Saturday, April 22, 2017

इकबाल : वो आलातरीन शायर जिसने मुल्क ही नहीं, हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब के भी टुकड़े कर डाले

अल्लामा इकबाल के बारे में हिंदुस्तान में राय अलग-अलग हो सकती है. एक तबका यह कहता है कि वे अपने दौर के सबसे महान शायर थे और दूसरा यह कि हिंदुस्तान की तकसीम उन्हीं की देन है. हर एक की अपनी-अपनी कैफ़ियत है. सही या ग़लत कहने वाले हम कौन होते हैं?
इकबाल के पूर्वज सप्रू गोत्र के कश्मीरी ब्राहमण थे, जिन्होंने लगभग ढाई सौ साल पहले इस्लाम क़ुबूल कर लिया था. उनके पूर्वज कारोबार के सिलसिले में जम्मू से पंजाब के सियालकोट में आकर बस गए थे. इकबाल पढने-लिखने में तेज़ थे. उन्हें स्कूल में वज़ीफ़ा मिलता था. सियालकोट से मैट्रिक पास करके लाहौर आये और वहां सरकारी कॉलेज में दाखिला ले लिया. यहां आकर उनकी मुलाकात अंग्रेज़ प्रोफेसर अर्नाल्ड से हुई जो अरबी-फ़ारसी के विद्वान थे. अर्नाल्ड ने उनके ज़हन पर काफी असर डाला और इकबाल का उनसे जिंदगी भर राब्ता रहा.
शायरी का जुनून और राष्ट्रवाद
लाहौर उन दिनों इल्म औ अदब का गढ़ था. यहां मुशायरों की धूम होती थी. आहिस्ता-आहिस्ता इकबाल ने उन मुशायरों में शिरकत शुरू कर दी. उनके हुनर से मुतास्सिर होकर ‘ऑबसर्वर’ रिसाला (पत्रिका) के पहले मुदिर (एडिटर) शेख अब्दुल कादिर ने लिखा - ‘मैंने उन्हें पहली मर्तबा लाहौर के एक मुशायरे में उन्हें देखा. इस बज़्म में उन्हें उनके चंद हम-जमाअत (सहपाठी) खींच लाये थे और उन्होंने कह-सुनकर एक ग़ज़ल भी उनसे पढ़वाई. उस वक़्त लाहौर में लोग इकबाल के नाम से वाबस्ता (परिचित) नहीं थे. छोटी सी ग़ज़ल थी. सादा से अलफ़ाज़, ज़मीन भी मुश्किल न थी. मगर कलाम में शोखी और बेसाख्तापन (नयापन) मौजूद था. बहुत पसंद की गयी. इसके बाद दो-तीन मर्तबा इसी मुशायरे में उन्होंने ग़ज़ल पढ़ी और लोगों को इल्म हुआ कि एक होनहार शायर मैदान में आया है. मगर यह शोहरत पहले-पहल बाज़ ऐसे लोगों तक महदूद रही जो तालीमी मशागिल (पेशे) से ताल्लुक रखते थे. इतने में एक अदबी (साहित्यिक) मजलिस (बैठक) कायम हुई जिसमें महाशीर (उस तरह के लोग) शरीक होने लगे और नज़्म व नस्र (ख्याल) के मज़ामीन (विषय) की इसमें मांग हुई. शेख मुहम्मद इकबाल ने उसके एक जलसे में अपनी वह नज़्म जिसमें ‘कोह हिमाला’ से खिताब है पढ़कर सुनाई. उसमें अंग्रेजी ख़यालात थे और फ़ारसी बंदिशे. इस पर ख़ूबी ये कि वतनपरस्ती की चाशनी उसमें मौजूद थी. मजाके-ज़माना और ज़रुरियाते वक्त के मवाकिफ (मुताबिक) होने के सबाब बहुत मकबूल हुई...’
यूं तो इकबाल ने ग़ज़ल कहना स्कूल के ज़माने से ही शुरू कर दिया था और शुरू में वे अपनी ग़ज़लें दुरुस्त करवाने के लिए डाक से उस्ताद दाग़ देहलवी के पास भेजते थे. हज़रत दाग़ को जल्द ही इकबाल के हुनर का अंदाज़ा हो गया और दो-चार ग़ज़लें देखने के बाद ही लिख दिया कि इनमे सुधार की गुंजाइश नहीं है. सोचिये, दाग़ देहलवी जैसा नामचीन उस्ताद एक नए शायर के बारे में यह कहे तो कितनी बड़ी बात होगी.
लाहौर के माहौल में उनकी सोच पुख्ता होती है और अब वे देश-दुनिया, मजदूर क्रांति और समाजवाद की बातें करने लग जाते हैं. वे ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा...’ लिखते हैं. वे मज़हबी पाबंदियों और रूढ़ियों को पसंद नहीं करते और वतनपरस्ती को उनसे ऊपर रखते हुए लिखते हैं:
‘सच कह दूं ऐ बरहमन! गर तू बुरा न माने,
तेरे सनमकदे के बुत हो गए पुराने,
पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाके वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है.’
यहां तक तो सब ठीक ही नज़र आता है पर जब वे विलायत पढ़ने जाते हैं तो किस्सा बदल जाता है.
विलायत में पढाई और ज़हनी तलातुम (उथल-पुथल)
इकबाल 1905 में आगे पढने के लिए यूरोप चले गए. उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से बीए और जर्मनी की लुडविग मैक्सिमिलन यूनिवर्सिटी से दर्शन में डॉक्टरेट हासिल की. इंग्लैंड में उन्हें फिर प्रोफ़ेसर अर्नाल्ड का साथ मिला. विलायत में पढ़ने के दौरान उनमें एक ख़ास परिवर्तन आया - वहां के माहौल ने ज़ेहन पर इस कदर असर डाला कि जिस राष्ट्रवाद को वे अपना सबसे बड़ा मज़हब मानते थे, उस पर से उनका यकीन उठ गया. उन्हें लगा कि साम्राज्यवाद के हितों को साधने के लिए ‘राष्ट्रवाद’ का चोला पहना दिया जाता है. अवाम को धोखे में रखने के लिए ‘वतन का नया बुत’, नया देवता खड़ा किया गया है. अब वे लिखते हैं:
‘इन ताज़ा खुदाओं में, बड़ा सबसे वतन है,
जो पैराहन(कपडा) है उसका, वह मज़हब का कफ़न है’
और जहां ‘तराना-ए-हिंद’ में वे हिंदुस्तान को सारे जहां से अच्छा बताते हैं, ‘तराना-ऐ-मिल्ली’ में लिखते हैं:
‘चीन-औ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
मुस्लिम हैं हम वतन हैं, सारा जहां हमारा.’
यहां तक आते-आते मुस्लिम लीग को एक ऐसा अदबी शख्स मिल जाता है जो पार्टी की रूपरेखा बदल देता है.
इकबाल और द्विराष्ट्र का सिद्धांत
बात थोड़ी फ़ास्ट-फॉरवर्ड तरीके से आगे बढ़ाते हैं. इलाहाबाद में 29 दिसंबर, 1930 के दिन इकबाल मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के तौर पर भाषण में ‘द्विराष्ट्र के सिद्धांत’ का मसला हवा में उछाल देते हैं. इकबाल के भाषण का यह अंश कुछ इस तरह हैं - ‘मैं चाहता हूं पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत, सिंध, बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाया जाए. स्वायत्य शासन की सरकार बने चाहे हुकूमते बर्तानिया के झंडे के नीचे या अलग. उत्तर-पश्चिम में मुसलमान राज्य की स्थापना मुझे अब आख़िरी मंज़िल आती है...’
इसकी तक़रीर में उन्होंने सदियों के हिंदू-मुसलमान भाईचारे को इतर रखकर कहा कि ’ न हमारे ख़यालात एक हैं, न रिवाज़, तारीख में दर्ज जो लोग हमारे आदर्श हैं वो हिंदुओं के नहीं और जो उनके हैं, वो हमारे नहीं.’ कुछ ऐसी ही बात हिंदू संगठन भी कह रह थे. मुल्क अब बस कुछ ही साल दूर था आज़ादी से. हवाएं तेज़ हो चली थीं. कौमी रंग हर चेहरे पर नुमायां हो रहा था. सरमायेदार बनने के लिए हर कोई बेचैन था. सबको अपना-अपना हिस्सा चाहिए था. मुल्क किसी को नहीं. रह गए थे तो बस मोहनदास करमचंद गांधी ‘खान’ और अब्दुल गफ्फार खान ‘गांधी’ सरीखे चंद लोग.
इसी दौर में इकबाल के दो ख़ास कलाम ‘ज़र्बे-कलीम’ और ‘बाल-ऐ-जिब्रील’ शाया हुए (छपे). पहले में उन्होंने आधुनिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ जंग के ऐलान की आवाज़ उठाई और दूसरे में वे ‘उम्माह’ में यकीन करने का आवाहन करते हैं. दरअसल, इकबाल ने इस्लाम ही को अपना मुल्क मान लिया था. ओटोमन राज्य के बिखरने से आज़ाद हुए बाल्कन राज्यों पर ख़ुश होने के बजाय वे अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं और ख़ुदा से ‘शिकवा’ करते हैं कि जो मुसलमान एकेश्वरवाद के लिए खड़े हुए थे आज इस तरह क्यूं हार रहे हैं? क्यूं वो पिछड़े हुए हैं और अगर ये हाल रहा तो कोई उनका नाम लेने वाला न रहेगा. बाद में उन्होंने ‘जवाब-ऐ-शिकवा’ लिखा जिसमें इस्लाम को मानने वालों को अपने डर, ग़ुरबत, पिछड़ेपन से लड़ने के लिए हौसला दिया.
बात अब खत्म करते हैं. इकबाल की शायरी और विचारों में मतभेद हो सकता है. पर इसमें कोई शक नहीं है कि वे उस दौर के सबसे आलातरीन शायर थे. उन्होंने गर इस्लाम की आजादी के लिये लिखा है तो राम, स्वामी रामतीर्थ और गुरुनानक पर भी लिखा. हो सकता है आप ‘सारे जहां से अच्छा...’ न गाएं पर ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी...’ गाये बिना नहीं रह पायेंगे. मैं भी नहीं रह सकता
लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी
दूर दुनिया का मेरे दम अंधेरा हो जाये
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये
हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
जिंदगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म की शमा से हो मुझको मोहब्बत या रब
हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्दमंदों से ज़इफ़ों से मुहब्बत करना
मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको
1938 में आज ही का दिन उनका आख़िरी दिन था.
चलते-चलते
इकबाल ने कुछ समय के लिए उर्दू में लिखना छोड़ दिया था. यह उस दौर की बात है जब उन्हें महसूस हुआ कि अगर अपनी बात इस्लाम को मानने वालों तक पहुचाना है तो फ़ारसी में लिखना होगा. 1930 के बाद फिर दुबारा वे उर्दू में लिखने लग जाते हैं. दरअस्ल, उर्दू सिर्फ हिंदुस्तान में ही बोली जाती है. उन्होंने इसे मुसलमानों की ज़बान मानने से इंकार कर दिया था. सही भी है. उर्दू इस मुल्क की जुबां है. हमें यह सोचना होगा कि क्या 9 नवंबर को जब इकबाल पैदा हुए थे, हमें ‘उर्दू दिवस’ के रूप में मानना चाहिए?
Source: Satyagrah (https://satyagrah.scroll.in/article/106356/iqbal-was-great-shayar-who-is-responsible-for-breaking-indias-cultural-unity)

Saturday, April 8, 2017

बिछोह

उन खतों को जिनमें मेरी खुशबू बसी है
सिरहाने रख वो मेरी छुअन महसूस करती है.

एक टैडी कत्थई सा, सीने से लगा
माथे को चूमता हूँ
जैसे उसकी मांग में भरा सिन्दूर होंठों से लगाया हो.

शोक का एक गीत बज उठता है
काली रात में मधुकामिनी के फूल
खुशबुएँ बिखेरते रो देते हैं.

बिछोह अगर आदमी होता
पिघल के मर गया होता
उस रात इतने गर्म आंसू गिरे थे.

बम कांड के बाद भगत सिंह ने अदालत से कहा…

Bhagat Singh
हमारे ऊपर गंभीर आरोप लगाए गए हैं. इसलिए यह आवश्यक है कि हम भी अपनी सफाई में कुछ शब्द कहें. हमारे कथित अपराध के संबंध में निम्नलिखित प्रश्न उठते हैं: (1) क्या वास्तव में असेंबली में बम फेंके गये थे, यदि हां तो क्यों? (2) नीचे की अदालत में हमारे ऊपर जो आरोप लगाए गए हैं, वे सही हैं या गलत?
पहले प्रश्न के पहले भाग के लिए हमारा उत्तर स्वीकारात्मक है, लेकिन तथाकथित चश्मदीद गवाहों ने इस मामले में जो गवाही दी है, वह सरासर झूठ है. चूंकि हम बम फेंकने से इनकार नहीं कर रहे हैं इसलिए यहां इन गवाहों के बयानों की सच्चाई की परख भी हो जानी चाहिए. उदाहरण के लिए, हम यहां बता देना चाहते हैं कि सार्जेंट टेरी का यह कहना कि उन्होंने हममें से एक के पास से पिस्तौल बरामद की, एक सफेद झूठ मात्र है, क्योंकि जब हमने अपने आपको पुलिस के हाथों में सौंपा तो हममें से किसी के पास कोई पिस्तौल नहीं थी. जिन गवाहों ने कहा है कि उन्होंने हमें बम फेंकते देखा था, वे झूठ बोलते हैं. न्याय तथा निष्कपट व्यवहार को सर्वोपरि मानने वाले लोगों को इन झूठी बातों से एक सबक लेना चाहिए. साथ ही हम सरकारी वकील के उचित व्यवहार तथा अदालत के अभी तक के न्यायसंगत रवैये को भी स्वीकार करते हैं.
पहले प्रश्न के दूसरे हिस्से का उत्तर देने के लिए हमें इस बमकांड जैसी ऐतिहासिक घटना के कुछ विस्तार में जाना पड़ेगा. हमने वह काम किस अभिप्राय से तथा किन परिस्थितियों के बीच किया, इसकी पूरी एवं खुली सफाई आवश्यक है.
जेल में हमारे पास कुछ पुलिस अधिकारी आये थे. उन्होंने हमें बताया कि लार्ड इर्विन ने इस घटना के बाद ही असेम्बली के दोनों सदनों के सम्मिलित अधिवेशन में कहा है कि ‘यह विद्रेाह किसी व्यक्ति विशेष के ख़िलाफ़ नहीं, वरना सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था के विरुद्ध था.’ यह सुनकर हमने तुरंत भांप लिया कि लोगों ने हमारे इस काम के उद्देश्य को सही तौर पर समझ लिया है.
मानवता को प्यार करने में हम किसी से पीछे नहीं हैं. हमें किसी से व्यक्तिगत द्वेष नहीं है और हम प्राणिमात्र को हमेशा आदर की नज़र से देखते आए हैं. हम न तो बर्बरतापूर्ण उपद्रव करने वाले देश के कलंक हैं, जैसा कि सोशलिस्ट कहलाने वाले दीवान चमनलाल ने कहा है, और न ही हम पागल हैं, जैसा कि लाहौर के ‘ट्रिब्यून’ तथा कुछ अन्य अख़बारों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है. हम तो केवल अपने देश के इतिहास, उसकी मौजूदा परिस्थिति तथा अन्य मानवोचित आकांक्षाओं के मननशील विद्यार्थी होने का विनम्रतापूर्वक दावा भर कर सकते हैं. हमें ढोंग तथा पाखंड से नफ़रत है.
यह काम हमने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा विद्वेष की भावना से नहीं किया है. हमारा उद्देश्य केवल उस शासन-व्यवस्था के विरुद्व प्रतिवाद करना था जिसके हर एक काम से उसकी अयोग्यता ही नहीं वरन अपकार करने की उसकी असीम क्षमता भी प्रकट होती है. इस विषय पर हमने जितना विचार किया उतना ही हमें इस बात का दृढ़ विश्वास होता गया कि वह केवल संसार के सामने भारत की लज्जाजनक तथा असहाय अवस्था का ढिंढोरा पीटने के लिए ही क़ायम है और वह एक ग़ैर-ज़िम्मेेदार तथा निरंकुश शासन का प्रतीक है.
जनता के प्रतिनिधियों ने कितनी ही बार राष्ट्रीय मांगों को सरकार के सामने रखा, परंतु उसने उन मांगों की सर्वथा अवहेलना करके हर बार उन्हें रद्दी की टोकरी में डाल दिया. सदन द्वारा पास किए गए गंभीर प्रस्तावों को भारत की तथाकथित पार्लियामेंट के सामने ही तिरस्कारपूर्वक पैरों तले रौंदा गया है, दरमनकारी तथा निरंकुश क़ानूनों को समाप्त करने की मांग करने वाले प्रस्तावों को हमेशा अवज्ञा की दृष्टि से ही देखा गया है और जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों ने सरकार के जिन क़ानूनों तथा प्रस्तावों को अवांछित एवं अवैधानिक बताकर रद्द कर दिया था, उन्हें केवल कलम हिलाकर ही सरकार ने लागू कर लिया है.
संक्षेप में, बहुत कुछ सोचने के बाद भी एक ऐसी संस्था के अस्तित्व का औचित्य हमारी समझ में नहीं आ सका, जो बावजूद उस तमाम शानो-शौकत के, जिसका आधार भारत के करोड़ों मेहनतकशों की गाढ़ी कमाई है, केवल मात्र दिल को बहलाने वाली, थोथी, दिखावटी और शरारतों से भरी हुई एक संस्था है. हम सार्वजनिक नेताओं की मनोवृत्ति को समझ पाने में भी असमर्थ हैं. हमारी समझ में नहीं आता कि हमारे नेतागण भारत की असहाय परतंत्रता की खिल्ली उड़ाने वाले इतने स्पष्ट एवं पूर्वनियोजित प्रदर्शनों पर सार्वजनिक संपत्ति एवं समय बर्बाद करने में सहायक क्यों बनते हैं.
हम इन्हीं प्रश्नों तथा मज़दूर आंदोलन के नेताओं की धरपकड़ पर विचार कर ही रहे थे कि सरकार औद्योगिक विवाद विधेयक लेकर सामने आई. हम इसी संबंध में असेंबली की कार्यवाही देखने गए. वहां हमारा यह विश्वास और भी दृढ़ हो गया कि भारत की लाखों मेहनतकश जनता एक ऐसी संस्था से किसी बात की भी आशा नहीं कर सकती जो भारत की बेबस मेहनतकशों की दासता तथा शोषकों की गलाघोंटू शक्ति की अहितकारी यादगार है.
अंत में वह क़ानून, जिसे हम बर्बर एवं अमानवीय समझते हैं, देश के प्रतिनिधियों के सर पर पटक दिया गया, और इस प्रकार करोड़ों संघर्षरत भूखे मज़दूरों को प्राथमिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया और उनके हाथों से उनकी आर्थिक मुक्ति का एकमात्रा हथियार भी छीन लिया गया. जिस किसी ने भी कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मूक मेहनतकशों की हालत पर हमारी तरह सोचा है वह शायद स्थिर मन से यह सब नहीं देख सकेगा. बलि के बकरों की भांति शोषकों, और सबसे बड़ी शोषक स्वयं सरकार है, की बलिवेदी पर आए दिन होने वाली मज़दूरों की इन मूक क़ुर्बानियों को देखकर जिस किसी का दिल रोता है, वह अपनी आत्मा की चीत्कार की उपेक्षा नहीं कर सकता.
गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी समिति के भूतपूर्व सदस्य स्वर्गीय श्री एसआर दास ने अपने प्रसिद्ध पत्र में अपने पुत्र को लिखा था कि इंग्लैंड की स्वप्ननिद्रा भंग करने के लिए बम का उपयोग आवश्यक था. श्री दास के इन्हीं शब्दों को सामने रखकर हमने असेंबली भवन में बम फेंके थे. हमने वह काम मज़दूरों की तरफ़ से प्रतिरोध प्रदर्शित करने के लिए किया था. उन असहाय मज़दूरों के पास अपने मर्मान्तक क्लेशों को व्यक्त करने का और कोई साधन भी तो नहीं था. हमारा एकमात्र उद्देश्य था ‘बहरों को सुनाना’ और उन पीड़ितों की मांगों पर ध्यान न देने वाली सरकार को समय रहते चेतावनी देना.
हमारी ही तरह दूसरों की भी परोक्ष धारणा है कि प्रशांत सागर रूपी भारतीय मानवता की ऊपरी शांति किसी भी समय फूट पड़ने वाले एक भीषण तूफ़ान की द्योतक है. हमने तो उन लोगों के लिए सिर्फ़ ख़तरे की घंटी बजाई है जो आने वाले भयानक ख़तरे की परवाह किए बग़ैर तेज़ रफ़्तार से आगे की तरफ़ भागे जा रहे हैं. हम लोगों को सिर्फ़ यह बता देना चाहते हैं कि ‘काल्पनिक अहिंसा’ का युग अब समाप्त हो चुका है और आज की उठती हुई नयी पीढ़ी को उसकी व्यर्थता में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं रह गया है.
मानवता के प्रति हार्दिक सद्भाव तथा अमित प्रेम रखने के कारण उसे व्यर्थ के रक्तपात से बचाने के लिए हमने चेतावनी देने के इस उपाय का सहारा लिया है. और उस आने वाले रक्तपात को हम ही नहीं, लाखों आदमी पहले से ही देख रहे हैं.
ऊपर हमने ‘काल्पनिक अहिंसा’ शब्द का प्रयोग किया है. यहां पर उसकी व्याख्या कर देना भी आवश्यक है. आक्रामक उद्देश्य से जब बल का प्रयोग होता है उसे हिंसा कहते हैं, और नैतिक दृष्टिकोण से उसे उचित नहीं कहा जा सकता. लेकिन जब उसका उपयोग किसी वैध आदर्श के लिए किया जाता है तो उसका नैतिक औचित्य भी होता है. किसी हालत में बल-प्रयोग नहीं होना चाहिए, यह विचार काल्पनिक और अव्यावहारिक है. इधर देश में जो नया आंदोलन तेज़ी के साथ उठ रहा है, और जिसकी पूर्व सूचना हम दे चुके हैं वह गुरु गोविन्द सिंह, शिवाजी, कमाल पाशा, रिजा खां, वाशिंगटन, गैरीबाल्डी, लफायत और लेनिन के आदर्शों से ही प्रस्फुरित है और उन्हीं के पद-चिन्हों पर चल रहा है. चूंकि भारत की विदेशी सरकार तथा हमारे राष्ट्रीय नेतागण दोनों ही इस आंदोलन की ओर से उदासीन लगते हैं और जानबूझकर उसकी पुकार की ओर से अपने कान बंद करने का प्रयत्न कर रहे हैं, अतः हमने अपना कर्त्तव्य समझा कि हम एक ऐसी चेतावनी दें जिसकी अवहेलना न की जा सके.
अभी तक हमने इस घटना के मूल उद्देश्य पर ही प्रकाश डाला है. अब हम अपना अभिप्राय भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं.
यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इस घटना के सिलसिले में मामूली चोटें खाने वाले व्यक्तियों अथवा असेंबली के किसी अन्य व्यक्ति के प्रति हमारे दिलों में कोई वैयक्तिक विद्वेष की भावना नहीं थी. इसके विपरीत हम एक बार फिर स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम मानव-जीवन को अत्यन्त पवित्र मानते हैं और किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुंचाने के बजाय हम मानव-जाति की सेवा में हंसते-हंसते अपने प्राण विसर्जित कर देंगे. हम साम्राज्यवाद की सेना के भाड़े के सैनिकों जैसे नहीं हैं जिनका काम ही हत्या होता है. हम मानव-जीवन का आदर करते हैं और बराबर उसकी रक्षा का प्रयत्न करते हैं. इसके बाद भी हम स्वीकार करते हैं कि हमने जान-बूझकर असेंबली भवन में बम फेंके.
साभार: विकीपीडिया
साभार: विकीपीडिया
घटनाएं स्वयं हमारे अभिप्राय पर प्रकाश डालती हैं. और हमारे इरादों की परख हमारे काम के परिणाम के आधार पर होनी चाहिए न कि अटकल एवं मनगढ़ंत परिस्थितियों के आधार पर. सरकारी विशेषज्ञ की गवाही के विरुद्ध हमें यह कहना है कि असेंबली भवन में फेंके गये बमों से वहां की एक खाली बेंच को ही कुछ नुकसान पहुंचा और लगभग आधे दर्जन लोगों को मामूली-सी खरोंचें-भर आईं. सरकारी वैज्ञानिकों ने कहा है कि बम बड़े ज़ोरदार थे और उनसे अधिक नुकसान नहीं हुआ, इसे एक अनहोनी घटना ही कहना चाहिए. लेकिन हमारे विचार से उन्हें वैज्ञानिक ढंग से बनाया ही ऐसा गया था. पहली बात, दोनों बम बेंचों तथा डेस्कों के बीच की खाली जगह में ही गिरे थे. दूसरे, उनके फूटने की जगह से दो फीट पर बैठे हुए लोगों को भी, जिनमें श्री पीआर राव, श्री शंकर राव तथा सर जार्ज शुस्टर के नाम उल्लेखनीय हैं, या तो बिलकुल ही चोंटें नहीं आईं या मात्र मामूली आईं.
अगर उन बमों में ज़ोरदार पोटैशिमय क्लोरेट और पिक्रिक एसिड भरा होता, जैसा कि सरकारी विशेषज्ञ ने कहा है, तो इन बमों ने उस लकड़ी के घेरे को तोड़कर कुछ गज की दूरी पर खड़े लोगों तक को उड़ा दिया होता. और यदि उनमें कोई और भी शक्तिशाली विस्फोटक भरा जाता तो निश्चय ही वे असेंबली के अधिकांश सदस्यों को उड़ा देने में समर्थ होते. यही नहीं, यदि हम चाहते तो उन्हें सरकारी कक्ष में फेंक सकते थे जो विशिष्ट व्यक्तियों से खचाखच भरा था. या फिर उस सर जान साइमन को अपना निशाना बना सकते थे, जिसके अभागे कमीशन ने प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के दिल में उसकी ओर से गहरी नफ़रत पैदा कर दी थी और जो उस समय असेंबली की अध्यक्ष दीर्घा में बैठा था. लेकिन इस तरह का हमारा कोई इरादा नहीं था और उन बमों ने उतना ही काम किया जितने के लिए उन्हें तैयार किया गया था. यदि उससे कोई अनहोनी घटना हुई तो यही कि वे निशाने पर अर्थात निरापद स्थान पर गिरे.
इसके बाद हमने इस कार्य का दंड भोगने के लिए अपने-आप को जान-बूझकर पुलिस के हाथों समर्पित कर दिया. हम साम्राज्यवादी शोषकों को यह बता देना चाहते थे कि मुट्ठी-भर आदमियों को मारकर किसी आदर्श को समाप्त नहीं किया जा सकता और न ही दो नगण्य व्यक्तियों को कुचलकर राष्ट्र को दबाया जा सकता है. हम इतिहास के इस सबक पर ज़ोर देना चाहते थे कि परिचय-चिन्ह तथा बास्तीय (फ्रांस की कुख्यात जेल जहां राजनीतिक बंदियों को घोर यंत्राणाएं दी जाती थीं) फ्रांस के क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलने में समर्थ नहीं हुए थे, फांसी के फंदे और साइबेरिया की खानें रूसी क्रांति की आग को बुझा नहीं पाई थीं. तो फिर, क्या अध्यादेश और सेफ्टी बिल्स भारत में आज़ादी की लौ को बुझा सकेंगे? षड्यंत्रों का पता लगाकर या गढ़े हुए षड्यंत्रों द्वारा नौजवानों को सज़ा देकर या एक महान आदर्श के स्वप्न से प्रेरित नवयुवकों को जेलों में ठूंसकर क्या क्रांति का अभियान रोका जा सकता है? हां, सामयिक चेतावनी से, बशर्ते कि उसकी उपेक्षा न की जाय, लोगों की जानें बचाई जा सकती हैं और व्यर्थ की मुसीबतों से उनकी रक्षा की जा सकती हैं. आगाही देने का यह भार अपने ऊपर लेकर हमने अपना कर्त्तव्य पूरा किया है.
(भगतसिंह से नीचे की अदालत में पूछा गया था कि क्रांति से उन लोगों का क्या मतलब है? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा था कि) क्रांति के लिए ख़ूनी लड़ाइयां अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है. वह बम और पिस्तौल का संप्रदाय नहीं है. क्रांति से हमारा अभिप्राय है अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन.
समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं. दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुंहताज हैं. दुनिया भर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने-भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है. सुंदर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गंदे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं. इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं.
यह भयानक असमानता और ज़बर्दस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है. यह स्थिति अधिक दिनों तक क़ायम नहीं रह सकती. स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियां मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं.
सभ्यता का यह महल यदि समय रहते संभाला न गया तो शीघ्र ही चरमराकर बैठ जाएगा. देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है. और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं उनका कर्त्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धांतों पर समाज का पुनर्निर्माण करें. जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, समाप्त नहीं कर दिया जाता, तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असंभव है, और तब तक युद्धों को समाप्त कर विश्व-शांति के युग का प्रादुर्भाव करने की सारी बातें महज ढोंग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं. क्रांति से हमारा मतलब अन्ततोगत्वा एक ऐसी समाज-व्यवस्था की स्थापना से है जो इस प्रकार के संकटों से बरी होगी और जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा. और जिसके फलस्वरूप स्थापित होेने वाला विश्व-संघ पीड़ित मानवता को पूंजीवाद के बंधनों से और साम्राज्यवादी युद्ध की तबाही से छुटकारा दिलाने में समर्थ हो सकेगा.
यह है हमारा आदर्श. और इसी आदर्श से प्रेरणा लेकर हमने एक सही तथा पुरज़ोर चेतावनी दी है. लेकिन अगर हमारी इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया और वर्तमान शासन-व्यवस्था उठती हुई जनशक्ति के मार्ग में रोड़े अटकाने से बाज न आई तो क्रांति के इस आदर्श की पूर्ति के लिए एक भयंकर युद्ध का छिड़ना अनिवार्य है. सभी बाधाओं को रौंदकर आगे बढ़ते हुए उस युद्ध के फलस्वरूप सर्वहारा वर्ग के अधिनायकतंत्र की स्थापना होगी. यह अधिनायकतंत्र क्रांति के आदर्शों की पूर्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा. क्रांति मानवजाति का जन्मजात अधिकार है जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता. स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है, जनता की सर्वोपरि सत्ता की स्थापना ही श्रमिक वर्ग का अंतिम लक्ष्य है. इन आदर्शों के लिए और इस विश्वास के लिए हमें जो भी दंड दिया जाएगा, हम उसका सहर्ष स्वागत करेंगे. क्रांति की इस पूजा-वेदी पर हम अपना यौवन नैवेद्य के रूप में लाए हैं, क्योंकि ऐसे महान आदर्श के लिए बड़े से बड़ा त्याग भी कम है. हम संतुष्ट हैं और क्रांति के आगमन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर रहे हैं.
इंक़लाब ज़िंदाबाद!
(www.marxists.org से साभार. यह फाइल आरोही, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित संकलन ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ (संपादक: राजेश उपाध्याय एवं मुकेश मानस) के मूल फाइल से ली गई है.)
Source: The Wire Hindi

Friday, April 7, 2017

फ़रोग फ़रोखज़ाद | Forough Farrokhzad

अभिवादन सूर्य का / फ़रोग फ़रोखज़ाद

  
एकबार फिर से मैं अभिवादन करती हूँ सूर्य का
मेरे अंदर जो बह रही है नदी
मेरी अंतहीन सोच के घुमड़ते मेघों का सिलसिला
बाग में चिनार की अनगढ़ बढ़ी हुईं क्यारियाँ
गर्मी के इस मौसम में भी
सब मेरे साथ-साथ चल रहे हैं।

खेतों में रात में आने वाली गंध
मुझ तक पहुँचाने वाले कौवों के झुंड भी
मेरी माँ भी जिसका
इस आईने में अब अक्स दिखता है
और मुझे खूब मालूम है
बुढ़ापे में दिखूँगी मैं हू-ब-हू वैसी ही।

एक बार मैं फिर से धरती का अभिवादन करूँगी
जिसकी आलोकित आत्मा में
जड़े हुए है मेरे अविराम आवेग के हरे-भरे बीज।

मैं लौटूँगी, ज़रूर लौटूँगी, मुझे लौटना ही होगा
अपनी लटों के साथ, नम माटी की सुगंध के साथ
अपनी आँखों के साथ,
अंधकार की गहन अनुभूतियों के साथ,
उन जंगली झाड़ियों के साथ
जिन्हें दीवार के उस पार से
चुन चुनकर मैंने इकट्ठा किया था।

मैं लौटूँगी, ज़रूर लौटूँगी, मुझे लौटना ही होगा
प्रवेश द्वार सजाया जाएगा प्रेम के बंदनवार से
और वहीं खड़ी होकर मैं एकबार फिर से
उन सबका स्वागत करूँगी
जो प्रेम में हैं डूबे हुए आकंठ
देखो तो एक लड़की अब भी खड़ी है वहाँ
प्रेम से सिरे तक आकुल।



बंदी / फ़रोग फ़रोखज़ाद

मैं तुम्हें चाहती हूँ हालाँकि मालूम है
कभी अपने सीने से लगा नहीं पाऊंगी तुम्हें
स्वच्छ और चमकीले आकाश हो तुम
और मैं अपने पिंजरे के इस कोने में
दुबकी हुई एक बंदी चिड़िया।

सर्द और काली सलाखों के पीछे से
बढ़ती हैं तुम्हारी ओर
लालसापूर्ण मेरी कातर निगाहें
आतुर होकर देखती रहती हूँ बाट उस बांह की
जो मुझ तक पहुँचे और मैं फड़फड़ाकर खोल दूँ
अपने सारे पंख तुम्हारी ओर।

सोचती हूँ, गफ़लत के पल भी आएँगे
और मैं इस सन्नाटे की क़ैद से उड़ जाऊँगी फुर्र से
पहरेदार की आँखों के इर्द-गिर्द करूँगी चुहलबाजियाँ
और नए सिरे से श्रीगणेश करूँगी
जीवन का तुम्हारे साथ-साथ।

ऐसी ही बातें सोचती रहती हूँ
हालाँकि मालूम है
है नहीं मुझमें इतना साहस
कि मुक्ति के आकाश में उड़ चलूँ
कालकोठरी से बाहर –
पहरेदार बहुत मेहरबान भी हो जाएँ
नहीं मिलेगी मुझे इतनी साँस और हवा
कि फड़फड़ाकर उड़ सकें मेरे पंख।

हर एक चटक सुबह सलाखों के पीछे से
मेरी आँखों में आँखें डालकर मुस्कुराता है एक बच्चा
और जब मैं उन्मत्त होकर गाना शुरू करती हूँ खुशी के गीत
बढ़ आते हैं उसके मुरझाए हुए होंठ मुझ तक चूमने को मुझे।

मेरे आकाश, जब कभी मैं चाहूँ
इस सन्नाटे की कालकोठरी से भाग कर तुम तक पहुँचना
क्या सफाई दूँगी कलपते हुए उस बच्चे की आँखों को
कि बंदी चिड़ियों का ही मालिक होता है
एक ही मालिक
क़ैदखाना।

मैं वह शमा हूँ
जो आत्मदाह से रौशन करते है अपने घोंसले
यदि मैं बुझा दूँगी अपनी आग और लौ
तो फिर कहाँ बचेगा
यह अदद घोंसला भी।




स्नान / फ़रोग फ़रोखज़ाद

अठखेलियाँ करती हवा में मैंने अपने कपड़े उतारे
कि नहा सकूँ कलकल बहती नदी में
पर स्तब्ध रात ने बाँध लिया मुझे अपने मोहपाश में
और ठगी-सी मैं
अपने दिल का दर्द सुनाने लगी पानी को।

ठंडा था पानी और थिरकती लहरों के साथ बह रहा था
हल्के से फुसफुसाया और लिपट गया मेरे बदन से
और जागने-कुलबुलाने लगीं मेरी चाहतें

शीशे जैसे चिकने हाथों से
धीरे-धीरे वह निगलने लगा अपने अंदर
मेरी देह और रूह दोनों को ही।

तभी अचानक हवा का एक बगूला उठा
और मेरे केशों में झोंक गया धूल-मिट्टी
उसकी साँसों में सराबोर थी
जंगली फूलों की पगला देने वाली भीनी ख़ुशबू
यह धीरे-धीरे भरती गई मेरे मुँह के अंदर।

आनंद में उन्मत्त हो उठी मैंने
मूँद लीं अपनी आँखें
और रगड़ने लगी बदन अपना
कोमल नई उगी जंगली घास पर
जैसी हरकतें करती है प्रेमिका
अपने प्रेमी से सटकर
और बहते हुए पानी में
धीरे-धीरे मैंने खो दिया अपना आपा भी
अधीर, प्यास से उत्तप्त और चुंबनों से उभ-चुभ
पानी के काँपते होंठों ने
गिरफ़्त में ले लीं मेरी टांगें
और हम समाते चले गए एक दूसरे में…
देखते – देखते
तृप्ति और नशे से मदमत्त
मेरी देह और नदी की रूह
दोनों ही जा पहुँचे – गुनाह के कटघरे में।



पाप / फ़रोग फ़रोखज़ाद

मैंने पाप किया पर पाप में था निस्सीम आनंद
समा गई गर्म और उत्तप्त बाँहों में
मुझसे पाप हो गया
पुलकित, बलशाली और आक्रामक बाँहों में।

एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में
मैंने उसकी रहस्यमयी आँखों में देखा
सीने में मेरा दिल ऐसे आवेग में धड़का
उसकी आँखों की सुलगती चाहत ने
मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया।

एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में
जब मैं उससे सटकर बैठी
अंदर का सब कुछ बिखर कर बह चला
उसके होंठ मेरे होंठों में भरते रहे लालसा
और मैं अपने मन के
तमाम दुखों को बिसराती चली गई।

मैंने उसके कान में प्यार से कहा –
मेरी रूह के साथी, मैं तुम्हें चाहती हूँ
मैं चाहती हूँ तुम्हारा जीवनदायी आलिंगन
मैं तुम्हें ही चाहती हूँ मेरे प्रिय
और सराबोर हो रही हूँ तुम्हारे प्रेम में।

चाहत कौंधी उसकी आँखों में
छलक गई शराब उसके प्याले में
और मेरा बदन फिसलने लगा उसके ऊपर
मखमली गद्दे की भरपूर कोमलता लिए।

मैंने पाप किया पर पाप में था निस्सीम आनंद
उस देह के बारूद में लेटी हूँ
जो पड़ा है अब निस्तेज और शिथिल
मुझे यह पता ही नहीं चला हे ईश्वर !
कि मुझसे क्या हो गया
एकांत के उस अँधेरे और नीरव कोने में।


वो जो नहीं है किसी जैसा / फ़रोग फ़रोखज़ाद

मैंने एक ख़्वाब देखा कि कोई आ रहा है.
मैंने एक लाल सितारे को ख़्वाब में देखा,
और मेरी पलकें झपकने लगती हैं
मेरे जूते तड़कने लगते हैं
अगर मैं झूठ बोल रही हूँ
तो अन्धी हो जाऊँ.
मैंने तब उस लाल सितारे का ख़्वाब देखा
जब मैं नींद में नहीं थी,
कोई आ रहा है,
कोई आ रहा है,
कोई बेहतर.

कोई आ रहा है,
कोई आ रहा है,
वो जो अपने दिल में हम जैसा है,
अपनी साँसों में हम जैसा है,
अपनी आवाज़ में हम जैसा है,
वो जो आ रहा है
जिसे रोका नहीं जा सकता
हथकड़ियाँ बाँध कर जेल में नहीं फेंका जा सकता
वो जो पैदा हो चूका है
याह्या के पुराने कपडों के नीचे,
और दिन ब दिन
होता जाता है बड़ा, और बड़ा,
वो जो बारिश से,
वो जो बून्दों के टपकने की आवाज़ से ,
वो जो फूलों के डालियों की फुसफुसाहट में,
जो आसमान से आ रहा है
आतिशबाज़ी की रात मैदान-ए-तूपखाने में
दस्तर-ख्वान बिछाने
रोटियों के हिस्से करने
पेप्सी बाँटने
बाग़-ए-मेली के हिस्से करने
काली खाँसी की दवाई बाँटने
नामज़दगी के दिन पर्चियाँ बाँटने
सभी को अस्पताल के प्रतीक्षालयों के कमरे बाँटने
रबड़ के जूते बाँटने
फरदीन सिनेमा के टिकट बाँटने
सय्यद जवाद की बिटिया के कपड़े देने
देने वह सब जो बिकता नहीं
और हमें हमारा हिस्सा तक देने.
मैंने एक ख़्वाब देखा.