Showing posts with label माखनलाल चतुर्वेदी. Show all posts
Showing posts with label माखनलाल चतुर्वेदी. Show all posts

Tuesday, April 7, 2015

निःशस्त्र सेनानी / माखनलाल चतुर्वेदी



‘सुजन, ये कौन खड़े है ?’ बन्धु ! नाम ही है इनका बेनाम ।
‘कौन करते है ये काम ?’ काम ही है बस इनका काम  ।
 
‘बहन-भाई’, हां कल ही सुना, अहिंसा आत्मिक बल का नाम,
‘पिता! सुनते है श्री विश्वेश, जननि?’ श्री प्रकॄति सुकॄति सुखधाम।
 
हिलोरें लेता भीषण सिन्धु पोत पर नाविक है तैयार
घूमती जाती है पतवार, काटती जाती पारावार ।
 
‘पुत्र-पुत्री है?’ जीवित जोश, और सब कुछ सहने की शक्ति;
‘सिद्धि’- पद-पद्मों मे स्वातन्त्र्य-सुधा-धारा बहने की शक्ति।
 
‘हानि?’ यह गिनो हानि या लाभ, नहीं भाती कहने की शक्ति,
‘प्राप्ति ?’- जगतीतल की अमरत्व, खड़े जीवित रहने की शक्ति।
 
विश्व चक्कर खाता है और सूर्य करने जाता विश्राम,
मचाता भावों का भू-कम्प, उठाता बांहें, करता काम ।
 
‘देह ?’- प्रिय यहाँ कहाँ परवाह टँगे शूली पर चर्मक्षेत्र,
‘गेह ?’- छोटा-सा हो तो कहूँ विश्व का प्यारा धर्मक्षेत्र !
 
‘शोक ?’- वह दुखियों की आवाज़ कँपा देती है मर्मक्षेत्र,
‘हर्ष भी पाते है ये कभी ?’ -तभी जब पाते  कर्मक्षेत्र।
 
फिसलते काल-करों से शस्त्र, कराली कर लेती मुँह बन्द;
पधारे ये प्यारे पद-पद्म, सलोनी वायु हुई स्वच्छंद ।
 
‘क्लेश ?’- वह निष्कर्मों का साथ कभी पहुँचा देता है क्लेश;
लेश भी कभी न की परवाह जानते इसे स्वयम सर्वेश।
 
‘देश ?’- यह प्रियतम भारत देश, सदा पशु-बल से जो बेहाल,
‘वेश ?’- यदि वॄन्दावन में रहे कहाँ जावे प्यारा गोपाल ।
 
द्रौपदी भारत माँ का चीर, बढ़ाने दौड़े यह महाराज,
मान लें, तो पहनाने लगूँ, मोर-पंखों का प्यारा ताज।
 
उधर वे दुःशासन के बन्धु, युद्ध-भिक्षा की झोली हाथ;
इधर ये धर्म-बन्धु, नय-बन्धु, शस्त्र लो,कहते है-‘दो साथ।’
 
लपकती है लाखों तलवार, मचा डालेंगी हाहाकार,
मारने-मरने की मनुहार, खड़े है बलि-पशु सब तैयार।
 
किन्तु क्या कहता है आकाश ? हॄदय ! हुलसो सुन यह गुंजार,
‘पलट जाये चाहे संसार, न लूंगा इन हाथों हथियार।’
 
‘जाति?’- वह मजदूरों की जाति, ‘मार्ग ?’ यह काँटों वाला सत्य;
‘रंग?’ -श्रम करते जो रह जाय, देख लो दुनिया भर के भॄत्य ।
 
‘कला?’- दुखिःयों की सुनकर तान, नॄत्य का रंग-स्थल हो धूल;
‘टेक ?’- अन्यायों का प्रतिकार, चढ़ाकर अपना जीवन-फ़ूल ।
 
‘क्रान्तिकर होंगे इनके भाव ?’ विश्व में इसे जानता कौन?
‘कौनसी कठिनाई है?’- यहीं, बोलते है ये भाषा मौन !
 
‘प्यार ?’-उन हथकड़ियों से और कॄष्ण के जन्म-स्थल से प्यार !
‘हार ?’- कन्धों पर चुभती हुई अनोखी जंजीरें है हार !
 
‘भार ?’- कुछ नहीं रहा अब शेष, अखिल जगतीतल का उद्धार !
‘द्वार ?’ उस बड़े भवन का द्वार, विश्व की परम मुक्ति का द्वार !
 
पूज्यतम कर्म-भूमि स्वच्छंद, मची है डट पड़ने की धूम;
दहलता नभ मंडल ब्रम्हाण्ड, मुक्ति के फट पड़ने की धूम !
 
( १९१३ , हिमतरंगिणी)
(महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ़्रीका संग्राम पर)

Saturday, April 4, 2015

कैदी और कोकिला / माखनलाल चतुर्वेदी


क्या गाती हो?
क्यों रह-रह जाती हो?
कोकिल बोलो तो !
क्या लाती हो?
सन्देशा किसका है?
कोकिल बोलो तो !

ऊँची काली दीवारों के घेरे में,
डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,
जीने को देते नहीं पेट भर खाना,
मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना !
जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,
शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?
हिमकर निराश कर चला रात भी काली,
इस समय कालिमामयी जगी क्यूँ आली ?

क्यों हूक पड़ी?
वेदना-बोझ वाली-सी;
कोकिल बोलो तो !
बन्दी सोते हैं, है घर-घर श्वासों का
दिन के दुख का रोना है निश्वासों का,
अथवा स्वर है लोहे के दरवाजों का,
बूटों का, या सन्त्री की आवाजों का,
या गिनने वाले करते हाहाकार ।
सारी रातें है-एक, दो, तीन, चार-!
मेरे आँसू की भरीं उभय जब प्याली,
बेसुर! मधुर क्यों गाने आई आली?

क्या हुई बावली?
अर्द्ध रात्रि को चीखी,
कोकिल बोलो तो !
किस दावानल की
ज्वालाएँ हैं दीखीं?
कोकिल बोलो तो !

निज मधुराई को कारागृह पर छाने,
जी के घावों पर तरलामृत बरसाने,
या वायु-विटप-वल्लरी चीर, हठ ठाने
दीवार चीरकर अपना स्वर अजमाने,
या लेने आई इन आँखों का पानी?
नभ के ये दीप बुझाने की है ठानी !
खा अन्धकार करते वे जग रखवाली
क्या उनकी शोभा तुझे न भाई आली?

तुम रवि-किरणों से खेल,
जगत् को रोज जगाने वाली,
कोकिल बोलो तो !
क्यों अर्द्ध रात्रि में विश्व
जगाने आई हो? मतवाली
कोकिल बोलो तो !

दूबों के आँसू धोती रवि-किरनों पर,
मोती बिखराती विन्ध्या के झरनों पर,
ऊँचे उठने के व्रतधारी इस वन पर,
ब्रह्माण्ड कँपाती उस उद्दण्ड पवन पर,
तेरे मीठे गीतों का पूरा लेखा
मैंने प्रकाश में लिखा सजीला देखा।

तब सर्वनाश करती क्यों हो,
तुम, जाने या बेजाने?
कोकिल बोलो तो !
क्यों तमोपत्र पत्र विवश हुई
लिखने चमकीली तानें?
कोकिल बोलो तो !

क्या?-देख न सकती जंजीरों का गहना?
हथकड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश-राज का गहना,
कोल्हू का चर्रक चूँ? -जीवन की तान,
मिट्टी पर अँगुलियों ने लिक्खे गान?
हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ,
खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूआ।
दिन में कस्र्णा क्यों जगे, स्र्लानेवाली,
इसलिए रात में गजब ढा रही आली?

इस शान्त समय में,
अन्धकार को बेध, रो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो !
चुपचाप, मधुर विद्रोह-बीज
इस भाँति बो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो !

काली तू, रजनी भी काली,
शासन की करनी भी काली
काली लहर कल्पना काली,
मेरी काल कोठरी काली,
टोपी काली कमली काली,
मेरी लोह-श्रृंखला काली,
पहरे की हुंकृति की व्याली,
तिस पर है गाली, ऐ आली !

इस काले संकट-सागर पर
मरने की, मदमाती !
कोकिल बोलो तो !
अपने चमकीले गीतों को
क्योंकर हो तैराती !
कोकिल बोलो तो !

तेरे `माँगे हुए’ न बैना,
री, तू नहीं बन्दिनी मैना,
न तू स्वर्ण-पिंजड़े की पाली,
तुझे न दाख खिलाये आली !
तोता नहीं; नहीं तू तूती,
तू स्वतन्त्र, बलि की गति कूती
तब तू रण का ही प्रसाद है,
तेरा स्वर बस शंखनाद है।

दीवारों के उस पार !
या कि इस पार दे रही गूँजें?
हृदय टटोलो तो !
त्याग शुक्लता,
तुझ काली को, आर्य-भारती पूजे,
कोकिल बोलो तो !

तुझे मिली हरियाली डाली,
मुझे नसीब कोठरी काली!
तेरा नभ भर में संचार
मेरा दस फुट का संसार!
तेरे गीत कहावें वाह,
रोना भी है मुझे गुनाह !
देख विषमता तेरी मेरी,
बजा रही तिस पर रण-भेरी !

इस हुंकृति पर,
अपनी कृति से और कहो क्या कर दूँ?
कोकिल बोलो तो!
मोहन के व्रत पर,
प्राणों का आसव किसमें भर दूँ!
कोकिल बोलो तो !

फिर कुहू !—अरे क्या बन्द न होगा गाना?
इस अंधकार में मधुराई दफनाना?
नभ सीख चुका है कमजोरों को खाना,
क्यों बना रही अपने को उसका दाना?
फिर भी कस्र्णा-गाहक बन्दी सोते हैं,
स्वप्नों में स्मृतियों की श्वासें धोते हैं!
इन लोह-सीखचों की कठोर पाशों में
क्या भर देगी? बोलो निद्रित लाशों में?

क्या? घुस जायेगा स्र्दन
तुम्हारा नि:श्वासों के द्वारा,
कोकिल बोलो तो!
और सवेरे हो जायेगा
उलट-पुलट जग सारा,
कोकिल बोलो तो !