Tuesday, June 8, 2010

क्यों.... क्यों गये हो इतने दूर?

कानों में,
आज भी गूंजती है
तुम्हारी आवाज़.
फेफड़ों को छलनी कर जाती है,
हवा संग बह
तुम्हारी खुशबू.

इतनी दूर क्यों गये मुझसे,
कि जेहन में भी
धुंधला गये हो तुम.

आज भी,
सांझ ढले लगता है
जैसे तुम,
जला जाओगे बत्तियां.
कर जाओगे रोशन
हमारा घर,
सपनों का घर.

आज,
हर सपना, हर महल
खंडहर सा लगता है,
तुम्हारे बिना.
खुद में जकड़ा सा,
दर्द में बुझा-बुझा 
महसूस करता हूँ.
मैं नहीं करता रोशन
अपना घर,
इतनी हिम्मत ही नही होती मेरी.

तन्हाई में
रोता हूँ मैं,
चंद नवेली साँसों के लिए.
तब लगता है
वैसे ही,
पीछे से आ
तुम थाम लोगे मेरे कंधे.
फिर हाथों में हाथ ले 
दिखा दोगे मुझे राह,
बना दोगे सड़कें,
या खुद ही बन जाओगे मंजिल.

क्यों....
क्यों गये हो इतने दूर?
कि पथरा गईं हैं मेरी आँखें,
तुम्हारी बाट जोहते-जोहते.

वो सड़क,
जहाँ हर सुबह 
हम उन्मुक्त घुमा करते थे,
वर्षों से वैसे पड़ी है.
अब तो पत्तों ने भी,
झड़-झड़ कर
उसपर मोटी परत बना ली है.
कूड़े का,
लम्बा ढेर लगती है दूर से.

क्यों,
क्यों चले गये इतने दूर?
कि वापसी की
हर राह तुम्हें बिसर गई?

तुम्हें लौटता ना देख,
भूलना चाहता हूँ मैं.
पर उन्मुक्त आस बन,
फिर-फिर आ जाते हो,
मेरे पास.
इतने दूर गये हो तुम,
कि शायद ना आ सको लौटकर.
फिर भी मेरा दिल
यह मानने तैयार नहीं.

तुम जिंदा रहोगे,
हमेशा मेरे मन में,
जेहन में.

Friday, May 28, 2010

बुढ़ापा







तब.....
मैं उसे,
कभी बेटू, कभी छोटू,
कभी चिल्ड, कभी शैतान,
कभी प्यारे, कभी दुलारे,
कह के बुलाता था,
और वो दौड़ा चला आता था.

अब....
वो मुझे,
कभी बुड्ढ़े, कभी ओल्डी,
कभी बापू, कभी दद्दू,
कभी निकम्मे,कभी पागल,
बुलाता है,
और मैं दौड़ा चला आता हूँ
,

Saturday, March 27, 2010

......................उलझन

हाँ ना की उलझन में ये तन्हाई उलझ गई.
ख्याल जो संजोये थे, पुलाव बन गये.
धुप में जो थे, सब छाँव बन गये.
दूर से देखा तो एक शहर की आस थी,
पास पहुंचे, सब गाँव बन गये.

ख्याल किया तेरा, तो ख्याली उलझ गयी.
जबाबों के भंवर में एक सवाली उलझ गयी.
चंद लफ्ज सुनने हम बिता बैठे जीवन.
दिल में जज्बात लिए खामोश रहे तुम.
खामोश ये ख़ामोशी कहर बन गयी.
अरमान की उमड़ती लहर बन गयी.

ढूढ़ते रहे हम तेरा निशां कहाँ है,
उंघती आँखों में पाया तुझको.
पलकों पे बैठी मेरे गीत गुनगुना रही थी.
दर्द में सिमटी जिरह गा रही थी,
मजबूरी पे अपनी मुस्कुरा रही थी.
तेरी मजबूरी मुझको गुनाह बन गई.
बे-मंजिल सी राह बन गई.

हाँ-ना की उलझन में तन्हाई उलझ गई.
पलकों के बीच अटकी रुलाई उलझ गई.

Thursday, March 4, 2010

Hello friends, I am not occupied till 8th March....college have GT till this. So I am free, just reading, writing, painting,blogging, playing and enjoying............Read and left your valuable comments on my these frequent poems. Thanking u.


 U knw, wt i made?? even i dnt.......but its a good way to show whole nature with decodesigns by just three color ball pens. :)

Monday, March 1, 2010

अँधेरे की ओर छितराती शाम


उन्नीदे होते हम,
अँधेरे की ओर छितराती ये शाम,
अदभुत! अतुल्य!! सुन्दर!!!

ढलता, पिघलता सूरज
जैसे अस्तित्व भांप रहा हो.
विराग, विहग खगकुल,
राग अपने गा छितरा गया.
समूचा गगन उसमे समा गया.
बचे सूरज की रौशनी समेटते
देहरी पे जलते दिए,
लौटती पन्हारिनें,
बदरंगे बादल,
खुशनुमा मौसम........
 फिर हमारे बीच से निकलती रेल,
जैसे सम्पूर्ण सौंदर्य मंडरा गया हो.

 प्रकृति रंग रंगे हम,
खग विहग गान,
अँधेरे की ओर छितराती शाम,
अदभुत! अतुल्य!! सुन्दर!!!

Sunday, January 31, 2010

विदर्भ के किसान का फोटो!


बेटियां भेंट करते,
विदर्भ के किसान का फोटो!
देश का सच कहने काफी है.
बीस रूपये सैकड़ा से,
लिया गया ब्याज.
चुकाते-चुकाते मर गये आप!
खेती भी बेंची, घर भी बेंच डाला,
साहूकार ने सबकुछ पचा डाला.
अब बचीं जवान बेटियां,
वो भी भेंट करो,
क़र्ज़ चुक जायेगा!
हवश से मिटता क़र्ज़,
देश करता तरक्की!
विकास की बात कहाँ तक सच्ची?

फोटो

पत्थर फोडती औरतों का
फोटो कितना दयनीय है.
दर्द से झुकती कमर,
बदन पसीने से तर,
हाथों में पड़ते फफोले,
पत्थरों पे नहीं,
सीधे आत्मा पर पड़ते हथोड़े!
क्या यह हमें ललकार नहीं रहा?


खेत पर,
पत्थरों के बीच लेटे
दुध्मुहें बच्चे का फोटो.
कितनी कराह है इसमें!
खेत जोतते माँ-बाप,
लत्तों से ढंका,
भूखा-दुधमुंहा,
तीव्र किरणों से,
अपने को समेटता है.
क्या फायदा,
सर ढंकने झोपड़ी कहाँ है,
बनाने पैसे कहाँ है!


बेटियां भेंट करते,
विदर्भ के किसान का फोटो!
देश का सच कहने काफी है.
बीस रूपये सैकड़ा से,
लिया गया ब्याज.
चुकाते-चुकाते मर गये आप!
खेती भी बेंची, घर भी बेंच डाला,
साहूकार ने सबकुछ पचा डाला.
अब बचीं जवान बेटियां,
वो भी भेंट करो,
क़र्ज़ चुक जायेगा!
हवश से मिटता क़र्ज़,
देश करता तरक्की!
विकास की बात कहाँ तक सच्ची?


ये फोटो कितने अजीब हैं,
संसद का फोटो कितना मोटा,
पेपर के मुख्य पृष्ट पर आता है.
दर्दील देश का असली सच,
यूँ ही गम हो जाता है.

Wednesday, January 6, 2010

Shades n Mood!!

रोते रोते हंसा दिया,
चार पल ढूंढ के,
पत्थरों से बह निकला,
कुछ दरारें ढूंढ के.
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खून के लफ्ज़ नहीं,
धब्बों से पहचान है.
गहरा है या मटमैला,
मौत ही दास्ताँ है.
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कर इबादत तेरी,
हम बेफिक्र हो लिए खुदा!
जब कहर ढाया गया,
गाज पहले हमपर गिरी!
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देखकर रास्ता मेरा,
सारा ज़माना हंस दिया.
फिर वक़्त के दरिये से,
सिर्फ हमही उबर कर निकले!
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आशिकी की आग थी,
देर तक जलती रही.
बुझी भी तो क्या बुझी,
जो तुझे फ़ना कर गई.
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कोई चार पल हंस दिया,
उन्हें भरोसा हो गया.
यहाँ हम भरोसा दिलाते,
आधी सदी गुजार दिए!
----
हंस दो मुस्कुराकर,
क्या मिलेगा रुलाकर.
आज हम उल्फत में हैं,
तेरी मुस्कान की जरूरत है.
                                      ~ViV's

इंतज़ार 
मैं इंतज़ार में,
पात सा
हरे  से पीत हो गया,
और अब
श्यामल पड़,
डाल से टूट बिखर गया.
अस्तित्वहीन रह गया.
काश! तुम,
बादल सा बरसते,
सींचते,
तो हम भी हरे होते.
नहीं मरे होते.

Sunday, December 13, 2009


मैं और मेरे पिता  


पिता की आँखें,
वो दीर्घ में देखती आँखें.
आँखों में पलता सपना-
की पाऊं में सफलता.
उन्होंने जो किया संघर्ष,
वो न करना पड़े मुझे!
लड़ना न पड़े मुझे.

मैं-नालायक
संघर्ष नियति मान करता हूँ.
अपना सपना पाल
खुद के लिए लड़ता हूँ.

अब,
हमारे सपने टकरा गये.
उनका सपना दीर्घ, मेरा सपना शुन्य,
उनकी नज़र में यह बूँद!!
मैं जीते या वो, नहीं पता.
पर मैं सफलता पा गया,
पा के इठला गया.

मैं सोचता हूँ,
वो देखते-मैं कितना खुश हूँ,
अपना सपना साकार कर,
पा सफलता अपने आधार पर.

वो सोचते हैं,
काश! बेटा देखे,
वो खुश हैं, उसकी लगन से,
उसने पाया, जो चाहा मन से.

लेकिन,
मैं दुखी हूँ, उनका सपना न साकार कर,
वो दुखी हैं, सपने थोपने के आधार पर.

हम,
खुश हैं,भीतर से,
दुखी, बाहर से.

मैं, पिता और ये अटूट बंधन,
हँसता, इठलाता ये जीवन.