picket fence homes that we are supposed to settle down into and only see limitations.
FOR US, SETTLING DOWN IS THE SAME THING AS SETTLING FOR A MEDIOCRE LIFE.
There is a whole world to explore still. There are empires to create. There are dreams to achieve. There are places to go, people to see, and memories to be made. And buying a two-story house in the suburbs of the small town, USA would only get in the way of all of that. We’ve discovered that you don’t need a house to be at home. We value experiences and connect rather than material investments such as huge houses.
This doesn’t mean we aren’t out there getting married or starting families, it just means they don’t look the way our parent’s families did. We are having kids and traveling with them. We are marrying who we want, when we want, and then seeing the world with them. We are doing the jobs we want to do, where we want to do them. We are still creating life it just doesn’t look the way they are used to.
We understand that life isn’t meant to be lived in one place anymore. We live in such a globalized world now. We travel as far as we can for as long as we can and then just maybe we consider staying put.
Maybe that makes us a crazy generation. Maybe this makes us unstable. Or maybe it just means we are squeezing every drop out of this life we were given and doing it in the way we want to. Maybe we understand that change isn’t a bad thing and that life is going to shift with or without us. Things are going to constantly change no matter what we do so why not change things ourselves?

Source: http://www.readunwritten.com/2017/03/08/generation-doesnt-believe-settling/

Saturday, April 22, 2017

इकबाल : वो आलातरीन शायर जिसने मुल्क ही नहीं, हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब के भी टुकड़े कर डाले

अल्लामा इकबाल के बारे में हिंदुस्तान में राय अलग-अलग हो सकती है. एक तबका यह कहता है कि वे अपने दौर के सबसे महान शायर थे और दूसरा यह कि हिंदुस्तान की तकसीम उन्हीं की देन है. हर एक की अपनी-अपनी कैफ़ियत है. सही या ग़लत कहने वाले हम कौन होते हैं?
इकबाल के पूर्वज सप्रू गोत्र के कश्मीरी ब्राहमण थे, जिन्होंने लगभग ढाई सौ साल पहले इस्लाम क़ुबूल कर लिया था. उनके पूर्वज कारोबार के सिलसिले में जम्मू से पंजाब के सियालकोट में आकर बस गए थे. इकबाल पढने-लिखने में तेज़ थे. उन्हें स्कूल में वज़ीफ़ा मिलता था. सियालकोट से मैट्रिक पास करके लाहौर आये और वहां सरकारी कॉलेज में दाखिला ले लिया. यहां आकर उनकी मुलाकात अंग्रेज़ प्रोफेसर अर्नाल्ड से हुई जो अरबी-फ़ारसी के विद्वान थे. अर्नाल्ड ने उनके ज़हन पर काफी असर डाला और इकबाल का उनसे जिंदगी भर राब्ता रहा.
शायरी का जुनून और राष्ट्रवाद
लाहौर उन दिनों इल्म औ अदब का गढ़ था. यहां मुशायरों की धूम होती थी. आहिस्ता-आहिस्ता इकबाल ने उन मुशायरों में शिरकत शुरू कर दी. उनके हुनर से मुतास्सिर होकर ‘ऑबसर्वर’ रिसाला (पत्रिका) के पहले मुदिर (एडिटर) शेख अब्दुल कादिर ने लिखा - ‘मैंने उन्हें पहली मर्तबा लाहौर के एक मुशायरे में उन्हें देखा. इस बज़्म में उन्हें उनके चंद हम-जमाअत (सहपाठी) खींच लाये थे और उन्होंने कह-सुनकर एक ग़ज़ल भी उनसे पढ़वाई. उस वक़्त लाहौर में लोग इकबाल के नाम से वाबस्ता (परिचित) नहीं थे. छोटी सी ग़ज़ल थी. सादा से अलफ़ाज़, ज़मीन भी मुश्किल न थी. मगर कलाम में शोखी और बेसाख्तापन (नयापन) मौजूद था. बहुत पसंद की गयी. इसके बाद दो-तीन मर्तबा इसी मुशायरे में उन्होंने ग़ज़ल पढ़ी और लोगों को इल्म हुआ कि एक होनहार शायर मैदान में आया है. मगर यह शोहरत पहले-पहल बाज़ ऐसे लोगों तक महदूद रही जो तालीमी मशागिल (पेशे) से ताल्लुक रखते थे. इतने में एक अदबी (साहित्यिक) मजलिस (बैठक) कायम हुई जिसमें महाशीर (उस तरह के लोग) शरीक होने लगे और नज़्म व नस्र (ख्याल) के मज़ामीन (विषय) की इसमें मांग हुई. शेख मुहम्मद इकबाल ने उसके एक जलसे में अपनी वह नज़्म जिसमें ‘कोह हिमाला’ से खिताब है पढ़कर सुनाई. उसमें अंग्रेजी ख़यालात थे और फ़ारसी बंदिशे. इस पर ख़ूबी ये कि वतनपरस्ती की चाशनी उसमें मौजूद थी. मजाके-ज़माना और ज़रुरियाते वक्त के मवाकिफ (मुताबिक) होने के सबाब बहुत मकबूल हुई...’
यूं तो इकबाल ने ग़ज़ल कहना स्कूल के ज़माने से ही शुरू कर दिया था और शुरू में वे अपनी ग़ज़लें दुरुस्त करवाने के लिए डाक से उस्ताद दाग़ देहलवी के पास भेजते थे. हज़रत दाग़ को जल्द ही इकबाल के हुनर का अंदाज़ा हो गया और दो-चार ग़ज़लें देखने के बाद ही लिख दिया कि इनमे सुधार की गुंजाइश नहीं है. सोचिये, दाग़ देहलवी जैसा नामचीन उस्ताद एक नए शायर के बारे में यह कहे तो कितनी बड़ी बात होगी.
लाहौर के माहौल में उनकी सोच पुख्ता होती है और अब वे देश-दुनिया, मजदूर क्रांति और समाजवाद की बातें करने लग जाते हैं. वे ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा...’ लिखते हैं. वे मज़हबी पाबंदियों और रूढ़ियों को पसंद नहीं करते और वतनपरस्ती को उनसे ऊपर रखते हुए लिखते हैं:
‘सच कह दूं ऐ बरहमन! गर तू बुरा न माने,
तेरे सनमकदे के बुत हो गए पुराने,
पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाके वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है.’
यहां तक तो सब ठीक ही नज़र आता है पर जब वे विलायत पढ़ने जाते हैं तो किस्सा बदल जाता है.
विलायत में पढाई और ज़हनी तलातुम (उथल-पुथल)
इकबाल 1905 में आगे पढने के लिए यूरोप चले गए. उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से बीए और जर्मनी की लुडविग मैक्सिमिलन यूनिवर्सिटी से दर्शन में डॉक्टरेट हासिल की. इंग्लैंड में उन्हें फिर प्रोफ़ेसर अर्नाल्ड का साथ मिला. विलायत में पढ़ने के दौरान उनमें एक ख़ास परिवर्तन आया - वहां के माहौल ने ज़ेहन पर इस कदर असर डाला कि जिस राष्ट्रवाद को वे अपना सबसे बड़ा मज़हब मानते थे, उस पर से उनका यकीन उठ गया. उन्हें लगा कि साम्राज्यवाद के हितों को साधने के लिए ‘राष्ट्रवाद’ का चोला पहना दिया जाता है. अवाम को धोखे में रखने के लिए ‘वतन का नया बुत’, नया देवता खड़ा किया गया है. अब वे लिखते हैं:
‘इन ताज़ा खुदाओं में, बड़ा सबसे वतन है,
जो पैराहन(कपडा) है उसका, वह मज़हब का कफ़न है’
और जहां ‘तराना-ए-हिंद’ में वे हिंदुस्तान को सारे जहां से अच्छा बताते हैं, ‘तराना-ऐ-मिल्ली’ में लिखते हैं:
‘चीन-औ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
मुस्लिम हैं हम वतन हैं, सारा जहां हमारा.’
यहां तक आते-आते मुस्लिम लीग को एक ऐसा अदबी शख्स मिल जाता है जो पार्टी की रूपरेखा बदल देता है.
इकबाल और द्विराष्ट्र का सिद्धांत
बात थोड़ी फ़ास्ट-फॉरवर्ड तरीके से आगे बढ़ाते हैं. इलाहाबाद में 29 दिसंबर, 1930 के दिन इकबाल मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के तौर पर भाषण में ‘द्विराष्ट्र के सिद्धांत’ का मसला हवा में उछाल देते हैं. इकबाल के भाषण का यह अंश कुछ इस तरह हैं - ‘मैं चाहता हूं पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत, सिंध, बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाया जाए. स्वायत्य शासन की सरकार बने चाहे हुकूमते बर्तानिया के झंडे के नीचे या अलग. उत्तर-पश्चिम में मुसलमान राज्य की स्थापना मुझे अब आख़िरी मंज़िल आती है...’
इसकी तक़रीर में उन्होंने सदियों के हिंदू-मुसलमान भाईचारे को इतर रखकर कहा कि ’ न हमारे ख़यालात एक हैं, न रिवाज़, तारीख में दर्ज जो लोग हमारे आदर्श हैं वो हिंदुओं के नहीं और जो उनके हैं, वो हमारे नहीं.’ कुछ ऐसी ही बात हिंदू संगठन भी कह रह थे. मुल्क अब बस कुछ ही साल दूर था आज़ादी से. हवाएं तेज़ हो चली थीं. कौमी रंग हर चेहरे पर नुमायां हो रहा था. सरमायेदार बनने के लिए हर कोई बेचैन था. सबको अपना-अपना हिस्सा चाहिए था. मुल्क किसी को नहीं. रह गए थे तो बस मोहनदास करमचंद गांधी ‘खान’ और अब्दुल गफ्फार खान ‘गांधी’ सरीखे चंद लोग.
इसी दौर में इकबाल के दो ख़ास कलाम ‘ज़र्बे-कलीम’ और ‘बाल-ऐ-जिब्रील’ शाया हुए (छपे). पहले में उन्होंने आधुनिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ जंग के ऐलान की आवाज़ उठाई और दूसरे में वे ‘उम्माह’ में यकीन करने का आवाहन करते हैं. दरअसल, इकबाल ने इस्लाम ही को अपना मुल्क मान लिया था. ओटोमन राज्य के बिखरने से आज़ाद हुए बाल्कन राज्यों पर ख़ुश होने के बजाय वे अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं और ख़ुदा से ‘शिकवा’ करते हैं कि जो मुसलमान एकेश्वरवाद के लिए खड़े हुए थे आज इस तरह क्यूं हार रहे हैं? क्यूं वो पिछड़े हुए हैं और अगर ये हाल रहा तो कोई उनका नाम लेने वाला न रहेगा. बाद में उन्होंने ‘जवाब-ऐ-शिकवा’ लिखा जिसमें इस्लाम को मानने वालों को अपने डर, ग़ुरबत, पिछड़ेपन से लड़ने के लिए हौसला दिया.
बात अब खत्म करते हैं. इकबाल की शायरी और विचारों में मतभेद हो सकता है. पर इसमें कोई शक नहीं है कि वे उस दौर के सबसे आलातरीन शायर थे. उन्होंने गर इस्लाम की आजादी के लिये लिखा है तो राम, स्वामी रामतीर्थ और गुरुनानक पर भी लिखा. हो सकता है आप ‘सारे जहां से अच्छा...’ न गाएं पर ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी...’ गाये बिना नहीं रह पायेंगे. मैं भी नहीं रह सकता
लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी
दूर दुनिया का मेरे दम अंधेरा हो जाये
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये
हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
जिंदगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म की शमा से हो मुझको मोहब्बत या रब
हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्दमंदों से ज़इफ़ों से मुहब्बत करना
मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको
1938 में आज ही का दिन उनका आख़िरी दिन था.
चलते-चलते
इकबाल ने कुछ समय के लिए उर्दू में लिखना छोड़ दिया था. यह उस दौर की बात है जब उन्हें महसूस हुआ कि अगर अपनी बात इस्लाम को मानने वालों तक पहुचाना है तो फ़ारसी में लिखना होगा. 1930 के बाद फिर दुबारा वे उर्दू में लिखने लग जाते हैं. दरअस्ल, उर्दू सिर्फ हिंदुस्तान में ही बोली जाती है. उन्होंने इसे मुसलमानों की ज़बान मानने से इंकार कर दिया था. सही भी है. उर्दू इस मुल्क की जुबां है. हमें यह सोचना होगा कि क्या 9 नवंबर को जब इकबाल पैदा हुए थे, हमें ‘उर्दू दिवस’ के रूप में मानना चाहिए?
Source: Satyagrah (https://satyagrah.scroll.in/article/106356/iqbal-was-great-shayar-who-is-responsible-for-breaking-indias-cultural-unity)