कहते हैं जंगल में कब, क्या और कैसे हो जाए, कोई नहीं जानता। अभी कुछ ही समय हुआ है इस जगह का अतिरिक्त प्रभार लिए, लेकिन यह अनुभव ताउम्र के लिए जेहन में दर्ज हो गया है।
दिसंबर 2023.. सर्दी की एक रात का वक्त था, गश्त के दौरान अचानक पंकज से खबर मिली कि जंगल के बीचों-बीच एक बाघ का बच्चा अकेला पड़ा है। हम मौके पर पहुंचे तो देखा—हथेली जितना छोटा, आंखें भी पूरी तरह नहीं खुली थीं, बस धीमी सी आवाज़ में अपनी मां को पुकार रहा था। लगभग 8 दिन की उम्र... यानी वह पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर था। आसपास बाघिन के पदचिह्न तो थे, लेकिन वह कहीं दिख नहीं रही थी।
नियम और भावना के बीच की कशमकश शुरू हुई। हमारा पहला मकसद था कि बच्चा अपनी मां से मिल जाए, क्योंकि मां के आंचल से बड़ी कोई सुरक्षा नहीं होती। हमने तय किया कि हम दूर से निगरानी रखेंगे। पूरी रात हम वहीं रहे, सांसें थामे इंतजार करते रहे कि शायद बाघिन वापस आए और उसे ले जाए। अंधेरी रात, जंगल की खामोशियां और वह नन्हा शावक—वक्त जैसे ठहर गया था।
लेकिन सुबह की पहली किरण तक भी कोई हलचल नहीं हुई। बाघिन का न आना खतरे की घंटी थी। शायद वह किसी वजह से उसे छोड़ के (परित्याग कर) चली गई थी (जंगल में अक्सर इस होता है)। अब उस बच्चे को वहां छोड़ना उसे मौत के मुंह में धकेलने जैसा था।
सुबह होते ही हमने वरिष्ठों के निर्देश पर प्रोटोकॉल के तहत उसका मेडिकल परीक्षण (Health Checkup) करवाया। वह बहुत कमजोर था और उसे तत्काल देखभाल की जरूरत थी। अंततः भारी मन से, लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए, निर्णय लिया गया कि उसे मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी, सतना भेजा जाए।
सफर के दौरान जब वह नन्हा बच्चा हमारी टीम की तरफ देख रहा था, तो लगा जैसे वह पूछ रहा हो कि "मेरी मां कहां है?" लेकिन एक फॉरेस्ट ऑफिसर के तौर पर कभी-कभी हमें 'पिता' बनकर कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। उसे मुकुंदपुर में सुरक्षित छोड़ दिया गया।
वो 8 दिन का नन्हा मेहमान आज भी याद आता है, टाइगर स्टेट की उम्मीद की एक किरण सा...
फोटो: नन्हा बाघ का बच्चा परीक्षण के दौरान।
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