Friday, June 15, 2012

नाजों से पाले ख्वाब रात हुए नहीं ढलते!



ख्वाब 


उम्मीद जब मुरझाई
पतझड़ बारिशों ने धुल दी.

गारे को फिदरत से सम्हालो
छैनी हौले से थामो
यकीं करो
नाजों से पाले ख्वाब
रात हुए नहीं ढलते!


जात 


मौसम सुहाना था,
बादल दीवाना था,
हँस दिया बादल
छलक पड़ी बूँदें!

.....और बूंदों ने भिगोने से पहले
मेरी 'जात' पूंछ ली!


तुम्हें पता है?


तुम्हें पता है,
तुम्हारा हमराह बन 
नहीं रहूँगा पास हमेशा.....

लेकिन तुम्हें पता है?
तुम्हारे पास नहीं पर
तुम्हारे साथ तो रहूँगा!

हाँ, हमें पता है,
साथ रहने के लिए हमें
पास रहना ज़रूरी नहीं!


धोखेबाजी 


हथेली थामे चल रहे थे ना,
लिए ढेर सारे ख्वाब और कुछ उम्मीदें!

देखो 
उसी हथेली की रेखाओं ने
हमें नदी सा मोड़ दिया.....
कभी ना मिलने के लिए!!



Wednesday, June 13, 2012

चार शख्स, चार मिजाज़







हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे साथी,उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी,गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी,जिन्दगी के टुकड़े

हथौड़ा अब भी चलता है,उदास निहाई पर
हल अब भी बहते हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता,प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी.

......
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी.....

पाश





चांदनी छत पे चल रही होगी

चांदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी

फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
वो बर्फ़-सी पिघल रही होगी

कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी

सोचता हूँ कि बंद कमरे में
एक शम-सी जल रही होगी

तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फ़सल रही होगी

जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी

- दुष्यंत कुमार




बाहर मैं कर दिया गया हूँ

बाहर मैं कर दिया गया हूँ। भीतर,पर,भर दिया गया हूँ।
ऊपर वह बर्फ गली है,नीचे यह नदी चली है
सख्त तने के ऊपर नर्म कली है
इसी तरह हर दिया गया हूँ। बाहर मैं कर दिया गया हूँ।

आँखो पर पानी है लाज का,राग बजा अलग-अलग साज का
भेद खुला सविता के किरण-व्याज का
तभी सहज वर दिया गया हूँ। बाहर मैं कर दिया गया हूँ।

भीतर,बाहर,बाहर भीतर, देख जब से ,हुआ अनश्वर
मय का साधन यह सस्वर
ऐसे ही घर दिया गया हूँ। बाहर मैं कर दिया गया हूँ।

-निराला



कुछ इश्क किया कुछ काम किया



वो लोग बड़े खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया

काम इश्क के आड़ आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

फैज अहमद फैज


Monday, May 21, 2012

....उफ़!! ये बेख़ौफ़ यादें






                        जब कभी तख्ल ख्वाहिशें पतंगों की तरह कटती हैं  तो दर्द बहुत देती हैं......लगता है जैसे हर टुकड़ा तुम्हें नाशाद कर गया हो! याद का हर लम्हा किसी थके स्कूटर की तरह स्लो चलता है लगता है खुदा ने 'वक़्त' बनाया तो साथ में उसकी बेरहमी बताने 'याद' भी बना दी.


            




1.
किसी  वीरान स्टेशन की
इकलौती ट्रेन कि तरह
जब तुम्हारा नंबर चमकता है
तो यह थका दिन भी हंस देता है.
कभी-कभी लगता है
एक बार पूंछ ही लूं-
'जब भी तुम घर जाते हो
मैं तुममें कितने प्रतिशत बचता हूँ!'


2.
जेहन के फर्श पर
हर लम्हा ये चहलकदमी तुम्हारी!
लगता है 
बेरहम मसअले हो तुम!
हर लम्स में 
हज़ारों तल्खियां भुला
कितने पास आ गये हो तुम!
ज़रा हटो,
थोड़ी सांस तो ले लूं!!!



3.
बादल से निकाल
यादों का इक कतरा 
फिर चूम लिया हमने.
देखो ये मुआ चाँद हमपर हंस रहा है!!

4.
ख्याल कितने हैं जेहन में मेरे
गिने तो इक तू ही निकली!

Wednesday, May 16, 2012

ज़िन्दगी मासूम ही सही......







            हर रात जब नज्में कागज़ पर उतरती हैं तो लगता है, कुछ येसे दिन भी थे जिनका हिसाब नहीं माँगा जा सकता और कुछ येसे दिन थे जिन्हें फिर से जीने कि कवायते तुम अक्सर करते हो. कभी कभी जब पलाश को लफ़्ज़ों में उतारता हूँ तो लगता है, भरी दोपहरी में भी उसकी पीली रंगत लौट आई हो. अक्सर तुम्हारी उम्मीद से बेहतर वही दिन होता है, जो स्वप्न कि तरह आता है और हकीक़त बन निकल जाता है.....


उस सुबह जब तुम
मुस्कुराते जागी थी
लगा सूरज ना उगेगा आज.
सिक्त होंठो पर
वो मीठी मुस्कान
आँखें तुम में भिगोने को काफी थी.
फिर पूरे दिन का ही हिसाब 
ना दिया मैंने किसी को.


दोपहर
जब तुम यूँ सिमटी थी मुझमे
तो लगा सारी धूप ही 
आगोश में ले ली हो मैंने.
सिरहाने रखकर कई ख्वाव 
मैं सो गया धूप में ही.
हर दिन लंच में 
अब वही दोपहर खाता हूँ.


वो शाम कितनी खुशनसीब थी
तीखी नज़रें दिखाती तुम
....और तुम्हारे पीछे भागता मैं
जैसे सूरज रोक रहा चाँद को.
फिर पीछे मुड़
सीने से लगे तुम....
और चांदनी बिखर गई.
झील भी ख़ामोशी से
सब देख रही थी....
अपनी रंगत बदल-बदल.
उस शाम,
 कुछ पल खुदगर्ज़ बनना 
अच्छा लगा था मुझे!

वो रात,
जैसे बारिशों में
कहीं ओट में छिपे हों हम.
चेहरे पर कई सौ रंग लिए आई तुम
लगा पत्थरों को भिगोने
नदी का बहाव काफी नहीं.
कंधे पर सर रख
तुमने जो ख्वाहिशें बुनी थी.
उन्हीं को सिरहाने रख 
हर रात सोता हूँ अब.


उम्मीद को दरिया से निकाल
हर बार टटोलता हूँ
रोज जरा बड़ी हो जाती है....
राह-दर-राह मौसम खुश हैं 
उम्र के संग उन्हें भी भीगना आता है.
....और ये चाँद
मुठ्ठियाँ भर भर चांदनी देता है
भले ही नेकी में खुद बुझ जाए.
लगता है ज़िन्दगी मासूम ही सही,
रंगत का तराना तो है!


Wednesday, May 9, 2012

तू, सत्यमेव जयते, गुलज़ार ....एंड व्हाट द हेल!!!

                                                                                                                                          
         
                      मैं उससे जी भर लड़कर गुस्से से फ़ोन  रखता हूँ, .......मोबाइल!....सीधा स्विच  ऑफ......हमारे बीच  गुस्सा जताने का सबसे बेहतरीन तरीका है........ अपने अन्दर को कुछ  हल्का करने केप्प्री में ही घर से निकल  आता हूँ......कुछ  फलांग  पर मंदिर है...... धीरे-धीरे से मंदिर के अन्दर घुसता हूँ, जैसे यहाँ आना ज़रूरी नहीं था, लेकिन और कोई जगह भी तो इतनी शांत  नहीं होती!! ......भगवान् अब भी वहीं हैं, ज्यूँ के त्यों।.......मूर्तियों की भी अजीब सी आदत  होती है, जहां भी बिठा दो वहीं बैठ जाती हैं, बिना कोई  शिकायत के....... मैं बड़े गौर से देखता हूँ.......फिर मुझे गुलज़ार की 'इक  ज़रा छींक  ही दो तुम, तो यकीन आये की सब देख  रहे हो......' याद आता है। मैं आरती मूर्ति के थोड़ी और पास  ले जाता हूँ, फिर भी भगवान वहीं हैं ज्यों की त्यों. शायद वहां नहीं हैं!! शायद कही नहीं है !!!!
......मंदिर की दीवार पर किसी पोस्टर के नीचे अंग्रेजी में लिखा हुआ  है.......'जैन  इज  द  बेस्ट  रिलीजन।...' ......मुझे कम्युनिटी का सेक्स-रेशिओ याद आता है.......हज़ार पर सात सौ नब्बे लडकियां और इस  हफ्ते का सत्यमेव जयते भी......सुना था जैन  लोग अंडे तक  नहीं खाते!!!!
                            फूहड़ता के बीच सत्यमेव जयते का आना अच्छा है.....पढ़ा-लिखा होना आपके न  तो संवेदनशील  होने की निशानी है, ना ही समझदार होने की, न  ही आपके अच्छे या बुरे होने की।..........किसी ब्लॉग  पे पढ़ा था 'डाक्टर्स  पोलिश्ड कमीनों  की जमात है।......' उनका तो नहीं पता लेकिन संभ्रांत  वर्ग  ज़रूर 'पोलिश्ड कमीनों की ज़मात'  लगता है।
                   .........वो मेरे भाई के नंबर पर कॉल  करती  है, 'तुम्हारा मोबाइल  क्यों बंद था?' फिर वही तीखी नोंक-झोंक .........उसके बाद बहुत सी हंसी! मुझे 'वो' याद आता है, उसने कहा था, तुम्हारी जन्मतिथि 23 अगस्त और उसकी ...**.. ......मतलब यू आर इन  बेटवीन लिओ  एंड विर्गो एंड शी  इज़  विर्गो, लगभग  एक  ही राशि है भाई, कभी बनेगी कभी नहीं।' ........कंप्यूटर पर 'कुंडली' मिलाता हूं...... कुल  उन्नीस गुण! अंग्रेजी में लिखा  है- 'आधे से ज्यादा हैं!! निभेगी! लेकिन ज्यादा मिलते तो अच्छा था'.........व्हाट  द  हेल!!!!

अंत में.....
              'गुलज़ार' साहब....वैसे ही जैसे हैं........सीधे-सीधे बतियाते....


चिपचिपे दूध से नहलाते हैं, आंगन में खड़ा कर के तुम्हें 
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलासियाँ भर के

औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी

जब धुआँ देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो. 

----
                            मैं उसे सत्यमेव जयते देखने को कहता हूँ, वो मना कर देती है।....लगता है समाज  में लडकियां सिर्फ  पेट में ही नहीं मरती!!!!!

Saturday, May 5, 2012

उम्र की टकसाल, एक उलझा ख्याल ....

एसा क्यूँ होता है, कुछ  लोग कहना नहीं चाहते, पर हकीक़त  उन्हें भी पता होती है, की सच उसे भी पता चल  गया होगा, क्यूंकि कोई तुम्हे अनकहे भी पढ़ सकता है, वो लफ्ज़ भी जो  कहे न गये हों, या वो भी जो शब्दों के बीच से निकल के आ रहे हों......

उम्र की टकसाल से निकला दिन,
हमेशा एक सा  नहीं होता,
कुछ होते हैं थोड़े से स्याह,
कुछ  थोड़े से खुश्क,
कुछ  थोड़े से नर्म .
कुछ  पाले  से सफ़ेद,
बर्फ  से शीतल.....
हर एक दिन  नया यहाँ.

आज  मैंने फिर एक  दिन   जी लिया
उम्र  की टकसाल  से निकला 
एक  दिन.......
तुम्हे पता तो है आज का दिन कैसा था.

Thursday, April 19, 2012

उधार के चार रंग.....

                                                                                                                                               दिल की भी क्या कोई आँखें होती हैं?..... वो जोर-जोर से हंसती है. देखो आई नो यू आर नॉट सो स्मार्ट बट  आई लव यू सो लव यू........ वो फिर हंसती है. 'तू कौन सा बड़ी मिस- इंडिया है, वो बोलता है. फिर दोनों बड़े जोर जोर से हँसते है.......यकायक से वो शांत हो जाती है, फिर धीरे से बोलती है- 'मेरे घर बाले नहीं मानेंगे'........ और फिर वही, मौत के बाद की सी ख़ामोशी.
                             सुना था कुछ लोग आरक्षण के खिलाफ हैं.......लेकिन जातिवाद के? ......पूछना पड़ेगा. मिडिल क्लास की नैतिकताएं भी तो, परिस्तिथियों के साथ बदलती हैं.

------***------

तू जॉब छोड़ दे अगर तुझे लगता है तो, वो जोर देकर कहता है......मेरा बेस्ट फ्रेंड है, कई दिन हमने फोकटियाई में चाय पीते गुजारे हैं....आज फिर हम वहीं बैठे हैं....वो अर्न-लीव पर है और मैं लोस-ऑफ़-पे पर........ 'सल्ले, मैं छोड़ तो दूंगा लेकिन मेरा खर्च क्या तू उठाएगा'....... वो एक बार लम्बी आँखों से देखता है,फिर हौले से कहता है, 'हाँ'......बेटा इत्ता पैसा लायेगा कहाँ से कि अपने-मेरे खर्च उठा सके. ......' साल्ले गर्लफ्रेंड छोड़ दूंगा' और फिर  वही पुरानी हंसी. खुदा ने कुछ रिश्ते खून के अलावा भी बनाए हैं......उफ्फ़!!! समझदार खुदा.

------***------


वो एक कोचिंग सेंटर के सामने टकरा गये....रिलेटिव हैं, ज्यादा दूर के नहीं, दिल से ज्यादा पास के नहीं. 'बेटे को आई ई टी कि कोचिंग करानी है, तुम्हे तो पता होगा कौन सी अच्छी है.'......मैं गौर से लड़के को देखता हूँ, 'कौन सी क्लास में हो?' .....'भैया, नाइंथ.' ........' हाँ, यही बाली अच्छी है, ज्वाइन करा दीजिये.' .......कह के मैं निकल लेता हूँ.  वक़्त बदल जायेगा लेकिन मिडिल क्लास कि ख्वाइशे बदस्तूर जारी हैं. मैंने सुना था कोई बीस वरस पहले उनका भी सपना आई आई टी ही था. मैं अपनी उम्र आंकता हूँ, चलो मुझे तो फिर से वही सपने पालने में बीस वर्ष का वक़्त है. कमबख्त वक़्त बदलता गया, आपकी गाडी वहीं है, ये रफ़्तार भी किस्मतों संग बदलती है.

-----***-----


अपने दरवाजे से ऑफिस तक बेहिसाब भागते लोग और चाय कि दूकान के पास आठ साल की वो दो साल के भाई को लटकाए पैसे मांगती है.......दोनों अलग-अलग अहसास देते हैं. कुछ बच्चों के पास फ़ुटबाल है, और उसके हाथ में वो नन्हा.....'ये सब पैसों का खेल नहीं पिछली पीड़ी कि बेवकूफियों का भी नतीजा है'......वो धीरे से कहता है....'मतलब?'......वो उस गन्दी-सी लड़की की और देखता है, 'इसका बाप शराब पी के डाला होगा कहीं और माँ... माँ को तो शायद इसके बाप ने ही मार दिया होगा.'........फिर नाउम्मीद कि गहरी सांस लेता है..........'और इन फुटबाल बालों का बाप हमारी तरह ज़िन्दगी  दौड़ रहा है की इन्हें फ़ुटबाल दे सके.' ...... कुल बाईस साल का मैं अपने आप को कुछ ज्यादा बड़ा महसूस करने लगता हूँ.
                 
                   उसके दरवाजे भी जरा दस्तक दे ये ज़िन्दगी.....
                   खुदा ने उसे भी मुद्दत से बनाया था.


Tuesday, April 10, 2012

ख़ामोशी में......ऐसे ही




सोचता हूँ, ले जाऊं तुझे  सारे रश्म'ओ-रिवाजों से कहीं दूर,

लेकिन ये अज्म भी तेरे दरवाज़े तक आते-आते ख़त्म हो जाते हैं. 












Pic: Lake View, Bhopal, Oct-Nov 2009

Friday, April 6, 2012

एक छोटा सा दिमाग और कुछ सतरंगी ख्याल

                                                                                                                                                                                            दौड़ की तरह ज़िन्दगी जीते लोग, और उनमे से एक आप......बस एक महीने ही चलते हो और थक जाते हो.....यहाँ सुबह ऑफिस की जद्दोजहद में ये ख्याल ही नहीं रहता की देश की सरकार ने कुछ ट्रेफिक रूल्स बनाए हैं और आप एक पढ़े-लिखे इंसान हैं.........वो पाँव में पट्टी बांधे आये हुए हैं..........क्या हो गया था सर?.........'यार 'कोन' निकलवाया था, तो.........ये सल्ली मेडिकल लीव अप्प्रोव ही नहीं की'........ये साल्ला गम बिकता नहीं है कहीं!!!......बिकता  होता तो पैसे देकर के ही दे आते.......काम से फुरसतें मिलें तो ख़ुशी-गम का एहसास हो लोगों को.......'सर , मैं घर जाना चाहता हूँ, पूरे एक महीने के लिए......'लॉस  ऑफ़ पे' पर.' मैं अपनी बात ख़त्म करता हूँ......वो कुछ नहीं बोलते हैं, चुपचाप छुट्टियाँ अप्प्रोव कर देते हैं........दिल से शायद वो भी कवि रहे होंगे............'उसका' फोन है, 'तुम अपने सारे डिसीजंस क्या दिल से लेते हो?'.......मैं कुछ नहीं बोलता हूँ.........बातें करते-करते वो रो पड़ती है......'अब तो तुम भी नहीं हो यहाँ किससे शेयर करूं'.......मैं कुछ नहीं कह पाता हूँ......ये गम शायद गलीचे में बंधा चलता है, कहीं भी जाओगे.......साथ-साथ चलता रहेगा......और ये इश्क भी इसी उम्र में होना है, और साथ में बहुत से जज्बात. .......मैं समझाते-समझाते रुक जाता हूँ........खैर.
                                        'मैं ये मूवी फ्रेंड्स के साथ देख आऊं?' वो बड़े प्यार से पूछती है.......उसे पता है मुझे अच्छा नहीं लगेगा, उसका जाना लेकिन मैं मना भी नहीं करूँगा........तरकरीबन आधा घंटे बात.......और फिर उसमें हज़ारों नसीहतें.........'अच्छे से पढना, और खाना भी खा लेना.'   दूर रह कर भी मेरा पूरा ख्याल  रखा जाता है तो लगता है चलो ज़िन्दगी में माँ-बाप के अलावा कुछ लोग तो हैं जो तुम्हारे लिए ठहर सकते हैं.....इस शोर के बीच, इस दौड़ के बीच.


                चलते-चलते.............


 जावेद अख्तर साहब की कल नई किताब आई है.....शीर्षक है 'लावा'. इन्दोर के उस ऑडिटोरियम में जावेद साहब बोलते हैं.......'लावा' निकलने में कुल सत्रह साल लग गये'...........'हज्जार से ज्यादा की क्षमता बाला ये हॉल पूरा भरा है, लगता है कविता पसंद करने बाले आज भी जिंदा हैं.'


                            उनकी पहली किताब 'तरकश' से 'उलझन'......



करोडो चेहरे 
और 
उनके पीछे 
करोडो चेहरे
ये रास्ते है की भीड़ है छते 
जमीं जिस्मो से ढक गई है 
कदम तो क्या तिल भी धरने की अब जगह नहीं है 
ये देखता हूँ तो सोचता हूँ 
की अब जहाँ हूँ 
वहीँ सिमट के खड़ा रहूँ मै
मगर करूँ क्या 
की जानता हूँ 
की रुक गया तो 
जो भीड़ पीछे से आ रही है 
वो मुझको पेरों तले कुचल देगी, पीस देगी 
तो अब चलता हूँ मै
तो खुद मेरे पेरों मे आ रहा है 
किसी का सीना 
किसी का बाजू
किसी का चेहरा 
चलूँ 
तो ओरों पे जुल्म ढाऊ
रुकूँ 
तो ओरों के जुल्म झेलूं 
जमीर 
तुझको तो नाज है अपनी मुंसिफी पर
जरा सुनु तो 
की आज क्या तेरा फेसला है



                                 

Monday, January 30, 2012

'उसे' भी इश्क था किसी से......

'वो दोनों ही मुझे पसंद करते हैं,और मजे की बात तो ये है की वो दोनों बेस्ट फ्रेंड्स हैं.' वो बताती है
'तुम्हारे बेस्ट फ्रेंड?'
'अरे  नहीं  डमडम, आपस  में .' 'डमडम' बोलना  उसकी  आदत  है , जहां  हम  प्यार  से  'पागल ' या  'बुद्धू ' बोलते  हैं ,
वहां  वो  'डमडम' बोलती  है . वो  मेरे  कॉलेज  से  ही  है , लेकिन  कॉलेज  के  चार  सालों  में  हमने  कुल चार  दफे  ही  बात  की  होगी , लेकिन  यहाँ  पता  नही  कैसे  हम  घुल -मिल  गये ......और  फ्रेंडशिप  के  शुरुआत  में  ही ...'एज एवेरी  गर्ल  यूज़  टू डू' वो  भी  डिफेंसिव  मोड में  अपनी  लव -लाइफ  (ओर सो  काल्ड  बोय्फ्रेंड्स ) के  बारे  में बता  रही  है .....लड़कियों  को  नये  लडको  से  मिलते  ही  यही  क्यों  लगने  लगता  है की  कहीं  वो  पसंद  न  करने  लगे!!! फिलहाल  वो  जारी  है .....
''a' इज सो  गुड , तुम  तो  जानते  होगे . 'b' के  कम्पेयर  में  स्मार्ट  भी  है , और  इंटेलिजेंट भी ....एंड  मोस्ट  important ही  इज  इन अ  वैरी  गुड  B-school, जब  प्लेसमेंट  पायेगा  तो  'Infy' से  अच्छा  तो  पायेगा  ही ....पर  पता  नहीं  क्यूँ  मैंने  उसे  हाँ  क्यूँ  नहीं  कहा.'
....'a' सच में  अच्छा  है , स्मार्ट ,इंटेलिजेंट  और  मेरी  क्लास  से  अच्छे  B-school में  जाने  बाला  सिंगल  बंदा. 'b' हमारे  साथ  ही  है , Infy में.
''b' को  पता  है?'
'क्या? की  मैं उसे  पसंद  करती  हूँ? शायद  हाँ, शायद  न!!! लेकिन  मुझे  'a' ज्यादा  पसंद  क्यों  नहीं  आया !?!? '....
अब  मैडम को  कौन  समझाए  की  इश्क  दिल  से  होता  है, दिमाग  से  नहीं. दिल  कोई  रूम  तो है  नहीं  की  किसी  को  भी  निकाल  दो  किसी  को  भी  रख  लो.
'यू  नो, आई ऍम  इन  लव.'
'तो  बोल  दो  उससे  जाके.'
'नहीं, क्यूंकि मुझे लगता है उसे भी प्यार है, और अगर  उसे  प्यार  है  तो  उसमे  बोलने  की  भी  डेयरिंग  होनी  चाहिए. वो  'आज  तुम  अच्छी  लग  रही  थी' भी  फ़ोन  पे  कहता  है. ये  तो  नोर्मल  फ्रेंड  इवेन  अननोन  भी  मुंह  पर  बोल  देते  हैं.'
मैं 'b' की हालत पे  हँसता  हूँ.

------अगले  फ्रायडे  को इवनिंग में-----
'कहाँ  जा  रहे  हो  विव?'.....पीछे  'b' है.
'सरदार  के  ढाबे  पे, अमन  वहीं है.' मैं  सीधे  सीधे  जबाव  देता  हूँ ....ये  पेट  भी  अजीब  चीज़  है, लोगों  को  कहाँ 
से  कहाँ  ला  देता  है, ढाबा  बाला  सरदार  जालंधर  से  है, और बेचारा  यहाँ मैसूर में  30 बाय 30 की  खुली  जगह  में  ढाबा  खोले  है.
....खैर, बेक  टू  द  ट्रैक-
'क्या  तुम  भी  पीते  हो ? तुम  तो  जैन  हो.'
'वैसे  'जैन' होने  या  न  होने  से  ज्यादा  फर्क  नहीं  पड़ता, लेकिन  मैं  नहीं  पीता  हूँ. लेकिन  मुझे  पास  बैठने  में  भी  कोई  परहेज़ नहीं  है. तुम  कहाँ  जा  रहे  हो?'
'वहीं  ढाबे  के  पहले  'टोनिफ' पे  खाना  खाने.'
'गुड....मुझे  तुमसे  कुछ  पूंछना  है.'
'क्या'?
'क्या  तुम  'उसे' पसंद  करते  हो?'
'हाँ शायद ......लेकिन  मेरी  भी  मजबूरी  है , ये  हेक्टिक  शेड्यूल और  'उसे',  दोनों को  मैं   एक  साथ  हेंडल  नहीं  कर  सकता.
तुम्हे  तो  पता  है  ट्रेनिंग  में  ध्यान  देना  ज़रूरी  है, नहीं  तो  फ़ैल  हो  जायेंगे.' ......मैं  कुछ  नहीं  कहता  हूँ. ये  साल्ला  इश्क  भी 
कस्टमाइज  हो  गया  है ......और  ये  इश्क  की  तरंगे  अब  दिल  से  नहीं  निकलती, दिमाग  से  निकलती  हैं.
'ब'बाय, रेस्टोरेंट आ  गया'
मैं  जवाब  नहीं  देता  हूँ.

-------वो  बेदर्द  शाम-----
'तुमने  चेक  किया , module  का  रिजल्ट  आया  है.' मेरे  क्लास  में  घुसते  ही  वो  कहती  है......'तुम्हारा  क्या  रहा?'.......'अपना  देखलो, मेरा  क्या  है   बता  ही  दूँगी.'
अपना  कंप्यूटर  खोलते  ही  मैं  उसे  अपना  रिजल्ट  बताता  हूँ ........  'मैं  फ़ैल  हो  गयी', वो  धीरे  से  बोलती  है.'......'पता  है  तुमने  क्लास  के  10 घंटों  में  6 घंटे  'उसकी' बात  की  है. यू  शुड कंसंट्रेट ऑन  यौर  स्टडीज़.'.....'हाँ  करूंगी.' वो  धीरे  से  बोलती  है.
    अब उसकी  ट्रेनिंग  एक  महीने  ज्यादा  चलेगी. उसकी  आँखों  में  आंसू  साफ़  देख  सकता  हूँ ......'मैं  उसे  समझाना  चाहता  हूँ  लेकिन  कहता  कुछ  नहीं.'

'विव  उसका  रिजल्ट  क्या  रहा' सामने  'b' है. ....'वो  फ़ैल  है.'....वो  मेरी  और  देखता  है , कहता  कुछ  नहीं. 'कांग्रेट्स मुझे  तुम्हारा 
रिजल्ट  पता  है , यू  आर  वन  ऑफ़  द टोपर्स.'......'थैंक्स, तुम्हारा  भी  तो  अच्छा  रहा  है .' वो  फोर्मलिटी  करता  है.
'शायद  अब  तुम्हे  पता  चल  गया  होगा  की  मैं  उसके  साथ  क्यों  नही  रहता  हूँ, रहता  तो  मैं  भी  फ़ैल  हो  गया  होता.' उसकी  बदतमीजी पर मैं  थप्पड़  मारना  चाहता  हूँ  बट एसा  करता  नहीं  हूँ. मुझे  उसपे  तरस  आता  है.
'.........या  शायद  तुम  दोनों  ही  बहुत  अच्छे  मार्क्स  लाते.' मैं  मुस्कुरा  के  निकल  जाता  हूँ. वो  पीछे  से  मुझे  घूर  रहा  है.

अपने कंप्यूटर पर  बैठा  हूँ .....बगल  बाली  टेबल  पर  उसका  मोबाइल  पड़ा  है .........वो  शायद  पेंट्री  गयी  है ....मैं  बेवजह ही   घुस  आई अ-सज्जनता  से  उसका   मोबाइल  उठा  लेता  हूँ.
'a' का  मैसेज  पड़ा  है -'यू  आर  सो  इंटेलिजेंट, इट  हेप्पेंस, लाइफ  में  एसा  चलता ही  रहता  है. डोंट  वरी. कहो  तो  सम्मर  ट्रेनिंग  में  मैं  तुम्हारे  पास  आ  जाऊं.'
इश्क  भी  अजीब  है, जिसे  हम  चाहते  हैं  वो  हमे  नहीं  चाहता  और  जो  हमे  चाहता  है  उसे  हम  नहीं  चाहते. किस पर  तरस  करूं, और  किसे  गलत  कहूं? 'a' का  प्यार, 'b' का  इनकार, या  बेचारी  वो  बेकरार? शायद  सभी  गलत हैं  और  शायद  कोई  भी  नहीं .......शायद  इश्क  की  ही  गलती  है.