Friday, November 18, 2016

बरगद से सिकोया की ओर | Arvind k Sen

कारोबारी मामलों के जानकार अक्सर भारतीय कर-व्यवस्था की तुलना बरगद के पेड़ से करते हैं। ऐसी व्यवस्था, जिसका बरगद के पेड़ की भांति खूब फैलाव है, जिसके कर प्रावधान बरगद की जड़ों की माफिक आपस में उलझे हुए हैं और बरगद की तरह ही कर प्रावधानों की ऊंचाई (पहुंच) कम होने के कारण बड़े पक्षी (करवंचक) पकड़ में नहीं आते हैं। इसके विपरीत, दुनिया की सफल कर-व्यवस्थाओं को सिकोया के पेड़ की संज्ञा दी जाती है। ऐसी कर प्रणालियां, जो सिकोया के पेड़ की तर्ज पर सीधी और स्पष्ट हैं, जिनका फैलाव कम और गहराई ज्यादा है। सीधी-सपाट होने के कारण सिकोया पेड़ जैसी कर प्रणालियों में उलझाव की गुंजाइश कम होती है, लिहाजा इन्हें लागू करना और कर उगाहना आसान होता है।
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एक ऐसा निर्णय है जो हमारी कर-व्यवस्था को बरगद के उलझाव से निकाल कर सिकोया की स्पष्टता की ओर ले जाने वाला है। अगर कर-कानून सुपरिभाषित हों तो कर चुकाने वाले ईमानदार नागरिकों की परेशानियां कम हो जाती हैं, वहीं कानून में झोल कम होने के कारण उनका उल्लंघन करना भी आसान नहीं होता। समाज के लगभग सभी तबकों और राजनीतिक दलों ने जीएसटी के पक्ष में सहमति जताई है। ऐसे में सरकार ने अगले वित्तवर्ष से जीएसटी को लागू करने की योजना बनाई है। चूंकि यह नया कर है और कई मौजूदा कर (उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, वैट, चुंगी व प्रवेश कर) जीएसटी में समाहित हो जाने हैं, इसलिए कर अधिकारियों को जीएसटी के क्रियान्वयन से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया जाना है।
इन दोनों चुनौतियों (प्रस्तावित कानून को अगले वित्तवर्ष से लागू करने तथा इसके क्रियान्वयन का प्रशिक्षण) को सुलझाने के लिए जरूरी है कि नए कर (जीएसटी) की दरें निर्धारित की जाएं और संसद का अनुमोदन लिया जाए। सरकार ने पहली चुनौती को सुलझा लिया है। राज्यों से विचार-विमर्श के बाद सरकार ने प्रस्तावित जीएसटी की दरें बीते दिनों घोषित की हैं। जीएसटी परिषद ने वस्तु एवं सेवा कर ढांचे के तहत 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की चार स्तर की दरें तय करके प्रस्तावित कर की मोटी-मोटी संरचना पेश कर दी है। हालांकि इस नई कर-व्यवस्था के संबंध में प्रशासनिक शक्तियों को साझा करने के सवाल पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अंतिम सहमति बनना बाकी है। अगर इस बिंदु पर भी बात बन जाती है तो जीएसटी की राह साफ हो जाएगी। इसके साथ ही पहली बार देश का आर्थिक एकीकरण होगा और सेवाओं एवं वस्तुओं के प्रवाह पर अंतरराज्यीय बाधाएं दूर होने से एक देशव्यापी साझा बाजार भी अस्तित्व में आएगा।
जीएसटी परिषद ने अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं की जुदा-जुदा दरें तय करके एक बहुस्तरीय कर-प्रणाली खड़ी करने का प्रयास किया है। हमारे देश की विविधता और लोगों की आमदनी में खासा फर्क होने के कारण प्रस्तावित बहुस्तरीय कर प्रणाली उचित ही है। मिसाल के तौर पर, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल खाद्यान्न (जैसे, चावल और गेहूं) जैसी आम उपभोग की चीजों पर शून्य प्रतिशत कर लगाया जाएगा। दूसरे लफ्जों में कहें तो फिलहाल खाद्यान्न पर जीएसटी नहीं लगाया जाएगा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल आधी चीजों (पचास फीसद) के लिए शून्य प्रतिशत की दर तय की गई है। यह तथ्य सब जानते हैं कि कम आमदनी वाले लोगों का सबसे ज्यादा साबका उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल चीजों से ही पड़ता है। इस तरह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल जरूरी उपभोग की चीजों पर शून्य प्रतिशत की दर रखने का फायदा जाहिर तौर पर लोगों को मिलेगा।
GST की चार दरों का ऐलान; 5, 12, 18 और 28 फीसदी पर बनी सहमति
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हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि भले ही दर शून्य प्रतिशत रखी गई हो लेकिन ये चीजें जीएसटी के दायरे में हैं। इसलिए यह फायदा लंबे समय तक कायम रहेगा या नहीं, यह फैसला आने वाली सरकारों के हाथ में रहेगा। नया कर होने के कारण क्रियान्वयन के शुरुआती दौर में लोगों को दिक्कतें उठानी पड़ सकती हैं। इसी बात का खयाल रखते हुए सरकार ने व्यापक खपत वाली चीजों पर भी कर की दरें नरम रखी हैं। मसलन, मसालों और सरसों के तेल का उपयोग देश के तकरीबन हर घर में होता है। बड़ी खपत वाली इन चीजों पर पांच फीसद की दर प्रस्तावित की गई है। नरम कर दरें यहां पर आकर समाप्त हो जाती हैं।
इसके बाद सरकार ने वस्तुओं एवं सेवाओं की प्रकृति और उनका उपभोग करने वाले लोगों की आमदनी को ध्यान में रखते हुए धीरे-धीरे नरम से कठोर दरों का रुख किया है।
जैसे, नौकरीपेशा लोगों द्वारा उपभोग किए जाने वाले डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर बारह फीसद की दर प्रस्तावित की गई है। इसे कठोर दर तो नहीं कहा जाएगा लेकिन इसकी दर व्यापक खपत वाली चीजों से ज्यादा रखी गई है। बढ़ते शहरीकरण के कारण तेजी से बढ़ रहे मध्यवर्ग द्वारा उपभोग की जाने वाली चीजों मसलन साबुन, तेल, टूथपेस्ट और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों जैसे रेफ्रिजरेटर व स्मार्टफोन पर 18 फीसदी की दर प्रस्तावित की गई है। सामान्यतया नव मध्यवर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का समर्थक रहा है और यह वर्ग बेहद आक्रामकता के साथ मीडिया व इंटरनेट माध्यमों के जरिए अपनी मांगें रखता रहा है।
फिलहाल टूथपेस्ट और स्मार्टफोन जैसी आधुनिक जीवन शैली वाली चीजों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। कहना मुश्किल है कि 18 फीसद की टैक्स-दर के प्रति नव मध्यवर्ग का क्या रुख होगा। धनाढ्य वर्ग द्वारा उपयोग की जाने वाली महंगी वस्तुओं (जिन्हें कराधान की भाषा में सफेद वस्तुएं कहा जाता है) और कारों पर लगने वाले कर की दर 28 फीसद रखी गई है। इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। बल्कि भारत के समकक्ष विकासशील देशों में लक्जरी वस्तुओं पर इससे भी ज्यादा दरों पर कर वसूला जाता रहा है। अगर इसे 30 फीसद रखा जाता और मध्यवर्ग व निम्न आदमनी वाले समूह के बीच झूल रहे नव मध्यवर्ग के उपभोग वाली चीजों पर लगने वाले कर की दरों को 12 फीसद के बजाय 10 फीसद रखा जाता तो और उचित होता।
हालांकि तर्क दिया जा सकता है कि जीएसटी एक नया कर है और इसमें बेहद ऊंची दरों का नकारात्मक असर भी हो सकता है। जरूरत पड़ने पर बाद में भी दरें बढ़ाई जा सकती हैं। मगर अनुभव बताता है कि एक बार स्थापित होने के बाद कर की दरों में इजाफा करना बेहद मुश्किल होता है। खासतौर पर लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दल टैक्स-दरों में बढ़ोतरी करके किसी तबके को नाराज करने का सियासी जोखिम उठाने से बचते हैं। बहरहाल, मौज-मजे और शान-शौकत के लिए खरीदी जाने वाली बेहद महंगी चीजों और मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तुओं जैसे पान मसाला, तंबाकू और शीतल पेयों (मानव शरीर और अर्थव्यवस्था पर बेहद नकारात्मक असर डालने वाली इन चीजों को आर्थिक भाषा में ‘पापमय वस्तुएं’ या ‘सिनफुल थिंग्स’ कहा जाता है) पर कर की दर 28 फीसद प्रस्तावित की गई है।
इस मोर्चे पर भी सरकार ने एक बार फिर नरमी बरती है, जिसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया के बाकी देशों में इस श्रेणी की चीजों पर ऊंची टैक्स-दरें लगाने की रवायत रही है, ताकि इनके उपभोग को हतोत्साहित किया जा सके। इससे दो फायदे होते हैं। एक, ऊंची कर-दरों के कारण के कारण कर-राजस्व में इजाफा होता है, और दूसरा, ऊंची कर-दरों के कारण इनके उपभोग में कमी आती है, जिसके चलते इन चीजों के उपभोग से पैदा होने वाली बीमारियों के इलाज पर खर्च होने वाली रकम बचती है। हमारे देश में भी लंबे समय से समाज का जागरूक तबका इन वस्तुओं पर ऊंची कर-दरों की मांग करता आया है। मगर इन वस्तुओं की निर्माता कंपनियां भी बराबर कर-दरें कम रखने की मांग करती रही हैं। संभव है कि सरकार इन वस्तुओं के कारोबारियों की तरफ से किए जा रहे प्रतिरोध के चलते इस श्रेणी की वस्तुओं पर ज्यादा ऊंची कर-दरें रखने का फैसला नहीं कर पाई।
बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जीएसटी जैसा विशाल और शक्तिशाली कर-विधान एक झटके में लागू नहीं किया जा सकता। कदम-दर-कदम ही इतने बड़े कर-सुधार को लागू किया जा सकता है। जीएसटी की बहुस्तरीय व्यवस्था उचित है, क्योंकि एक ही दर रहने से मुद्रास्फीति बढ़ने का अंदेशा था। कर श्रेणियां बन गई हैं, अब देखने वाली बात यह है कि कौन-सी वस्तुएं किस श्रेणी में आती हैं। इसके अलावा, सेवाओं पर लगने वाले करों की दरें घोषित होना बाकी है। कयास लगाए जा रहे हैं कि अधिकतर सेवाओं पर 18 फीसद और जरूरी सेवाओं पर 12 फीसद की दर से कर लगाया जा सकता है। इस बारे में अंतिम निर्णय जीएसटी परिषद को लेना है।
खैर, सरकार को सेवाओं पर कर की दरें निर्धारित करते वक्त और वस्तुओं की श्रेणियां तय करते समय इस बात का खयाल रखना होगा कि कर-राजस्व में बढ़ोतरी हो लेकिन इसकी कीमत आम आदमी को न चुकानी पड़े। जीएसटी की बहुस्तरीय व्यवस्था में जुदा-जुदा वस्तुओं और सेवाओं का अलग-अलग श्रेणियों में आवंटन इस तरह हो कि उसमें हमारी अर्थव्यवस्था की मौजूदा खपत-प्रवृत्तियों की झलक हो। यानी जो ज्यादा आमदनी के साथ ज्यादा उपभोग करे, उस पर ज्यादा टैक्स और व्यापक उपभोग वाली जीवन की जरूरी चीजों पर कम टैक्स लगे। यही कराधान का स्वर्णिम नियम भी है।

संकट में वन्य जीव | रीता सिंह

वर्ल्ड वाइल्ड फंड एवं लंदन की जूओलॉजिकल सोसायटी की हालिया रिपोर्ट चिंतित करने वाली है कि 2020 तक धरती से दो तिहाई वन्य जीव खत्म हो जाएंगे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हो रही जंगलों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले चार दशकों में वन्य जीवों की संख्या में भारी कमी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक 1970 से 2012 तक वन्य जीवों की संख्या में 58 फीसद की कमी आई है। हाथी और गोरिल्ला जैसे लुप्तप्राय जीवों के साथ-साथ गिद्ध और रेंगने वाले जीव तेजी से खत्म हुए हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2020 तक 67 फीसद वन्य जीवों की संख्या में कमी आ सकती है।
गौरतलब है कि खत्म हो रहे जीवों में जंगली जीव ही नहीं बल्कि पहाड़ों, नदियों व महासागरों में रहने वाले जीव भी शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1970 से अब तक इन जीवों की संख्या में तकरीबन 81 फीसद की कमी आई है। जलीय जीवों के अवैध शिकार के कारण तीन सौ प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। जलीय जीवों के नष्ट होने का एक अन्य कारण फफूंद संक्रमण और औद्योगिक इकाइयों का प्रदूषण भी है। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाएं, विभिन्न प्रकार के रोग, जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी भी प्रमुख कारण हैं। इन्हीं कारणों की वजह से यूरोप के समुद्र में ह्वेल और डॉल्फिन जैसे भारी-भरकम जीव तेजी से खत्म हो रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक भीड़-बकरियों जैसे जानवरों के उपचार में दी जा रही खतरनाक दवाओं के कारण भी पिछले बीस सालों में दक्षिण-पूर्व एशिया में गिद्धों की संख्या में कमी आई है। भारत में ही पिछले एक दशक में पर्यावरण को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की संख्या में 97 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। गिद्धों की कमी से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और किस्म-किस्म की बीमारियां तेजी से पनप रही हैं। गिद्धों की तरह अन्य प्रजातियां भी तेजी से विलुप्त हो रही हैं।
वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि पेड़ों की अंधाधुध कटाई और जलवायु में हो रहे बदलाव के कारण कई जीव जातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर विविधता और पारिस्थितिकी अभिक्रियाओं पर उसका नकारात्मक असर पड़ना तय है। यह आशंका इसलिए अकारण नहीं है कि पृथ्वी पर करीब बारह करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीव के समाप्त होने का कारण मूलत: जलवायु परिवर्तन ही था। अगर जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाले वर्षों में धरती से जीवों का अस्तित्व मिटना तय है।
धरती के साथ मानव का निष्ठुर व्यवहार बढ़ता जा रहा है जो कि जीवों के अस्तित्व के प्रतिकूल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बारह हजार वर्ष पहले हिमयुग के खत्म होने के बाद होलोसीन युग शुरू हुआ था। इस युग में धरती पर मानव सभ्यता ने जन्म लिया। इसमें मौसम चक्र स्थिर था, इसलिए स्थलीय और जलीय जीव पनप सके। लेकिन बीसवीं सदी के मध्य से जिस तरह परमाणु ऊर्जा के प्रयोग का दौर शुरू हुआ है और बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो रही है उससे होलोसीन युग की समाप्ति का अंदेशा बढ़ गया है। उसी का असर है कि आज वन्य जीव अस्तित्व के संकट से गुजर रहे है।
वन्य जीवों के वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो पृथ्वी के समस्त जीवधारियों में से ज्ञात तथा वर्णित जातियों की संख्या लगभग अठारह लाख है। लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या के तकरीबन पंद्रह फीसद से कम है। उसका कारण लाखों जीवों के बारे में जानकारी उपलब्ध न होना है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी पर विद्यमान कुल जातियों की संख्या पचास लाख से पांच करोड़ के बीच है। इनमें अधिकांश का वर्णन व नामकरण अब भी नहीं हो सका है। जबकि जीव जातियों की पहचान व इनके नामकरण का क्रमबद्ध कार्य पिछले ढाई सौ वर्षों से जारी है।
जहां तक भारत का सवाल है, तो यहां विभिन्न प्रकार के जीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। जीवों की लगभग पचहत्तर हजार प्रजातियां यहां पाई जाती हैं। इनमें तकरीबन 350 स्तरनधारी, 1250 पक्षी, 150 उभयचर, 2100 मछलियां, 60 हजार कीट व चार हजार से अधिक मोलस्क व रीढ़ वाले जीव हैं। भारत में जीवों के संरक्षण के लिए कानून बने हैं। इसके बावजूद जीवों का संहार जारी है। जैव विविधता को बचाने के लिए आवश्यक है कि जीवों को बचाया जाए। जैव विविधता एक ऐसा प्राकृतिक संसाधन है जो यदि एक बार समाप्त हो गया तो उसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता। अर्थात इसका विलुप्तिकरण सदैव के लिए हो जाता है।
गौर करें तो जीवों पर बढ़ते संकट का मुख्य कारण वायुमंडल के तापमान का बढ़ना, प्रदूषण का बढ़ता स्तर, जंगलों तथा भूमि का व्यापक कटाव, मनुष्यों की अदूरदर्शिता, क्लोनिंग व जैव तकनीक का बढ़ता प्रयोग तथा उच्च स्तरीय और कीट-प्रतिरोधी बीजों का विकास आदि हैं। अस्तिव के संकट में फंसे जीवों को बचाने के लिए जरूरी है कि धरती के बढ़ते तापमान और प्रदूषण की रोकथाम की ठोस पहल हो। जिस गति से धरती का तापमान बढ़ रहा है उससे आने वाले दिनों में वन्य जीवों का संकट गहरा सकता है। लिहाजा, उनके संरक्षण के लिए विशिष्ट परियोजनाएं बनाई जाएं तथा वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगे। इसके अलावा, वन क्षेत्र को कम करके कृषि विस्तार की योजनाआेंं पर भी रोक लगनी चाहिए। ‘स्थानांतरण खेती’ को नियंत्रित किया जाए तथा यदि संभव हो तो उसे समाप्त ही कर दिया जाए। नगरों के विकास के लिए भी वनों की कटाई पर रोक लगनी चाहिए।
लेकिन त्रासदी है कि संपूर्ण विश्व में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई जारी है। इस तरह हम देखते हैं कि जलवायु बदलाव के संकट के मूल में विकास का प्रचलित मॉडल है जो संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर आश्रित है। ‘ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट’ (जीएफआरए) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 1990 से 2015 के बीच कुल वन क्षेत्र तीन फीसद घटा है और 102,000 लाख एकड़ से अधिक का क्षेत्र 98,810 लाख एकड़ तक सिमट ढाई सौ वर्षों से चल रहा है। यानी 3,190 लाख एकड़ वनक्षेत्र में कमी आई है। गौर करें तो यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रीका के आकार के बराबर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक वनक्षेत्र में छह फीसद की कमी आई है। उष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्रों की स्थिति और भी दयनीय है। यहां सबसे अधिक दस फीसद की दर से वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है। ये हालात तब हैं जब एक दशक से पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर सतत प्रयास जारी है।
एक अनुमान के मुताबिक वैश्विक समुदाय विकास के नाम पर प्रत्येक वर्ष सात करोड़ हेक्टेयर वनक्षेत्र का विनाश कर रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वनों के विनाश से वातावरण जहरीला होता जा रहा है और प्रतिवर्ष दो अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमंडल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है। ‘नेचर जिओसाइंस’ का कहना है कि ओजोन परत को होने वाले नुकसान से कुछ खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्त्वों (वीएसएलएस) की संख्या में वृद्धि हुई है जो वन्य जीवों व मानव जाति के अस्तित्व के लिए बेहद खतरनाक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्त्वों (वीएसएलएस) की ओजोन को नुकसान पहुंचाने में भागीदारी नब्बे फीसद है। विडंबना यह कि एक ओर प्राकृतिक आपदाओं से जीव-जंतुओं की प्रजातियां नष्ट हो रही हैं, वहीं रही-सही कसर इंसानी लालच और उसका शिकार का शौक पूरा कर दे रहा है। अभी पिछले दिनों ही इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफयर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिछले एक दशक में प्रतीक के लिए दुनिया भर में सत्रह लाख वन्य जीवों का शिकार (ट्राफी हंटिंग) किया गया। इनमें दो लाख विलुप्तप्राय जीव हैं।
दरअसल, इन वन्य जीवों के शिकारी जीवों के अंगों को महंगी कीमतों पर बेचते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी मुंहमांगी कीमत मिलती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक हाथी मारने की कीमत पच्चीस से साठ हजार डॉलर है। इसी तरह एक बाघ साढ़े आठ हजार से पचास हजार और तेंदुआ पंद्रह से पैंतीस हजार डॉलर तक है। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि शौक के लिए शिकार यानी ट्राफी हंटिंग को अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों ने मान्यता दे रखी है। ट्राफी हंटिंग में अमेरिकी शिकारी सबसे आगे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले एक दशक में दुनिया भर में ग्यारह हजार बाघों का शिकार किया गया जिनमें पचास फीसद बाघों को अमेरिकी शिकारियों ने मारा है। आश्चर्य की बात यह है कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन यह तर्क दे रहा है कि अगर कानूनी दायरे में ट्राफी हंटिंग हो तो वन्य जीवों के संरक्षण में मदद मिलेगी और जीवों की आबादी नियंत्रित होगी। साथ ही स्थानीय लोगों को आर्थिक फायदा भी पहुंचेगा। लेकिन यह दलील सही नहीं है। सच यह है कि इससे वन्य जीवों की संख्या में कमी आएगी और पहले से ही लुप्त हो रहे जीवों का अस्तित्व मिट जाएगा।

भारत में नया बाजार तलाशता ब्रिटेन | दीपक रस्तोगी

इसमें न तो कोई आश्चर्य है और न ही भारत के लिए आनंद मनाने जैसी बात कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री जब यूरोप के बाहर पहली बार किसी देश की यात्रा पर निकलीं तो उन्होंने भारत को चुना। ब्रेक्जिट के बाद से ही इस यात्रा का अनुमान लगाया जाने लगा था। भारत का तेजी से बढ़ता हुआ बाजार उन सभी यूरोपीय देशों को लुभा रहा है, जो आज की तारीख में आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। यूरोपीय संघ से निकलने की तैयारी में जुटे ब्रिटेन का पहला चयन जाहिर तौर पर भारत को होना था।  अभी ब्रिटेन के सामने चुनौती अपनी अर्थव्यवस्था का ढांचा तैयार करने की है। ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन की स्थिति आर्थिक महाशक्ति वाली नहीं रह गई है। ब्रिटिश कंपनियां पूंजी की तलाश में जुट गई हैं। वहां के लोगों को रोजगार दिलाने के लिए सरकार को नए रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं। ऐसे में ब्रिटेन को अभी तय करना होगा कि उसकी अर्थव्यवस्था पुराने अंदाज वाली रहेगी, औद्योगिक उत्पादन वाली अर्थव्यवस्था या फिर चीन की तरह वह उत्पादन और विपणन केंद्रित अर्थव्यवस्था बनना चाहेगा।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे के पहले भारत दौरे को लेकर राजनयिक शब्दावलियों का जामा पहनाया गया है। उनके आने के पहले कहा गया था कि भारत के साथ ब्रिटेन के ‘विशेष और पुराने संबंध’ रहे हैं। उन संबंधों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। अपनी यात्रा के पहले थेरेसा मे ने लंदन के अखबार ‘संडे टेलीग्राफ’ में लेख लिख कर बताया कि ‘बेहद जरूरी और सबसे करीबी’ देश भारत का उनका दौरा कितना जरूरी है और इस लेख के जरिए उन्होंने अपने देश के लोगों को बताने की कोशिश की कि वे भारत से बहुत कुछ ले आएंगी। तेजी से महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रहे भारत को ब्रिटेन ने पुराने संबंधों और मूल्यों की याद दिलाने में कोई कसर नहीं उठा रखी।
500 और 1000 रुपए के नोट बंद- मोदी सरकार के फैसले पर क्‍या सोचती है जनता
अतीत के अनुभवों को देखते हुए ब्रिटेन की इस तरह की उम्मीदें गैर-वाजिब नहीं कही जाएंगी। ब्रिटिश उपनिवेश रहे देशों का संगठन कॉमनवेल्थ और इसके सदस्य देश हमेशा से ब्रिटेन के प्रति नरम रवैया रखते रहे हैं। इन देशों में अहम जगह बना चुके भारत ने ब्रिटिश कंपनियों के लिए अपने बाजार के दरवाजे खोले ही हैं। थेरेसा मे की यात्रा में तिरासी हजार करोड़ रुपए के कारोबार को लेकर जो समझौते हुए हैं, उनसे स्पष्ट है कि उनका भारत दौरा ब्रिटिश अर्थव्यवस्था में कुछ जान जरूर फूंकेगा। यूरोपीय बाजारों से ब्रिटेन को तगड़ा नुकसान हो रहा था। यूरोपीय समुदाय के साथ अपनी करेंसी के मूल्यांयन को लेकर ब्रिटेन असहज स्थिति में आ गया था। ऐसे में वहां के लोगों और कारोबारी जगत से ब्रिटिश सरकार पर नए बाजार की तलाश का बेहद दबाव था भी।
थेरेसा मे के नेतृत्व में वहां से तैंतीस उद्योगपतियों का प्रतिनिधिमंडल भारत आया था, जिसने निर्माण, प्रौद्योगिकी, सूचना-प्रौद्योगिकी, रक्षा, खाद्य प्रसंस्करण, एफएमसीजी, फैशन, इस्पात, ऊर्जा आदि क्षेत्रों में संभावनाओं की तलाश की। यहां आने के पहले थेरेसा मे अपने देश में वादा करके आई थीं कि ‘मेरी यात्रा हमारे घर के लोगों के लिए सुरक्षित रोजगार के सृजन की तलाश’ में हो रही है। ब्रिटेन में भारतीयों के लिए वीजा के ताजा प्रावधानों को घरेलू मोर्चे पर दबाव का ही नतीजा माना जा रहा है। भारत में दोनों प्रधानमंत्रियों की बातचीत में यह मुद्दा उठना ही था। थेरेसा मे ने विकल्प के तौर पर व्यापार केंद्रित दो वीजा कार्यक्रमों- ‘रजिस्टर्ड ट्रेवलर स्कीम’ और ‘ग्रेट क्लब’ की घोषणा की। लेकिन भारत इन्हें अपर्याप्त मान रहा है और मोदी ने उनका ध्यान अपने छात्रों और कामकाजी पेशेवरों पर ब्रिटेन के सख्त वीजा प्रावधानों के पड़ने वाले प्रभावों की ओर आकृष्ट किया। आधिकारिक ब्रिटिश आंकड़ों के अनुसार भारतीय नागरिकों को जारी किए गए स्टडी वीजा की संख्या घट कर 11,864 रह गई, जो 2010 में 68,238 थी।
उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में वीजा व्यवस्था सरल हो जाएगी। भारतीय सूचना प्रोद्यौगिकी कंपनियों की ओर से इसके लिए दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव है। अब ब्रिटिश सरकार को रास्ता निकालना है। तभी व्यापार को बढ़ावा देने की आपसी प्रतिश्रुति पर हकीकत में अमल हो पाएगा। दोनों नेताओं ने व्यापार को बढ़ावा देने और वीजा व्यवस्था को सरल बनाने के अलावा सुरक्षा और रक्षा सहयोग सहित विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर विचार विमर्श किया। दोनों नेताओं ने साझा हितों वाले क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा की। उन्होंने दक्षिण एशिया को स्थिर, खुशहाल और आतंकवाद से मुक्त होने की आवश्यकता पर भी बल दिया तथा सभी देशों से इस लक्ष्य की दिशा में काम करने का आह्वान किया।  ब्रिटिश नेतृत्व को उम्मीद है कि भारत के बाजार में दखल से वहां की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था ताकत पाएगी। ब्रिटेन के सेक्रेटरी आॅफ स्टेट (अंतरराष्ट्रीय व्यापार) लियाम फॉक्स इस यात्रा को लेकर खासे सक्रिय रहे। खासकर दिल्ली में भारत के वाणिज्यिक संगठनों के साथ अपने प्रतिनिधिमंडल की बैठकें कराने में और फिर बंगलुरु जाकर सूचना प्रौद्योगिकी में नामी भारतीय कंपनियों के सीईओ और आला अधिकारियों के साथ बैठकें करने में।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ थेरेसा मे की शिखर वार्ता के बाद संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया गया। राजनयिक परिभाषा में इस कवायद का मतलब यही होता है कि जिन विषयों का जिक्र सामने आ रहा है, उन पर दोनों देश एक राय हैं। भारत में इन दिनों रक्षा खरीद सौदों पर सरकार का जोर है। सेना, वायुसेना और नौसेना की जरूरतें अरसे से लंबित हैं। ऐसे में नए सैन्य साजो-सामान के लिए उन्नत तकनीक और प्रभावी आयुधों की तलाश में भारत है। भारत ने रक्षा जैसे अहम क्षेत्र के लिए भी ब्रिटिश कंपनियों के दरवाजे खोलने का भरोसा दिया है। रक्षा उपकरणों के लिए निर्माण, तकनीकी हस्तांतरण और सह विकास के लिए भारतीय एजेंसियों के साथ सरकार की नीति के अनुसार ही सहभागिता की शर्त भी रखी गई है। लेकिन ऐसे वक्त में जब अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदा और युद्धक विमान खरीद में रॉल्स रॉयस द्वारा घूस देने का विवाद जांच एजेंसियों के गले की हड्डी बना हुआ है, रक्षा सौदों में भागीदारी का वचन कितना धरातल पर आ सकेगा- इस पर सवाल बना हुआ है। अगस्ता वेस्टलैंड विवाद में कमीशनखोरी का आरोपी क्रिस्टीन मिशेल और रॉल्स रॉयस मामले में सुधीर चौधरी- दोनों ही भारत में वांछित हैं और लंदन में रह रहे हैं। भारत ने दोनों के प्रर्त्यपण की मांग की है। जाहिर है, प्रत्यर्पण वाली शर्त ब्रिटेन पर भारी पड़ने वाली है। क्योंकि दोनों ही वहां अच्छा राजनीतिक रसूख रखते हैं।
दोनों देशों के संयुक्त बयान में आतंकवाद, उग्रवाद, समुद्री सुरक्षा और समुद्री कानून व्यवस्था को लेकर अहम बातें कही गई हैं, जो भारत के लिए आगामी दिनों में मुफीद हो सकती हैं। दोनों प्रधानमंत्रियों ने स्वीकार किया है कि आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक हैं। इस संबंध में समन्वित वैश्विक कार्रवाई होनी चाहिए। दोनों देशों ने समुद्र संबंधी कानून से जुड़ी 1982 की संयुक्त राष्ट्र संधि (यूएनसीएलओएस) के आधार पर समुद्रों और सागरों में कानूनी व्यवस्था कायम रखने के महत्त्व को रेखांकित किया। दक्षिणी चीन सागर के संदर्भ में यह कवायद अहम है। चीन ने संयुक्त राष्ट्र के उस आदेश को मानने से इंकार करते हुए उसकी आलोचना की है।
अंतरराष्ट्रीय राजनय को लेकर संयुक्त घोषणापत्र में जो बातें कही गई हैं, उनका मूल आर्थिक आधार ही है। आपसी कारोबार बढ़ाने पर भारत और ब्रिटेन में जोर दिया जा रहा है। वित्तीय पटरी पर रफ्तार तेज करने के लिए दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार की बात की जा रही है। मगर यह तभी होगा, जब ब्रिटेन की यूरोपीय संघ से बाहर आने की औपचारिकता पूरी हो जाए। ब्रिटेन को जी-20 देशों में भारत में निवेश करने वाला सबसे बड़ा देश माना जाता रहा है। लेकिन अब भारतीय कंपनियां ब्रिटेन में हाई-प्रोफाइल खरीद कर रही हैं। वहां टाटा स्टील और टाटा मोटर्स, इंफोसिस, टेक महिंद्रा, समेत कई कंपनियों का निवेश बढ़ा है। लेकिन भारत और ब्रिटेन का आपसी कारोबार दो फीसद से ज्यादा कभी नहीं रहा। इसमें भी भारत को ब्रिटिश निर्यात ज्यादा है। ब्रिटेन इस भागीदारी को बढ़ाना चाहता है। लेकिन बाजार में उसे कोरियाई, अमेरिकी, जर्मन और चीनी उत्पादों से कड़ी होड़ करनी होगी।
सबसे जरूरी बात यह कि अगर यूरोप के बाहर ब्रिटेन खुद को अटलांटिक सिंगापुर के तौर पर स्थापित करना चाहता है, तो उसे पहले सिंगापुर बनना होगा। हर तरह के विचारों के लिए खुला, मुक्त कारोबार क्षेत्र और आव्रजकों के लिए भी मुक्त। उसे भारतीय आव्रजकों और भारतीय सेवा प्रदाताओं के लिए अपने दरवाजे खोलने होंगे। उसे याद करना होगा कि वीजा नियमों और वहां की अर्थव्यवस्था के चलते ब्रिटेन में भारतीय विद्यार्थियों की संख्या में बीस फीसद की गिरावट आई है। अभी ब्रिटेन दोराहे पर खड़ा है। उसे तय करना होगा कि वह यूरोप की छाया से खुद को मुक्त करेगा या खुद को कॉमनवेल्थ का सिरमौर मानता रहेगा।

विकास भी चाहिए और रोजगार भी | एन के सिंह

पिछला एक वर्ष भारत के लिए उथल-पुथल भरा रहा है। अपनी संप्रभुता, सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रवाद की आक्रामक अभिव्यक्तियों से उसे जूझना पड़ा है। वहीं, इस क्षेत्र की भू-राजनीति अब भी अनिश्चित और अस्थिर बनी हुई है। चीन की विकास दर घट रही है, लिहाजा अपने आर्थिक रसूख को कायम रखने के लिए वह नए-नए तरीके अपना रहा है। दक्षिण चीन सागर विवाद पर ट्रिब्यूनल के फैसले को न मानना, ‘वन बेल्ट वन रोड’ (सिल्क रोड आर्थिक गलियारा और 21वीं सदी के समुद्री सिल्क रोड) पर तेजी से आगे बढ़ना और तिब्बत से निकलने वाली नदियों के पानी के रुख में तब्दीली से जुड़ी खबरें उसकी इन्हीं कोशिशों के चंद उदाहरण हैं।
वह पारंपरिक रूप से भारत का सहयोगी माने जाने वाले रूस के साथ भी दोस्ती की नई पींगे बढ़ा रहा है, और पाकिस्तान के साथ उसकी कदमताल जारी है ही। इससे निश्चय ही इस क्षेत्र की भू-राजनीति और जटिल बनने वाली है। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे को लेकर तस्वीर भले ही साफ दिखती हो, मगर नए अमेरिकी मुखिया के साथ चीन की विदेश नीति की दिशा क्या होगी, इस पर अब तक भ्रम की चादर पड़ी है। मगर हां, इस तस्वीर के बीच भी भारत ने कई मोर्चों पर उल्लेखनीय प्रगति की है।
हमारी पहली प्रगति विदेश नीति के मोर्चे पर हुई है। हाल के वर्षों में रणनीतिक तौर पर हम अमेरिका से इतने करीब कभी नहीं रहे, जितने अभी हैं। साथ ही, अफ्रीका, लातीन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक भी हमारी पहुंच मजबूत हुई है। देश-दुनिया में मोदी के नेतृत्व को व्यापक रूप से मान्यता मिली है। दूसरी सफलता आर्थिक मोर्चे पर है। मामूली मुद्रास्फीति के साथ हमारी अर्थव्यवस्था 7.4 फीसदी की दर से कुलांचे भर रही है। चालू खाते का घाटा स्थिर है और अधिक उदार मौद्रिक नीति की ओर भी हमने कदम बढ़ाया है। विश्व में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हमारा एक सकारात्मक पक्ष है ही।
मगर भारत में निजी निवेश की रफ्तार अब भी सुस्त है। हालांकि बैंकों के संचित कोष पर पाबंदियों को हटाकर और इन्फ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर निवेश करके निजी निवेश को गति देने की कोशिश की जा रही है, मगर इन कोशिशों का लाभ मिलने में वक्त लगेगा। हमने राजनीतिक मोर्चे पर भी खूब प्रगति की है। भाजपा इससे पहले इतनी मजबूत कभी नहीं रही, जितनी कि पिछले एक वर्ष में रही है। इसके खाते में कई राज्य सरकारें आई हैं और कई क्षेत्रीय पार्टियों ने भी इसका दामन थामा है। हालांकि इससे ऐतराज नहीं कि अब भी काफी कुछ उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात के विधानसभा चुनावों पर निर्भर करेगा।
इन तमाम क्षेत्रों के अलावा मैं यहां दो अन्य संदर्भों की चर्चा करना चाहूंगा, जिसमें पहला विश्व बैंक से जुड़ा है। विश्व बैंक हर वर्ष ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ यानी कारोबारी माहौल को लेकर दुनिया के तमाम देशों की रैंकिंग जारी करता है। यह सूची एक तरह से निवेश के माहौल और संभावित विकास के अनुमान का खाका होती है। हालिया सूची में हमारी स्थिति में पिछले वर्ष के मुकाबले बहुत मामूली सुधर हुआ है और महज एक पायदान ऊपर चढ़कर हम 130वें स्थान पर पहुंचे हैं। यह मोदी सरकार के उन वादों से कोसों दूर है, जिसमें भारत को शीर्ष 50 देशों में शुमार किए जाने की बात कही गई थी।
बेशक इस सूची के गुणा-भाग के तरीके पर सवाल उठाया जा सकता है, मगर कुछ मामलों में हमारी गति वाकई निराशाजनक है। कारोबार को शुरू करने, निर्माण-कार्यों की अनुमति लेने, कर्ज मिलने और दिवालियेपन का समाधान निकालने में हम उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर सके हैं। जाहिर है, इस संदर्भ में छोटे से छोटे फैसले लेने और केंद्र और राज्यों के बीच नीतिगत मामलों में सामंजस्य बनाने की दरकार है। हमें अपनी गति दोगुनी करनी होगी, तभी इस सूची में हम अपना प्रदर्शन बेहतर कर सकते हैं। मेरा मानना है कि नीति आयोग के उपाध्यक्ष के नेतृत्व में नीति आयोग, औद्योगिक नीति व संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) और वित्त मंत्रालय का एक संयुक्त कार्य समूह बनाया जा सकता है, जो इस दिशा में काम करे।
मेरा मानना है कि मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से मिले फायदे को हमें यूं ही जाया नहीं होने देना चाहिए। दूसरा संदर्भ नई नौकरियों के सृजन से जुड़ा है। मैं हाल ही में एक टीवी-डिबेट में शामिल हुआ था, जहां सभी की यही राय थी कि अगर हर महीने दस लाख नौकरियां पैदा करनी हैं, तो हमें नई रणनीति अपनानी ही होगी। रणनीति की इसलिए भी दरकार है, क्योंकि प्रौद्योगिकी में बदलाव, डिजिटल प्लेटफॉर्म, इंटरनेट के विस्तार और चौथी औद्योगिक क्रांति की वजह से नौकरियां जितनी तेजी से खत्म हो रही हैं, उतनी तेजी से पैदा नहीं हो रहीं। विश्व बैंक का अनुमान है कि विध्वंसकारी तकनीकी बदलाव के कारण करीब 68 फीसदी भारतीयों की नौकरियां खतरे में हैं।
बेशक तकनीकी समावेशन को रोककर हम खुद को स्पर्धा से बाहर नहीं कर सकते। मगर जिन तकनीकों का चरित्र श्रमिकों का विस्थापन है, उसे लेकर नए दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। चीन का उदाहरण हमारे सामने है, जहां मजदूरी की दरों में उल्लेखनीय इजाफा होने के कारण श्रम-प्रधान उद्योग विकल्प के रूप में देखे जाने लगे हैं। भारत में भी कपड़ा, रत्न व आभूषण, चमड़ा, हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों को लेकर काम किए जाने की जरूरत है। नीति आयोग ने कुछ कदम जरूर उठाए हैं, मगर श्रम कानूनों (जो अब राज्य के अधिकार-क्षेत्र में है), भूमि अधिग्रहण की मंजूरी और अन्य नीतिगत बदलावों पर जल्दी से जल्दी काम नहीं किया गया, तो हम यह अवसर गंवा सकते हैं।
महज यह मान लेना कि हमारी पहल ही पर्याप्त नौकरियां पैदा करने के लिए काफी होगी, इस मामले को सतही तौर पर देखना होगा। स्किल इंडिया कार्यक्रम को अगर अत्याधुनिक बनाना है, तो हमें 21वीं सदी के अनुकूल शिक्षा और कौशल को बढ़ावा देना होगा। इससे जुड़े कार्यक्रमों में सुधार करने होंगे। इसके साथ, सामाजिक क्षेत्रों की नीतियों को भी इसके अनुकूल बनाना होगा। अगर हम ऐसा करने में सफल रहे, तो यकीन मानिए कि नौकरी के हिसाब से यह न सिर्फ ग्रामीण भारत के लिए, बल्कि तकनीक में बदलाव के कारण ‘बेरोजगार’ होने वाले भारत के लिए भी काफी सुखद रहेगा। यह दौर सचमुच खत्म होना चाहिए, जिसमें विकास तो हो रहा है, मगर बेरोजगारी भी है। यह तभी संभव है, जब रोजगार का लगातार सृजन हो और विकास-दर सतत गति से आगे बढ़े। जाहिर है, भारत अभी बदलाव के चौराहे पर है।

राजनीतिः जोखिम में बच्चों की जिंदगी | अरविंद कुमार सिंह

बच्चे राष्ट्र की थाती हैं। भविष्य हैं। पर दुर्भाग्य है कि आज उनका जीवन संकट में है। वे विभिन्न प्रकार के गंभीर रोगों का सामना कर रहे हैं और उचित इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। चंद रोज पहले यूनिसेफ की सालाना रिपोर्ट ‘स्टेट आॅफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन’ से खुलासा हुआ है कि अगर समय रहते दुनिया के देश बच्चों के स्वास्थ्य और स्वच्छता को लेकर जागरूक नहीं हुए तो आने वाले वर्षों में उनकी मृत्यु दर में भारी इजाफा होगा। भारत दुनिया के उन देशों में शुमार हो जाएगा जो बच्चों की मौत के मामले में शीर्ष पर हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में भारत में कुल बारह लाख बच्चों की मौत हुई और अगर भारत संजीदगी नहीं दिखाता है तो वर्ष 2030 तक दुनिया भर में अपने पांचवें जन्मदिन से पहले दम तोड़ने वाले सबसे अधिक बच्चों की तादाद भारत में होगी।
गौरतलब है कि पिछले साल दुनिया भर में पांच साल से कम उम्र के तकरीबन 59 लाख बच्चों की मौत स्वच्छता और सेहत के प्रति उदासीनता के कारण हुई जिनमें सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चों की रही। रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया गया है कि आगामी पंद्रह वर्षों में तकरीबन 16 करोड़ 70 लाख लोग गरीबी के चक्रव्यूह में होंगे, जिनमें छह करोड़ नब्बे लाख ऐसे बच्चे होंगे जिनकी सेहत पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे काल के गाल में समा जाएंगे। रिपोर्ट में आशंका व्यक्त की गई है कि मरने वाले बच्चों में ज्यादातर गरीब परिवारों के होंगे और इन मौतों का प्रमुख कारण गरीबी व कुपोषण होगा। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि ढेर सारे आर्थिक व सामाजिक कार्यक्रमों के बाद भी कुपोषण को मिटाया नहीं जा सका है। यह सही है कि इस मामले में देश में पिछले दो दशक में कुछ प्रगति हुई है जिससे पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है। लेकिन चिंता की बात यह है कि विकसित देशों के मुकाबले भारत में अब भी शिशु मृत्यु दर में अपेक्षित कमी दर्ज नहीं हुई है।
आंकड़ों के मुताबिक फिलहाल भारत में प्रति एक हजार शिशुओं पर शिशु मृत्यु दर 48 है जबकि विकसित देशों में यह दर 5 है। विशेषज्ञों की मानें तो भारत में बच्चों की उच्च मृत्यु दर का मूल कारण समय-पूर्व जन्म व प्रसव संबंधी जटिलताओं के अलावा बच्चों में पनपने वाली बीमारियों के प्रति उपेक्षात्मक रवैया है। यह तथ्य है कि निमोनिया, डायरिया व सेप्सिस जैसी घातक बीमारियों से बच्चों की मौत हो रही है लेकिन इससे निपटने के लिए ठोस रणनीति का अभाव है। ‘स्टेट आॅफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन’ रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका तथा दक्षिण व पश्चिम एशियाई क्षेत्रों में पांच साल से कम आयु के शिशुओं की मौत का मुख्य कारण निमोनिया तथा पेचिश जैसी बीमारियां हैं और इनमें सर्वाधिक बच्चे गरीब तबके के थे।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दक्षिण एशिया में, शिशु मृत्यु दर ही नहीं बल्कि नवजातों की मृत्यु दर के मामले में भी, दुनिया के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा स्थिति गंभीर है, और शिशु मृत्यु दर के मामले एक क्षेत्र-विशेष में केंद्रित होते जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में जहां अस्सी फीसद ऐसे मामले दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र में हुए वहीं इनमें से आधे डेमोक्रेटिक रिपब्लिकन आॅफ कांगो, इथोपिया, भारत, नाइजीरिया और पाकिस्तान में देखने को मिले। रिपोर्ट में ताजा आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि गरीबी के कारण दुनिया में इस समय 15 करोड़ बाल मजदूर हैं और करीब 5 करोड़ 60 लाख बच्चे 2014 में स्कूल छोड़ गए हैं। अशिक्षा और गरीबी के कारण हर साल अठारह वर्ष से कम आयु की डेढ़ करोड़ बच्चियों का जबरन विवाह किया जा रहा है। यही नहीं, शारीरिक रूप से अक्षम लाखों बच्चे अपनी इस स्थिति के कारण हाशिए पर धकेले जा रहे हैं या फिर शिक्षा से वंचित हो रहे हैं।
अशिक्षा व गरीबी के कारण बच्चों तथा उनके परिवारीजनों में जागरूकता की कमी है और वे आसानी से किस्म-किस्म की गंभीर बीमारियों के शिकार बन रहे हैं। सच तो यह है कि बच्चों के जन्म लेने के बाद उनके बचने और एक बेहतर जीवन जीने की संभावनाएं बहुत हद तक उनके परिवार की सामाजिक व आर्थिक स्थिति तथा जन्म के हालात पर निर्भर करती है। तथ्य यह भी है कि आज की तारीख में कुपोषण और बीमारी की वजह से दुनिया में सबसे ज्यादा कमजोर और अविकसित बच्चे भारत में हैं। उनकी संख्या तकरीबन 4.8 करोड़ है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट से उद््घाटित हो चुका है कि अफ्रीका की तुलना में भारत में दोगुने बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। सरकार के आंकड़ों पर गौर करें तो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जन्म लेने वाले कुपोषित बच्चों की संख्या पचास फीसद से अधिक है। दरअसल, कुपोषण का मुख्य कारण गरीबी तो है ही, साफ-सफाई की खराब हालत, शौचालयों की गंदगी व स्वच्छ पानी की कमी भी इसके लिए जिम्मेवार है। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय विकास दानदाता संस्था ‘वॉटर एड’ की रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल से कम उम्र के हर पांच में से दो बच्चे अविकसित हैं जिससे उनका शारीरिक, संज्ञात्मक और भावनात्मक विकास प्रभावित हो रहा है। उल्लेखनीय है कि 1.03 करोड़ अविकसित बच्चों के साथ नाइजीरिया और 98 लाख ऐसे बच्चों के साथ पाकिस्तान दूसरे व तीसरे स्थान पर हैं। दुनिया के सबसे नए देशों में से एक दक्षिण पूर्वी एशिया का पूर्वी तिमोर इस सूची में पहले स्थान पर है। यहां की आबादी के अनुपात में अविकसित बच्चों का प्रतिशत सबसे ज्यादा, 58 फीसद है।
यहां ध्यान देना होगा कि जीवन के पहले दो साल में बच्चे के कुपोषित होने के कारण कम विकास और कमजोरी की समस्या उत्पन होती है, और यह पूरे जीवन को प्रभावित करती है। यहां चिंता की बात यह है कि उस उम्र के बाद इसे सुधारा नहीं जा सकता। इस रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में कहा गया है कि बड़ी संख्या में लोगों के पास शौचालयों की पर्याप्त सुविधा नहीं है, इसलिए यहां खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या भी ज्यादा है। शोध से यह उद्घाटित हुआ है कि खुले में शौच और कमजोर बच्चों की बढ़ती संख्या में गहरा संबंध है। पर्यावरण में मौजूद मल हाथों और आसपास के इलाकों को प्रदूषित कर देता है और उससे रोग व संक्रमण तेजी से फैलते हैं। शोध में कहा गया है कि कुपोषण के पचास फीसद मामलों की वजह संक्रमण खासकर लंबे समय तक चलने वाला अतिसार है। यह साफ पानी की कमी और साबुन से हाथ न धोने जैसे कारणों से होता है।
एक आंकड़े के मुताबिक भारत में पांच साल से कम उम्र के तकरीबन 1 लाख 40 हजार बच्चे हर साल मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण होने वाले डायरिया संबंधी रोगों के चलते मौत के मुंह में चले जाते हैं। गौर करें तो भारत समेत दुनिया भर में करीब साढ़े छह करोड़ लोगों के पास साफ पेयजल की सुविधा नहीं है। इसी तरह तेईस लाख लोग सफाई की मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। नतीजतन, गंभीर रोगों का संकट बढ़ता जा रहा है। विडंबना यह भी कि परिवार बच्चों के खानपान और सेहत को लेकर भी गंभीर नहीं हंै। जंक फूड और बैठे-बैठे गेम्स खेलने की आदत के कारण बच्चों में मोटापा बढ़ता जा रहा है जो कि कई बीमारियों का कारण है।
कुछ दिन पहले जारी किए गए एक शोध से खुलासा हुआ है कि 2025 तक पांच से सत्रह साल के 2.68 करोड़ बच्चों के मोटापे से प्रभावित होने का अनुमान है। बढ़ती जनसंख्या के संदर्भ में हुए शोध के मुताबिक 2010 में जहां मोटे बच्चों की संख्या 2.19 करोड़ थी, वह 2025 में बढ़ कर 2.68 करोड़ हो जाएगी। शोधपत्र के सह लेखक ‘वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन’ (लंदन) के टिम लेबेस्टीन की मानें तो यह अनुमान चिकित्सा क्षेत्र के मैनेजरों और पेशेवरों के लिए खतरे की घंटी होना चाहिए और उन्हें मोटापे के कारण बढ़ती बीमारियों की रोकथाम के प्रयास करने होंगे। अच्छी बात यह है कि बाल अधिकार के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ ने पांच बीमारियों के संयुक्त टीके के लिए चार भारतीय समेत छह कंपनियों से करार किया है, जिससे हर वर्ष सत्तावन लाख बच्चों की जान बचाई जा सकेगी।
यूनिसेफ के मुताबिक इस करार के फलस्वरूप यह टीका मौजूदा दाम से आधे दाम पर मिलेगा। यानी इसे प्रति खुराक एक डॉलर से भी कम की दर पर खरीदा जा सकेगा। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 2017 से 2020 के दौरान तकरीबन अस्सी देशों में इस टीके की पैंतालीस करोड़ खुराक भेजी जा सकेगी, जिससे हर वर्ष पांच साल से कम उम्र के लाखों बच्चों की जिंदगी बचेगी। गौरतलब है कि यह टीका एक साथ डिफ्थेरियम, टिटनेस, पर्टूटिस, हेपेटाइटिस बी तथा टाइप-बी हीमोफिलस इंफ्लुएंजा (हिब) से बच्चों को बचाएगा। उल्लेखनीय है कि हिब एक जीवाणु है जिसके संक्रमण से मेनिनजाइटिस, निमोनिया तथा ओटिटिस जैसी घातक बीमारियां होती हैं। लेकिन इस टीके के जरिए इन बीमारियों से छुटकारा मिलेगा और बच्चों की मृत्यु दर कम होगी।

Thursday, October 20, 2016

Reinventing old links

The India-Russia summit in Goa on October 15 was high on both symbolism and substance. The joint dedication by Prime Minister Narendra Modi and Russian President Vladimir Putin of Unit 2 of the Kudankulam power plant and the “pouring of concrete” for Units 3 and 4 projected a unique partnership in nuclear energy: eight years after India’s foreign collaborations in civil nuclear energy were legitimised, Russia remains the only foreign country involved in nuclear power production in India. Mr. Modi invoked a Russian proverb to reaffirm India-Russia friendship in a changing world: “An old friend is better than two new ones.” The informality of a one-to-one conversation of the leaders over lunch also showcased the intimacy of relations.
Pillars of the partnership
The bilateral agreements and the joint statement contained significant substance. The three defence cooperation projects are notable, not only for their functional importance, but also for the speed of their progress from announcement to agreement. The decision to jointly manufacture Kamov Ka226T helicopters in India was announced in 2014, an Intergovernmental Agreement (IGA) was concluded in 2015, and a shareholders’ agreement was signed in Goa. The S-400 air defence system and building of naval frigates have taken an even shorter time from conception to IGA. This is a refreshing departure from the glacial progress of most defence projects. Two other decisions could have a far-reaching impact on India-Russia defence cooperation: the establishment of a ministerial-level Military Industrial Conference to identify new projects and resolve pending issues, and a Science and Technology Commission to facilitate development and sharing of cutting-edge technologies.
These agreements consolidate Russia’s position as India’s principal defence partner. Over the past 10 years, Russia provided 70 per cent of India’s defence imports; the U.S. was next with 14 per cent. About 70 per cent of our weapons and equipment are of Russian or Soviet origin. Diversification of defence acquisitions will necessarily be an extended process. The Russian partnership has a role even in this process: it can be leveraged to increase benefit from other partnerships. Whether it is technology or other support, the Russian benchmark is what other partnerships will be pressed to match. The more we raise this benchmark, the more we benefit.
The effort to strengthen non-defence pillars of the India-Russia partnership shows progress. Agreements for Units 5 and 6 in Kudankulam are under finalisation and six more units are in the pipeline. There are major developments in hydrocarbons: in the last four months alone, Indian companies have invested about $5.5 billion in the Russian oil and gas industry. Equally significant is the acquisition, by a consortium led by Russian oil major Rosneft, of about 98 per cent of Essar Oil and its Vadinar port in a cash deal worth $13 billion. A joint fund of $1 billion, equally shared by Russian sovereign fund RDIF and our National Investment and Infrastructure Fund (NIIF), is to promote investment in infrastructure and technology projects. The agreement for information security cooperation should enable India to benefit from Russia’s globally acknowledged expertise in cyber technologies. There has been a significant increase in university exchanges and joint science and technology research projects funded by the two governments.
Areas that need improvement
As yet, however, the effort to broad-base the India-Russia economic partnership has not percolated fully to our private sector industry, whose attitudes are shaped by some experiences of the past and unflattering images of Russia in the international media. The popular narrative of a floundering Russian economy distorts reality. International Monetary Fund (IMF) statistics highlight some strong fundamentals of the Russian economy: a healthy current account surplus, low unemployment (under 6 per cent), undervalued corporate stocks and external sovereign debt of only 13 per cent of GDP. The IMF has progressively upgraded its outlook on the Russian economy, now predicting growth of over 1 per cent in 2017.
There is also misinformation about sanctions. The sanctions against Russia bind only a few countries — G7 and the European Union — and are specific in their application. European businesses have found channels to circumvent them. Recent investments in Russia by our hydrocarbons companies have also shown the way. The RDIF-NIIF fund provides an opportunity to cast off misconceptions about the Russian economy and sanctions.
The joint statement declares “zero tolerance for direct or indirect support of terrorism”, stressing the need “to deny safe havens to terrorists”. In Afghanistan too, it calls for eliminating “terror sanctuaries, safe havens and other forms of support to terrorists”. The target of these references is clear.
Russia reaffirmed support for India’s permanent membership of the UN Security Council. India “recognised” Russia’s efforts for a political settlement in Syria. The call for full implementation of the Minsk Agreements of February 2015 echoes Russia’s position on Ukraine.
Diplomatic norms preclude public airing of areas of “concern” in the relationship that were discussed in the closed-door meetings. On the Indian side, these relate to aspects of Russia-China relations and Russia-Pakistan defence links — dramatically highlighted by joint military drills barely a week after the Uri attack. India’s Foreign Secretary confirmed in his press briefing that India received satisfactory assurance that Russia will not take any step detrimental to India’s security interests. The joint military drills have been privately explained by Russians as inspired by elements inimical to India in the Russian establishment. India cannot accept this explanation, even if it is true. As a former Indian Foreign Secretary wrote recently, this action is as provocative as a joint India-Ukraine military exercise near Crimea would be to Russia. Ways have to be found to prevent such crossed wires. On Russia’s arms supplies to Pakistan, the CEO of Rostec, the apex holding company of the Russian defence industry, confirmed publicly that besides four Mi-35 helicopters, no other military equipment supply to Pakistan is in the pipeline. While welcome, this assurance needs a continued reality check.
The pursuit of strategic interests in the global geopolitical environment dictates alignments along multiple axes. Russia pursues a “multi-vector” foreign policy, dealing with countries of widely divergent perspectives. Contacts with Japan, Turkey and Saudi Arabia are examples. The partnership with China and dalliance with Pakistan are part of this mix. Equally, India is broad-basing its international engagement to maximise its room for manoeuvre.
This new dynamic has not diminished the political and strategic relevance of India-Russia relations. India-Russia, India-U.S.-Japan and India-West Asia alignments are not mutually exclusive. Some strands of cooperation from these alignments could intertwine, since there are common interests across them.
A frank and continuous high-level dialogue, reinforced by regular backchannel communications, should ensure that each partner remains sensitive to the core concerns of the other and discordant public messaging is avoided.
P.S. Raghavan is a former diplomat, and was Ambassador of India to Russia (2014-16). The views expressed are personal.

Monday, October 3, 2016

सिस्टम का शिकार आदिवासी समाज

 एक आंकड़े के मुताबिक आदिवासी बच्चों की मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से दोगुना स्तर पर पहुंच गई है। एक रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ है कि जनजातीय बच्चों की मृत्यु दर 35.8 है जबकि राष्ट्रीय औसत दर 18.4 फीसद है। इसी तरह जनजातीय शिशु मृत्यु दर 62.1 फीसद है जबकि राष्ट्रीय शिशु मृत्यु दर 57 फीसद है। गौर करें तो यह आंकड़ा भारत की सांस्कृतिक विविधता पर मंडराते किसी खतरे से कम नहीं है। गत वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘द स्टेट आफ द वल्र्डस् इंडीजीनस पीपुल्स’ नामक रिपोर्ट में भी कहा गया कि मूलवंशी और आदिम जनजातियां भारत समेत संपूर्ण विश्व में अपनी संपदा, संसाधन और जमीन से वंचित व विस्थापित होकर विलुप्त होने के कगार पर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खनन कार्य के कारण हर रोज हजारों जनजाति परिवार विस्थापित हो रहे हैं और उनकी सुध नहीं ली जा रही है। विस्थापन के कारण उनमें गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी बढ़ रही है। गत माह पहले प्रकाशित नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे से खुलासा हुआ है कि कोलम (आंध्रप्रदेश और तेलंगाना) कोरगा (कर्नाटक) चोलानायकन (केरल) मलपहाडिय़ा (बिहार) कोटा (तमिलनाडु) बिरहोर (ओडिसा) और शोंपेन (अंडमान और निकोबार) के विशिष्ट संवेदनशील आदिवासी समूहों की तादाद घट रही है। इसका मुख्य कारण बीमारी और विस्थापन है। भारत में कुपोषण, गरीबी और सेहत को बनाए रखने के लिए जरूरी संसाधनों के अभाव और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कारण आज आदिवासी समाज अमानवीय दशा में जीने को मजबूर हैै। गौर करें तो इसके लिए देश की सरकारें जिम्मेदार हैं। 25 अक्टूबर 1980 को वन-संरक्षण अधिनियम लागू किया गया। इस कानून की मंजूरी ने लाखों आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया। सैकड़ों वर्षों से जिस भूमि को वे अपनी मातृभूमि समझ सहेजते-संवारते रहे वह उनके हाथ से निकल गई। अपनी ही जमीन पर वे पराया हो गए। उनके बीच संदेश गया कि सरकार उनके खिलाफ है और येन-केन-प्रकारेण उनकी जमीन हड़पकर पूंजीपतियों को देना चाहती है। लिहाजा उनके मन में आक्रोश उपजने लगा। वे अपनी जमीन बचाने के लिए हिंसा पर उतर आए। सरकार भी उनपर आपराधिक मुकदमे ठोकने लगी। इस स्थिति ने जंगल का माहौल खराब कर दिया। नक्सली इसका फायदा उठाने में सफल रहे। आज स्थिति यह है कि आदिवादी समाज अपने को ठगा महसूस कर रहा है। उसके पास न तो जीविका का कोई साधन रह गया है और न ही रोजगार की संभावना। वनों की अंधाधुंध कटाई जारी है। सरकार को जनजातियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के अलावा सामाजिक समस्याओं पर भी गौर फरमाना होगा जो परसंस्कृति ग्रहण के कारण उन्हें दोराहे पर खड़ा कर दिया है जिससे न तो वह अपनी संस्कृति बचा पा रहे हैं और न हीे आधुनिकता से लैस होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में ही शामिल हो पा रहे हैं। बीच की स्थिति के कारण उनकी सभ्यता और संस्कृति दोनों दांव पर हैैै। 2006 में केंद्र सरकार ने वनाधिकार मान्यता कानून को पारित किया। उसका मकसद आदिवासियों को उनका हक देना था। लेकिन इस कानून के जटिल प्रावधानों ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं। वे सरकार से इस कानून में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिन क्षेत्रों में आदिवासियों को उजाडक़र सरकारें उनकी आवास व खेती की जमीनों को अधिग्रहित कर रही हैं उन क्षेत्रों में विस्थापन को लेकर विकट समस्या उत्पन हो गई है। अपनी जमीन गंवाने के बाद उनके पास जीविका का कोई साधन नहीं रह गया है। कल तक वे जंगल के राजा कहे जाते थे आज वे मौत को गले लगाने को तैयार हैं। आर्थिक तंगी से परेशान होकर अपराध की दुनिया में कदम रख रहे हैं। विस्थापित किए गये आदिवासियों के लिए सरकार के पास न तो कोई पुनर्वास संबंधी नीति है और न ही उन्हें रोजी-रोजगार से जोडऩे का कोई नायाब तरीका। ऐसे में अगर कोई दाना मांझी अपनी मृत पत्नी के शव को कंधे पर ढोने को मजबूर होता है तो आश्चर्य किस बात का!

राजनीतिः गांधी के सपनों का स्वराज | श्रीभगवान सिंह


महात्मा गांधी अपनी ‘स्वराज’ या ‘स्वराज्य’ संबंधी अवधारणा को जीवनपर्यंत परिभाषित करते रहे। हिंदुस्तान के संदर्भ में उन्होंने जिस स्वराज की परिकल्पना की थी, उसके केंद्र में थी गांवों की स्वायत्त, स्वावलंबी अर्थ एवं प्रबंधन सत्ता। उनकी दृष्टि में गांवों की संपन्नता में ही देश की संपन्नता तथा गांवों की स्वायत्त पंचायती व्यवस्था में ही देश की सच्ची प्रजातांत्रिक छवि अभिव्यक्ति पा सकती थी। उनका मानना था कि भारत चंद शहरों में नहीं, बल्कि सात लाख गांवों में बसा हुआ है और इस सोच के अनुरूप उन्होंने किसानों को राष्ट्रीय आंदोलन में व्यापक पैमाने पर शामिल किया।गांधी ने 1920 से स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व संभाला, तो उनके लिए भारत के शहरों का नहीं, बल्कि सात लाख गांवों के पुनर्निर्माण का मुद््दा अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा। यही कारण था कि उन्होंने देश की राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ ग्रामोद्योग, ग्राम-स्वराज्य जैसी योजनाओं की परिकल्पना का भी अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में समावेश किया। हिंद स्वराज्य की परिकल्पना को उन्होंने ग्राम-स्वराज्य का पर्याय बना दिया।
गांधीजी अपने कई भाषणों एवं लेखों में ग्राम-स्वराज्य के संबंध में अपनी योजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत करते रहे, जिसका सिलसिला 1909 में लिखी उनकी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ से लेकर जीवनपर्यंत चलता रहा। मसलन, ‘हरिजन सेवक’ नामक पत्र के 2 अगस्त, 1942 के अंक में उन्होंने ‘ग्राम-स्वराज्य’ की चर्चा करते हुए लिखा- ‘‘ग्राम-स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा; और फिर भी बहुतेरी दूसरी जरूरतों के लिए- जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा- वह परस्पर सहयोग से काम लेगा। इस तरह हर एक गांव का पहला काम यह होगा कि वह अपनी जरूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिए कपास खुद पैदा कर ले। उसके पास इतनी सुरक्षित जमीन होनी चाहिए जिसमें ढोर चर सकें और गांव के बड़ों व बच्चों के लिए मनबहलाव के साधन और खेल-कूद के मैदान वगैरा का बंदोबस्त हो सके। हर एक गांव में गांव की अपनी एक नाटकशाला, पाठशाला और सभा-भवन रहेगा। पानी के लिए उसका अपना इंतजाम होगा- वाटर वर्क्स होंगे- जिससे गांव के सभी लोगों को शुद्ध पानी मिला करेगा। कुओं और तालाबों पर गांव का पूरा नियंत्रण रख कर यह काम किया जा सकता है। बुनियादी तालीम के आखिरी दरजे तक शिक्षा सबके लिए लाजिमी होगी। जहां तक हो सकेगा, गांव के सारे काम सहयोग के आधार पर किए जाएंगे। जात-पांत और क्रमागत अस्पृश्यता के जैसे भेद आज हमारे समाज में पाए जाते हैं, वैसे इस ग्राम-समाज में बिल्कुल नहीं रहेंगे।’’
इसी लेख में वह यह भी कहते हैं ‘‘सत्याग्रह और असहयोग के शस्त्र के साथ अहिंसा की सत्ता ही ग्रामीण समाज का शासन बल होगी।… गांव का शासन चलाने के लिए नियमानुसार एक खास निर्धारित योग्यता वाले गांव के बालिग स्त्री-पुरुषों को अधिकार होगा कि वे अपने पंच चुन लें। इन पंचायतों को सब प्रकार की आवश्यक सत्ता और अधिकार रहेंगे। चूंकि इस ग्राम स्वराज में आज के प्रचलित अर्थों में सजा या दंड का कोई रिवाज नहीं रहेगा, इसलिए यह पंचायत अपने एक साल के कार्यकाल में स्वयं ही धारा सभा, न्याय सभा और कार्यकारिणी सभा का सारा काम संयुक्त रूप से करेगी।… इस ग्राम शासन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधार रखने वाला संपूर्ण प्रजातंत्र काम करेगा। व्यक्ति ही इस सरकार का निर्माता भी होगा। उसकी सरकार और वह दोनों अहिंसा के वश होकर चलेंगे। अपने गांव के साथ वह सारी दुनिया की शक्ति का मुकाबला कर सकेगा।’’
ग्राम-स्वराज्य के लिए और वांछनीय चीजों की चर्चा करते हुए गांधी जी ने ‘हरिजन सेवक’ के दस नवंबर 1946 के अंक में लिखा- ‘‘देहात वालों में ऐसी कला और कारीगरी का विकास होना चाहिए, जिससे बाहर उनकी पैदा की हुई चीजों की कीमत की जा सके। जब गांवों का पूरा-पूरा विकास हो जाएगा, तो देहातियों की बुद्धि और आत्मा को संतुष्ट करने वाली कला-कारीगरी के धनी स्त्री-पुरुषों की गांवों में कमी नहीं रहेगी। गांव में कवि होंगे, चित्रकार होंगे, शिल्पी होंगे, भाषा के पंडित और शोध करने वाले लोग भी होंगे। थोड़े में, जिंदगी की ऐसी कोई चीज न होगी जो गांव में न मिले। आज हमारे गांव उजड़े हुए और कूड़े-कचरे के ढेर बने हुए हैं। कल वहीं सुंदर बगीचे होंगे और ग्रामवासियों को ठगना या उनका शोषण करना असंभव हो जाएगा।’’
संक्षेप में यही थी गांधी की ग्राम-स्वराज्य संबंधी परिकल्पना, जिसे मूर्त करते हुए वे गांवों की पुनर्रचना करने का सपना संजोए हुए थे और इसी में वे हिंद स्वराज को मूर्त होते हुए देखना चाहते थे। लेकिन हम सबको मालूम है कि आजादी मिलने के बाद अपनी परिकल्पना के अनुरूप गांवों की पुनर्रचना करने का अवसर गांधी को सुलभ नहीं हुआ। अवसर सुलभ हुआ उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी प्रधानमंत्री बने जवाहरलाल नेहरू को, जिन्होंने पश्चिमी उद्योग-शिल्प-मशीनीकरण को प्रमुखता देने में ही कृषि-प्रधान देश रहे भारत की उन्नति देखी। स्वातंत्र्योत्तर भारत में मशीनीकरण की जो हवा चली उसने न केवल गांधी परिकल्पित ग्राम-स्वराज्य को, बल्कि गांवों में सदियों से चले आ रहे हस्त-उद्योगों को भी तहस-नहस करके रख दिया। आज की तारीख में गांवों में कुम्हार, बढ़ई, लोहार, बुनकर, ठठेरा (बर्तन बनाने वाले), मोची आदि सभी के हस्त-उद्योग समाप्तप्राय हो चुके हैं और इनकी जगहों पर बड़ी-बड़ी कंपनियों, फैक्टरियों के उत्पादित माल ने कब्जा कर लिया है।
सच तो यह है कि गांवों के आर्थिक स्वावलंबन के आधार रहे ग्रामोद्योग का जितना विनाश ब्रिटिश शासन ने नहीं किया, उससे कई गुना अधिक विनाश हमारे देशी शासन-तंत्र ने किया है विगत सात दशकों में। ग्रामोद्योगों के विनाश का भयावह दुष्परिणाम यह हुआ कि गांव उद्योग-विहीन हो गए और वहां के युवक रोजगार के अभाव में शहरों की ओर या फिर खाड़ी देशों की ओर रोजगार के लिए पलायन करने लगे हैं। आज का यह परिदृश्य तुलसीदास की इस व्यथा का स्मरण करा देता है- ‘जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों, कहा जाई का करी?’
इसमें दो मत नहीं कि कृषि-यंत्रों के चलन ने खेती को सुविधाजनक बनाया, पर इसका अनिष्टकारी पक्ष इस रूप में प्रकट हुआ कि इसके कारण खेतिहर मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर कम हो गए। यही नहीं, इससे पशु-धन के समाप्त होने जाने का भी संकट आ खड़ा हुआ। ट्रैक्टर, थे्रसर, बोरिंग मशीन आदि ने हल, दवनी, रहट आदि के काम आने वाले बैलों की उपयोगिता खत्म कर दी। गाय-भैंस जैसे दुधारू मवेशियों की भी संख्या कम होती जा रही है, क्योंकि इन मवेशियों को पालने-पोसने में सिर्फ नौकरी के लिए आकुल-व्याकुल पीढ़ी की दिलचस्पी कम होती जा रही है। जो पंचायत-व्यवस्था गांवों में सौहार्द कायम रखने की भूमिका निभाती आई थी, उसमें भी चुनावी राजनीति के कीटाणु घुसपैठ करते जा रहे हैं। आज आलम यह है कि मुखिया, सरपंच, प्रमुख आदि के चुनाव में वोट खरीदे जा रहे हैं, मारपीट से लेकर हत्याएं तक हो रही हैं।

यह सब देखते हुए मानना पड़ता है कि स्वतंत्र भारत में जिस ग्राम-स्वराज्य के रास्ते गांधी हिंद स्वराज्य का सपना साकार होते देखना चाहते थे और जिस पंचायती राज के निमित्त हमारे संविधान में नीति-निदेशक तत्त्वों का सन्निवेश किया गया, उससे हमारे आज के गांव कोसों दूर होते जा रहे हैं। वास्तव में विकास के नाम पर शहरीकरण, मशीनीकरण दैत्याकार रूप में फैलते जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ गांवों की रौनक कूच करती जा रही है। कृषि व कुटीर उद्योगों वाली आधारभूत संरचना के नष्ट होते जाने से गांव वीरानगी के शिकार होते जा रहे हैं। गांवों से युवा-शक्ति का पलायन रोकना एक बहुत बड़ी चुनौती है हमारे सामने।
अब सवाल यह है कि इन गांवों में युवकों को रोजगार कैसे उपलब्ध कराए जाएं? इस समस्या का समाधान हम अंधाधुंध मशीनीकरण के कंधे पर सवार होकर हरगिज नहीं कर सकते। इसके लिए हमें वाई-फाई-कम्प्यूटर, लैपटॉप, ओटोमेशन का मार्ग छोड़ कर गांवों के पुराने पारंपरिक उद्योगों, जो शारीरिक श्रम पर आधारित थे, का पुनरुद्धार करना पडेÞगा। जैसे गांधीजी ने मिल के कपड़ों के विकल्प के रूप में चरखे का पुनरुद्धार किया, वैसे ही आज हमें फिर से सिंचाई के लिए बैल से चलने वाले रहट, बैल से चलने वाले गन्ना पेरने वाले कोल्हू, हाथ-करघा, हाथ के सहारे ढलने वाले बर्तन, लोहा-उद्योग आदि को सामने लाना होगा। मिट््टी की खुदाई-कटाई करने के लिए जेसीबी जैसी दैत्याकार मशीन की जगह हाथ की शोभा बढ़ाने वाले फावड़े को आगे करना होगा। मशीनों के अवैध प्रवेश पर अंकुश लगाना होगा। साथ ही शिक्षा-पद्धति के चरित्र में सुधार करते हुए उसमें शारीरिक श्रम के महत्त्व और गरिमा को प्रतिष्ठित करना होगा।